समान प्राण और कृकल उपप्राण, समान प्राण, समान वायु, समान वात, कृकल उपप्राण, कृकल उपवायु, कृकल लघुवायु, जठराग्नि, सत्त्वगुण, सगुण निर्गुण तत्त्व, समता, सम तत्त्व, सर्वसम तत्त्व, योगमार्ग का प्राण

समान प्राण और कृकल उपप्राण, समान प्राण, समान वायु, समान वात, कृकल उपप्राण, कृकल उपवायु, कृकल लघुवायु, जठराग्नि, सत्त्वगुण, सगुण निर्गुण तत्त्व, समता, सम तत्त्व, सर्वसम तत्त्व, योगमार्ग का प्राण

इस अध्याय में समान प्राण और कृकल उपप्राण, समान प्राण (समान वायु, समान वात),  कृकल उपप्राण (कृकल उपवायु, कृकल लघुवायु), जठराग्नि, सत्त्वगुण, सगुण निर्गुण तत्त्व, समता, सम तत्त्व, सर्वसम तत्त्व और योगमार्ग का प्राण आदि बिंदुओं पर बात होगी I

 

हृदयाकाश गर्भ के मुख्य भाग
हृदयाकाश गर्भ के मुख्य भाग, हृदयाकाश गर्भ के भाग

 

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2011 ईस्वी के प्रारम्भ का है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भत्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भत्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकेर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का उनतालीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये अध्याय आंतरिक यज्ञमार्ग की श्रृंखला का छठा अध्याय है।

 

हृदयाकाश का प्राण गुफा, हृदयाकाश का प्राणमय गुफा
हृदयाकाश का प्राण गुफा, हृदयाकाश का प्राणमय गुफा

 

समान प्राण और कृकल उपप्राण का नाता, समान वायु और कृकल लघुवायु का नाता, समान प्राण और कृकल लघुप्राण का नाता, समान वात और कृकल उपवात, समान लघु और कृकल लघुवयू, … समान प्राण और सत्त्वगुण, समान प्राण और सगुण निर्गुण तत्त्व, समान प्राण और समता, समान प्राण और सर्वसमता, समान प्राण और ब्रह्मलोक, समान प्राण और सदाशिव का सद्योजात मुख, समान प्राण और परा प्रकृति, समान प्राण और वामदेव ब्रह्म, समान प्राण और माँ गायत्री का धवला मुख, समान प्राण और आदिशक्ति, …

 

हृदय में पञ्च प्राण और उपप्राण का तंत्र
हृदय में पञ्च प्राण और उपप्राण का तंत्र

 

सनातन गुरुदेव बोले… यह समान वायु उदर क्षेत्र की वायु है और इसका मूल स्थान नाभि क्षेत्र होता है I यह वायु, उदर क्षेत्र की ऊर्जाओं सहित अन्य सभी ऊर्जाओं को अपने ही भीतर की ओर लेके जाती है, उनको संगठित करती है और अंततः उन सभी ऊर्जाओं को समतावादी ही बना देती है I यह प्राण हरे-पीले वर्ण का भी हो सकता है, लेकिन अंततः यह श्वेत ही पाया जाएगा I समान प्राण के मध्य की अवस्था समता की है, इसलिए इस प्राण का मध्य भाग श्वेत वर्ण का होता है I यही कारण है कि इसका नाम समान कहा गया है I सम तत्त्व इस वायु के मध्य में ही पाया जाता है, इसलिए इस वायु के अंतिम साक्षात्कार के समय इसका वर्ण श्वेत ही पाया जाता है I श्वेत वर्ण सगुण निर्गुण तत्त्व का द्योतक है, और यह वर्ण समतावाद को भी दर्शाता है I क्यूंकि यह वायु सबकुछ अपने भीतर ही समाती है, इसलिए इस वायु के मध्य भाग में सर्वसमता ही पाई जाती है I इस समान वायु का उपप्राण कृकल कहलाता है I

हृदयाकाश में प्राणमय कोष, हृदयाकाश के पञ्च प्राण
हृदयाकाश में प्राणमय कोष, हृदयाकाश के पञ्च प्राण

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह वर्ण सदाशिव के सद्योजात मुख से भी नाता रखता है I सदाशिव का सद्योजात मुख ही ब्रह्मलोक कहलाता है, जो सर्वसम सगुण निराकार होता है, और जिसके देवता सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति ही हैं, जो हीरे के समान प्रकाश को धारण किए हुए होते हैं I पञ्चब्रह्म मार्ग में, इस वर्ण का नाता वामदेव ब्रह्म से भी है I इसी वर्ण का नाता माँ गायत्री के धवला मुख से भी होता है I और इसी वर्ण का नाता परा प्रकृति से भी है, जिसकी दिव्यता को माँ आदि शक्ति कहा जाता है और जो एक बहुत सूक्ष्म श्वेत वर्ण, सगुण साकार मातृ स्वरूप को धारण करे हुए देवी हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… क्यूंकि इस समान प्राण सहित, सभी के सभी पञ्च प्राण समस्त पिण्डों और ब्रह्माण्ड में भी निवास करते हैं, इसलिए इस समस्त ब्रह्म रचना में सभी दशाओं के मध्य भाग सर्वसम तत्त्व से ही संबद्ध होते हैं I जो कुछ भी इस जीव जगत में है, उस सबके मध्य में समता नामक तत्त्व ही पाया जाता है और ऐसा होने का मूल कारण भी यह समान प्राण ही है I समता नामक तत्त्व के गुण को ही सत्त्वगुण कहते हैं I ऐसा होने के कारण ही समता का विधान बहुत सारे योगतन्त्रों में भी, किसी न किसी रूप में अपनाया गया था I

नन्हें विद्यार्थी ने गुरुदेव को अपना सर हिलाकर संकेत दिया कि उसे समझ आ गया है I

 

समान प्राण और सूक्ष्म श्वेत शरीर, सूक्ष्म श्वेत शरीर, श्वेत सिद्ध शरीर, परा प्रकृति शरीर, सगुण निर्गुण शरीर, सगुण निर्गुण सिद्ध शरीर, आदिशक्ति शरीर, सम शरीर, सम तत्त्व का शरीर,  हीरे के समान सिद्ध शरीर, हीरे का सिद्ध शरीर, सूक्ष्म श्वेत शरीर, सर्वसम शरीर, सदाशिव के सद्योजात मुख की सिद्धि, सदाशिव के सद्योजात मुख का सिद्ध शरीर, ब्रह्मलोक का सिद्ध शरीर, ब्रह्मा का सिद्ध शरीर, प्रजापति का सिद्ध शरीर, वामदेव ब्रह्म का सिद्ध शरीर, …

सनातन गुरु बोले… इस प्राण का सिद्ध शरीर श्वेत वर्ण का होता है, इसलिए इसको श्वेत सिद्ध शरीर भी कहा जा सकता है I इस श्वेत शरीर का नाता समता नामक तत्त्व से होता है, इसलिए यह इस प्राण का यह सिद्ध शरीर, समता सिद्ध शरीर और समता शरीर भी कहलाया जा सकता है I इस समता तत्त्व का नाता सगुण निर्गुण ब्रह्म से होता है, इसलिए इस सिद्ध शरीर को सगुण निर्गुण ब्रह्म शरीर भी कहा जा सकता है I और इस सगुण निर्गुण ब्रह्म की जो प्राकृत दशा है, वह परा प्रकृति कहलाती है और इसी कारण से यह सिद्ध शरीर, परा प्रकृति शरीर भी कहलाया जा सकता है I और क्यूँकि परा प्रकृति ही आदिशक्ति कहलाई गई हैं, इसलिए इस सिद्ध शरीर को आदिशक्ति सिद्ध शरीर और आदिशक्ति शरीर भी कहा जा सकता है I

सनातन गुरुदेव बोले… यह शरीर एक अतिसूक्ष्म श्वेत वर्ण के मेघ के समान होता है और अंततः परा प्रकृति में ही विलीन हो जाता है I ऐसे विलीन होने के पश्चात वह सिद्ध शरीर भी परा प्रकृति और सगुण निर्गुण ब्रह्म के समान, सगुण निराकार ही हो जाता है I इन सभी दशाओं का स्थान, साधक के शरीर के भीतर नाभि में समान प्राण के मध्य भाग में ही होता है I इसी परा प्रकृति को नवम आकाश भी कहा गया है, इसलिए, इस सिद्ध शरीर को नवम आकाश का सिद्ध शरीर भी कहा जा सकता है I ब्रह्म रचना के समय परा ही प्रकृति का प्रथम कोश हुआ था और क्यूँकि उत्कर्ष पथ रचना के मार्ग से विपरीत ही होता है, इसलिए उत्कर्ष मार्गों में परा प्रकृति का साक्षात्कार, प्रकृति के नौ कोशों के साक्षात्कार मार्ग की अंत में ही होता है I और क्यूँकि परा प्रकृति, अर्थात प्रकृति के नवम कोष का साक्षात्कार, अपरा प्रकृति के आठों कोशों के साक्षात्कार के पश्चात ही होता है, इसलिए यह साक्षात्कार और इसका सिद्ध शरीर यह भी स्पष्ट दर्शाता है, कि इसका साक्षात्कारी साधक उसके अपने उत्कर्ष पथ में अपरा प्रकृति के आठों कोषों को पार कर चुका है I

सनातन गुरु आगे बोले… उत्कर्ष पथ पर जैसे ही साधक के अहम्, बुद्धि, चित्त, मन और प्राण उस समता में बस जाते हैं, जो समान प्राण से संबंधित है, वैसे ही साधक स्वयं को ही सम तत्त्व स्वरूप में देखता है, और उसी समता में स्वयं भी बस जाता है I ऐसी दशा में साधक पाता है कि यह समता नामक तत्त्व व्यापक ही है और ऐसा इसलिए पाया जाता है क्यूंकि परा प्रकृति (या प्रकृति का नवम कोष) अन्य सभी प्राकृतिक दशाओं से सूक्ष्म है, जिसके कारण यह परा प्रकृति सभी प्राकृतिक दशाओं को भेदकर उनके भीतर भी पाई जाती है I ऐसी दशा में वह साधक स्वयं के भीतर प्रतिष्ठित हुई समता को सर्वव्यापक पाकर, उस समता के गंतव्य को पा जाता है, जो सर्वसमता कहलाता है, और जिसका सीधा सीधा नाता वामदेव ब्रह्म से और सदाशिव के सद्योजात मुख से भी होता है I

सनातन गुरु आगे बोले… इसी दशा से वह साधक इस समान प्राण की गंतव्य दशा की ओर जाकर, उसको प्राप्त भी होता है और जो हीरे के समान प्रकाश को धारण करी हुई होती है I पञ्च मुखा सदाशिव मार्ग में इस दशा का संबंध सदाशिव के सद्योजात मुख से भी होता है, और पञ्च ब्रह्म मार्ग में इस दशा का संबंध वामदेव ब्रह्म से है I इसका नाता सर्वसम ब्रह्म से भी है, जो सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामाह ब्रह्म कहलाए हैं, और जो तैंतीस कोटि देवी देवताओं में तैंतीसवें देवता, प्रजापति ही हैं I इसका सिद्ध शरीर भी हेरे के समान प्रकाशमान होता है और सर्वसम ब्रह्म को दर्शाता है, जिसके कारण इसको सर्वसम ब्रह्म शरीर भी कहा जा सकता है, और इस सिद्ध शरीर को प्रजापति शरीर (प्रजापति सिद्ध शरीर) भी कहा जा सकता है I इस सिद्ध शरीर का नाता हीरे का समान प्रकाशमान ब्रह्मलोक से भी है, इसलिए इस सिद्ध शरीर को ब्रह्मा शरीर और ब्रह्मलोक शरीर भी कहा जा सकता है I

नन्हें विद्यार्थी ने अपने गुरुदेव को सर हिलाकर संकेत दिया कि उसे समझ आ गया है I

 

समान प्राण और युग स्थापक, समान प्राण और युग संस्थापक, समान प्राण और गुरुयुग स्थापक, समान प्राण और गुरुयुग संस्थापक, … समान प्राण और सत्त्वगुण का नाता, समान प्राण और सगुण निर्गुण ब्रह्म का नाता, समान प्राण और नाभि लिंग, … समान प्राण और जठराग्नि का नाता, समान प्राण और अमृत कलश का नाता, समान प्राण और वैदिक कलश का नाता, समान प्राण और वैदिक कलश सिद्धांत, समान प्राण और नाभि क्षेत्र का अमृत, समान प्राण और आयुर्वेद का अमृत, समान प्राण और मनात्मा, समान प्राण और ब्रह्मचर्य, … समान प्राण और सत्त्वगुण का नाता, समान प्राण का सगुण निर्गुण ब्रह्म से नाता, समान प्राण का समता से नाता, समान प्राण का सम ब्रह्म से नाता, समान प्राण का आदिशक्ति से नाता, …

सनातन गुरु बोले… इस हीरे के समान शरीर का लय ब्रह्मलोक में होता है I इस सिद्ध शरीर का धारक सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति स्वरूप होता है I ऐसा योगी उत्पत्ति कृति का धारक भी होता है, जिसके प्रयोग से वो आवश्यक दशाएँ और स्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है I

सनातन गुरु बोले… ऐसा योगी तब लौटाया जाता है जब गुरुयुग का आगमन होता है, और वह भी तब, जब उस गुरुयुग का ज्ञानमय चेतनमय क्रियामय आधार डालना होता है I ऐसा आधार अतिसूक्ष्म होता हुआ भी, शिवमय और शक्तिमय ही होता है I ऐसे आधार के मूल में वैदिक महावाक्य ही होते हैं, और ऐसा होने पर भी उस योगी का मूल वैदिक महावाक्य, सामवेद का “तत् त्वम् असि” ही होता है I और इस प्रक्रिया में, इस महावाक्य का नाता ब्रह्म के सगुण साकार, सगुण निराकार, सगुण निर्गुण साकार, सगुण निर्गुण निराकार, शून्य, शून्य ब्रह्म, सर्वसमता और निर्गुण निराकार, इन सभी स्वरूपों से होता है I उस गुरुयुग का ऐसा आधार भी वह योगी उसकी अपनी इच्छा शक्ति का आलम्बन लेकर ही डालता है I वह योगी जो गुरु युग का स्थापक (गुरुयुग का संस्थापक) कहलाता है, उसके स्थापित गुरुयुग की आयु कोई 10,000 वर्षों की होती है I लोकों आदि की उत्पत्ति के समय भी ऐसे योगी पितामह ब्रह्मा के सहायक होते हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… क्यूंकि वह योगी तो स्वयं ही पितामह ब्रह्म स्वरूप है, इसलिए ऐसे योगी कभी भी, किसी भी देवी देवता के माध्यम नहीं हो सकते I ब्रह्मा देव न तो किसी के माध्यम हुए हैं, और न ही कोई उनका माध्यम हो सकता है I जब ऐसा योगी किसी धरा पर लौटाया जाता है, तब उस धरा सहित, ब्रह्माण्ड के उस भाग के समस्त देवी देवता उस योगी के साथ ही खड़े हो जाते हैं I उस योगी का साथ देने के लिए तो यह देवी देवता अपने दुर्ग तक त्याग देते हैं क्यूंकि उनके रचैता का स्वरूप ही उस धरा पर, कायाधारी होकर आ गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ऐसे योगी के भाव में ही उसका साधन होता है, और अपने उसी भाव से वह उस साधन को स्वयं प्रकट करता है, जिसको वह उत्पन्न करना चाहता है I ऐसे योगी का मूल प्राण भी समान प्राण ही होता है I

नन्हें विद्यार्थी को समझ आ गया इसलिए उसने गुरुमुख की ओर देखकर, अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरु बोले… क्यूंकि यह पञ्च प्राण सर्वव्यापक हैं, और क्यूँकि समान प्राण जो अपने भीतर की ओर ही गति करता है और नाभि क्षेत्र (अर्थात शरीर के मध्य क्षेत्र) का प्राण है, इसलिए इस प्राण के व्यापक स्वरूप के कारण इस जीव जगत में जो भी है, उस सबके मध्य की समता नामक शक्ति रूप में यह समान प्राण ही है I और इसी प्राण के कारण इस जीव जगत में जो भी है, उस सबके मध्य भाग, उनके अपने मध्य की ओर ही चलित होते रहते हैं, जिसका कारण भी यही समान प्राण है जो सबकुछ को अपने मध्य भाग की ओर ही खींचता रहता है I यही कारण है, कि यदि हम इस जीव जगत और उसके भागों को पृथक रूप में भी देखेंगे, तो सब कुछ अपने और इस जीव जगत के मध्य की ओर ही चलित हो रहा है I और ऐसी चाल का कारण भी यह मध्य का प्राण, समान ही है, जो इस जीव जगत और उसके समस्त भागों में व्यापक है और उन भागों को अपने ही भीतर की ओर खींचता रहता है I क्यूंकि यह प्राण ब्रह्मपथ को भी दर्शाता है, इसलिए इस प्राण के कारण, पञ्च ब्रह्म भी अपने मध्य की ओर ही देखते हैं I

टिप्पणी: ऐसा ही पञ्चब्रह्म मार्ग अध्याय श्रंखला में बताया गया था I

 

सनातन गुरु बोले… यह मध्य का भाग एक सूक्ष्म श्वेत वर्ण के प्रकाश को धारण किया होता है, और यह सूक्ष्म श्वेत प्रकाश सत्त्वगुण को ही दर्शाता है I सत्त्वगुण का नाता परा प्रकृति से होता है, जिनको आदि शक्ति भी कहा जाता है और उत्कर्ष पथ के दृष्टिकोण से, इन्ही परा प्रकृति को प्रकृति का नवम कोष भी कहा जाता है I यह नवम कोष ही इस प्रकृत जीव जगत के आधार स्वरूप में, सत्त्वगुण कहलाया है, और यही कारण है कि वैदिक मनीषियों ने भी इस प्राकृत ब्रह्म रचना की उत्पत्ति के मूल में सत्त्वगुण को भी बताया है I

सनातन गुरु आगे बोले… परा प्रकृति का स्वरूप सूक्ष्म श्वेत वर्ण के मेघ के समान होता है, और इस समस्त जीव जगत में, यह परा प्रकृति व्यापक ही हैं I यह श्वेत वर्ण सगुण निर्गुण ब्रह्म का भी द्योतक है I और यही श्वेत वर्ण समता नामक तत्त्व को भी दर्शाता है I योगमार्गों में इस समता नामक तत्त्व की उपयोगिता अनिवार्य ही है, क्यूंकि इस समता नामक तत्त्व को अपनाए बिना, योगसिद्धि का मार्ग कठिन हुए बिना भी नहीं रह पाता I सभी विपरीत और पृथक दशाओं के योगमध्य में भी यही समता होती है, इसलिए इस समस्त जीव जगत में चाहे कुछ भी एक दुसरे से योग करे (या टकराए या युद्ध ही करे) , लेकिन उनकी योगदशा की अंतगति में यह समतावाद ही पाया जाएगा I क्यूंकि यह समतावाद इसी समान प्राण का है, इसलिए उन समस्त योगदशाओं के मध्य में भी यही समान प्राण है I

सनातन गुरु आगे बोले… स्थूल शरीर के उदर क्षेत्र (अर्थात नाभि क्षेत्र) में यह समान प्राण निवास करता है और इस नाभि क्षेत्र में भी इस प्राण की गति उसके अपने भीतर की और ही होती है I यह प्राण सब ऊर्जाओं को अपने भीतर की ओर ही गति देता है I जब यह ऊर्जाएँ इस प्राण द्वारा प्रदान की हुई गति से, इस प्राण के भीतर पहुँच जाती है तब वह ऊर्जाएँ भी अपने पूर्व का स्वरूप त्यागकर, इस समान प्राण के समता नामक तत्त्व में बसकर, समतावादी होकर, सूक्ष्म श्वेत स्वरूप में आ जाती हैं I ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस प्राण का मूल गुण समता है और जहां यह समता भी इस प्राण के मध्यभाग में ही साक्षात्कार करी जाती है I इस समता नामक तत्त्व के प्राकृत स्वरूप को ही सत्त्वगुण कहते हैं, और जहां यह सत्त्वगुण ही इस ब्रह्म रचना के कारण या दैविक, सूक्ष्म और स्थूल जीव जगत का मूल स्वरूप है और जहां वह मूल ही सत्त्वगुण रूप में प्रतिष्ठित हुआ है I इसलिए…

प्राकृत जीव जगत के दृष्टिकोण से, मूल ही गुण है और गुण ही मूल कहलाता है I

प्राकृत जीव जगत में जो भी है, उसके मध्य में समान प्राण का समता तत्त्व ही है I

समता नामक तत्त्व की गुणात्मक दशा के अनुसार, इसको सत्त्वगुण कहा जाता है I

सनातन गुरु आगे बोले… यही कारण है, कि त्रिगुणों को प्रकृति के चौबीस तत्त्वों का अंतर्गत नहीं बताया गया था I और ऐसा इसलिए हुआ था, क्यूंकि मूल को तत्त्व माना ही नहीं जा सकता है… ब्रह्मरचना का मूल ही तो शक्ति कहलाती हैं, और वह शक्ति, तत्त्व स्वरूप में मानी ही नहीं जा सकती हैं I यदि उन शक्ति को तत्त्व मान लोगे, तो यह जीव जगत मूल रहित हो जाएगा, और ऐसी दशा में इसकी सत्ता का सार्वभौम भाग ही समाप्त हो जाएगा I ब्रह्मरचना का आधार यह ब्रह्मशक्ति है और उसी शक्ति का त्रिगुणात्मक स्वरूप त्रिगुण कहलाया है, और जहाँ उन त्रिगुणों का नाता भी पञ्चब्रह्म से और पञ्च मुखा गायत्री से भी है I इसी पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत में व्यापक संस्कारिक, दैविक या कारण, सूक्ष्म और स्थूल जीव जगत निवास करता है I ब्रह्म की रचना के समय पर, इसी गायत्री पञ्चब्रह्म सिद्धांत में ही समस्त जीव जगत सैद्धांतिक, व्यहवारिक और दार्शनिक तीनों रूपों में वेदोक्त मार्ग से बसाया गया था I और यही कारण है, कि जीवों का मुक्तिमार्ग भी इसी पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत से होकर ही जाता है I

नन्हें विद्यार्थी को समझ आ गया इसलिए उसने गुरुमुख की ओर देखकर, अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

आगे बढ़ता हूँ…

सनातन गुरुदेव बोले… इसी समान प्राण के क्षेत्र में नाभि के पीछे की ओर, और मेरुदण्ड के समीप एक लिंग रूप होता है, जिसको नाभि लिंग भी कह सकते हैं I यह लिंग परा प्रकृति और वामदेव ब्रह्म का लिंग भी कहा जा सकता है I उस नाभि लिंग में शरीर की जो तैंतीस करोड सूक्ष्म ऊर्जावान नाड़ियां होती है, उन सभी नाड़ियों का और उन नाड़ियों की ऊर्जाओं का समतावादी योग होता है I यह योग भी समान प्राण के क्षेत्र में होता है. इसलिए इस योग की अंत दशा भी सूक्ष्म श्वेत वर्ण की ऊर्जा रूप में समता तत्त्व से सम्बंधित होती है I यही कारण है की यह नाभि लिंग जो समान प्राण के क्षेत्र में बसा होता है, उसका वर्ण भी श्वेत ही होता है I

सनातन गुरु आगे बोले… इस नाभि लिंग में, जो शरीर की तैंतीस करोड़ नाड़ियों से निर्मित होता है, जब बाहर से ऊर्जाएँ, समान प्राण के ऊर्जा प्रवाह के कारण भीतर की ओर गति करती हैं और समान प्राण के मध्य में पहुँच जाती हैं, तब वह ऊर्जाएँ अपने पूर्व के गुण दोष आदि त्यागकर, समतावादी हो जाती है, और ऐसी दशा में उनका वर्ण भी श्वेत ही हो जाता है I यही श्वेत वर्ण इस नाभि लिंग में भी दृश्यमान होता है I

सनातन गुरु बोले… जब तैंतीस कोटि नाड़ियों की ऊर्जाएं नाभि के समान प्राण के क्षेत्र में योग करती हैं, तब उन सभी नाड़ियों की ऊर्जाएं भी समान प्राण के भीतर की समता को पाकर, श्वेत वर्ण की ही हो जाती हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

सनातन गुरु आगे बोले… जब विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएं इस समता को प्राप्त होने हेतु, समान प्राण के क्षेत्र में ही गति कर रही होती हैं, तब एक अग्निमय स्वरूप स्वयं प्रकट होता है, और इसी अग्निमय स्वरूप को ही जठराग्नि कहा गया है I यहाँ बताई गई प्रक्रिया से ही जठराग्नि स्वयं उत्पन्न होती है, और इस अग्नि का नाता भी समान प्राण और उसके भीतर बसे हुए नाभि लिंग और उनके समतावादी तत्त्व से ही है I और ऐसा होने के कारण, इस जठराग्नी का नाता सत्त्वगुणी प्रकृति से भी है, और आदिशक्ति से भी I ऐसा होने के कारण, इस जठराग्नी का नाता सत्त्वगुण को धारण किए हुए मनस तत्त्व से भी होता है, क्यूंकि मन का स्थान भी नाभि क्षेत्र में ही होता है, जिसके कारण इस समान प्राण का नाता मनात्मा नामक सिद्धि से भी होता है I

नन्हें विद्यार्थी को समझ आ गया इसलिए उसने गुरुमुख की और देखकर, अपना सिर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

इसके पश्चात सनातन गुरु बोले… क्यूंकि इसी नाभि लिंग में शरीर की तैंतीस कोटि सूक्ष्म नाड़ियों और उनकी ऊर्जाओं का समतावादी योग होता है, इसलिए इस नाभि लिंग का वर्ण भी श्वेत ही होता है I यह नाभि लिंग, शरीर के नाभि के पीछे की ओर, और मेरुदण्ड के समीप बसा होता है, और यह लिंग ऊपर की ओर से मेरुदण्ड की ओर ही थोड़ा सा मुड़ा भी होता है I जब साधक समता नामक सिद्धि को पाता है, तब इस लिंग का वर्ण खुरदरा-श्वेत हो जाता है, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने इस लिंग पर श्वेत वर्ण के चूने को डाल दिया है I इसलिए ऐसी दशा में यदि इस नाभि लिंग का साक्षात्कार होगा, तो ऐसा भी प्रतीत होगा जैसे इस लिंग के बाहर की ओर किसी ने श्वेत वर्ण का चूना डाल रखा है, जिसके कारण इसकी दशा खुरदरे श्वेत वर्ण की हो गई है I यही वह दशा है जिसके पश्चात साधक उस मार्ग पर जाने का पात्र बनता है, जो अष्टम चक्र सिद्धि कहलाती है, और जिसका नाता सिद्धों द्वारा बताए गए निरलम्बस्थान से है, और जिसका सूक्ष्म सांकेतिक वर्णन अथर्ववेद के दसवें अध्याय के दूसरे खंड के इकतीसवें, बत्तीसवें और तैंतीसवें मंत्रों में भी किया गया है, और जिसको आंतरिक अश्वमेध यज्ञ भी कहा जा सकता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… विभिन्न मार्गों में और उनके शास्त्रों में इसी नाभि लिंग को विभिन्न प्रकार से बताया जाता है I आयुर्वेद में जो नाभि क्षेत्र में अमृत और अमृत कलश का वर्णन आता है, वह इसी नाभि लिंग का है I वैदिक मंदिरों के ऊपर जो कलश स्थापित किया जाता है, उसका नाता भी इसी नाभि लिंग से होता है I इसी नाभि लिंग को अमृत कलश कहा जाता है, और जब साधक अपने उत्कर्ष पथ की अंतगति में जाने का पात्र बनता है, तब यह अमृत कलश नाभि क्षेत्र से ऊपर की ओर उठता है, और अंततः सहस्रार चक्र ही पार  करके, वज्रदण्ड चक्र से होकर, निरलम्ब चक्र में ही चला जाता है I ऐसी दशा को ही मुक्तिमार्ग आदि शब्दों से बताया जाता है, जिनका नाता भी नाभि क्षेत्र में बसे हुए अमृत कलश रूपी नाभि लिंग से है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… वैदिक मंदिर स्थूल काया का स्वरूप ही होता है, जिसके स्वामी भगवान् ही होता हैं और जो साधक के आत्मस्वरूप में ही निवास करते हैं I जब साधक मुक्तिमार्ग के गंतव्य पर जाता है, तो उस साधक का नाभि लिंग अष्टम चक्र को जाता है, जो कपाल से भी ऊपर की दशा है I इसी अष्टम चक्र (या निरालंबस्थान) विज्ञान से वैदिक मंदिर के ऊपर के भाग में कलश स्थापना करी जाती है, क्यूंकि वैदिक मंदिरों का यह भाग, निरलम्बस्थान का द्योतक है… और वह कलश जो वैदिक मंदिरों के ऊपर स्थापित किया जाता है, वह नाभि लिंग का I जब योगमार्ग पर गमन करते साधक का वह अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) नाभि क्षेत्र से ऊपर उठकर, अष्टम चक्र (अर्थात निरालम्ब चक्र) पर ही पहुँच जाता है, तब वह साधक उस निरंग प्रकाश का साक्षात्कार करता है, जिसको निर्गुण निराकार ब्रह्म कहा जाता है… परन्तु महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में ऐसे साधक अतिविरले ही हुए हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… पञ्च मुखा सदाशिव मार्ग के अनुसार यह नाभि लिंग सदाशिव का सद्योजात मुख है, जो पश्चिम दिशा की ओर देखता है I और पञ्च ब्रह्म मार्ग के अनुसार यह नाभि लिंग पश्चिम दिशा के वामदेव ब्रह्म का द्योतक है I पञ्च मुखा गायत्री मार्ग के अनुसार यह नाभि नाभि माँ गायत्री के धवला मुख की दिव्यता ही है I प्रकृति के नवम कोशों के विज्ञान के अनुसार, यह नाभि लिंग परा प्रकृति का द्योतक है, जिनकी दिव्यता को आदिशक्ति कहा जाता है I योगमार्ग पर गति करते हुए मुमुक्षु के मार्गानुसार यह नाभि लिंग ही समता तत्त्व को दर्शाता है I सगुण साकार ब्रह्म के दुर्ग निर्माण विज्ञान के अनुसार, यह नाभि लिंग ही उस कलश का द्योतक है जिसको देव दुर्गों के ऊपर के भाग में स्थापित किया जाता है I आयुर्वेद विज्ञान के अनुसार, यह नाभि लिंग ही वह अमृत है जो उदर क्षेत्र में बसा होता है I गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार, इसी खुरदरे श्वेत वर्ण के नाभि लिंग के साक्षात्कारी और धारक योगी को ही गुरु चन्द्रमा नामक शब्द से पुकारा जाता है I और उसी गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार, जिस योगी का नाभि लिंग (अर्थात नाभि का अमृत कलश) निरलम्ब चक्र को ही पार कर गया होगा, और इसके पश्चात उस योगी ने पञ्चमुखा सदाशिव का साक्षात्कार किया होगा और उन्ही सदाशिव के पञ्चमुखों में वह योगी समानरूपेण और पूर्णरूपेण लय भी हुआ होगा, तो ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा, ऐसे अतिदुर्लभ योगी को ही गुरु विष्वकर्मा कहा जाता है I और ऐसे गुरु विष्वकर्मा योगी की स्थूल काया के भीतर ही पञ्चदेव और उनके पञ्चकृत्य सहित, पञ्चब्रह्म मार्ग और पञ्चमुखा सदाशिव मार्ग के सभी बिंदुओं की स्थापना होती है. और ऐसे योगी के भीतर ही वेद चतुष्टय सहित, आम्नाय चतुष्टय का मूल स्वरूप प्रकाशित होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि पञ्चब्रह्म में ही समस्त जीवत्व, जगत्व, देवत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व, विष्णुत्व, शकतत्व, गणपत्व आदि बिंदु प्रकाशित होते हैं, इसलिए इन सभी से संबद्ध जो भी है, वह सब उस योगी (अर्थात गुरु विष्वकर्मा) की काया के भीतर ही बसने लगता है I यही कारण है, कि जब भी किसी भी ब्रह्माण्ड में कोई योगी गुरु विश्वकर्मा नामक उपाधि को पाता है, तब उस ब्रह्माण्ड की समस्त दिव्यताएं अपने-अपने पूर्व के दुर्गों (अर्थात स्थानों या मंदिरों) को त्यागकर, उस योगी की काया में ही प्रवेश कर जाती हैं I और जब वह योगी देहावसान करेगा, तब वह उन सभी दिव्यताओं आदि को अपने साथ ही लेकर चला जाएगा I इसलिए गुरु विश्वकर्मा एक दैविक डकैत ही है, जो जब भी आएगा, तब वह समस्त दिव्यताओं आदि को उस ब्रह्माण्ड से लेकर ही चला जाएगा I यही कारण है, कि गुरु शिष्य परंपरा और उनके समस्त सम्प्रदायों के दृष्टिकोण से, गुरु विष्वकर्मा से बड़ी न तो कोई उपाधि हुई है… और न ही कभी हो पाएगी I इस उत्कृष्टम उदधि के मार्ग मूल में भी, समान के भीतर बसा हुआ वही अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… शिव तारक मंत्र के मार्गानुसार इसी नाभि लिंग की ऊर्ध्वगति को रकार मार्ग से जाना जाता है, जो अंततः साधक की काया के भीतर बसी हुई काशी नगरी से होकर ही सहस्रार चक्र को पार करता है, और रकार मार्ग पर गति करता है I इस नाभि लिंग का नाता खकार मार्ग, ड़कार मार्ग और गकार मार्ग से भी होता है, इसलिए इसी नाभिलिंग की गंतव्य सिद्धि को खड़क (या खड़ग) सिद्धी भी कहा जाता है I इसी रकार मार्ग पर जाकर साधक कई और सिद्धियों को पता है, जैसे देवराज इंद्र की वज्र सिद्धि, शिव तारक मंत्र सिद्धि जो राम भद्र की होती है, कृष्ण चन्द्र की विराट नामक सिद्धि, ब्रह्म की विश्वरूप नामक सिद्धि, प्रजापति सिद्धि, हिरण्यगर्भ सिद्धि, कृष्ण पिङ्गल रुद्र सिद्धि, पिङ्गल रुद्र सिद्धि, एकादश रुद्र सिद्धि, द्वादश आदित्य सिद्धि, अष्टवसु सिद्धि, दस महाविद्या सिद्धि, नव दुर्गा सिद्धि, योगिनी सिद्धि, भैरव भैरवी सिद्धि, मातृका सिद्धि, यक्ष यक्षिणी सिद्धि, गरुड़ सिद्धि, देवदत्त अश्व सिद्धि, क्षीरसागर सिद्धि, तक्षक नाग सिद्धि, आदिशेष सिद्धि, इत्यादि I इसी मार्ग पर जाकर वह सिद्धि साधक उस पञ्चदेव सिद्धि को पाता है, जिसके अंतर्गत पञ्चकृत्य सिद्धि, पञ्च महाभूत सिद्धि, पञ्च तन्मात्र आदि सिद्धियाँ आती हैं I जो साधक पञ्चकृत्य का ही सिद्ध हुआ है, वह ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में अतिमानव कहलाता है I ऐसा सिद्ध साधक जीव जगत का तारक भी कहलाता है I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव ठहाके मार के हँसते हुए और अपनी ऊँगली को अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर दिखाते हुए बोले… पुत्र, तुम वही हो… तत् त्वम् असि I

क्यूंकि उसके गुरुदेव ठहाके मार के हँसते हुए यह अंतिम वाक्य बोले थे, इसलिए उस नन्हें विद्यार्थी ने गुरु के इस वाक्य को अनसुना कर दिया I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव बोले… जब यह नाभि लिंग ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है, तब इसके मार्ग का नाता निर्गुणयान (अर्थात अद्वैतयान) से होता है, और इस दशा में इस नाभिलिंग का नाता रंध्र विज्ञान से भी होता है I इसी रंध्र विज्ञान से जाकर साधक इस नाभि लिंग का नाता गरुड़ सिद्धि और देवतत्त अश्व सिद्धि से भी जानता है, और इनके सहित और बहुत सारी सिद्धियों का धारक बनता है I मूलाधार चक्र से प्रारंभ होते हुए और नाभिलिंग से आगे जाते हुए और अष्टम चक्र की ओर जाते हुए साक्षात्कार और उसके योगविज्ञान से वह योगी मूषक सिद्धि, नंदी सिद्धि, सिंह सिद्धि, हंस सिद्धि, इत्यादि को भी पाता है, और ऐसे पाने के पश्चात वह इन सबको अपनी काया के भीतर बसे हुए दैविक आदि भागों में धारण भी करता है I इस नाभि लिंग की ऊर्ध्वगति के मार्ग को ही अथर्ववेद के दसवें अध्याय के दूसरे खंड के एकत्तीसवें, बत्तीसवें और तैंतीसवें मंत्र में सूक्ष्म सांकेतिक रूप में बताया गया है I इसी नाभि लिंग का नाता जीव जगत के प्रादुर्भाव सहित, पितामह ब्रह्म के हिरण्यगर्भात्मक स्वरूप के स्वयं उदय से भी है I ऐसा होने के कारण, यह नाभि लिंग ही इस समस्त जीव जगत का मूल लिंग कहलाया है, और ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में, इस नाभि लिंग का साक्षात्कारी और धारक साधक ही योगमूल और उत्कर्षमूल आदि कहलाता है, और ऐसा सिद्ध साधक ही मुक्तिमार्गों का गंतव्य होकर, जीव जगत का तारक कहलाया जाता है I ऐसे योगी का स्थूल शरीर ही श्रीक्षेत्र, उत्कल प्रदेश, विश्व मंदिर, भारत, महाकारण, काशी नगरी, अयोध्या पुरी,  पुर्यष्टक आदि कहलाता है I

इन सभी बातों को सुनकर, नन्हा विद्यार्थी अचंभित अवस्था में अपने गुरुदेव के श्रीमुख की ओर, शब्दरहित होकर देखता गया I

 

आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरु बोले… समान प्राण के बाहर की ओर की ऊर्जाएं जब इस प्राण के भीतर चली जाती हैं, तो इस प्राण के स्वाभाविक भीतर के प्रवाह के कारण वह ऊर्जाएँ इस प्राण के मध्य में पहुँच जाती हैं I जब ऐसा होता है, तो वह ऊर्जाएँ अपने पूर्व के बहुवादी स्वरूप को त्यागकर, इसी प्राण के मध्य में जो समता नामक तत्त्व होता है, उसको धारण करती हैं और समतावादी होकर ही शेष रह जाती हैं I क्यूँकि समता ही सगुण निर्गुण ब्रह्म है, जो श्वेत वर्ण के होते हैं, इसलिए जब वह सभी बहुवादी ऊर्जाएँ इस समान प्राण के मध्य में पहुँच जाती हैं, तब उनके वर्ण भी सगुण निर्गुण ब्रह्म के समान, सूक्ष्म श्वेत ही हो जाते हैं I इसी दशा से साधक की काया के भीतर परा प्रकृति का स्वयं उदय होता है और ऐसा साधक इस आदि शक्ति सिद्धि को पाकर, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में आदिशक्ति स्वरूप कहलाता है I ऐसा साधक जगत के जीवों का उद्धार भी कर पाता है I

सनातन गुरुदेव बोले… जब बाहर की ऊर्जाएं, समान प्राण के भीतर गति करती करती, इस समान के मध्य में पहुंचकर, श्वेत वर्ण की होकर सगुण निर्गुण ब्रह्म में लय होती हैं, तब ऐसा भी पाया जाता है जैसे इस नाभि लिंग को एक श्वेत वर्ण ने घेरा हुआ है I इस दशा में यह नाभि लिंग जो साधक के भीतर निवास करता हुआ अमृत कलश ही है, उसके भीतर भी श्वेत वर्ण की ऊर्जा प्रवेश कर जाती है, जिससे ऐसा लगता है जैसे इस लिंग के भीतर उन सगुण निर्गुण ब्रह्म और उनकी आदिशक्ति का श्वेत वर्ण का द्रव्य पड़ा हुआ है I

सनातन गुरु आगे बोले… यह श्वेत वर्ण का द्रव्य ही ब्रह्मचर्य सिद्धि कहलाती है, क्यूंकि उस ब्रह्मचर्य सिद्धि के परिपूर्ण स्वरूप का यही अंतिम प्रमाण होता है I जब इस अमृत कलश में वह द्रव्य पूर्णरूपेण भर जाता है, तब वह द्रव्य जो वास्तव में साधक की काया के भीतर पड़ा हुआ अमृत ही है, वह इस कलश से बाहर की ओर, नाभि क्षेत्र और समान प्राण के भीतर ही गिरने लगता है, और जब यह ऐसे गिरता है, तब यह श्वेत ऊर्जा के सामान ही होता है I जब यह अमृत रूपी सगुण निर्गुण ब्रह्म, इस अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) से बाहर की ओर गिरता है, तब इस अमृत का अधिकांश भाग उन तैंतीस कोटि नाड़ियों में प्रवेश भी करता है, जिनके योग से इस नाभि लिंग का निर्माण हुआ था I जब ऐसा होता है, तब वह अमृत इन तैंतीस कोटि नाड़ियों की ऊर्जाओं को भी समतावादी बनने लगता है I जब यह नाड़ियाँ और उनकी ऊर्जाएँ समता को प्राप्त हो जाती है, तब साधक को ऐसा भी लगेगा जैसे उसके शरीर में कोई श्वेत वर्ण की दुग्ध-मलाई बहने लगी है I ऐसी दशा में साधक के शरीर के भीतर और उस शरीर की त्वचा पर एक हीरे के समान प्रकाश आ जाता है I यही समान प्राण सिद्धि है, जिससे आगे जाकर साधक वेदों के तैंतीस कोटि देवी देवताओं में से तैंतीसवें देवता, सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति के स्वरूप को, उन्ही प्रजापति के अनुग्रह से पाता है, और जिनके लोक को ब्रह्मलोक कहा गया है I इसके पश्चात ही कोई साधक पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत में गमन करके, पञ्चब्रह्म गायत्री स्वरूप सहित, पञ्च विद्या स्वरूप को भी पा जाता है I

इसके पश्चात सनातन गुरु ठहाके मार मार कर हँसते हुए अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर अपनी उंगली दिखा कर बोले… पुत्र, अपने कई पूर्व जन्मों से तुम यही हो… तत् त्वम् असि I

क्यूंकि गुरुदेव ठहाके मार के हँसते हुए यह अंतिम वाक्य बोले थे, इसलिए नन्हें विद्यार्थी ने गुरु के इस वाक्य को यह सोचकर अनसुना कर दिया कि गुरु उसकी अनभिज्ञता का आनंद ले रहे हैं I

इसके पश्चात सनातन गुरु बोले… एक बिंदु सदैव ही स्मरण में रहे, कि जब कोई कारण आदि किसी बिंदु का साक्षात्कार करता है, तो वह साधक उसी साक्षात्कार में विलीन होकर, उसी साक्षात्कार का सगुण साकार स्वरूप हो जाता है I इसलिए योगमार्ग के अनुसार जो एक अकाट्य सत्य होता है, उसको ध्यानपूर्वक सुनो…

तुम वही हो, जिसका तुमने अपनी साधनाओं में साक्षात्कार किया है I

नन्हें विद्यार्थी के पास तो अब कोई शब्द ही नहीं थे, इसलिए वह अपने गुरु के मुख की ओर ही देखता गया I

हृदय के सनातन गुरु बोले… इसी समान प्राण से चलित हुई कुण्डलिनी शक्ति को चित्त और मन से युक्त कुण्डलिनी कहते हैं, जिसकी ऊर्ध्वगति के मूल में यही अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) होता है, और इसी कुण्डलिनी शक्ति के साथ यह अमृत कलश भी ऊर्ध्वगति को पाता है I इसी चित्त और मन से युक्त कुण्डलिनी शक्ति के साथ अमृत कलश सहस्रार को पार करके, वज्रदण्ड चक्र में जाकर, उस वज्रदण्ड को भी पार करता है, जिसके पश्चात उस कुण्डलिनी शक्ति की ऊर्ध्वगति के प्रभाव से यह नाभि लिंग (अर्थात अमृत कलश) निरलम्ब चक्र को ही चला जाता है I और यदि ऐसे योगी के पास उसके इस जन्म सहित, पूर्वजन्मों के साधनाबल, जपबल, योगबल और तपबल की योगावस्था होती है, तब ऐसे योगी का यह अमृत कलश उस निरालम्ब चक्र को भी पार कर जाएगा I ऐसा साधक ही उन श्रीमन नारायण में विलीन होता है, जो शून्य ब्रह्म कहलाए गए हैं I और अपने शरीरी रूप में ही ऐसा साधक, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से उन श्रीमन नारायण का ही सगुण साकार स्वरूप (अर्थात शरीरी रूप) कहलाता है I योगमार्ग में यही वह अंतिम सिद्धि है, जो इस शब्दात्मक जीव जगत से संबंधित होती है, क्यूंकि इसके पश्चात के साक्षात्कारों में जो दशाएँ होंगी, वह शब्दातीत होंगी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस सिद्धि के पश्चात, जिस मार्ग पर साधक गमन करेगा, वह शब्दातीत ब्रह्म से ही संबंधित होती है I शब्दातीत ही तो जीवातीत, जगतातीत और ब्रह्माण्डातीत कहलाता है I और जो ब्रह्माण्डातीत है, वही तो भूतातीत, तन्मात्रातीत, गुणातीत और कालातीत कहा जाता है I इसलिए इस निरलम्बस्थान की सिद्धि के पश्चात, साधक इन सिद्धियों के मार्ग पर ही चलने लगता है I और क्यूंकि इस मार्ग में न तो कर्म होते हैं, न ही कर्मफल और न ही संस्कार ही होते हैं, इसलिए ऐसा साधक अंततः उन कर्मातीत ब्रह्म को ही प्राप्त होता है, जो फलातीत और संस्कारातीत भी कहलाए गए हैं I ऐसा साधक न किसी लोक का होगा, और न ही अलोक का, और न ही इनके मध्य का और न ही इन सबसे परे परे का ही हो पाएगा I ऐसे साधक साधक की दशा को ही कर्ममुक्त, फलमुक्त और संस्कारमुक्त आदि कहा जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि इस सिद्धि का कर्मों, उनके फलों और उनके संस्कारों से भी लेना देना नहीं होता है, इसलिए इस सिद्धि की प्राप्ति अनुग्रह से ही होती है, और जहाँ वह अनुग्रह भी ब्रह्म और प्रकृति, दोनों का ही एक साथ प्राप्त होता है I इसलिए ऐसा साधक भी अनुग्रह सिद्ध और कृपा सिद्ध ही कहलाता है I यह एक दुर्लभ से भी दुर्लभ सिद्धि है, क्यूंकि इस महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, ऐसे अनुग्रह सिद्धि (या कृपा सिद्धि) इतने भी नहीं हुआ है, कि उनको अपने हस्त की उँगलियों पर ही गिना जाए I इस पूरे महाकल्प में ऐसे कृपा सिद्धि बस दो ही हुए हैं, और इस महाकल्प से पूर्व के बहुत सारे महाकल्पों में ऐसे अनुग्रह सिद्धि एक भी नहीं हुए थे I ऐसे सिद्धों का आदर तो कारण ही नहीं, बल्कि महाकारण जगत के निवासी भी करते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जिन साधकगणों की योगमार्ग पर गति उत्कृष्ट नहीं है, उनमें यह समान प्राण हलके पीले-हरे वर्ण का पाया जाएगा I उन साधकगणों में जिनकी योगमार्ग पर गति उत्कृष्ट हुई है, यह समान प्राण श्वेत वर्ण का पाया जाएगा I इसलिए इस समान प्राण की यह दो दशा (वर्ण) होती हैं I इसके अतिरिक्त, जिस साधक की पूर्वजन्म में योगमार्ग पर गति उत्कृष्ट थी, लेकिन वह पुनः जन्म लेकर इस या किसी और मृत्युलोक में आया है, उस साधक का समान प्राण भी तबतक हलके पीले-हरे वर्ण का ही रहेगा, जबतक वो अपने इस जन्म में उसी दशा को नहीं पा लेगा, जो उसके पूर्वजन्म की उत्कृष्ट योगदशा से संबंधित है I इसलिए यह प्राण, पूर्वजन्मों के उत्कृष्ट साधकगणों में भी तबतक श्वेत नहीं होगा, जबतक वह अपने इस जन्म में उसी उत्कृष्ट योगदशा को नहीं पाएंगे, जो उनके पूर्वजन्म की थी I

इसके पश्चात हृदय के सनातन गुरुदेव ने नन्हें विद्यार्थी का हाथ पकड़ा और चलने लगे I

हृदयाकाश गर्भ की प्राण गुफा के भीतर चलते-चलते, गुरु अपनी ऊँगली से दिखाते हुए बोले… प्राण गुफा के भीतर, यहीं से समान प्राण का प्रारम्भ होता है I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और जान लिया, और इसके पश्चात उसने गुरुमुख की ओर देखकर, इसका पुष्टिकारी संकेत भी दिया I

 

प्राण गुफा के शुद्धिकरण से पूर्व और पश्चात की दशा, प्राण गुफा के शुद्धिकरण से पूर्व की दशा, प्राण गुफा के शुद्धिकरण के पश्चात की दशा, समान प्राण की शुद्धिकरण से पूर्व और पश्चात की दशा, समान प्राण की शुद्धिकरण से पूर्व की दशा, समान प्राण की शुद्धिकरण के पश्चात की दशा, … समान प्राण का तंत्र, समान प्राण की ऊर्जाएं, समान प्राण की ऊर्जाओं की गति, समान प्राण का सूक्ष्म भाग, समान प्राण की आभा, … समान प्राण का उपप्राण, समान प्राण की उपवायु, समान वायु की उपवायु, समान प्राण की लघुवायु, समान प्राण का कृकल उपप्राण, समान वायु का कृकल वायु, समान प्राण का कृकल लघुप्राण, समान वायु का कृकल लघुवायु, … मन और प्राण, प्राण को मन भेदता है, प्राण ही ऊर्जा है, प्राण स्थूल शरीर को भेदते है, समान योगमार्ग का प्राण है, समान प्राण और योगमार्ग, …

सनातन गुरु बोले… यह समान प्राण अभी तक विशुद्ध नहीं हुआ है I जब यह विशुद्ध हो जाएगा, तब इसका वर्ण भी बहुत सूक्ष्म सा श्वेत हो जाएगा I अभी भी वह श्वेत वर्ण, इस समान प्राण के मध्य में दिखाई दे रहा है, लेकिन क्यूंकि यह प्राण पूर्णरूपेण विशुद्ध नहीं हुआ है, इसलिए यह श्वेत वर्ण केवल इस प्राण के मध्य भाग में ही दिखाई दे रहा है… न की इस प्राण के पूरे क्षेत्र में I

हृदय गुरु बोले… इस समान प्राण को इसके उपप्राण, जिसका नाम कृकल है, उसने घेरा हुआ है I यह कृकल उपप्राण ही इस समान प्राण को अन्य सभी प्राणों और उपप्राणों से पृथक रखता है, जिससे यह समान प्राण अपने तंत्र को स्वतंत्र होकर करता है I अपने उपप्राण अर्थात कृकल से यह समान प्राण अन्य सभी प्राणों की ऊर्जाओं को अपने भीतर की ओर गति देकर, उनको सत्त्वगुण में स्थापित करता है I और ऐसा होने के पश्चात, यही समान प्राण उस सत्त्वगुण को अपने कृकल उपप्राण का आलम्बन लेकर, अन्य सभी प्राणों की ओर भेजता भी है I ऐसा करने से सत्त्वगुण उन सभी प्राणों और उपप्राणों में भी प्रतिष्ठित हो जाता है I इसी प्रक्रिया से पञ्च प्राण में, यही समान प्राण उन पाँच प्राणों का संतुलनकर्ता, आत्मसात्कर्ता और विच्छेदनकर्ता, संचायक और वितरक कहलाता है, और ऐसा होने के कारण पञ्च प्राणों में, यही समान प्राण, तटस्थ प्राण, समता का प्राण और समदर्शी प्राण भी कहलाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ऐसा होने के कारण, जब हम इस प्राण का अध्ययन करेंगे, तब हमें इस प्राण के मध्य से थोड़ा हटकर ही रहना होगा, क्यूंकि यदि हम ऐसा नहीं करेंगे, तो इस प्राण की सभी दिशाओं से भीतर की ओर आने वाली समतावादी ऊर्जाएं हमें इसका अध्ययन करने ही नहीं देंगी I क्यूंकि इस प्राण की ऊर्जाएं, इस प्राण के मध्य भाग की ओर ही चलित होती हैं, इसलिए इसको योगमार्ग का प्राण भी कहा जा सकता है, और जहाँ वह योग शब्द भी इस प्राण की मध्य दशा को ही दर्शाता है I पञ्चप्राणों में यह समान प्राण ही योग नामक शब्द को दर्शाता है I

इसके पश्चात, सनातन गुरु ने एक दिशा अपनी ऊँगली से दिखाकर कहा… देखो वहां पर यह प्राण सभी प्राणों के कुछ न्यून भागों को अपने भीतर खींच रहा है, और उन सभी विविध दशाओं की ऊर्जाओं को अपने मध्य भाग में लाकर, अंततः अपनी (अर्थात समान प्राण की) समता में ही प्रतिष्ठित कर रहा है I इसीलिए यह सभी विविध प्रकार की ऊर्जाएं अंततः इसी प्राण में समतावाद को पा रही हैं, जिसके कारण उन सबके विभिन्न प्रकार के रंग भी अंततः श्वेत ही होते जा रहा हैं I और यह भी जानो की कुछ न्यून मात्रा में ही सही, लेकिन सभी प्राणों की ऊर्जाएं इसी समान प्राण की और आते ही जा रही है, और अंततः इस समान के मध्य भाग में पहुँचकर, वह सभी श्वेत वर्ण की ही होती चली जा रही हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और जान गया, लेकिन उसने सोचा कि कोई इसका चित्र कैसे बना सकता है, क्यूंकि यह ऊर्जाएं जो विविध प्रकार की ही हैं, वह सब इसी प्राण की समता में ही समाती ही जा रही हैं I

इसपर हृदय के सनातन गुरु बोले… इसका चित्र बनाना असंभव सा ही होगा I यह समान प्राण अन्य सभी प्राणों की अधिक ऊर्जाओं को अपनी ओर खींचकर, उन ऊर्जाओं को अपने ही मध्य भाग में ले जाकर, उनको समतावादी बनाकर, शरीर में इन प्राणों में एक दुसरे के प्रति समता, सद्भाव और संतुलन लाता है I इसलिए शरीर की ऊर्जाओं को संतुलित रखने को और प्राणों को समतावाद में बसाए रखने के लिए यह समान, एक अतिमहत्वपूर्ण प्राण है I इस कार्य से यह समान प्राण स्थूलादि शरीरों को भी स्वस्थ रखता है, और शरीर के तंत्र को संतुलित रूप में चलायमान रखने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है I जब भी इस प्राण में ऊर्जा इतनी अधिक हो जाती है कि वह ऊर्जा अन्य किसी भी प्राण में समाहित नहीं करी जा सकती, तो यह समान प्राण अपनी अधिक ऊर्जा को शरीर से बाहर की ओर गति करने वाले व्यान प्राण में प्रतिष्ठित करके, उसको शरीर से ही बाहर निकाल देता है, और यह भी शरीर को स्वस्थ रह्कने का एक कारण बनता है I जब यह अधिक ऊर्जा व्यान प्राण से शरीर से बहार जाती है, तो यही ऊर्जा शरीर के आभामण्डल के रूप में दिखाई देती है I जितनी अधिक ऊर्जा यह व्यान प्राण स्थूल शरीर से बाहर की ओर भेजेगा, उतना बड़ा ही शरीर के आभामण्डल का माप या विस्तार भी होगा I

सनातन गुरु बोले… अधिकांश मानव के आभामण्डल का विस्तार 3.5 से 4 ऊँगली तक ही होता है, लेकिन कुछ योगीजनों के आभामण्डल में तो पूरी पृथ्वी ही समाई होती है I और कुछ उत्कृष्ट योगीजन तो ऐसा भी हुए हैं, जिनके आभामण्डल का विस्तार संपूर्ण ब्रह्माण्ड में ही पाया जाता है I ऐसे योगीजन ब्रह्माण्ड योग के सिद्ध होते हैं I मानव आदि शरीरों के सर के ऊपर वाले भाग में, हीरे के प्रकाश को धारण करी हुए एक नाड़ी होती है, जिसमें से ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएँ शरीर को प्राप्त होती है I उत्कृष्ट योगीजनों की इस नाड़ी में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जाएँ शरीर के भीतर आती है I और इन ऊर्जाओं का अधिक भाग उनके व्यान प्राण से शरीर से बाहर की ओर ही चला जाता है I और क्यूंकि उत्कृष्ट योगीजनों की इस नाड़ी से बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जाएँ शरीर में आती हैं, इसलिए उनके व्यान प्राण से भी बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जाएँ उनके शरीर से बाहर जाती हैं I यही कारण है कि उत्कृष्ट योगीजनों का आभामण्डल बहुत बड़ा ही पाया जाता है I और कुछ योगीजन ऐसे भी हुए हैं, जिनके मन को ही इस प्रक्रिया में भाग लेना पड़ा था, और ऐसा इसलिए हुआ था क्यूंकि व्यान प्राण में तो वह क्षमता ही नहीं होती है, की वह इतनी बड़ी ऊर्जा को संभाल सके, इसलिए जब ऐसा होता है, तो मन जिसका मूल स्थान, सामान प्राण के भीतर का नाभि क्षेत्र ही होता है, वह भी व्यान प्राण की सहायता हेतु आ जाता है I

सनातन गुरुदेव बोले… प्राण गुफा के प्राण, मनस गुफा में भी पाए जाते हैं, और ऐसा ही हम जानेंगे जब हम मन की गुफा में जाऐंगे I इसका अर्थ हुआ कि हृदयाकाश गर्भ की मनस गुफा को प्राण गुफा के प्राण भेदते हैं I लेकिन जब हम पञ्च कोष का अध्ययन करते हैं तब हम पाते हैं कि मनोमय कोष ही प्राणमय कोष को भेदता है I इसका यह अर्थ हुआ कि पञ्च कोष के मनोमय कोष और प्राणमय कोष की तुलना में हृदयाकाश गर्भ के प्राण गुफा और मनस गुफा में मन और प्राणों के नाते की विपरीत दशा पाई जाती है I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और जाना… मनोमय कोष की सूक्ष्मता प्राणमय कोष से अधिक है, इसलिए मनोमय कोष प्राणमय कोष को भेदता है, और ऐसा होने पर भी मन की गति का कारण प्राण ही हैं I लेकिन हृदयाकाश गर्भ में यह नाता उल्टा है क्यूंकि मन को भेदते हुए प्राण पाए जा रहे हैं I इसलिए इन दोनों स्थितियों में, मन और प्राण का नाता विपरीत सा प्रतीत होता है I

सनातन गुरुदेव बोले… यही कारण है कि कुछ ग्रंथ मन को सूक्ष्म मानते हैं और कुछ प्राण को I जबकि सत्य तो यह है कि दोनों दशाएँ सत्य है… बस अंतर इतना ही है कि इन दोनों का अध्ययन किस दशा से किया गया है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपने गुरु को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

समान प्राण के कार्य, कृकल उपप्राण के कार्य, समान वायु के कार्य, कृकल उपवायु के कार्य, कृकल लगवायु के कार्य, समान वायु और कृकल उपवायु के गुण, … समान प्राण और भावों का नाता, समान प्राण और भावों की समतावादी दशा, …

सनातन गुरु बोले… समान प्राण का कार्य है पाचन और आत्मसात्करण I जब यह प्राण हृदय से सम्बंधित होता है, तब यह भावों का आत्मसात्करण करने में सहायक होता है I जब यह प्राण सूर्य चक्र और चंद्र चक्र से संबंधित होता है, तब यह कर्म और फल का आत्मसात्करण करने में सहायक होता है I और जब यह प्राण नाभि क्षेत्र में होता है तब यह भोजन के आत्मसात्करण करता है, और जहां भोजन का संबंध भी मन, बुद्धि, चित्त, अहम् और प्राण के भोजन से भी होता है I

सनातन गुरु बोले… अधिकांश रूप में भावों का संबंध नाभि कमल से ही होता है क्योंकि इसी नाभि कमल में मन का मूल स्थान होता है I इसीलिए कुछ योगीजन कहते हैं कि मन का स्थान नाभि कमल है I स्थूल शरीर की प्रत्येक कोशिका का अपना मन होता है, और उस मन के अपने भाव होते हैं और इस कारण से शरीर के भीतर एक ही समय पर अनेकानेक भाव उत्पन्न और लय होते रहते हैं I यह समान प्राण उन भावों की ऊर्जाओं को अपने भीतर लाकर, उनकी पृथकता समाप्त करता है, और उनमें समता को जागृत करता है I यदि ऐसा नहीं होता तो शरीर अपनी असंख्य कोशिकाओं के मन नामक भाग के पृथक भावों से और अपने असंख्य भावों की अधिकता से ही बीमार हो जाता I इसलिए शरीर के भीतर बसा हुआ यह समान प्राण, भावनात्मक संतुलन और भावनात्मक समता का कारण भी होता है I

सनातन गुरु आगे बोले… क्यूंकि यह प्राण समता को प्रदान करता है, इसलिए यह प्राण की अंतदशा सर्वसम ही पाई जाएगी I और ऐसी दशा मैं यह प्राण हीरे का समान प्रकाशमान भी पाया जाएगा I इसलिए जबकि समान प्राण हलके पीले-हरे वर्ण का पाया जाता है, लेकिन तब भी इसकी अंत दशा हीरे के समान प्रकाशित ही पाई जाती है I हीरे के समान जो प्रकाशित होता है, वही सर्वसमता का द्योतक होता है I इस प्राण का स्थान उदर क्षेत्र है, और यह प्राण अंतड़ियों तक भी पाया जाता है I इस प्राण की केंद्रीभूत (या संकेन्द्रित) दशा यकृत, पित्त ग्रंथि और पित्त नली में भी पाई जाती है I कुछ न्यून मात्रा में प्लीहा ग्रंथि में भी यह प्राण होता है I और अपान प्राण के साथ, गुर्दे और अधिवृक्क ग्रंथियाँ भी इस प्राण को धारण करी हुई होती हैं I यह प्राण पीठ के काठ से लेकर वक्षीय क्षेत्र तक पाया जाता है, और यह इस क्षेत्र के तंत्रिका तंत्र में भी बसा हुआ है I जबतक मन बुद्धि चित्त अहम् और प्राणों की वृत्तियाँ रहती हैं, तबतक ही यह प्राण हलके पीले-हरे रंग का होता है I और जब यह वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं, तब यह प्राण अपने मूल श्वेत वर्ण का ही हो जाता है I ऐसी दशा में साधक अपनी साधनाओं में वैदिक महावाक्यों के ज्ञानमय साक्षात्कार का पात्र भी बन जाता है, और जहां यह साक्षात्कार भी यजुर्वेद के महावाक्य “अहम् ब्रह्मास्मि” के सार से ही प्रारम्भ होता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपने गुरु को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

सनातन गुरु बोले… क्यूंकि समान प्राण ऊर्जाओं को अपने भीतर समाकर उनको समता प्रदान करता है और क्यूंकि समता का मूल स्वाभाव निस्वार्थ प्रेम ही होता है, इसलिए समान वायु पर साधना, निस्वार्थ प्रेम का मार्ग भी है I जिस योगी में यह समान प्राण समतावादी हो जाता है, वह योगी इस समस्त जीव जगत से ही निस्वार्थ प्रेम कर बैठता है I ऐसे योगी का निस्वार्थ प्रेम ही उस योगी का ब्रह्मपथ हो जाता है, और जहां वह ब्रह्मपथ भी प्रकृति की ऊर्जावान दशा के संपूरक कोण की समग्रता का सार्वभौम समतावादी स्वरूप होता है I इसलिए समान प्राण से प्रारंभ होता हुआ मुक्तिमार्ग उस समतावाद का होता है, जिसका नाता प्रकृति की समस्त दशाओं और उनकी ऊर्जाओं से भी होता है I क्यूंकि ब्रह्मरचना में समता ही मूल दशा है, इसलिए ऐसा ही उस योगी का ब्रह्मपथ भी होता है, जिसका नाता ब्रह्माण्ड मूल से ही होता है I इसलिए इस मार्ग में योगी ब्रह्माण्डीय मूल (अर्थात सत्त्वगुण) से ही गंतव्य को जाता है I यही कारण है कि जबकि समान प्राण का स्थान उदर क्षेत्र होता है, लेकिन तब भी इसकी समता का श्वेत वर्ण अन्य सभी प्राणों में कुछ न्यून मात्रा में ही सही… लेकिन पाया जाता है I

इसके पश्चात सनातन गुरु बोले… इससे पहले हम आगे बढ़ें, इस दशा को देखो और जानो I

नन्हें विद्यार्थी ने ऐसा ही पाया, इसलिए उसने गुरुदेव को पुष्टिकरण संकेत भी दिया I

सनातन गुरु आगे बोले… समान अपने उपप्राण (कृकल) से सभी प्राणों का कुछ भाग अपनी ओर खींचकर, अपने ही भीतर लेता है I यह समान प्राण सभी प्राणों का जीवन शक्ति नियंत्रक है, यह उनकी अधिकताओं को ग्रहण करता है, इन अतिरिक्तताओं को आत्मसात करता है और फिर इसे अपनी ही मूल तटस्थता (समता) में परिवर्तित कर देता है, और फिर इस समता रूपी प्राणों के सार को कृकल उपप्राण में भेजता है I इसके पश्चात कृकल उपप्राण इस सार को धनञ्जय उपप्राण में भेजता है और इस धनञ्जय से यह सार व्यान और अन्य प्राणों के उपप्राणों में जाकर, उन सभी प्राणों में चला जाता है I व्यान वायु से यह सार सभी प्राणों के उपप्राणों से होता हुआ, उन उपप्राणों के प्राणों में चला जाता है I इसके पश्चात भी जो बचा रहता है, वह व्यान प्राण से शरीर के बाहर की गति में जाकर, शरीर के आभामण्डल का कारण बन जाता है I यही समान प्राण और कृकल उपप्राण का अन्य सभी प्राणों और उपप्राणों से नाता है, और इसी नाते से शरीर में समता (अर्थात सत्त्वगुण) बना रहता है, जिसके कारण जीवों का नाता परा प्रकृति से भी बना ही रहता है I और अंततः जब साधक सर्वसम ब्रह्म को प्राप्त होने का पात्र बनता है, तब इस समान प्राण का वर्ण हीरे के समान ही हो जाता है I

सनातन गुरु आगे बोले… अब हम उस स्थान पर जाएंगे जहां समान प्राण का मध्य भाग होता है, और जहां समान में समाई हुई ऊर्जाएं समतावाद को प्राप्त होती है I

इसके पश्चात सनातन गुरु ने अपने नन्हें विद्यार्थी का हाथ पकड़ा और वह दोनों एक दिशा में चलने लगे I

समान प्राण के मध्य में पहुंचकर सनातन गुरु बोले… देखो यही इस प्राण का स्वभाव और सुन्दरता है I यह प्राण सभी ओर से ऊर्जाओं को अपने मध्य में लाकर, उनको समता प्रदान करता है और ऐसा करने के पश्चात, वह नाभि लिंग जो इस समान प्राण के भीतर ही बसा होता है, उसका आलम्बन लेकर यह प्राण इस समता को शरीर के सभी भागों में भेजता रहता है I यही कारण है कि शरीर में समता का निवास बना ही रहता है, जिसके कारण शरीर के अंगों में और उनके कार्यों में विविधता होने पर भी, उनमें उनकी मूल एकता बनी रहती है I ब्रह्माण्ड में भी इस प्राण का यही कार्य है, इसलिए प्रकृति बहुवादी होते हुए भी अद्वैत तत्त्व का मार्ग होती है, और इसी बिंदु को वैदिक वाङ्मय में भी कई स्थानों पर सूक्ष्म सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शाया गया है I इस प्राण के कारण, वैदिक वाङ्मय के विभिन्न मार्गों में विविधता होने पर भी, वह सब मार्ग ब्रह्मपथ के अंग ही हैं I वैदिक वाङ्मय में कोई कर्म है ही नहीं जो भगवान् के लिए नहीं किया जाता, इसलिए वैदिक वाङ्मय ही वह एकमात्र मार्ग है, जिसमें कर्मों की विविधता होने पर भी, सभी कर्म ब्रह्मपथ का अंग ही होते हैं I और इस सिद्धांत के मूल में समान प्राण का वही गुण होता है, जिसको अभी बताया गया था I और इस गुण में बसे होने के कारण, …

वैदिक वाङ्मय को बहुवादी अद्वैत मार्ग भी कहा जा सकता है I

बहुवादी अद्वैत का अर्थ है, कि सभी पथ उन्ही अद्वैत ब्रह्म को जाते हैं I

बहुवादी अद्वैत में उत्कर्षादि मार्गों में पृथकता होने पर भी, सब ब्रह्मपथ ही हैं I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले…

बहुवादी अद्वैत मार्ग में बहुवाद प्रकृति या ब्रह्मशक्ति का है और अद्वैत ब्रह्म का I

यही परंपरा का द्योतक है, जिसमें परम शब्द ब्रह्म का, और परा शब्द प्रकृति का है I

जिस मार्ग में ब्रह्म और प्रकृति का योग नहीं, वह परंपरा भी नहीं हो सकता है I

जो परंपरा में नहीं, वह समता को प्रदान करने वाला सम्प्रदाय भी नहीं होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले…

सामान प्राण का गुण उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति का द्योतक है I

समान प्राण का गंतव्य ही उस सर्वसम सगुण निराकार ब्रह्मलोक का द्योतक है I

सामान प्राण की गति योग की द्योतक है, यह प्राण योगीजनों का मूलप्राण है I

सामान प्राण के क्षेत्र से ही सर्वसम प्रजापति लोक का मार्ग प्रशस्त होता है I

इसलिए, सामान प्राण ही उस ब्रह्मपथ को दर्शाता है, जो ब्रह्मलोक का है I

योग, वैदिक परम्पराओं और सम्प्रदायों के मूल में यही सामान प्राण है I

वैदिक और योग परम्पराओं और सम्प्रदायों का यह मूल प्राण ही है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

समान प्राण और स्थूल जगत पदानुक्रम के भीतर विकासवादी स्थिति, समान प्राण और साधक की उत्कर्ष स्थिति, समान प्राण और साधक की उत्कर्ष पथ पर गति और स्थिति, …

सनातन गुरु बोले… जब यह समता सर्वस्व की ओर हो जाती है, तब यह प्राण सर्वसम होता है, और ऐसी दशा में यह हीरे के समान अति प्रकाशमान दशा को धारण करता है I ब्रह्माण्डीय उत्कर्ष सिद्धांत के अनुसार उत्कर्ष स्थिति को नीचे नहीं लाया जा सकता, क्यूंकि उत्कर्षपथ ऊपर की दिशा का पथ ही है I इसलिए, जब साधक का समान प्राण सर्वसमता को प्राप्त होता है, अर्थात हीरे के समान प्रकाशित हो जाता है, तो चाहे कोई कुछ भी कर ले, वह साधक अपने उत्कर्ष पथ में इस दशा से नीचे नहीं गिर सकता है I इस दशा को प्राप्त होने का प्रमाण भी समान प्राण के भीतर बसा हुआ वही नाभि लिंग होता है, जो ऐसे समय पर श्वेत वर्ण का हो जाता है और ऐसा होने के पश्चात, साधक के आगे के उत्कर्ष पथ में वह साधक कभी भी अपकर्ष को नहीं पा सकता है I इसी दशा के पश्चात साधक शिव तारक मंत्र के मार्ग पर जाकर, विभिन्न प्रकार की समाधिओं को स्वतः ही पाता जाता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

इसके पश्चात गुरु बोले… अब हम इसी हृदयाकाश गर्भ की प्राण गुफा में बसी हुई प्राण वायु और नाग उपवायु में जाऐंगे I

ऐसा कहते ही हृदय के सनातन गुरु ने अपने नन्हे शिष्य का हाथ पकड़ा और एक दिशा की ओर वह दोनों चलने लगे I

चलते चलते गुरु बोले… क्या तुमने (अर्थात नन्हें विद्यार्थी ने) कृकल उपप्राण और अन्य उपप्राणों के कार्यों में कोई अंतर देखा? I

नन्हें विद्यार्थी ने अपने सर दाएं बाएं हिलाकर संकेत दिया… नहीं I

गुरु बोले… क्या तुमने कृकल उपप्राण और अन्य उपप्राणों के वर्णों में कोई अंतर देखा? I

नन्हें विद्यार्थी ने उत्तर दिया… कुछ ख़ास नहीं, किन्तु इन उपप्राणों के वर्ण लगभग एक जैसे होने पर भी, इनके कर्मों के अनुसार इनमें कुछ अंतर भी थे I

इसपर गुरु बोले… यही तो प्राणों और उपप्राणों की विशेषता है, कि…

एक होने पर भी यह अनेक प्रतीत होते हैं I

इसलिए यह विविधता में ही एकता को दर्शाते हैं I

और उस एकता के विविध स्वरूपों के भी द्योतक भी हैं I

गुरु का हाथ पकड़कर चलते चलते नन्हें विद्यार्थी ने सोचा… वाह, विविधता में एकता, विसमता में समरसता, पृथकता में अद्वैतता I क्या विशिष्टता है, ब्रह्म रचना के इस प्राणों से युक्त, ऊर्जाओं से संयुक्त, सार्वभौम शक्तिमय स्वरूप की I

सनातन गुरु जो अपने विद्यार्थी के यह भाव पड़ रहे थे, बोले… इस समस्त जीव जगत में प्राण सर्वव्यापक ही हैं I प्राण ही जीव जगत की शक्ति हैं, और शक्ति ही ऊर्जा रूपी प्रकृति कहलाई गई है I ऊर्जा से ही धातु आदि का निर्माण हुआ है, और अंततः यह धातु अपने-अपने प्रारब्ध पूर्ण करके, पुनः उसी ऊर्जा रूपी प्रकृति में लय होते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जहां वह प्रकृति, जो ब्रह्म की ही सार्वभौमिक शक्तिमय अभिव्यक्ति हैं, वही अपराजिता, मूल प्रकृति, दुर्गा आदि शब्दों से पुकारी जाती हैं, और जो विष्णुकांता स्वरूप में इस स्थूल शरीर रूपी अयोध्या नगरी सहित, इस जीव जगत की समस्त स्थूल और सूक्ष्मादि धातुओं के स्वरूप में भी अवतीर्ण हुई है I इस ज्ञान का मार्ग भी वह मुक्तिमार्ग ही है, जिसके मूल में ऊर्जा और धातु अंतरपरिवर्तनीय होते हैं I इसलिए इस ज्ञान मार्ग में, ऊर्जाओं का प्रकट स्वरूप धातु कहलाता है और धातु का मूल और गंतव्य स्वरूप ऊर्जावान प्रकृति ही है, और जहां उन माँ प्रकृति के मूल स्वरुप को ही ब्रह्मशक्ति कहा गया है I वही ब्रह्मशक्ति प्राणों के स्वरूप में साधक का ब्रह्मपथ होकर, साधक की काया के भीतर ही प्राणों के स्वरूप में स्वयंप्रकट होती हैं, इसलिए यह प्राण विज्ञान भी ब्रह्मपथ ही है, जो प्रकृति से जाता हुआ भी, अंततः साधक को ब्रह्मलीन ही कर देता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ब्रह्म रचना के “बहुवादी अद्वैत सिद्धांत” में यह ब्रह्मशक्ति ही प्राणों के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं I ऐसा होने के कारण ही ब्रह्मरचना अपने प्रकट आदि स्वरूप में बहुवादी होती हुई भी, अपने मूल और गंतव्य स्वरूप में अद्वैत ही है I इसी कारणवश, यह ब्रह्म्रचना जो ब्रह्म की अभिव्यक्ति ही है, वही ब्रह्मपथ भी है I क्यूँकि अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक नहीं होती, इसलिए यह ब्रह्म्रचना, ब्रह्म भी है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन्ही बिन्दुओं के साक्षात्कार मार्ग को “असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमय “ के मंत्र से सूक्ष्म सांकेतिक रूप में बताया गया है I वैदिक वाङ्मय का इसी सिद्धांत में बेस होने के कारण, वेद ही ऐसा मार्ग है जिसमें प्रकृति के तारतम्य का आलम्बन लेके भी, कैवल्य मोक्ष रूपी ब्रह्म में लय हुआ जा सकता है I वैदिक वाङ्मय के सिवा, इस समस्त महाब्रह्माण्ड में कोई और ऐसा मार्ग है ही नहीं, जो प्रकृति से जाता हुआ भी ब्रह्मपथ हो सके I और इस मार्ग के मूल में यही समान प्राण है, जिसकी गंतव्य दशा हीरे के समान प्रकाश की होती है, और जो उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति और उनके ब्रह्मलोक से सम्बंधित होती है I इसलिए इस समान प्राण की सिद्धि को ही प्रजापति सिद्धि कहते हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… यह समान प्राण, ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं की सभी विविधताओं को समता की ओर लेकर जाता है I इसलिए जबकि ब्रह्म रचना में विविधता होती है, लेकिन इस प्राण के कारण, प्रत्येक दशा में एक मूल एकता बनी रहती है, जिसके कारण ब्रह्माण्ड और उसकी विभिन्न दशाएं पृथक सी प्रतीत होती हुई भी, एक ही रहती हैं I दशाओं और उनकी ऊर्जाओं की विविधता से ब्रह्माण्ड गतिशील रहता है, और इसके साथ साथ, उन दशाओं के मूल समतत्व से, जो इसी समान प्राण का होता है, ब्रह्माण्ड एक रहता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और सोचने लगा… वाह, व्यक्तिगत स्वरूप में तो जगत के सूक्ष्मादि भागों का पृथक-पृथक प्रवाहादि होता है, और यही स्थूल जगत का अस्तित्व सुनिश्चित करता है I इसके साथ ही, स्थूल-तटस्थता जो एकता के अलावा और कुछ नहीं है, प्रत्येक पहलू के भीतर और उसके आंतरिक सार रूप में भी बनी रहती है I वाह, यही तो उस रचैता की उसके ही रचना स्वरूप में अभिव्यक्त, परमप्रतिभा और परमविशिष्टता का पूर्ण प्रमाण है I

इसके पश्चात नन्हा विद्यार्थी अपने हृदयाकाश के भीतर विराजमान और पूर्णतः शुशोभित हो रहे सनातन गुरु का हाथ पकड़े हुए, गुरु का अंग-संग होकर, गुरु के साथ ही शांतचित्त चलता गया… और उसको अब विशवास होने लगा था, कि उसके हृदय में बसे हुए सनातन गुरु, कोई साधुबाबा नहीं हैं… बल्कि कोई बहुत-बहुत बड़ी सत्ता ही हैं I

 

असतो मा सद्गमय I

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