अकार, सावित्री सरस्वती, ॐ का प्रथम बीज, माँ सावित्री सरस्वती विद्या, सावित्री विद्या सरस्वती, बुद्ध प्रज्ञापारमिता, विराट, विश्व, अग्नि

अकार, सावित्री सरस्वती, ॐ का प्रथम बीज, माँ सावित्री सरस्वती विद्या, सावित्री विद्या सरस्वती, बुद्ध प्रज्ञापारमिता, विराट, विश्व, अग्नि

यहाँ मैं अकार, जो ॐ का प्रथम बीज शब्द है, उस शब्द को थोड़ा विसपतारपूर्वक बतलाऊँगा। पञ्च विद्या या पञ्च सरस्वती में, ॐ का यही प्रथम बीज शब्द जो अकार है, वो ही सावित्री विद्या हैं, जिनको सावित्री सरस्वती या माँ सावित्री भी कहा जाता है। बौद्ध मार्ग में इन्ही देवी को बुद्ध प्रज्ञापारमिता भी कहा गया है।

और बाइबिल में यही देवी मदर मैरी, वुमन ऑफ अपोकलीप्स या रहस्योद्घाटन वाली महिला या रहस्योद्घाटन की महिला, सूर्य के वस्त्र वाली महिला, और सूर्य के आवरण वाली महिला, सूर्य के वस्त्र धारण की हुई महिला (woman clothed with the sun), अदि वाक्यों से भी पुकारी गई हैं।

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला था।

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समरपित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का पचपनवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, ओ३म् सावित्री मार्ग की श्रृंखला का दूसराअध्याय है।

 

अपोकलीप्स (Apocalypse) शब्द का अर्थ, सत्य का प्रकाश या रहस्योद्घाटन है

इस बात पर ध्यान देने की यूनानी भाषा का शब्द, जिसको अपोकलीप्स कहा जाता है, वो प्रलय या कयामत का वाचक नहीं है।

अपोकलीप्स शब्द का वास्तविक अर्थ होता है … कि …,

 

उस सत्य का प्रकाश या रहस्योद्घाटन जो बहुत लम्बे समय से छुपा हुआ था।

वो ज्ञान और मार्ग जो बहुत लम्बे समय से छुपा हुआ था, उसका सार्वभौम प्रकाश।

यहाँ कहे गए सार्वभौम शब्द का अर्थ, “चतुर्दश भुवन” ही मानना चाहिए।

बाइबिल में इसी “चतुर्दश भुवन” को ऐसा बतलाया गया है…,

मेरे पिता के बहुत सारे लोक हैं, या मेरे पिता के बहुत सारे भवन हैं, या मेरे पिता बहुत सारे लोकों के स्वामी हैं (My father has many mansions)”

 

जब किसी भी लोक में ऐसे ज्ञान का, जो वास्तविकता या सत्य बतलाता है, उसका प्रकाश होता है, तब उस लोक में जितने भी प्रपंच या असत्य हैं, उन सबका अंत होने लगता है। और इस अंत का मार्ग भी उन प्रपंचों के, उन प्रपंचों को मानने वालो के, और उन प्रपंचों के मार्ग के प्रलय स्वरूप में ही दिखाई देता है।

जब जब इस विश्व के किसी भी लोक में, उस अंतिम सत्य का प्रकाश किया जाता है, तब तब प्रकृति एक खंड विप्लव लाती है, जो लम्बे समय तक चलता भी है। और क्यूँकि प्रकृति जीवों के भीतर, उर्जा या प्राण और तत्त्वों के स्वरूप में भी होती है, इसलिए ये विप्लव का कारण जीव भी होते हैं। और इसके साथ साथ, क्यूंकि प्रकृति ही ब्रह्म की प्राथमिक अभिव्यक्ति है, इसलिए इन विप्लवों के कारण दैविक भी होते हैं।

और ये खंड विप्लव की प्रक्रिया उस लोक को विशुद्ध करती है, जिसमें उस सत्य का प्रकाश किया जा रहा होता है। और इसके साथ साथ ये खंड विप्लव की प्रक्रिया, उस लोक की प्रकृति को भी नवीन करती है।

इस नवीन होने की प्रक्रिया में, उस लोक में जो कुछ भी असत्य था, कुपित या दूषित था, उस सबका अंत होता है।

और इस प्रक्रिया का अंतिम परिणाम वो होता है, जिसमे समस्त असत्य, उनको मानने वाले और उनके मार्गों का भी अंत होता है। ये प्रक्रिया त्रितापों से होकर जाती है, और ये त्रिताप, मानव जनित, दैविक और प्राकृतिक, तीनों कारणों से आते हैँ।

इस प्रक्रिया की अंत गति में, उस सनातन वैदिक आर्य मार्ग, अर्थात बहुवादी अद्वैत मार्ग का इस प्रकार से प्रकाश होता है, की वो मार्ग सर्वव्याप्त हो ही जाता है।

और जब ऐसा होता है, तब उत्कर्ष मार्ग भी विशुद्ध होते हैँ। और इस प्रक्रिया के अंत भाग में, ये सभी मार्गों का स्वरूप, मुक्तिमार्ग होने की ओर अग्रसर हो जाता है। इस प्रक्रिया के अंत भाग में में, जो मार्ग ऐसे नहीं हो पाते, उनका अंत होता ही है।

यही कारण है, की जब ऐसे रहस्योदघाटन रूपी ज्ञान का प्रकाश होता है, तब वो सभी मार्ग जो कहते थे, की उनका न्याय या मुक्ति अंत समय पर ही होगा, उन सबका अंत हो जाता है, क्यूंकि वो सभी मार्ग प्रपञ्च स्वरूप में ही दिखाई देने लगते हैँ।

और जैसे जैसे इस रहस्योद्घाटन प्रक्रिया में, उन सभी प्रपंची मार्गों का अंत होने लगता है, वैसे वैसे इसी ज्ञान रूपी रहस्योद्घाटन प्रक्रिया से ही, एक विशुद्ध मुक्तिमार्ग का प्रकाश होता है, जो विदेहमुक्ति, जीवनमुक्ति, सद्योमुक्ति अदि सत्य मार्गों का प्रकाश करता है।

इसलिए ये अपोकलीप्स शब्द का वास्तविक अर्थ प्रलय नहीं है, बल्कि सत्य के ऐसे प्रकाश या रसस्योदघाटन को दर्शाता है, जिसकी सर्वव्याप्त प्रक्रिया में समस्त असत्य, उस असत्य को मानने वाले और उस असत्य के मार्गों का ही अंत हो जाता है…, और प्रकृति नवीन होती है। और ऐसा प्रत्येक युग के अंत और स्तम्भित होने पर होता ही है।

इसलिए, इस अपोकलीप्स की प्रक्रिया को क्रियान्वित करने के लिए, जिस योगी को चुना जाता है, उसका ज्ञान ही एक सार्वभौम अस्त्र सरीका होता है, और ऐसा योगी ज्ञान ब्रह्म नामक सिद्ध का धारक भी होगा ही। और क्यूँकि ज्ञान ब्रह्म नामक सिद्धि, ब्रह्मचर्य आश्रम की ही होती है, इसलिए जो योगी जो इस रहस्योद्घाटन का निमित्त बनता है, वो इस रहस्योद्घाटन के समय पर, अविवाहित ही होता है, और यदि वो योगी विवाहित भी होगा, तब भी वो रहस्योद्घाटन के समय पर, ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा होगा।

इस रहस्योद्घाटन की प्रक्रिया के सूत्रधार योगी का ज्ञान ही शब्दात्मक होता है, जिसके कारण, ऐसा योगी शब्द ब्रह्म नामक सिद्धि का धारक भी होगा ही, जिसके कारण, उसके शब्द या वाणी ही उसके सार्वभौम अस्त्र होंगे।

यही है इस रसहयोद्घाटन (अपोकलीपड़े) प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन।

और जिस समय में मैं यह बता रहा हूँ, उस समय पर ये विश्व इस प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है।

जब मानव अपनी दिनचर्या में व्यस्त होगा और इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ होगा, तब ऐसे समय पर ही ये प्रक्रिया इस धरा के अमुक अमुक स्थानों पर खंड विप्लव के स्वरूपों में अकस्मात् ही आती रहेगी।

और ये तबतक आती रहेगी, जबतक इस विश्व की मानव जाति, अगले वैदिक युग या गुरुयुग या आम्नाय युग के सिद्धांतों को पूर्णरूपेण अपनी जीवन शैली और मार्ग में ही धारण नहीं कर लेगी।

अगले मानव युग या गुरुयुग का मूल मार्ग बहुवादी अद्वैत का है, जिसका अर्थ है, कि…, “मार्ग तो बहुत हैं उस ब्रह्म जो जाने के”। लेकिन अन्ततः सभी मार्ग उसी अद्वैत निर्गुण ब्रह्म को जाते हैं …

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन इस बतलाई गई प्रक्रिया के मूल में, यही अकार की देवी हैं, अर्थात सावित्री सरस्वती हैं, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म के कार्य ब्रह्म स्वरूप की सगुण साकार, मानव रूपी, विराट अभिव्यक्ति होने के साथ साथ, उसी हिरण्यगर्भ ब्रह्म की दिव्यता, दूती, शक्ति और अर्धांगनी भी है।

इसलिए इस प्रक्रिया के अंत होने के समय, वो ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म, जो वेदों के तैंतीस कोटि देवी देवताओं में, तैंतीसवें देवता, अर्थात प्रजापति का ही एक स्वरूप है…, उनके मार्ग का ही प्रकाश होना है।

और वो योगी जो इस मार्ग को प्रकाश करने को आया है, वो ब्रह्मस्वरूप को धारण किया हुआ भी, उसी महाब्रह्म प्रजापति के हिरण्यगर्भ, अर्थात महेश्वर या योगेश्वर स्वरूप से एकत्व रखता हुआ भी, ज्ञान ब्रह्म और शब्द ब्रह्मात्मक होता हुआ भी, उसी ब्रह्म के समान अपने भाव रूपि साधन का आलम्बन लेता हुआ भी, स्वयं ही स्वयं में रहता हुआ और कार्य करता हुआ भी, वास्तव में स्वयं को ब्रह्मपुत्र और ब्रह्मशिष्य ही मानेगा।

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

अकार क्या है …

 

अकार क्या है, ॐ का प्रथम बीज शब्द
अकार क्या है, ॐ का प्रथम बीज शब्द

 

अकार शब्द रूप को दर्शाता है …

स्व:ज्ञान मार्ग में रूप का ज्ञान अरूप से पूर्व होता है। निराकार या अरूप का साक्षातकार, रूप या साकार के पश्चात ही होता है।

इसलिए जो अरूप को मानता है, लेकिन रूप का ही खंडन करता है, उनको ना तो रूप का, और ना ही अरूप का ज्ञान प्राप्त होता है।

इस कलियुग में आये हुए अरूप के मार्गों की यही वास्तविकता रही है, कि वो उनके समस्त इतिहास में उस अरूप का साक्षात्कार ही नहीं कर पाए है, जिसको वो मानते हैं।

लेकिन इसका कारण भी यही है, कि वो केवल अरूप को मानते हैं, और इसके साथ साथ वो उस रूप का ही खंडन करते हैं, जो अरूप का मार्ग होता है।

वास्तव में तो, अरूप का साक्षात्कार, रूप से होकर  ही जाता है।

ये चित्र जो ओम शब्द के प्रथम बीज अकार का है, वो ब्रह्म की प्राथमिक रूपावस्था को दर्शाता है। इसी प्राथमिक रूप को ब्रह्म ने तब अभिव्यक्त किया था, जब वो ब्रह्म सर्वप्रथम साकरी हुआ था।

इसीलिए ये चित्र उस निर्गुण ब्रह्म की प्राथमिक सगुण साकार स्थिति को दर्शाता है, और जब उस ब्रह्म ने स्वयं को उसके अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक जगत में, एक विराट जीव स्वरूप में अभिव्यक्त किया था।

 

अकार का मार्ग

पूर्व में बतलाए गए गुहा कैवल्य के ज्ञान में, हमने कहा था कि जब योगी की चेतना हृदय के सामने से ऊपर की ओर उठने वाले विशालकाय पीले और लाल किरणों के प्रकाश में विलीन हो जाती है, तब उस योगी की चेतना हृदय से ऊपर की ओर उठने लगती है, अर्थात, उस चेतना की गति, योगी के हृदय से मस्तिष्क की ओर हो जाति है।

और हृदय के सामने से ऊपर की ओर उठने वाले प्रकाश की किरणों का अलम्बन लेके, योगी की चेतना मस्तिष्क में स्थित ब्रह्मरन्ध्र की ओर चली जाती है। इसके पश्चात ही, ब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में वो योगी महामानव पद को पाता है।

जब वो योगी अपने ही हृदय के सामने से उठने वाले लाल और पीले रंग के प्रकाश के आलम्बन से ऊपर की ओर गतिशील होता है, तो इस ऊपर की ओर की गति में, लाल और पीले रंगों में से, लाल रंग कम होता जाता है, और  पीला रंग बढ़ता चला जाता है।

हृदय से ऊपर की ओर की गति जो ब्रह्मरन्ध्र की ओर लेके जाती है, वो बहुत धीरे होती है, इसीलिए उसे पूर्ण करने के लिए कुछ दिवस भी लग सकते हैं।

लेकिन वो समय जब उस योगी की चेतना ऊपर की ओर जा रही होती है, तब वो योगी पूर्ण प्रत्याहार और इसके कुछ बाद में त्याग भाव में भी स्थित हो जाता है।

और ऐसे पूर्ण त्याग के भाव में जब वो योगी बस जाता है, तब उसको कोई अंतर नहीं पड़ता, कि वो जिए या मरे।

जैसे जैसे वो योगी, हृदय के सामने से ऊपर की ओर उठते हुए पीले और लाल किरणों के प्रकाश का आलम्बन लेके हृदय क्षेत्र से ऊपर की ओर उठता चला जाता है, वैसे वैसे लाल रंग के प्रकाश की किरणें कम होती चली जाती है, और पीले रंग की किरणें बढ़ती चली जाती है।

और ऐसा समय पर उस योगी के मूलाधार चक्र के स्थान पर, एक बहुत सूक्ष्म पीले रंग का प्रकाश प्रकट हो जाता है।

ये पीले रंग का अति सूक्ष्म प्रकाश धीरे धीरे उस योगी की सुषुम्ना नाड़ी को घेर लेता है, और ऐसे समय पर उस योगी की काया भी थोड़ी पीली पड़ जाती है, जैसे उसको पीलिया सरीका कोई रोग हो गया है।

और इस मार्ग की समाप्ति अवस्था में, उस योगी की चेतना ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में पहुँच जाता है। ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष की अवस्था भी बहुत प्रकाशमान होता है, और उसका रंग भी चमकदार पीला ही होता है ।

यही मार्ग है अकार सिद्धि का, अर्थात ॐ मार्ग में, ॐ के प्रथम सगुण साकार स्वरूप की सिद्धि का।

 

अकार साक्षात्कार की दो अवस्थाएं

अकार के साक्षात्कार में दो पद होते हैं, इसीलिए अकार साक्षात्कार की दो अवस्थाएं होती है।

तो अब इन दोनों के बारे में, एक एक करके बतलाता हूँ।

 

अब ध्यान देना …

यहाँ बताए गए ज्ञान में, कई सारे ग्रन्थों के मार्ग हैं।

इस ज्ञान साक्षात्कार से ये बात भी स्पष्ट होती है, कि इसी ज्ञान मार्ग से कई सारे पन्थ और उनके ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं और उन सभी पंथों और उनके ग्रन्थों के मूल में, माँ सावित्री ही हैं, अर्थात यहाँ बतलायी जा रही अकार की देवी ही हैं।

 

पहला पद … अकार तक पहुँचने से पूर्व की अवस्था …

बुद्ध प्रज्ञापारमिता, प्रज्ञापारमिता बुद्ध, प्रज्ञापारमिता
बुद्ध प्रज्ञापारमिता, प्रज्ञापारमिता बुद्ध, प्रज्ञापारमिता

 

ये चित्र आकार के पहले पद या पहली अवस्था को दिखा रहा है।

तो अब इस चित्र का वर्णन करता हूं …

जब योगी हृदय की कैवल्य गुफा से मस्तिष्क की ओर उठ रहा होता है, और जब वो योगी पहली बार अकार का साक्षातकार करता है, तब वो योगी अकार को वैसे ही साक्षात्कार करता है, जैसा इस चित्र में दिखाया गया है।

इसलिए, ये चित्र अकार की उस दशा को दर्शाता है, जब वह योगी अकार के समीप तो होता है, लेकिन अकार तक पहुंचा नहीं होता है,  और उस योगी की चेतना अकार से नीचे होती है।

जब वह योगी अकार के नीचे होता है, और वो अकार को अपने से ऊपर की ओर देखता है, तब उसे वैसा ही दिखता है, जैसा इस चित्र में दिखाया गया है।

इसलिए इस चित्र की दशा तब की भी है, जब योगी की चेतना ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोश में पहुँचि नहीं होती…, लेकिन बस पहुँचने ही वाली होती है।

इस दशा में, अकार को विभिन्‍न मार्गो में क्‍या कहा गया है…, अब वो बताता हूं।

 

  • पहला बिंदु,

बुद्ध प्रज्ञापारमिता

यही बुद्ध प्रज्ञापारमिता है।

यदि हम प्रज्ञापारमिता के शब्द का संधि विच्छेद करते हैं, तो इसके तीन भाग हो जाते हैं…, जो इस प्रकार हैं।

  • पहला शब्द प्रज्ञा है, जिसका अर्थ है निष्कलंक प्रकाश, और जो विशुद्ध ज्ञान और चेतना का वाचक है, और जिनका आलम्बन लेके निस्वार्थ कर्म किये जाते हैं। प्रज्ञा शब्द, ब्रह्म के स्व:प्रकाश (स्वयं प्रकाश) स्वरूप का भी वाचक है, इसलिए ये शब्द ऋग्वेद के महावाक्य, प्रज्ञानं ब्रह्म के समीप है। इसलिए ये शब्द ब्रह्मपथ के ज्ञान, चेतन और निष्काम कर्म के सिद्धांतों को भी दर्शाता है।
  • दूसरा शब्द, परा या पार (या परा) है, जिसका अर्थ है “वे जो सुदूर है” … ये शब्द परा प्रकृति का भी वाचक है, जो प्रकृति का नवम कोष है, जो अति सूक्ष्म श्वेत मेघ के समान है, और जिसकी दिव्यता माँ आदिशक्ति हैं। ब्रह्माण्ड की रचना के दृष्टिकोण से, परा प्रकृति ही ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति थी। इसलिए ये शब्द ब्रह्म की पराशक्ति (माँ आदिशक्ति) का भी वाचक है, जिनको वैदिक वाङ्मय में, देवी, माँ, जननी और शक्ति आदि शब्दों से संबोधित भी किया गया है। और इस परा शब्द की सर्वोच्च अवस्था में, इस शब्द का अर्थ, परम भी होता है।
  • और तीसरा शब्द मिता है, जिसका अर्थ है, मित्र … इसी शब्द के आधार पर, मेरे पिछले जन्म के गुरुदेव ने मुझे मित्र नामक शब्द के आधार पर मैत्री का नाम दिया था। उन गुरु को आज गौतम बुद्ध के नाम से पुकारा जाता है, और उनका जन्म 1914 ईसा पूर्वा से 7 वर्षो के भीतर हुआ था, नाकि उस समय पर, जो आज के जन मानस मान बैठे हैं। ये मिता नामक शब्द प्रजापति के सर्वसम मूलस्वरूप का भी द्योतक है।

और एक बात, गौतम बुद्ध के शब्द में, गौतम शब्द उनका गोत्र है, और बुद्ध शब्द उनकी बुद्धत्व सिद्धि को दर्शाता है।

  • तो इसी आधार पे, प्रज्ञापारमिता शब्द का अर्थ होता है, “परा अवस्थाओं का प्रकाशमान मित्र या परा अवस्थाओं को प्रकाशित, अर्थार्त साक्षात्कार करवाने वाला मित्र”।

कुछ बौद्ध मार्ग बुद्ध प्रज्ञापारमिता को बोधिसत्व कहते है, और कुछ उन्हें बुद्ध बुलाते हैं।

लेकिन क्योंकि ये हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति की अर्धांगिनी हैं, इसलिये मैं उन्हें बुद्ध के नाम से ही संबोधित करूंगा…, नाकि बोधिसत्व।

लेकिन वैदिक वाङ्मय के पञ्च विद्या नामक ज्ञान में, इन्ही बुद्ध प्रज्ञापारमिता को चतुर्थ विद्या, माँ सावित्री, देवी सावित्री, सावित्री विद्या और सावित्री सरस्वती आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

 

पीली कचीना

इसी अवस्था में, अमेरिका महाद्वीप के मूलनिवासी गण, इनको पीली कचीना के नाम से भी सम्बोधित करते हैं।

वैसे एक पूर्व जन्म में, मैं ही वो “मैं दानव (अर्थात, माया दानव या मैं दानव) था, जो अव्यक्त सिद्ध था, इसलिए मैं दानव शब्द से सम्बोधित किया गया था (अव्यक्त सिद्ध को ही दानव कहते हैं।

उस जन्म में, मैंने ही अमेरिका महाद्वीप में वेद मार्ग ख्यापित किया था, और जिसकी स्थापित सभ्यताओं में से एक सभ्यता को आज “माया सभ्यता” कहते हैं।

मुझे उस समय के भारत द्वीप से देश निकाला दिया गया था, या ये कहूं कि तड़ीपार कर दिया गया था, क्योंकि उस समय मैंने यहां के वेद मनीषियों के विकृत मार्गों को चुनौती दी थी और, तब के सम्राट, जो एक वेद मनीषी के ही शिष्य थे, उन्होंने मुझे भारत देश से निकाल दिया था।

उस देश निकाले के पश्चात, मैं पातालपुरी गया था, जिसे आज अमेरिका महाद्वीप कहते हैं। उस पाताल पूरी में मैंने वेदमार्ग स्थपित किया था।

आज के अमेरिकी मूलनिवासी उसी मार्ग को पालन करते हैं। यदि आज भी कोई उन मूलनिवासी सभ्यताओं के मूल मार्ग और प्रधान देवता का अध्यन्न करेगा, तो वो जान जाएगा, कि उनके मार्ग के मूल में आज भी वही वेद मार्ग है, जो मैंने ही स्थापित किया था, जब मैं “माया दानव या मैं दानव” कहलाया था।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

“मैं दानव या माया दानव” उसे बोलते थे, जो अव्यक्त सिद्ध हो। अव्यक्त को ही माया शक्ति या ब्रह्म की पूर्ण शक्ति कहा जाता है।

दानव शब्द का वास्तविक अर्थ, राक्षस या दैत्य नहीं होता…, बल्कि उस विशालकाय अव्यक्त या ब्रह्मशक्ति में लय हुआ, उस अव्यक्त या महामाया रूपी सर्वज ज्ञान, सर्वव्याप्त चेतना और सार्वभौम क्रिया का धारक होता है I

ऐसे योगी को वो सर्वमाता महामाया उनके अपने सर्वव्यापी सर्वशक्तिमय आँचल में घेर कर या ढक कर या छिपा कर इस प्रकार रखती हैं, जैसे कोई बहुत धनी व्यक्ति, एक दुर्लभ रत्न को सबसे छिपा कर रखता है। इसलिए ऐसे योगी के आगमन के बारे में कोई भी तबतक जान नहीं पाता, जबतक महामाया नहीं चाहती।

ब्रह्माण्ड की रचना भी अव्यक्त का अलम्बन लेकर ही हुई थी, और इसीलिए, अव्यक्त सिद्ध योगी पितामह ब्रह्म के उत्पत्ति कृत्य का भी धारक होता है, अर्थात उस अव्यक्त सिद्ध योगी के भाव में ही उसका साधन होता है।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

उस समय के देश निकाले के पश्चात, उसी उत्पत्ति कृत्य का अलम्बन लेके, मैंने पातालपुरी, अर्थात, आज के अमेरिका महाद्वीप में, वेद मार्ग स्थपित किया था।

और क्योंकि ये मार्ग वेदों का था, इसीलिए ये मार्ग भी सनातन वैदिक आर्य धर्म के सिद्धांतों में ही बसा हुआ था, जो समस्त उत्कर्ष मार्गों का मूल और समस्त उत्कर्ष मार्गों की परदादी जी हैं।

यही कारण है, कि इस कलियुग में उन अमेरिका के आदिवासियों पर, चाहे कितने ही विप्लव आए, लेकिन आज भी मेरा ख्यापित किया हुआ वो वेदमार्ग, अपने मूल रूप में सुरक्षित है।

एक बात और जान लो, कि यदि ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक या स्थान पर, किसी भी दानव, अर्थात, अव्यक्त सिद्ध योगी ने वेद मार्ग स्थपित कर दिया, तो वो मार्ग कभी लुप्त नहीं हो सकता है।

इसका कारण है कि उस अव्यक्त सिद्ध के द्वारा क्रियान्वित की गयी स्थापना प्रक्रिया में, अव्यक्त की शक्ति, अर्थात, माया शक्ति, जो चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म की अर्धांगिनी हैं, वो ही क्रियान्वित हो जाती हैं।

और जिस भी मार्ग में, माया शक्ति, जो पितामह ब्रह्म की सनातन दिव्यता हैं, एक बार भी पूर्ण रूप में क्रियांवित हो गई, वह मार्ग सनातन ही होगा और त्रिकालों के समस्त कालों में समान रूप में बसे हुए उस एकमात्र अद्वैत सत्य की ओर ही लेके जाएगा।

यही कारण है कि चाहे कोई कुछ भी कर ले, ऐसे मार्ग के मूल स्वरूप का कभी भी विनाश या अंत नहीं हो सकता है।

इस भूमंडल पर, जब वेदों को ख्यापित किया गया था, तब भी अव्यक्त सिद्धों के द्वारा ही किया गया था, और इसीलिए वेदमार्ग सनातन कहलाया था।

इस जन्म में, जब मैं समुद्री जहाजों पर काम करता था, तो मैं कई बार उत्तर और दक्षिण अमेरिका गया। और जब भी मुझे अवसर मिलता था, तब मैं कुछ मूलनिवासी क्षेत्रों में भ्रमण भी करता था, लेकिन केवल ये देखने के लिए, कि अभी के समय में मेरा स्थपित मार्ग जीवित भी है…, या नहीं।

ये बात मैं अपने ही प्रत्यक्ष प्रमाण से बोल रहा हूँ, कि इतने लाखों वर्षों के पश्चात भी, मेरे उस पूर्व जन्म में ख्यापित किया हुआ वो मार्ग, उसके मूल रूप में आज भी पूर्ण सुरक्षित है।

इतने लाखों वर्षों के पश्चात भी, मेरे उस पूर्व जन्म में ख्यापित किया हुआ वो मार्ग, उसके अपने मूल स्वरूप में, आज भी जीवित है ।

आज भी उन उत्तर और दक्षिण अमीरीकी आदिवासियों की जीवन शैलियों और परम्पराओं में, मेरी इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देते हैं।

जब भी अव्यक्त शक्ति का प्रयोग होता है, तो उस समय उस अव्यक्त शक्ति के भीतर, जो ज्ञान , चेतन और त्रिगुणात्मक तत्त्व, स्व:क्रियान्वित या स्वयंचलित होता है, वो भी इन्ही अकार की देवी का ही होता है।

और क्यूंकि ये तीनों तत्त्व सनातन ही है, इसलिए जब भी अव्यक्त शक्ति का आलम्बन लेके कोई भी मार्ग ख्यापित किया जाता है, तब वो मार्ग भी उसी अनादि अनन्त सनतान, अव्यक्त अवस्था में स्वतः ही बस जाता है।

इसी कारणवश वो मार्ग, उसके अपने मूल स्वरूप स्वरूप में, सनातन कालों तक बना रहता है, अर्थात त्रिकाल के समस्त भागों में वो मार्ग, उसके अपने मूल रूप में सुरक्षित रहता है।

 

और एक बात…

उस समय, ये जो अमेरिका द्वीप पर वेद स्थापना हुई थी, ये उत्तर से दक्षिण अमेरिका तक हुई थी। और उस समय, गोत्र सप्तम के अनुसार, ये स्थापना, सात मूलनिवासी सभ्यताओं में हुई थी।

जब मैं एक बार समुद्री जहाज से पेरू और चिली गया था, जो आज के दक्षिण अमेरिका के दो देश हैं, तब भी मैं मूलनिवासी क्षेत्रों में घूम के आया था, केवल ये जानने के लिए, कि मेरा ख्यापित किया हुआ वो वेद मार्ग, अपने मूल रूप में अभी भी है…, या नहीं।

वैसे भी चिली नामक देश से तो मेरा बहुत प्राचीन नाता भी है, क्योंकि स्वयंभू मन्वन्तर में, मैं चिली के एक पहाड़ पर रहता था, जो आज के समय में, एंटोफ़गास्ता नामक स्थान के समीप है।

इस जन्म में, मैं उस पहाड़ पर भी घूम के आया हूँ, जिसपर मैं उस प्राचीन जन्म में, स्वयंभू मन्वन्तर के समय निवास करता था। उस स्वयंभू मन्वन्तर में, मैं प्रजापति स्वरूप, ब्रह्मऋषि क्रतु का एक मनस पुत्र था।

यहां पर “एक” शब्द कहा है, क्योंकि ब्रह्मऋषि क्रतु के तो बहुत सारे मनस पुत्र थे, और मैं उन बहुत सारे मनस पुत्रों में से एक था।

ब्रह्मऋषि क्रतु ने अपने एक मनस पुत्र को अमुक अमुक स्थानों पर भेजा था, और मुझे उस समयखंड में, आज के एंटोफ़गास्ता बंदरगाह के समीप, जो एक छोटा सा पहाड़ सरीका है, उसपर भेजा गया था, कि बेटा अब इस पहाड़ी पर ही निवास कर।

और क्रतु ऋषि जो मेरे मनस पिता हैं, उन्होंने अपने सारे मनस पुत्रों से ये भी कहा था, कि जब-जब गुरुयुग आएगा, तब-तब तुम सब में से एक मनस पुत्र लौट के आएगा और उस गुरुयुग की एक अतिसूक्ष्म, लेकिन शक्तिशाली आधार या नीव डालेगा।

और ये अतिसूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली नीव जगत चतुष्टय में रखी जाएगी…, अर्थात ये नीव प्राथमिक ब्रह्माण्ड या सूक्ष्म सांस्कारिक जगत से लेकर, कारण या दैविक जगत, सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत में एक के बाद एक…, ऐसे ही डाली जानी चाहिए।

और क्रतु ऋषि जो मेरे मनस पिता हैं, उन्होंने अपने सारे मनस पुत्रों से ये भी कहा था, कि अपने मूल और गंतव्य, दोनों से ही ये नीव वैदिक वाङ्मय की होगी, इसलिए वो गुरुयुग जो इस नीव पर प्रकाशित होगा, वो भी वैदिक युग ही कहलाएगा, जिसके कारण उस गुरुयुग के सार्वभौम सम्राट और एकमात्र गुरु भी तुमसब मनस पुत्रों के सनातन गुरुदेव, श्रीमन नारायण ही होंगे।

उन प्रजापति स्वरूप ब्रह्मऋषि क्रतु ने अपने मनस पुत्रों को ये भी बोला था, कि वो गुरुयुग, कलियुग को स्थम्बित करके आएगा, इसलिए अपनी नीव ऐसी डालना, की कलियुग की समस्त दैत्यवादी शक्तियां उस नींव को न तो जान पाएं, और न ही उसको ढक या ढहा पाएं।

इसीलिए इस नीव का फल केवल इस स्थूल जगत में ही नहीं दिखेगा, बल्कि संपूर्ण चतुर्दश भुवनात्मक ब्रह्मंड में दिखेगा।

ये नीव अतिसूक्ष्म होने के साथ साथ, अति शक्तिशाली भी होनी चाहिए।

उस स्वयंभू मन्वन्तर में, हम सभी मनस पुत्रों को, हमारे मनस पिता, प्रजापति स्वरूप ब्रह्मऋषि ने ऐसा ही कहा था।

गुरुयुग एक वैदिक युग होता है, जो पृथ्वी के अग्रगमन चक्र में सुचलित किया जाता होता है, और जो देवताओं के कलियुग को बीच में ही रोक के, अर्थात देवताओं के कलियुग को स्तम्भित करके ही लाया जाता है। किसी भी कलियुग के कालखंड में, ऐसा अठारह बार होता है I

उस गुरु युग के सम्राट श्रीमन नारायण होते हैं, और वही नारायण उस गुरुयुग के प्रधान गुरु भी होते हैं।

इसलिए इस गुरु युग में आम्नाय सिद्धांत ही सर्वव्यापक होता है। गुरुयुग में आम्नाय सिद्धांत और आम्नाय पीठ से ही शासन होता है, क्योंकि नारायण ही आम्नाय पीठों के प्रथम पीठाधीश्वर हैं।

इसीलिए गुरुयुग वो मानव युग होता है, जो देवयुग के कलियुग को कोई 10,000 वर्षो के लिए, स्तंभित करके या रोक कर लाया जाता है।

ऐसा ही कलियुग के कालखंड में चलते हुए प्रत्येक अग्रगमन चक्र में भी होता है। इसलिए किसी भी कलियुग के कालखंड में, ऐसा अठारह बार होता है I

इसका अर्थ हुआ, जो मानव सतयुग, देवताओं के कलियुग के बीच में, उस कलियुग को ही स्तंभित करके या रोक कर लाया जाता है, वे ही गुरुयुग या वैदिक युग या व्यास गद्दी का युग कहलाता है।

आज के परिपेक्ष्य में,ये गुरुयुग 2028 के 27-28 सितम्बर से 2.7 वर्षो के मध्य में प्रकाशित किया जाएगा।

लेकिन जबकि इस गुरुयुग की नीव यहाँ बताए गए कालखंड में ही डाली जानी है, पर तब भी इस पृथ्वी लोक पर, पूर्ण रूप में ये गुरुयुग 2082 ईस्वी से 27 और 1 वर्ष और इसके अतिरिक्त 2.7 वर्षों के भीतर ही प्रकाशित होगा।

जैसे जैसे इसकी नीव डाली जाएगी, वैसे वैसे समस्त कलियुगी तंत्र और मार्ग, एक खण्डित स्वरूप को पाएंगे और घोर विप्लव को जाते जाएंगे।

ये खंडविप्लव मानव जनित तो होंगे ही, लेकिन इसके साथ साथ, ये विप्लव प्रकृतिक और दैविक भी होंगे । मैं ये जानता हूँ, की इस प्रक्रिया में मेरा भी कुछ न कुछ घाटा होगा ही, क्यूंकि मेरी आज की ये मानव काया भी तो कालगर्भित ही है।

इस कलियुग स्तम्भित करने की, और गुरुयुग स्थापना की प्रक्रिया में, समस्त वैदिक देवी देवता, कुछ सिद्ध और ऋषि गण, कुछ वैदिक योद्धागण इत्यादि भी भाग लेंगे, और इसीलिए, अगामी समय में, समस्त आगम निगम के देवी देव अपने धर्मदुर्गों या वैदिक मंदिरों को त्याग के, इस प्रक्रिया में भाग लेने हेतू इस धारा पे लौट आएंगे।

मेरी ये बात ध्यान से सुनना, कि इस स्थूल जगत में, 2028 सितम्बर से 2.7 वर्षो में इस गुरुयुग की नीव डाली जानी है। आगामी समय में, जो भी खंड विप्लव आएंगे, वो सभी इस लोक के जीवों को उसी गुरुयुग की नीव स्थापना की ओर लेके जायेंगे।

ये सब खंड विप्लव तबतक आते ही चले जाएंगे, जबतक मानव जाति इस कलियुग के तन्त्रों को त्यागके, गुरुयुग के मार्गों को अपना नहीं लेती है।

और इन सभी खंड विप्लव में, मानव जाति के कलियुगी मार्गों और तंत्रों का बहुत बड़ा क्षय भी होने वाला है, क्यूंकि आज के अधिकांश मानव, राक्षसी प्रवृति के ही हैं, जिसका आगामी गुरुयुग में कोई स्थान है ही नहीं।

मैं ये बात, 170 से भी अधिक देशों में भ्रमण करके ही बोल रहा हूँ, की आज की अधिकांश मानव जाति ऐसी घोर राक्षसी प्रवृत्ति की है, जिसमें देवत्व और जीवत्व के सिद्धांत तो छोड़ो …, मानवता तक के अंश मात्र ही नहीं बचे हैं।

इसीलिए, यदि मानव जाति उस आगामी गुरुयुग के सिद्धान्तों को स्वेच्छा पूर्वक अपनाएगी नहीं, तो आगामी समय के उन एक के बाद एक आने वाले विश्वव्यापी खण्ड विप्लवों में, मानव जाति का अधिकांश भाग नष्ट होने वाला है।

और इस प्रबुद्ध योगभ्रष्ट की एक और बात और याद रखो, की सनातन कभी भी लुल्लपुल्ल होकर नहीं आता…, वो करोड़ों सिंघों की दहाड़ के साथ आता है…, और ये दहाड़ चौरासी लक्ष जीवों और जगत चतुष्टय, दोनों में ही अपने खन्डित स्वरूप में सुनाई देती है। आगामी समयखंड मेरी इस बात का साक्ष बनेगा, और उस समय के जीव मेरी इस बात के साक्षी भी होंगे।

इसके पश्चात ही इस संपूर्ण चतुर्दश भुवन रूपी ब्रह्माण्ड में, सनातन वैदिक आर्य सिद्धान्त का प्रकाश होगा, जो उन पितामह प्रजापति का ही ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्त स्वरूप है, और जिसकी शक्ति को माँ भारती सरस्वती कहते है, जो जीवों के मूलाधार चक्र से लेकर मणिपुर चक्र तक की शक्ति होती है। तो अब मैंने संकेत में ही सही, लेकिन बता दिया उस खण्डविप्लव का मूल कारण।

और इस बतलाए गए बिंदु के साथ साथ, उस सनातन के प्रकाश में, इन्ही अकार की देवी, अर्थात माँ सावित्री सरस्वती का प्रमुख योगदान भी होगा, क्योंकि उस गुरुयुग में, इन अकार की देवी का शब्दात्मक स्वरूप ही सनातन की नीव का आधार होता है।

2028 ईस्वी के सितम्बर से 2.7 वर्षों के भीतर और इस कालखंड के पश्चात, जैसे जैसे समय आगे को बढ़ेगा, वैसा वैसा सनातन ख्यापित होता चला जाएगा, इस संपूर्ण चतुर्दश भुवन रूपी ब्रह्माण्ड में जो वास्तव में सर्वेश्वर का साम्राज्य ही है, और जिसको वैदिक राष्ट्र भी कहा जा सकता है। वास्तव में तो ब्रह्माण्ड को ही वैदिक राष्ट्र कहते हैं, क्यूंकि ब्रह्माण्ड ही सर्वेश्वर का साम्राज्य होता है।

आज के वैष्णवाचार्यों द्वारा, सर्वेश्वर शब्द को नारायण से जोड़ा जाता है, लेकिन वास्तव में ये शब्द प्रजापति का ही वाचक है।

यहां केवल पृथ्वी लोक की बात नहीं हो रही है, बल्कि संपूर्ण चतुर्दश भुवन की ही बात हो रही है।

जो गुरुयुग होता है, वो बहुवादी अद्वैत मार्ग का युग होता है। बहुवादी अद्वैत का अर्थ होता है, कि “मार्ग से बहुवादी…, लेकिन गंतव्य से एक”।

इसका सिद्धांतिक स्वरूप ऐसा होगा…, सभी उत्कर्ष के मार्ग उसी ब्रह्म से प्रकाशित हुए हैं और अन्ततः उसी ब्रह्म को जाते हैं, क्यूंकि सभी मार्गों का मूल और गंतव्य भी तो वो ही पूर्ण सन्यासी, सर्वसाक्षी, स्व:प्रकाश, सर्वव्याप्त निर्गुण निराकार ब्रह्म ही है, और वो भी इस समस्त जीव जगत के ही अद्वैत आत्मस्वरूप में।

बहुवादी अद्वैत ही सनातन का मार्ग होता है। जहाँ बहुवाद ही अद्वैत को लेके जाए, वो वैदिक सनातन के सिवा कुछ हो भी तो नहीं सकता।

इस ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, सनातन वैदिक आर्य मार्ग ही ऐसा उत्कर्ष पथ है, जिसमें प्रकृति के तारतम्य का आलम्बन लेके भी, उस अद्वैत निर्गुण निराकार ब्रह्म को प्राप्त हुआ जा सकता है।

बहुवाद प्रकृति का है, और अद्वैत ब्रह्म का वाचक है। इस बहुवादी अद्वैत या वैदिक मार्ग के मूल में प्रकृति होती है, और गंतव्य में निर्गुण ब्रह्म।

उस आगामी गुरुयुग में, जिसने अभी के कालखंड में इस चतुर्दश भवन के समस्त द्वारों पर अपनी दस्तक देना प्रारंभ भी कर दिया है, प्रकृति और पुरुष दोनो के सिद्धांतो में सामंजस्य होगा, दोनो का योग होगा और वो प्रकृति के समतावादी नवम कोष से प्रारम्भ होगा, और उस सर्वसम चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म की सर्वसमता की ओर लेके जायेगा।

और क्यूंकि उस आगामी गुरुयुग के मार्गों में प्रकृति और पुरुष का योग, ऐसी सर्वव्याप्त समतावादी दशा में होगा, इसीलिए, ये प्रकृति और पुरुष दोनों की बराबरी में स्थित होगा।

वो आगामी गुरुयुग इस कलियुग के कालखंड में आए हुए विकृत धर्म शास्त्रों का नहीं होगा, जहां प्रकृति को किसी ना किसी भगवान के अधीन बताया गया है, और कुछ कलियुगी मार्ग तो ये भी कहते हैं, कि प्रकृति अमुक देव की बपौती है।

लेकिन ऐसी सभी बातों और मतों का प्रकृति की वास्तविकता से कोई भी लेना देना नहीं है।

प्रकृति अपना सनातन योग, पुरुष या ब्रह्म से तो लगायी होती है, लेकिन अपने कार्य क्षेत्र में, प्रकृति स्वतंत्र होती है।

उस निर्गुण ब्रह्म से योग के कारण, प्रकृति ब्राहमय होकर, ज्ञानमय और चेतनमय तो हो जाती है, लेकिन ऐसा होने पर भी, कर्म के अनुसार, प्रकृति पूर्ण स्वतंत्र ही रहती है, क्यूंकि निर्गुण केवल सर्वसाक्षी ही होता है…, निर्गुण न कर्मों में है और न ही कर्मफलों में है, और न ही इनमें नहीं है I

आगामी आम्नाय या वैदिक के युग में, ऐसा ही सनातन सिद्धांत प्रकाशित होगा, जिसमें माँ प्रकृति को उनका उचित स्थान दिया जाएगा, इसीलिए, वैदिक पुरातन कालखण्डों के समान, उस आगामी आम्नाय या वैदिक के युग में प्रकृति के तत्त्वों पर भी उपासनाएँ होंगी।

इसीलिए, उस गुरुयुग में, मातृ शक्ति, अर्थात नारी शक्ति को भी उसका उचित स्थान प्राप्त होगा, जिसका सिद्धांत इस कलियुग की काली काया ने ढक लिया है।

यही वैदिक सिद्धांत मैंने मेरे “मैं दानव” के जन्म में, उत्तर और दक्षिण अमरीका में ख्यापित किया था, जिसमें मूल में देवता, प्रजापति ही थे।

यदि आज भी कोई उन सभ्यताओं के मूल बिंदुओं का अध्यन्न करेगा, तो उनमे  प्रजापति सूक्त, हिरण्यगर्भ सूक्त इतियादी ही पाएगा।

अब आए बढ़ता हूँ और अकार की दूसरी दिशा को बतलाता हूँ …

 

दूसरा पद … ये अकार की दशा पर पहुँचने के पश्चात की अवस्था का है, …

सावित्री सरस्वती, सावित्री विद्या, माँ सावित्री, सावित्रि, सावित्रि विद्या सरस्वती …

 

सावित्री विद्या, सावित्रि सरस्वती, माँ सावित्री, सावित्रि, सावित्रि सरस्वती विद्या
सावित्री विद्या, सावित्रि सरस्वती, माँ सावित्री, सावित्रि, सावित्रि सरस्वती विद्या

 

जैसे जैसे योगी की चेतना, पूर्व के अध्यायों में बतलाई गई हृदय कैवल्य गुफा के सामने से ऊपर की ओर उठने वाले उस विशालकाए प्रकाश, या ब्रह्माकाश की किरणों का अलम्बन लेके, मस्तिष्क की ओर उठती चली जाती है, वैसे वैसे वो चेतना यहाँ बतलाई जा रही, अकार की देवी के समीप पहुँचती ही जाती है।

और यहां बताए जा रहे उत्कर्ष मार्ग के अंत में, वो चेतना, अकार रूपी विराट देवी के श्रीचरणों के समीप ही बैठ जाती है। इन देवी की दशा अति प्रकाशमान स्वर्णिम वर्ण की है।

इसी प्रकाशमान स्वर्णिम वर्ण में एक सुनहरे रंग की देवी विराजमान होती हैं, जिनका बीज शब्द या नाद, शब्द होता है। यौगिक और वैदिक वांगमय में, इन्हीं देवी को अकार कहा गया है।

ये पद्मासन में बैठी होती हैं, साड़ी पहनती हैं, और अनंत कोटि सूर्यों के समान प्रकाशमान होती हैं।

इनमें इतना प्रकाश होता है, कि वो योगी जो इनके कोश के स्थित होता था, इनको अधिक समय तक देख ही नहीं पाता।

इसलिए, वो योगी बस इनके श्री चरणों की ओर ही बैठ जाता है और उन्हीं चरणों को ही देखता रहता है और ऐसी दशा में, वो इनका शब्द सुनता रहता है, जो संस्कृत भाषा का अ शब्द है।

और कभी-कभी, बीच-बीच में, वो योगी इन देवी की ओर देखता भी है।

 

अब आगे बढ़ता हूँ और अकार शब्द की देवी का वर्णन करता हूं …

  • इनका रंग चमकदार सुनहरा है, जैसे इनमें कोटि-कोटि सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हैं।
  • इनके सर के ऊपर का भाग, ऊपर की ओर उठा हुआ है, और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इन्होनें कोई सुनहरे रंग का मुकुट धारण किया हुआ है, जैसा जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऊपर का अकार है। ये अवस्था इनके गंतव्य स्थित ज्ञान और चेतना को दर्शाती है, जिसके कारण ये अकार की देवी, ब्रह्म के परम चेतन, सगुण साकार विराट अवस्था को भी दर्शाती हैं।
  • इनकी साड़ी लाल रंग की है, और उस साड़ी में से बहुत चमकदार हीरे के समान बिन्दु रूप में बहुत सारी प्रकाश की किरणें निकालती ही रहती हैं।
  • इनका आसन पद्म है, अर्थात ये देवी पद्मासन में ही बैठी हैं।
  • इनके नाभी से, बहुत चमकदार हीरे के समान प्रकाश बाहर को निकलता है। ये प्रकाश इतना है, कि यदि उसे कुछ अधिक समय तक देखा जाए, तो वो साधक को अँधा ही कर देगा। ये प्रकाश इनके नाभि कमल की पूर्ण जागृत स्थिति को दर्शाता है।
  • नाभि में ही मन केन्द्रित होता है, इसलिए ये हीरे जैसा प्रकाश, ये भी बतलाता है, कि इनका मनस तत्व सर्वसमतावादी है, क्यूंकि हीरे का प्रकाश सर्वसमता को ही दर्शाता है, जो सदाशिव के सद्योजात मुख की होती है, और जिसे ब्रह्मलोक भी कहा जाता है। यही कारण है की जिस साधक की मनोस्तिथि सर्वसमता की नहीं है, वो इन अकार की देवी, या माँ सावित्री सरस्वती का साक्षात्कार भी नहीं कर पाएगा।
  • इनके दिव्य शरीर के नीचे के भाग से तीन प्रकार के प्रकाश बाहर निकल रहे होते हैं। इन तीनो प्रकार के प्रकाश के बारे में, थोड़ी बाद में बात करूंगा।

और ऐसी ही विशुद्ध अति प्रकाशमयी अवस्था में बैठ के, वो योगी उसके अपने ही ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष के उस अथाह सुनहरे प्रकाश में, इन विशालकाय देवी को जान कर, उनके अ नामक बीज शब्द में ही खो जाता है।

और ऐसी अवस्था में बैठे हुए उस योगी को (अर्थात योगी की चेतना को) पता ही नहीं चलता, की कितना समय व्यतीत हो गया।

अब आगे बढ़ता हूं…

 

शास्त्रों में अकार के विभिन्न नाम

अकार को विभिन्न नामों से पुकार जाता है, तो अब इन सब का वर्णन करूंगा…

 

  • माँ सावित्री अकार की देवी

माँ सावित्री, हिरण्यगर्भ ब्रह्म के कार्य ब्रह्म स्वरूप की सनातन अर्धांगनी हैं, और सावित्री मंत्र की दिव्यता भी हैं।

वैसे मैं सावित्री विद्या को ही गायत्री विद्या कहती हूं, क्योंकि मेरे मार्ग में ये दोनों देवियाँ एक ही हैं।

शब्दात्मक देवी को ही सावित्री सरस्वती कहा जाता है और ज्ञानात्मक या वेदात्मक देवी को गायत्री विद्या।

वेदमाता और देवमाता स्वरूप में, सावित्री विद्या ही गायत्री विद्या हैं I

और शब्दात्मक स्वरूप में, गायत्री विद्या ही सावित्री विद्या हैं।

ऐसा कहने का यह कारण है, कि …

शब्दात्मक स्वरूप में, शब्द ही वेद कहलाता है

और वेदात्मक स्वरूप में, वेद ही शब्द।

वेद का अर्थ है, ज्ञान। यहाँ कहे गए ज्ञान शब्द का अर्थ, आत्मज्ञान ही मानना चाहिए क्यूंकि वेद आत्मज्ञान कारक ही हैं। यही कारण है, कि ये अकार की देवी ही ज्ञान और उत्कर्ष मार्ग की प्रधान दिव्यता हैं।

ये अकार की देवी, आज्ञाचक्र की देवी हैं। इनके आज्ञाचक्र में उपस्थित रहने के कारण ही आज्ञा चक्र स्वयंजागृत चक्र कहलाता है। लेकिन इनका वास्तविक स्थान आज्ञाचक्र के समीप है, नाकी आज्ञाचक्र के भीतर।

स्वयंजागृत आज्ञा चक्र की सरस्वती अर्थात सार्वभौम सत्ता होने के कारण, इनका प्रभाव बाकी सभी चक्रों पर और उन चक्रों की दैविक सत्ताओं पर भी पड़ता है, और यही कारण है, कि इनका प्रभाव अन्य चार विद्याओं और उनके चक्रों पर भी होता है।

चारो योग मार्ग, अर्थात ज्ञान योग, कर्म योग, श्रद्धा समर्पण योग या भक्ति योग और राज योग, और इन योग चतुष्टय की गंतव्य अवस्थाएं, इनही अकार की देवी के भीतर, उन अवस्थाओं के मूलात्मक शब्द रूप में ही समायी हुई हैं।

ये देवी ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया की शक्ति और दिव्यता भी है। इसीलिए, इनसे सम्बंधित योगीजन, अंततः बुद्धता को ही प्राप्त होते हैं।

बुद्धता या बुद्धत्व शब्द का अर्थ होता है…, “वो योगी जो इस समस्त जीव जगत को ऐसे देखता है, जैसे साधारणगण इस पृथ्वी लोक में निवास करते समय, एक दुसरे को और इस पृथ्वी को देखते हैं”I

इसलिए बुद्धत्व का शब्द, सर्वज्ञता नामक शब्द को भी दर्शाता है।

 

अकार की देवी का देवराज इंद्र और इन्द्रलोक से नाता

क्योंकि ब्रह्मांड के विज्ञानमय कोष को ही इंद्रलोक कहते हैं, इसलिए इन्द्रलोक पर भी इन अकार की देवी, सावित्री सरस्वती का पूर्ण प्रभाव है।

और क्यूंकि विज्ञान ही सभी दैविक और अन्य लोकों की मूल सत्ता है, इसलिए, जहाँ तक किसी भी लोक का प्रश्न है, इन देवी का प्रभाव सार्वभौम ही है।

और क्यूँकि ज्ञान ही ब्रह्म है, इसलिए इस समस्त चतुर्दश भुवन और उससे परे भी, इन देवी का प्रभाव ब्रह्म सरीका ही है।

और क्योंकि इनका साक्षातकार साधक के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है, इसलिए ये देवी ही विज्ञानमय कोष की देवी भी हैं। ये ज्ञान जो मैं बता रहा हूं, उसमें भी मैं इन्हीं देवी सावित्री को ही पाता हूं।

इनका ज्ञान मार्ग तेजपूर्ण है और जहाँ वो तैजस, अग्नि के रूप में ही होता है I ये देवी अज्ञान रूपी तम या अंधकार हरिणी भी हैं। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का वैदिक वाक्य इनके पूर्ण ज्ञान को ही दर्शाता है, जो किसी भी साधक के तम रूपी अज्ञान को समाप्त करता है।

इसलिए वेदों के वाक्य, जैसे “तमसो मा ज्योतिर्गमय”, इत्यादि भी इनके वास्तविक ज्ञानमय और चेतनमय स्वरूप को ही दर्शते हैं। ये देवी एक विराट मानव आकृति धारण की हुई हैं, और ये देवी चैतन्य, ज्ञानमय, कोटि-कोटि सूर्यों के प्रकाश रूपी आभा को धारण की हुई, परम ज्योतिस्वरूप ही हैं।

बौद्ध मार्ग में जो धर्मकाया नामक शब्द बताया गया है, उस धर्मकाया की ज्ञान देवी भी सावित्री विद्या ही है। वैसा जो बौद्ध मार्ग का धर्मकाया है, उसे ही वेदों में हिरण्यगर्भ कहा गया है।

इनके अनुग्रह के बिना बुद्धत्व प्राप्ति असंभव है। कोई बुद्ध हुआ ही नहीं जिसपर इन देवी का अनुग्रह ना रहा जो। जो योगी इनका नहीं है, वो बुद्धता को प्राप्त भी नहीं हो पाएगा।

आत्मज्ञान के मार्ग में भी ये देवी मिलेगी, इसीलिए, जब कोई योगी इनका साक्षातकार करता है, तो वो योगी सावित्री मंत्र में छुपे हुए आत्मतत्व का भी ज्ञाता हो जाता है। वैसे आजकल सावित्री मंत्र को ही गायत्री मंत्र कहते हैं।

इस चित्र में इन देवी को घेरे हुए जो सुनहरा रंग दिखाया गया है, वो ही योगी के ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष का प्रकाश है। इसी ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में ये देवी प्रत्येक साधक की काया के भीतर निवास करती हैं।

और क्यूँकि साधक के शरीर के भीतर ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष का क्षेत्र, आज्ञाचक्र के थोड़ा ऊपर से लेकर, ब्रह्मरन्ध्र चक्र के ऊपर के भाग से थोड़ा सा नीचे तक होता है, इसलिए पुरातन वेद मनिषियों ने इनका स्थान आज्ञाचक्र कहा था।

लेकिन सुनहरा रंग तो हिरण्यगर्भ ब्रह्म का होता है, जिनकी कार्य ब्रह्म स्वरूप में अभिव्यक्ति, इन देवी के स्वामी, अर्थात पति भी हैं।

 

अकार की देवी का ब्रह्मपुत्र के शब्द से नाता

इन देवी माँ में लय हुए योगिजनों को ब्रह्मपुत्र भी कहा जाता है। जिस योगी की चेतना इन देवी में लय नहीं हुई, वो ब्रह्मपुत्र नहीं कहलाया जा सकता ।

पर यहाँ कहे गए ब्रह्मपुत्र के शब्द में, ब्रह्म नामक शब्द हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म, दोनों को ही दर्शाता है। और इसी ब्रह्मपुत्र के शब्द में, पुत्र नामक शब्द, उस सनातन काल के ही चक्र स्वरूप को दर्शाता है, जिसकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म से हुई थी।

और अपने गंतव्य स्वरूप में, यही पुत्र का शब्द, शब्दब्रह्म नमक सिद्धि को भी दर्शाता है।

और यहाँ कहे गए ब्रह्मपुत्र के शब्द में, यही पुत्र का शब्द, मनु नामक शब्द को भी दर्शाता है, जिसका वास्तविक अर्थ, शब्द, नाद, कम्पन और मंत्र होने के साथ साथ, मन्त्रार्थ, शब्दार्थ, मन्त्रार्थ स्थित, शब्दार्थ स्थित, वेद, वेदार्थ, वेद स्थित, वेदार्थ स्थित, वेददृष्टा , मंत्रदृष्टा, शब्ददृष्टा, ब्रह्मऋषि, ब्रह्म का पुत्र, ब्रह्म का शिष्य, इत्यादि भी होता है।

पर गंतव्य रूप में, यहाँ कहे गए सभी शब्दों का अर्थ, ॐ और ॐ द्रष्टा ही होता है, क्यूंकि ॐ ही इन सबका मूल और गंतव्य…, दोनों ही है।

 

अकार की देवी का हिरण्यगर्भ ब्रह्म,  कार्यब्रह्म, काल और कालचक्र से नाता

हिरण्यगर्भ ही वो देवता हैं, जो अभिमानी और अनाभिमानी दोनो होते हैं। अपने महेश्वर या योगेश्वर स्वरूप में, अर्थात हिरण्यगर्भ स्वरूप में, वो अनाभिमानी देवता हैं। और अपने ही रजोगुणी कार्यब्रह्म स्वरूप में, वही हिरण्यगर्भ, अभिमानी देवता हैं।

अभिमानी और अनाभिमानी, दोनो ही स्वरूपों में होने के कारण, हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही वो देवता हैं जो देवत्व, जीवत्व और जगतत्व नामक शब्दों की परिपूर्णता को दर्शाते हैं।

और क्यूंकि ये अकार की देवी, हिरण्यगर्भ ब्रह्म के कार्य ब्रह्म नामक अभिव्यक्ति की ही अर्धांगिनी हैं, इसलिए ये अकार की देवी भी ऐसी ही पूर्ण दिव्यता को धारण करी हुई हैं।

हिरण्यगर्भ से ही काल स्वयंउत्पन्न हुआ था, और वो भी उस काल के ही स्वयंचलित, स्वयं परिवर्तित, अनादि अनन्त, सनातन कालचक्र स्वरूप में।

और ये देवी, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की अर्धांगिनी हैं, वो भी उसी काल की धारक हैं, इसलिए ये देवी भी अनादि कालों से हैं, और अनन्त कालों तक रहेंगी भी।

ऐसा होने के कारण, ये अकार की देवी, सनातन ज्ञान या वेद शब्द और उसके मार्ग की प्रधान दिव्यता भी हैं।

इनके गंतव्य रूपी देवत्व को ही वेदों में सावित्री, सवितृ और सवितुर शब्दों में दर्शया गया है। सवितुर नामक शब्द की दिव्यता के मूल में कोई देव नहीं है, बल्कि यही अकार की देवी हैं। सवितृ और सवितुर का अर्थ होता है, सविता, अर्थात सूर्य या तेजाग्नि की दिव्यता को धारण किया हुआ। इन दोनों शब्दों के सम्बन्ध भी हिरण्यगर्भ ब्रह्म के प्रकाश से ही है।

सवितुर ही ब्रह्मलोक का मार्ग है, और इसीलिए साधकों के उत्कर्ष मार्ग में सवितुर नमक शब्द की व्यापकता भी मुक्तिकारक ही है।

योगमार्ग में, ब्रह्मलोक का मार्ग भी इस सवितुर नमक शब्द की दशा से होकर जाता है। और उस ज्ञान चेतन तेजाग्निपूर्ण मुक्तिमार्ग में, ये अकार की देवी ही प्रधान दिव्यता हैं। इस ज्ञान चेतन तेजाग्निपूर्ण मुक्तिमार्ग को, चित्रों सहित किसी और अध्याय में बताऊंगा।

 

अकार की देवी का चौबीस तत्त्वों और चौबीस गुणों से नाता

ये अकार की देवी ही सांख्य के चौबीस तत्त्वों की स्वामिनी और धारक हैं। ये चौबीस तत्व ऐसे होते हैं…, प्रकृति, महत, अहंकार, मनस, कर्मेंद्री पंचक, ज्ञानेंद्री पंचक, तन्मात्र पंचक और महाभूत पंचक।

लेकिन यहां जो प्रकृति शब्द कह गया है, उसे ही वेदांती अव्यक्त कहते हैं…, पर ये बात पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि कलियुग के प्रभाव के कारण, आज के वेद मनीषी भी बिना साक्षातकार किए हुए ही, बस इस या उस ग्रन्थ का आश्रय लेकर कुछ भी बोल देते हैं।

सावित्री देवी ही न्याय और योग मार्ग के चौबीस गुणों की स्वामिनी और धारक हैं। इनका मंत्र भी चौबीस बीज अक्षरों का ही होता है, और इस मंत्र के चौबीस परपितामह, चौबीस पितामह, चौबीस पिता और चौबीस नाती रूपी स्वरूप भी होते हैं। इसी मंत्र के चौबीस मातृशक्ति स्वरूप भी होते हैं I और इसी मंत्र के, चौबीस गुरु और चौबीस शिष्य स्वरूप भी होते हैं। और इसी मंत्र के चौबीस योगात्मक स्वरूप भी होते है, जिनमें यहां बताए गए समस्त बिन्दुओं का अद्वैत योग होता है I इनही स्वरूपों के शब्द बीजों के अनुलोम विलोम से वैदिक काल, गुण, कोष, भूत, तन्मात्र और दिव्यादि अस्त्रों का निर्माण किया जा सकता है।

लेकिन कलियुग में दिव्यास्त्रों का प्रयोग वर्जित होता है, इसलिए कलियुग के कालखंड में इन दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी लुप्त हो जाता है I

और जब कलियुग समापन की ओर जा रहा होता है या स्तम्भित किया जा रहा होता है (जैसे आज की अवस्था में कलियुग स्तम्भित किया जा रहा है), तो इस प्रक्रिया के संधिकाल के मध्य भाग से ही इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया जा सकता है I अभी के परिपेक्ष्य में, ये समय 2028.74 ईस्वी से 2.7 वर्षों के भीतर प्रारंभ हो जाएगा I

सबकुछ काल गर्भित होता है, इसलिए युग के काल नियमों का अतिक्रमण या उलंघन करके, कुछ भी नहीं किया जा सकता, इसलिए जिस युग या कालखंड में जो नियम अदि होते हैं, उनके अनुसार ही सबकुछ क्रियान्वित होता है I

 

अकार की देवी का त्रिगुणों से नाता

समस्त जीव और जगत में, त्रिगुण भी देवी सावित्री या सावित्री सरस्वती के विराट स्वरूप से ही प्रकाशित होते हैं। इस चित्र में भी इन त्रिगुणों को दिखाया गया है, जिसके बारे में इसी अध्याय के आगे के भाग में बताया गया है।

 

अकार की देवी का ब्रह्माण्ड की भाषा से नाता

ब्रह्माण्ड की भाषा जो संस्कृत है, जिसके प्रथम अभिव्यक्त शब्द, का शब्द भी देवी सावित्री या अकार की देवी का ही बीज मंत्र है।

इसीलिए ये देवी ही ब्रह्माण्ड की भाषा, अर्थात संस्कृत भाषा की प्राथमिक स्वामिनी हैं, और यही देवी, भाषा के शब्दों को उनके शब्दात्मक कम्पन स्वरूप में, जीव और जगत के भीतर के पृथ्वी तत्त्व में स्थापित करती हैं, जिससे जीव और जगत में शब्द सर्वव्याप्त होता है, और इस सर्वव्याप्त अवस्था में वो शब्द ही ब्रह्म सरीका होकर रह जाता है और ऐसी अवस्था में ही वो शब्दब्रह्म कहलाता है I

माँ सरस्वती ही अपने सावित्री स्वरूप में संस्कृत भाषा की स्वामिनी हैं I और वही माँ सरस्वती उनके अपने गायत्री स्वरूप में वेदों, वेदमंत्रों और वैदिक दिव्यताओं की स्वामिनी हैं।

भाषा के बिना ज्ञान और दिव्यता नहीं होती, और ज्ञान और दिव्यता के बिना भाषा का उत्कर्ष रूपी प्रभाव कैसे होगा, इसीलिए साधक के ज्ञानमय चेतनमय मुक्तिमार्ग में, जिसे आत्मज्ञान का मार्ग कहा जाता है, ये दोनो देवियां, अर्थात, गायत्री विद्या और सावित्री विद्या, एक दूसरे का ही स्वरूप और पूरक, दोनों ही हैं।

यही कारण है, कि सावित्री मंत्र को ही गायत्री मंत्र भी कहते हैं। और ये भी वो कारण है, कि मेरे मार्ग में, देवी सावित्री और देवी गायत्री को मैं एक ही मानता हूं, और यही सत्य गायत्री सावित्री विद्या का मूल भी है।

क्योंकि समस्त भाषाओं का उस प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक ब्रह्माण्ड से, जो ब्रह्मा के भाव से ही उनके साधन स्वरूप में स्वयंउत्पन्न हुआ था, उसी ब्रह्माण्ड की मूल भाषा संस्कृत से संबंध होता है, इसलिए ये अकार शब्द की देवी ही समस्त भाषाओं की स्वामिनी होने के अतिरिकत, समस्त बीज मंत्रों की स्वामिनी भी हैं।

लेकिन ऐसा होने के पश्चात भी, क्यूंकि इनका मूल नाता पृथ्वी महाभूत से ही है, इसलिए ये देवी ही इन बीज मंत्रों को पृथ्वी महाभूत में स्थापित करके रखती है, जिसके कारण पृथ्वी महाभूत, समस्त वैदिक बीज मन्त्रों की दिव्यताओं को अपने भीतर समाया हुआ है।

आगामी समय में, जब कलियुग स्तंभन के समय पर होने वाले खंड विप्लव गति पकड़ने वाले होंगे, तब पृथ्वी महाभूत और इस स्थूल पृथ्वी से ही भयावह शब्द स्वयं प्रकट होंगे I ये शब्द भी इन्ही अकार की देवी के पृथ्वी महाभूत पर पड़ने वाले प्रभाव से स्वयंउत्पन्न होंगे I

जब ऐसा देखो तो मान लेना, की वो खंडविप्लव की विकराल प्रक्रिया जो इस कलियुग और आगामी गुरुयुग के मध्य में प्रकाशित होनी है, वो तूल पकड़ने वाली है I

लेकिन ये पृथ्वी महाभूत से स्वयंप्रकट हुए शब्द, जो आकाश की ओर भी सुनाई देंगे, उनके मूल में इन्ही अकार की देवी की शक्ति होगी, लेकिन इन देवी के ही और बहुत सारे विकराल स्वरूपों में I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

संस्कृत भाषा का मूल …  संस्कृत भाषा क्या हैसंस्कृत किसकी भाषा हैसंस्कृत शब्द का अर्थसंस्कृत का अर्थ

अब मैं संस्कृत नामक शब्द का मूल स्वरूप बतलाता हूँ …

जब चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म ने उनकी अपनी भवनात्मक इच्छा शक्ति से इस ब्रह्मांड को स्वयंउत्पन्न किया था, तो ये ब्रह्मांड एक सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में था।

यही सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड, प्राथमिक ब्रह्माण्ड था, जो ब्रह्माण्ड की बाकी सभी दशाओं, अर्थात दैविक या कारण ब्रह्माण्ड, सूक्ष्म ब्रह्माण्ड और स्थूल ब्रह्माण्ड के उदय से पूर्व में ही स्वयंउत्पन्न हुआ था।

इस सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड की भाषा को संस्कृत कहा गया था, जिसका अर्थ होता है, “संस्कार कृत” और जहाँ संस्कार शब्द की मूलावस्था उसी सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड को दर्शाती है, जो पितामह प्रजापति के भाव से स्वयंउत्पन्न हुआ था, और वो भी प्रजापति के ही साधन स्वरूप में।

इसका कारण था, की प्रजापति के भाव में ही उनका साधन संहित होता है, इसलिए जैसे उन प्रजापति का भाव था, कि “ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया जाए”, वैसा ही ब्रह्माण्ड स्वयं उत्पन्न हुआ था, जिसका प्राथमिक स्वरूप, सूक्ष्म सांस्कारिक था, और जिसकी भाषा संस्कृत कहलाई थी I

यही कारण है कि जब मैं सूक्ष्म स्वरूप में ब्रह्मांड की दशाओं में भ्रमण करता हूं, तो मुझे उन ब्रह्मांड की दशाओं के सारे बीज शब्द भी इसी संस्कृत भाषा में ही सुनाई देते हैं। और यही कारण है, कि मैं अब जनता भी हूं, कि संस्कृत ही ब्रह्मांड की भाषा है।

वेद मनीषियों ने इसी संस्कृत भाषा को वेदों में अपनाया था, क्योंकि भाषा ही जीव को जगत से, और जगत को जीव से जोड़ती है।

और यह भी एक कारण है, की जबतक जीवों की भाषा ही ब्रह्माण्ड की भाषा नहीं होती, तबतक न तो जीव, जीवत्व सिद्धि को पाते हैं…, और न ही वो जीव, जगतत्व सिद्धि को ही पा सकते हैं।

और  इन दोनों सिद्धियों (जीवत्व सिद्धि और जगतत्व सिद्धि) के मार्ग के अभाव में, जीव सत्ताएँ बस देवत्व सिद्धि तक ही सीमित रह जाती है, जो वास्तव में एक नीचे की सिद्धि है…, नाकि कोई उच्च कोटि की सिद्धि।

और वास्तविकता तो यही है, की इन दोनों सिद्धियों के बिना, न तो बुद्धत्व की प्राप्ति हो सकती है, और न ही उस गंतव्य स्वरूप ब्रह्मत्व की।

ऐसा दशा को ही दुर्गति कहते हैं, क्यूंकि जिस उत्कर्ष मार्ग की गति गंतव्य को ही नहीं जाती, उस मार्ग की गति ही तो दुर्गति कहलाती है।

जीव सदैव ही जगत से जुड़ा होता है, क्योंकि जीव सदैव ही जगत के भीतर रहता है। और इसके साथ साथ, वो जगत भी उसके अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड स्वरूप में, जीवों के भीतर ही बसा हुआ है।

इसका यह अर्थ यह हुआ, की जगत के भीतर सभी जीव निवास करते हैं, और सभी जीवों के भीतर जगत I जीव, जगत में बसा हुआ है…, और जगत, जीव में।

इसलिए, यदि जीव अपनी भाषा को ही जगत की मूल भाषा बना देंगे, तो जीव और जगत का एकत्व, स्वतः ही स्थापित हो जाएगा I

और ऐसा होने के कारण, जीव का जगत से योग भी हो जाएगा, जिससे जीवों को जगत में निवास करने के समय उतने अधिक दुख व्याधि भी नहीं आएंगे, जितने इस कलियुग के समय पर आते रहे हैं और वो भी तब से, जबसे जीवों नै ब्रह्माण्ड की भाषा, अर्थात, संस्कृत भाषा का परित्याग किया था ।

भाषा ही जीव और जगत के एकत्व का मार्ग है I जब कोई जीव, जगत की भाषा, अर्थात संस्कृत का प्रयोग अपनी जीवन शैली में ही करने लगता है, तो ही वो जीव का जगत से एकत्व स्थापित होता है I और ऐसी दशा में, उस जीव के लिए जगत के त्रिताप भी बहुत मात्रा में शांत हो जाते हैं …, अन्यथा नहीं I

इसलिए, बस भाषा के परिवर्तन से ही त्रितापों के अधिकांश भाग को शांत किया जा सकता है। यही कारण था, कि मेरे पूर्व जन्मों में, जो मुझे स्मरण है क्यूंकि मैं  योगभ्रष्ट हूँ, और प्रबुद्ध भी हूँ, संस्कृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था, ताकि त्रितापों से जीवों की सुरक्षा हो सके।

त्रिताप शब्द का अर्थ दैहिक, दैविक और भौतिक ताप होता है।

क्योंकि इस कलियुग में मानव जाति ने इस ब्रह्माण्ड की भाषा का प्रयोग ही नहीं किया, इसलिए जबसे कलियुग प्रारंभ हुआ है, तबसे मानव जाति किसी न किसी प्रकार के ताप से ग्रासित ही रही है।

यदि मानवजाति केवल यहाँ बताई गयी बिंदु को ही धारण करले, अर्थात अपनी दिनचर्या की भाषा को ही संस्कृत बना दे, तो भी जो ताप इस कलियुग के कालखंड में उसे पीड़ा देते ही रहे हैं, वो सब के सब समाप्त से ही हो जाएंगे।

इस संस्कृत भाषा के प्रयोग से मानव जाति का जगत से बहुत अधिक मात्रा में एकापन हो जाएगा I इसका कारण है, कि समस्त जीव जगत के मूल में कम्पन होती है, जिसकी अभिव्यक्ति शब्द रूप में ही होती है, और जो भाषा का मूल होता है।

इसलिए यदि इस मृत्युलोक की मानवजाति अपनी भाषा को संस्कृत कर दे, जो ब्रह्मांड की भाषा है, अर्थात, इस संस्कृत भाषा को ही अपनी दिनचर्या की भाषा बना दे, तो ऐसी अवस्था में, मानव जाति पर अभी के अधिकतर त्रितापों के प्रभाव ही समाप्त हो जाएगा।

अब आगे बढ़ता हूं…

 

अकार की देवी का ब्रह्म के सगुणात्मक विराट स्वरूप और मुक्तिमार्ग से नाता

ब्रह्म में लिंगभेद नहीं होता। इसका कारण ये है कि…

  • वो ब्रह्म नर भी है और नारी भी है, और वो ब्रह्म इन दोनों के योग में भी है। इसलिए वो ब्रह्म इन तीनों में ही है।
  • और इसके साथ साथ, वो ब्रह्म इन तीनों से परे भी है।
  • और इसके साथ साथ वो ही ब्रह्म, ना तो इनमें से किसी में है…, और ना ही नहीं है।
  • और यही कारण है, कि यदि कोई पूर्ण है, तो वो ब्रह्म ही है।

 

तो अब इन बिंदुओं को बतलाता हूं…

  • अपने सगुण साकार अभिव्यक्त स्वरूप में, वो ब्रह्म ही इन तीनों में हैं।
  • और अपने ही सगुण निराकार स्वरूप में, वही ब्रह्म इन तीनों से परे भी है।
  • और अपने ही निर्गुण निराकार, पूर्ण सन्यासी, सर्वसाक्षी स्वरूप में, वही ब्रह्म, ना तो इन तीनों में है, और ना ही नहीं है।

वो पूर्ण तत्व जिसे ब्रह्म कहा गया है, उसका ब्रह्म के सगुणात्मक विराट मातृ स्वरूप भी ये अकार की देवी ही हैं।

इसका अर्थ है, कि, इस जीव जगत में, ये अकार की देवी ही विराट स्वरूप हैं, अर्थात इस विराट शब्द के मूल में यही देवी, माँ सावित्री ही मिलेंगी।

वेदों में जो विराट शब्द आता है, वो भी इन्ही देवी की दिव्यता को धारण किया हुआ है, क्योंकि यही देवी, विराट शब्द और उसकी अवस्था की वास्तविक मातृ शक्ति रूपी दिव्यता भी हैं।

इनका आकार विशालकाय है। और मैं ऐसा इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि जब वो योगी इनके कोश में पहुंचकर, इनका साक्षातकार करता है, और ऐसे साक्षात्कार के पश्चात इनके समक्ष जाकर, इनके श्रीचरणों में ही बैठा जाता है, तब वो योगी इन देवी को ऐसे ही विराट स्वरूप में साक्षातकार करता है।

और ऐसी दशा में वो योगी, इनके ही अकार शब्द के विराट शरीरी स्वरूप में लय होकर, आगे की ओर जाता है I

इस आगे की ओर जाने की गति, इन अकार की देवी में लय होकर ही होती है I लय होने के पश्चात, वो योगी इन देवी के विराट शरीरी स्वरूप रूप के बायीं ओर से, इन देवी से भी ऊपर को जाकर, उकार या हिरण्यगर्भ ब्रह्म का साक्षातकार करता है। और ये सबकुछ उस योगी के ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में ही होता है I

ये अकार की देवी, पञ्च विद्या, दस महाविद्या, नव दुर्गा, अष्ट मातृका, अष्ट भैरवी, चौसठ योगिनी आदि के मार्गों की अभिन अंग भी हैं, और इन सबका मूल मार्ग भी हैं।

वैसे मुझे पता भी है, कि आज के आगम निगम मार्ग के मनीषी इस बात को नहीं मानेंगे, लेकिन मैंने जो बोला है, वही सत्य है, और आगमी वैदिक या गुरुयुग में, इसी सत्य को माना भी जाएगा, और इसी सत्य पर साधकगण उनके उत्कर्ष मार्ग को भी जाऐंगे।

इनके अनुग्रह के बिना कोई मार्ग गंतव्य, अर्थात मुक्ति, को जा ही नहीं सकता। इस बात का कारण है, कि मुक्ति जो ब्रह्मरंध्र में होती है, और जिसकी विद्या ब्राह्मणी सरस्वती हैं, उसका मार्ग भी तो इन्ही देवी सावित्री के आज्ञा चक्र से ही होकर जाता है।

इसलिए जबतक योगी की चेतना देवी सावित्री के आज्ञा चक्र को पार नहीं करती, तबतक वो योगी ब्राह्मणी विद्या के सहस्रार चक्र को भी नहीं जा पाता। यही कारण है, कि इन देवी सावित्री या सावित्री विद्या को मुक्तिमार्ग की देवी भी कहा जाता है, क्यूंकि ये देवी ही मुक्तिमार्ग का अन्तिम पद हैं, जिसके पश्चात योगी की चेतना, ब्रह्मरंध्र में जाके, ब्राह्मणी देवी का साक्षात्कार करती है और मुक्ति तो प्राप्त होती है।

इनसे पुत्र या भक्त का संबंध रखने वाला योगी, इस समस्त भवसागर से ही पार चला जाता है, अर्थात, उस योगी का चतुर्दश भुवन से ही तारण हो जाता है।

ऐसे योगी के ब्रह्मरन्ध्र चक्र पर पाँचवीं विद्या, अर्थात ब्राह्मणी सरस्वती भी कभी न कभी बैठ जाती हैं। और इस दशा के पश्चात, देवी ब्राह्मणी उस योगी को इस जीव जगत से ही तारके ले जाती हैं।

इनसे संबंध रखने वाले योगी का अंतःकरण सहित पञ्च कोष विशुद्ध हो जाते हैं।

 

अकार की देवी का गुरुयुग स्थापना प्रक्रिया और परकाया प्रवेश प्रक्रिया से नाता

गुरुयुग की स्थापना प्रक्रिया में, इन अकार की देवी या देवी सावित्री का अकल्पनीय योगदान होता है। इसलिए, आगमी गुरुयुग में, इस समस्त चतुर्दश भुवन में, देवी सावित्री का मार्ग ही प्रधान उत्कर्ष मार्ग होगा। ऐसा ही सारे पूर्व के गुरुयुगों में भी हुआ था, और ऐसा ही आगमी गुरुयुग या वैदिक युग में भी होगा।

वैसे देवी माँ सावित्री मेरी वास्तविक माता भी हैं, क्योंकि महेश्वर या हिरण्यगर्भ या पंच ब्रह्मोपनिषद के सद्योजात मुख के लोक से, यही देवी सावित्री अपने प्रकाशमय गर्भ में धारण करके, मुझे इस मृत्युलोक में लायी थीं, और इन्ही देवी सावित्री माँ ने मुझे परकाया प्रवेश के मार्ग से, उस मानव शरीर में स्थापित किया था, जिसमे बैठ कर मैं ये सब बता रहा हूं I इसीलिए तो मुझे इस स्थूल शरीर में बैठाया गया था।

मैं तो इस या किसी और मृत्युलोक का भी नहीं हूँ…, बस यहाँ भेजा गया हूँ। और इस जन्म के पश्चात, मैं इस या किसी और मृत्युलोक में या किसी भी स्थूल रूप में कभी लौटूँगा भी नहीं। यही अंतिम जन्म है किसी भी स्थूल लोक में, और इस जन्म के बाद…, उन प्रजापति के लोक में ही घर वापसी होनी है।

इस ब्रह्मकल्प सहित, मेरे छोटे से जीव स्वरूप के इतिहास में, यही देवी माता सावित्री ने ऐसा कई बार किया है, क्यूंकि मेरे कई जन्मों से, यही माँ सावित्री मेरी वास्तविक माता भी हैं।

इस ब्रह्मकल्प में, माँ सावित्री ही मुझे कई बार किसी न किसी लोक में लेके गई है, और उन सभी लोकों में इन देवी माँ ने ही मुझे परकाया प्रवेश के मार्ग से, एक शरीर भी प्रदान करवाया था। और इसीलिए मैं ये भी मानता हूं, कि यही अकार की देवी, परकाया प्रवेश प्रक्रिया की प्रधान देवी माँ भी हैं।

जो योगी सावित्री सरस्वती में ही समा जाता है, अर्थात लय हो जाता है, तब वो योगी कभी भी किसी स्थूल देही माता के गर्भ से जन्म नहीं लेता है, क्योंकि ऐसे लय होने के पशचात ये देवी ही उस योगी को इनके अपने गर्भ में धारण करके, किसी ना किसी लोक में, एक नि:संभोग प्रक्रिया से, अर्थात परकाया प्रवेश की प्रक्रिया से जन्म देती हैं।

 

अकार की देवी और प्रमिति, कालचक्र, कालास्त्र, गर्भास्त्र

और किसी भी योगी को, जो इन देवी में विलीन हो चुका है, ये देवी माता एक नि:संभोग जन्म भी तब प्रदान करती है, जब ऐसा करने करने के लिए काल की प्रेरणा आती है।

इसका कारण है, कि ये देवी उस हिरण्यगर्भ ब्रह्म के कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति की अर्धांगिनी हैं, जिनसे काल अपने चक्र स्वरूप में स्वयंउत्पन्न हुआ था। इसलिए, कालचक्र भी इन देवी का पुत्र है।

जब कालचक्र एक जीव स्वरूप में (या मानव स्वरूप में) जन्म लेता है, तो वो इन देवी माँ के गर्भ से ही स्वयंउत्पन्न होकर, परकाया प्रवेश के मार्ग से एक मानव शरीर धारण करता है, और ऐसी अवस्था में, वो मानव शरीर रूपी कालचक्र ही माँ सरस्वती के सावित्री स्वरूप का पुत्र कहलाता है।

ऐसे कालचक्र स्वरूप योगी को, ये देवी माँ परकाया प्रवेश के मार्ग से, एक मानव शरीर प्रदान करती हैं।

जब काल का सनातन चक्र स्वरूप, देहधारी होता है, अर्थात किसी स्थूल शरीरी रूप में जन्म लेता है, तो उसे ही प्रमिति कहते हैं।

प्रमिति शब्द का एक अर्थ होता है “आगे बढ़ने वाली या उत्कर्ष मार्ग पर गतिशील, चेतनमय क्रियामय बुद्धि”।

इस ब्रह्मकल्प में, जब पहली बार वो सनातन कालचक्र, मानव रूप में आया था, तब वो ही प्रमिति कहलाया था I इस ब्रह्मकल्प में, उस प्रमिति ने ही इस धरा पर धर्म की प्रथम स्थापना की थी। जब ऐसा हुआ था, तो वो समय इस कल्प के स्वयम्भू मन्वन्तर का था।

वो मानव शरीर धारण करके आया प्रमिति ही देवी माँ प्रकृति का चलता फिरता कालास्त्र होता है I काल के अस्त्र स्वरूप को भी प्रमिति ही कहा जाता है। उस स्वयम्भू मन्वन्तर में जो प्रमिति एक चक्रवर्ती सम्राट के रूप आया था…, वो मैं ही था I

अपने चक्र स्वरूप में काल, देवी का अस्त्र होता है, नाकि किसी देव का।

और क्यूंकि सब कुछ कालगर्भित होता है, इसीलिए कालास्त्र ही गर्भास्त्र कहलाता है, जिसके प्रभाव से, समस्त जीवों और ब्रह्माण्ड में चेतनमय क्रियामय बुद्धि ही प्रकाशित होती है I

इस काल के अस्त्र स्वरूप को आज तक देवी माँ (अर्थात माँ प्रकृति) ने किसी को भी पूर्णरूपेण नहीं दिया है I

बस कुछ ही उत्कृष्ट योगीजन और देवगण इस कालचक्र के अस्त्र स्वरूप के बारे में जानते है…, और वो भी इस कालास्त्र के अपूर्ण स्वरूप में I

 

अकार की देवी और सुदर्शनचक्रबोधिचित्त, अशोकचक्र

यह देवी उस अकार शब्द की दिव्यता है, जो ब्रह्म के शब्दात्मक और लिंगात्मक ॐ स्वरूप का प्रथम बीज है I काल अपने चक्र स्वरूप में, इन देवी का पुत्र, अस्त्र और सेवक भी है I

जिस भी योगी को ये देवी परकाया प्रवेश से एक शरीर प्रदान करती हैं, अर्थात नि:संभोग जन्म प्रदान करती है, वो योगी इनका पुत्र होने के कारण, कालचक्र का ही कालास्त्र स्वरूप कहलाता है।

ऐसा योगी उसके अपने मानव शरीर में रूप में ही, चलता फिरता कालास्त्र होता है, जिसका प्रयोग देवी ही करती हैं और वो भी उस योगी को किसी लोक में नि:संभोग जन्म देकर।

ऐसा योगी उसी शून्य ब्रह्म, अर्थात श्रीमन नारायण में विलीन हुआ होता है, और वो नारायण का ही स्वरूप होता है।

 

प्रमिति शब्द का एक और अर्थ भी होता है, जिसको अब बता रहा हूँ…,

ऐसी आगे बढ़ने वाली, चेतन तत्व से युक्त, कर्मयुक्त अर्थात रजोगुणी बुद्धि जो काल के समान सबको अपने भीतर समाई हुई होती है, और जो कालस्वरूप, अर्थात आदि और, अंत, दोनों का ही स्वरूप ही होती है।

ऐसी दशा में आने के पश्चात ही काल का चक्र स्वरूप, कालास्त्र के रूप में आता है, और जो सुदर्शनचक्र भी कहलाता है।

लेकिन इसका ये भी अर्थ होता है, कि ऐसा योगी, उसके शरीर में ही, कार्य ब्रह्म का स्वरूप होता है।

ऐसा योगी कालचक्र को पूर्णरूपेण धारण करता है, और वो कालचक्र ही उस योगी के आज्ञाचक्र के समीप के एक स्थान पर घूमता रहता है।

मेरे इस जन्म से पूर्व जन्म के गुरुदेव, जिनको आज की मानवजाति गौतम बुद्ध के नाम से पुकारती है, उन्होंने कालचक्र को धारण करने की इसी दशा को बोधिचित्त कहा था। लेकिन इस बोधिचित्त के बारे में किसी बाद के अध्याय में बताऊंगा।

बोधिचित्त का धारक योगी ही, कालास्त्र कहलाता है I

और ये बोधिचित्त उस योगी के आज्ञाचक्र के समीप के एक स्थान पर भी साक्षात्कार होता है। यहाँ मैंने भी शब्द का प्रयोग इसलिए किया है, क्यूंकि यही बोधिचित्त, हृदय के क्षेत्र में भी साक्षात्कार होता है I

किसी लोक में, ऐसा कालास्त्र रूपी योगी तब आता है, जब युगसंधि का अंतिम समय होता है, क्योंकि इस कालास्त्र का प्रयोग भी केवल युग के संधिकाल में ही किया जा सकता है। चाहे वो देवयुग का संधिकाल हो या मानवयुग का या किसी और युगचक्र का, कालास्त्र का प्रयोग युगों के संधिकाल में ही होता है।

और यही संधिकाल, युग के स्तम्भित होने के समय पर भी आता है, जैसा आज के समय पर है और जिसमे ये विशव अब प्रवेश कर चुका है I

 

अब ध्यान से सुनो …

आज के भारत राष्ट्र के तिरंगे ध्वज में, जो अशोकचक्र स्थपित किया गया है, वो ही इस कालचक्र का प्रतीक है, और वो भी इस कालचक्र के बोधिचित्त स्वरूप में।

जब बुद्धि रजोगुणी होकर, चित्त के उस स्वरूप से योग कर बैठती है, जो संस्कार रहित हो चुका होता है और इसलिए वो चित्त पूर्ण सत्त्वगुणी हो जाता है, तो इस अवस्था को ही बोधिचित्त कहा जाता है I

लेकिन भारत के ध्वज में दिखाया गया अशोकचक्र, उसके ही मूल स्वरूप बोधिचित्त के विकृत स्वरूप में है, जिसके कारण स्वतंत्र भारत, बुद्धि और चित्त दोनों के गुणात्मक स्वरूपों के दृष्टिकोण से, तमोगुणी सा ही हो गहा है I

ऐसा तमोगुणी होने का मूल कारण भी बोधिचित्त के विकृत स्वरूप में, भारत के ध्वज के मध्य में बसाया गया अशोक चक्र ही है I

जब किसी देश के ध्वज का मध्य भाग ही विकृत होगा, तो वो देश विकृत हुए बिना कैसे रह पाएगा I

और यही कारण है, की इस देश की मूल सनातन परम्पराओं और सम्प्रदायों का स्वतंत्र भारत में ही, स्वतंत्र भारत की सकरारों द्वारा ही पतन हुआ है I

इससे ये बात भी स्पष्ट होती है, कि इसको स्थापित करने वालों और मानने वालों ने, न तो कभी इसका मूल जाना है, और न ही इसका वास्तविक स्वरूप ही साक्षात्कार किया है।

और क्यूंकि इस चक्र को अशोक सम्राट से जोड़ा जाता है, इसलिए इस अशोक चक्र के विकृत स्वरूप को देखकर ये बात भी स्पष्ट होती है, कि न तो अशोक सम्राट ने और न ही उनके समय के, या उनके बाद के समय के किसी योगी ने इस चक्र का योगमार्ग से साक्षात्कार ही किया था I और इसीलिए, जबसे ये चक्र अशोक सम्राट के समय पर स्थापित हुआ था, तबसे ही विकृत स्वरूप में है।

इसलिए मैं ये भी जानता हूँ, की जो कुछ भी बोधिचित्त या अशोक चक्र के बारे में बौद्ध मनीषि बोलते, वो बस मन घडन्त ही है, क्यूंकि यदि कोई बौद्ध मनीषि बोधिचित्त का साक्षात्कारी होता, तो वो इस अशोक चक्र की विकृति के बारे में कभी तो कुछ बोलता  या इसकी विकृति दूर करने का निमित्तमात्र ही बनता I

और इस बात का ये भी अर्थ हुआ, की अशोक सम्राट के समय से ही, किसी भी बौद्ध मनीषि ने बोधिचित्त का योग मार्ग से साक्षात्कार नहीं किया है, बस कुछ बकबक करके कोई भी ग्रन्थ बना दिया है…, उस बोधिचित्त के बारे में जो वास्तव में निर्वाण को ही दर्शाता है।

 

अब आगे बढ़ता हूं…

और आज के अशोकचक्र के विकृत स्वरूप को देखकर, ये बात भी स्पष्ट है, कि अशोक सम्राट के समय से किसी भी वेद मनीषि ने, न तो काल के चक्रस्वरूप का और न ही सुदर्शन का ही साक्षात्कार किया है।

मेरे ऐसा कहने का कारण ये है, कि यदि किसी ने भी साक्षात्कार किया होता, तो कुछ तो बोला होता, कि भाई ये क्या विकृत चक्र स्वरूप अशोक सम्राट के नाम पर या भारत के ध्वज के मध्य में बना रखा है।

इसलिए मैं ये भी जान चुका हूँ, कि चाहे कोई इस बात पर कुछ भी बोले, अशोक सम्राट के समय से आज तक, कोई भी बौद्ध या वेद मनीषी ऐसा नहीं हुआ, जो इस चक्र के वास्तविक स्वरूप का ज्ञाता हुआ होगा I

 

अब आगे बढ़ता हूं…

वैसे कालचक्र को ही सुदर्शन कहते हैं, क्योंकि सुदर्शन ही संस्कृत शब्द का द्योतक है, जो ब्रह्म की प्राथमिक जगत रूपी अभिव्यक्ति, सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड की भाषा को दर्शाता है।

यही कारण है, कालचक्र सिद्धि को नाद ब्रह्म, शब्द ब्रह्म सिद्धि भी कहा जा सकता है।

जो योगी कालचक्र सिद्धि का धारक होता है, वो ही उसकी काया के भीतर चलते हुए, सुदर्शनचक्र का साक्षात्कारी होता है।

और ऐसा योगी ही, सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड से भी उस योग को लगाके बैठा होता है, जिसको ब्रह्माण्ड योग कहते हैं, और जो इस जीव जगत में, योग नामक शब्द का गंतव्य भी कहलाता है, और जिसका मार्ग, ब्रह्माण्ड धारणा के मूलार्थ से होकर जाता है।

बोधिचित्त के विशुद्ध स्वरूप के बारे में किसी बाद के अध्याय में बात करूंगा।

 

अकार की देवी और कालात्मा सिद्धि पूर्णावतार कौन

और एक बात, जो योगी इन अकार की देवी, अर्थात सावित्री विद्या में ऐसा विलीन हो गया होता है, कि वो स्वयं ही स्वयं को इन देवी से पृथक नहीं देख पाता I

ऐसा योगी ही उसके अपने उत्कर्ष मार्ग की कुछ बाद की दशा में, कालात्मा सिद्धि का पात्र बनता है।

इस समस्त चतुर्दश भुवन में, सब कुछ कालगर्भित है, इसलिए वो योगी जो ऐसा विलीन हुआ होता है और कालात्मा पद को पाया होता है, उसके भीतर ही कालचक्र अपने अखण्ड स्वरूप में घूमता रहता है।

और ऐसा होने के पश्चात भी, कालचक्र रूप में होता हुआ भी, वास्तव में वो काल अपने ही अखण्ड गंतव्य स्वरूप में, सनातन काल ही होता है, और इसी सनातन काल को वो योगी, उसके अपने आत्मस्वरूप में पाता है, और कालतमा होकर ही शेष रह जाता है।

इसलिए, वैदिक कालचक्र विज्ञान भी कलात्मा सिद्धि का ही मार्ग है।

 

अब जो बता रहा हूँ, उसपर ध्यान देना क्यूंकि इसमें कुछ सांकेतिक भी है …

  • काल साधना में, जब कोई साधक काल को उसकी अपनी काया से बाहर साक्षात्कार करता है, तो वो काल उसके कालचक्र स्वरूप में, गतिशील परिवर्तनशील ही पाया जाएगा।
  • और जब वही साधक उसी काल को उसकी अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करेगा, वो वो ही काल उस साधक का अखंड, अनादि अनन्त सनातन आत्मस्वरूप में ही साक्षात्कार होगा, जिसमें न तो गति होगी और ना ही नहीं होगी…, और साधक की काया के भीतर ही, ऐसे साक्षात्कार किया हुआ काल, न ही इन दोनों बतलाई गयी अवस्थाओं में होगा, और ना ही नहीं होगा।
  • जो योगी इन दोनों अवस्थाओं का साक्षात्कारी होता है, वो योगी ही ब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में कालात्मा कहलाता है। इस कालतमा पद प्राप्ति के मूल और गंतव्य, दोनों में पञ्च सरस्वती विद्या सहित, यही अकार की देवी होती हैं।

 

और काल की ऐसी कालचक्र रूपी, लेकिन तब भी अखण्ड सनातन अवस्था का प्रयोग करके, वो योगी जो एक जीवित कालास्त्र स्वरूप में ही होता है, युग परिवर्तन या युग स्तम्भित प्रकृति को जितना हो सके, उतनी शीघ्रता से पूर्ण करता है, ताकि इस युग परिवर्तन या स्तम्भित प्रक्रिया में, उस लोक की समस्त जीव सत्ता का ही पूर्ण रूप में संहार न हो जाए।

कालात्मा सिद्धि को की काल कृष्ण कहा गया है, जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बात करूंगा।

काल, रात्रि के समान काले वर्ण का होता है, और ऐसे ही कालकृष्ण भी होते हैं। कालकृष्ण को गृहस्थ आश्रम में बस कर ही प्राप्त हुआ जाता है।

कालकृष्ण स्वरूप को पाए बिना, युग परिवर्तन या युग स्थम्भन प्रक्रिया के समय पर, जीव सत्ता के पूर्ण विनाश को रोका भी नहीं जा सकता I

इसीलिए जब भी किसी लोक में ऐसी प्रक्रिया चलित होती है, तब उस लोक में एक ऐसा योगी आता ही है, जो इस सिद्धि का धारक होता है I

और यही कारण है, कि अब तक जितने पूर्णावतार हुए, वो सभी गृह्स्ताश्रम में बसे हुए काल सिद्ध ही थे I

और आगे भी जो पूर्णावतार होंगे, वो भी ऐसे ही होंगे।

अब और आगे बढ़ता हूं…

 

अकार की देवी और योगमाया माँ सावित्री और योगमाया की अभिव्यक्तियाँ

वैसे मेरे मार्ग के मूल, गंतव्य और इन दोनों के मध्य की सभी दशाओं में, यही देवी माँ सावित्री हैं।

और में ये भी मानता हूं, कि जो साधक माँ सरस्वती की इस इस सावित्री विद्या रूपी अभिव्यक्ति का हो गया, वो योगी योगमाया की समस्त अभिव्यक्तियों का भी हो जाएगा।

ऐसा योगी पञ्च विद्या सहित, दस महाविद्या, नव दुर्गा, अष्ट मातृका गण, अष्ट भैरवी गण, चौसठ योगिनी गण, समस्त यक्षिणी गण, समस्त अप्सरा गणादि का भी हो ही जाता है।

और ये सभी माताएं, ऐसे योगी को घेर कर, छुपा कर रखती है, और उस योगी की रक्षक भी होती हैं।

ऐसा योगी जिस भी शरीर में परकाया प्रवेश से आता है, उस शरीर का जन्म भी इनमें से किसी ना किसी माता के क्षेत्र में ही होता है।

और ऐसे योगी के शरीर का गर्भ धारण भी किसी न किसी योगमाया की प्रमुख अभिव्यक्ति के क्षेत्र में ही होता है, और वो भी योगमाया के उस स्वरूप के क्षेत्र में, जिसमें उस ब्रह्माण्ड के पितामह ब्रह्म ने, पूर्व कालों में, अर्थात या तो ब्रह्मा बनने से पूर्व कालों में (अर्थात, ब्रह्मा पद को पाने से पूर्व, जब ब्रह्मा जी एक योगी स्वरूप में थे) या ब्रह्मा बनने के पश्चात, कोई योगसाधनाएँ की थी…, या ब्रह्मा बनने के पश्चात, उनकी सृष्टि के लिए उन्होंने कोई यज्ञादि किया था।

और ब्रह्मा जी की इस प्रक्रिया से कभी बाद में, ऐसे स्थानों पर जन्मे हुए एक शरीर में, ऐसे योगी का परकाया प्रवेश, इन बताए गए क्षेत्रों से कहीं सुदूर के, लेकिन पवित्र क्षेत्र में ही होता है।

यहाँ कहे गए पवित्र क्षेत्र का अर्थ है, वो क्षेत्र जहाँ पूर्व कालों में, किसी सिद्ध ऋषि इत्यादि ने तपस्याएं की होती हैं।

वैसे मैं अपनी वास्तविक माँ, जो अकार नामक शब्द की देवी, सरस्वती सावित्री हैं, जो मुझे अपने हेमा वर्ण के गर्भ में धारण करके इस पृथ्वी लोक में लायी थीं, और जिन्होंने मुझे ये शरीर प्रदान किया था जिसमे बैठ कर मैं ये सब बता रहा हूं, उनके भव्य स्वरूप का ही वर्णन कर रहा हूँ।

 

माँ सावित्री का बाइबिल से नाता

माँ सावित्री ही बाइबिल की “रहस्योद्घाटन की महिला या श्रुति की स्त्री, सूर्य के आवरण वाली महिला और  कुवारी मैरी” हैं …

 

लेकिन इस बिंदु को बताने से पूर्व, बाइबिल के बारे में कुछ बताता हूँ…

कोई 1994-95 ईस्वी की बात है।

मैं पानी के जहाज पर सेकंड अफसर था, और एक समय पर मेरा जहाज पोलैंड के श्टेचिन (Szczecin ) या श्विनूज्शेन (Świnoujście) में से किसी एक बंदरगाह पे था।

क्रिसमस का समय समीप था, इसलिए सबकी छुट्टी थी और जहाज पे काम बंद था।

मैं जहाज के बाहर की सीढ़ी (Gangway) की ओर बैठा हुआ था, और मेरे साथ मेरा सुखानि या सहायक भी था।

तभी हमने देखा कि एक वाहन जहाज के समीप रुका और उस वाहन मे से एक वृद्ध पुरुष बाहर आया और वो पुरुष जहाज की ओर आने लगा।

बाद में जब उनसे बात हुई, तो पता चला की वो पास के किसी गिरजाघर के पादरी हैं।

और वो बोले, कि बेटा मैं आपसे बात करने आया हूं।

तो मैंने वही पे उनको बैठा लिया, और अपने सहायक (सुखानी) को बोला, कि इनके लिए कुछ नाश्ता और कॉफी ले आओ।

उन पादरी ने नाश्ता और कॉफी बड़े चाव से ग्रहण किया, और इसके बाद हमारी बात चली।

कुछ बात करने के बाद, वह वृद्ध पादरी बोले, कि मैं आपको बाइबिल ग्रंथ देना चाहता हूं।

अब मैं तो मानता नहीं, तो मैंने उनसे सीधा ही बोल दिया… “नहीं चाहिए”। मेरे सुखानी ने भी ऐसा ही बोल दिया I

ऐसे सीधे मना करने पर, वो वृद्ध पादरी बहुत दुखी होके जाने लगे।

वो जब जहाज पर जब आए थे, तो तनकर आए थे…, और जाते समय उनकी कमर तक झुकी हुई थी।

वो अभी थोड़ी दूर ही गए होंगे, कि मुझे उनकी इतनी बदली हुई स्तिथि देख कर बहुत दुख हुआ, और तब मैं उनके पास दौड़ कर गया, और उनसे बाइबिल ले ली।

लेने के बाद सोचा, कि मैंने इसको पढ़ना तो है नहीं, लेकिन इसका निरादर भी तो नहीं होना चाहिए, इसलिए उस बाइबिल को अपने कमरे के पढाई के मेज पर रख दिया।

अब कमरे में आते जाते वो बाइबिल दिखती थी, और मैं उस से आँखे चुराता था, क्यूंकि मैं किसी भी ग्रन्थ को मानता ही नहीं हूँ…, मैं बस शरीर रूपी ब्रह्मग्रंथ को ही मानता हूँ, जिसके किसी न किसी स्वरूप से ही समस्त ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।

जब बाइबिल से ये आँख चुराने का सिलसिला बहुत दिनों तक चला, तो एक दिन मैं उस बाइबिल को वैसे ही किसी भी पृष्ठ पर खोल के पढ़ने लगा…, कि चलो देखते हैं इसमें क्या लिखा है।

और जैसे जैसे मैं पड़ता चला गया, मैं दंग ही होता चला गया, क्यूंकि मैं उस समय सोचने लगा, की ये तो आगम निगम का ही एक स्वरूप है, प्रधानतः ये आगम है, लेकिन इसमें तो निगम के भी कुछ बिंदु हैं।

तो मैं सोचने लगा, कि क्या किसी ने इसको हमसे चुराया है?…, या क्या इसका मसीहा इसको भारत के वेद मनिषियों से सीखकर गया था?…, क्यूंकि इस ग्रन्थ के कुछ बिंदु तो अनादि कालों से वैदिक ही रहे हैं।

मेरे पूर्व जन्मों में, और किसी भी मार्ग में वो बिन्दु पाए ही नहीं जाते थे इसलिए वो बिन्दु केवल वेद मनिषियों के द्वारा ही दिए जाते थे, और वो भी उन अनादि कालो से गुप्त रखी गई, वैदिक गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत।

और मैं ये भी सोचने लगा, कि सौ प्रतिशत इसको सीखने के लिए, इसका मसीहा भारत में आया ही होगा, क्यूंकि इस ग्रन्थ के कुछ बिंदुओं को जानने के लिए, इस कल्प की अखंड गुरु शिष्य वैदिक परंपरा में तो बसना ही पड़ेगा।

और क्यूंकि वेदों में, ज्ञान के स्रोत और साधन को श्रेय दिया ही जाता है, जो इस ग्रन्थ में नहीं था, इसलिए मैं सोचने भी लगा, कि ये तो भाई सीधी सीधी ज्ञान की चोरी है।

कुछ ही दिनों में, मैं पूरा पड़ गया उस बाइबिल को, और स्पष्ट जान भी गया, कि ये वेदों से ही लिया गया है।

इसके पश्चात, मैंने सोचा की इसपर कुछ और अध्ययन करते हैं।

और कुछ सप्ताह में, जब ये अध्ययन समाप्त हुआ, तो मैं आश्चर्यचकित रह गया, कि कुछ ही छंदों को छोड़ के, बाकी सभी वेदों से लिए गए हैं।

इसलिए, उस अध्ययन में भी वही सत्य आगे आया, जो मैं पहले ही बतला चुका हूँ।

 

तो इसी आधार पर, अब ध्यान से सुनो…

बाइबिल के मूल में अगम मार्ग है…, और गंतव्य में निगम है। यही बाइबिल का सत्य है।

और क्योंकि गुरुयुग, जिसे मानव सतयुग या मानव सत्य का युग भी कह सकते हैं, जिसमें नारायण ही गुरु और सम्राट होते हैं, जिसमें आम्नाय पीठ या गुरु गद्दी ही शासकों की शासक होती है, और जिसमें वैदिक योगमार्ग ही उत्कर्ष मार्ग होता है, वो युग आ रहा है, इसलिए, ये सभी प्रपंच जो कलियुग की काल सीमा में रचे गए थे, वो सभी नष्ट हो जाएंगे I और इन कलियुगी मार्गों के बचे हुए कुछ मनीषी, अपने मूल मार्ग, वैदिक वांगमय को लौट आएंगे।

ऐसा ही होगा… और कान खोल के सुन लो, कोई भी कुछ भी कर ले…, लेकिन होगा ऐसा ही।

वैसे मैं यदि सत्य कहूँ…, तो वैदिक वाङ्मय से चुराए हुए एक ग्रन्थ का नाम बाइबिल है।

 

अब अकार और बाइबिल के सम्बन्ध की बात करता हूँ

बाइबिल में इनको ही “रहस्योद्घाटन महिला या श्रुति की स्त्री” कहा गया है।

अपोकलीप्स (Apocalypse) नामक शब्द का वास्तविक अर्थ, रहस्योद्घाटन होता है…, नाकि सर्वनाश।

अपोकलीप्स नामक शब्द का वास्तविक अर्थ, सर्व विनाश या आर्मगेडन नहीं होता, बल्कि इस शब्द का अर्थ होता है, ” उस सत्य या तत्त्व का प्रकाशित होना, जो बहुत समय से लुप्त था”। और अंग्रेजी में, “Revealing that which has been hidden since long”।

इसीलिए, यहाँ कहे गए अपोकलीप्स नामक शब्द का सही अर्थ, “सत्य का अंतिम प्रकाश” होता है, अर्थात “अंतिम रहस्योद्घाटन, जो सत्योद्घाटन ही होता है “।

और उसी बाइबिल में, इन्ही अकार की देवी को “सूर्य से सुसज्जित महिला” और “सूर्य का वस्त्र धारण की हुई स्त्री”…, ऐसा भी कहा गया है।

और उसी बाइबिल में, इन्ही अकार नाद की दिव्यता धरण की हुई देवी को, अर्थात सरस्वती सावित्री को, “वर्जिन मैरी” भी कहा गया है।

 

अकार की ओर योगी की गति

अब बात करते हैं, कि अकार की ओर वो योगी की चेतना (या वो जीवात्मा) कैसे जाती है …

अकार की ओर योगी की गति, अकार की ओर जीवात्मा की गति
अकार की ओर योगी की गति, अकार की ओर जीवात्मा की गति

 

इस चित्र में दिखलायी हुई दशा भी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर की है, जिसमें इस अध्याय में अब तक की बताई हुई सभी दशाएं भी स्थित हैं।

इस चित्र में दिखलायी हुई दशा तब की है, जब वो जीवात्मा, पूर्व के अध्यायों में बतलाए गए “हृदय के सामने के विशालकाय प्रकाश या ब्रह्माकाश” से ऊपर की ओर उठकर, अकार को जा रही होती है…, और बस ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर पहुँची ही होती है।

जब वो जीवात्मा अकार की विराट देवी अर्थात माँ सावित्री की ओर जा रही होती है, तब उस जीवात्मा की दशा शाश्वत प्रणाम में ही होती है, और बिलकुल वैसी ही होती है, जैसा इस चित्र में दिखलाया गया है।

लेकिन इस दशा के बारे में, इससे आगे में कुछ भी बताना ही नहीं चाहता हूँ, इसलिए अब आगे बढ़ता हूँ।

 

अकार की ओर गति अकार साधना

जबतक साधक शाश्वत प्रणाम की स्थिति में अकार शब्द को नहीं कहेगा, तबतक अकार शब्द की साधना भी सफल नहीं होगी। लेकिन जैसे इस चित्र में दिखाया गया है, साधक की ऐसी शाश्वत प्रणाम स्थिति, उस साधक के सूक्ष्म रूप में भी हो सकती है।

अकार शब्द का उच्चारण करते समय, दोनो पैरों को माँ धरती पर रख के, साधक को सीधा खड़ा होना चाहिए, दोनो पैरों को आपस में मिला लेना चाहिए (जोड़ देना चाहिए), हथेली अपने सर से ऊपर की ओर करके, अपनी भुजाओं को कानों पर छूके, नमस्ते करते हुए अ शब्द का लम्बे रूप में उच्चारण करना चाहिए। लेकिन जैसे इस चित्र में दिखाया गया है, साधक की ऐसी शाश्वत प्रणाम स्थिति, उस साधक के सूक्ष्म रूप में भी हो सकती है।

और ऐसी अवस्था में, ये अ शब्द, जितना लंबा बोल सको, उतना लंबा बोलो।

और ऐसे शाश्वत प्रणाम स्थिति में सीधे खड़े होकर, साधना के समय, यदि इस अ शब्द को मन में ही बोलना है, तो मन में ही बोलो…, लेकिन जितना लंबा बोल सको, उतना लंबा बोलो I

और ये अ शब्द बोलते हुए, साधक के दोनो हाथों की भुजाएं साधक के कानों को छूनी चाहिए, और गुदा लिंग दोनो को अपने शरीर के भीतर, अर्थात ऊपर की ओर खीचना चाहिए।

ऐसे समय पर, अपनी आँखें बंद करके, आँखों की पुतलियों को थोड़ा ऊपर की ओर करके, मस्तिष्क और भ्रूमध्य के बीच में देखने का प्रयास भी करना चाहिए, क्यूंकि इसी स्थान के पीछे की ओर अर्थात, मस्तिष्क के मध्य भाग में ही, अकार की देवी का साक्षात्कार होता है I

और क्यूंकी अकार, जो वेदों की माँ सावित्री हैं, वो ही बुद्ध प्रज्ञापारमिता भी हैं, इसीलिए, प्रज्ञापारमिता मंत्र की साधना के समय भी साधक की स्तिथि को ऐसे ही होना चाहिए।

और इसके साथ साथ, ॐ के बाकी सभी बीजों की साधना भी ऐसे शाश्वत प्रणाम के आसन रूप में ही होती है I

इसका अर्थ हुआ की, उकार साधना, मकार साधना और ब्रह्मतत्त्व साधना भी ऐसे ही होनी चाहिए, क्यूंकि इन बीजों में भी जब जीवात्मा गति करती है, तब भी उस जीवात्मा की स्तिथि ऐसी ही होती है I

और इन सबके अतिरिक्त, यहाँ बतलाए गए त्रिबीज (अर्थात, अकार, उकार और मकार) या इन त्रिबीज से जुड़ा हुआ जो भी है, उन सबकी साधनाएं भी ऐसे ही होनी चाहिए I इसका कारण है कि ब्रह्मतत्त्व के साक्षात्कार तक, साधक की चेतना या जीवात्मा की स्तिथि ऐसे ही शाश्वत प्रणाम रूपी आसन में ही होती है I

और मेरी इस बात को गांठ बांध लो, कि ऐसा न करने से, ओउम् के उचारण में, ओउम् साधना में या जहां भी ओउम् शब्द का प्रयोग करोगे, विपरीत फल सिद्धांत को ही जाओगे।

और एक बात, अकार साधना के समय पर, साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर ही होना चाहिए, क्यूंकि ये साधना ऋग्वेद के अंतर्गत आती है I और ऐसा ही उकार, मकार और ब्रह्मतत्त्व की साधनाओं में भी होना चाहिए I

 

और एक बात …

जब भी इष्ट, गुरु अदि को शाश्वत प्रणाम किया जाता है, तब भी ॐ का मन में उच्चारण किया जाता है, क्यूंकि साधक के लिए इष्ट, और शिष्य के लिए गुरु, ब्रह्म ही होते हैं। वैसे तो माता पिता भी ऐसे ही गुरु ब्रह्म होते हैं I

और जो साधक अपने ही इष्ट का शिष्य भी होता है, उसके वास्तविक गुरु भगवान नारायण ही होते हैं।

और ऐसी दशा में चाहे वो साधक किसी भी गुरु का शिष्य हो या किसी भी देवी देवता को अपना इष्ट क्यों न माने, पर वो ही गुरु भगवान नारायण उस शिष्य रूपी साधक और साधक रूपी शिष्य के गुरु इष्ट और इष्ट गुरु…, दोनों के स्वरूप में होते हैं।

इसलिए जब भी किसी भी इष्ट की साधना करो, तो उन इष्ट को ही माता, पिता, ज्येष्ठ, सखा और गुरु मानो, क्यूंकि ऐसे भाव में करी गयी साधना में, नारायण ही अंतिम सत्य रूप में होंगे I

और उस दशा में, वो नारायण ही पंच मुखा सदाशिव, भगवान् विश्वकर्मा और विराट परब्रह्म स्वरुप में, इन देवी सावित्री के ही स्वरुप में ही तुमपर अनुग्रह करेंगे, और तुम्हे ब्रह्मपथ में दृढ़ करके, ब्रह्मपथगामी बनाके, अंततः तुम्हारे मुक्तिकारक होंगे I

और एक बात…, कि जो नारायण का हो गया, वो सबका हो गया और सब उसके हो गए, क्यूँकि स्तिथि कृत्य जो नारायण का होता है, वो ऐसा ही होता है I

 

अब आगे बढ़ता हूं…

मेरुदंड, अर्थात रीड की हड्डी के दोनों ओर, एक-एक सूक्ष्म नाड़ी होती है।

दाएं हाथ अर्थात, दक्षिण की ओर, पिंगला नाड़ी होती है…, और बाएं हाथ, अर्थात, वाम हाथ की ओर, इड़ा नाड़ी होती है।

अकार साधना में, दक्षिण नाड़ी, अर्थात पिंगला नाड़ी, लाल रंग की हो जाती है। और वाम दिशा की नाड़ी, अर्थात इड़ा नाड़ी, पीले रंग की हो जाती है।

ये साधना, जिसमे अ शब्द का बारम्बार उच्चारण होता है, उसे तकतक ही करनी चाहिए, जबतक सूर्य आकाश में दिखाई देता है…, सूर्यास्त के पश्चात नहीं।

यदि ऐसा नहीं करोगे, तो इसी अ शब्द का उच्चारण ही, साधक को दस महाविद्या तंत्र की अति उग्र देवी, माँ बगलामुखी के क्रोध की ओर ले जाएगा ।

यही कारण है, की पुरातन कालों में वेद मनीषी कहते भी थे, की यदि ॐ या ॐ के बीजों का उचित प्रकार से उच्चारण नहीं होगा, तो वो उच्चारण से ही साधक की काया के भीतर ही, ऊर्जाओं का विस्फोट हो जाएगा।

माँ सावित्री अतिउग्र विद्या है, लेकिन उनकी साधना में, उनके अपने अकार स्वरूप में वो अपने साधकों के लिए, एक सौम्य-उग्र और उग्र-सौम्य, दोनों ही कोटि की देवी हैं…, और अपने बगलामुखी स्वरूप में, वो एक अतिउग्र स्वरूप धारण की हुई हैं।

ऐसे अतिउग्र स्वरूप में, देवी बगलामुखी ही ब्रह्मास्त्र विद्या की प्रधान दिव्यता है। अकार रूप में, माँ सावित्री का स्थान आज्ञाचक्र के समीप, ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है, और बगलामुखि रूप में, माँ सावित्री का स्थान नाभि कमल या मणिपुर चक्र के समीप होता है।

इसलिए इन स्वरूपों की साधना भी, इन्हीं चक्रों को केंद्र बनाकर की जानी चाहिए।

 

अकार साधना में शरीर की स्तिथि … 

जब वो योगी या जीवात्मा अकार की ओर जा रहा होता है, तब ऐसे समय पर उस योगी की पिंगला नाड़ी लाल रंग की हो जाती है। ये लाल वर्ण, तैजस की रजोगुणी अवस्था को दर्शाता है।

ये तैजस पिंगला नाड़ी में प्रकट होता है। पिंगला नाड़ी को तैजस नाड़ी और सूर्य नाड़ी भी कहा जाता है। इस पिंगला नाड़ी के देवता रुद्र देव है, और इस नाड़ी के भीतर रुद्र पिंगल रंग के होते हैं, जिनका नाद आआआला… आआआला, ऐसा होता है।

ये आला नाद इस्लाम के अल्लाह ताला का है, और ये आला का शब्द, अल्लाह या रुद्र का ही नाद होता है। जिनको वेदों में, पिंगला स्वरूप में रुद्र कहा गया है, वही इस्लाम के अल्लाह हैं। और ये बात मैंने हवा में नहीं की है…, मैं इस बात का साक्षातकारी भी हूं।

इसलिए, जब आगमी गुरुयुग का प्रकाश होगा, तो इस्लाम के बचे हुए मनीषी, निगम मार्ग को जाएंगे, अर्थात, वैदिक हो जाएंगे। लेकिन इनकी संख्या बहुत कम होने वाली है, क्योंकि उन सभी आगामी खंड विप्लवों में, अधिकांश नष्ट होने वाले हैं।

इसका अर्थ हुआ, कि जबतक साधक की पिंगला नाड़ी में तैजस का प्रकाश नहीं होगा, तबतक वह साधक अकार सिद्धि को नहीं पाएगा।

इसलिए, तेजस प्रज्वलित करके ही अकार साधना करनी चाहिए। साधक को अपनी बुद्धि में ही तैजस रूपी अग्नि प्रज्वलित करके, अकार साधना करनी चाहिए (ये बात मैंने सांकेतिक रूप में ही बोली है)।

रुद्रदेव का स्व:प्रादुर्भाव सदाशिव के अघोर मुख से हुआ था, जिसका महाभूत, अग्नि ही है। अग्नि में भी रुद्रदेव का तेजस तत्व ही होता है। इसलिए, अग्नि का आलम्बन लेके ही अकार साधना करनी चाहिए।

वह अग्नि दीपक की, यज्ञ कुंड की या किसी और दशा की भी हो सकती है, लेकिन अकार साधना में, अग्नि होनी होगी। वो अग्नि आंतरिक भी हो सकती है, इसलिए वो अग्नि साधक की बुद्धि में भी प्रज्वलित की जा सकती है (यह बात भी सांकेतिक रूप में ही बताई गई है, क्यूंकि मै जानता हूँ, कि जिसको समझना है, वो समझ ही जाएगा)।

और इसलिए, अकार साधना को ज्ञान मार्गी परिव्राजक और वेदान्ती नहीं कर सकते, जिन्हें अग्नि ही निषेध है। येदि ऐसे ज्ञान मार्गी, परिव्राजक और वेदान्तियों को अकार साधना करनी है, तो उनको अपने भाव साम्राज्य में ही करनी होगी। मेरा मार्ग भी मेरे भाव साम्राज्य का ही था, और इसलिए मैं जानता हूँ, की ऐसे भाव साम्राज्य का आलम्बन लेके भी, ये अकार साधना हो सकती है (यह बात भी सांकेतिक रूप में ही बताई गई है, क्यूंकि मै जानता हूँ, कि जिसको समझना है, वो समझ ही जाएगा)।

लेकिन एक बात बता देता हूं, कि, इन सभी साधनाओं का फल एक ही होगा, क्योंकि वेदों में मार्ग जो भी हो, फल से न तो किसी को वंचित रखा गया है, और न ही पृथक मार्गों के अनुसार, एक ही देवत्व की बिन्दु साधना में, उस देवत्व बिन्दु के अंतिम फल में कोई भेद किया गया है।

जबतक साधक कुछ मुख्य बिंदुओं का पालन करेगा, जैसे भीतर और बाहर का शुद्धिकरण, तबतक साधनाओं के विभिन्‍न प्रकारों से किए जाने के पश्चात भी, यदि उन साधनाओं का मूल बिंदु एक ही है…, तो उन साधनाओं का अंतिम फल भी एक ही होगा।

क्यूंकि आज के मानुषी इन बातों का पालन ही नहीं करते, इसलिए ॐ जप ही उनके आंतरिक विस्फोटों का कारण बन रहा है।

और सच्ची बात बताऊं, तो अब ॐ साधना का मार्ग और ज्ञान ही लुप्त सा हो चुका है, इसीलिए इसको यहाँ पर कुछ स्पष्ट और कुछ सांकेतिक रूप में प्रकाशित किया जा रहा है, क्यूंकि आगामी गुरुयुग में, ये ॐ का त्रिबीज जप ही एक उत्कृष्ट मुक्तिमार्ग होगा।

और क्योंकि ये ज्ञान ही लुप्त हो चुका है, इसीलिए आज ना तो वैदिक मनीषी माँ सावित्री का साक्षातकार करते हैं, और ना ही बौद्ध पंथ के मनीषी, बुद्ध प्रज्ञापारमिता का साक्षातकार कर पा रहे हैं।

बस इस बतलाई गई विकृति को सही करो, और तुम्हारी वो ॐ जप रूपी साधनाएं सफल होने लगेंगी।

इन बतलाए गए बिंदुओं में स्वस्थ क्रांति लाओ, और ओम साधना में सिद्धि पाओ। ओम साधना से बड़ी कोई भी सिद्धि न हुई है…, न ही कभी होगी।

जो ओम का दर्शी होता है, वो ही वेदों का दर्शी होता है, क्योंकि ओम वेदों का बीज भी है और गंतव्य भी है। पुरातन कालों में, ऐसे वेदद्रष्टा को ब्रह्मऋषि भी कहा जाता था।

इस ब्रहमऋषि शब्द को एक बाद के अध्याय में बतलाया जाएगा।

 

अकार के रंगों का विज्ञान प्रज्ञापारमिता सूत्र और प्रज्ञापारमिता मंत्र की बीज दशा …

इस चित्र में दिखलाई हुई दशा का साक्षात्कार तब होता है, जब योगी की चेतना, हृदय के सामने से ऊपर की ओर उठने वाले विशालकाय प्रकाश में प्रवेश करती है, और उस विशालकाय प्रकाश की किरणों का आलम्बन लेके, वो चेतना ऊपर की ओर, अर्थात ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष की ओर उठती चली जाती है।

अकार के रंगों का विज्ञान, प्रज्ञापारमिता सूत्र और प्रज्ञापारमिता मंत्र की बीज दशा
अकार के रंगों का विज्ञान, प्रज्ञापारमिता सूत्र और प्रज्ञापारमिता मंत्र की बीज दशा

 

उस चेतना के ऊपर की ओर उठने की स्तिथि में, एक दशा ऐसी भी आती है जब वो चेतना बस इन अकार की देवी, अर्थात, सावित्री सरस्वती से, थोड़ा सा नीचे की ओर ही होती है।

और ऐसी दशा में, जब वो चेतना अपने से ऊपर की ओर देखती है, तो वो इन देवी को, इस चित्र में दिखलाई हुई दशा में ही साक्षात्कार करती है।

इसलिए ये चित्र जिस दशा को दिखला रहा है, वो तब का है, जिसमें साधक की चेतना बस इन देवी के समीप पहुँचने ही वाली होती है…, लेकिन उस समय वो चेतना, इन देवी से थोड़ा सा नीचे की ओर ही होती है।

और इसी दशा का आलम्बन लेके, योगी ॐ का पूर्ण साक्षात्कार करता है।

इसी साक्षात्कार का मार्ग, मेरे इस जन्म से पूर्व के जन्म के गुरुदेव, जिनको आज गौतम बुद्ध के नाम से भी पुकारा जाता है, उन्होंने प्रज्ञापारमिता सूत्र में, प्रज्ञापारमिता मंत्र के माध्यम से सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन बतलाया था। लेकिन इस मंत्र के मार्ग के बारे में कभी बाद में बताऊंगा।

ऐसे साक्षात्कार की दशा में, कुछ प्रकार के प्रकाश इन देवी के वस्त्रों से, शरीर इत्यादि से बाहर की ओर निकालते हैं, जैसा की इस चित्र में भी दिखलाया गया है। और ये सभी रंग किसी न किसी दैविक अवस्था से सम्बन्ध रखते हैं।

मेरे पूर्व जन्म के गुरुदेव गौतम बुद्ध ने, इसी अवस्था में, इन देवी को बुद्ध प्रज्ञापारमिता शब्द से सम्बोधित किया था।

लेकिन इससे आगे बढ़ने से पूर्व, कुछ शब्दों को परिभाषित करना होगा, इसलिए अब जो बता रहा हूँ, उसपर ध्यान देना।

 

प्रज्ञापारमिता शब्द का अर्थप्रज्ञा शब्द की परिभाषाप्रज्ञा शब्द का अर्थ

इस प्रज्ञापारमिता शब्द का अर्थ है …,

परा अवस्थाओं का विशुद्ध कर्ममय, प्रकाशमान, चेतनमय ज्ञानमय मित्र

 

यहाँ कहे गए विशुद्ध कर्ममय शब्द को “ब्रह्ममय कर्म या ब्रह्मपथ” ही मानना चाहिए…, और प्रकाशमान ज्ञानमय चेतनमय शब्दों को स्वयंप्रकाश ब्रह्म की प्रकाशमान अभिव्यक्ति ही मानना चाहिए।

वैसे तो प्रज्ञा शब्द का अर्थ …

 विद्या शब्द का गंतव्य भी होता है I

 

और मेरे पूर्व जन्म के गुरुदेव गौतम बुद्ध ने यह प्रज्ञा शब्द इसलिए कहा था, क्यूंकि ये अकार की देवी,  पञ्च विद्या में से एक विद्या भी हैं।

 

विवेकी ज्ञानयुक्त चेतनयुक्त ब्रह्मपथगामी निष्काम कर्ममयी बुद्धि को भी प्रज्ञा ही कहते हैं।

 

और इसके अतिरिक्त …,

ब्रह्म के स्वयंप्रकाश अमूल गंतव्य स्वरूप को भी प्रज्ञा कहा जा सकता है।

ब्रह्म का यही स्व:प्रकाश अमूल गंतव्य स्वरूप, जीव और जगत का मूल भी है I

स्वयंप्रकाश वो होता है, जो सबको प्रकाशित करता हुआ भी, सबमें बसा हुआ भी और सब उसमें बसे हुए भी, वो स्वयंप्रकाश छुपा हुआ होता है।

 

जो सबमें प्रकाशित होता हुआ भी, सबको प्रकाशित करता हुआ भी, प्रकाश और अन्धकार दोनों में समान रूप में बसा हुआ भी, सबमें बसा हुआ भी, सब उसमें बसे हुए भी और सबसे परे होता हुआ भी, लुप्त सरिका ही रहता है…, उससे ही स्व:प्रकाश कहते हैं I

स्वयंप्रकाश वो भी होता है, जिसकी अभिव्यक्ति समस्त जीव जगत कहलाती है, इसलिए वो जीव जगत के मूल में बसा हुआ भी, और जो जीव जगत का गंतव्य होता हुआ भी, जीव जगत के स्वरूप में ही स्वयं अभिव्यक्त होता है…, उससे ही स्वयंप्रकाश और स्व:प्रकाश कहा गया है।

उसी स्वप्रकाश या स्वयंप्रकाश का मार्ग और दिव्यता, पञ्च सरस्वती हैं।

योग मार्ग और समाधि भी प्रज्ञा शब्द का अंग है। इसलिए ये प्रज्ञापारमिता सूत्र का मार्ग भी योग शब्द के अंतर्गत है, और अंततः ये मार्ग समाधि की दशा की ओर ही लेके जाता है, जिसके गंतव्य में साधक को स्व:ज्ञान ही होता है।

स्वयंज्ञान भी साधक का स्वप्रकाशित आत्मस्वरूप ही होता है, इसलिए जो यहाँ स्वयंप्रकाश कहा गया है, वो साधक का आत्मस्वरूप ही है, जो वैदिक वाङ्मय में निर्गुण निराकार और ब्रह्म कहलाता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ और इन देवी के शरीर और वस्त्रों से बाहर निकल रहे रंगों को और उनकी दैविक अवस्थाओं के बारे में बतलाता हूँ।

 

पहला रंग

चमकदार सुनहरा चमचमाता पीला रंगअकार की देवी और इंद्र

  • ये रंग हिरण्यगर्भ का है। लेकिन हिरण्यगर्भ के बारे में, किसी बाद के अध्याय में बताऊंगा, जब उकार के शब्द पर बात होगी।
  • जब हिरण्यगर्भ केवल इसी सुनहरे रंग के होते हैं, तो वो कार्यब्रह्म नहीं होते। ऐसी दशा में वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म इस जीव जगत के रचइता नहीं होते। और ऐसी दशा में, वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म अनाभिमानी देवता ही होते हैं I
  • और जब वो ही हिरण्यगर्भ, रजोगुणी होकर, लाल वर्ण के होते हैं, तो ही वो कार्य ब्रह्म कहलाते हैं I और ऐसी दशा में, वो ही कार्य ब्रह्म अभिमानी देवता ही होते हैं I
  • ये सुनहरा रंग ऋग्वेद के महावाक्य, प्रज्ञानं ब्रह्म को दर्शाता है, इसलिए ये सुनहरा रंग ऋग्वेद का है।
  • पंच कोष विज्ञान में, ये रंग विज्ञानमय कोष को दर्शाता है, जिसके देवता देवराज इंद्र होते हैं। इंद्र देव ही बुद्धि के स्वामी हैं…, न कि और कोई देवी देवता।

ब्रह्माण्ड का विज्ञानमय कोष ही इन्द्रलोक कहलाता है, जो देवराज इंद्र का ही सगुण निराकार स्वरूप होता है ।

सारे जीवों के विज्ञानमय कोष में ही देवराज इंद्र, उनके अपने सगुण साकार स्वरूप में होते हैं I

इसीलिए जबसे इस कलियुग के कालखंड में मानव जाति ने इंद्र देव के बारे में बुरा भला बोलना प्रारम्भ किया था, तबसे मानव जाति की बुद्धि भ्रष्ट होने लगी थी, जिससे कलियुगी तंत्र प्रबल होने लगा था।

और इसका कारण भी वही है, जो पहले बताया था, कि बुद्धि के देवता देवराज इंद्र होते हैं, जो पितामह ब्रह्म के सबसे प्यारे शिष्य भी हैं। और यही कारण है, कि पितामह ब्रह्म ने भी अपना ज्ञान, सर्वप्रथम इंद्र देव को ही दिया था।

इन्द्र पद से अगले पद को ही ब्रह्मा कहा जाता है, इसलिए ब्रह्मा होने से पूर्व, सारे के सारे ब्रह्मा जी भी इंद्र ही होते हैं। देवराज इन्द्र के पद को पार करके ही, पितामह ब्रह्म के पद को पाया जाता है।

इंद्र को बुरा भला बोलने पर, जब बुद्धि ही भ्रष्ट हो जायेगी, तो तुम्हे कौन बचाएगा, क्यूंकि ऐसी दशा में तो तुम सब स्वयं ही स्वयं के विनाश का ही कारण बन जाओगे, जैसा की इस कलियुग के कालखंड में, समय समय पर होता ही रहा है I

यदि किसी को मेरी इस बात पर विश्वास नहीं है, तो 2024 ईस्वी और उसके बाद के कालखंड में में देख लेना, जब तुम्हारे आज के बचने वाले ही भाग खड़े होंगे…, उनके अपने ही प्राण बचाने को।

तैंतीस कोटि देवी देवताओं में इंद्र का स्थान, प्रजापति अर्थात, पितामह ब्रह्म से एक स्थान नीचे या पहले आता है। समस्त देवी देवताओं में, इंद्र केवल ब्रह्म या प्रजापति से नीचे होते हैं, और बाकी सभी देवी देवता, इंद्र से नीचे होते हैं।

अगला मानव युग जो गुरुयुग है, अर्थात वैदिक युग है, उसमे साधकों की उपासना में इंद्र ही होंगे, और जब ऐसी दशा आएगी, तो उसके पश्चात यही पृथ्वी लोक जो अभी मृत्युलोक सा दिखाई दे रहा है…, वो देवलोक तुल्य हो जाएगा I

और जब ऐसा हो चुका होगा, तो देवी देवता भी अपने लोकों से यहाँ पर आया करेंगे, जो आज के समय पर नहीं हो रहा है, क्यूंकि उनके देवराजन इंद्र को ही मानव जाति के ग्रंथों में, विकृत स्वरूप में बताया गया है I

इसलिए आगामी समय में, मानव जाति उन सभी ग्रंथों और मार्गों का परित्याग कर देगी, जिनमे देवराज इंद्र को किसी भी विकृत स्वरूप में दर्शाया गया है I

और वो ही देवराजन इंद्र तुम्हारी इड़ा नाड़ी, अर्थात चंद्र नाड़ी का देवता होते हैं, इसलिए वेदों में उनका नाम इदंड्रा कहा गया है। इड़ा नाड़ी का देवता इदंड्रा, ही इंद्र है। वेदों ने तो देवराज इंद्र को परमात्मा तक कहा है।

और क्योंकि इंद्र ही देवराज हैं, इसीलिए तैंतीस कोटि देवी देवता भी इंद्र के अधीन होके ही कार्य करते हैं।

जिन भी देवी देवताओं को आज तक किसी भी मार्ग में, ग्रन्थ में या कालखंड में माना गया है, उन सभी के सम्राट भी देवराज इंद्र ही हैं I

यदि देवी देवता भी इंद्र से पंगा ले लेंगे, तो इंद्र उनसे भी विमुख हो जाएंगे और इसके पश्चात, उन देवी देवताओं की बुद्धि भी भृष्ट हो जाएगी, और अंततः उनका भी पतन हो ही जाएगा…, जैसे इस कलियुग में तुम वेद मनीषियों का भी हुआ है।

यदि देवराज इंद्र को ही अपने विकृत भाव साम्राज्य में डालोगे, तो तुम्हारी मति भ्रष्ट ही होगी, जिसके बाद तुम्हारे लिए पतन के सिवा, कोई और विकल्प बचेगा भी नहीं।

ऐसा ही हुआ है, कलियुग में तुम सभी वेद मनीषियों के साथ, और ऐसा भी तब से ही हुआ है, जब से तुमने अपने ग्रंथों में इन्द्र को विकृत स्वरूप में दर्शाया था।

और इसके बाद, जैसे जैसे कलियुग चला, इंद्र को वेद मनीषी ही बुरा भला बोलने लगे, जिसके कारण, इंद्र ने स्वयं को ही वेद मनीषियों से विमुख कर लिया।

जैसे जैसे इंद्र वेद मनीषियों से विमुख होते चले गए, वैसे वैसे इस धरा पर वेद मनीषी अपना सम्मान, अपनी प्रतिष्ठा, अपनी आर्य, अर्थात उत्कृष्ट परंपरा और मुक्तिमार्ग को प्रतिष्ठित और प्रकाशित करते हुए सम्प्रदाय भी खोते ही चले गए।

और जैसे जैसे वैदिक मनीषियों से इंद्र और भी दूर होते चले गए, वैसे वैसे इस धरा पर समस्त वैदिक साम्राज्य और ज्ञानमार्ग भी समाप्त होते चले गए।

वैसे एक बात बता दूं, कि आज का वैदिक वाङ्मय एक प्रतिशत भी नहीं है, उस अथाह सागर रूपी वैदिक ज्ञान की तुलना में, जो मेरे पूर्व जन्मों में पूर्णप्रकाशित था और जो मुझे स्मरण भी है, क्यूंकि मैं योगभ्रष्ट हूँ, और इसके साथ साथ मैं प्रबुद्ध भी हूँ I

उस ज्ञान के लुप्त होने का कारण भी वही है, कि देवराज इंद्र जो बुद्धि के देवता हैं, वो वेदों को मानने वालों से विमुख हो गए थे।

इसी कारण से वेद मनीषियों की बुद्धि भ्रष्ट हुई थी, और धीरे धीरे वो आपस में ही एक दूसरे का विरोध करने लगे, जिसके कारण भारत विभाजित होता होता, अंततः, प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों ही स्वरूपों में परतंत्र हुआ था…, कई हजार वर्ष तक।

और जब 1947 ईस्वी में भारत स्वतंत्र हुआ,  तब भी वेद मनीषियों ने इस गलती को नहीं सुधारा, इसलिए स्वतंत्र भारत में भी, वेद मनीषी अपना अधिकार और सम्मान नहीं पा सके हैं । और आगे भी नहीं पाएंगे, जबतक वो देवराज को उनका उचित स्थान नहीं देंगे I

ये भी वो कारण है कि मैं कभी कभी सोचता हूं, कि क्या वेदों के नाम पर मूर्खानंदों की बारात निकल पड़ी है…, और वो भी आज के स्वतंत्र भारत में।

और विडंबना तो ये भी है, कि यदि आज के मूर्खानंदों को मूर्ख बोलोगे, तो वो धूर्तवाद पर उतर आएंगे, धूर्तानंद हो जाएंगे। और तब यदि उस धूर्तानंद को धूर्त बोलोगे, तो वो तर्क वितर्क को त्यागके, कुतर्क करने लगेगा, कुतरकानंद हो जाएगा। और तब उस कुतरकानंद को कुतर्की बोलोगे, तो कपट करने लगेगा, कपटानंद हो जाएगा। आज के अधिकाँश धर्मशाश्त्री, चाहे वो किसी भी मार्गधर्म के हों…, ऐसे ही हैं।

अरे मूर्खानंदों, यदि तुम देवराज इंद्र को ही आपनित करते रहोगे, तो गुरु गद्दी का युग कैसे आएगा, जिसमें पारंपरिक राजतंत्र होता है, नाकी ये विकृत प्रजातंत्र जिसमें जिस भी देश में देखो…, रक्षक ही भक्षक बना बैठा है।

इस कलियुग के विकृत प्रजातंत्र और राजतंत्र में, जहां भी देखो, राजा अपनी कमाई करना ही भूल गया।

पूर्व कालों के वैदिक राजतन्त्र में, राजागण उनके प्रजा और साम्राज्यों के पालनहार होते थे, लेकिन आज के विकृत राजतंत्र और प्रजातंत्रों में, सब के सब राजागण और नेतागण बस भिखारी हो गए I और चाहे ऐसा प्रत्यक्ष रूप में हुआ हो, या परोक्ष रूप में…, लेकिन है ऐसा ही I

और इस बात का प्रमाण भी यही है, की आज सरकारें ही सबसे बड़ी कर्जदार हो रखी हैं I और विडम्बना भी यही है, की आज की सरकारों को कमाना आता नहीं, और कर्जा बढ़ाती ही जा रही हैं I

और इसके साथ साथ, इन अनभिग्य सरकारी तंत्रों के कारण, व्यापारी भी ऐसे ही हो गए हैं…, जो जितना धनि है, वो उतना बड़ा कर्जदार भी है I

कलियुग में एक ही पुरुषार्थ होता है, जो अर्थ पुरुषार्थ कहलाता है I

कलियुग के कालखंड में जिस भी राजा की अपनी कमाई नहीं होती, वो पुरुषार्थ विहीन ही माना जाना चाहिए, जिसके कारण ऐसा राजा अनभिज्ञ ही होता है I

चाहे कोई उस राजा को ऐसा माने, या न माने…, पर पुरुषार्थ के दृष्टिकोण से वो अनभिज्ञ ही माना जाएगा I

बस एक हाथ में भीख का कटोरा और एक हाथ में चाकू रखकर कोई अर्थ पुरूषार्थी नहीं होता।

यदि भीख के कटोरे में तुम टैक्स और पेनल्टी नहीं डालोगे, तो चाकू का प्रयोग होगा तेरे पे…, तुझे फँसा के अंदर कर दिया जायेगा। ऐसा होता है क्या राजतंत्र, जिसमे राजा के अर्थ पुरुषार्थ के नाम पर, बस  भीख का कटोरा और चाकू ही दिखाई देता है।

कमाएगी दुनिया…, खाएँगे हम…, वैदिक पुरुषार्थ मार्ग के अर्थ तंत्र में, इस वाक्य में कोई अर्थ पुरुषार्थ नहीं होता I

इस कलियुग के छोटे से, कोई 5100 वर्षों से थोड़ा अधिक समय के कालखण्ड में, राजागण (और प्रजातान्त्रिक नेतागण) बस ऐसे चाकू दिखने वाले भिखारी ही रहे हैं, इसलिए ये पृथ्वीलोक अर्थ पुरुषार्थ विहीन सा ही हो गया है I

आज के समस्त राजागण, कम या अधिक रूप में ऐसे अनभिज्ञ ही हैं, क्यूंकि वो मान बैठे हैं…, कि “कमाएगी दुनिया…, खाएंगे हम”।

जबकि वैदिक राजतन्त्र में, इससे विपरीत ही होता है ,क्यूंकि वैदिक राजतन्त्र में, वैदिक सम्राट अपनी समस्त प्रजा का भरण पोषण इत्यादि करने में सक्षम होता है।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जिस देश के राजा का पुरुषार्थ ही सुरक्षित नहीं है, वो राजा अपनी प्रजा को क्या पुरुषार्थ के मार्ग पर लेके जाएगा।

और पुरुषार्थ के बिना, वो प्रजा और राजा, मोक्ष पथगामी कैसे होंगे?…, थोड़ा सोचो तो I

समस्त जीव, इस जगत में, मुक्ति पाने को ही तो आये थे, इसलिए यदि उनको वो ही न मिले, जो उनके जीव रूप में आने का मूल कारण है, तो जीव पागल नहीं होंगे, तो क्या होंगे?… थोड़ा इसपर भी सोचो तो और जानो कि कलियुग में जीव सत्ता  हर कुछ वर्षों में त्रितापों के किसी न किसी स्वरूप में क्यों चली जाती है? I

ब्रह्म की रचना में, जिस मूल कारण से तुम जीव रूप में उत्पन्न हुए थे,  यदि उसके मार्ग पर ही नहीं जाओगे, तो त्रासदी के सिवा और क्या पा सकते हो?…, थोड़ा इसपर भी सोचो तो और जानो कि इस कलियुग के कालखंड में, तुम्हारे लिए हर कुछ समय के पश्चात, वो त्रासदियाँ क्यों आती हैं? I

वो विविध प्रकार की त्रासदियाँ तुम्हे क्या सिखाना चाहती है?…, थोड़ा इसपर भी मनन चिंतन करो I

किसी भी लोक में, प्रकृति और दैविक सत्ताएँ कभी भी बिना कारण कोई दुर्भीक्ष या विप्लव नहीं लाती…, इस मूल बिंदु को समझकर, अपनी जीवन शैली और उसके उत्कर्ष के सभी बिंदुओं में, स्वस्थ गंतव्यमार्गी क्रांति लाओ I

और मेरी एक बात और जान लो, की जब तुम ऐसा करके उसमें सफल होने लगोगे, तो उस समय, तुम स्वयं को वैदिक मान बिंदुओं के भीतर बसा हुआ ही पाओगे क्यूंकि समस्त उत्कर्ष मार्ग, वैदिक जीवन शैली से ही होकर जाते हैं I

वो वैदिक जीवन शैली, प्रकृति में बसे होने का कारण, मूल से बहुवादी होती है, और इसके साथ साथ, उस निर्विकल्प ब्रह्म में बसे होने के कारण, गंतव्य से वो अद्वैत ही पाई जाएगी I

जिस मृत्युलोक में, जैसा ये पृथ्वीलोक है, पुरुषार्थ ही नहीं होता, वो नरक के सिवा और क्या होगा?…, थोड़ा इसपर भी सोचो तो I

और एक बात याद रखो, कि जिस जीवन मार्ग के मूल में वो ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति नहीं होती…, वो दुर्गति को ही लेके जाता है I

और जिस जीवन मार्ग की गति उस गंतव्य रूपी ब्रह्म, जो कैवल्य मोक्ष ही है, उसतक नहीं होती…, उसकी दुर्गति ही तो होती है।

समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकल्प ही अर्थ पुरुषार्थ का मूल होते हैं। अर्थ पुरुषार्थ माँ प्रकृति का ही होता है, इसलिए जो अर्थ तंत्र, प्रकृति के तत्त्वों को ही विकृत कर दे, वो ही तो अनर्थ कहलाता है।

जो आर्थिक विकासवाद, उस प्रकृति के तत्त्वों को ही विकृत और प्रदूषित करदे, जो अर्थ के मूल में होते है, वो विकास नहीं बल्कि विनाश का मार्ग होता है I

यही कारण है, की वो आगामी कालखंड में, जो अभी के समय पर, इस विश्व के द्वार पर खड़ा हो चुका है, उसमें प्रकृति के परिकल्प ही विनाश का कारण बनेंगे I लेकिन वो प्रकृति तो जीवों और जगत के भीतर भी होती है, इसलिए उस आगामी विनाश के कारण, जीवों के भीतर से भी उत्पन्न होंगे, और इस प्रक्रिया में, मानव जाति भी एक प्रमुख योगदान देगी I

और मेरी एक बात याद रखो…, कि प्रकृति ही ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, पूर्ण शक्ति, समस्त दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और प्रमुख दूती होती है, इसलिए प्रकृति किसी देव की बपौती नहीं होती, जैसा किसी न किसी प्रकार से, तुम्हारे उन कलियुगी शास्त्रों में कहा गया है I

आगामी समयखण्ड में, जब प्रकृति ही पीटेगी तुम जीव रूपी मानव जाति को, तो उस समय तुम्हारे समस्त देवी देवता भी भाग खड़े होंगे I

आगामी समय मेरी इस बात का प्रमाण भी देने वाला है, इसलिए तबतक प्रतीक्षा करो I और उस प्रतीक्षा के समय, अपने पर अनुग्रह करके, इस बात पर कोई टिप्पणी मत करो…, अपनी विकृत कलियुगी बुद्धि और ग्रंथों का आलम्बन लेके I

जो अनर्थ ही है, उसकी गति कैवल्य मोक्ष तक कैसे होगी?…, जिसको पाने हेतु ही सभी आत्माएं जीव रूप में आई हैं…, इसपर भी थोड़ा सोचो तो।

और ऐसा मनीषि जो विकृत अर्थ पुरुषार्थ का अंग है, वो पञ्च विद्या के मार्ग पर कैसे जाएगा?…, ये भी थोड़ा सोचो।

और पञ्च विद्या जो किसी भी मुमुक्षु के मूल मार्ग में, विद्या रूप में ही होती है, उसके बिना मुक्ति को कैसे पाओगे?…, जिसके लिए तुम जीव रूप में आये थे…, थोड़ा इसपर भी सोचो I

 

अब जो बता रहा हूँ, उसको सदैव ही अपने स्मरण में रखो …

इस ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, जिस भी समयखंड में, देवराज इंद्र का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में निरादर हुआ है, वो समयखंड पतन का मार्ग बना है, जैसे इस कलियुग में अधिकांश समयखण्डों में मानव जाति के साथ हुआ है I

जिस लोक में और जिस लोक से, इंद्र ही रूठ जाते हैं, उस लोक में दैत्य ही देवता बनके आते है I

और ऐसी दशा में, वो लोक कुपित होके, समय समय पर किसी न किसी त्रासदी को ही पाता है I

बिलकुल ऐसा ही इस पृथ्वीलोक में, इस कलियुग के कालखंड में ही हुआ है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

भगवान राम ने तो केवल एक अश्वमेध यज्ञ किया था, और तुमने उन्हें पुरुषोत्तम भगवान बता दिया।

अरे मूरखानन्दो, इंद्र वो उत्कृष्ट योगी होता है, जो अपने जीव रूपी इतिहास में, एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ का सिद्ध होता है।

मानव इतिहास में, उन पुरषोत्तम राम को कई योगीजन साक्षात्कार कर चुके, पर इंद्र और इन्द्रलोक का कितने योगियों ने साक्षात्कार किया है…, यदि थोड़ा इस बिंदु पर भी मनन और चिंतन करोगे, तो जान जाओगे, कि इस चतुर्दश भुवन रूपी ब्रह्माण्ड के अनादि अनन्त इतिहास में, ऐसे योगी मुट्ठी भर भी नहीं है I

पर आज के ग्रंथ तो कुछ और ही कहते हैं, लेकिन मैं उन विकृत ग्रंथों को नहीं मानता, क्योंकि मैं केवल मेरे अपने साक्षातकारों के आधार पर ही बताता हूं। मैं वो कुछ भी नहीं बोल रहा हूं, जो मेरे साक्षातकार में नहीं है।

लेकिन, यहाँ बताए गए समस्त बिंदु, देवराज इंद्र और हिरण्यगर्भ ब्रह्म से ही वास्ता रखते हैं, जिनको आज के वेद मनीषि या तो पूजते नहीं हैं, या उनके बारे में अनाप शनाप बकते हैं…, और यही कारण है, कि स्वतंत्र भारत में भी, वेद मनिषियों का उद्धार नहीं हुआ है I

और आज के इस स्वतंत्र भारत में, उन वेद मनीषियों की दुर्दशा भी इतनी हो गयी, कि उनके अपने पुरातन मठ मंदिर भी पूर्णरूपेण उनके नहीं…, उनकी अनादि परम्पराएं तक आज उनकी नहीं  और आज के समय पर अधिकांश रूप में तो उनके पास, उनके अनादि अनन्त वैदिक संप्रदाय तक नहीं बचे है, तो किस बात के वैदिक है वो वेद मनीषि, जो व्यर्थ की उपाधियां धारण करके, बस इस छोटे से मृत्युलोक में ही महिमामंडित हो रहे हैं I

वैदिक आचार्य कभी भी ऐसे नहीं हुआ करते थे, जैसे आज के समयखण्ड में दिखाई दे रहे हैं, बस पढ़े लिखे, लेकिन अधिकाँश मूर्खानंद I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

अब इसी सुनहरे वर्ण के विज्ञान के कुछ और बिंदुओं को बताता हूं…

  • पंच कोष विज्ञान में, ये हेम वर्ण या पीला रंग, हृदय के आगे की ओर जाने वाले प्राण वायु की अवस्था को दर्शाता है। इसलिए ये रंग, उत्कर्ष मार्ग में आगे की ओर बढ़ती हुई साधक की गति को भी दर्शाता है।
  • ये रंग, विज्ञानमय कोष को भी दर्शाता है।
  • ये रंग, ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष को भी दर्शाता है।
  • अंत:करण चतुष्टय में, ये रंग विशुद्ध बुद्धि का वाचक है।
  • पंच महाभूत विज्ञान में, ये रंग पृथ्वी महाभूत को दर्शाता है, जिसका रंग हल्का पीला…, पीली मिट्टी के समान होता है।
  • पंच तन्मात्र विज्ञान में, ये रंग गंध को दर्शाता है। इस पंच तन्मात्र विज्ञान में गंध का अर्थ दुर्गंध नहीं होता…, बल्कि सुगंध होता है।
  • और अंतगति में ये रंग, बुद्धत्व का भी वाचक है। बुद्ध वो योगी होता है, जो समस्त ब्रह्माण्ड को ऐसे देखता है, जैसे वो समस्त ब्रह्माण्ड उसका ही प्रतिबिंब हो। “यत पिण्डे तत ब्रह्मांण्डे” का वाकय भी बुद्धता को ही दर्शाता है।

 

और इस पीले वर्ण के अंत में …

इस परकाया प्रवेश के मार्ग से प्राप्त हुए जन्म में, मैं उस सारस्वत परंपरा का हूँ, जो पुरातन कालों में शाकद्वीप के सौर्य सारस्वत ब्राह्मण कहलाते थे, अर्थात वो ब्राह्मण जो आज के अफ़ग़ानिस्तान से लेकर, इज़रायल तक के ऋग्वेदी ब्राह्मण थे, और जिनसे, यहूदी, फ़ारसी, यूनानी, ईसाई, यवनी और सिख आदि धर्मों का उदय हुआ था I

लेकिन आज अधिकाँश सारस्वत ब्राह्मण अपनी बुद्धि से ही कुपित हो चुके हैं, इसलिए, उस आगामी गुरुयुग में, इन्ही सारस्वत ब्राह्मणों की परंपरा में से कुछ ब्राह्मण बालक, उन गुरु विश्वकर्मा के होके, इस भूमण्डल पर उदय होंगे, और आम्नाय चतुष्टय की गुरु गद्दियों को धारण करेंगे I

उस समय, आज के समय की सरस्वत परंपरा का गुरु गद्दियों पर से अधिकार समाप्त हो जाएगा, और ये अधिकार उन गुरु विश्वकर्मा के ब्राह्मणों के पास चला जाएगा I

विश्वकर्मा को ही पञ्च मुखा सदाशिव कहा गया है, और वो पञ्च मुखा सदाशिव ही श्रीमन नारायण और विराट पारब्रह्म कहलाते हैं I

आगामी गुरुयुग, जिसकी आयु कोई दस हजार वर्षों की है, वो मेरी इस बात का भी प्रमाण देगा…, क्यूंकि ये बात कहने की प्रेरणा भी मुझे मूल विद्याएँ या पञ्च विद्याएँ, अर्थात पञ्च सरस्वती ही दे रही हैं I

 

तो अब अगले बिंदु पर जाता हूं, जो कि लाल रंग का प्रकाश है…, और जो इन अकार की देवी के शरीर के नीचे के वस्त्रों से, फूट-फूट के बाहर की ओर आ रहा होता है।

 

दूसरा रंग

चमकदार लाल

  • ये रंग विशुद्ध रजोगुण को दर्शाता है। विशुद्ध रजोगुण को ही ब्रह्म कहते हैं, क्यूंकि यह विशुद्ध रजोगुण, गुण ब्रह्म के वाक्य को भी दर्शाता है I ऐसी दशा का सिद्ध योगी, गुण ब्रह्म को पाता है।
  • ये प्रकाश स्पष्ट बतलाता है, कि अकार की देवी, विशुद्ध रजोगुण को अपने भीतर ही समाई हुई हैं।
  • पञ्च कोष विज्ञान में, ये रंग प्राणमय कोश के अपान प्राण का है।
  • और अंतःकरण चतुष्टय में, ये रंग मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की रजोगुणी अवस्था को दर्शाता है।
  • पंच महाभूत में, ये रंग अग्नि महाभूत को दर्शाता है।
  • और अंतगति में, ये रंग प्रजापति के ही कार्यब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है। जब भी ब्रह्मा, रचैता का कार्य करते हैं, तब वो लाल रंग के होते हैं, और यही कारण है, की पुराणों में, ब्रह्मदेव को लाल रंग का कहा गया है। इसीलिए, ये रंग भी ऋग्वेद का है।
  • और इसके अतिरिक्‍त, ये रंग रुद्रदेव की पिंगला अवस्‍था से भी संबंध है, इसीलिए, ये रंग यजुर्वेद का भी है।

 

तीसरा रंग

चमकदार नीला

  • ये रंग विशुद्ध तमोगुण का है। विशुद्ध तमोगुण को ही ब्रह्म कहते हैं, और जो गुण ब्रह्म के वाक्य को भी दर्शाता है।
  • और ये दर्शाता है, कि अकार की देवी तमोगुण को भी अपने भीतर समाई हुई हैं।
  • ये रंग सदाशिव के अघोर मुख से संबंध रखता है, जिसका शब्द आआआहम… आआआहम… ऐसा होता है। इसका वेद, यजुर्वेद है और इसका महावाक्य, अहम् ब्रह्मास्मि है।
  • पंच कोश विज्ञान में, ये रंग मनोमय कोश को दर्शाता है, लेकिन केवल उसी अवस्था में, जबतक साधक की चेतना ने, अपरा प्रकृति के आठ कोषों को पार न किया हो।

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्यूंकि जब साधक की चेतना, अपरा प्रकृति के आठों कोषों को पार कर जाती है, तो साधक का मन पूर्व की अवस्थाओं के समान नीला नहीं रहता, बल्कि वो मैं प्रकृति के नवम कोष के समान, श्वेत हो जाता है।

मन की एक विशेषता है, कि “गंगा गए तो गंगा राम और यमुना गए तो यमुना दास”।

इसलिए जिस समय, जिस भी दिशा से मन सम्बंधित होता है, उस समय वो मन उस दशा के अनुसार ही होकर रहता है।  लेकिन यह एक मनसवृत्ति भी है, जिसपर विजय पाके ही मुक्तिमार्ग प्रशस्त किया जाता है I

  • ये रंग उड़ान प्राण और पञ्च उप-प्राणों से भी सम्बंधित है।
  • और अंतःकरण चतुष्टय में, ये रंग मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की तमोगुणी अवस्था का वाचक है।
  • इसके अतिरिक्त, अंतःकरण चतुष्टय विज्ञान में, ये रंग अहंकार का वाचक भी है। लेकिन इन देवी का अहंकार, विशुद्ध होता है, इसलिए ब्रह्म सरीका ही होता है। विशुद्ध अहम् को ही ब्रह्म कहते हैं।
  • पंच महाभूत विज्ञान में, जब ये नीला रंग, सत्वगुण के श्वेत रंग से योग करता है, तब ये रंग वायु महाभूत को दर्शाता है, जो हल्का नीला होता है।
  • और अंतगति में, ये रंग महादेव का वाचक है।

 

चौथा रंग

चमकदार श्वेत

  • ये रंग विशुद्ध सत्वगुण का है। विशुद्ध सत्व को ही ब्रह्म कहते हैं, और जो गुण ब्रह्म के वाक्य को भी दर्शाता है।
  • और ये दर्शाता है, कि आकार की देवी, सत्त्वगुण को भी अपने भीतर समायी हुई हैं, इसलिए ये देवी, प्रकृति के नवम कोष, अर्थात परा प्रकृति से भी सम्बंधित हैं, माँ अदिशक्ति से सम्बंधित हैं, क्यूंकि प्रकृति के नवम कोष की देवी, माँ आदि शक्ति ही होती हैं।
  • और इनका चमकदार श्वेत रंग, उन सर्वसम, सगुण साकार, चतुर्मुखा पितामह और उनके सर्वसम, सगुण निराकार ब्रह्मलोक का भी वाचक है। इसी अवस्था में पितामह ब्रह्म, वेदों के तैंतीस कोटि देवी देवताएँ में, प्रजापति कहलाते हैं।

वैसे तो पितामह प्रजापति के कई स्वरूप हैं, लेकिन ये स्वरूप जो यहाँ बतलाया गया है, उसको ही वेदों के तैंतीस कोटि देवी देवताएँ में प्रजापति कहा गया है।

मुझे ये भी पता है, की आज के वेदांती इस तथ्य को नहीं मानेंगे, लेकिन मैं तो वही बताता हूँ, जो मेरे साक्षात्कार में है…, नाकि कुछ पढ़ा लिखा हुआ।

लेकिन इसके बारे में तब बात करूंगा, जब पंच मुखा सदाशिव के सद्योजात मुख की बात होगी।

  • इस रंग का वास्ता वैदिक महावाक्य “तत् त्वम् असि” से भी है, जो सामवेद का महावाक्य है।
  • पंच कोष विज्ञान में, ये रंग प्राणमय कोश की गंतव्य दशा को दर्शाता है, जब प्राण समतावादी हो जाते हैं।
  • और इस रंग का वास्ता, समान प्राण से भी है, लेकिन तब, जब साधक की कुण्डलिनी शक्ति, राम नाद से जाकर, अष्टम चक्र को ही पार कर जाती है।
  • इस रंग का वास्ता कुण्डलिनी शक्ति की उस अवस्था से भी है, जो प्रथम विद्या, अर्थात, माँ भारती सरस्वती से सम्बंधित होती है, इसीलिए ये रंग जब साधक के शरीर में, मूलाधार चक्र से ऊपर की ओर उठता है, तब साधक के शरीर के भीतर के ब्रह्माण्ड में, माँ भारती सरस्वती ही जागृत हो जाती हैं। और ऐसी अवस्था के पश्चात, साधक के शरीर के भीतर बसा हुआ वो सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड ही भारत कहलाता है, जो माँ भारती सरस्वती के ही स्वामी, अर्थात पति होकर, साधक के साक्षात्कार में आता है।
  • इस रंग का वास्ता उस लिंग से भी है, जो नाभि क्षेत्र में होता है, जो ऊपर से थोड़ा पीछे की ओर, अर्थात मेरुदण्ड की ओर झुका होता है, और जिसमे तैंतीस कोटि नाड़ियाँ मिलती है, और जो साधक के शरीर के भीतर बसे हुए तैंतीस कोटि देवी देवताओं और उनकी दिव्यताओं को दर्शाती हैं।

और जब भी उन नाड़ियों की ऊर्जाएं, एक दुसरे के साथ योग करके, समता को पाती हैं, जिससे उस साधक के भीतर से ही, उस साधक का ब्रह्मपथ स्वयंप्रकट होता है।

  • और पंच कोश विज्ञान में, ये रंग मनोमय कोश को भी दर्शाता है, लेकिन केवल तब, जब उस साधक की चेतना, अपरा प्रकृति के आठों कोषों को पार करके, परा प्रकृति में स्थित हो चुकी होती है।

इसीलिए, श्वेत रंग ही मनोमय कोश की अंतिम सगुण अवस्था है, क्योंकि इसके पश्चात, मन ब्रह्मरन्ध्र को ही पार करके, शुन्य के बाद शून्य ब्रह्म को जाके, अंततः, निर्गुण में ही लय हो जाता है।

और इसके पश्चात, वो मन निरंग या निर्गुण होके, निराकार या अनन्त होके ही शेष रह जाता है। ऐसा साधक निर्गुण ब्रह्म को पाता है और पुनः कभी भी जीव रूप में नहीं लौट पाता है।

लेकिन इसको प्राप्त होने के पश्चात, साधक की काया में प्राण विकराल हो जाते है और ब्रह्मरंध्र चक्र को पार करके, कुछ लम्बे समय तक विसर्गी ही हो जाते हैं, और ऐसी दशा में, साधक के सर के सारे बाल, खड़े हो जाते हैं I

प्राण की विसर्गी दशा, साधक के शरीर को कष्ट देती ही है I लेकिन इस दशा में साधक को शांत चित्त होके, साक्षी भाव में स्थित होके, स्वयं को ही ऐसे देखना चाहिए, जैसे वो साधक स्वयं ही स्वयं के शरीर को सुदूर से देख रहा है I प्राण विसर्गी होने पर, यदि साधक ऐसा नहीं करेंगे, तो मरणासन को ही जाएगा I

ऐसा साधक देवत्व, जीवत्व, जगतत्व, बुद्धत्व को पार करके, ब्रह्मत्व के ही निर्गुण स्वरूप में लय होके, पुनः कभी भी, किसी भी सगुण स्वरूप में नहीं लौट पाता है।

और यही कारण है, कि वेदों में, मन को पितामह ब्रह्मा के साथ बतलाया गया है, अर्थात मन के देवता स्वरूप में पितामह ब्रह्म को बतलाया गया है।

  • और अंतःकरण चतुष्टय में, ये रंग मन, बुद्धि, चित्त और अहम की सत्वगुणी अवस्था का वाचक है।
  • अन्तगति में, ये रंग ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति का वाचक है। ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति का प्रमाण, हीरे के समान प्रकाशमान ब्रह्म शरीर होता है, जिसके बारे में एक बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

 

पांचवा रंग

चमकदार भगवा

  • ये रंग लाल रंग के रजोगुण और पीले रंग की बुद्धि के योग का वाचक है।
  • जब बुद्धि निष्कलंक होके विशुद्ध रजोगुण से युक्त होती है, तो उसका रंग भगवा होता है।
  • जब बुद्धि ब्रह्म भावापन्न होकर, सर्वव्याप्त होकर, सार्वभौम स्वरूप में स्व:चालित होती है, तो भी उस बुद्धि का रंग भगवा होता है I और ये दशा कर्मातीत मुक्ति को लेके जाती है। इसीलिए, भगवा रंग कैवल्य की ओर लेके जानी वाली बुद्धि का होता है।
  • जब भी कोई साधक कैवल्य मार्गी होता है, तब उसकी बुद्धि भगवे रंग की हो ही जाती है।
  • पञ्च मुखी सदाशिव के अनुसार, ये रंग रुद्र का है, जिनकी स्वयं अभिव्यक्ति अघोर मुख से हुई थी, और इसीलिए रुद्र को स्वयंभू कहा गया था।
  • जब नीला रंग जो अघोर मुख का है, और भगवा रंग जो रुद्र का है, आपस में योग करते हैं, तो इसी अवस्था को कृष्णा पिंगल रुद्रावस्था कहा गया था। ऐसे योग के समय, भगवा नहीं रहता, बल्कि वो भगवा, पिंगल रंग का हो जाता है।
  • जब ऐसा योग, साधक के शरीर में ही होता है, तो उस समय, साधक के स्थूल शरीर में, एक कृष्ण पिंगल सिद्ध शरीर, स्वतः ही प्रकट होता है। ये कृष्ण पिंगल रुद्र का सिद्ध शरीर है। ये बहुत बड़ी सिद्धि है, क्योंकि ऐसा साधक रूद्र के ही संहार कृत्य का धारक हो जाता है।
  • पंच कोष विज्ञान में, ये लाल और नीले का योग, उड़ान प्राण का वाचक है। ये उड़ान प्राण, सदाशिव के ईशान मुख की ओर, साधक को अग्रसार कर देता है।

इसीलिए वास्तव में, उड़ान प्राण शिव के ईशान मुख का होता है, नाकि अघोर (या रुद्र) का, लेकिन उस उड़ान प्राण का प्रादुर्भाव रुद्र की कृष्ण पिंगल अवस्था से ही होता है, जो शिव के अघोर मुख का ही अंग है।

  • और पंच महाभूत विज्ञान में, ये लाल और नीले का योग, योगी को आकाश महाभूत के साक्षातकार को लेकर जाता है। आकाश महाभूत भी ईशान मुख का अंग है, नाकि अघोर का, लेकिन तब भी आकाश महाभूत का प्राथमिक साक्षात्कार, अघोर मुख से ही होता है, और ऐसे साक्षात्कार में, वो आकाश महाभूत बैंगनी वर्ण का ही होता है ।
  • अंतःकरण चतुष्टय में, ये रंग अंतःकरण की लय प्रक्रिया का वाचक है।
  • यदि ये भगवा रंग साधक के त्रिनेत्र में ही आ जाए, तो उसको ही शिव का त्रिनेत्र कहते हैं। और ये अवस्था भी आज्ञारन्ध्र से सम्बंधित निर्गुणयान का ही अंग है, जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बताऊँगा।
  • जो साधक कैवल्य मार्गी हो गया, उसकी बुद्धि भगवे रंग की ही हो जाएगी, और ऐसी बुद्धि उस साधक को लय कि ओर ही लेके जायेगी…, और कहीं भी नहीं। लय का अर्थ होता है, समाधि।
  • ये रंग धर्म के सनातन स्वरूप का भी वाचक है।
  • और ये रंग रुद्राग्नि का भी वाचक है जो साधक की समस्त विकृतियां विध्वंस कर देती है।

जब पंच कोषों की विकृति विध्वंस होती है, तब साधक को नानी तो अवश्य ही याद आएगी…, ये पक्का है।

अब तक बताई गई सारी बातों के समान, ये बात भी मैंने अपने आभास से बोली है…, नाकि किसी ग्रन्थ से I

 

छठा रंग

चमकदार हरा और उसका ही भाग, हलके हरे-धहुए जैसा रंग

  • ये रंग विशुद्ध चित्त को दर्शाता है, जो अर्धनारीश्वर, अर्थात सगुण आत्मा का है।
  • वास्तव में तो अर्धनारीश्वर की दो अवस्थाएं होती हैं।

पहली जिसमे शिव नीले और शक्ति श्वेत होती है। इस अवस्था में, अर्धनारीश्वर त्रिनेत्र में होते हैं…, और वो भी साधक के ही सगुण आत्मा के स्वरूप में।

लेकिन ऐसे साक्षात्कार और उसकी अवस्था की प्राप्ति के पश्चात, यही अर्धनारीश्वर की स्तिथि साधक के शरीर में, व्याप्त रूप में भी पाई जाएगी।

और ऐसी अवस्था में, साधक का मन ही, समता को प्राप्त हुई उसकी प्राण शक्ति से योग लगाके बैठा होगा। यही अर्धनारीश्वर सिद्धि या अर्धनारिश्वर शरीर कहलाता है जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बताऊंगा I लेकिन यहाँ बतलाया गया स्वरूप, अथर्ववेद का है I

लेकिन दूसरी अवस्था भी होती है, जो साधक को अपने पूरे शरीर में ही व्याप्त हुई  दिखती है, जिसमें शिव नीले और शक्ति लाल होती है। इसी को ही कृष्ण पिंगला रुद्र कहा गया है। इस दूसरी अवस्था में, जल तत्व हरे रंग का होता है। लेकिन यहाँ बतलाया गया स्वरूप, यजुर्वेद का है, नाकि अथर्ववेद का I

  • ये रंग भवसागर को दर्शाता है। ये रंग जल महाभूत का भी है।
  • ये रंग, रस तन्मात्र को दर्शाता है।
  • ये रंग सदाशिव के अघोर मुख और सदाशिव के तत्पुरुषा मुख के योग को भी दर्शाता है। इसका वेद अथर्ववेद है, और इसका महावाक्य, अयमात्मा ब्रह्म है।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इन्हीं रंगो के आधार पर, आगमी गुरुयुग या वैदिक युग में, भारत राष्ट्र का ध्वज बनेगा। और उस ध्वज के मध्य में, ओम का लिपि लिंगात्मक स्वरूप भी होगा।

जब ऐसा हो जाए, तो जान लेना कलयुग स्तम्भित हो चुका है, और उसी कलियुग में ही, सतयुग बस प्रकाशित होने को है।

इस बात को भी गांठ बाँध लो, क्योंकि अगामी समय ही मेरी इस बात का प्रमाण देना वाला है। ऐसा ही पहले के सारे गुरु युगों में हुआ था… और इस बार भी ऐसा ही होगा।

 

अकार की देवी का वास्तविक स्वरूप … हर एक प्रबुद्ध योग भ्रष्ट की माता जी …

अकार की देवी, अकार की देवी का वास्तविक स्वरूप, प्रबुद्ध योग भ्रष्ट की माता,
अकार की देवी, अकार की देवी का वास्तविक स्वरूप, प्रबुद्ध योग भ्रष्ट की माता,

 

इस चित्र में दिखाई हुई दशा तब साक्षातकार होती है, जब साधक की चेतना अकार की देवी के समीप पहुंच कर, उनके पास ही, उनके श्रीचरणों के समीप ही बैठ जाती है। इसलिए, ये चित्र इस बतलाये जा रहे ज्ञान के अंतिम साक्षातकार दशा का है।

अकार की देवी जो सावित्री विद्या हैं, मेरी वास्तविक माता हैं।

मैं योग भ्रष्ट हूं और प्रबुद्ध भी हूं। ऐसा अभी से नहीं हूं, बल्कि स्वयंभू मन्वन्तर से ही हूं।

जो योगभ्रष्ट प्रबुद्ध होता है, वो किसी स्थूल देही माता के गर्भ से जन्म नहीं लेता, बल्कि वो परकाया प्रवेश से ही लौटता है।

और वो परकाया प्रवेश प्रक्रिया भी इन्ही देवी से पूर्ण होती है, जिसके कारण ये अकार की देवी ही प्रत्येक प्रबुद्ध योगभ्रष्ट की वास्तविक माता भी हैं।

इन अकार की देवी के इसी स्वरूप को माँ सावित्रि सरस्वती कहा गया है।

इनमें इतनी ऊर्जा है, की जब साधक की चेतना इनके समक्ष बैठी होती है, तब साधक के शरीर में भी वज्र स्वरूप में ऊर्जाए घूम रही होती हैं I

और ये भी एक कारण है, की इन माँ सावित्रि को उग्र स्वरूप में बताया गया है।

इनके ऐसे साक्षात्कार के कुछ समय तक, साधक के मेरुदण्ड के नीचे के भाग में, इन्हीं देवी का स्वर्णिम प्रकाश दिखाई देता है।

इससे आगे मैं बताना नहीं चाहता हूँ, इसलिए इस भाग को अब समाप्त करके, अगले भाव पर जाता हूँ।

 

अकार की देवी का विराट, विश्व, और अग्नि स्वरूप

यहाँ जो बताया जा रहा है, उसमें से कुछ तो स्पष्ट रूप में है, लेकिन अधिकांश भाग सांकेतिक ही है I कुछ तथ्यों को खुल कर नहीं बताया जाता I

यहाँ बताया गया, पूर्ण रूप में भी नहीं है I  कुछ तथ्यों को तो पूर्णरूपेण बताया ही नहीं जाता I

  • अकार ही विराट है … वेदमार्ग और योगमार्ग में कहे गए विराट के मूल में, यही अकार की देवी हैं I यही अकार की देवी, अर्थात सावित्री विद्या ही विराट हैं I

ऐसा साक्षात्कार भी तब होता है, जब योगी की चेतना, ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में पहुँच कर, इन देवी के के श्रीचरणों के समीप बैठ जाती है I

 

विराट शब्द के कई अर्थ होते हैं, जैसे …

जिसने त्रिगुण सहित, प्रकृति, महत और बाकी सभी तत्त्वों को धारण किया हुआ है, और ऐसा होने के पश्चात भी वो एक सगुण साकार स्वरूप में ही प्रतीत होता है I इसके कारण विराट ही महदात्मा (महतात्मा), प्रकृतिआत्मा इतियादी भी होता है I

जिसने प्रकृति के चौबीस तत्त्वों सहित, त्रिगुणों को धारण किया हुआ है, अर्थात जो त्रिगुणों को धारण किया हुआ है, वो ही विराट है I और इसके कारण, भूतात्मा, तन्मात्रात्मा, गुणात्मा आदि शब्दों से जिसको पुकारा जाता है, वो ही विराट है I

जिसने उस काल को ही धारण किया है, जिसके गर्भ में जीव और जगत बसाया गया है, उसको भी विराट शब्द से ही पुकारा जाता है I

ऐसा धारक एक विशालकाय लेकिन सगुण साकार स्वरूप में ही पाया जाएगा, क्यूंकि इन सबका का धारक कोई छोटे आकार का हो ही नहीं सकता I

 

  • अकार ही विश्व को धारण किया हुआ, विश्व है

प्रकृति के चौबीस तत्त्वों के मूल में त्रिगुण होते हैं I प्रकृति के तत्त्वों की संगृहीत अवस्था ही विश्व कहलाता है, जो सांस्कारिक, दैविक या कारण और सूक्ष्म स्वरूप के साथ साथ, स्थूल स्वरूप में भी होता है I

जिसने उन त्रिगुणों को धारण किया है, जिनसे विश्व स्वयंउत्पन्न हुआ था, वो ही विश्व के मूल में होता है…, इसलिए वो विश्व ही कहलाता है I

ऐसे धारक के शरीरी स्वरूप में ही समस्त विश्व बसा होता है, अर्थात ब्रह्माण्ड के समस्त लोक बसे होते है I

वो जिसके सगुण साकार या शरीरी रूप में ही समस्त चतुर्दश भुवन बसा होता है, वो ही अकार है I

इसके कारण ही, वैदिक वाङ्मय में वो विराट शरीर धारी, जो निराकार सरीका ही प्रतीत होता है, उसको ही विश्व कहा गया था, और उसके शरीर का विश्व, मूलतः एक सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में ही होता है, जिसको साधारण जीव ना जान पाएंगे, और न ही धारण कर पाएंगे I

जो धारण करने योग्य हो, और जो धारण किया जा सके, वो ही अनन्त कालों तक धारण किया जा सकता है, और उसे ही धर्म कहते हैं, इसलिए अकार धर्म का मूल भी हैं I ऐसी सत्ता में से ही धर्म प्रकाषित और सुरक्षित होता है I

जो धर्म होता है, वो किसी से भी पक्षपात नहीं करता, इसलिए वो जीव जगत सहित, दैविक सत्ताओं को भी समान भाव से देखता है, और इन सब पर समान रूप में लागू भी होता है I

 

  • अकार ही अग्नि है … अकार ही अग्नि है I

लेकिन अग्नि के तो कई स्वरूप होते हैं, जैसे भूताग्नि, तन्मात्राग्नि, कोषाग्नि, ज्ञानाग्नि, चिदाग्नि, प्राणाग्नि, गुणाग्नि, कालाग्नि, इत्यादि I

यहाँ कही गई अग्नियों के भी भाग रूपी स्वरूप होते हैं I

अंत में जो अग्नि का स्वरूप होता है, उसे ब्रह्माग्नि कहते हैं, जो यह अकार की देवी ने धारण किया हुआ है I

क्यूंकि इसी ब्रह्माग्नि से बाकी सभी अग्नि स्वरूपों का स्वयंप्रादुर्भाव होता है, इसलिए इन अकार की देवी को ही अग्नि कहा गया है I

लेकिन इसका स्वज्ञान साधक को तब ही होगा, जब वो साधक इन अकार की देवी, अर्थात सावित्री सरस्वती के समीप, उनके श्रीचरणों में ही बैठ जाएगा I

 

इस भाग में मैं इससे अधिक बताना नहीं चाहता…, इसलिए अब अगले भाग जो परकाया प्रवेश का है…, उसपर जाता हूँ I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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