प्राण वायु, प्राण प्राण और नाग उपप्राण, प्राण प्राण, प्राण वात, नाग उपप्राण, नाग उपवायु, नाग लघुवायु, उत्कर्ष पथ का प्राण, उत्कर्ष मार्ग का प्राण, उत्कर्ष सिद्धांत, निर्गुण चक्र, निर्गुण लिंग, पागलनाथ, महापागलनाथ

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यहाँ पर प्राण प्राण और नाग उपप्राण, प्राण प्राण (प्राण वात), नाग उपप्राण (नाग लघुवायु), उत्कर्ष पथ का प्राण, उत्कर्ष मार्ग का प्राण, निर्गुण चक्र, निर्गुण लिंग, पागलनाथ और महापागलनाथ पर बात होगी I यह प्राण वायु हृदय क्षेत्र में अपनी नाग उपवायु के साथ निवास करती है I प्राणवायु का वर्ण पीला होता है, और इसकी गति शरीर से आगे की ओर होती है, जिसके कारण यह उत्कर्ष मार्ग का प्राण, और उत्कर्ष पथ का द्योतक भी होता है, और ऐसा होने के कारण यह प्राण उत्कर्ष सिद्धांत को भी दर्शाता है I

 

हृदयाकाश गर्भ के प्रधान भाग
हृदयाकाश गर्भ के प्रधान भाग

 

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2011 ईस्वी के प्रारम्भ का है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भत्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भत्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का चालीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये अध्याय आंतरिक यज्ञमार्ग की श्रृंखला का सातवाँ अध्याय है।

 

हृदयाकाश में प्राण गुफा का स्थान
हृदयाकाश में प्राण गुफा का स्थान

 

प्राण प्राण और नाग उपप्राण का नाता, प्राणवायु और नाग लघुवायु का नाता, प्राण प्राण और नाग लघुप्राण का नाता, प्राण प्राण और नाग लघुप्राण, प्राण वायु और नाग लघुवायु, … प्राण वायु और हिरण्यगर्भ, प्राण वायु और ज्ञान तत्त्व, प्राण वायु और विज्ञान तत्त्व, प्राण वायु और महाकारण, प्राण वायु और सदाशिव का तत्पुरुष मुख, प्राण वायु और ब्रह्माण्डीय विज्ञानमय काया, प्राण वायु और सद्योजात ब्रह्म, प्राण वायु और माँ गायत्री का हेमा मुख, …  प्राण वायु और उत्कर्ष पथ, प्राण वायु और उत्कर्ष मार्ग,  प्राण वायु और उत्कर्ष सिद्धांत, प्राण वायु और निर्गुण चक्र,  प्राण वायु और निर्गुण लिंग, प्राण वायु और उत्कर्ष पथ का प्राण, प्राण वायु और उत्कर्ष मार्ग का प्राण, … हृदय में भगवान् और निर्गुण लिंग, हृदय में परमात्मा और निर्गुण लिंग, हृदय में परब्रह्म और निर्गुण लिंग, …

 

हृदय में पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण का तंत्र
हृदय में पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण का तंत्र

 

 

प्राण गुफा के भीतर चलते चलते एक पीले वर्ण का प्रकाश दिखाई दिया I उस प्रकाश को देखकर सनातन गुरु बोले… यह प्राण वायु है, और इस प्राण के पीछे इसकी नाग उपवायु है, जो चित्त गुफा की ओर है I

 

हृदयाकाश का प्राणमय कोष
हृदयाकाश का प्राणमय कोष

 

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और सोचा, जबकि इस प्राण का वर्ण तो नाभि चक्र जैसा ही पीला है, लेकिन नाभि चक्र की तुलना में यह थोड़ा चमकदार है I और ऐसा जानने के पश्चात, उस विद्यार्थी ने अपना सर हिलाकर इस बात का संकेत भी दिया कि उसे समझ आ गया है I

सनातन गुरु बोले… जिन साधकगणों ने अपरा प्रकृति के अष्टम कोष का साक्षात्कार किया होता है, उनमें इस वायु का वर्ण चमकदार ही होता है I इसके अतिरिक्त जिस साधक की यह प्राण वायु शुद्ध हो चुकी है (अर्थात इसकी विकृतियाँ नष्ट हो चुकी है) उनमें इसका वर्ण सुनेहरा भी पाया जा सकता है I कुछ न्यून मात्राओं में और समय समय पर, यह वायु मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक पाई जाती है, और ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह वायु उस उत्कर्ष पथ को दर्शाती है, जिसके अंग सभी सप्तचक्र सहित, अष्टम चक्र भी होता है I क्यूंकि इस वायु की गति आगे की ओर होती है (अर्थात शरीर से आगे की ओर यह वायु गति करती है) इसलिए यह प्राण वायु, उत्कर्ष पथ की दशा और गति को भी दर्शाती है I

सनातन गुरुदेव बोले… जबकि यह वायु, पञ्च प्राण में मुख्य वायु सी ही प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं  क्यूँकि पञ्च वायु में कोई भी मुख्य या न्यून नहीं होती, सभी पञ्च प्राण बराबर के महत्त्व के होते हैं I लेकिन ऐसा होने पर भी, इसी वायु के नाम पर ही प्राणमय कोष में प्राण शब्द आया है, और ऐसा होने के कई सारे कारण हैं, जिनमें से एक यह है कि यह वायु सदैव ही आगे की ओर जाने वाले उत्कर्ष मार्ग की द्योतक ही है I और आगे की ओर गति के कारण यह वायु उत्कर्ष सिद्धांत की भी द्योतक होती है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने अपना सर हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरु बोले… प्राणमय कोष के भीतर इस प्राण वायु का स्थान हृदय क्षेत्र है I यह वायु का चक्र हृदय कमल (अर्थात अनाहत चक्र) होता है I जब साधक की चेतना हृदय कमल में बैठ कर, उस हृदय चक्र से लम्बवत् दिशा में देखती है, तो वह पाती है कि हृदय चक्र से लम्बवत् दिशा में एक निरंग दशा दिखाई दे रही है I यह निरंग दशा ही निर्गुण चक्र कहलाया गया था, जो एक लिंग रूप में ही होता है न कि चक्र रूप में I यह निर्गुण चक्र उन निर्गुण निराकार ब्रह्म का द्योतक है, और ऐसा होने के कारण ही योग और वेद मनीषियों ने परमात्मा का स्थान हृदय ही बताया था I और क्यूंकि यह निर्गुण चक्र, परब्रह्म का ही द्योतक होता है, इसीलिए प्राण वायु के नाम को ही अन्य सभी प्राणों से साथ जोड़ा गया था I इस निर्गुण चक्र के साक्षात्कारी योगीजन विरले ही हुए हैं, और इस कलियुग के समयखण्ड में तो इसका ज्ञान भी लुप्त हो चुका है I इसलिए इस बिंदु को तो आज के वेद और योग मनीषी भी नहीं जानते होंगे, क्यूंकि अभी के समय चल रहे कलियुग की काली काया के कारण, उनकी आज की परंपराओं में तो इसका ज्ञान और साक्षात्कार मार्ग ही नहीं बचा होगा I इस कलियुग में तो कोई विरला योगी ही होगा, जो किसी दुर्गम जनशून्य स्थान पर बैठा होगा और जिसने इस निर्गुण चक्र को साक्षात्कार किया होगा I

सनातन गुरु आगे बोले… यह निर्गुण चक्र एक निरंग प्रकाश के समान होता है I इसकी दिशा मेरुदण्ड के साथ होती है, इसलिए यह मेरुदण्ड की दिशा में ही एक निर्गुण लिंग के समान दिखाई देता है I जब साधक की चेतना हृदय कमल में निवास कर रही होती है, और वह चेतना ऊपर की ओर (अर्थात मस्तिष्क की ओर) देखती है, तब यह निर्गुण लिंग ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई लम्बे से आधे मटर जैसी निरंग दशा इस हृदय चक्र की लंबवत दिशा में मस्तिष्क की ओर दिखाई दे रही है I यही निर्गुण चक्र और निर्गुण लिंग है जिसका साक्षात्कार भी हृदय क्षेत्र के अनाहत चक्र में बसकर ही किया जाता है, और जहां यह हृदय कमल भी प्राण वायु के क्षेत्र में ही होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… साधारणतः यह निर्गुण चक्र देखा नहीं जाता है लेकिन कुछ उत्कृष्ट योगीजनों के हृदय कमल में यह एक निरंग झिल्ली के समान प्रकाश के स्वरूप में ही स्वयंप्रकट हो जाता है I और इस निर्गुण चक्र के स्वयंप्रकट होने से ही मेरा (अर्थात सनातन गुरु का) स्वयं प्रकटीकरण उस योगी के हृदय क्षेत्र की एक गुफा में हो जाता है I इस निर्गुण चक्र की लिंगरूप दशा मेरुदण्ड की दिशा में ही होती है I इस निर्गुण चक्र का स्वयं प्रकटिकरण उन्ही योगीजनों के हृदय चक्र में होता है जो निर्गुण निराकार ब्रह्म में विलीन होने का पात्र हुए हैं I और क्यूंकि ऐसे योगी दिर्लभ से भी दुर्लभ होते हैं, इसलिए इस निर्गुण चक्र का स्वयं प्रकटीकरण एक अति दुर्लभ दशा है I जिन योगीजनों के हृदय कमल में यह निर्गुण चक्र स्वयंप्रकट होता है, वह जीवित अवस्था में या देहवसान के तुरंत बाद ही निर्गुण ब्रह्म में लय भी हो जाते हैं I इसलिए यह चक्र ऐसा योगी की जीवनमुक्ति अथवा विदेहमुक्ति को प्राप्त होने की पात्रता का प्रमाण भी होता है I ऐसे योगीजन ही ईशान ब्रह्म में विलीन होकर, कैवल्य मोक्ष को प्राप्त होते हैं I

और गुरु आगे यह भी बोले… लेकिन तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) इस जन्म में सद्योमुक्ति को पाओगे और इसको पाकर, जीवन्मुक्त होकर ही अपनी काया में निवास करते रहोगे I और अंततः, देवसान के पश्चात, अपनी विदेहमुक्ति को भी पाओगे I वह समय जब तुम्हारी सद्योमुक्ति होनी है, वह बहुत निकट ही है I परन्तु सद्योमुक्ति की वह प्रक्रिया जो जीवनमुक्ति की ओर लेकर जाती है, एक अति-कष्टकारी प्रक्रिया है, इसलिए तुम्हें भी वह कष्ट आएँगे और उन कष्टों का कालखंड भी शीघ्र ही आ रहा है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इस निर्गुण चक्र की धुरी (या अक्ष या अक्षरेखा) सुषुम्ना नाड़ी के साथ-साथ और उसके भीतर ही चलती है, अर्थात इस निर्गुण चक्र की धुरी (या अक्ष या अक्षरेखा) उस दिशा में होती है जिसमें मूलाधार चक्र को सहस्रार चक्र से जोड़ने वाली नाड़ी की धुरी (या अक्ष या अक्षरेखा) होती है I जबकि यह निर्गुण चक्र एक निर्गुण लिंग के समान ही दिखाई देता है, लेकिन यह तो केवल साक्षात्कार करने हेतु ही ऐसा दिखाई देता है, और ऐसा कहने का कारण है, कि निर्गुण का कोई रूप या अरूप नहीं होता, क्यूंकि निर्गुण तो सर्वव्यापक ही होता है I इसलिए जबकि यह निर्गुण चक्र एक लिंग रूप में ही दिखाई देता है, लेकिन यदि साधक इसको ध्यानपूर्वक अध्ययन करेगा, तब यह सर्वव्यापक ही पाया जाएगा I और ऐसा होने पर भी प्राथमिक साक्षात्कार में यह निर्गुण लिंग (अर्थात निर्गुण चक्र) लम्बे से आधे मटर के समान ही दिखाई देता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… कलियुग के कालखंडों में इस निर्गुण चक्र का ज्ञान लुप्त हो जाता है, इसलिए आज के समयखण्ड में इस चक्र का ज्ञान नहीं है I लेकिन इस निर्गुण लिंग के ज्ञान के लुप्त होने के पश्चात भी, इसका सार शेष रह जाता है जिसके कारण कलियुग की काली काया के विकृत प्रभावों के पश्चात भी (अर्थात कलियुगों में भी) योगीजन परमात्मा का स्थान हृदय में है… ऐसा ही कहते हैं I वह परमात्मा जिसके बारे में योगीजनों ने कहा है, यही निर्गुण लिंग रूप में होता है I योगीजनों द्वारा इसी निर्गुण लिंग को ही हृदय में भगवान्, हृदय में परमात्मा और हृदय में परब्रह्म आदि प्रकार से बताया गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि कलियुग के कालखंड में इस निर्गुण लिंग के साक्षात्कारी योगी अतिविरले होते ही होते हैं, और क्यूंकि इस निर्गुण लिंग के साक्षात्कार से ही निर्गुण ब्रह्म के सर्वव्यापक सनातन निरंग स्वरूप का साक्षात्कार मार्ग प्रशस्त होता है, इसलिए कलियुग के कालखंडों में निर्गुण ब्रह्म के साक्षात्कारी योगीजन भी अतिविरले ही होते हैं I क्यूँकि निर्गुण चक्र का साक्षात्कार ही उन निर्गुण निराकार ब्रह्म के साक्षात्कार का मार्ग होता है, और क्यूंकि कलियुग के कालखंड में इस निर्गुण लिंग के साक्षात्कारी योगीजन या तो नहीं होते और या विरले होते हैं, इसलिए कलियुग के कालखंड में निर्गुण ब्रह्म के साक्षात्कारी योगीजन भी, या तो नहीं होते और या अतिविरले ही होते हैं I यही कारण है कि कलियुगों में, योगीकन और वेद मनीषी कहते ही है, कि …

निर्गुण को कौन जान पाया हैकोई भी नहीं I

आत्मा को कौन जान पाया हैकोई भी नहीं I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव अपनी ऊँगली से एक दिशा में दिखाते हुए बोले… वहां देखो, वह रहा निर्गुण चक्र जो हृदय कमल से लम्बवत्त दिशा में अपने निर्गुण लिंग रूप में ही दिखाई दे रहा है I

नन्हें विद्यार्थी ने उस निरंग लिंग रूप को देखा और सोचा, कितने दुःख की बात है कि हृदय कमल में बसे हुए निर्गुण ब्रह्म के लिंगात्मक स्वरूप का ज्ञान आज बचा ही नहीं… कितने दुःख की बात है कि इस के निर्गुण चक्र का ज्ञान जो कैवल्य मोक्ष को ही दर्शाता है, उसके और उसके मार्ग के बारे में आज कोई बात करता ही नहीं I और कितने दुःख की बात है, कि यह निर्गुण चक्र जो उन कैवल्य मोक्ष स्वरूप परब्रह्म का मार्ग ही है, उसके बारे में आज कोई जानता ही नहीं I और उसी समय उस नन्हे विद्तारथी ने हृदय चक्र का साक्षात्कार भी किया I इस साक्षात्कार के पश्चात, उस नन्हें विद्यार्थी ने अपने सनातन गुरुदेव के मुख की ओर देखा और अपना सर हिलाकर संकेत भी दिया, कि उसे समझ में आ गया है I

और इसी समय उस नन्हें विद्यार्थी ने सूर्य चक्र और चंद्र चक्र का भी साक्षात्कार किया जिनकी ओर उसके सनातन गुरु ने उनकी अपनी ऊँगली से दिशा संकेत किया था I

और ऐसे समय सनातन गुरुदेव बोले… यह सूर्य और चंद्र चक्र हैं, जो हृदय चक्र से थोड़ा सा नीचे की ओर होते हैं, और इनका स्थान गर्भ-निरोधक टोपी (अर्थात उदर डायाफ्राम या उदर झिल्ली) के समीप होता है I इसमें से सूर्य चक्र प्रकाशमान होता है, और चंद्र चक्र का प्रकाश थोड़ा कम ही होता है I यह दोनों चक्रों में से, सूर्य चक्र का नाता सूर्य नाड़ी (अर्थात तैजस नाड़ी या पिङ्गला नाड़ी) से है, और चंद्र चक्र का नाता इड़ा नाड़ी से होता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने अपना सर हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरुदेव बोले… पिङ्गला नाड़ी का नाता रुद्र देव से है, जो निन्यानवें आंतरिक अश्वमेध यज्ञ सिद्धि के द्योतक हैं I और इड़ा नाड़ी का नाता इंद्र देव से है, जो एक-सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ सिद्धि के द्योतक हैं I सुषुम्ना नाड़ी का नाता एक सौ एकवी आंतरिक अश्वमेध सिद्धि से है, जो पितामह ब्रह्म की द्योतक है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब अपने ही संपूर्ण जीवकाल में कोई योगी निन्यानवे आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लेता है, तब वह रुद्र स्वरूप हो जाता है और वह योगी ही एकादश रुद्र का संपूर्ण स्वरूप कहलाता है… तुमने इस स्वरूप को एक पूर्व के महाकल्प में पाया था I और जब वह योगी एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण पर लेता है, तब वह इंद्र स्वरूप हो जाता है और इंद्रासन पाने का पात्र भी बन जाता है… तुमने इस स्वरूप को इसी महाकल्प के इसी कल्प में पाया था I और जब वह योगी एक सौ एक आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लेता है, तब वह ब्रह्मा के पद का ही पात्र बन जाता है, और आगामी किसी काल में वही योगी महा ब्रह्माण्ड का पितामह ब्रह्मा बनता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… तुमने अब तक एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिए हैं, और अब तुम एक सौ एकवें पर जाओगे और इसी का मार्ग प्रशस्त करने हेतु मेरा आंतरिक अवतरण तुम्हारे हृदय गुफा में हुआ हैं I और जहां यह एक सौ एकवां आंतरिक अश्वमेध यज्ञ भी तुम्हारे स्वयम्भू मन्वन्तर के मनस पिता,ब्रह्मर्षि क्रतु के आदेशनुसार ही होगा क्यूंकि उन्होंने अपने सभी मनस पुत्रो को यही आदेश दिया था, कि जबतक तुम सब एक सौ एक आंतरिक अश्वमेध पूर्ण नहीं करोगे, तकतक तुम्हारी मुक्ति भी नहीं होगी और तुम सब मनस पुत्र और पुत्रियां, प्रबुद्ध योगभ्रष्ट होकर ही किसी न किसी लोक में, उस लोक की काया को पाकर, आते जाते रहोगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… निन्यानवे आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करके, उस योगी की चेतना समस्त जीवों की पिङ्गला नाड़ी (सूर्य नाड़ी) में निवास करने लगती है I एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करके, उस योगी की चेतना समस्त जीवों की ईड़ा नाड़ी (चंद्र नाड़ी) में निवास करने लगती है I एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करके, उस योगी की चेतना समस्त जीवों की सुषुम्ना नाड़ी में निवास करने लगती है I सुषुम्ना नाड़ी ही वह सरस्वती नाड़ी जिसको प्राप्त हुआ योगी सारस्वत कहलाता है I इस सरस्वती नाड़ी के भीतर ही ब्रह्मा नाड़ी है, और जिसके भीतर चित्रिणी नाड़ी भी निवास करती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… पिङ्गला नाड़ी रुद्रत्व को दर्शाती है, जो शक्तिमान के सर्व कल्याणकारी शिवत्व के रजोगुणी अर्थात, कार्यत्व (या कर्मत्व) का द्योतक है I इड़ा नाड़ी इंद्रत्व को दर्शाती है, जो समस्त देवत्व का द्योतक है I सरस्वती नाड़ी ज्ञानत्व और चेतनत्व को दर्शाती है, जो समस्त शाक्तत्व का द्योतक है I इन सबसे ऊपर (या आगे) ब्रह्म नाड़ी ब्रह्मत्व को दर्शाती है, जो प्रजापति का द्योतक है I चित्रिणी नाड़ी उस ब्रह्मत्व के ही शिवत्व, शाक्तत्व, गणपत्व और विष्णुत्व सहित, समस्त महाकारणत्व की द्योतक है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और वह वज्रदण्ड जो इस चित्रिणी नाड़ी की ही सहस्रार से परे की अवस्था है, वह हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म को दर्शाती है, जो लिंग चतुष्टय स्वरूप में इस नाड़ी के सिद्ध साधक की काया में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में ही स्वयंप्रकट होते हैं I और इससे आगे जो निरालम्ब चक्र है, वह ब्रह्मलोक का द्योतक है I और इसी निरालम्ब चक्र का मध्य भाग, शून्यता और पूर्णता, दोनों का ही समान  द्योतक है, इसलिए यह निरालम्ब चक्र का मध्य स्थान ही शून्य ब्रह्म (अनंत शून्य और शून्य अनंत) कहलाया है, और जो नारायणत्व सहित, सदाशिव, महाब्रह्म और अदि पराशक्ति के समस्त स्वरूपों का भी का द्योतक है, और उनके अनुग्रहत्व सहित पञ्चकृत्य सिद्धि का भी का द्योतक है जो ब्रह्म की समस्त रचना और रचना के तंत्र की सिद्धि को भी दर्शाता है, और इन सबका जो धारक योगी होता है, वही अतिमानव कहलाता है I

नन्हा विद्यार्थी अपनी स्तम्भित दशा में ही यह सब सुनता गया I

 

सनातन गुरुदेव बोले… अपने एक बहुत पूर्व के जन्म में जब तुम वह सम्राट थे, जो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का शिष्य सत्यवर्त था, तुमने (अर्थात नन्हे विद्यार्थी ने) इस देवराज इंद्र की सिद्धि को पाया था I और इस देवराज के इंद्रासन की सिद्धि पाकर भी तुमने इसको त्याग दिया था, जिसके पश्चात तुम ही त्रिशंकु कहलाए थे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब सौवीं अश्वमेध सिद्धि के एक भाग को त्यागा जाता है, तब वह त्यागी त्रिशंकु की दशा को पाता है I और तुमनें भी ऐसा ही किया था, उन पितामह ब्रह्मा की वाणी का मान रखने के लिए, जिसमें पितामह ब्रह्म ने इंद्रदेव के सिंघासन को आशीर्वाद दिया था, कि जबतक कोई इंद्र परंपरागत प्रकार से और अपने जीव काल में ही एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ सिद्ध करके इस इंद्रासन नामक सिंहासन पर बैठेगा, तबतक इस सिंघासन पर कोई और नहीं बैठ पाएगा, जिसके कारण कुछ भी हो जाए, इंद्रासन इंद्र के पास ही रहेगा I

और हृदय के सनातन गुरुदेव यह भी बोले… और ऐसा जानकार तुमने अपनी सौवीं आंतरिक अश्वमेध सिद्धि के एक अंतिम भाग का त्याग किया था, जिसके कारण तुम ही त्रिशंकु सिद्धि को पाकर, उसी सिद्धि के नाम से जाने गए थे I और क्यूंकि तुमने अपनी सिद्धि के उस अंतिम भाग का त्याग भी पितामह ब्रह्म के शब्दों का मान रखने के लिए ही किया था, इसलिए ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा तुम्हें उसी समय चुन लिया गया था, इसी आंतरिक अश्वमेध यज्ञ के अगले चरण के लिए, जो उसी आंतरिक अश्वमेध यज्ञ का एक सौ एकवां भाग है, और जो पितामह ब्रह्म सिद्धि ही कहलाता है I आंतरिक अश्वमेध यज्ञ की एक सौ एकवीं सिद्धि को महाब्रह्म प्रजापति सिद्धी भी कहा जाता है और इसी सिद्धि के मार्ग पर महाब्रह्माण्ड भी सिद्ध करा जाता है I इसी सिद्धि के मार्ग में हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म सिद्धि भी पाई जाती है, इसलिए यह एक बड़ी ही विशालकाय और विचित्र सिद्धि है I महाब्रह्माण्ड के संपूर्ण इतिहास में, इस सिद्धि के उतने योगी भी नहीं पाए हैं जिनको अपने एक ही हस्त की उँगलियों पर पूर्णरूपेण गिना जा सके क्यूंकि ऐसी गणना में उस एक हस्त की उँगलियाँ ही अधिक हो जाएंगी I पर इन सभी सिद्धियों का मार्ग देवराज इंद्र और त्रिशंकु नामक सिद्धियों से ही जाता है, लेकिन दुखवश आज के कलियुगी वेद मनीषी तो देवराज इंद्र सहित, उस इंद्रपद सिद्ध का जो त्रिशंकु होता है, दोनों को ही बुरा भला ही कहते हैं I

नन्हा विद्यार्थी इन सभी बिंदुओं जानता ही था, क्यूंकि उसको उसके पूर्व जन्म का स्मरण था ही, इसलिए उसने अपना सर हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह दोनों चक्र (अर्थात चंद्र और सूर्य चक्र) पृथक से प्रतीत होते हुए भी, इनकी ऊर्जाएँ एक दुसरे से योग करी होती है इसलिए तुम्हारे (अर्थात नन्हें विद्यार्थी के) अद्वैत योगमार्ग के दृष्टिकोण से इनको एक ही मानना चाहिए I सूर्य चक्र की तुलना में जबकि चंद्र चक्र का प्रकाश थोड़ा न्यून सा ही दिखाई देता है, लेकिन तब भी इसे प्रकाश से रहित नहीं मानना चाहिए I सूर्य चक्र की तुलना में, चंद्र चक्र का प्रकाश थोड़ा कम ही होता है, इसलिए जब सूर्य चक्र की ऊर्जा में बैठकर इस चंद्र चक्र को देखा जाएगा, तो यह अँधेरे सा ही प्रतीत होगा, लेकिन ऐसा होने पर भी यह चंद्र चक्र में कोई अँधेरा नहीं होता I पर ऐसा होने पर भी, योगमार्ग में इन दोनों चक्रों से ही प्रकाश और रात्रि की योगावस्था का ज्ञान और साक्षात्कार होता है I इसलिए यह दोनों चक्रों के उर्जाओं की योगदशा, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की योगसिद्धि को भी दर्शाती है, और जहां यह एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धि है I

नन्हें विद्यार्थी जो गुरुवाणी के अनुसार यह सब देख भी रहा था, उसने सोचा, कितने दुःख की बात है कि आज इन दोनों चक्रों का ज्ञान भी लुप्त सा ही हो गया है I और इसके पश्चात उस नन्हे शिष्य ने अपना सर हिलाकर अपने गुरुदेव को संकेत भी दिया, कि वो समझ गया है I

 

हृदय में बैठे सनातन गुरुदेव ने अपनी ऊँगली से एक दिशा की ओर दिखाया और बोले… इस निर्गुण चक्र के लिंगरूप की धुरी (या अक्षरेखा) की ओर देखो और जानो कि यह निर्गुण लिंग की दशा अन्य सभी चक्रों से लम्बवत्त दिशा की ओर ही है और इस चक्र की धुरी (या अक्ष या अक्षरेखा) मेरुदण्ड के साथ साथ ही है I और इस चक्र के निरंग प्रकाश का योग भी हृदय चक्र के प्रकाश से हो रहा है, जिसके कारण हृदय कमल में भी एक निरंग प्रकाश दिखाई दे रहा है I और यदि इस निर्गुण लिंग रूपी निर्गुण चक्र का अध्ययन ध्यानपूर्वक किया जाएगा, तो यह भी जाना जाएगा कि इसका निरंग प्रकाश सभी दिशाओं और दशाओं में व्यापक ही है, जिसके कारण यह भी जाना जाएगा कि इस चक्र का प्रकाश अनंत दूरी तक ही व्यापक है I इसी से साधक यह जानता है कि…

जब निर्गुण शब्द का योग निरकार से होता है, तब वह निराकार ही अनंत होता है I

 

सनातन गुरुदेव बोले… निर्गुण निराकार ही अनंत ब्रह्म है, और अनंत को ही श्रीमन नारायण, श्री हरी, परमेश्वर, परपरमेश्वरी,  सदाशिव आदि कहा जाता है I यही कारण है कि निर्गुण चक्र से ही उन अनंत का साक्षात्कार होता है, जिनको वेद मनीषि निर्गुण निराकार ब्रह्म, परब्रह्म, निर्गुण ब्रह्म और परमात्मा आदि नामों से भी पुकारते हैं I और इसी कारणवश वेद मनीषियों ने कहा था, कि हृदय में ही उन अनंत नारायण (अर्थात परमात्मा) का निवास स्थान है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इसी निर्गुण चक्र के निर्गुण लिंग और व्यापक स्वरूप के साक्षात्कार से उन निर्गुण निराकार और उनके स्वयंप्रकाश (या स्व:प्रकाश) मूल-स्वरूप को परिभाषित भी करा जाता है I इसलिए अब इन परिभाषाओं को ध्यानपूर्वक सुनो क्यूंकि इन परिभाषाओं में मुक्तिमार्ग ही बताया जा रहा है…

जो सबकुछ, सबका मूल और गंतव्य, तीनों पूर्णरूपेण है, वह निर्गुण निराकार है I

जो सर्वमूल, सर्वस्व और सर्वगंतव्य तीनों समानरूपेण है, वह निर्गुण निराकार है I

जो सबको प्रकाशित करता हुआ भी, स्वयं ही स्वयं में गुप्त है, वह स्व:प्रकाश है I

जो सर्वव्यापक होता हुआ भी, अधिकांश के साक्षात्कार में नहीं है, वह स्व:प्रकाश है I

वो सर्वव्यापक जो मन बुद्धि चित्त अहम् और प्राणों से अतीत है, वह स्व:प्रकाश है I

जो उत्कर्ष का गंतव्य, कैवल्य मोक्ष होता हुआ भी, उत्कर्षमूल उत्कर्षपथ, उत्कर्षतंत्र और उत्कर्षमार्गी जीव जगत भी हुआ है, वह स्व:प्रकाश है, वही निर्गुण निराकार है I

जो अपनी अभिव्यक्ति रूपी तारतम्य में प्रतीत होता हुआ भी, वास्तव में सबका सर्वसाक्षी अभिव्यक्ता ही है, वह अद्वैत है, स्व:प्रकाश है, वही निर्गुण निराकार है I

जो निर्गुण निराकार होता हुआ भी, सगुण निराकार, सगुण साकार, सगुण निर्गुण साकार, सगुण निर्गुण निराकार, शून्य, शून्य ब्रह्म और सर्वसम हुआ है, वही निरालम्ब निर्विकल्प निरंजन तुरीयातीत सर्वात्मा है, वही आत्मा है, वही स्व:प्रकाश ब्रह्म है I

जिसकी अभिव्यक्तियाँ ही अणुरूप से लेकर जीव और जगत रूप में हैं, और जो विराटरूप और विश्वरूप भी हुआ है, वही सर्वाभिव्यक्ता, है, वही निर्गुण निराकार है I

जो सर्वातीत, सर्वमूल, और सर्वगंतव्य होता हुआ भी, सर्वरूप में अभिव्यक्त हुआ है, वही सर्वसाक्षी, स्व:प्रकाश, सर्वव्यापक, सर्वकालात्मक, सर्वगर्भात्मक निर्गुण निराकार है I

जिसको जानकार भी उसको पूर्णरूपेण बताया न जा सके, वही निर्गुण निराकार है I

जो भूतातीत, तन्मात्रातीत, गुणातीत, कालातीत, लोकातीत, कर्मातीत, फलातीत, संस्कारातीत, जीवातीत, जगतातीत, पिण्डातीत, ब्रह्माण्डातीत, भावातीत, इच्छातीत, मनातीत, बुद्धितीत, चित्तातीत, अहमातीत, प्राणातीत, भेदातीत, कोषातीत, दिशातीत, मार्गातीत, ग्रंथातीत, दशातीत,रचनातीत, सिद्धांतातीत, तंत्रातीत और सर्वातीत पूर्ण संन्यासी होता हुआ भीसब हुआ हैवही निर्गुण निराकार है, वही स्व:प्रकाश है

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरुमुख की ओर देखकर, अपना सर हिलाकर गुरु को इसका पुष्टिकारी संकेत भी दिया I

 

गुरु बोले… हृदय कमल के भीतर दिखाई देता हुआ यह निर्गुण लिंग रूपी निर्गुण चक्र ही वह निर्गुण निराकार है, और यही स्व:प्रकाश ब्रह्म का द्योतक भी है I और जब यह निर्गुण चक्र अपने निर्गुण लिंग स्वरूप में साधक को उसके अपने हृदय में ही चलित हो रहे, आंतरिक योगमार्ग में साक्षात्कार होता है, तो यही निर्गुण चक्र उन निर्गुण निराकार ब्रह्म का चिन्ह भी होता है I इसी के साक्षात्कार से साधक उन निर्गुण ब्रह्म के सर्वव्यापक अनंत स्वरूप का साक्षात्कार अपने आत्मस्वरूप में ही करता है I निर्गुण निराकार का साक्षात्कार मार्ग भी स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य में बसकर ही प्रशस्त होता है, क्यूंकि इसके साक्षात्कार का कोई और मार्ग हुआ ही नहीं है I इसलिए जब कोई साधक इस निर्गुण लिंग के साक्षात्कार का पात्र बनता है,  तब इसके साक्षात्कार का मार्ग भी साधक की काया के भीतर ही स्वयंप्रकट होगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यही कारण है कि निर्गुण निराकार जो सर्वव्यापक स्व:प्रकाश ही है, वह…

उसका साक्षात्कार करके भी, वह अपने पूर्णस्वरूप में अवर्णनीय ही है I

ग्रंथों और महावाक्यों में सूक्ष्मरूप में दर्शाए जाने पर भी, वह ग्रंथातीत है I

मन बुद्धि चित्त अहम् और प्राणों से वह अतीत है, यह सब उसको नहीं जानते  हैं I

स्वयं ही स्वयं में वह बोधगम्य होता हुआ भी, शब्दों से परे है, शब्दातीत है I

वह योगमार्ग से जाना तो जा सकता है लेकिन उसका पूर्णवर्णन असंभव ही है I

पिण्ड ब्रह्माण्ड में व्यापक होता हुआ भी, उसको न पिण्ड जानता है, न ही ब्रह्माण्ड I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले…

चित्त के प्रपंचों से परे, वह संस्कार रहित है, वही संस्कारातीत है, वही चिदाकाश है I

वह संकुचित अहंकार से परे है, वह विशुद्ध विश्वरूप अहम् है, वही अहमाकाश है I

बुद्धि से परे, निष्कलंक ज्ञान विज्ञान रूप में वह पूर्णस्थित है, वही ज्ञानाकाश है I

मन की सदैव गतिशील दशा से वह परे है, वह पूर्णस्थिर ही है, वही मनाकाश है I

प्राणों के खण्डित स्वरूप से परे, वह सार्वभौम एकसत्ता ही है, वही प्राणाकाश है I

वही ज्ञानात्मक, चिदात्मक, अहमात्मक, मनात्मक है, और वही भी प्राणात्मक है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… वह जो निर्गुण निराकार ब्रह्म ब्रह्म है…

वही सर्वाभिव्यक्ता है, सर्वमूल सर्वगंतव्य है, वही सर्व रूपों में भी अभिव्यक्त हुआ है I

उसी को एकेश्वर कहा गया है, वही एकेश्वरी भी है, वह लिंगादि भेद से अतीत है I

उसको प्राप्त किया ही नहीं जाता, क्यूंकि वह कर्मों और कर्मफलों से अतीत है I

वह एकेश्वर जो एकेश्वरी भी है, लिंगातीत है, उसको केवल प्राप्त हुआ जाता है I

जो तुम अपनी वास्तविकता में अनादि कालों से हो, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

उसको प्राप्त होने का मार्ग अनुग्रह सिद्धि हैऐसा योगी, अनुग्रह सिद्ध है I

अनुग्रह सिद्धि से ही उस निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश को जाना जाता है

जो उसके अनुग्रह में ही नहीं आया है, वह उसको प्राप्त भी नहीं होगा I

अधिकांश अनुग्रह सिद्ध, उसको जानकार देहवसान को ही पाते हैं I

इसलिए महाब्रह्माण्ड में उसके जीवित ज्ञाता, अतिदुर्लभ ही हैं

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरु बोले… यह सब साक्षात्कार, जो योगमार्ग के अंतिम साक्षात्कार ही होते हैं, वह हृदय क्षेत्र में बसे हुए निर्गुण चक्र के लिंगरूप के साक्षात्कार से आगे जाकर ही होते हैं I और क्यूँकि हृदय क्षेत्र की वायु को ही प्राण कहा गया है, इसलिए यही प्राण नामक शब्द, पञ्च वायु के उत्कर्ष पथ स्वरूप को भी दर्शाता है क्यूंकि उत्कर्ष मार्गों में गति प्रदान करने की क्षमता इस प्राण वायु में ही होती है I इस प्राण वायु की महिमा यह भी है, कि इसी के क्षेत्र में वह निर्गुण निराकार जो स्व:प्रकाश ही है, उसका प्राथमिक आंतरिक साक्षात्कार होता है I और यह भी वह कारण था, कि इस प्राण वायु के नाम पर ही प्राणमय कोष का नाम आया था I

इसके पश्चात सनातन गुरु अपनी ऊँगली से दिखाते हुए आगे बोले… देखो, उस हृदयाकाश में भी यही निर्गुण तत्त्व दिखाई देने लगा है I

नन्हें विद्यार्थी ने गुरुदेव की ऊँगली की दिशा में देखा और अपने गुरुदेव के श्रीमुख की ओर देखकर, उनको नमन करके बोला… जी मेरे भगवन्, ऐसा ही है I

 

इसपर सनातन गुरु बोले… किसी भी जन्म में, यदि किसी भी साधक को एक बार भी निर्गुण का साक्षात्कार हो गया, तो उसके पश्चात वह साधक सभी दशाओं के भीतर और सभी दशाओं को घेरे हुए, उसी निर्गुण को देखते ही जाता है I ऐसा साधक ही उस निर्गुण को सर्वव्यापक कहता है, पर इस महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, ऐसे साधक अतिविरले ही हुए हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने भी ऐसा ही देखा, लेकिन इस निर्गुण निराकार साक्षात्कार के तुरंत बाद उस नन्हें विद्यार्थी को विशवास होने लग गया, कि उसके गुरुदेव कोई वृद्ध से, पतले से, फटे पुराने भगवे वस्त्र पहने हुए साधुबाबा नहीं हैं, बल्कि वह कोई बहुत बड़ी सत्ता ही हैं, जो उस विद्यार्थी के हृदय में किसी महाप्रक्रिया से, जो इस जीव जगत के ज्ञान में नहीं है, और इस जीव जगत से अगम्य ही है, उससे ही अवतरित हुए हैं I

ऐसा उस नन्हें विद्यार्थी ने इसलिए सोचा, क्यूंकि जिस साक्षात्कार के लिए योगीजन कई महाकल्प तक लगा देते हैं, उसको उस मूर्खानंद नन्हें विद्यार्थी ने इतने कम समय में ही साक्षात्कार कर लिया था I

 

निर्गुण निराकार साक्षात्कार, स्वयंप्रकाश साक्षात्कार, स्व:प्रकाश साक्षात्कार, निर्गुण निराकार का साक्षात्कार, स्वयं प्रकाश का साक्षात्कार, स्व:प्रकाश का साक्षात्कार, गुरु अनुग्रह मार्ग, … गुरु ही ब्रह्मा विष्णु शिव देवी और गणेश हैं, गुरु ही ब्रह्मा विष्णु और महेश हैं, गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश हैं, गुरु ही रुद्र हैं, गुरु ही देवी हैं, गुरु ही शिव हैं, गुरु ही परब्रह्म हैं, गुरु ही नारायण हरी हैं, गुरु ही सदाशिव हैं, गुरु ही माता और पिता हैं, गुरु ही सखा हैं, गुरु ही इष्ट हैं, गुरु ही पञ्च देव हैं, गुरु ही त्रिदेव हैं, गुरु ही पिण्ड और ब्रह्माण्ड हैं, गुरु ही जीव जगत हैं, गुरु ही आत्मा हैं, गुरु ही ब्रह्म हैं, गुरु ही शिष्य रूप में अभिव्यक्त हुए हैं, गुरु ही शरीर रूपी अयोध्यापुरी के सम्राट हैं, गुरु ही शरीरी लोकों के बालगोपाल हैं, गुरु ही शरीरी गोलोक के गोपाल हैं, गुरु ही विश्वकर्मा है, …

नन्हें विद्यार्थी ने अपने पूज्य गुरुदेव से प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा, पूर्व में आप बोले था, कि निर्गुण निराकार जो स्व:प्रकाश ही हैं, उनको बस कुछ ही विरले साधकगण जानते हैं, लेकिन अभी तो मैं उन निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश को सभी ओर और सबमें ही देख रहा हूँ… स्वयं में और आपमें भी उन्ही निर्गुण निराकार को देख रहा हूँ… ऐसा क्यों हुआ है? I

इसपर नन्हें विद्यार्थी के ही हृदय में बैठे हुए सनातन गुरुदेव बोले… जब कोई साधक इस निर्गुण का यह लिंगरूप साक्षात्कार करके, इसी निर्गुण के अनंत स्व:प्रकाश स्वरूप का साक्षात्कारी भी हो जाता है, तब उस साधक को इस समस्त जीव जगत और उसके सभी भागों में और उन भागों को घेरे हुए भी, केवल यही निर्गुण निराकार स्वयं प्रकाश दिखाई देने लगता है I और अंततः, ऐसा साधक को यह बोध भी होता है, कि यही निर्गुण निराकार जो स्व:प्रकाश कहलाया गया है, वही एकमात्र है, सभी और सबकुछ का वास्तविक स्वरूप भी वही निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश ही है I ऐसा साधक उसी निर्गुण निराकार को अपने और समस्त जीव जगत के आत्मस्वरूप में भी देखता है और जान जाता है, कि वेदांत द्वारा घोषित किए गए वाक्य “ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः:” का वास्तविक, अर्थात आत्मिक अर्थ क्या है I

सनातन गुरुदेव बोले… क्यूंकि उन निर्गुण निराकार के सीधे-सीधे साक्षात्कारी योगीजन अतिविरले ही होते हैं, इसलिए तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) भी इसी प्रकार के ही योगी हो I जो योगीजन उस स्व:प्रकाश निर्गुण अनंत तत्त्व का बस एक बार भी सीधा-सीधा साक्षात्कार कर लेते हैं, वह उस निर्गुण के समष्टि स्वरूप को ही, उन निर्गुण निराकार ब्रह्म के सर्व, सर्वमूल, सर्वगंतव्य रूप में और जीव जगत के समस्त भागों के भीतर और बाहर भी समानरूपेण और पूर्णरूपेण देखते हैं I इसलिए, जबकि ऐसा योगी उन निर्गुण निराकार ब्रह्म की किसी अभिव्यक्ति की ओर ही देख रहा होगा, लेकिन तब भी उस योगी को उस ब्रह्म अभिव्यक्ति के भीतर और उस अभिव्यक्ति को घेरे हुए, वही निर्गुण निराकार ब्रह्म, उनके स्वयं प्रकाश स्वरूप में ही प्रतीत होंगे I इसलिए ऐसे योगीजन, इस महाब्रह्माण्ड और उसके समस्त भागों में बस उन्ही निर्गुण निराकार ब्रह्म को देखता है I उसको और कुछ दिखाई ही नहीं देता है, और ऐसा योगी उसके अपने आत्मस्वरूप में भी वही ब्रह्म को पाता है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि ब्रह्म ही सर्वव्यापक है और जहां इस सर्वव्यापक शब्द का अर्थ, इस समस्त ब्रह्म रचना की अवस्थाओं के भीतर और बाहर की सभी स्थितियों से संबद्ध है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ध्यान देना क्यूंकि यह उत्कर्ष पथ के ब्रह्मपथ स्वरूप को दर्शाते हुए बिंदु हैं…

ब्रह्म साक्षात्कारी भी ब्रह्म ही होता है

तुम वही हो जिसका तुमनें साक्षात्कार किया है I

जो उस ब्रह्म को जानता है, वह भी वही ब्रह्म हो जाता है I

ब्रह्म ही ब्रह्म का ज्ञाता होता है, … ब्रह्म का ज्ञाता ही ब्रह्म होता है I

यदि ब्रह्म को जानना है, तो अपनी आंतरिक स्थिति में ब्रह्म ही हो जाओ I

अपनी आंतरिक स्थिति में ब्रह्म हुए बिना, ब्रह्म को जाना ही नहीं जा सकता है I

जो योगी ब्रह्म को एक बार जान गया, वो अनादि कालों तक ब्रह्म ही कहलाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर भी विशेष ध्यान देना क्यूंकि यह ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मदृष्टा, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मस्थित ऋषि के लक्षण होते हैं…

जो ब्रह्म को जानकर मानता है कि उसको पूर्णरूपेण जानता है, वह अज्ञानी ही है I

जो उसको जानकर भी मानता है, कि उसको पूर्णरूपेण नहीं जानता है, वही ज्ञानी है I

इसीलिए उसके वास्तविक ज्ञानी उसको कुछ ही शब्दों में बताकर, शांत हो जाते हैं I

और अज्ञानी, उसको विस्तारपूर्वक बताने के प्रयत्न में, अंततः मूर्ख ही कहलाते हैं I

इसीलिए तो वैदिक वाङ्मय में ब्रह्मदृष्टाओं ने महावाक्यों का आश्रय लिया था I

 

सनातन गुरुदेव बोले… ऐसा इसलिए है क्यूंकि…

अपरिभाषित को विस्तारपूर्वक बताया नहीं जाता, उसको तो केवल दर्शाया जाता है I

ब्रह्म जो अनंत ही है, उसका वर्णन कैसे करोगेउसका तो केवल दर्शन ही होता है I

अभिव्यक्ति में क्षमता ही नहीं कि अपने अभिव्यक्ता का पूर्णवर्णन वर्णन कर सके I

इसलिए अभिव्यक्तियों के ब्रह्मपथ को प्रशस्त करने हेतु, वैदिक महावाक्य आए थे I

जीव रूपी अभिव्यक्ति होकर, जगत रूपी अभिव्यक्ति में ही बसकर, अपने जीवातीत और जगतातीत अभिव्यक्ता का पूर्णरूपेण वर्णन कैसे करोगे?… कर ही नहीं पाओगे I

अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता को निर्गुण स्वरूप में किसी लोक में स्थापित भी नहीं कर पाई हैउस अभिव्यक्ता को महावाक्यों द्वारा ख्यापित किया जाता है I

 

सनातन गुरुदेव बोले… इन सभी बिंदुओं पर भी ध्यान पूर्णकेन्द्रित करो…

निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश का साक्षात्कार भी, अपनी काया के भीतर ही होता है I

इस साक्षात्कार में, साधक का आत्मस्वरूप ही निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश होता है I

इसलिए यदि निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश को जानना है, तो स्वयं ही स्वयं में जा I

इस मार्ग में योगी अपने आत्मस्वरूप में ही निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश को पाएगा I  

इस मार्ग के अंत में योगी ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में, ब्रह्म ही होगा I

यह आंतरिक मार्ग जो स्वयं ही स्वयं में जाता हैवह ब्रह्मपद ही प्रदान करता है I

तू भी स्वयं ही स्वयं में जा, और अंततः वह निर्गुण निराकार स्व:प्रकाश ही हो जा I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने गुरुमुख की ओर देखकर, अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

गुरु आगे बोले… वह निर्गुण निराकार ही सबकुछ हुआ है, और यह सबकुछ ही उस निर्गुण निराकार की अभिव्यक्तियाँ हैं I इसलिए उस निर्गुण निराकार की अभिव्यक्तियों को ही सगुण निराकार, सगुण साकार, सगुण निर्गुण निराकार, सगुण निर्गुण साकार कहा जाता है I और इसके अतिरिक्त वह निर्गुण निराकार ही शून्य, शून्य ब्रह्म, और सर्वसम तत्त्व भी हुआ है I वही निर्गुण निराकार चौबीस तत्त्वों में अभिव्यक्त हुआ है और वही उन तत्त्वों का मूल, त्रिगुण भी हुआ है I यह सब भी उसी निर्गुण निराकार की अभिव्यक्तियाँ हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… वही निर्गुण निराकार सगुण ब्रह्म भी हुआ है और वही निर्गुण ब्रह्म भी है I वही निर्गुण निराकार समस्त देवत्व बिंदु और उनकी दिव्यताएं भी है I वही निर्गुण निराकार ही स्थूल, सूक्ष्म, कारण या दैविक और संस्कारिक जगत और इन सब जगत के जीवादि स्वरूपों के भीतर और उनको घेरे हुए भी… और उन्ही स्वरूपों में ही प्रकाशित हो रहा है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि…

जीव जगत रूप में, उस निर्गुण निराकार ने अपने सिवा कुछ और बनाया ही नहीं I

वास्तव में तो वह निर्गुण निराकार उसके अपने सिवा कुछ और बना पाया ही नहीं I

इस महाब्रह्माण्ड में जो भी था, है या होगा, वह सबकुछ वही निर्गुण निराकार ही है I

जीव जगत में जो भी है, वह सब निर्गुण निराकार ही हैअबसे तू ऐसा ही मान I

ऐसा मानकर, इस जीव जगत के समस्त भागों में, उसी निर्गुण निराकार को देख I

शनैः शनैः, जीव जगत में बसकर भी, तू इससे अतीत, कैवल्य मुक्त हो जाएगा I

नन्हा विद्यार्थी की पूर्व की शंका, कि उसके हृदय में बसे हुए सनातन गुरुदेव कोई साधारण से साधुबाबा नहीं, बल्कि वह कोई बहुत बड़ी सत्ता ही है, वह अब प्रबल होती जा रही थी… लेकिन उसने कुछ बोला नहीं I

वह नन्हा विद्यार्थी बस शांत बैठा हुआ, अपनी अचंभित दशा में, अपने गुरु के मुख की ओर देखता ही गया, और मन ही मन सोचता गया, कि यह पतले से, बुड्ढे से साधुबाबा जो उसकी अपनी हृदय गुफा में बैठकर उसको यह सबकुछ बता रहे हैं, और बताते-बताते उसको सबकुछ दिखाते भी जा रहे हैं, वह कौन हैं?… क्या यह बुड्ढे साधुबाबा कोई मायाधारी जादूगर हैं?,… या यह साधुबाबा साक्षात महामाया हैं, जो जगद्गुरु शारदा सरस्वती कहलाती हैं I और वह नन्हा विद्यार्थी तो यह भी सोचने लगा, तो क्या वही जगदगुरु माता, शारदा विद्या ही इन बुड्ढे साधुबाबा का स्वरूप धारण करके मेरी हृदय गुफा में बैठ गई हैं?,… या यह बुड्ढे साधुबाबा कोई और बड़ी सत्ता हैं? I

यह सब, और इन सबके अतिरिक्त भी और बहुत कुछ सोचता सोचता वह नन्हा विद्यार्थी शांत होकर, अपने सनातन गुरुदेव के श्रीमुख की ओर, एकटक देखता रहा, क्यूंकि उसको अब बिलकुल समझ में ही नहीं आ रहा था, कि वह बुड्ढे साधुबाबा जो उसके हृदय गुफा में बैठकर, उसको यह सब बता रहे हैं, … वह कौन हैं? I

 

कितने चक्र होते हैं, कितने चक्र हैं, चक्र कितने होते हैं, … सात चक्र, आठ चक्र, नौ चक्र, दस चक्र, … सनातन गुरुदेव में नन्हें विद्यार्थी को महापागलनाथ बोल दिया, महापागलनाथ कौन, पगलनाथ कौन, गुरुदेव ने नन्हें विद्यार्थी को महापागलनाथ कह दिया, पागलनाथ और महापागलनाथ, … 

नन्हें विद्यार्थी ने अपने सर्वज्ञ सनातन गुरु से पूछा… गुरु चंद्रमा, कितने चक्र होते है? I कुछ सात चक्र बोलते हैं, कुछ आठ चक्र बोलते हैं, कुछ नौ चक्र बोलते हैं और कुछ दस चक्र ही बोलते हैं, और कुछ तो इससे भी अधिक बोलते हैं I तो अब आप ही बताएं कि वास्तव में कितने चक्र होते हैं? I

सनातन गुरु बोले… उत्कर्ष मार्ग के अनुसार, यह प्राण वायु ही मुख्य है,  इसलिए यह सभी चक्रों में बसा हुआ है I तो अब इसी प्राण वायु को अध्ययन करो और बताओ किन-किन चक्रों में यह है? I मस्तिष्क के सहस्रार चक्र से प्रारंभ करके इस प्राण वायु के पीले वर्ण को सभी चक्रों में देखते जाओ और बताओ कि यह कहाँ-कहाँ है I

नन्हें विद्यार्थी देखते गया और गुरु को बताता गया… पहला मस्तिष्क का ब्रह्मरंध्र चक्र, दूसरा भ्रूमध्य का आज्ञा चक्र, तीसरा कंठ का विशुद्ध चक्र, चौथा हृदय का अनाहत चक्र, पाँचवाँ उदर और हृदय के मध्य के सूर्य चंद्र चक्र, छठा उदर का मणिपुर चक्र, सातवां नाभि और लिंग के मध्य का स्वाधिष्ठान चक्र और आठवाँ मेरुदण्ड के नीचे के भाग के समीप का मूलाधार चक्र I

और इसके पश्चात नन्हें विद्यार्थी ने अपने सर्वज्ञ गुरु के मुख की ओर देखा और कहा… इन्हीं चक्रों में यह पीले वर्ण की प्राण वायु दिखाई देती है I

सनातन गुरु बोले… अब सूर्य चंद्र चक्र को पुनः देखो और बताओ, इसके कितने केंद्र हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और कहा… इसके दो केंद्र हैं, एक सूर्य चक्र का और दूसरा चंद्र चक्र का I लेकिन यदि इनकी ऊर्जाओं को देखा जाएगा, तो ऐसी दशा में इसका केंद्र एक ही होगा I

सनातन गुरु बोले… यही सब बातें इनकी गणना में अंतर लाती हैं I अब निर्गुण चक्र को पुनः देखो और बताओ, क्या इसमें भी यह पीले वर्ण की प्राण वायु दिखाई देती है I

नन्हा विद्यार्थी निर्गुण लिंग को देखकर बोला… यह निर्गुण चक्र (या निरंग चक्र) हृदय कमल के मध्य भाग में एक निरंग लिंगरूप में है, और इसका प्रकाश सभी को प्रकाशित करता हुआ भी, सबके पीछे ही छिपा हुआ है… और ऐसा ही यह रहता होगा… अभी तो मुझे यह ऐसा ही प्रतीत हो रहा है I

इसके पश्चात नन्हें विद्यार्थी ने गुरु मुख की ओर देखकर बोला… गुरु चंद्रमा, क्या यह निर्गुण चक्र भी एक प्रमुख चक्र है? I

सनातन गुरु ने उत्तर दिया… हाँ और ना I हाँ उस साधक के लिए जो निर्गुण ब्रह्म के पथ पर होगा या निर्गुण में लय ही हुआ होगा I और ना उस साधक के लिए जो ऐसा नहीं होगा, जिसके कारण वह साधक अभी भी किसी अभिमानी देवता या अनाभिमानी देवता से संबद्ध होकर, उस देवता के देवत्व और लोकादि से ही जुड़ा हुआ होगा I लेकिन इस हाँ का मार्ग भी वैदिक महावाक्यों से ही जाता है, मूलतः अथर्ववेद का महावाक्य जिसको “अयमात्मा ब्रह्म” कहा जाता है, और जिसका नाता तत्पुरुष ब्रह्म से है, और इसका नाता माँ गायत्री के रक्ता मुख से भी है (अर्थात माँ गायत्री के विद्रुमा मुख से भी है), और चक्र विज्ञानं में जिनका नाता मूलाधार चक्र से होता है I इसिलिए पञ्चब्रह्म मार्ग में मूलाधार चक्र का नाता, तत्पुरुष ब्रह्म और माँ गायत्री के रक्ता मुख से ही है I इसी मूलाधार चक्र से जो मार्ग प्रारंभ होता है, उसमें ही आगे चलकर इस निर्गुण चक्र का साक्षात्कार होता है, और वह भी तब, जब साधक की ह्रदय गुफ़ा में उस साधक का सनातन गुरु स्वयंप्रकट हो जाता है I यह मार्ग भी तब ही प्रारम्भ होगा, जब उस साधक के मूलाधार चक्र के नीचे के भाग में एक हेमा वर्ण का प्रकाश स्वयंप्रकट हो जाएगा, और जहां इस हेमा वर्ण के प्रकाश का नाता भी सद्योजात ब्रह्म से और माँ गायत्री के हेमा मुख से भी होता है I जब तह यह हेमा वर्ण का प्रकाश स्वयंप्रकट नहीं होगा, तबतक मूलाधार चक्र से ऊपर के चक्रों की ओर जाने वाला मार्ग भी प्रशस्त नहीं होगा I

सनातन गुरु आगे बोले… योगमार्ग में जबतक कोई साधक किसी भी बिंदु के ज्ञान का पात्र नहीं होता, तबतक उसे वह ज्ञान (या साक्षात्कार) भी नहीं होता, इसलिए योगमार्ग में जो भी साक्षात्कार किया जाता है, वह तब ही होता है जब साधक में उस बिन्दु की पात्रता आती है… इससे पूर्व नहीं I इसलिए योग ज्ञान और साक्षात्कार भी उन्हीं साधकगणों हो होते हैं, जो उनके पात्र होते हैं… और यही बिंदु किसी साधक के हृदय में उसके सनातन गुरु के स्वयं प्रकटीकरण पर भी लागू होता है I इसीलिए उन अतिपुरातन वैदिक योगीजनों ने ऐसा भी कहा था…

जो साधक पात्र हो गया, उसके गुरु उसके समक्ष स्वयं ही आ जाएंगे I

पात्र को ही गुरु मिलते हैंजो पात्र नहीं हुआ, उसको गुरु भी नहीं मिलेंगे I

जो गंतव्यमार्ग का पात्र हो गया, उसको अपनी काया में ही सनातन गुरु मिलेंगे I

सनातन गुरु आगे बोले… तुम्हारी (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) पात्रता के पश्चात ही मैं (अर्थात सनातन गुरु) तुम्हारी काया के भीतर, तुम्हारे हृदय की तमस गुफा में स्वयंप्रकट हुआ हूँ I जबतक तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) पात्र नहीं हुए थे, तबतक मैं (अर्थात सनातन गुरु) तुम्हारे भीतर अनादि कालों से निवास करता हुआ भी, तुम्हारे समक्ष स्वयंप्रकट नहीं हुआ था… और ऐसा ही मैं प्रत्येक जीव में और समस्त जगत के भागों में भी समानरूपेण और पूर्णरूपेण अनादि कालों से ही बसा हुआ हूँ I और जब मैं (अर्थात सनातन गुरु) आ गया था, तब ही तुम अपने हृदय में प्रवेश कर पाए थे, क्यूंकि समस्त जीव सत्ता में, उनके ह्रदय में प्रवेश का मार्ग भी मैं ही खोलता हूँ I

सनातन गुरु आगे बोले… जबतक कोई साधक किसी ज्ञान या मार्ग का पात्र नहीं बनता, तबतक उसको न वह मार्ग मिलता है, और न ही उसका ज्ञान I पात्रता से ही सबकुछ मिलता है, चाहे वह भौतिक जगत के किसी बिंदु की हो, या अध्यात्मिक जगत का कोई बिंदु हो या कारण या दैविक जगत का हो, और या संस्कारिक और महाकारण जगत का ही कोई बिन्दु क्यों न हो I यही कारण है कि योगीजनों ने कहा भी था कि…

जो किसी बिंदु का पात्र नहीं हुआ है, उसको उसका ज्ञान या मार्ग नहीं देना चाहिए I

 

सनातन गुरु आगे बोले… इसी सिद्धांत से किसी अपात्र को दीक्षा भी नहीं दी जाती है I मैं (अर्थात सनातन गुरु) भी तुम्हारी काया में, तुम्हारे हृदय गुफा में तब ही प्रकट हुआ था, जब तुम (अर्थात नन्हा शिष्य) मेरे (अर्थात सनातन गुरु) मार्गदर्शन के वास्तविक पात्र हुए थे I जबतक तुम (अर्थात नन्हा शिष्य) ऐसे पात्र नहीं हुए थे, तबतक तो मैं (अर्थात सनातन गुरु) भी तुम्हारे हृदय में अनादि कालों से निवास करता हुआ भी, तुम्हारे समक्ष स्वयंप्रकट नहीं हुआ था I इसलिए तुम्हारे हृदय में मेरा (अर्थात सनातन गुरु का) स्वयं प्रकटीकरण भी तुम्हारी पात्रता प्राप्ति के पश्चात ही हुआ था I वैसे इस महाकल्प में कुछ ही अतिविरल योगीजन हुए हैं, जिनके हृदय गुफा में मैं (अर्थात सनातन गुरु) स्वयंप्रकट हुआ हूँ I और मेरा (अर्थात सनातन गुरु का) प्रदान किया हुआ मार्ग भी, मूलाधार चक्र से, अर्थात तत्पुरुष ब्रह्म के चक्र से, जो तुम्हारी माँ गायत्री के रक्ता मुख का चक्र भी है, उससे ही प्रारम्भ होता है I इसी कारण वश, यह मार्ग अथर्ववेद का मार्ग है, जो अथर्ववेद के महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म के ज्ञानमय साक्षात्कार से होकर ही जाएगा I और ऐसे जाकर ही साधक वेद चतुष्टय के महावाक्य चतुष्टय सहित, सोऽहं नामक महावाक्य को भी अपने ही आत्मस्वरूप में पाएगा I

नन्हें विद्यार्थी समझ गया लेकिन उसको अभी भी शंका थी, इसलिए उसने अपने सर्वज्ञ गुरुदेव से प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा, क्या यह नाभि कमल (मणिपुर चक्र) भी मुख्य चक्र है? I

सनातन गुरु मुस्कुराते हुए बोले… तुम्हारे (अर्थात नन्हें विद्यार्थी के) एक पूर्व जन्म में, तुम्ही ने तो सप्त चक्रों का ज्ञान दिया है I उस पूर्व जन्म में तुम ही तो वह अघोर ब्रह्म से लौटे हुए योगी थे, जिसने राज योग के मार्ग से जाकर, योगतंत्र का शुद्धिकरण किया था, जिसका ज्ञान और मार्ग आज के इस कलियुग के समयखण्ड में भी इस पृथ्वी लोक में सुरक्षित है, और जिसके नाम का साधारण अर्थ “दिव्य पत्ते के प्रति श्रद्धा, दिव्य श्रद्धावान पत्तल” आदि है और उसी योगी को आज ऋषि पतञ्जलि कहा जाता है I लेकिन उसके ज्ञान का ऐसा सुरक्षित रहने पर भी, इस कलियुग के प्रभाव से उसके उस जन्म की समय सीमा में कई हजार वर्षों की त्रुटि आ गई है I लेकिन वह पतञ्जलि जो अघोर मार्गी लेकिन वैष्णव योगी था, वह वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग और शाक्त मार्गों का योग ही था I और अपने उस पूर्व जन्म में ऐसा उत्कृष्ट योगी होने के पश्चात भी, देखो आज तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) अपने पूर्व जन्म में दिए हुए ज्ञान और उसके मार्ग को ही इस जन्म में भूल गए हो, और मुझसे वही प्रश्न पूछ रहे हो, जिनके उत्तर तुम्हारे उस जन्म के दिए हुए ज्ञान में ही हैं I पर क्यूंकि तुम प्रबुद्ध योगभ्रष्ट ही हो, इसलिए यदि तुम थोड़ा प्रयत्न करोगे, तो उसको पुनः जान जाओगे और उस जन्म की सिद्धियों को भी प्राप्त कर जाओगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… लेकिन ऐसा ही तो होता है, जब जिस बालक के शरीर में तुम परकाया प्रवेश प्रक्रिया से लौटाए  गए हो, उस बालक के संस्कार ही ऐसा हों जो तुम्हे तुम्हारे कुछ पूर्व जन्मों से और उन पूर्व जन्मों के ज्ञान आदि सिद्धियों से जुड़ने न दें I ऐसा होने के कारण ही तुम अपने अधिकांश जन्मों को जान नहीं पाए हो, और वो भी तब, जब तुम वह योगभ्रष्ट ही हो, जो प्रबुद्ध होता है I और ऐसा होने के कारण उस प्रबुद्ध योगभ्रष्ट को अपने उन सभी जन्मों का ज्ञान होता है, जब से वह प्रबुद्ध योग भ्रष्ट हुआ था I क्यूंकि तुम्हारी कुछ संस्कारिक बाधाएं हैं, इसलिए आज के समय, तुम्हें उन पूर्व जन्मों का ज्ञान नहीं है, लेकिन जैसे ही यह संस्कारिक बाधाएँ हट जाएंगी, वैसे ही तुम्हे ज्ञान भी हो जाएगा… ऐसा ही प्रत्येक प्रबुद्ध योग भ्रष्ट के साथ होता है, जब वह पुनः किसी न किसी मृत्युलोक में परकाया प्रवेश प्रक्रिया से लौटाया जाता है I

सनातन गुरु आगे बोले… परकाया प्रवेश से जन्म के पश्चात, जो योगी उस स्थूल शरीर को धारण करता है, उसको उस स्थूल शरीर के दानी के कुछ संस्कार भी उठाने पड़ते हैं I और यदि इस स्थूल शरीर का दानी, परकाया प्रवेश से लौटाए जाने वाले उस योगी से यही माँग ले, कि तुम्हें मेरे सभी संस्कार उठाने होंगे (अर्थात समस्त कर्म धारण करने होंगे) तो ही ऐसी ज्ञान आदि मार्ग से जुडी हुई बाधाएं आती है, जो तुम्हें (अर्थात नन्हे शिष्य को) भी आई हैं I जबतक उन समस्त संस्कारों का, जिनको तुमने अपने स्थूल शरीर के दानी से लिया था, नाश नहीं होगा, तबतक तुम अपने पूर्व जन्मों के ज्ञान और सिद्धि आदि से जुड़ भी नहीं पाओगे I और जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक तुम वह कर्म भी नहीं कर पाओगे, जिनके लिए तुम्हारा परकाया प्रवेश मार्ग से इस स्थूल काया में आगमन करवाया गया था और वह भी माँ सावित्री सरस्वती द्वारा I इसलिए भी मेरा (अर्थात सनातन गुरु का) प्रकटीकरण तुम्हारी हृदय गुफा में हुआ है I उस नन्हे बालक, जिसके शरीर में तुम्हारा आगमन हुआ है, उसके संस्कारों का नाश भी एक कारण भी है, कि तुम्हे इस अतिगुप्त और कठिन हृदयाकाश गर्भ तंत्र के मार्ग पर डाला गया है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

नन्हा विद्यार्थी गुरु वाणी को समझ तो गया, पतंतु उसको उसके पूर्व के प्रश्न का अभी भी उत्तर नहीं मिला था, कि क्या यह नाभि कमल एक मुख्य चक्र है I इसलिए उस नन्हें विद्यार्थी ने यह प्रश्न पुनः पुछा I

सनातन गुरुदेव ने उत्तर दिया… हाँ और ना I ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह नाभि चक्र का क्षेत्र ही पञ्चप्राण और पञ्च उपप्राण का क्रीड़ा क्षेत्र है, और यह क्रीड़ाएँ भी समान प्राण के भीतर ही चलित होकर, उन तैंतीस करोड सूक्ष्म नाड़ियों में पहुँच जाती हैं, जिसके कारण इस नाभि लिंग का श्वेत वर्ण में उदय होता है I और पूर्व (के अध्याय) में बताया गया था, कि ऐसे समय पर यह पीले वर्ण की प्राण वायु भी नाभि चक्र में जाकर, उसका वर्ण अपने समान पीला ही कर देती है I यही कारण है कि योगीजनों ने इस नाभि चक्र का वर्ण पीला ही कहा था I दस महाविद्या में इस चक्र का नाता माँ बगलामुखी से है, जो पीताम्बरा कहलाती हैं, और जो ब्रह्मास्त्र विद्या ही हैं I

सनातन गुरुदेव बोले … अब इस नाभि चक्र की और देखो और जानो की इसमें तैंतीस करोड सूक्ष्म ऊर्जाओं की नाड़ियां एकत्रित होकर, इसके समीप एक नाभि लिंग जैसी दिखाई देती हैं, और जहाँ यह नाभि लिंग भी मेरुदण्ड के भीतर बसे हुए इस नाभि कमल की ओर ही, अपने ऊपर के भाग से झुका होता है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुनः देखा और अपने सर को आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारी संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरु बोले… लेकिन जब यह नाभि लिंग जो समान प्राण में बसा हुआ है, वह समान प्राण की समता के प्रभाव में आता है, तब इसका वर्ण भी श्वेत ही हो जाता है I यह श्वेत वर्ण, या तो खुरदरा श्वेत होता है या चमकदार श्वेत I यदि खुरदरा श्वेत होगा तो यह वर्ण समता को दर्शाता है, और यदि चमकदार श्वेत होगा, तो यह वर्ण सर्वसमता का ही द्योतक हो जाता है I और जहां यह सूक्ष्म श्वेत वर्ण की समता परा प्रकृति की द्योतक है… और यह हीरे के समान प्रकाशमान सर्वसमता, सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति और उनके ब्रह्मलोक से ही संबंधित होती है I

लेकिन नन्हें विद्यार्थी को तो अभी भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं मिला था, कि क्या यह नाभि कमल एक प्रधान चक्र है या नहीं, इसलिए उसने अपने गुरुदेव से यही प्रश्न पुनः किया I

सनातन गुरु बोले… जिस भी चक्र में यह प्राण वायु अधिक मात्रा में पाई जाती है, वह सभी मुख्य चक्र ही होते हैं I

इस उत्तर से नन्हा विद्यार्थी संतुष्ट हुआ, इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरु बोले… अष्टचक्रा नवद्वारा ही अधिकांश प्राण धारी जीवों का स्थूल देह कहलाता है, और इस स्थूल देह के राजन, भगवान् राम होते हैं I इसलिए यह स्थूल देह अपने भौतिक स्वरूप में होता हुआ भी, वास्तव में अध्यात्मिक और दैविक अयोध्यापुरी ही है I इसी सत्य को अथर्ववेद के दसवें अध्याय के दूसरे खंड के इक्कतीस्वें मंत्र में सूक्ष्म सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन बताया गया है I इस स्थूल देह रूपी अयोध्यापुरी में भगवान् राम, सगुण साकार स्वरूप भी होते हैं, और सगुण निराकार और लिंगात्मक स्वरूप भी होते हैं I और इस स्थूल देह नामक अयोध्यापुरी में, जहां तक उन भगवान् राम के बसे हुए लिंगात्मक स्वरूपों के प्रश्न हैं, वह चार ही होते हैं और ऐसी दशा में उन भगवान् राम के लिंगात्मक चतुष्टय स्वरूप ही हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय कहलाए गए हैं I और इसी स्थूल देह के भीतर, भगवान् राम अपने सगुण साकार बाल रूप में भी होते हैं, और इस दशा में वह ब्रह्मरंध्र के भीतर जो छोटे-छोटे तीन चक्र हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में ही, राम लल्ला के स्वरूप में हिरण्यमय मानव शरीर रूप में निवास करते हैं I और इन सबके अतिरिक्त, इसी स्थूल देह रूपी अयोध्या पुरी में वह भगवान् राम निर्गुण निराकार भी हैं I यह स्थूल देह ही वास्तविक अयोध्यापुरी है, न की वह अयोध्यापुरी जो भौतिक जगत के दृष्टिकोण से, इस पृथ्वीलोक के एक स्थान रूप में बताई जाती है I इसी आंतरिक अयोध्या पुरी में एक ऊर्जा रूपी नदी भी बहती रहती है, और यही नदी ही वास्तविक सरयू नदी है I

सनातन गुरु आगे बोले… इसी स्थूल देह रूपी अयोध्या पुरी में`वह निर्गुण लिंग होता है जिसके बारे में पूर्व में बताया गया था I और इसी निर्गुण लिंग का छाया स्वरूप मूलाधार चक्र के समीप भी होता है I इसी छाया को कुण्डलिनी लिंग कहा जाता है, जो काले जामुन के आकार और वर्ण का होता है और जो साधक की स्थूल काया के भीतर ही मुलात्मक रूप में बसे हुए, शून्य तत्त्व सहित शून्य ब्रह्म की ऊर्जा को भी दर्शाता है I भगवान् राम के इसी काले जामुम के लिंगरूप वाले नाम पर ही जम्बूद्वीप शब्द आया था, और यही कुण्डलिनी शक्ति का वह केंद्र भी है जिसको उत्कर्षमूल भी कहा जाता है I इसी कुण्डलिनी चक्र में कुण्डलिनी शक्ति अपनी सुसुप्ति की अवस्था में तबतक निवास करती है, जबतक वह जागृत नहीं हो जाती है I जागृत होकर वह कुण्डलिनी शक्ति मेरुदण्ड के भीतर के सभी saptचक्रों और बत्तीस देवी देवताओं के लोकों को भेदती हुई, मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक गति करती है I यह बत्तीस लोक भी मेरुदण्ड की बत्तिस हड्डियों से संबद्ध होते हैं I और अंततः यह कुण्डलिनी शक्ति, सहस्रार में बसे हुए तैंतीसवें देवलोक तक पहुँच जाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जागृत होकर और इसके पश्चात ऊपर की ओर उठने की प्रक्रिया में, जब यह कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार से लेकर हृदय चक्र तक गति करती है, तब यह शक्ति सुषुम्ना से संबद्ध जो 100 उप-नाड़ियां होती हैं, और जो मेरुदण्ड के नीचे के भाग से ऊपर उठती हुई हृदय क्षेत्र में खुलती हैं, उन 100 उप-नाड़ियों में भी प्रवेश कर जाती है I जैसा ही ऐसा होता है, वैसे ही यह कुण्डलिनी शक्ति से उन नाड़ियों में ऊर्जा प्रवाह आ जाता है I अपने भीतर ऊर्जाओं को प्रवाहित करती हुई इन एक सौ नाड़ियों को ही वैदिक वाङ्मय में भारत की सौ नदियां कहा गया है I और जहां वह भारत भी साधक के स्थूल काया के भीतर बसा हुआ वह सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक महाब्रह्माण्ड ही है, जो रचैता ब्रह्मा की इच्छा शक्ति से प्रादुर्भाव हुआ था, और जिससे आगे की ब्रह्म रचना में सभी दैविक या कारण, सूक्ष्म और स्थूल जीव जगत उत्पन्न हुए थे I समस्त जीवों के पितामह (अर्थात चतुर्मुखा ब्रह्मा) की इच्छा शक्ति से जो ब्रह्माण्ड का प्राथमिक स्वरूप उत्पन्न हुआ था, वही यह सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और इन सब के पश्चात, हृदय से ऊपर और ब्रह्मरंध्र की ओर बस एक ही नाड़ी चलती है, जो हृदय के अग्रभाग से चालित होकर, सहस्रार तक जाती है I यही इंद्र नाड़ी है, जिसमें जाकर साधक कई सारे लोकों का साक्षात्कार करता है, जैसे वरुण लोक, विद्युत् लोक, पशुपतिनाथ लोक और शून्य प्रकृति का लोक, इत्यादि I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और इसी प्रक्रिया में साधक चतुर्दश नाड़ियों और इनकी दिव्यताओं का भी अध्ययन करके, उनका साक्षात्कार करता है I इसीलिए कुछ योगमनीषियों ने चतुर्दश नाड़ियों का वर्णन भी किया है I

सनातन गुरुदेव बोले… अब ध्यान देना क्यूंकि अब सार बताया जा रहा है Iयहाँ बताई गई…

  • मूलाधार से हृदय चक्र तक, ऊपर की ओर जाती हुई जो एक सौ नाड़ियाँ होती है, वही वेद मनीषियों द्वारा बताई गई भारत की सौ नदियाँ हैं I और जहां वह भारत भी साधक की स्थूल काया के भीतर बसा हुआ, सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड ही है I
  • योगमनीषियों द्वारा बायी गई चतुर्दश नाड़ियाँ, चतुर्दश भुवन रूपी ब्रह्माण्ड को भी दर्शाती है I और इनका चक्र ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से सबसे नीचे के चौदाह पत्तों (अर्थात चतुर्दश दल कमल) के चक्र में होता है I
  • मेरुदण्ड के नीचे के भाग से उऊपर जाते हुए जो बत्तीस हड्डियाँ आती है, उन के भीतर बसे हुए बत्तीस देवलोक को जब चेतना पार करती है, तब ही वह चेतना ब्रह्मरंध्र के भीतर बसे हुए तीन छोटे छोटे चक्रों के मध्य के छोटे से कमल में जाती है, जिसके बत्तीस पत्ते (अर्थात बत्तीस दल कमल) होते हैं I और इस बत्तीस दल कमल के मध्य में ही राम लल्ला रूपी सुनहरी आत्मा मानव शरीर धारण करके बैठा करती है I और इसी मध्य के कमल में बैठी हुई वह सुनहरी आत्मा ऊपर की ओर ही देखती रहती है, अर्थात सहस्रार से बाहर की ओर देखती रहती है I ब्रह्मरंध्र के भीतर बसा हुआ यह बत्तीस दल कमल ही उन सुनहरी आत्मा का राम लल्ला स्वरूप है, जिसमें राम लल्ला सगुण साकार अवस्था में बालक रूप में होते हैं और गंतव्य (अर्थात कैवल्य मोक्ष) की ओर ही देखते रहते हैं I इसलिए उन राम लल्ला की ऐसी दृष्टि मोक्ष को दर्शाती है, जिसके कारण ब्रह्मरंध्र के भीतर बेस हुए इस बत्तिस दल कमल में पद्मासन लगाकर बैठे हुए वह राम लल्ला ही अनुग्रह कृत्या की ध्योतक कहलाते हैं I और क्यूँकि अनुग्रह कृत्य गणपति देव का ही होता है, इसलिए इस दशा में वह राम लल्ला ही शिव शक्ति के लल्ला, श्री गणेश स्वरूप होते हैं I
  • उसी ब्रह्मरंध्र के भीतर और इस छोटे से बत्तीस दाल को धारण किया हुए राम लल्ला के कमल के ऊपर, एक और चक्र होता है, जिसके छह पत्ते होते हैं, जो श्वेत वर्ण के होते हैं और जिनको हलके नीले वर्ण ने घेरा होता है और जो उस शून्याकाश की ओर जाने वाला मार्ग है, और जो मनस चक्र कहलाता है I इसी को पार करके साधक का मन ब्रह्मलीन होता है I
  • इसीलिए उस बत्तीसदल कमल में बैठे हुए राम लल्ला पर ही वह उत्कर्ष पथ, जिसका नाता प्राण वायु से है, वह समाप्त होता है I और समाप्त होकर, वही पूर्व का उत्कर्ष पथ, इस पथ के योगी के मुक्तिमार्ग में परिवर्तित भी हो जाता है I इसी कारण से राम लल्ला ही इस प्राण वायु की ऊर्जाओं का आलम्बन लेकर गति करते हुए उत्कर्ष पथ की वह अंतिम दशा हैं, जो मुक्तिपथ मुक्तिपथ है I
  • और जहां ब्रह्मरंध्र के भीतर के बत्तीसदल कमल के उन राम लल्ला से चलित हुआ वह मुक्तिमार्ग, वज्रदण्ड से जाकर, निरलम्ब चक्र से होकर, अंततः पञ्च मुखी सदाशिव को जाता है, जिसके कारण राम भगवान् को राम भद्र भी कहा गया है I और जहां भद्र शब्द का नाता मुक्ति से भी है, मुक्तिपथ से भी है, और इस समस्त ब्रह्म रचना की उस सर्वकल्याणकारी सत्ता से भी होता है, जो हरी, हर और हरिहर नामों से भी पुकारी जाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और कुछ योगीजनों की तो यह कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार से परे जो वज्रदण्ड चक्र है, उस वज्रदण्ड को भी पार करके, निरालम्ब चक्र में भी पहुँच जाती है I और कुछ अतिविरले साधकगणों में तो वह कुण्डलिनी शक्ति निरालम्ब चक्र (या निरालंबस्थान) को भी पार कर जाती है I इस निरालंबस्थान (या निरालम्ब चक्र) को पार करके यह कुण्डलिनी शून्य ब्रह्म में लय भी होती है I और इसी दशा में वह साधक विराट कृष्ण का साक्षात्कार करता है I उन विराट कृष्ण का मार्ग भी ज्ञान कृष्ण से प्रारम्भ होकर, कालकृष्ण को जाकर, आनंदकृष्ण को प्राप्त होकर, आत्मकृष्म में ही चला जाता है I जिस साधक ने यहाँ बताया गया सबकुछ साक्षात्कार किया होगा, वही रामकृष्ण स्वरूप कहलाता है, क्यूंकि वह साधक का वास्तविक स्वरूप (अर्थात आत्मस्वरूप), राम भी है और कृष्ण भी वही साधक का आत्मस्वरूप ही है I ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, ऐसा साधक राम भी है और कृष्ण भी, इसलिए उसे ही रामकृष्म कहा जाता है I इसी स्वरूप के मंत्र को चैतन्य महाप्रभु बताए थे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… लेकिन यह सब वही साधक साक्षात्कार करेगा, जिसनें कुण्डलिनी शक्ति को कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन अपने हृदय में, अपनी इच्छा शक्ति नामक बल का प्रयोग करके, रोका होगा I जब कुण्डलिनी शक्ति जो मूलाधार चक्र के समीप के स्थान से ऊपर की ओर उठ रही होती है, और उसको ह्रदय कमल में चित्तबल से ही रोक दिया जाता है, तब कुण्डलिनी चक्र के मध्य में उस कुंडलिनी की ऊर्जाएं काले जामुन के समान दिखाई देने लगती हैं I ऐसी दशा से ही साधक ईमाहो शब्द का साक्षात्कार करता है I यह साक्षात्कार भी पञ्च विद्या में से जो ब्रह्माणी विद्या सरस्वती हैं, उनके अनुग्रह से होता है I ब्रह्माणी विद्या ही ईमाहो शब्द की दिव्यता हैं और जहां यह ईमाहो का शब्द, ब्रह्माण्ड विजय की प्रारंभिक दशा को दर्शाता है, अर्थात ब्रह्माण्ड से तारण होने की दशा के प्रारंभिक मार्ग को दर्शाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… पञ्च विद्या सरस्वती में से एक सरस्वती ही तुम्हें (अर्थात नन्हे शिष्य को) योगेश्वर लोक (अर्थात महेश्वर लोक, या हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति के लोक) से लेकर इस स्थूल देह में परकाया प्रवेश प्रक्रिया से लाई थी I वैसे भी तुमने (अर्थात नन्हे शिष्य ने) स्वयंभू मन्वन्तर से ही परकाया प्रवेश मार्ग से जन्म लिए हैं, क्यूंकि उसी स्वयंभू मन्वन्तर में जब तुम ब्रह्मर्षि क्रतु के एक मनस पुत्र हुए थे, तबसे तुमने कोई योनि जन्म नहीं लिया है I स्वयंभू मन्वन्तर से जब भी तुम किसी स्थूल काया में कुछ विशेष कार्य करने हेतु लौटाए गए हो, तो तुम परकाया प्रवेश के मार्ग से लौट गए हो, इसलिए इस ब्रह्मकल्प के उस स्वयंभू मन्वन्तर के समयखंड से ही तुमने कभी भी योनिजन्म नहीं लिया है और यह भी वह कारण है कि उस स्वयंभू मन्वन्तर से ही तुम्हारा गोत्र भी क्रतु ही रहा है I स्वयंभू मन्वन्तर के तुमहारे मनस पिता, ब्रह्मर्षि क्रतु प्रजापति स्वरूप ही थे और आज भी वही प्रजापति स्वरूप ऋषि तुम्हारे मनस पिता है I क्यूंकि उनके मनस पुत्र होने के पश्चात, तुमने कभी भी योनि जन्म नहीं लिया इसलिए तुम्हारा गोत्र वर्ण इत्यादि भी उनके गोत्र और वर्ण पर ही रहा है I

नन्हें विद्यार्थी इन सभी गुरु वचनों को समझ गया, लेकिन उसे अब भी शंका थी, इसलिए उसने अपने सर्वज्ञ सनातन गुरुदेव से पुछा… गुरु चंद्रमा,  कृपया बताएं कि कुंडलिनी जागरण के पश्चात, कुण्डलिनी चक्र की क्या दशा होती है? I

सनातन गुरुदेव बोले… देखो, उन संस्कारों के कारण जो तुमने उस नन्हे बालक से उठाए थे जिसने तुम्हें यह शरीर दान में दिया था, तुम अपने सभी पूर्व जन्मों में इस ज्ञान के सिद्ध होने के बाद भी, इस जन्म में इसके ज्ञान और प्रक्रिया को ही भूल गए हो I यही होता है जब संस्कार रहित चित्त धारी किसी और के संस्कारों को धारण कर लेता है I और जबतब वह पूर्व का संस्कार रहित चित्त धारी पुनः संस्कार रहित नहीं हो जाएगा, तबतक वह अपने पूर्व जन्म के ज्ञान आदि सिद्धियों को भी नहीं पाएगा I इसी को प्राप्त करने हेतु तुम्हे इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में डाला गया है I

सनातन गुरु बोले, अब सुनो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर… मेरुदंड के बिलकुल नीचे के भाग में यह कुण्डलिनी चक्र होता है I एक बार कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है, तो उसको कभी भी रोका नहीं जा सकता है I और ऐसा होने के पश्चात भी, उस कुंडलिनी शक्ति को कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन कुछ उत्कृष्ट योगीजन रोक भी पाते हैं I लेकिन ऐसी रुकावट अनंत कालों तक नहीं, बल्कि कोई छोटे से कालखण्ड के लिए ही हो सकती है I स्थूल काया के भीतर बसे हुए आत्मस्वरूप की दिव्यता, जो ब्रह्मशक्ति ही है, उसका नाम कुण्डलिनी है I इसलिए…

स्थूल देह के भीतर, ब्रह्मशक्ति की प्राणात्मक अभिव्यक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं I

स्थूलदेह के आत्मरूपी ब्रह्म की मूलशक्ति, दुर्गा रूपी अभिव्यक्ति कुण्डलिनी है I

आत्मा रूपी ब्रह्म की ज्ञानात्मक, मनात्मक, चिदात्मक और अहमात्मक, सार्वभौम आत्मशक्ति नामक दिव्यता से युक्त अभिव्यक्ति कुण्डलिनी है I

आत्मा रूपी ब्रह्म की गुणात्मक, कालात्मक, भूतात्मक, तन्मात्रात्मक और सर्वात्मक सर्वशक्तिमय अभिव्यक्ति कुण्डलिनी है I

कुण्डलिनी होती हो देह में है, पर इसका वास्तविक स्वरूप ब्रह्मशक्ति ही होता है I

वह ब्रह्मशक्ति ही ब्रह्म की परिपूर्ण, अपराजिता सर्वशक्तिमय अभिव्यक्ति दुर्गा हैं I

दुर्गा ही मूलप्रकृति हैं, जो अमूल हैं, और महाब्रह्माण्ड की सर्वऊर्जावान मूलावस्था हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… यदि यह कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर, ऊपर उठती हुई निरालम्ब चक्र को पार करती है, तब साधक का कुण्डलिनी चक्र अपने पूर्व के काले जामुम स्वरूप को त्याग देता है I और इसी कुण्डलिनी चक्र के स्थान पर एक सुनहरा कुण्डलिनी लिंग स्वयंप्रकट हो जाता है I ऐसी दशा में यह भी पाया जाएगा, कि उस स्वर्णिम कुण्डलिनी लिंग में और बहुत सारे सवर्ण लिंग भी संहित हैं, अर्थात जुड़े हुए हैं I यही द्वादश ज्योतिर्लिंगों में, हाटकेश्वर लिंग कहलाया है I और इसी को “पाताले हाटकेश्वरम” नामक वाक्य से भी दर्शाया गया है, क्यूंकि कुण्डलिनी चक्र के नीचे से ही सप्त-पाताल लोकों का मार्ग जाता है, इसलिए यह कुण्डलिनी चक्र ही इस चक्र से भी नीचे के सप्त पाताल के मार्ग में गमन का द्वार है I कुण्डलिनी चक्र से नीचे की ओर सप्त पाताल हैं, और इस चक्र से ऊपर सात ऊर्ध्व लोक हैं, जिनमें से सबसे ऊपर का सतलोक (या ब्रह्मलोक) होता है I

इसके बाद गुरु बोले… अब उस कुंडलिनी चक्र का अध्ययन करो I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा कि उस स्थान पर एक काले जामुन के फल जैसी आकृति दिखाई दे रही है I लेकिन उसको अभी भी समझा नहीं कि क्या यह सब शास्त्रों में क्यों नहीं बताया गया है I

सनातन गुरुदेव बोले… अब देखो क्या तुम्हें इस कुण्डलिनी चक्र में भी पीले वर्ण की प्राण वायु दिखाई दे रही है I

नन्हें विद्यार्थी ने उत्तर दिया… नहीं जी, लेकिन इस कुण्डलिनी चक्र के समीप जो मूलाधार चक्र है, उसमें प्राण वायु का पीला वर्ण दिखाई दे रहा है I

सनातन गुरुदेव बोले… जिस चक्र में कुछ न्यून मात्रा में ही सही, लेकिन इस प्राण वायु का पीला वर्ण नहीं होता, वह प्रधान चक्र भी नहीं केहलाता I

नन्हें विद्यार्थी ने अब समझ लिया कि गुरुदेव प्रश्न का उत्तर देने हेतु ही उसको उसके सारे शरीर में ही घुमा रहे थे I और इसके पश्चात उस नन्हे शिष्य ने अपने सर्वज्ञ गुरु के मुख की ओर देखकर, इसका पुष्टिकारी संकेत भी दे दिया I

 

इसपर सनातन गुरु बोले… इसका अर्थ हुआ कि शरीर में आठ चक्र ही होते हैं I इनमें से सात चक्र, शरीर के मेरुदण्ड में होते हैं, और आठवाँ निरालम्ब चक्र है, जो सहस्रार से भी ऊपर उस शून्य ब्रह्म रूपी आकाश में स्तित होता है, और जिसका सूक्ष्म सांकेतिक वर्णन, अथतववेद के दसवें अध्याय के दूसरे खंड के एकत्तीसवें मंत्र में किया गया है I इस मंत्र में सांकेतिक रूप में बताए गए अष्टम चक्र को निरालम्ब चक्र, कैवल्य चक्र, मोक्ष चक्र, निर्वाण चक्र, मुक्ति चक्र, श्री हरि चक्र, नारायण चक्र, सदाशिव चक्र, ब्रह्म चक्र और ब्रह्मलोक चक्र  इत्यादि भी कहा जा सकता है I यह अष्टम चक्र, वज्रदण्ड के ऊपर होता है और उस शून्याकाश रूपी शून्य ब्रह्म में ही निरालम्ब रूप में स्थित होता है, जिसके कारण सिद्धों ने इस चक्र को निरालम्ब चक्र और निरालंबस्थान भी कहा है I यही अंतिम साक्षात्कार होता है, क्यूंकि इसके पश्चात साधक उस मार्ग पर चला जाता है, जो पशुपातमार्ग कहलाता है, और जिसपर गमन राजयोग से किया जाता है और जिससे साधक ब्रह्माण्डातीत ही हो जाता है, और अंततः वह साधक पञ्च मुखा सदाशिव में भी बस जाता है I ऐसा साधक पञ्च ब्रह्म का स्वरूप भी होता है और पञ्च मुखा सदाशिव का स्वरूप भी वही साधक होता है I ऐसा साधक ॐ का ही सगुण साकार स्वरूप भी होता है I ऐसे साधक का आत्मस्वरूप, वह सर्वव्यापक पूर्णब्रह्म भी होता है, और सार्वभौम अपराजिता ब्रह्मशक्ति भी I ऐसा साधक पञ्च कृत्य का द्योतक भी होता है, और पञ्च देव का स्वरूप भी वही साधक होता है I यह एक अतिविरली से भी अतिविरली सिद्धि है, क्यूंकि इस संपूर्ण महाकल्प में केवल मुट्ठी भर योगी ही इसको प्राप्त हुए हैं I इस सिद्धि की पूर्ण प्राप्ति केवल और केवल एक सौ एकवें आंतरिक अश्वमेध यज्ञ से ही होती है I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव अपने नन्हे शिष्य की ओर उंगली दिखाकर बोले… परकाया प्रवेश से प्राप्त हुए इस जन्म में, तुम्हे इसी मार्ग पर जाना है, और इसीलिए तुम्हें लौटाया गया है, क्यूंकि इस मार्ग पर जाकर ही किसी चलते हुए देव कलियुग में, गुरुयुग (अर्थात वैदिक युग) प्रकाशित किया जाता है I और आगामी समयखण्ड उसी गुरुयुग का ही है, जिसमें श्रीहरि ही महाब्रह्माण्ड के अद्वैत गुरु और सार्वभौम सम्राट होते हैं, और जिनकी इस मृत्युलोक में गुरुगद्दी और सिंघासन भी आम्नाय पीठ ही होती हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरुदेव बोले… यह भी वह कारण है, कि मुझे (अर्थात सनातन गुरुदेव को) तुम्हारे हृदय में ही स्वयंप्रकट होना पड़ गया है क्यूंकि तुम एक बाल-वानर के समान अपने हृदय में जाने का प्रयास करते ही जा रहे थे, और वह भी तब, जब तुम्हे इतने वर्षों के व्यतीत होने पर भी, हृदय प्रवेश में कोई भी सफलता नहीं मिल रही थी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इतनी असफलता के पश्चात तो उत्कृष्ट योगीजन और देवता आदि भी उस कार्य को त्याग देते हैं, और तुम निरंतर इस हृदय प्रवेश के प्रयासों में लगे ही रहे I इतना हठी तो इस ब्रह्माण्ड में कोई और है ही नहीं, जिसको बस एक वाक्य के स्त्रोत को जानना था, जो उसके हृदय में से आया था, और जिसमें उसे बोला गया था… “अब बस भी कर दे यार” I

नन्हें विद्यार्थी को यह पता था, क्यूंकि कुछ वर्ष पूर्व उसने यह वाक्य सुनकर ही अपने हृदय प्रवेश के प्रयासों को प्रारम्भ किया था I इसलिए उसने गुरुमुख की ओर देखकर अपना सर आगे पीछे हिलाकर, उसको समझ में आने का संकेत भी दिया I

 

सनातन गुरुदेव नन्हे शिष्य की ओर उंगली दिखाकर मुस्कुराते हुए बोले… लेकिन यह भी सत्य है, कि …

इस ब्रह्मरचना के संपूर्ण इतिहास में, केवल पगले ही सिद्ध हुए हैं I

जो पूर्णरूपेण पगला नहीं होता, वह सिद्ध भी नहीं होता I

और तुम तो उन सभी पगलों में भी महापागल ही हो I

इसके पश्चात सनातन गुरु हँसते हुए और भी बोले… इस महाब्रह्माण्ड में तुमसे बड़ा पागल और कौन हो सकता है, कि मुझे ही अपनी हृदय गुफा में खींच लाए और वह भी तब, जब कलियुग चलित हो रहा है I मैं (अर्थात सनातन गुरु) तो कभी भी किसी कलियुग में आया ही नहीं हूँ I कलियुग मेरे आगमन का युग है ही नहीं, और देखो इस कलियुग के कालखंड में मैं जो पिण्डातीत और ब्रह्माण्डातीत, इस जीव जगत के सगुण साकार रचैता का भी रचैता, सगुण निराकार सर्वेश्वर ही हूँ, तुम्हारे हृदय में सगुण साकार स्वरूप धारण करके बैठ गया हूँ I मुझसे ऐसा करवाने वाला तो पूरा पालग ही होगा I और तुमसे बड़ा पागल कौन होगा?… कम से कम इस ब्रह्मकल्प में तो कोई भी नहीं हुआ है I

और गुरु ठहाके मारते मारते हँसते हुए नन्हे शिष्य की ओर उंगली दिखाकर बोले… तुम ही इस पूरे ब्रह्मकल्प के महापागलनाथ हो I लेकिन तुम जैसे महापागलनाथ ही उस देह को पाता हैं, जो महाकारण देह कहलाया गया है, और जिसका नाता हिरण्यगर्भ ब्रह्म से होता है I तुमसे कुछ न्यून श्रेणी के योगी जो पागलनाथ के श्रेणी में आते हैं, वही कारण देह को पाते हैं I तुम चाहते तो स्वयंभू मन्वन्तर में ही मुक्त हो जाते, लेकिन क्यूंकि तुम महापागलनाथ ही हो, इसलिए अब तक चले आ रहे हो, और अपने एक जन्म से दूसरे जन्म की इस अनंत श्रंखला में अब तक पड़े हुए हो I इसलिए अब बताओ, तुम महापागलनाथ नहीं तो… कौन हो? I

गुरु हँसते हँसते आगे भी बोले… योगीजन मुक्ति को पाके उसको ठुकराते नहीं हैं, और तुम अब तक असंख्य बार अपनी मुक्ति को आगे की ओर ठेल चुके हो I ऐसे योगी को महापागल नहीं कहोगे, तो क्या कहोगे? I और तुम महापागलनाथ का इतिहास देखकर मैं (अर्थात सनातन गुरु) यह भी जानता हूँ, कि इस बार भी तुम मुक्ति से विमुख हुए बिना नहीं रह पाओगे I लेकिन क्यूंकि तुम्हारे सभी पूर्व जन्मों के और तुम्हारे जीव स्वरूप के समस्त शेष कर्तव्य इसी जन्म में ही पूर्ण हो जाएंगे, इसलिए कम से कम इस जन्म में तो तुम उस कैवल्य मोक्ष से पूर्ण विमुख नहीं हो पाओगे I अर्ध विमुख हो सकते हो, लेकिन ऐसे होने पर भी, आगामी किसी भी कालखंड में तुम्हारा आगमन जीव रूप में नहीं हो पाएगा, क्यूंकि इस जन्म में मेरा यह नन्हा सा महापागलनाथ कुछ भी कर ले, पर वह निर्गुण ब्रह्म में लय हुए बिना नहीं रह पाएगा I इसको क्रियान्वित करने हेतु भी मैं तुम महापागलनाथ सिद्ध के हृदय गुफा में अवतरण किया हूँ… समझ गए I

नन्हें विद्यार्थी ने मुस्कुराते  हुए और गुरुमुख की ओर देखते हुए अपना सर आगे पीछे हिलाया और इस बिंदु के समझ आने का पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

और इसके पश्चात नन्हे शिष्य ने सोचा, यह महापालगनाथ कैसी उपाधी होती है…, चलो कोई नहीं… गुरु ने दी है, तो समर्पणमय श्रद्धामय प्रेममय होकर धारण करना ही पड़ेगा I

 

सनातन गुरु बोले… अष्ट चक्र में मूलाधार, स्वाधिस्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार और निरालम्ब चक्र प्रमुख रूप में होते हैं I और यदि हम सूर्य और चंद्र चक्र को भी लेंगे, तो नौ या दस प्रमुख चक्र हो जाएंगे, लेकिन ऐसा होने पर भी क्यूंकि यह दोनों चक्र एक दुसरे की ऊर्जाओं के विपरीत ही होते हैं, इसलिए इनको अष्ट चक्र में गिना भी नहीं जाता है और ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि इनकी ऊर्जाएँ इनके प्रभावों को ही काट देती हैं I यदि हम निर्गुण चक्र को भी लेते हैं, तो ग्यारह प्रमुख चक्र होते हैं, लेकिन ऐसा होने पर भी क्यूंकि यह चक्र, निर्गुण ही होता है, इसलिए इसको भी अष्ट चक्र में गिना नहीं जाता है I और यदि हम वज्रदण्ड को भी लेंगे तो बारह प्रमुख चक्र होंगे, पर क्यूंकि इसके भीतर प्राण वायु तब ही प्रवेश करती है, जब योगी रकार मार्ग (अर्थात आंतरिक अश्वमेध यज्ञ मार्ग) पर जाता है, इसलिए इसके भीतर प्राण वायु सदैव ही निवास नहीं करती है, जिसके कारण इसको भी अष्ट चक्र में गिना नहीं जाता है I इन सबमें से निर्गुण चक्र ही सर्वव्यापक होता है I और यदि हम योगमार्ग के संपूर्ण चक्रों को लेंगे, तो एक सौ चौदाह होंगे I इन एक सौ चौदाह में से एक सौ बारह चक्र शरीर के भीतर होंगे और दो चक्र शरीर से परे ही पाए जाएंगे और इनमें से भी, केवल आठ चक्र ही प्रधान होंगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और यदि हम शरीर के समस्त चक्रों को ही ले लेंगे, तो उन चक्रों की संख्या असंख्य ही होगी, क्यूंकि यह चक्र प्रत्येक हड्डी के जोड़, शरीर के प्रत्येक अंग में भी पाए जाएंगे, और इसके अतिरिक्त समस्त कोशिकाओं में भी बहुत नन्हे से चक्र होते हैं I शरीर में जो कुछ भी होता है, उस सबका एक-एक चक्र होता है और ऐसा इसलिए है क्यूंकि इन्ही चक्रों से उस शरीर में ऊर्जा प्रवाहित होती (अर्थात आती और जाती) है, जिसके कारण इन चक्रों की संख्या असंख्य ही पाई जाएगी I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि …

ऊर्जा प्रवाह और उसका आवगमन स्थान और मार्ग ही चक्र कहलाता है I

 

सनातन गुरुदेव बोले… और तो और, रंध्रों के भीतर भी छोटे छोटे चक्र होते हैं, और तैंतीस कोटि नाड़ियों के भी अपने अपने छोटे छोटे चक्र होते हैं I इसलिए वास्तव में चक्रों की गणना असँख्य की ओर ही लेके जाएगी I लेकिन ऐसा होने पर भी अष्ट चक्र ही माना जाता है, क्यूंकि यही अष्ट चक्र प्रधान होते हैं I एक पूर्वजन्म में जब तुम पतञ्जलि कहलाए थे, तब तुमने ही इन सप्त चक्रों का ज्ञान और मार्ग बताया था, और वह मार्ग आज भी सुरक्षित ही है I इसलिए इस जन्म में केवल अष्टम चक्र और उससे संबंधित मार्ग को ही विस्तारपूर्वक बताओगे I वैसे तो शरीर में तैंतीस करोड एक सौ आठ नाड़ियाँ होती है, लेकिन भाषा में इन्हे तैंतीस कोटि ही कहा जाता है I

इस गुरुवाणी से नन्हा विद्यार्थी अचंभित हो गया क्यूंकि गुरुदेव ऊँगली से दिखा दिखा कर भी उन दशाओं को बता रहे थे I

सनातन गुरु आगे बोले… चक्र के आकार आदि से कोई चक्र प्रधान नहीं होता, क्यूंकि प्रधान चक्र वह होते है जिसके मध्य में यह प्राण वायु पाई जाती है I प्राण वायु के नाम पर ही प्राणमय कोष में प्राण शब्द आया है, और ऐसा इसलिए है क्यूंकि प्राण की गति आगे की ओर होती है, जो उत्कर्षपथ को दर्शाती है I और क्यूँकि योग और वेद में उत्कर्ष पथ पर गति को ही प्रधान माना जाता है, इसलिए प्राण वायु के प्राण नामक शब्द से ही प्राणमय कोष नामक शब्द आया है I

 

प्राण वायु की आगे की और गति, प्राण वायु का उत्कर्ष मार्ग, प्राण वायु का उत्कर्ष पथ, उत्कर्ष मार्ग और वास्तविक अगलापन, उत्कर्ष मार्ग और अगले से अगलापन, उत्कर्ष पथ और वास्तविक अगलापन, उत्कर्ष पथ और अगले से अगलापन, वास्तविक अगलापन, अगले से अगलापन, …

नन्हें विद्यार्थी ने पूछा… गुरु चंद्रमा, आगे की ओर गति किसे कहते हैं I

इसपर सनातन गुरु बोले… उत्कर्ष पथ पर वह गति जिससे वह उत्कर्ष पथ ही मुक्तिमार्ग हो जाए I और जहां यह गति वास्तविक अगलापन (अर्थात एक के बाद उससे अगली दशा के क्रमबद्ध स्वरूप में) की दशा में लेके जाती है I इसलिए जबकि इस गति में दशाओं का तारतम्य होता है, लेकिन तब भी इसकी मूलावस्था लौकिक, पारलौकिक, अध्यात्मिक और दैविक उत्कर्ष की ही होती है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, उत्कर्ष पथ में यह वास्तविक अगलापन क्या होता है?, और क्या इससे भी कोई विपरीत दशा भी होती है? I

सनातन गुरु बोले… वास्तविक अगलापन वह होता है जिसमें साधक की उत्कर्ष पथ पर गति वैसी ही होती है, जैसे एक सौ माले पर जाने की गति होती है, और जिसमें पहले माले से दुसरे, और दूसरे से तीसरे पर, और तीसरे से आगे के मालों पर भी क्रमबद्ध प्रकार से ही जाया जाता है I और ऐसी क्रमबद्ध गति में कर्मवश जाते हुए ही ऊपर जाया जाता है, और अंततः सौवें माले पर पहुंचा जाता है I उत्कर्ष पथ में, ऐसी एक के बाद एक क्रमबद्ध स्वरूप की गति को ही वास्तविक अगलापन कहते हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… इस वास्तविक अगलापन से विपरीत भी एक गति होती है जिसमें एक के बाद एक के मार्ग पर क्रमबद्ध स्वरूप में नहीं जाया जाता है I इसमें सौवें माले पर जाते जाते कुछ मालों को कूदा जाता है, जिससे साधक उन मालों को दरकिनार करके भी सबसे ऊपर के माले (अर्थात सौवें माले) पर पहुँच जाता है I यह गति अगले से अगलापन कहलाती है I

सनातन गुरुदेव बोले… ऐसी अगले से अगलापन गति में साधक, उत्कर्ष के कुछ मालों पर गए बिना ही गंतव्य पर पहुँच जाता है I और ऐसी अगले से अगलापन नामक उत्कर्ष गति होने के कारण, चाहे वह साधक गंतव्य पर ही क्यों न पहुँच गया हो, वह गंतव्य में स्थापित नहीं हो पाता है I गंतव्य में स्थापित नहीं होने का कारण भी वही है कि उस साधक ने अपने उत्कर्ष पथ की गति में कुछ बीच की दशाओं को दरकिनार किया था, जिसके कारण उन दशाओं की सिद्धि उस साधक के पास नहीं है I

सनातन गुरु आगे बोले… जबतक कोई साधक अपने उत्कर्ष पथ में, उस उत्कर्ष पथ के समस्त उपभागों पर क्रमशः जाकर, उनको सभी उपदशाओं को सिद्ध करके उनको क्रमशः पार नहीं करता, तबतक चाहे वह साधक उस उत्कर्ष पथ के गंतव्य पर ही क्यों न पहुँच जाए, लेकिन तब भी वह साधक उस गंतव्य में स्थापित नहीं हो पाएगा I इसलिए यदि उत्कर्ष पथ में जाते समय, उस उत्कर्ष पथ के कुछ उपभागों को दरकिनार किया जाएगा, तो चाहे वह साधक उत्कर्ष के गंतव्य पर ही क्यों न पहुँच जाए, तब भी वह साधक उस गंतव्य में स्थापित नहीं हो पाएगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इसीलिए जो योगीजन गंतव्य को पाकर भी उस गंतव्य में स्थापित नहीं हो पाते हैं, वह अपने उत्कर्ष पथ की पूर्व दशाओं में वही साधक रहे होते हैं जिनकी उत्कर्ष गति कभी न कभी अगले से अगलापन नामक दशा में रही होती है I और ऐसे साधक गंतव्य (अर्थात कैवल्य मोक्ष रूपी ब्रह्म) पर पहुँच कर भी (अर्थात उस निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करके भी), उस निर्गुण ब्रह्म में स्थापित नहीं हो पाते I और जब वह साधक इस बिंदु को जान जाते हैं, तब वह पुनः जन्म लेते हैं और अपने पूर्व कालों की उत्कर्ष गति के उन अगले से अगलापन वाली दशाओं में जाकर हैं, उन सबको क्रमशः प्राप्त होके, उनको क्रमशः ही सिद्ध भी करते हैं, ताकि उनके उत्कर्ष पथ में जो अगले से अगलापन वाली बाधाएं थीं, उन बाधाओं से पार जा सकें I जब ऐसे साधक उनके पूर्वकालों के उत्कर्ष पथ की उन सभी अगले से अगलापन दशाओं को सिद्ध कर लेते हैं, तब ही ऐसे साधक के उत्कर्ष पथ वास्तविक अगलापन में स्थापित हो पाते हैं… और इसके पश्चात ही वह साधक गंतव्य में स्थापित होते है… इससे पूर्व नहीं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जबतक किसी साधक की उत्कर्ष पथ पर गति वास्तविक अगलापन के अंतर्गत नहीं होगी, तबतक चाहे वह साधक गंतव्य को ही क्यों न साक्षात्कार कर ले, लेकिन वह उस गंतव्य में स्थापित तो बिलकुल नहीं हो पाएगा I ऐसे साधक ही आगामी कालों में किसी धरा पर स्थूल काया को धारण करते हैं, और अपने पूर्वकालों के उत्कर्ष पथ की अगले से अगलापन दशाओं को सिद्ध करते हैं I और इसके पश्चात, वह साधक अपने उत्कर्ष पथ को वास्तविक अगलापन में स्थापित करके, कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हो पाते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जबतक उत्कर्ष पथ की गति वास्तविक अगलापन के अंतर्गत नहीं आती, तबतक वह गति कैवल्य मुक्ति को भी नहीं दर्शाती I ऐसा इसलिए होता है, क्यूंकि यह समस्त ब्रह्म रचना जो ब्रह्मशक्ति ही है, वह उस साधक को गंतव्य पर तबतक स्थापित होने ही नहीं देंगी, जबतक वह साधक उसके अपने उत्कर्ष मार्ग के वास्तविक अगलापन में स्थापित नहीं हो जाएगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और ऐसे उत्कृष्टम साधक जो अपने किसी भी जन्म में, और अपने पूर्व जन्मों से चले आ रहे उत्कर्ष पथ के वास्तविक अगलापन को पूर्ण सिद्ध करे होते हैं, और गंतव्य प्राप्ति के पात्र बने होते हैं, वह उस गंतव्य प्राप्ति से पूर्व, अपने ज्ञान और मार्ग आदि के समस्त प्रमुख बिन्दुओं को अन्य जीवों के लिए और उन जीवों के उत्कर्ष मार्गों को प्रशस्त करके रखने के लिए, प्रदान भी करते हैं I ऐसे साधक ही उन गुप्त उत्कर्ष मार्गों और उनके ज्ञान को प्रदान करते हैं, जो उस समयखण्ड में लुप्त हो चुके होते हैं I ऐसे साधकगणों की हृदय गुफा में भी मैं (अर्थात सनातन गुरुदेव) स्वयंप्रकट होता हूँ I मेरा स्वयं प्रकटीकरण भी उन्हीं साधकगणों के हृदय गुफा में होता है, जो गंतव्य प्राप्ति के पात्र हुए हैं, और जिनके वह जन्म, इस समस्त महाब्रह्माण्ड में और उनके जीव रूप में, अंतिम जन्म ही होते हैं I

सनातन गुरुदेव… जिस साधक का जन्म अंतिम होना होता है, उसके हृदय गुगा में ही मैं (अर्थात सनातन गुरुदेव) स्वयंप्रकट होता हूँ… अन्य किसी के भी नहीं I इसलिये तुम्हारा यह जन्म भी अंतिम ही मानो, क्यूंकि इस जन्म के पश्चात, कोई भी सत्ता कुछ भी कर ले, तुम्हे जन्म नहीं दे पाएगी I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि इस समस्त महाब्रह्माण्ड में कोई सत्ता है ही नहीं, जो निर्गुण निराकार सहित, ब्रह्म की समस्त अभिव्यक्तित्यों को पूर्णरूपेण और समानरूपेण प्राप्त हुए और कैवल्य मुक्त योगी को सगुण साकार या सगुण निराकार, या कोई और, या किसी और ब्रह्म अभिव्यक्ति का स्वरूप दे सके I इसलिए किसी योगी की हृदय गुफा में, मेरा स्वयं प्रकटीकरण भी तब ही होता है, जब वह योगी अपने उत्कर्ष पथ के वास्तविक अगलापन को प्राप्त होने का वास्तविक पात्र हो जाता है… इससे पूर्व तो बिलकुल भी नहीं… और इससे पश्चात जब वह योगी अपने उत्कर्ष पथ के वास्तविक अगलापन को पूर्णरूपेण पा जाएगा, तब भी मैं उसकी हृदय गुफा में बिलकुल नहीं मिलूंगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब कोई योगी अपने उत्कर्ष पथ के वास्तविक अगलापन को पा जाता है, तब मैं उसके ह्रदय गुफ़ा में नहीं मिलूंगा I ऐसा इसलिए है क्यूंकि वह योगी उस अंतिम पथ पर चला जाता है, जिसको पूर्व में “स्वयं ही स्वयं में”, ऐसा कहा गया है, और जिसमें न तो कोई गुरु होता है और न शिष्य, न माता पिता और न पुत्र, न इष्ट और न भक्त, और न ही कोई और नाता होता है I उस अंतिम पथ में योगी, “स्वयं ही स्वयं में” जाता हुआ, स्वतंत्र कहलाता है, और जहाँ स्वतंत्र तो वह केवल स्वरूप ब्रह्म ही हैं I ऐसा होने के कारण जब किसी साधक का उत्कर्ष पथ पूर्णरूपेण वास्तविक अगलापन में ही स्थित हो जाएगा, तो मैं उसके हृदय में नहीं मिलूंगा, क्यूंकि इस वास्तविक अगलापन को प्राप्त होने के पश्चात, वह साधक केवल होकर, जीव जगत से ही अतीत होने के मार्ग पर चला जाएगा, जिसमें वह साधक स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य के सार में बसकर ही जाता है I

नन्हें विद्यार्थी की पूर्व की शंका की उसके हृदय में बसे हुए गुरुदेव कोई साधारण सत्ता नहीं है, वह प्रबल हो गई, इसलिए उस नन्हें विद्यार्थी ने अपने गुरुदेव को ऐसा बोल भी दिया I

 

आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरु बोले… प्राण वायु ही वह प्राण है, जो उस वास्तविक अगलापन की दशा को पुनः स्थापित करने में सहायक होती है I इसके कारण प्राण वायु ही वह प्राण है, जो साधक के उत्कर्ष पथ की सभी अगले से अगलापन से संबंधित दशाओं को पार करवाके, साधक के उत्कर्ष पथ को वास्तविक अगलापन में ही लेके जाती है I इसीलिए यह प्राण वायु जो आगे की ओर चलती है, उसको उत्कर्ष पथ से जोड़कर भी देखा जाता है I इसी कारण से किसी भी उत्कर्ष मार्ग पर गमन करते हुए, और समस्त जीवों के दृष्टिकोण से यह प्राण वायु सबसे प्रमुख प्राण भी हो जाता है I

सनातन गुरुदेव नन्हें विद्यार्थी की ओर उंगली दिखाकर आगे बोले… इस महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में कोई ऐसा योगी हुआ ही नहीं, जिसके पूर्वकालों के उत्कर्ष पथ में कुछ न कुछ अगले से अगलापन न रहा हो I कुछ योगीजन ऐसा ही होते हैं, जो उत्कर्ष पथ के अगले से अगलापन को धारण करके भी, गंतव्य साक्षात्कार किया होते, और ऐसे साक्षात्कार के पश्चात, वह गंतव्य में स्थापित नहीं हो पाते हैं क्यूंकि उनके उत्कर्ष पथ में अगले से अगलापन होता है I

और सनातन गुरुदेव नन्हें विद्यार्थी की ओर उंगली दिखाते हुए आगे भी बोले… और कुछ महापागलनाथ भी होते हैं, जो जान बूझकर उस अगले से अगलापन को पार नहीं करते, जिसके कारण वह कालचक्र के सदैव गतिशील और कुछ विशेष कालखण्डों में जन्म लेते ही जाते हैं I ऐसे योगीजनों को माँ प्रकृति, जो ब्रह्मशक्ति ही हैं, तब जन्म देती है जब या तो युग परिवर्तन हो रहा हो, या कोई चलता हुआ युग ही स्तम्भित किया जा रहा हो I आज के समयखण्ड में भी कलियुग को स्तम्भित करने की प्रक्रिया चलित हो रही है, और इसीलिए ऐसे एक योगी को इस धरा पर, परकाया प्रवेश के मार्ग से ही सही, लेकिन जन्म दिया गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जिस योगी की उत्कर्ष गति को वास्तविक अगलापन के अंतर्गत आना होता है, लेकिन तब भी वह वास्तविक अगलापन किसी कारणवश स्तम्भित हो जाता है, तब भी उस योगी की हृदय गुफा में मैं (अर्थात सनातन गुरुदेव) स्वयंप्रकट होता हूँ I इसलिए जो योगीजन मुक्ति के वास्तविक पात्र हैं और ऐसा होने पर भी उनमें वास्तविक अगलापन किसी कारणवश स्तम्भित हो गया है, तो उस रुकावट के निवारण हेतु भी मैं ऐसे योगीजनों के हृदय गुफा में, स्वयं ही स्वयंप्रकट होता हूँ I ऐसा इसलिए है क्यूंकि जो मुक्तिमार्ग का वास्तविक पात्र होता है, उससे विमुख हुआ ही नहीं जा सकता, चाहे उसका उत्कर्ष पथ किसी कारणवश स्तम्भित ही क्यों न हो गया हो I ऐसे साधकगणों के हृदय में भी मैं स्वयंप्रकट होता हूँ I और मेरे हृदय में स्वयंप्रकट होने का कारण भी वही है जो पूर्व में बताया था, कि हृदय की प्राण वायु ही उत्कर्ष पथ को दर्शाती है, और इसी वायु का आलम्बन लेके ही भवसागर को पार किया जाता है I इसी मुक्तिमार्ग पर गति का संकेत, ब्रह्मसूत्र के अंतिम अध्याय में बताया गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब योगी किसी ऐसे उत्कर्ष मार्ग पर जाता है जो बहुत अधिक गति (या तीव्रता) को प्रदान करता है, या जो कहता है कि इस मार्ग पर मुक्ति को सीधा-सीधा पाया जा सकता है, तब ऐसे योगी का उत्कर्ष मार्ग वास्तविक अगलापन के अंतर्गत नहीं रह पाता, और इसीलिए ऐसा योगी ही उस दशा को पाता है जिसे यहाँ पर अगले से अगलापन कहा गया है I इस कलियुग के कालखंड में आए जितने भी मार्ग हैं, उनमें से अधिकांश मार्ग इसी अगले से अगलापन को, या तो पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप में जाते ही हैं I इसीलिए इस कलियुग के कालखंड में आए अधिकांश मार्गों में तो वह क्षमता ही नहीं है, कि वह साधक को कैवल्य में स्थापित कर सके I इस कलयुग के कालखंड में आए वह सभी मार्ग जो कहते हैं, कि वही सत्य है और अन्य सभी असत्य, वह सभी के सभी इसी अगले से अगलापन के हैं I इसलिए उन सभी विकृत एकवादी (अर्थात मोनोथेइस्टिक) मार्ग और उनके ग्रन्थों में मुक्ति नहीं होती, और इसी कारणवश वह सभी कहते ही हैं, कि उनके अनुयायियों के न्याय भी अंत समय में ही होगा I यही प्रमाण है कि ऐसे मार्गों में मुक्ति का सिद्धांत होते हुए भी… नहीं है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और वास्तविकता तो यही है, कि जिन मार्गों में मुक्ति का सिद्धांत ही नहीं होता, वह सनातन मार्ग भी नहीं होते, इसलिए ऐसे मार्ग बस आते हैं, कुछ समय तक किसी लोक में दिखाई देते हैं और इसके पश्चात वह कलह कलेश में जाकर, ऐसे समाप्त होते है जिससे आगामी कालखंडों में तो उनका कोई संकेत मात्र भी शेष नहीं रहता I यह सभी विकृत एकवाद के मार्ग (अर्थात मोनोथेइसम के मार्ग) न तो व्यापक हैं, और न ही अनश्वर सनातन I जब इनका समय पूर्ण होता है, तब यह सभी अपने उसी अंत को पाते हैं, जिनके बारे में इनके शास्त्रों में ही कहा गया है I और जबतक यह विकृत एकवाद के मार्ग किसी लोक में रहते भी हैं, तबतक उस लोक में समय-समय पर कलह कलेश के कारण भी बनते हैं I इसलिए इन मार्गों की गति न तो शान्ति में होती है, और न ही किसी और लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक या दैविक समृद्धि में I वह समयखण्ड जिसका आगमन बस आने ही वाला है, वह ऐसे ही विश्वव्यापक कलेशों का है जिनसे जाकर यह सभी विकृत एकवाद के मार्ग अपने अंत को पाएंगे I और क्यूंकि आज के समयखण्ड में ऐसे विकृत एकवाद के मार्ग ही सर्वाधिक हैं, इसलिए आगामी समय में नास्तिकता की भी बहुत बड़ी वृद्धि होनी है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… आगामी समयखण्ड में, मानव जनित, प्राकृतिक और दैविक, तीनों प्रकार के प्रकोप आएँगे और मानव जाति त्राहि-त्राहि करेगी I इसी त्राहिमाम से उस अनादि अनंत सनातन का उदय होगा, इसलिए उस आगामी समयखण्ड में, एक ओर विकृत एकवाद के कारण त्राहिमाम हो रहा होगा और दूसरी ओर सनातन प्रकाशित हो रहा होगा, और इसी सनातन से आध्यात्मिक उत्कर्ष भी चलित हो रहा होगा I क्यूंकि यह समय इस ज्ञान का नहीं है, इसलिए इसका प्रकाश भी कुछ साधकगण को ही प्रभावित करेगा, न की अधिकांश मानव जाती को I इसीलिए, जबतक आगामी समय में इस लोक में सनातन का प्राथमिक प्रकाश नहीं आएगा, इस ज्ञान के पाठक भी बहुत कम मात्रा में होंगे I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, क्या वह प्राण वायु केवल प्रधान चक्रों में ही निवास करती है, या यह अन्य चक्रों में ही होती है? I

सनातन गुरुदेव बोले… यह सभी चक्रों में होती है, लेकिन यह चक्रों के मध्य में प्राण केवल मुख्य चक्रों में ही पाया जाएगा… इस बिंदु को स्वयं अध्ययन करके जानो I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और अपने गुरुदेव को बोला… जी, जबकि यह प्राण सभी चक्रों में है, लेकिन चक्रों के मध्य में यह केवल उन आठ चक्रों में ही है जिनके बारे में आपने पूर्व में बताया था I

सनातन गुरुदेव बोले… समस्त संसार में, यही प्राण वायु उत्कर्ष पथ पर वास्तविक अगलापन की गति को दर्शाती है I इसी वास्तविक अगलापन में बसी हुई उत्कर्ष गति के समस्त भागों को भी यही प्राण वायु ही दर्शाती है I और जबतक योगी उस उत्कर्ष पथ पर नहीं जाएगा, जो तीव्रता में बसा हुआ है, तबतक यह प्राण वायु उस योगी को वास्तविक अगलापन में ही स्थापित रखेगी और योगी के उत्कर्ष मार्ग को सुरक्षित रखने भी सहायक होगी I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, पूर्व में आपने अनेच्छिक कार्यों को व्यान वायु से जोड़कर बताया था, तो क्या यह प्राण वायु अनेच्छिक कार्यों को करने में भी सहायक होती है? I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… व्यान प्राण से ही अनेच्छिक कार्य सम्पादित होते हैं, परन्तु उन अनेच्छिक कार्यों को वास्तविक अगलापन में रखने में यह प्राण वायु का योगदान रहता ही है I साधक के उत्कर्ष मार्ग को वास्तविक अगलापन में रखने के लिए, इस प्राण वायु का योगदान होता है, और तब से होता है जब से वह माता के गर्भ में स्थापित हुआ था I और जीवों के दृष्टिकोण से यही वायु समस्त जीवों के उत्कर्ष पथ के वास्तविक अगलापन को बनाए रखने का कारण भी है I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव ने अपने हाथ को गोलाकार दिशा में घुमाया और कहा… जब से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है, तब से यह प्राण वायु इसी वास्तविक अगलापन को बनाए रखने के कार्य में लगी हुई है, और ऐसी ही यह प्राण वायु रहेगी भी I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, लेकिन यदि यह प्राण वायु वास्तविक अगलापन को बनाए रखने का कार्य करती ही रहती है, तो उत्कर्ष मार्गी साधक और योगीजनों में अगले से अगलापन कैसे आता है? I

इसपर सनातन गुरु बोले… यदि इच्छा शक्ति का प्रयोग अधिक हो जाएगा, तो ही यह अगले से अगलापन आएगा… अन्यथा नही I संपूर्ण सृष्टि और सृष्टि संयुक्त जीव जगत की उत्पत्ति पितामह ब्रह्मा की इच्छा शक्ति से ही हुई थी, इसलिए जीवों के उत्कर्ष मार्गों में भी यही इच्छा शक्ति, प्रधान शक्ति होती है I इसलिए यदि किसी साधक की वह इच्छा शक्ति, जो पितामह ब्रह्मा की इच्छा शक्ति से ही संबद्ध है, और जिससे यह जीव जगत उत्पन्न हुआ है, प्रबल हो जाएगी, तो यह प्राण वायु क्या कर लेगी? I प्रबल इच्छा शक्ति ही उत्कर्ष मार्गी साधकगणों को विकृतियों की ओर लेके जाती है, जिनमें से एक उत्कर्ष पथ का अगले से अगलापन में चला जाना भी होता है I इच्छा शक्ति से ही सबकुछ उत्पन्न होता है, इच्छा शक्ति से ही सबकुछ स्थित होता है, इच्छा शक्ति से सबकुछ संघार होता है I इच्छा शक्ति ही तिरोधान (अर्थात निग्रह) और अनुग्रह कृत्य की कारण और कारक भी होती है I

सनातन गुरु आगे भी बोले… इच्छा शक्ति से ही सबकुछ प्राप्त होता है, और इच्छा शक्ति से ही सब कुछ अप्राप्त भी होता है I इच्छा शक्ति ही इस जीव जगत के मूलशक्ति है, और यही इच्छा शक्ति ही उन रचैता ब्रह्म की मूल प्रकृति कही गई है, जो अपराजिता मूल प्रकृति है, और जिनको दुर्गा भी कहा गया है I ऐसी इच्छा शक्ति को अदि पराशक्ति, पराशक्ति और अदि शक्ति आदि भी कहा गया है, और समस्त शक्तियों के मूल में यही इच्छा शक्ति होती है I जबतक साधक की तृष्णा ही विकृत नहीं होती, तबतक साधक की इच्छा शक्ति भी विकृत नहीं होती I और जब साधक अपनी विकृत तृष्णाओं से ही ग्रसित हो जाएगा, तब उस साधक की इच्छा शक्ति भी विकृत हुए बिना नहीं रह पाएगी, और ऐसी दशा में उस साधक का उत्कर्ष मार्ग भी अगले से अगलापन में जाए बिना नहीं रह जायेगा I यही कारण है, कि योगी को उसके मन बुद्धि चित्त अहम् में उठती हुई तृष्णा का नाश करते रहना चाहिए I इस नाश प्रक्रिया के मूल में, ब्रह्मभावापन ही होता है, इसलिए उत्कर्षमार्गी योगीजनों को अपनी तृष्णा का नाता केवल “ब्रह्म से और ब्रह्म में” रखकर रहना चाहिए I ब्रह्मभावापन अवस्था में योगी का उत्कर्ष मार्ग अगले से अगलापन में जा ही नहीं सकता है I समस्त उत्कर्ष मार्गों का यही वह मूल सिद्धांत भी है, जिससे उत्कर्ष मार्ग विकृत नहीं हो पाता है… लेकिन इसको तो केवल उत्कृष्ट योगीजन ही जान पाए हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने अपने गुरुदेव की ओर मुख करके प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा,  तो क्या इसका अर्थ हुआ, कि विकृत तृष्णा, अर्थात वह तृष्णा जो ब्रह्मभावापन अवस्था से संबद्ध नहीं है, उससे ही इच्छा शक्ति साधक के उत्कर्ष मार्ग को अपकर्ष की ओर लेकर जाती है और अगले से अगलापन का कारण बन जाती है? I

सनातन गुरुदेव बोले… इच्छा शक्ति ही उत्कर्ष पथ के प्रादुर्भाव, उस उत्कर्ष पथ की सुरक्षा और उस उत्कर्ष पथ में स्थिरता का कारण होती है, लेकिन ऐसा होने के लिए इच्छा शक्ति को ब्रह्म भावापन होना ही होगा, और जहां वह ब्रह्म ही साधक का आत्मस्वरूप होते हैं I और इसके विपरीत जब वही इच्छा शक्ति, विकृत तृष्णा में बस जाती है, तो वह अपकर्ष पथ पर गति का कारण भी बन जाती है I विकृत तृष्णा उसे कहते हैं, जो वर्षा के समान आती है और काम, लोभ, मोह, अहंकार आदि अवगुणों के अतिवृष्टि और अनावृष्टि स्वरूप से संबंधित होती है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि वह वर्षा के सामान तृष्णा, जो ब्रह्म भावापन अवस्था से संबंधित नहीं है, उसकी अनावृश्टि भी उतनी ही हानिकारक होती है, जितनी उसकी अतिवृष्टि होती है I ऐसी विकृत तृष्णा की दशा में साधक की इच्छा शक्ति भी विकृत हुए बिना नहीं रह पाती, और ऐसा होने का कारण ही वह साधक ही उस मार्ग पर जाता है जो अपकर्ष कहलाता है और जिसका नाता अगले से अगलपन से किसी न किसी रूप में होता ही है I जब तब साधक ब्रह्म भावापन रहेगा, तबतक उसके समस्त भाव और भावों से चलित कर्म भी ब्रह्म के लिए ही किए जाएंगे, और ऐसा ही उन कर्मों के फल भी होंगे I इनके उदाहरण देता हूँ, इसलिए अब ध्यान देना I जब ऐसा ब्रह्म भावापन साधक…

  • अन्न ग्रहण करेगा, तो उसके मन में जो भाव होगा, उसमें वह साधक अपने आत्मस्वरूप ब्रह्म को ही भोजन करवाएगा I
  • स्नान आदि प्रक्रियाओं में जाएगा, तो उसके भावों में वह साधक उस ब्रह्म दुर्गों (अर्थात ब्रह्म के मंदिरों) को ही स्नान करवा रहा होगा, जो उस साधक के स्थूल आदि देह हैं I
  • जब साधक निद्रा में ही होगा, तब भी वह उस ब्रह्म दुर्ग को विश्राम करवा रहा होगा I
  • जब ऐसा साधक कोई कर्म कर रहा होगा, तो उस साधक की भावना में वह साधक उस ब्रह्म दुर्ग, जो उस साधक का शरीर ही है, उसके लिए ही कर्म कर रहा होगा I
  • इसलिए, ऐसे साधक की इस ब्रह्म भावापन दशा में जो भी होगा, या किया जाएगा, वह सब उस आत्मा रूपी ब्रह्म के लिए, या उस आत्मदुर्ग (या ब्रह्मदुर्ग) जो उस साधक का शरीर ही है, उसके लिए ही होगा या किया जाएगा I
  • यही ब्रह्म भावापन दशा है और इसी दशा को पाकर, योगीजन उत्कर्ष मार्ग से भटकते नहीं है I
  • और इसी ब्रह्म भावापन दशा में पूर्णरूपेण बासकर, योगीजन उस मार्ग पर जाते हैं, जिससे वह इस भवसिंधु को स्वतः ही और सरलता से पार करके, कैवल्य में ही स्थापित हो जाते हैं I
  • इस ब्रह्म भावापन दशा में योगीजनों के उत्कर्ष मार्ग, अगले से अगलापन में जा ही नहीं सकते हैं I इसलिए ऐसी भावनात्मक दशा में योगीजन कैवल्य को पाकर, उसी में विलीन हो जाते हैं I
  • और यदि उन योगीजनों के उत्कर्ष मार्गों की पूर्व दशाओं में कुछ अगले से अगलापन का कुछ भी दुष्प्रभाव रहा होगा, तो वह भी स्वतः ही नष्ट हो जाएगा I
  • ऐसे ब्रह्म भावापन योगीजन जीव जगत से एकवाद भी रख पाते हैं, और जहां यह एकवाद भी इस जीव जगत के रचैता ब्रह्म से ही होकर जाता है, इसलिए वह किसी विकृति में भी नहीं जा पाते हैं I और ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि ऐसे योगीजनों को जीव जगत स्वरूप में भी ब्रह्म ही दिखाई देता है I

 

सनातन गुरुदेव बोले… ऐसे ही योगीजन यह भी मानते हैं कि…

जीव भावापन अवस्था ही संघ का गंतव्य होता है I

जीव भावापन अवस्था में चरअचर सहित, समस्त जीव जगत होता है I

ऐसे संघ में ही चतुर्मुखा पितामह प्रजापति सहित, श्रीहरि भी पाए जाते हैं I

जीव भावापन दशा से ही शिवसंघ, नारायणसंघ, ब्रह्मसंघ, आदि को पाया जाता है I

  • इसी जीव भावापन को प्राप्त होके और उसी में पूर्णरूपेण स्थित होके, साधक जीवातीत और जगतातीत भी होते हैं I
  • और ब्रहंमाण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से ऐसे साधक…

पिण्ड रूप में होते हुए भी पिण्ड नहीं माने जाएंगेवह पिण्डातीत ही कहलाएंगे I

ब्रह्माण्ड में होने पर भी, ब्रह्माण्डीय नहीं होंगेवह ब्रह्माण्डातीत ही कहलाएंगे I

ब्रह्मरचना होने और ब्रह्मरचना में बसे होने पर भी, वह रचनातीत ही कहलाएंगे I

  • ऐसे जीव भावापन योगीजन ही उस कर्मातीत मुक्ति को प्राप्त होते हैं, जो कर्म और कर्म फलों में नहीं पाई जाती है I इसलिए ऐसा साधक ही उस सर्वव्यापक कर्म और कर्मफल सिद्धांत से परे चले जाते हैं, जिसमें यह समस्त जीव जगत बसाया गया था और जिसके कारण इस जीव जगत को कर्मक्षेत्र भी कहा गया है I ऐसे योगीजन ही उस कैवल्य मोक्ष को पाते हैं, जो उनका ही आत्मस्वरूप होता है, और जो वैदिक वाङ्मय में पूर्ण शब्द से दर्शाया गया है, और ब्रह्म कहलाया है I
  • ऐसे योगीजनों का मुक्तिमार्ग भी उस जीव जगत भावापन अवस्था से होकर जाता है, जो ब्रह्माण्ड धारणा और ब्रह्माण्ड योग का मार्ग होता है, और जिसमें साधक समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी काया के भीतर ही उस ब्रह्माण्ड के प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में ही साक्षात्कार करके, उस ब्रह्माण्ड को ब्रह्म के ही अभिव्यक्त रूप में जानकार, ब्रह्म रूप में ही पाता है I ऐसा साधक ही कह पाता है कि…

अभिव्यक्ता ही अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति का मुक्तिमार्ग हुआ है I

समस्त जीव जगत और उसका तंत्र, ब्रह्म की अभिव्यक्तिब्रह्म ही है I

अभिव्यक्ता (ब्रह्म) अपनी ही अभिव्यक्ति (जीव जगत) से पृथक नहीं है I

अभिव्यक्ति के भीतर से ही अभिव्यक्ता को जाने वाला मुक्तिमार्ग प्रशस्त है I

इसी मुक्तिमार्ग को शाश्वत, अनादि अनंत, सनातन वैदिक आर्यमार्ग कहा गया है I

इस मार्ग का मूल ही वो अमूल गंतव्य है जो कैवल्यमोक्ष स्वरूप ब्रह्म कहलाता है

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ध्यानपूर्वक सुनो…

यही मार्ग है जिसमें तृष्णा पर विजय पूर्णरूपेण पाई जाती है I

क्यूंकि इस मार्ग में तृष्णा भी ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरूप में ही पाई जाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और ऐसे पाए जाने के कारण, वह तृष्णाएं भी ब्रह्मलीन होकर, विशुद्ध होकर, साधक के पास आती है I लेकिन इन सभी के भावनात्मक मूल में ब्रह्म भावापन के सिवा कुछ और नहीं होने चाहिए I ऐसी ब्रह्म भावापन दशा में पूर्णरूपेण स्थित हुआ साधक…

त्रिष्णातीत ब्रह्म को पाएगा, जो केवल है, निर्गुण निराकार है, स्व:प्रकाश सर्वसाक्षी है I

ऐसा ही साधक का आत्मस्वरूप भी होगा, जो स्वयं ही स्वयं का साक्षी ही होगा I

और साधक का स्वयं भी, उसकी काया सहित, जीव जगत रूप में व्यापक होगा I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यही उस उत्कर्ष पथ को दर्शाने वाली प्राण वायु की गंतव्य सिद्धि है, जिसमें साधक का आत्मस्वरूप ही उन हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म के समान, “स्वयं ही स्वयं में” रमण करता हुआ, और समस्त जीव जगत स्वरूप में बसा हुआ भी, उस जीव जगत से अतीत ही रहता है I वैदिक ऋषिगणों ने इसी स्वरूप को, जो होता हुआ भी नहीं है और नहीं होता हुआ भी सदैव ही शाश्वत रहा है, पूर्ण और ब्रह्म के शब्दों से दर्शाया है I इससे आगे कोई सिद्धि नहीं होती, क्यूंकि इसके अंतर्गत ही समस्त सिद्धियाँ आती हैं I लेकिन जिस साधक ने यह सब कुछ जाना होगा, वह पूर्ण संन्यास को पाए बिना भी नहीं रह पाता है Iऔर जहां वह पूर्ण संन्यास नामक शब्द भी निर्गुण निराकार ब्रह्म का ही द्योतक है, जो कैवल्य मोक्ष ही हैं I

इसके पश्चात गुरुदेव ने नन्हें विद्यार्थी की ओर ऊँगली करके कहा… अपने इस परकाया प्रवेश के जन्म में, तुम भी इसी मार्ग पर गमन करने हेतु लौटाए गए हो I और तुम इस मार्ग पर चले तो जाओगे, लेकिन इसपर तबतक स्थित नहीं हो पाओगे, कबतक तुम अपने पूर्व जन्मों के शेष कार्य, जो तुम्हारे पूर्व जन्मों के गुरुजनों और मनस पिता के आदेशानुसार होने हैं, उनको पूर्ण नहीं कर दोगे I और उसी कर्म आदि की श्रंखला में, तुम्हारे हृदय के भीतर मेरा (अर्थात सनातन गुरुदेव का) स्वयं प्रकटीकरण हुआ है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह जन्म तुम्हारा अंतिम में से भी अंतिम ही है I जो उस पूर्ण संन्यास को पाकर, उस पूर्ण संन्यासी ब्रह्म में ही स्थापित हो गया, उसका किसी भी आगामी समय खंड में सगुण साकार या सगुण निराकार काया रूप में आगमन या प्रस्थान या स्थिति कैसे हो सकती है?… थोड़ा सोचो तो I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अघोर मार्ग में साधक सबकुछ जानकार, मुक्ति को नहीं पा पाता है क्यूंकि अघोर मार्ग सिद्धों का मार्ग है, और जो सिद्ध होता है, वह मुक्त नहीं हो पाता है I और इसके विपरीत वैष्णव मार्ग में, योगी अज्ञानी सा होकर ही रहता है, और इसके कारण वह योगी स्वतः ही मुक्ति को पाता है, क्यूंकि इस मार्ग में उसकी पूर्व जन्मों की सिद्धियाँ भी नहीं रहती हैं I

मुक्तात्मा कभी सिद्ध नहीं हुआ है, और सिद्धात्मा कभी मुक्त नहीं हुआ है I

निर्गुण ब्रह्म में कोई सिद्धि नहीं होतीब्रह्म्रचना कभी सिद्धितीत नहीं होती I

वह योगी जो सिद्धात्मा ही हो गया, उसको मुक्ति या बंधन से क्या लेना देना? I

जो मुक्तात्मा हुआ, उसको सिद्धि से क्या लेना, वह तो सिद्धियों से भी मुक्त है I

सिद्ध से अच्छा कोई गुरु नहींमुक्तात्मा से अच्छा कोई मुक्तिमार्ग नहीं होता I

जो कैवल्य मुक्त हुआ है, वह निर्गुण निराकार ब्रह्म के समान सिद्धितीत ही है I

सिद्ध उत्पत्ति, स्थिति, संघार, निग्रह कृत्यों कामुक्तात्मा अनुग्रह कृत्य का होता है I

अनुग्रह का प्राप्ति मार्ग भी उत्पत्ति, स्थिति, संघार, निग्रह कृत्यों से होकर ही जाता है I

वास्तविकता तो यही है, कि पूर्व का सिद्धात्मा ही मुक्तात्मा होने का पात्र होता है I

 जो पूर्व का सिद्ध ही नहीं होगा, वह मुक्तात्मा होने का पात्र भी नहीं हो सकता है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… लेकिन तुम्हारा मार्ग तो वैष्णव अघोरी का है, इसलिए इस जन्म में तुम उस पूर्ण संन्यास को ही पाओगे, जो निर्गुण ब्रह्म कहलाता है और जिसकी अभिव्यक्ति यह समस्त जीव और महाब्रह्माण्ड ही है I इसलिए इस जन्म में तुम ब्रह्म भारत और भारती विद्या सरस्वती में ही विलीन होकर, उन निर्गुण ब्रह्म को जाओगे I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि भारत ही ब्रह्म है और उस भारत नामक ब्रह्म की दिव्यता या शक्ति को ही भारती सरस्वती कहा गया है I ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि ऐसा मार्ग मुक्ति और सिद्धि, दोनों में ही नहीं होता I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिन्दुओं को भी ध्यानपूर्वक सुनो…

जो इन दोनों से अतीत है, उसको इनसे, इनके सिद्धांत या मार्गों से क्या लेना देना I

जो ऐसा अतीत है, वह होता हुआ भी नहीं है, और नहीं होता हुआ भी शाश्वत ही है I

जो ऐसा है, वही पूर्ण और ब्रह्म कहलाया है, उसी को पूर्ण संन्यास कहा जाता है I

वास्तव में समस्त जीवजगत, वह पूर्ण संन्यासी ही हैमैं और तुम भी वही हैं I

 

और सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिन्दुओं को भी बहुत ध्यानपूर्वक सुनो…

सम्पूर्ण रचना में, उस पूर्ण संन्यासी ने अपने सिवा, कुछ और बनाया ही नहीं है I

वह पूर्ण संयासी (ब्रह्म) अपने सिवा कुछ और बना पाया ही नहीं है I

इसी सत्य का प्रमाण, समस्त वैदिक महावाक्य भी हैं I

तुम वही सत्य होतत् त्वम् असिऐसा जानो I

इसी सत्य का मार्ग यह प्राण वायु भी है I

 

नन्हें विद्यार्थी समझ गया, परन्तु उसको अभी भी संतुष्टि नहीं मिली, इसलिए उसने गुरु मुख की ओर ऊपर देखकर बोला… गुरु चंद्रमा,  इन प्राणों के वर्ण गुण आदि पृथक शास्त्रों में पृथक क्यूँ बताए गए हैं? I

इस प्रश्न पर सनातन गुरुदेव बोले… जिस दशा में स्थित होकर इनका साक्षात्कार होगा, वैसे ही इनके वर्ण और गुणादि भी पाए जाएंगे I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि यह प्राण प्रकृति के ऊर्जा स्वरूप हैं, जिसके कारण यह प्रकृति की पृथकता भी में बसे हुए हैं I यह वैसा ही है जैसे किसी रंगीन चश्मे से यदि श्वेत आदि रंगों को देखोगे, तो उन रंगों में उस चश्मे का रंग भी दिखाई देंगे I जिस भाव, मन, विद्या, चित्त और अहम् आदि दशा में बैठकर इन प्राणों को देखा जाएगा, यह प्राण उसी दशा के अनुसार ही साक्षात्कार होंगे, और ऐसे साक्षात्कार में, इन प्राणों में उसी दशा के बिंदु भी पाए जाएंगे जिसके भीतर बैठकर या जिसका आलम्बन लेकर इनका अध्ययन किया जाएगा I यही कारण है कि पृथक योग्यजनों ने इन प्राणों के पृथक वर्ण और गुणधर्म आदि बताए हैं I परन्तु हृदयाकाश की इस प्राण गुफ़ा में यह प्राण, अपनी वास्तविकता में ही पाये जाएंगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… लेकिन जब योगी उस आंतरिक शक्ति शिव योग को ही चला जाता है, और जब वह योग उस योगी की काया के भीतर ही प्रतिष्ठित और चलित होता है, तब इस योग के पूर्ण होने के पश्चात, यह सभी प्राण श्वेत ही पाए जाएंगे I यह श्वेत वर्ण ही इन प्राणों की प्राचीन (या प्राथमिक) दशा थी, जब यह प्राण अपने पञ्चक स्वरूप में नहीं आए थे I इस शिव शक्ति योग में, साधक के नाभि क्षेत्र में बसा हुआ अमृत कलश ऊपर को उठता है और अष्टम चक्र को ही पार कर जाता है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, क्या अमृत कैलाश की दशा वही है जो सूक्ष्म सांकेतिक रूप में कुछ योगीजनों ने बताई है I

सनातन गुरु ने उत्तर दिया… पर इसके बारे में तो कई योगीजनों ने और कई शास्त्रों में सूक्ष्म सांकेतिक रूप में बताया गया है I उसी सूक्ष्म सांकेतिक स्वरूप में तो इसके बारे में ब्रह्मसूत्र में भी बताया गया है I इसलिए यह वह प्रश्न है, जिसको साधक को स्वयं ही साक्षात्कार करना होता है, क्यूंकि इसका कितना भी वर्णन कर लो, पर इसका पूर्ण ज्ञान वही जानता होगा, जो इस शक्ति शिव योग से गया होगा, और जहां यह योग भी उस साधक की काया के भीतर ही हुआ होगा I योगमार्ग के कुछ बिन्दु स्व:साक्षात्कार का ही अंग होते हैं, और यह शिव शक्ति योग भी उनमें से एक है, क्यूंकि यह योग निर्बीज समाधि का मार्ग ही है, और शब्दों में निर्बीज का पूर्ण वर्णन असंभव होता है I और ऐसा इसलिए होता है, क्यूँकि निर्बीज समाधि कर्म, कर्मफल और उनके संस्कारों और इनके सिद्धांत से भी अतीत जाने का मार्ग होती है I इस मार्ग से जाकर ही योगी कर्मातीत मुक्ति को प्राप्त होता है I

सनातन गुरु आगे बोले… अब ध्यान देना …

कर्मातीत मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है क्यूंकि कर्माधीन मुक्ति तो केवल प्रपंच है I

कर्मातीत मुक्ति तो कर्मों और फलों में है ही नहीं, तो इसको कर्मों से कैसे पाओगे I

कर्मातीत मुक्ति को तो कर्म और कर्मफल, दोनों को त्यागके प्राप्त हुआ जाता है I

कर्ममुक्ति का मार्ग त्याग ही है और जहां वह त्याग भी जीव जगत का होता है I

वह कर्ममुक्ति जो तुम स्वयं ही अनादि अनंत कालों से हो, उसको पाओगे कैसे I

कर्ममुक्त जो तुम अपने शाश्वत आत्मस्वरूप में हो ही, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

कर्ममुक्ति का तो बस होने पड़ेगा, क्यूंकि वह कर्मों और फलों से अतीत दशा है I

सर्वस्वत्याग ही कर्ममुक्ति का वह एकमात्र मार्ग है, जिसपर विरले योगी जाते हैं

सनातन गुरुदेव अपने नन्हें विद्यार्थी की और ऊँगली दिखा के आगे बोले… मुक्ति का ऐसा होने के कारण ही तो पुरातन कालों में उत्क्रिस्ट योगीजन जब किसी पात्र को मुक्ति का ही आशीर्वाद देते थे, तो वह कहते थे मुक्त भवः, जिसका वास्तविक अर्थ था कि मुक्ति को प्राप्त हो, न की मुक्ति को प्राप्त करो I ऐसे उत्कृष्ट योगीजनों द्वारा ऐसा इसलिए कहा जाता था, क्यूंकि वह गंतव्य स्थित योगीजन जानते थे, कि…

कर्ममुक्ति को पाया नहीं जाता है, उस कर्ममुक्ति को तो बस प्राप्त हुआ जाता है I

कर्ममुक्ता ही समस्त कर्मों, कर्मफलों और उनके संस्कारों से अतीतातीत होता है I

पूर्ण संन्यासी ब्रह्म को ही कर्ममुक्ता कहते हैंतुम वही होतत् त्वम् असि I

जीव जगत रूप में भी वह कर्ममुक्त ब्रह्म ही हैऐसा मानो, ऐसा ही जानो I

 

हृदय में विराजमान सनातन गुरु अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर ऊँगली करके आगे बोले…

वह मुक्ति तो मुक्ति ही नहीं होती, जो सर्वस्व से नहीं होती है I

जिसमें साधक स्वयं से ही मुक्त नहीं हुआवह भी कैसी मुक्ति I

वास्तविक मुक्ति में तो योगी स्वयं भी स्वयं का साक्षी मात्र ही रह जाता है I

इसमें योगी स्वयं को ही ब्रह्म, ब्रह्मरचना और रचना के तंत्र स्वरूप में पाता है I

इसके पश्चात ही वह योगी स्वयं ही स्वयं का साक्षी होकर, सर्वसाक्षी हो पाता है I

जो योगी स्वयं ही स्वयं सहित, सर्वसाक्षी हुआ हैतुम वही होतत् त्वम् असि I

 

इसके पश्चात, अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर अपनी उंगली दिखाते-दिखाते हृदय में बसे हुए सर्वज्ञ और सनातन गुरु बोले…

ब्रह्म ही शाश्वत, सर्वमूल, सर्व, सर्वगंतव्य, सर्वव्यापक, सार्वभौम, सर्वसाक्षी सर्वज्ञ है I

सर्वसाक्षी ही निर्गुण निराकार, सगुण निराकार, सगुण साकार हैवही सर्वज्ञ ब्रह्म है I

ब्रह्म ही कैवल्य, मोक्ष, निर्वाण, स्वतंत्र, निरंजन, निरालम्ब, निर्विकल्प और निर्बीज है I

योगी का आत्मस्वरूप भी वही ब्रह्म होता हैतुम वही ब्रह्म होतत् त्वम् असि I

 

हृदयाकाश गर्भ की प्राण गुफा में गुरु के साथ बैठा हुआ नन्हा विद्यार्थी जो अपने गुरु के मुख की ओर ही एकटक देखता हुआ, शांत चित्त होकर यह गुरूवाणी सुन रहा था, वह अब सोचने लगा… लगता है कि मेरी हृदय गुफा में, साक्षात सनातन भगवान् ही मेरे गुरु रूप में स्वयंप्रकट हुए हैं I

 

नाग उपप्राण क्या है?, नाग वायु क्या है?, नाग लघु वायु क्या है?, …

सनातन गुरु जो उस विद्यार्थी को देख रहे थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए उस नन्हे शिष्य का हाथ पकड़ा और बोले… चलो अब नाग उपवायु का अध्ययन करते हैं I

ऐसा कहते ही वह नन्हा विद्यार्थी उठा और सनातन गुरु के साथ, उसी प्राण गुफा के भीतर चलने लगा I

कुछ दूरी पर एक हल्का नीला प्रकाश आया जिसकी ओर गुरुदेव ने अपनी ऊँगली दिखाकर कहा… वह नाग उपवायु है I

नन्हें विद्यार्थी ने गुरु की ऊँगली से दिखाई हुई दिशा की ओर देखा और कहा… जी देख लिया I

और इसके पश्चात उस नन्हें विद्यार्थी ने कहा… गुरु चंद्रमा,  इस नाग लघुवायु की गति ज्यावक्रीय दशा में क्यूँ है? I

सर्वज्ञ गुरु बोले… इस वायु का नाता भावों से होता है, और वह भावों की गति भी ज्यावक्रीय सरीकी ही होती है I इसी वायु में समस्त भाव बसे होते हैं, और इसी वायु से समस्त भाव चलित होकर, कर्मों आदि का स्वरूप धारण करता हैं I इसी ज्यावक्रीय गति से ही तो इस उपप्राण का नाम नाग कहलाया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब भाव सूक्ष्मता से संबद्ध होते हैं, तब इस वायु की ज्यावक्रीय गति में इन वायु तरंगों का आयाम विस्तार भी न्यून होता है I और ऐसी दशा में इन वायु तरंगों की आवृत्ति भी अधिक होती है I और जब साधक भाव रहित होता है, तब इसी भाव रहित दशा से ही इसी प्राण वायु के भीतर की वह गति होती है, जिससे साधक के लिए निर्गुण चक्र का साक्षात्कार मार्ग प्रशस्त होता है I

इसके पश्चात सनातन गुरु नन्हे शिष्य को बोले… अब इस नाग लघुवायु को देखकर बताओ कि क्या इसमें और अन्य लघुवायु के कार्यों में कोई अंतर है? I

नन्हें विद्यार्थी अध्ययन करके बोला… गुरु चंद्रमा, कोई अंतर नहीं है I यह नाग उपवायु इसकी प्राण वायु की सहायता वैसे ही कर रही है, जैसे अन्य लघुयायु करती हैं I

सनातन गुरु अपने नन्हे शिष्य की ओर देखकर बोले… तो अब हमनें इस प्राण वायु और नाग उपवायु का अध्ययन कर लिया है I

तो अब सनातन गुरुदेव के इसी वाक्य पर यह अध्याय समाप्त करके, अगले अध्याय पर जाता हूँ, जिसका नाम उदान प्राण और देवदत्त उपप्राण होगा I

 

असतो मा सद्गमय I

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