विष्णुत्व, अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर, अर्धनारी, अर्धनारीश्वर, सगुण आत्मा, विष्णु स्वरूप, अर्द्धनारी योग, अर्द्धनारीश्वर योग, श्री विष्णु, नैन कमल में अर्द्धनारी, सहस्रार में अर्द्धनारी, अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारीश्वर शरीर, गौरीशंकर, उमा महेश्वर, उमाशंकर

विष्णुत्व, अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर, अर्धनारी, अर्धनारीश्वर, सगुण आत्मा, विष्णु स्वरूप, अर्द्धनारी योग, अर्द्धनारीश्वर योग, श्री विष्णु, नैन कमल में अर्द्धनारी, सहस्रार में अर्द्धनारी, अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारीश्वर शरीर, गौरीशंकर, उमा महेश्वर, उमाशंकर

अब तक शरीर में शिव शक्ति योग को बताया गया था I इस अध्याय में इसी शक्ति शिव योग को नैन कमल और सहस्रार में बताया जाएगा I इस अध्याय में साधक की काया के भीतर बसे हुए गुरुदेव, जो शक्ति और शिव की योगदशा को दर्शाते हैं, और जो अर्द्धनारीश्वर, अर्धनारी, अर्धनारीश्वर, कहलाए गए हैं, उनको बताया जाएगा I इसलिए इस अध्याय में मेरे आंतरिक योग मार्ग के अनुसार विष्णुत्व, अर्द्धनारी, सगुण आत्मा, विष्णु स्वरूप, अर्द्धनारी योग, अर्द्धनारीश्वर योग, श्री विष्णु, नैन कमल में अर्द्धनारी, सहस्रार में अर्द्धनारी, अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारीश्वर शरीर, गौरीशंकर, उमाशंकर, उमा महेश्वर आदि बिंदुओं पर बात होगी I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय और यह पूरी श्रंखला भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है I

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला था I

यह अध्याय भी आत्मपथ, ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अंग है, जो पूर्व के अध्याय से चली आ रही है।

यह भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जो भी जुड़ा हुआ है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को समरपित करता हूं।

यह भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट, योगगुरु और योगेश्वर भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनाकि अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मस्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

यह अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का छियासठवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

यह अध्याय, इस हिरण्यगर्भ ब्रह्माणी मार्ग का चौथा अध्याय है I

 

भगवान् अर्द्धनारीश्वर कौन, भगवान् अर्द्धनारी कौन, अर्धनारी कौन हैं, अर्धनारीश्वर कौन, अर्द्धनारीश्वर कौन, अर्द्धनारी कौन, अर्द्धनारी योग, अर्द्धनारीश्वर योग, … भगवान् अर्द्धनारीश्वर का स्थान, भगवान् अर्द्धनारी का स्थान, शरीर में भगवान् अर्द्धनारीश्वर का स्थान, शरीर में भगवान् अर्द्धनारी का स्थान, भगवान् अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, भगवान् अर्द्धनारी का साक्षात्कार, … सगुण आत्मा क्या है, सगुण आत्मा कौन हैं, सगुण आत्मा कौन, सगुण आत्मा किसे कहते हैं, अर्द्धनारी ही सगुण आत्मा हैं, … स्वयं ही स्वयं में का अर्थ, शिव ही शिव में, शिव ही शिव में का अर्थ, शक्ति ही शक्ति में, शक्ति ही शक्ति में का अर्थ, … उमा महेश्वर कौन हैं, गौरी शंकर कौन हैं, उमाशंकर कौन हैं, अर्द्धनारीश्वर सिद्धि, अर्द्धनारी सिद्धि, अर्द्धनारीश्वर सिद्धि क्या है, अर्द्धनारी सिद्धि क्या है, … भगवान् अर्द्धनारीश्वर के स्थान, भगवान् अर्द्धनारी के स्थान, भगवान् अर्द्धनारीश्वर और सगुण आत्मा, भगवान् अर्द्धनारी और सगुण आत्मा, … गौरी शंकर कौन, गौरीशंकर कौन, उमामहेश्वर, उमा महेश्वर कौन, उमामहेश्वर कौन, साधक के भीतर गौरीशंकर, साधक के भीतर उमा महेश्वर, उमा शंकर, साधक के भीतर उमाशंकर, …

 

भगवान् अर्द्धनारीश्वर, भगवान् अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर, अर्द्धनारी
भगवान् अर्द्धनारीश्वर, भगवान् अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर, अर्द्धनारी, अर्द्धनारी कौन, अर्द्धनारीश्वर कौन, अर्धनारी, अर्धनारीश्वर,

 

मैंने अर्द्धनारी भगवान् का यह चित्र नहीं बनाया है, बस उनका छायाचित्र दिखाया है I जबकि इस छाया चित्र में दिखाया गया है, किन्तु भ्रूमध्य में खड़े हुए अर्द्धनारी के साथ कोई पशु आदि नहीं होते I

क्यूंकि अर्द्धनारीश्वर भगवान् का उनके सगुण साकार स्वरूप में साक्षात्कार, भ्रूमध्य में होता है और इस स्थान पर मंदहास धारण करे हुए अर्द्धनारीश्वर घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में गोल गोल घूमते रहते हैं, इसलिए मैं कहता हूँ कि उनका स्थान भ्रूमध्य में बसा हुआ आज्ञा चक्र है I यह चित्र भ्रूमध्य के आज्ञा चक्र में खड़े हुए और गोल गोल घूमते हुए जो भगवान् अर्द्धनारीश्वर हैं, उनका है I

शिव शक्ति के योग को अर्द्धनारी कहते हैं I उन अर्द्धनारी के दाएं ओर का स्थान शिव का है जो नीले से वर्ण के होते हैं और बाई ओर का स्थान माँ शक्ति का है, जो श्वेत वर्ण सी होती है I इसका अर्थ हुआ कि अर्द्धनारी के सगुण साकार शरीरी स्वरूप में, उनके दाएं ओर का भाग गुरु शिव का है और बाएं ओर का भाग गुरुमाई शक्ति का I भ्रूमध्य के उन अर्द्धनारीश्वर में यह दोनों बिन्दु बिलकुल स्पष्ट रूप में साक्षात्कार होते हैं I

शिव शक्ति के बराबर के योग में ही अर्द्धनारी साक्षात्कार होते हैं, इसलिए अर्द्धनारी गुरु शिव भी हैं, और गुरुमाई शक्ति भीI

शिव और शक्ति के समान योग को ही सगुण आत्मा कहा गया है I इसलिए भ्रूमध्य के नैन कमल के स्थान में, मंदहास धारण करके खड़े हुए और घडी की सुई से विपरीत दिशा में गोल गोल घूमते हुए अर्द्धनारी ही सगुण आत्मा हैं I

सगुण आत्मा का अर्थ होता है, आत्मा का ही सगुण स्वरूप, इसलिए ऐसी दशा में अर्द्धनारी ही साधक के सगुण आत्मस्वरूप होते हैं I इस सगुण आत्मस्वरूप में अर्द्धनारीश्वर सगुण साकार भी होते हैं और सगुण निराकार भी वही अर्द्धनारी ही होते हैं I

भ्रूमध्य के स्थान पर अपने मानव शरीरी स्वरूप में अर्द्धनारीश्वर सगुण साकार आत्मा है और इस दशा को जिस नीले और श्वेत वर्ण के मिश्रित प्रकाश ने घेरा हुआ होता है, वही उन अर्द्धनारी का सगुण निराकार स्वरूप है I इसलिए भ्रूमध्य में अर्द्धनारी जो सगुण आत्मा ही हैं, वह सगुण साकार भी हैं और वही अर्द्धनारी अपने प्रकाश स्वरूप में सगुण निराकारी भी होते हैं I अर्द्धनारी का ऐसा सगुण साकार और सगुण निराकार स्वरूप जो भ्रूमध्य में साक्षात्कार होता है, उसी को सगुण आत्मा कहा गया है I

भ्रूमध्य में अर्द्धनारी का ऐसा स्वरूप ही साधक का सगुण आत्मस्वरूप भी है I इसका अर्थ हुआ कि साधक का वह सगुणत्मक स्वरूप जो वह साधक अपने भ्रूमध्य में सगुण साकार और सगुण निराकार रूप में साक्षात्कार करता है, वही  भगवान् अर्द्धनारीश्वर हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

ऐसे स्वरूप में अर्द्धनारीश्वर उस साधक के गुरुदेव और गुरुमाई, दोनों ही होते हैं I इसलिए ऐसा साधक मानता ही है, कि उसका सगुण आत्मस्वरूप ही उसके गुरु हैं I और ऐसा जानने के पश्चात उस साधक के पास स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य के सार में गति करने के सिवा कोई और विकल्प रहता भी नहीं है I इस साक्षात्कार के पश्चात मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था I

ऐसा जानने के पश्चात, उस स्वयं ही स्वयं में के वाक्य में गति करता हुआ मैं कुछ और भी जाना था, जो ऐसा था…

शिव ही शिव में I

शक्ति ही शक्ति में I

अर्द्धनारी ही अर्द्धनारी में I

और क्यूंकि शिव शक्ति का समान रूप में योग ही श्री विष्णु हैं, इसलिए इस साक्षात्कार में मैं जो जाना था, वह ऐसा ही था…

विष्णु ही विष्णु में I

 

और ऐसा जानने के पश्चात ही मैं उस मार्ग पर गया था जिसके बारे में एक पूर्व के अध्याय में ऐसे बताया गया था…

भीतर से शाक्त बाहर से शैव और इस धरा पर वैष्णव I

यही वाक्य मेरे आंतरिक योगमार्ग का अभिन्न अंग भी हुआ था I

 

और जब मैं इस वाक्य के सार पर गमन किया, तो जो मैं जाना वही इस वाक्य का गंतव्य स्वरूप था और जो ऐसा ही था…

भीतर से आत्मना बाहर से सर्वा और इस महाब्रह्माण्ड में ब्राह्मण I

यही वाक्य उन श्री विष्णु का द्योतक है, जो मेरी हृदय के भीतर की तमस गुफा में बसे हुए सनातन गुरुदेव हैं I

 

और ऐसा जानने के पश्चात ही मैं वह भी जाना था, जिसको किसी पूर्व के अध्याय में सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन कहीं न कहीं बताया ही गया होगा…

भीतर से भूमा, बाहर से भूमत्व, रचना में भूधर, स्वरूप में भू, गंतव्य में भूतीत I

भीतर से वायु, बाहर से अग्नि, रचना में जल, स्वरूप में भूमी, गंतव्य में आकाश I

भीतर से शाक्त, बाहर से शैव, धरा पर वैष्णव, स्वरूप में सौर्य, गंतव्य में गणपत्य I

भीतर से निग्रह, बाहर से संहार, धरा पर स्थिति, स्वरूप में उत्पत्ति, गंतव्य में अनुग्रह I

भीतर से गुरुदेवी, बाहर से गुरुशिव, धरा पर श्रीविष्णु, स्वरूप में सूर्य, गंतव्य में गणेश I

भीतर से आत्मना, बाहर सर्वा, रचना में ब्राह्मण, स्वरूप में स्व:प्रकाश, गंतव्य में कैवल्य I

 

यही अर्द्धनारीश्वर सिद्धि का पूर्ण स्वरूप है I

और यही शक्ति शिव योग, भद्री भद्र योग, समंतभद्री समंतभद्र योग और प्रकृति पुरुष योग का भी सगुणत्मक गंतव्य है I

और इस अध्याय में इसी स्वरूप को सगुण आत्मा कहा गया है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

शरीर में अर्द्धनारी के कई स्थान होते हैं, तो अब उनको बताता हूँ…

  • भ्रूमध्य में अर्द्धनारी मानव रूप में होते हैं और इस स्थान पर वह खड़े हुए होते हैं I
  • चक्र रूप में भगवान् अर्द्धनारी आज्ञा चक्र के रूप में होते हैंI आज्ञाचक्र ही अर्द्धनारी का चक्र है I
  • उसी भ्रूमध्य में अर्द्धनारी अपने सगुण निराकार स्वरूप में ही होते हैं I
  • भ्रूमध्य के अर्द्धनारी ही सगुण आत्मा हैं I अपने सगुण आत्मा स्वरूप में अर्द्धनारी भ्रूमध्य में ही होते हैं I और इस स्वरूप में वह सगुण साकार आत्मा और सगुण निराकार आत्मा, दोनों ही स्वरूपों में होते हैं I
  • स्थूल शरीर के भीतर भगवान् अर्द्धनारी वैसे ही रूप और आकार में होते हैं, जैसे साधक का शरीर होता है I इस अध्याय में इसको अर्द्धनारीश्वर शरीर, अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारीश्वर सिद्ध शरीर, अर्द्धनारी सिद्ध शरीर, आदि भी कहा गया है I
  • रुद्राक्ष रूप में अर्द्धनारी, गौरीशंकर रुद्राक्ष स्वरूप में होते हैं I इस गौरीशंकर रुद्राक्ष का नाता भी आज्ञा चक्र से ही है I जैसे आज्ञा चक्र स्वयं जाग्रित चक्र होता है, वैसा ही गौरीशंकर रुद्राक्ष भी होता है I
  • योगमार्ग में अर्द्धनारी ही शिव शक्ति योग में हैं I और क्यूंकि इस शक्ति शिव योग का नाता भी राम नाद से है, इसलिए राम नाद का नाता भी अर्द्धनारी से है I

वैसे एक बात बता दूं, कि भगवान् और भगवती के योग स्वरूप में, भ्रूमध्य में बैठे हुए अर्द्धनारी मेरे गुरुदेव भी हैं और गुरुमाई भी हैं I उन्ही गुरुदेव और गुरुमाई के योगस्वरूप का भ्रूमध्य क्षेत्र में साक्षात्कार मेरे पहले कुछ साक्षात्कारों में ही होगा I

 

नैन कमल में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारी, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, नैन कमल में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारीश्वर, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, … सहस्रार में अर्द्धनारीश्वर, सहस्रार में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, सहस्रार में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, … शिवरंध्र में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्द्धनारी, शिवरंध्र में अर्द्धनारीश्वर, शिवरंध्र में अर्द्धनारी का प्रकाश, शिवरंध्र में अर्द्धनारीश्वर का प्रकाश, … नैन कमल में शिव शक्ति योग, नैन कमल में शक्ति शिव योग, आज्ञा चक्र में शिव शक्ति योग, आज्ञा चक्र में शक्ति शिव योग, शिवरंध्र में शिव शक्ति योग, शिवरंध्र में शक्ति शिव योग, … अर्द्धनारीश्वर का गुरु रूप, अर्द्धनारी का गुरु रूप, गुरु अर्द्धनारीश्वर, गुरु अर्द्धनारी, गुरु अर्द्धनारीश्वर गुरु हैं, अर्द्धनारी गुरु हैं, … अर्द्धनारी का दीक्षातीत स्वरूप, अर्द्धनारीश्वर का दीक्षातीत स्वरूप, अर्द्धनारी की दीक्षा नहीं होती, अर्द्धनारी दीक्षातीत हैं, अर्द्धनारीश्वर की दीक्षा नहीं होती, अर्द्धनारीश्वर दीक्षातीत हैं, … गुरु गौरीशंकर, गुरु उमामहेश्वर, गुरु उमाशंकर, शिवरंध्र में गौरीशंकर, शिवरंध्र में उमामहेश्वर, शिवरंध्र में उमाशंकर, नैन कमल में गौरीशंकर, नैन कमल में उमामहेश्वर, नैन कमल में उमाशंकर, सहस्रार में गौरीशंकर, सहस्रार में उमामहेश्वर, सहस्रार में उमाशंकर, आज्ञा चक्र में गौरीशंकर, आज्ञा चक्र में उमा महेश्वर, आज्ञा चक्र में उमाशंकर, …

 

आज्ञा चक्र में अर्द्धनारी, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारीश्वर
आज्ञा चक्र में अर्धनारी, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारीश्वर, नैन कमल में अर्धनारी का साक्षात्कार, नैन कमल में अर्धनारी, नैन कमल में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, नैन कमल में अर्द्धनारीश्वर, आज्ञा चक्र में अर्द्धनारी, आज्ञा चक्र में अर्धनारीश्वर, नैन कमल में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, नैन कमल में अर्द्धनारी, नैन कमल में अर्धनारीश्वर का साक्षात्कार, नैन कमल में अर्धनारीश्वर,

 

पूर्व में बताया गया था, कि अर्द्धनारीश्वर नैन कमल और सहस्रार में भी निवास करते हैं I उनका ऐसा निवास प्रकाश रूप में ही होता है I

 

तो अब आज्ञा चक्र में अर्द्धनारीश्वर का प्रकाश बताता हूँ…

यह चित्र का साक्षात्कार शिव शक्ति योग से पूर्व का है I इसमें साधक के आज्ञा चक्र के दोनों पत्तों में से एक में नीले वर्ण का और दुसरे में श्वेत वर्ण का प्रकाश आता हैI

और इस चित्र की दशा में, एक पत्ते का प्रकाश दूसरे पति के भीतर भी, कुछ न्यून मात्रा में ही सही, लेकिन दिखाई देता है I ऐसा ऊपर के चित्र में भी दिखाया गया है I

और ऐसी दशा के मध्य में निर्बीज ब्रह्म होते हैं और इसी निर्बीज दशा को इस चित्र के मध्य में, सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दिखाया भी गया है I

जब साधक की चेतना, इसी मध्य के स्थान पर स्थित होती है, तो भी वह साधक निर्बीज समाधि को पा सकता है I इस निर्बीज समाधि के बारे में किसी आगे के अध्याय में बतलाऊँगा I

अर्द्धनारीश्वर सगुण आत्मा और सगुण ब्रह्म होने के कारण, इनके स्थान स्वयं जागृत रहते हैं I यही वह कारण है कि आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र का शिवरंध्र नामक स्थान, दोनों ही स्वयं जागृत रहते हैं I

और ऐसा होने के कारण ही आज्ञा चक्र पर त्राटक का विधान आया था I

 

आगे बढ़ता हूँ…

अब गुरुदेव गुरुमाई अर्द्धनारी के सहस्रार में बसे हुए स्वरूप को बताता हूँ…

सहस्रार में अर्द्धनारीश्वर, सहस्रार में अर्द्धनारी
सहस्रार में अर्धनारी, सहस्रार में अर्द्धनारीश्वर, शिवरंध्र में अर्धनारी का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्धनारी, शिवरंध्र में अर्द्धनारीश्वर का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्द्धनारीश्वर, सहस्रार में अर्द्धनारी, सहस्रार में अर्धनारीश्वर, शिवरंध्र में अर्द्धनारी का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्द्धनारी, शिवरंध्र में अर्धनारीश्वर का साक्षात्कार, शिवरंध्र में अर्धनारीश्वर,

 

सहस्र दल कमल के शिवरंध्र नामक स्थान पर भी गुरु अर्द्धनारी प्रकाश रूप में निवास करते हैं I ऊपर का चित्र इसी दशा को दर्शा रहा है I लेकिन इस दशा के बारे में एक पर्व के अध्याय में कुछ तो बताया जा चुका है, और उससे आगे क्यूंकि मैं बताना ही नहीं चाहता हूँ, इसलिए बस इसके चित्र को दिखाकर ही मैं इस बिन्दु का समापन करता हूँ I

 

आगे बढ़ता हूँ…

और इन दोनों चक्रों में जो अर्द्धनारीश्वर भगवान् हैं, उनके कुछ और बिंदुओं को बताता हूँ…

जब यही योग उस दशा में चला जाता है जो पुरुष प्रकृति योग कहलाता है, तो साधक निर्बीज ब्रह्म का साक्षात्कार करता है और जहाँ यह साक्षात्कार भी निर्बीज समाधि से ही होता है I ऐसी निर्बीज समाधि का मार्ग भी शून्य समाधि से होता हुआ, असंप्रज्ञात समाधि से जाता हुआ ही निर्बीज समाधि की ओर जाता है I

जब यही योग शिव शक्ति योग के स्वरूप में चलित होता है, तो साधक सगुण आत्मा को पाता है, और जहाँ वह सगुण आत्मा सगुण निराकार और सगुण साकार दोनों ही स्वरूपों में होते हैं I ऐसे स्वरूप में ही अर्द्धनारीश्वर भगवान् मेरे ही भीतर निवास करते हुए, मेरे गुरु हैं I

जब इसी योग से साधक उस दशा को पाता है, जिसमें शिव और शक्ति बराबर के प्रभाव में होते हैं, तो साधक उन्ही अर्द्धनारीश्वर से श्री विष्णु को प्राप्त होता है I इसके पश्चात वह साधक श्री विष्णु के ही विष्णुत्व में स्थित हो जाता है, और ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में ऐसा साधक विष्णु स्वरूप ही कहलाया जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

और अब इन दोनों चित्रों को प्रकृति के नव कोशों के दृष्टिकोण से बताता हूँ…

प्रकृति के नौ कोष होते हैं जिनमें से नीचे के आठ, अपरा प्रकृति कहलाते हैं और ऊपर के अंतिम कोष परा प्रकृति कहलाता है I

अपरा प्रकृति के आठ कोशों में से आठवाँ कोष नीले वर्ण का होता है, और उन्ही प्रकृति का नवम कोष श्वेत वर्ण के अति सूक्ष्म मेघ के समान होता है I

अपरा प्रकृति ही जीव जगत की मातृ शक्ति हैं और इन अपरा प्रकृति का आठवां कोष जो नील वर्ण का होता है, वही वह शक्तिमान है जिसने अपरा और परा प्रकृतियों की शक्ति को धारण करा हुआ होता हैI वह शक्तिमान ही शिव का द्योतक है I इसलिए अपरा प्रकृति का आठवाँ कोष, शिव का भी द्योतक है और शक्ति के मातृ स्वरूप को भी दर्शाता है I

अध्याय के इस भाग के दोनों चित्र उन्ही शक्तिमान और उनकी परा प्रकृति के योग को भी दर्शाते हैं I वह शक्तिमान जिनका निवास स्थान प्रकृति के आठवें कोष में ही है, वही महादेव हैं, जिन्होंने प्रकृति के नौ के नौ कोशों की शक्ति को धारण करा हुआ है I

इसी स्वरूप और सिद्धांत पर वह अर्द्धनारीश्वर इन दोनों चक्रों में शक्ति और शिव की योगावस्था में उद्भासित होते हैं, और उन अर्द्धनारीश्वर के ऐसे सैद्धान्तिक स्वरूप में…

शिव ही शक्ति होते हैं और शक्ति ही शिव होती हैं I

शिव ही शक्ति स्वामी होते हैं और शक्ति ही शिव स्वामिनि I

शक्तिमान ही शक्ति स्वरूप होते हैं और शक्ति ही शक्तिमान स्वरूप I

शिव शक्ति के ऐसे योग में, वह दोनों एक दुसरे में विलीन होकर रहते हैं I

साधक अर्द्धनारीश्वर का ऐसा अद्वैत स्वरूप जानकर ही उनको गुरुरूप में पाएगा I

आगे बढ़ता हूँ…

अध्याय के इस भाग में बताए गए चक्र साधना से साक्षात्कार करे हुए अर्द्धनारीश्वर की कोई दीक्षा नहीं होतीI इसलिए अध्याय के इस भाग में बताए गए अर्द्धनारी दीक्षातीत हैंI

ऐसा इसलिए हैं, क्यूंकि जो सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार सहित, अनंत भी हैं, उसकी दीक्षा या मार्ग कैसे हो पाएगा I

इसलिए अध्याय के इस भाग में दर्शाए गए अर्द्धनारी का साक्षात्कार और मार्ग भी वही गुरु भगवान् अर्द्धनारीश्वर ही प्रशस्त करेंगे I

और जहाँ उस मार्ग को वह अर्द्धनारीश्वर,साधक के गुरुदेव और गुरुमाई स्वरूप में, साधक के भीतर से, चक्रों में बसे हुए ही प्रशस्त करेंगे I

इसलिए अध्याय के इस भाग की दीक्षा भी साधक के भीतर बैठे हुए अरचनारीश्वर से ही प्रशस्त होगी, और जहाँ वह अर्द्धनारीश्वर भी गौरी शंकर के स्वरूप के साधक की सगुण आत्मा ही होंगे I

इसलिए अध्याय के इस भाग की दीक्षा, साधक के सगुण आत्मा स्वरूप अर्द्धनारीश्वर से ही होगी I और यह भी तब होगी, जब साधक इस मार्ग पर जाने का पात्र होगा… इससे पूर्व नहीं I

जिस साधक ने यह दीक्षा अपने ही सगुण आत्म स्वरूप, भगवान् और भगवती अर्द्धनारी से प्राप्त करी होती, वह भी यही बोलेगा…

मेरा सगुण आत्मा ही मेरे गुरु है I

और मै मेरे सगुण आत्मा का शिष्य हूँ I

अपने पञ्च कोष के दृष्टिकोण से, मैं शिष्य हूँ I

अपने आत्मस्वरूप के दृष्टिकोण से, मैं ही मेरा गुरु हूँ I

मेरा मुक्तिमार्ग स्वयं ही स्वयं में, स्वयं की ओर ही जाता है I

मैं स्वयं ही रचना रूपी शिष्य हूँ, और स्वयं ही रचनातीत आत्मा हूँ I

मैं स्वयं ही मुमुक्षु हूँ, मैं ही मेरा मुक्तिमार्ग हूँ, और स्वयं ही मुक्ति भी हूँ I

मैं ही मेरा गुरु हूँ, गुरु द्वारा प्रशस्त मुक्तिमार्ग हूँ, और मैं अपना ही शिष्य हूँ I

मेरे आंतरिक उत्कर्षपथ में मेरे सिवा न कभी कुछ था, न है और न ही कभी होगा I

 

यही कारण है, कि जबकि अध्याय के इस भाग की गुरु शिष्य परंपरा तो है, किन्तु वह गुरु और शिष्य साधक ही होता है I

इसलिए इस अध्याय के इस भाग की दीक्षा कोई बाह्य मार्गों से चलित हो रही गुरु शिष्य परंपरा के अनुयायी नहीं दे पाएंगे और यदि ऐसा होगा भी, तो भी वह दीक्षा कभी भी पूर्ण नहीं कहलाई जा सकती I

ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस अध्याय का यह भाग जो सगुण आत्मा स्वरूप गुरु अर्द्धनारीश्वर का है, वह आंतरिक योगमार्ग का ही रहा है… और आगे भी यह ऐसा ही रहेगा I

किन्तु अर्द्धनारीश्वर के श्री विष्णु स्वरूप में यहाँ बताए गए बिंदु लागू नहीं होते हैं I इसलिए वैष्णव, शैव और शाक्त परम्पराओं में उनके देवताओं के अनुसार दीक्षा तो हो सकती है, लेकिन सगुण आत्म स्वरूप के अर्द्धनारीश्वर का कोई दीक्षा मार्ग है ही नहीं I

इसलिए इस इस भाग में बताए गए आंतरिक योगमार्ग की दीक्षा तो साधक की काया के भीतर विराजमान, साधक के ही सगुण आत्मस्वरूप अर्द्धनारी ही देंगे और वह भी तब, जब साधक उनकी दीक्षा की पात्रता को पाएगा… इससे पूर्व नहीं I

 

अर्द्धनारीश्वर सिद्धि ही विष्णुत्व है, श्री विष्णु सिद्धी क्या है, अर्द्धनारी सिद्धि और विष्णुत्व, … विष्णुत्व क्या है, विष्णुत्व की दशा, विष्णुत्व सिद्धि, विष्णुत्व सिद्धि क्या है, विष्णुत्व किसे कहते हैं, विष्णुत्व का प्रमाण, …

अध्याय के इस भाग को मैं संक्षेप में और कुछ सांकेतिक रूप में ही बतलाऊँगा I

सृष्टि प्रारम्ब से पूर्व की दशा कालातीत है I

वह कालातीत, ज्ञान विज्ञान से परे परमशिव है I

वह परमशिव, निर्गुण निराकार ब्रह्म कहलाया है I

उन परमशिव की प्रथम अभिव्यक्ति सगुण शिव थी I

सगुण शिव से पुरुष और प्रकृति का प्रादुर्भाव हुआ था I

पुरुष ही भगवान् और ही प्रकृति ही भगवती कहलाई थी I

आगे बढ़ता हूँ…

पुरुष प्रकृति की समान योगदशा अर्द्धनारी है I

वह प्रादुर्भाव दशा ही अर्द्धनारीश्वर कहलाया था I

पुरुष प्रकृति योग से ही सृष्टि का आरम्भ हुआ है I

वह अर्द्धनारी ही सगुण आत्मा और सगुण ब्रह्म था I

वह सगुण आत्मा, शिव शक्ति का समान योगरूप था I

उन शिव शक्ति के समान योगस्वरूप को ही श्रीविष्णु कहते हैं I

और जहाँ वह श्री विष्णु ही जीवों के भीतर बैठे हुए सनातन गुरु हैं I

अर्द्धनारीश्वर का सगुण आत्मा और सगुण ब्रह्म स्वरूप ही श्रीविष्णु हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

उत्कर्ष पथ, उत्पत्ति के पथ से विपरीत ही होता है I

उत्कर्ष और उत्पत्ति, दोनों मार्गों में सगुण आत्मा अर्द्धनारी ही हैं I  

उन्ही सगुण आत्मा अर्धनारी, श्रीविष्णु से जाता हुआ ही मुक्तिमार्ग होता है I

आगे बढ़ता हूँ…

परमशिव ही रचनातीत होते हैं I

परमशिव ही निर्गुण निराकार ब्रह्म हैं I

उन परमशिव से सगुण शिव उदय हुआ था I

रचनातीत ही रचना और रचना का तंत्र हुआ है I

सगुण शिव से पुरुष और प्रकृति का प्रादुर्भाव हुआ था I

रचना और रचना का तंत्र उन रचनातीत की ही अभिव्यक्ति हैं I

रचनातीत ही सृष्टि के प्रारभ से पूर्व और अंत के पश्चात शेष रहता है

रचना और रचना के तंत्र स्वरूप में भी वही रचनातीत प्रकाशित हो रहा है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

सृष्टि के पूर्व में अनुग्रह ही एकमात्र कृत्य था I

उत्कर्ष पथ का अंतिम कृत्य भी अनुग्रह होता है I

कालातीत प्रधानतः अनुग्रह कृत्य का धारक होता है I

और कालातीत में ही अन्य चार कृत्य निवास करते हैं I

उसी कालातीत से ही यह पञ्च कृत्य का प्रादुर्भाग होता है I

सृष्टि के महाप्रलय की दशा में तिरोधान ही व्यापक रहता है I

पूर्व सृष्टि की महाप्रलय प्रक्रिया, संहार कृत्य से चालित होती है I

उस महाप्रलय प्रक्रिया में, संहार और निग्रह कृत्यों का योग होता है I

संहार और निग्रह कृत्यों के योग में भी स्थिति कृत्य बसा हुआ होता है I

वह सगुण आत्मा, संहार कृत्य और तिरोधान कृत्य की समान योगदशा है I

संहार और निग्रह नामक कृत्यों की योग दशा ही स्थिति कृत्य कहलाई जाती है I

स्थिति से ही उत्पत्ति का प्रादुर्भाव होता है और उत्पन्न हुई दशा स्थित हो पाती है I

स्थित होने के पश्चात ही वह उत्पन्न दशा, संघार निग्रह अनुग्रह कृत्यों को पाती है I

 

टिप्पणियाँ:

  • यदि संहार और निग्रह कृत्यों की योगदशा में स्थिति कृत्य बसा हुआ नहीं होगा, तो ऐसी दशा में यदि सृष्टि महाप्रलय को जाएगी, तो उसका पुनः प्रादुर्भाव ही नहीं हो पाएगा I
  • इसलिए वह महाप्रलय की दशा ही अनंत स्वरूप में आ जाएगी, जिसके पश्चात वह सृष्टि को न तो कोई और ब्रह्मदेव धारण कर पाएगा, और न ही कोई और उसके उत्पत्ती कृत्य को ही बचा पाएगा I
  • उस दशा में उत्पत्ति कृत्य का ही संहार हो जाएगा और संहार होकर वह उत्पत्ति कृत्य ही तिरोधान कृत्य (अर्थात निग्रह कृत्य) द्वारा पूर्णरूपेण ढक लिया जाएगा I
  • इसलिए ब्रह्मरचना में, सृष्टि चक्र को अनंत काल तक स्थापित रखने हेतु, स्थिति कृत्य ही संहार कृत्य और तिरोधान कृत्य सहित, उत्पत्ति कृत्य को भी भेदता है I
  • और इन चारों कृत्यों को (अर्थात उत्पत्ति, स्थिति और संहार को), अनुग्रह अनुग्रह कृत्य भी भेदता है I और इसके अतिरिक्त उसी अनुग्रह के सनातन परिधान को धारण करके ही यह चार कृत्य नित्य रह पाते हैं I
  • इसलिए अनुग्रह कृत्य की प्राप्ति अन्य चारों कृत्यों से, उनके देवत्व बिंदुओं से, उनके तत्वों और तन्मात्रों से और उनके देवताओं से भी प्राप्त हो सकती है I
  • यही कारण है, कि इन पञ्च कृत्यों में अनुग्रह कृत्य ही सभी कृत्यों के भीतर पाया जाएगा और सभी कृत्य इसी अनुग्रह के परिधान को भी धारण करके रहते हैं I
  • और इसी कारण से चाहे किसी भी कृत्य का प्रभाव इस जीव जगत के किसी भाग पर पड़ रहा होगा, लेकिन यदि वह भाग अनुग्रह का पात्र होगा, तो वह जीव जगत का भाग, उत्पत्ति, स्थिति, संहार और निग्रह कृत्यों में से किसी एक या अधिक कृत्यों के प्रभाव में बसे होने पर भी, अनुग्रह कृत्य को ही पाएगा (अर्थात कैवल्य मोक्ष को ही पाएगा) I
  • यही कारण है कि वैदिक वाङ्मय में देवी देवता, उनके तत्व और तन्मात्र, उनके मार्ग और सिद्धियाँ पृथक होने पर भी, सब के सब उसी अनुग्रह की ओर लेकर जाते हैं, जो कैवल्य मोक्ष कहलाता है और जिसका नाता उन कृत्यातीत निर्गुण निराकार ब्रह्म से है, जो जीव जगत के पृथक पृथक स्वरूपों में अभिव्यक्त होता हुआ भी, जीव जगत का तंत्र भी हुआ है I
  • ऐसा होने के कारण, इस जीव जगत और उसके तंत्र स्वरूप में वही निर्गुण निराकार ब्रह्म एकमात्र प्रकाशित हो रहा है I

और यह भी वह कारण है कि उन निर्गुण निराकार ब्रह्म का साक्षात्कार समस्त जीव जगत की किसी भी दशा में हो सकता है I

ऐसा इसलिए संभव होता है क्यूंकि जब निर्गुण का योग निराकार से होता है, तो वह निराकार ही अनंत होता है, और वह अनंत ही सर्वव्यापक स्वरूप में साक्षात्कार होता है I

जो सर्वव्यापक होता है वह समस्त जीवों और जगत के समस्त भागों के भीतर भी बसा होता है, और उन सबको घेरे हुए भी होता है I

ऐसा होने के कारण उस सर्वव्यापक का साक्षात्कार किसी भी ऐसे मार्ग से हो सकता है, जो उसकी अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ता दोनों स्वरूपों में समानता रखकर जाता है I

  • क्यूंकि वैदिक वाङ्मय का ब्रह्म ही समस्त ब्रह्म रचना और रचना का तंत्र भी हुआ है, इसलिए वह पूर्ण कहलाया गया है I

और इसीलिए वैदिक वाङ्मय का कैवल्य मोक्ष उन पूर्ण ब्रह्म को ही दर्शाता है, न की उन पूर्ण ब्रह्म के केवल, अर्थात निर्गुण स्वरूप को I

 

आगे बढ़ता हूँ…

उन्ही पूर्ण ब्रह्म स्वरूप के द्योतक अर्द्धनारी हैं I

वह पूर्ण ब्रह्म ही सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार हैं I

अर्द्धनारी का सगुण आत्मा और सगुण ब्रह्म स्वरूप ही श्री विष्णु हैं I

श्री विष्णु ही अर्द्धनारी नामक सगुण आत्मब्रह्म स्वरूप में अभिव्यक्त हैं I

इन्ही आत्मब्रह्म को अथर्ववेद और उत्तराम्नाय से संबद्ध महावाक्य भी दर्शाता है I

जो योगी अपने आध्यात्मिक साक्षात्कारों से ही ऐसा जानता होगा, वही विष्णुत्व को प्राप्त भी हुआ होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ…

अर्द्धनारीश्वर शरीर, अर्द्धनारीश्वर सिद्ध शरीर, अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारी सिद्ध शरीर, … अर्द्धनारी और सगुण आत्मा, अर्द्धनारीश्वर और सगुण आत्मा, अर्धनादीश्वर और निर्गुण आत्मा, अर्द्धनारी और निर्गुण ब्रह्म, अर्द्धनारीश्वर और निर्गुण निराकार आत्मा, अर्द्धनारी और निर्गुण निराकार आत्मा, अर्द्धनारीश्वर और निर्गुण निराकार ब्रह्म, अर्द्धनारी और निर्गुण निराकार ब्रह्म, अर्द्धनारी का सगुण और निर्गुण स्वरूप, अर्द्धनारीश्वर का सगुण और निर्गुण स्वरूप, अर्द्धनारी का साकार और निराकार स्वरूप, अर्द्धनारीश्वर का साकार और निराकार स्वरूप, अर्द्धनारीश्वर साकार और निराकार हैं, अर्द्धनारी साकार और निराकार हैं, अर्द्धनारीश्वर सगुण और निर्गुण हैंअर्द्धनारीश्वर सगुण और निर्गुण हैं, … अर्द्धनारीश्वर ही आत्मस्वरूप है, अर्द्धनारी ही आत्मस्वरूप है, सगुण आत्मा को अर्द्धनारी कहा गया है, … अर्द्धनारी और आत्मस्वरूप, अर्द्धनारीश्वर और आत्मस्वरूप, अर्द्धनारी और साधक का आत्मस्वरूप, अर्द्धनारीश्वर और साधक का आत्मस्वरूप, … अर्द्धनारी और पूर्ण ब्रह्म, अर्द्धनारीश्वर और पूर्ण ब्रह्म, … अर्द्धनारी का गुरु स्वरूप, गुरु अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर के गुरु स्वरूप, गुरु अर्द्धनारीश्वर, …

अब ध्यान देना…

जगत ही शिव है, जगत दिव्यता ही शक्ति I

शिव शक्ति का समानरूप में योग अर्द्धनारी हैं I

जगत का जगत शक्ति से सर्वसम योग अर्द्धनारी हैं I

आगे बढ़ता हूँ..

शिव ही वेद हैं और शक्ति ही वेद दिव्यता I

वेद और वेद दिव्यता का समानरूप में योग अर्द्धनारी हैं I

सम्पूर्ण वेद सार का वेद दिव्यता से सर्वसम योग अर्द्धनारी हैं I

आगे बढ़ता हूँ…

अर्द्धनारी सगुण साकार स्वरूप में हैं I

अर्द्धनारी सगुण निराकार स्वरूप में भी हैं I

अर्द्धनारी निर्गुण निराकार ब्रह्म के भी द्योतक हैं I

अर्द्धनारीश्वर शून्य और शून्य ब्रह्म के भी मार्गस्वरूप हैं I

अर्द्धनारी समतावादी प्रकृति और सर्वसम ब्रह्म के भी मार्ग हैं I

जो इनसब स्वरूपों में समानरूपेण और पूर्णरूपेण है, वही अर्द्धनारी हैं I

अपने ऐसे सर्वस्व स्वरूप में अर्द्धनारीश्वर उन पूर्ण ब्रह्म को भी दर्शाते है I

पूर्ण ब्रह्म स्वरूप में ही अर्द्धनारी साधक के आत्मस्वरूप में प्रकाशित होते हैं I

आगे बढ़ता हूँ…

अब अर्द्धनारीश्वर का सगुण साकार स्वरूप बताता हूँ…

इस सगुण साकार स्वरूप के साक्षात्कार मार्ग में चार प्रमुख चरण होते हैं I तो अब इनको बताता हूँ…

 

  • प्रथम चरण… भद्र का भद्री पर प्रभुत्व, शिव का शक्ति पर प्रभुत्व, मन का प्राणों पर प्रभुत्व, मन का प्राण पर प्रभुत्व,
भद्र का भद्री पर प्रभुत्व, शिव का शक्ति पर प्रभुत्व
भद्र का भद्री पर प्रभुत्व, शिव का शक्ति पर प्रभुत्व, मन का प्राणों पर प्रभुत्व, मन का प्राण पर प्रभुत्व,

 

यह चित्र इस भाग में बताए जा रहे अर्द्धनारी के सगुण साकार स्वरूप के साक्षात्कार के प्रथम चरण को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शा रहा है I

इस दशा में भद्रा का भद्री प्रभुत्व होता है, अर्थात इस प्रथम चरण में भद्री (अर्थात शक्ति) भद्र (अर्थात शिव) के आधीन होकर कार्य करती हैं I इस दशा का नाता पूर्व के अध्याय में बताए गए शक्ति शिव योग से भी है I इसी दशा से शिव शक्ति योग का प्रारम्भ भी होता है I

इसी दशा से साधक उस मार्ग पर जाता है, जो स्व:ज्ञान का होता है और जिसके गंतव्य में साधक उस चतुर्थ चरण को ही चला जाता है, जिसका वर्णन आगे दिया गया है I ऐसी दशा में वह साधक स्थूल कायाधारी सा प्रतीत हुआ भी, वास्तव में सगुणत्मक अर्द्धनारीश्वर ही है, और जहाँ वह सगुणत्मक अर्द्धनारी, शिवत्व और शाक्तत्व सहित, विष्णुत्व के भी द्योतक होते हैं I

इस चित्र का नाता प्राणमय मनोमय योग से भी है, जिसके बारे में एक पूर्व के अध्याय में बताया जा चुका है I इस दशा में प्राण समता को बस प्राप्त ही हुए होते हैं, और ऐसी समतावादी दशा में वह प्राण साधक के शरीर में व्याप्त होते हैं I उन समतावादी श्वेत प्राणों की इसी दशा को इस चित्र में सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दिखाया गया है I

जब समस्त प्राणों का (अर्थात पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण का) एक दुसरे से समतावादी योग होता है, तब वह प्राण समता को प्राप्त होते हैं I और ऐसी दशा में वह अपने पूर्व के वर्ण गुण आदि त्यागकर, समता को धारण करके, श्वेत वर्ण के ही हो जाते हैं I यह वही दशा है जिसमें यह पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण तब थे, जब वह अपने जीव जगत के भीतर के पंचक स्वरूप में नहीं आए थे I और ऐसी समतावादी दशा में उन प्राणों का नाता उन परा प्रकृति से होता है, जिनकी दिव्यता आदिशक्ति कहलाई जाती हैं I

ऐसी सूक्ष्म श्वेत वर्ण की समता नामक दशा को पाया हुआ प्राण, मनोमय कोष में व्यापक होता है I

जबकि मन का वास्तविक वर्ण तो श्वेत ही है, किन्तु जगत के इस भाग में जहाँ यह पृथ्वीलोक बसा हुआ है, मन का प्रधान नाता अघोर ब्रह्म से ही है I और ऐसा होने के कारण, जहाँ तक इस पृथ्वी लोक के प्रश्न है, यहाँ पर मनोमय कोष भी सदाशिव के अघोर मुख के समान, नीले वर्ण का ही होता है I

और क्यूँकि सूक्ष्म शरीर के उन्नीस बिंदुओं में से, मन नामक बिंदु ही प्रधान होता है, इसलिए इस पृथ्वी लोक के जीवों का सूक्ष्म शरीर भी नीले वर्ण का ही होता है I और जबतक आकाश गंगा में घूमता हुआ सूर्य, आकाश गंगा के अघोर नामक स्थान पर रहेगा (अर्थात आगे के कोई 5.4 करोड़ से भी अधिक वर्षों तक) तबतक इस पृथ्वीलोक के जीवों का मनोमय कोष और सूक्ष्म शरीर भी ऐसा ही नील वर्ण का रहेगा I

अपनी ऐसी समतावादी दशा में प्राण, मनोमय कोष में प्रवेश करके, कुछ वैसे ही दिखाई देते हैं जैसे ऊपर के चित्र में दिखाया गया है I और अपनी ऐसी श्वेत (अर्थात समतावादी) दशा में प्राण, आदिशक्ति का ही स्वरूप होते हैं और वह नील वर्ण का मनोमय कोष, शिव का ही द्योतक हो जाता है I

किन्तु प्राणों की ऐसी दशा होने पर भी, उन प्राणों पर मन का ही प्रभुत्व रहता है I  ऐसी दशा में साधक शैव होकर रह जाता है, और जहाँ उस शैव मार्ग के शिव ही शक्ति रूप होते हैं I

इस श्रृंखला के एक पूर्व के अध्याय में बताया गया था, कि शक्ति शिव योग के समय, एक हिमपात के समान ऊर्जा मेरुदण्ड के नीचे के भाग में बसे हुए मूलाधार चक्र के समीप से ऊपर की ओर उठती है और मस्तिष्क के सहस्रार में पहुँच जाती है I

यह जो हिमपात होता है, वह हिम लच्छों के स्वरूप को धारण किया हुआ ही होता है, और यह चित्र इस दशा का प्रारम्भ ही है I इसका अर्थ हुआ, कि यह चित्र उस शिव शक्ति योग (अर्थात भद्र भद्री योग) का प्रारम्भ ही है, जिसका वर्णन एक पूर्व के अध्याय में किया गया था I

 

  • दूसरा चरण… भद्री का भद्र पर प्रभुत्व, शक्ति का शिव पर प्रभुत्व, प्राण का मन पर प्रभुत्व, प्राणों का मन पर प्रभुत्व,
भद्री का भद्र पर प्रभुत्व, शक्ति का शिव पर प्रभुत्व
भद्री का भद्र पर प्रभुत्व, शक्ति का शिव पर प्रभुत्व, प्राण का मन पर प्रभुत्व, प्राणों का मन पर प्रभुत्व,

 

यह चित्र इस भाग में बताए जा रहे अर्द्धनारी के सगुण साकार स्वरूप के साक्षात्कार के दुसरे चरण को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शा रहा है I

इस चित्र की दशा में भद्री का भद्र पर प्रभुत्व हो जाता है I और आंतरिक योगमार्ग के दृष्टिकोण से, इस चित्र की दशा में प्राणों का मन परप्रभुत्व हो जाता है, अर्थात प्राणमय कोष, मनोमय कोष पर हावी हो जाता है I

जब ऐसा होता है, तब साधक एक विचित्र मनस्थिति में पहुँच जाता है, जिसमें उसको न तो अपने जीवरूप से कोई नाता रहता है और न ही उस जगत से कुछ लेना देना रहता है, जिसमें वह साधक कायाधारी होकर उस समय बसा हुआ होता है… और जहाँ वही जगत उसके अपने प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में उस साधक के भीतर भी बसा हुआ होता है I

इसलिए साधक की मनोदशा के अनुसार, यह एक विचित्र स्थिति हो जाती है जिसमें साधक न तो अपने जीवत्व से और न ही अपने भीतर सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में बसे हुए जगतव से ही कोई नाता रख पाता है I

जब ऐसा होता है तब साधक का नाता समस्त जीव जगत से ही टूट जाता है, अर्थात साधक जीवित सा प्रतीत होता हुआ भी, अपनी मनोदशा के अनुसार समस्त जीवत्व और जगतत्व से ही अतीत सा हो जाता है I

और यह वह भी दशा है जिसमें साधक न तो उसके भीतर बसे हुए पुरुष से और न ही प्रकृति से कोई नाता रख पता है I इसलिए यह वह दशा है, जिसमें साधक एक प्रकार के पूर्ण वैराग्य में ही चला जाता है, और जहाँ उस वैराग्य में न तो कोई स्थूल अथवा सूक्ष्म जीवत्व होगा और न ही जगतत्व होगा I

इस दशा में बस उस साधक के प्राण ही ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के समतावादी स्वरूप होकर, मन को भी उस सम्तावाद की ओर लेकर जाता हैं, जिसमें उस साधक के दृष्टिकोण से, न तो जीव की कोई मेहती रह जाती है और न ही जगत की I

क्यूंकि जीव तो वह साधक ही है, और जगत में ही वह साधक अपने जीव रूप में बसा हुआ होता है, और इसके अतिरिक्त वह जगत भी अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक स्वरूप में उस साधक के भीतर भी बसा हुआ होता है I इसलिए ऐसी दशा में वह साधक न तो किसी जीव से और न ही जगत के किसी स्वरूप से ही नाता रख पता है I ऐसा होने के कारण इसी विचित्र मार्ग से साधक उस दशा की ओर स्वतः ही गति करने लगता है, जिसमें ब्रह्म रचना का कोई भाग ही नहीं होता और जो वह रचनातीत ब्रह्म ही हैं, जो पूर्ण होते हुए भी, अर्थात जाव जगत और उसका तंत्र होते हुए भी, पूर्ण संन्यास को दर्शाते हैं और जो कैवल्य शब्द का आलम्बन लेकर भी बताए जाते हैं I

ऐसा होने के कारण, साधक एक व्यापक देवत्व में ही बस जाता है और वह देवत्व भी साधक के भीतर बसे हुए देवी देवताओं के स्वरूप में स्व:प्रकट होने लगता है I और ऐसी दशा में साधक के भीतर स्व:प्रकट हुए उस व्यापक देवत्व में बसे हुए जीवों (अर्थात देवी देवताओं) अथवा उनके लोकों का भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता है I

और ऐसा होने पर भी वह साधक उस सम्तावाद को प्राप्त होता है, जिसमें साधक की मनोदशा आदि के दृष्टिकोण से, साधक की इस सबमें न तो कोई रुचि और न ही कोई अरुचि ही रह जाती है, न तो कोई सौमनस्य ही रह जाता है और न ही कोई वैमनस्य, न तो कोई अनुराग रह जाता है और न ही कोई विराग I ऐसी दशा में साधक की इच्छा में समस्त प्रकार के द्वैतवाद ही समाप्त हो जाते हैं I

ऐसी दशा में साधक शाक्त होकर ही रहता है और जहाँ उस मार्ग की दिव्यता ही समता नामक आदिशक्ती होती हैं, और जो सर्वकल्याणकारी शिवत्व की ही व्यापक-द्योतक होती हैं I

यही वह दशा है, जब भद्री भद्री योग का पूर्ण प्रभाव आना प्रारम्भ हो जाता है और यह भद्री रूपी समता को धारण करी हुई प्राण शक्ति, मन रुपी भद्र पर हावी होने लगती हैं I

इस दशा की प्राप्ति तब होती है, जब शिव शक्ति योग उस स्थिति में पहुँच जाता है जब वह हिमपात (जिसके बारे में इसी श्रृंखला के एक पूर्व के अध्याय में बताया गया था) और जो समतावादी प्राण ही हैं, वह श्वेत वर्ण के हिमपात के समान और प्राणरूप में साधक के सहस्रार में पहुँच जाते हैं I

और उस पूर्व के अध्याय में तो यह भी बताया गया था, कि यह हिमपात के समान जो प्राण ऊर्जा है, वह मेरुदंड के नीचे के मूलाधार चक्र के समीप के स्थान से ऊपर उठकर, मस्तिष्क के सहस्रार में ही पहुँच जाता है I और ऐसे ऊपर (अर्थात सहस्रार की ओर) उठने के समय, वह उस समतावादी हिमपात के समान और समता को धारण करी हुई प्राण ऊर्जा, अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) को भी नाभि क्षेत्र से ऊपर उठाकर, सहस्रार में लेकर चली जाती है I

इस दशा के पश्चात ही इस चित्र की दशा साधक की स्थूल काया के भीतर प्रकट होती है I

जब वह हिमपात के समान श्वेत वर्ण की समतावादी प्राण ऊर्जा, मेरुदंड के नीचे के भाग के समीप से श्वेत वर्ण के हिम लच्छों के रूप में, मूलाधार चक्र से ऊपर उठकर सहस्रार में पहुँच जाती है, और ऐसे ऊपर उठते समय वह समतावादी प्राण ऊर्जा अपने साथ नाभि क्षेत्र के अमृत कलश को भी सहस्रार तक उठा देती है, तब एक दशा ऐसी आती है जिसमें समता को धारण किए हुए और हिम लच्छों के समान ऊपर की ओर उठते हुए प्राण, मन पर हावी हो जाते हैं I यह चित्र इसी दशा को दिखा रहा है I

इस दशा का नाता उस नील मणि शरीर से भी है, जो साधक की स्थूल काया के भीतर ही प्रकट होता है और जिसके बारे में एक और अध्याय में बताया गया है I

 

  • तीसरा चरण… भद्र भद्री योग की संतुलित दशा, भद्री भद्र योग की संतुलित दशा, शिव और शक्ति की संतुलित दशा, शक्ति और शिव की संतुलित दशा, प्राण और मन की संतुलित दशा, मन और प्राण की संतुलित दशा, …
भद्री भद्र योग की संतुलित दशा, शिव और शक्ति की संतुलित दशा
भद्र भद्री योग की संतुलित दशा, भद्री भद्र योग की संतुलित दशा, शिव और शक्ति की संतुलित दशा, शक्ति और शिव की संतुलित दशा, प्राण और मन की संतुलित दशा, मन और प्राण की संतुलित दशा,

 

यह चित्र इस भाग में बताए जा रहे अर्द्धनारी के सगुण साकार स्वरूप के साक्षात्कार के तीसरे चरण को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शा रहा है I

यह चित्र मन और प्राण के संतुलक स्वरूप को दर्शाता है I इस दशा में समतावादी प्राण मन के भीतर बसकर रहते हैं I यह भद्र भद्री योग का तीसरा चरण है I यह दशा शिव शक्ति योग का अंग भी है I

इस दशा में समतावादी प्राणों को मन ऐसे धारण कर लेता है, जैसे कि मन ही प्राण हो I और इस दशा में प्राण भी उस मन को ऐसे धारण कर लेता है, जैसे प्राण ही मन हो I इस दशा में मन और प्राण का वह योग होता है, जिसमें मन उन समतावादी प्राणों को पूर्णरूपेण अपना लेता है और वह समतावादी प्राण भी मन पूर्णरूपेण अपना लेते हैं I

इस दशा में आकर ही मन उन सर्वशक्तिमान सर्वकल्याणकारी शिव का द्योतक हो जाता है, और वह प्राण उन सर्वकल्याणकारी शिव की सार्वभौम दिव्यता (अर्थात शक्ति) के द्योतक होते हैं I इस दशा में मन प्राणों के आवरण जैसा हो जाता है और प्राण भी मन के आवरण जैसे ही पाए जाते हैं I मन और प्राण की ऐसी योगदशा होने पर भी, मन उन समता को प्राप्त हुए, आदि शक्ति को दर्शाते हुए प्राणों को घेरकर रखता है I

यह दशा तब आती है जब शक्ति शिव योग, राम नाद को चला जा चुका होता है (अर्थात साधक ने शिव तारक मंत्र का वह अतिभयावह शब्दात्मक साक्षात्कार वज्रदण्ड के भीतर जाकर कर लिया होता है), और इसके पश्चात यह योग अब अपने गंतव्य को प्राप्त होने ही वाला होता है I

इसलिए यह दशा तब ही आती है, जब साधक का अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग अथवा आदिशक्ति लिंग या परा प्रकृति लिंग) सहस्र दल कमल के ऊपर के वज्रदण्ड में प्रवेश कर चुका होता है, और ऐसी दशा में उस साधक की चेतना हिरण्यगर्भ ब्रह्माणि योग की ओर चलित हो रही होती है I

ऐसी दशा में साधक के प्राण शाक्तत्व को प्राप्त होते हैं और मन शिवत्व को I और जहाँ वह शाक्तत्व ही शिवत्व सारिका और शिवत्व ही शाक्तत्व सरीका होता है I

ऐसी दशा में शिव, देव सिद्धांत और शक्ति, देवी सिद्धांत को दर्शाती है और जहाँ देव और देवी एक दुसरे के संतुलक स्वरूप होते हैं I

और ऐसी स्थिति में शिव और शक्ति अपनी योगदशा में देवत्व के गंतव्य के द्योतक भी होते हैं I

 

ऐसी दशा में…

शिव ज्ञान रूप, और शक्ति उन शिव की ज्ञानशक्ति होती हैं I

शिव चेतन रूप, और शक्ति उन शिव की ही चेतनाशक्ति होती हैं I

शिव क्रियातीत रूप में, और शक्ति उन शिव की क्रियाशक्ति होती हैं I

शिव इच्छातीत रूप में, और शक्ति उन शिव की इच्छा शक्ति होती हैं I

शिव प्राणातीत रूप में, और शक्ति उन शिव की प्राणात्मक शक्ति होती हैं I

शिव साधक के सगुण आत्मस्वरूप में शक्ति साधक की आत्मशक्ति होती हैं I

इसलिए इस दशा में शिव और शक्ति एक ही होते हैं और दो भी वही शिव और शक्ति ही होते I और ऐसे होते हुए ही वह एक दुसरे के संतुलक होते हैं I

और ऐसी दशा में प्राण अपने सर्वसम स्वरूप को प्राप्त होने की ओर अग्रसर भी हो जाते हैं और जहाँ उन प्राणों का यह सर्वसम स्वरूप भी वही है जो तब था जब प्राण का दस भागों में (अर्थात पञ्च वायु और पञ्च उपवायु के स्वरूप में) विभाजन नहीं हुआ था और जिसको एक पूर्व के अध्याय में एकोहम बहुस्याम: के वाक्य से सूक्ष्म सांकेतिक रूप में भी दर्शाया गया था I

ऐसी दशा को प्राप्त होकर साधक की चेतना वज्रदण्ड से ऊपर जो निरलम्बस्थान है, उसपर गति करने की पात्र होती है I

और ऐसी दशा में ही वह सिद्धगण जो उस निरालम्ब चक्र को पूर्वकालों में पाए होते हैं, वह जानने लगते हैं कि कोई और योगी उनके समान पूर्ण सिद्ध होने वाला है I

और ऐसी दशा में वह निरलम्बस्थान के सिद्धगण पूछते भी हैं, कि वह योगी कौन है, किस लोक में निवास कर रहा है, और किस मार्ग का पथगामी होकर वह इस सिद्धि को प्राप्त हुआ है I और ऐसा ही प्रश्न देवी देवता भी उनके गणों से पूछने लगते हैं I

 

  • चौथा चरण… शक्ति का शिव से योग, शिव का शक्ति से योग, भद्र का भद्री से योग, भद्री का भद्र से योग, प्राण का मन से योग, मन का प्राण से योग, अर्द्धनारीश्वर सिद्धि की प्राप्ति, अर्द्धनारी सिद्धि की प्राप्ति, अर्द्धनारी शरीर की सिद्धि प्राप्ति, अर्द्धनारीश्वर शरीर की सिद्धि, …

 

अर्द्धनारी शरीर, अर्द्धनारीश्वर शरीर
शक्ति का शिव से योग, शिव का शक्ति से योग, भद्र का भद्री से योग, भद्री का भद्र से योग, प्राण का मन से योग, मन का प्राण से योग, अर्द्धनारीश्वर सिद्धि की प्राप्ति, अर्द्धनारी सिद्धि की प्राप्ति, अर्द्धनारी शरीर की सिद्धि प्राप्ति, अर्द्धनारीश्वर शरीर की सिद्धि, अर्धनारी शरीर, अर्धनारीश्वर शरीर, अर्धनारी शरीर सिद्धि, अर्धनारीश्वर शरीर सिद्धि,

 

इस चित्र में जो सिद्ध शरीर दिखाया गया है, वह इस अध्याय के पाठक की ओर ही देख रहा है I

यह चित्र इस भाग में बताए जा रहे अर्द्धनारी के सगुण साकार स्वरूप के साक्षात्कार के चौथा चरण को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शा रहा है I

यह शारीर साधक की काया के भीतर ही बनता है और साधक की स्थूल काया के आकार का ही प्रतीत होता है I यही अर्द्धनारीश्वर सिद्धि की गंतव्य अवस्था है I

इस सिद्धि रूपी शरीर में जहाँ शिव और शक्ति का योग होता है, वहां शून्य ब्रह्म साक्षात्कार होगा I ऊपर के चित्र में सांकेतिक रूप से ही सही, लेकिन यह दशा दर्शाई गई है I

शून्य ब्रह्म का साक्षात्कार असंप्रज्ञात समाधि से होता है, और असंप्रज्ञात समाधि से ही निर्बीज समाधि का मार्ग प्रशस्त होता हैI इस सिद्धि के गंतव्य में निर्बीज ब्रह्म ही हैं I निर्बीज समाधि के पश्चात, साधक को अपनी काया में रहना भी बहुत कठिन सा ही हो जाता है, और ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस निर्बीज समाधि के पश्चात, साधक पर कष्टों का पहाड़ ही गिर जाता है I

समाधि के समस्त प्रकारों में से, निर्बीज समाधि का मार्ग और इसके पश्चात की दशा भी सबसे कठिन होती है I और इस समाधि के पश्चात, साधक के पञ्च कोषों के दृष्टिकोण से, यह निर्बीज समाधि सबसे विप्लवकारी भी है I इस समाधि के कोई ग्यारह माह के बाद तक तो मैं घर से भी निकल नहीं पाया था और इस समाधि के कोई छह माह पश्चात तक तो मैं अपनी शयन शय्या से भी उठ नहीं पाता था I जबकि मैं समाधि के कई स्वरूपों को पाया था, किन्तु शारीरिक आदि कष्टों के दृष्टिकोण से निर्बीज समाधि की तो कोई तुलना ही नहीं है I

ऊपर के चित्र में वह असम्प्रज्ञात दशा, जो शून्य ब्रह्म को दर्शाती है और जो निर्बीज ब्रह्म का मार्ग भी होती है, वह नीले और श्वेत वर्ण के मध्य में सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दिखाई गई है I

असंप्रज्ञात समाधि तक तो ठीक है, किन्तु निर्बीज में तो साधक के जीवन में विप्लव ही मच जाता है, और यह भी वह कारण है कि जबकि इस ग्रंथ में निर्बीज समाधि की बात तो होगी, किन्तु उसका कोई चित्र नहीं मिलेगा I बस उन असम्प्रज्ञात ब्रह्म तक ही चित्र मिलेगा… इससे आगे नहीं I

इस चतुर्थ चरण का यह चित्र, अर्द्धनारीश्वर की भ्रूमध्य के भीतर की दशा से संबंध रखता है I

और यही चित्र उन अर्द्धनारीश्वर के व्यापक स्वरूप में निवास से भी से भी नाता रखता है, और जहाँ वह अर्द्धनारीश्वर साधक के स्थूल शरीर के भीतर  ही स्वयंप्रकट होते हैं और उस स्थूल शरीर के आकार के ही पाए जाते हैं I

इन दोनों दशाओं के सिद्ध योगी ही पञ्च मुखी सदाशिव मार्ग पर जाने का पात्र बनता है, जिसको एक आगे की अध्यय श्रंखला में बताया जाएगा, और उस श्रृंखला का नाम भारत भारती मार्ग होगा I

इस सिद्धि को प्राप्त हुआ योगी, शून्य के समस्त स्वरूपों का भी समाधि मार्ग से ही साक्षात्कारी होगा, और जहाँ वह शून्य भी कई प्रकार की समाधियों से और कई स्वरूपों में साक्षात्कार किया जायेगा I लेकिन इस बिंदु के बारे में आगे के अध्याय (अथवा अध्यायों) में बताया जाएगा I

इस सिद्धि के बाद के उन सभी साक्षात्कारों से साधक यह भी जानता है, कि…

शून्य ही पूर्ण है और पूर्ण ही शून्य है I

पूर्ण ही शून्य स्वरूप में अभिव्यक्त हुआ है I

पूर्ण के साक्षात्कार का मार्ग भी शून्य ही जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ… इसलिए…

जबतक शून्य ही सिद्ध नहीं होगा, तबतक पूर्ण का साक्षात्कार भी नहीं होगा I

शून्य समाधि में जब साधक शून्य की परिपूर्णता देखेगा, तब शून्य ही पूर्ण होगा I

और पूर्ण में बसकर जब उस पूर्ण को देखा जाएगा, तब वह शून्य स्वरूप ही होगा I

सांकेतिक रूप में यही बिंदु शून्य के पूर्ण रूप और पूर्ण के शून्य रूप को दर्शाते हैं I

और ऐसे साक्षात्कार के पश्चात ही वह साधक, निर्बीज समाधि का पात्र बन पाता है I

और उस निर्बीज समाधि का मार्ग भी, इसी अर्द्धनारीश्वर सिद्धि से होकर जाता है I

इस सिद्धि का मार्ग भी शिव शक्ति योग है, जिसका नाद राम कहलाता है और जो शिव तारक मंत्र ही है I जब शक्ति शिव योग पूर्ण होगा, तब इस योग के पश्चात ही यह सिद्धि प्राप्त होगी I

यह एक अतिदुर्लभ सिद्धि है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

इस सिद्धि के कुछ समय पश्चात, उस शून्य अनंत के भीतर बसी हुई माँ भगवती का संन्यासी, सगुण साकार सीता माता स्वरूप, उस चिरंजीव और उनके समक्ष अर्धवज्रासन में हाथ जोड़कर बैठे हुए योगी से पूछती भी है, कि अमुक लोक का वह योगी जो इस सिद्धि को पाया है… वह कौन है?…क्या वह कोई परमहँस है अथवा अवधूत ही है?, अथवा वह योगी कोई और ही है?…इसका पता करो और बताओ I

इसलिए यही वह दशा है जब माँ आदि शक्ति को भी ज्ञान होता है, कि कोई योगी उस सिद्धि को प्राप्त हुआ है, जिसको इस संपूर्ण महाब्रह्माण्ड के इतिहास में उतने योगी भी नहीं पाए हैं, जिनको अपनी हस्त की दस उँगलियों पर ही पूर्णरूपेण गिना जा सके I

लेकिन इस चौथे चरण की यह सिद्धि तब ही प्राप्त होगी, जब योगी की चेतना उस निरालम्ब चक्र पर जाकर, उस निरालम्ब चक्र को ही पार करके, पुनः नीचे की और (अर्थात मूलाधार चक्र की और) आ जायेगी I

इस निरालम्ब चक्र के बारे में, जिसका नाता अथर्ववेद के 10.2.31से भी है, एक आगे के अध्याय में बताया जाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ…

और अब अर्द्धनारीश्वर का सगुण निराकार स्वरूप बताता हूँ…

 

अर्द्धनारीश्वर का सगुण निराकार स्वरूप, सगुण निराकार अर्द्धनारीश्वर, सगुण निराकार अर्द्धनारी
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जब सगुण साकार अर्द्धनारीश्वर सिद्धि के मार्ग पर योगी गमन कर रहा होता है, तो उस योगी के भ्रूमध्य में उन्ही अर्द्धनारीश्वर का सगुण निराकार स्वरूप भी प्रकाशित हो रहा होता है I

यह चित्र अर्द्धनारी को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन उनके सगुण निराकार स्वरूप में दर्शा रहा है I कुछ ऐसे ही प्रकाशरूप में अर्द्धनारी सगुण निराकार स्वरूप में साक्षात्कार होते हैं I यह प्रकाश प्रधानतः भ्रूमध्य में ही साक्षात्कार होता है I

अपने सगुण साकार और सगुण निराकार स्वरूपों में ही अर्द्धनारीश्वर मेरे गुरु हुए हैं I और जहाँ वह गुरु भी मेरे शरीर के भीतर ही विराजमान हुए हैं और उनके अनुग्रह से ही मैं इस अध्याय श्रृंखला सहित, इस ग्रंथ की कई और अध्याय श्रृंखलाओं में गति किया हूँ I और उन अध्याय श्रंखलाओं में से कुछ को ही मैंने इस ग्रंथ में प्रकाशित किया है… सभी को नहीं I

यहाँ बताई गई सिद्धि का नाता ऋग्वेद (7.59.12), यजुर्वेद (3.60) और अथर्ववेद (14.1.17) से भी है I

 

शक्ति शिव योग और अंतःकरण चतुष्टय, शिव शक्ति योग और अंतःकरण चतुष्टय की दशा, … अर्द्धनारी और अंतःकरण चतुष्टय, अर्द्धनारीश्वर और अंतःकरण चतुष्टय, … अर्द्धनारीश्वर और श्री विष्णु, अर्द्धनारी और श्री विष्णु, श्री विष्णु स्वरूप  और अर्द्धनारीश्वर, श्री विष्णु स्वरूप क्या है, विष्णु स्वरूप क्या है, … शक्ति शिव योग और अर्द्धनारीश्वर, शक्ति शिव योग और अर्द्धनारी, अर्द्धनारीश्वर ही विष्णु हैं, अर्द्धनारी ही विष्णु हैं, …

इस शक्ति शिव योग में (अर्थात इस योग से थोड़ा पूर्व से लेकर, इस योग की समाप्ति के पश्चात तक) अंतःकरण की जो स्थिति होती है, अब उसके बारे में बताता हूँ I

अंतःकरण के चार भाग होते है, जो मन, बुद्धि, चित्त और अहम् कहलाते हैं I और इन चार भागों का नाता प्राणों से भी रहता है I

इनमें से…

  • मन… का नाता वामदेव ब्रह्म से होता है I ऐसा होने के कारण मन की दिव्यता (अर्थात शक्ति) के रूप में माँ गायत्री का धवला मुख ही है I
  • बुद्धि… का नाता सद्योजात ब्रह्म से होता है I ऐसा होने के कारण बुद्धि की दिव्यता (अर्थात शक्ति) के रूप में माँ गायत्री का हेमा मुख ही है I
  • चित्त… का नाता तत्पुरुष ब्रह्म से होता है I ऐसा होने के कारण चित्त की दिव्यता (अर्थात शक्ति) के रूप में माँ गायत्री का विद्रुमा मुख ही है I
  • अहम् (अहंकार)… का नाता अघोर ब्रह्मा से होता है I ऐसा होने के कारण अहम् (या अहंकार) की दिव्यता (अर्थात शक्ति) के रूप में माँ गायत्री का नीला मुख ही है I

जब साधक के स्थूल शरीर के भीतर ही यह शक्ति शिव योग चलित होता है, तो इससे पूर्व साधक का अन्तःकरण चतुष्टय अपने हृदय के स्थान से बाहर की ओर निकलने लगता है I

अन्तःकरण चतुष्टय कि ऐसी दशा इस योग के प्रारम्भ से लेकर, इस योग के पूर्ण होने तक पाई ही जाएगी I

ऐसी स्थिति में वह अन्तःकरण चतुष्टय हृदय के उस भाग से, जिसका आकार अंगुष्ठ के ऊपर के भाग सा होता है, उससे बाहर निकल जाएगा I और हृदय के भीतर के अपने पूर्वस्थान से बाहर निकलकर ही प्रकाशित होता जाएगा I

 

टिपण्णी: लेकिन इस अध्याय में अन्तःकरण चतुष्टय के भ्रूमध्य क्षेत्र में लय होने की दशा नहीं बताई गई है I इस दशा के बारे में एक बाद के अध्याय में बतलाऊँगा, जब बोधिचित्त नामक सिद्धि की बात करी जाएगी I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

इस योग सिद्धि के पश्चात, अन्तःकरण चतुष्टय की जो दशा होती है, अब उसको बताता हूँ…

मन का लय, वामदेव ब्रह्म से संबद्ध मनाकाश में होता है I

चित्त का लय, तत्पुरुष ब्रह्म से संबद्ध चिदाकाश में हो जाता है I

अहम् का लय, अघोर ब्रह्म से संबद्ध अहमाकाश में ही हो जाता है I

बुद्धि का लय, सद्योजात ब्रह्म से संबद्ध ज्ञानाकाश में ही हो जाता है I

प्राणों का लय, पञ्च ब्रह्म से संबद्ध संपूर्ण एकादशाकाश में ही हो जाता है I

लय होने के समय मन, बुद्धि, चित्त, अहम्, सगुण साकार स्वरूप में ही होते हैं I

और ऐसे लय होने के समय, प्राण अपने सगुण निराकार स्वरूप में ही पाए जाते हैं I

 

टिपण्णी: यहाँ जो एकादशाकाश का शब्द आया है, उसके एकादश भाग होते हैं I इन भागों में से, दस भाग ब्रह्म शक्ति स्वरूप में पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण के होते हैं और ग्यारहवां भाग, आत्मशक्ति का I प्राणों के एकादशाकाश का संयुक्त स्वरूप ही प्राणाकाश कहलाता है I

 

इस लय के पश्चातसाधक जो पाएगा, अब उसको बताता हूँ…

मन का सगुण निराकार गंतव्य मनाकाश है I

बुद्धि का सगुण निराकार गंतव्य ही ज्ञानाकाश है I

चित्त का सगुण निराकार गंतव्य चिदाकाश ही होता है I

अहम् का सगुण निराकार गंतव्य ही अहमाकाश कहलाता है I

पञ्च प्राण और उपप्राण का सगुण निराकार गंतव्य ही प्राणाकाश है I

प्राणशक्ति का एकादशाकाश नामक संयुक्त स्वरूप ही प्राणाकाश होता है I

 

इस योग सिद्धि के पश्चात साधक यही जानेगा…

मन बुद्धि, चित्त और अहम्, निर्गुण ब्रह्म में ही लय होते हैं I

और वह निर्गुण निराकार ब्रह्म को ही ईशान ब्रह्म कहा गया है I

पञ्च प्राण और उपप्राण, पञ्चब्रह्म में लय होकर उनकी दिव्यता होते हैं I

 

जब साधक अपने अंतःकरण के चारों भागों को उनके सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार, तीनों स्वरूपों में पाएगा, तब ही वह साधक पूर्ण ब्रह्म को जान पाएगा I ऐसी दशा में वह साधक यह भी जानेगा…

पूर्ण ब्रह्म ही सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार समानरूप में हैं I

अपने अंतःकरण के ऐसे साक्षात्कार से साधक पूर्ण ब्रह्म स्वरूप को ही पाएगा I

और वह पूर्णब्रह्म भी साधक के अपने आत्मस्वरूप में ही प्रकाशित होंगे I

उस आत्मस्वरूप पूर्ण ब्रह्म की दिव्यता पञ्च मुखा गायत्री ही होंगी I

 

इसलिए यह अर्द्धनारी स्वरूप का साक्षात्कार, उन्ही पूर्ण ब्रह्म का मार्ग है, जिनको यहाँ पर बताया गया है I और इस सिद्धि का मार्ग भी शिव शक्ति की वह योग दशा ही है, जो अर्द्धनारीश्वर कहलाई थी और जिनको श्री विष्णु भी कहा जाता है I

 

इस अंतिम सिद्धि का जो मार्ग है, अब उसको बताता हूँ I इस मार्ग पर साधक का…

मन, वामदेव में लय होकर, तत् त्वम् असि का स्वरूप हो जाता है I

बुद्धि, सद्योजात ब्रह्म में लय होकर, प्रज्ञानं ब्रह्म का स्वरूप होती है I

चित्त, तत्पुरुष ब्रह्म में लय होकर, अयमात्मा ब्रह्म का स्वरूप हो जाएगा I

अहम्, अघोर ब्रह्म में लय होकर, अहम् ब्रह्मास्मि का स्वरूप ही हो जाता है I

पञ्च प्राण और उपप्राण, पञ्च ब्रह्म में लय होकर, सोऽहं का स्वरूप ही हो जाते हैं I

अब ऊपर बताई गई दशाओं की मार्ग सिद्धियों को बताता हूँ…

मन, मनस चक्र से ऊपर के शून्य तत्त्व में ही लय होता है I

बुद्धि, ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर ब्रह्मतत्त्व में लय होगी I

चित्त, सहस्रार और वज्रदण्ड से ऊपर के निरलम्बस्थान में लय होता है I

अहम्, उन शून्य ब्रह्म में लय होता है, जो शून्य अनंत: अनंत शून्यः ही हैं I

प्राण उन पञ्च मुखी गायत्री में लय होते हैं, जो पञ्च ब्रह्म की व्यापक दिव्यता हैं I

अब इस मार्ग की अंतरिम दशा को बताता हूँ…

मन पूर्ण स्थिर होकर ब्रह्मलीन होगा I

बुद्धि निश्कलंक होकर, ब्रह्मलीन होगी I

चित्त संस्कार रहित होकर, ब्रह्मलीन होगा I

अहम् पूर्ण विशुद्ध होकर ही, ब्रह्मलीन हो पाता है I

प्राण सार्वभौम होकर, ब्रह्म शक्ति से ही हो जाएंगे I

इस योग में ब्रह्म ही ब्रह्मशक्तिब्रह्मशक्ति ही ब्रह्म  हैं I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि…

पूर्ण स्थिर मन ही ब्रह्म होता है I

निष्कलंक बुद्धि ही ब्रह्म होती है I

संस्कार रहित चित्त ही ब्रह्म कहलाता है I

विशुद्ध अहम् ही ब्रह्म का द्योतक होता है I

ब्रह्म की दिव्यता को पाए हुए प्राण ही ब्रह्मशक्ति हैं I

ब्रह्मशक्ति ही ब्रह्म होती हैं और ब्रह्म ही ब्रह्म शक्ति होते हैं I

 

और एक बात…

जो इस सब का सिद्ध होगा, वह ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति दोनों होगा I

जो ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति दोनों होगा, वही पूर्ण ब्रह्म का सिद्ध भी होगा I

जो पूर्ण ब्रह्म सिद्ध होगा, वही भगवान् और भगवती प्रकृति का स्वरूप होगा I

जो भगवान् और भगवती का समान स्वरूप होगा, वही अर्द्धनारीश्वर स्वरूप होगा I

भ्रूमध्य में बसे हुए अर्द्धनारीश्वर के साक्षात्कार के पश्चात, ऊपर बताया गया सबकुछ, चाहे विलम्ब से ही सही, लेकिन अर्द्धनारीश्वर साक्षात्कारी साधक के साथ होता ही है I

 

ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में, ऐसे साधक की जो दशा होती है, अब उसको बताता हूँ…

वह होता हुआ भी नहीं है, और नहीं होता हुआ भी सदैव ही है I

वह महाब्रह्माण्ड को धारण किया हुआ भी, ब्रह्माण्डीय नहीं रहता है I

वह सगुण साकार शरीरी रूप में होता हुआ भी, सगुण निराकार ही होता है I

आत्मस्वरूप से वह सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार भी होता है I

ऐसे साधक की योगदशा के कुछ और बिंदुओं को अब बताता हूँ…

वह त्रिगुण में होता हुआ भी त्रिगुणातीत है I

वह पञ्च महाभूत में होता हुआ भी भूतातीत ही है I

वह कालचक्र में बसा हुआ भी कालचक्र से अतीत, कालातीत है I

वह शून्य, शून्य ब्रह्म और सर्वसम तत्त्व में है, और इनसे परे भी वही है I

वह समस्त ब्रह्म रचना और रचना का तंत्र होता हुआ भी, रचनातीत ब्रह्म ही है I

यही अर्द्धनारीश्वर सिद्धि का विष्णुत्व भाग है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

अर्द्धनारी सिद्धि ही विष्णुत्व की द्योतक होती है I

शिव और शक्ति का योग ही श्री विष्णु कहलाया जाता है I

इस सिद्धि को पाया हुआ साधक ही श्री विष्णु स्वरूप कहलाता है I

अर्द्धनारीश्वर सिद्धि की यहां बताई गई परिपूर्णता ही विष्णुत्व सिद्धि है I

शिव शक्ति का समानरूपेण और पूर्णरूपेण योग ही अर्द्धनारीश्वर, श्री विष्णु हैं I

और जब यह योग साधक की काया के भीतर और यहाँ बताए गए सभी स्थानों पर और प्रकारों से सिद्ध होता है, तो ब्रह्माण्डिय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में वह साधक ही श्री विष्णु का स्वरूप माना जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

इन साक्षात्कारों का साररूप, अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग के कुछ साक्षात्कार, …

इन सभी साक्षात्कारों में जो साररूप पाया जाता है, अब उसको बताता हूँ…

  • अर्द्धनारीश्वर ही सदाशिव हैं I
  • सदाशिव होते हुए भी नहीं हैं, और नहीं होते हुए भी सदैव ही हैं I
  • वह शून्य जो पूर्ण है और वह पूर्ण जो शून्य है, वही इस अध्याय से साक्षात्कार होगा… और वही अर्द्धनारी के परमगुरु स्वरूप में सदाशिव हैं I
  • जो प्रकाश और अंधकार, दोनों के भीतर और बाहर होता हुआ भी, न प्रकाश और न अंधकार ही है, और जो स्व:प्रकाश ही है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही सदाशिव का ईशान मुख है I
  • जो न बीज है और न ही निर्बीज ही है, जो बीज और निर्बीज दोनों से अतीत है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही सदाशिव कहलाया है I
  • वह शून्य जो अभी तक शून्य नहीं हुआ है क्यूंकि वह पूर्ण ही रहा है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि से साक्षात्कार होगा I यही सदाशिव कहलाया है I
  • वह जो शून्यता और पूर्णता की योगदशा है, और ऐसा होता हुआ भी वह पूर्ण ही रहा है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही सदाशिव कहलाया है I
  • जो सदैव ही विद्यमान सनातन अनंत स्व:प्रकाश अद्वैत सत्ता है, और ऐसा होते हुए भी जिसनें अनादि कालों से अपने आप को एक अन्धकारमय आवर्ण जैसी दशा में ढक कर रखा हुआ है, और जो जगन्नाथ कहलाया है और जिसको पूर्ण ब्रह्म,महाब्रह्म आदि शब्दों से भी दर्शाया जाता है, और जो असम्प्रज्ञात और निर्बीज शब्दों के सार का भी द्योतक है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I
  • वह जो सर्वस्व का अस्तिव्त्व और अनस्तित्व दोनों है, और इन दोनों के योग में है, और इसके अतिरिक्त इन दोनों से परे भी है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही सदाशिव कहलाया है I
  • जिसमें समस्त प्रकाश और अंधकार पूर्णरूपेण बसा हुआ है, और जो इन दोनों में भी समानरूपेण बसा हुआ है, और जो इन दोनों से और स्वयं से भी अतीत है, वह अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही परमशिव कहलाया है I
  • वह जो राम और कृष्ण के शब्द से दर्शाया गया है, वह भी अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही सर्वेश्वर कहलाया है I
  • वह प्राज्ञ जो सम्प्रज्ञात समाधि से जाना जाता है, वह शून्य जो शून्य समाधि से जाना जाता है, और वह शून्य ब्रह्म जो असंप्रज्ञात समाधि से जाना जाता है, और वह जो निर्बीज समाधि से जाना गया निर्बीज ब्रह्म ही है, वह सब भी अर्द्धनारीश्वर सिद्धि मार्ग से साक्षात्कार होगा I वही समाधिश्वर है I
  • वह जो इस जीव जगत का गर्भ रूप महाकाल है, और वह जो इस जीव जगत की गर्भ शक्ति महाकाली है, उन दोनों का योग भी इसी अर्द्धनारीश्वर योगमार्ग से जाकर ही सिद्ध होगा I
  • वह जो योगीजनों द्वारा पिण्ड ब्रह्माण्ड और उसका योग कहलाया है, और वह जिसको योगीजनों ने राजभवन तक कहा है, यह भी इसी अर्द्धनारीश्वर योगमार्ग से जाकर ही सिद्ध होगा I
  • वह जिसको सर्वं खल्विदं ब्रह्म, सत्यम् ज्ञानम् अनंतम् आदि वाक्यों से दर्शाया गया है, और वह जिसको वेद चतुष्टय के महावाक्य दर्शाते हैं, वह सब भी इसी अर्द्धनारीश्वर सिद्धि से जाकर सीधा- सीधा अपने ज्ञानरूप में साक्षात्कार होंगे I

 

आगे बढ़ता हूँ…

  • अर्द्धनारीश्वर साकार और निराकार दोनों स्वरूपों को धारण करे हुए हैं I
  • जिस साधक ने उसके अपने आंतरिक योगमार्ग से अर्द्धनारी का पूर्णरूपेण साक्षात्कार करा होगा, वह उन गुरुदेव अर्द्धनारीश्वर को ऐसा ही पाएगा I इसलिए ऐसा साधक अर्द्धनारीश्वर को सगुण साकार और सगुण निराकार, दोनों ही स्वरूपों में साक्षात्कार करेगा I
  • अर्द्धनारीश्वर सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों को धारण करे हुए हैं I
  • यह साक्षात्कार अर्द्धनारी के सगुण निराकार और सगुण साकार दोनों स्वरूपों में ही होता है I इस साक्षात्कार में साधक उस निरंग प्रकाश को अर्द्धनारीश्वर में पाएगा, जो अनंत सा ही होगा I और इसी निरंग प्रकाश ने उन्ही अर्द्धनारीश्वर के सगुण निराकार और सगुण साकार दोनों स्वरूपों को घेरा हुआ भी होगा, और उस प्रकाश की सीमा भी अनंत सरीकी ही होगी I जबकि साधक यह साक्षात्कार, उन अर्द्धनारी के सगुण स्वरूप का अलंबन लेकर ही करता है, किन्तु इसमें वह साधक उन अर्द्धनारीश्वर भगवान के निर्गुण निराकार स्वरूप को ही जान जाता है I
  • और ऐसे जानने के पश्चात ही वह साधक उन अर्द्धनारी भगवान् के पूर्ण स्वरूप को जानता है, जिसमें वह अर्द्धनारीश्वर ही वह पूर्ण ब्रह्म हैं, जो सगुण निराकार, सगुण साकार और निर्गुण निराकार, तीनों ही स्वरूपों में साधक की काया के भीतर ही प्रकाशित हो रहे होते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

आज के कुछ वेदज्ञ ही कहते हैं, कि आत्मा को कौन जान पाया है?, निर्गुण ब्रह्म को कौन जान पाया है? I

लेकिन ऐसा तो वह मनीषी ही बोलते हैं, जो शास्त्रों से ब्रह्म को जानते हैं, न कि वह योगीजन जिन्होंने निर्गुण निराकार ब्रह्म को उनके अपने आंतरिक योगमार्ग से सीधा सीधा साक्षात्कार करा है I

हो सकता है शास्त्रों में मनीषीगण को ऐसा ही दृश्य होता है, किन्तु मैं तो अपने ही सीधे सीधे साक्षात्कार के अनुसार ही यह कह रहा हूँ, कि…

जो साक्षात्कारों से जानकार भी पूर्णरूपेण बताया न जा सके, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जो योगमार्ग से जाना तो जा सके, किन्तु वर्णन से अतीत हो, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जो जानने के पश्चात भी शब्दातीत और वाक्यातीत ही रहा है, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जो मन बुद्धि चित्त अहम् से अतीत, योगमार्ग से जाना जाए, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसको योगमार्ग से जानकर भी, वह योगातीत ही पाया जाए, वह निर्गुण ब्रह्म है I

 

और इस अध्याय के आंतरिक योगमार्ग से जो गंतव्य स्वरूप में साक्षात्कार होता है, अब उसको बताता हूँ…

जिसमें ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का भेद ही न रहे, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसमें द्रष्टा, दृष्टि और दृश्य का भेद ही न हो, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसमें साधक, साधना और साध्य का भेद न हो, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसमें चेतना, चेतन और चेतने का भेद ही नहीं रहे, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसमें अहम्, तवं, अयं, सो आदि का द्वैतवाद ही नहीं, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जिसमें मन बुद्धि चित्त अहम्, लय होकर भेद रहित होंगे, वह निर्गुण ब्रह्म है I

जहाँ रचना, स्वयं को अपने रचैता के समान निर्विकल्प पाए, वह निर्गुण ब्रह्म है I

 

और इसके अतिरिक्त…

जिसमें पिण्ड ब्रह्माण्ड नामक रचना का रचैता से भेद न रहे, वह पूर्ण ब्रह्म है I

जब रचना, स्वयं को रचैता और रचना के तंत्र स्वरूप में पाए, वह पूर्ण ब्रह्म है I

उन पूर्ण ब्रह्म को अर्द्धनारीश्वर भगवान अपने सगुण आत्मा स्वरूप में दर्शाते हैं I

 

और अब मैं उन गुरुदेव और गुरुमाई के योगरूप की वंदना करके इस अध्याय को समाप्त करता हूँ I

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव

त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव

त्वमेव सर्वम् मम देव देव

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय I

 

 

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