वासुकी नाग, श्श्श नाद, नागराज, नाग सम्राट, शिव के कण्ठ् का नाग, सर्पराज, योग वासुकी, योग आदिशेष, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव षडक्षर मंत्र, शिव अष्टाक्षर मंत्र, ॐ नमः शिवाय, शिव षडक्षर स्तोत्रम्, क्षीर सागर, अत्यन्तिकाप्रलय, ब्रह्माण्ड प्रदक्षिणा, ब्रह्माण्ड परिक्रमा

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यहाँ पर वासुकी नाग, श्श्श नाद, नागराज, नाग सम्राट, शिव के कण्ठ् का नाग, सर्पराज, योग वासुकी, योग आदिशेष, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव षडक्षर मंत्र, शिव अष्टाक्षर मंत्र, ॐ नमः शिवाय, शिव षडक्षर स्तोत्रम्, क्षीर सागर, अत्यन्तिकाप्रलय, ब्रह्माण्ड प्रदक्षिणा, ब्रह्माण्ड परिक्रमा आदि बिंदुओं पर बात होगी I

पर यहाँ जिस ब्रह्माण्ड की प्रदक्षिणा की बात करी है, वह आंतरिक ब्रह्माण्ड है, अर्थात साधक की काया के भीतर का ब्रह्माण्ड है… न कि वह बाह्य ब्रह्माण्ड जिसके भीतर साधक की काया पड़ी हुई है I

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान बस होने ही वाला था I

यह अध्याय भी आत्मपथ, ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अंग है, जो पूर्व के अध्याय से चली आ रही है।

यह भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जो भी जुड़ा हुआ है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को समरपित करता हूं।

यह भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट, योगगुरु और योगेश्वर भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनाकि अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मस्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है ।

यह अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का उनहत्तरवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा ।

यह अध्याय, इस हिरण्यगर्भ ब्रह्माणी मार्ग का सातवाँ अध्याय है I

 

शिव पंचाक्षरी मंत्र, शिव षडाक्षरी मंत्र, शिव पंचाक्षर मंत्र क्या है, शिव षडक्षर मंत्र क्या है, शिव अष्टाक्षर मंत्र क्या है, ॐ नमः शिवाय का मंत्र, शिव षडक्षर स्तोत्रम् क्या है, … शिव पंचाक्षर मंत्र का ना शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का ना शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का न शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का न शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का मा शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का मा शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का म शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का म शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का शि शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का शि शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का वा शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का वा शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का व शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का व शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का या शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का या शब्द, शिव पंचाक्षर मंत्र का य शब्द, शिव षडक्षर मंत्र का य शब्द, …

यहाँ पर नमः शिवाय और नमः शिवाय के मंत्रों के नाते पर बात होगी I

 

और शिव पंचाक्षर मंत्र  बताता हूँ…

पूर्व के अध्याय जिसका नाम मक्केश्वर महादेव था, उसमें जो नमः शिवाय का मंत्र बताया गया था, उसको अब संक्षेप में बताता हूँ…

  • मेरुदण्ड के मार्ग से जब चेतना ऊपर उठती है और मूलाधार चक्र को पार करती है, किन्तु अब तक वह मूलाधार चक्र के ऊपर के स्वाधिष्ठान चक्र पर नहीं पहुंची होती है, तब जो बीज शब्द सुनाई देता है, वह ना का शब्द (न शब्द) होता है I और योगमार्गों में इसी शब्द को नकार कहा जाता है I

इसलिए योगमार्ग में ना का बीज शब्द, मूल कमल का ही कहा गया है I

और ऐसा होने पर भी यह बीज शब्द, मूलाधार चक्र से थोड़ा सा ऊपर की ओर ही सुनाई देता है I

  • इससे आगे के मार्ग में, जब चेतना स्वाधिष्ठान चक्र पर पहुँच कर, उससे ऊपर उठती है, लेकिन मणिपुर चक्र पर नहीं पहुंची होती है, तब जो बीज शब्द सुनाई देता है, वह मा का शब्द (म का शब्द) है I और योगमार्गों में इसी शब्द को मकार कहा जाता है I

इसलिए योगमार्ग में मा का बीज शब्द, काम कमल का ही कहा गया है I

और ऐसा होने पर भी यह बीज शब्द, स्वाधिष्ठान चक्र से थोड़ा सा ऊपर की ओर ही सुनाई देता है I

  • इससे आगे के मार्ग में, जब चेतना मणिपुर चक्र पर पहुँच कर, उससे ऊपर उठती है, लेकिन अनाहत चक्र पर नहीं पहुंची होती है, तब जो बीज शब्द सुनाई देता है, वह शि का शब्द (शि शब्द) है I और योगमार्गों में इसी शब्द को शिकार कहा जाता है I

इसलिए योगमार्ग में शि का बीज शब्द, नाभि कमल का ही कहा गया है I

और ऐसा होने पर भी यह बीज शब्द, नाभि चक्र से थोड़ा सा ऊपर की ओर ही सुनाई देता है I

  • इससे आगे के मार्ग में, जब चेतना अनाहत चक्र पर पहुँच कर, उससे ऊपर उठती है, लेकिन विशुद्ध चक्र पर नहीं पहुंची होती है, तब जो बीज शब्द सुनाई देता है, वह वा का शब्द (व का शब्द) है I और योगमार्गों में इसी शब्द को वकार कहा जाता है I

इसलिए योगमार्ग में वा का बीज शब्द, हृदय कमल का ही कहा गया है I

और ऐसा होने पर भी यह बीज शब्द, हृदय चक्र से आगे की दिशा में और थोड़ा सा ऊपर की ओर ही सुनाई देता है I

  • और इससे आगे के मार्ग में, जब चेतना विशुद्ध चक्र पर पहुँच कर, उससे ऊपर उठती है, लेकिन आज्ञा चक्र पर नहीं पहुंची होती है, तब जो बीज शब्द सुनाई देता है, वह या का शब्द (य का शब्द) है I और योगमार्गों में इसी शब्द को यकार कहा जाता है I

इसलिए योगमार्ग में या का बीज शब्द, कण्ठ् कमल का ही कहा गया है I

और ऐसा होने पर भी यह बीज शब्द कण्ठ्मणि के समीप और उससे थोड़ा सा ऊपर की ओर ही सुनाई देता है I

आगे बढ़ता हूँ…

 

ऐसा होने के कारण ही यह साक्षात्कार मार्ग…

  • शिव पंचाक्षर मंत्र का योग मार्गी स्वरूप है, जो नमः शिवाय के स्वरूप में बताया गया है I
  • और क्यूंकि इस मंत्र का नाता परमगुरु शिव से है और इस नमः शिवाय के मंत्र में पाँच बीजाक्षर होते हैं, इसलिए इसको शिव पंचाक्षर मंत्र और शिव पंचाक्षरी मंत्र भी कहा जाता है I

तो यह था शिव पंचाक्षर मंत्र का योगमार्गी स्वरूप I

आगे बढ़ता हूँ…

 

और अब में शिव षडक्षर मंत्र को योगमार्ग से बताता हूँ I

  • और इस नमः शिवाय से आगे के मार्ग में, जब चेतना आज्ञा चक्र पर पहुंचकर, उससे ऊपर उठती है, लेकिन सहस्रार चक्र पर नहीं पहुंची होती है, और वह चेतना बस ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही पहुंची होती है, तब साधक पूरे ॐ मार्ग का साक्षात्कार करता है (जिसको एक पूर्व की अध्याय श्रंखला में, जिसका नाम ॐ सावित्री मार्ग था, उसमें बताया जा चुका है) I

और ऐसे मार्ग के अंत में जो शब्द साक्षात्कार होते है, वह ओ३म् के अकार, उकार, मकार के शब्द स्वरूपों सहित, शुद्ध चेतन तत्त्व (अर्थात ब्रह्मतत्त्व) और ॐ के लिपिलिंग स्वरूप का भी है I

इसलिए योगमार्ग में ओम का शब्द, नयन कमल और सहस्र दल कमल, दोनों का ही कहा गया है I यही कारण है कि उत्कृष्ट योगीजनों ने ॐ को आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र, दोनों से ही संबद्ध बताया है I

और ऐसा होने पर भी ॐ नाद के शब्दात्मक और लिपिलिंगात्मक स्वरूप साक्षात्कार में, वह ॐ का शब्द ब्रह्मरंध्र के भीतर के (और ब्रह्मरंध्र से थोड़ा नीचे के) ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही सुनाई देता है I

ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष, नैन कमल से थोड़ा ऊपर और सहस्र दल कमल से थोड़ा नीचे ही साक्षात्कार होता है I

यही उस शिव षडक्षर मंत्र का साक्षात्कार मार्ग है, जो ॐ नमः शिवाय के मंत्र का योगमार्गी स्वरूप है, और इसी स्वरूप में इसको यहाँ बताया गया है I

आगे बढ़ता हूँ…

 

इसी साक्षात्कार और उसकी सिद्धि को शिव षडक्षर स्तोत्रम् में ऐसे बताया गया है I

 

ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः ।

कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥

जिन बिंदुसंयुक्त ओमकार पर योगी नित्य ध्यान करते हैं I

जो इच्छा पूर्ती और मोक्ष भी प्रदान करते हैं, उन ओमकार  शिव को नमस्कार  ॥१॥

टिपण्णी: यहाँ जो ओमकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का “” है।

 

 

नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः ।

नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः ॥२॥

ऋषि देवता अप्सराओं के समूह जिनके प्रति श्रद्धापूर्वक झुकते हैं

जिनको मनुष्य नमन करते हैं, उन देवेश नकार स्वरूप शिव को नमस्कार है ॥२॥

टिपण्णी: यहाँ जो नकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का “न” अक्षर है।

 

 

महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम् ।

महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः ॥३॥

जो महान देव, महान आत्मा, सभी ध्यान का अंतिम उद्देश्य हैं I

समस्त पापों के महा विनाशक उन मकार स्वरूप शिव को नमस्कार है ॥३॥

टिपण्णी: यहाँ जो मकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का “म” अक्षर है। यही वह मकार भी है, जिसके बारे में एक पूर्व के अध्याय में बताया गया था और जिसका एक नाम सगुण शिव भी कहा गया था I और उस अध्याय में यह भी कहा था, कि उन त्रिमणि स्वरूप मकार में मध्य का मणि नीले और श्वेत वर्ण के शिव और शक्ति हैं और उस मणि ने मुझे कहा था, कि उनके स्थान पर नीले मणि को मध्य में दिखाया जाए, जिसके कारण उस अध्याय (अर्थात मकार या हरिहरब्रह्मा के अध्याय) के चित्र में भी ऐसा ही दिखाया गया है I

 

 

शिवं शांतं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् ।

शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नमः ॥४॥

शिव (शुभ) शांति का निवास, जगत स्वामी और लोकों का कल्याण करते हैं I

शिव एक शाश्वत शब्द है, उन शिकार स्वरूप शिव को नमस्कार है  ॥४॥

टिपण्णी: यहाँ जो शिकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का “शि” अक्षर है।

 

 

वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कण्ठ्भूषणम् ।

वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ॥५॥

जिनका वाहन बैल, जिनके गले का आभूषण वासुकी नाग है I

जिन देव के बाईं ओर शक्ति हैं, उन वकार स्वरूप शिव को नमस्कार है  ॥५॥

टिपण्णी: यहाँ जो वकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का “वा” अक्षर है। इसमें वासुकि का स्थान कण्ठ् में होने पर भी, वकार के साथ ही कहा गया है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि वकार जो हृदय चक्र से थोड़ा सा ऊपर साक्षात्कार होता है, वहीँ पर वासुकि का प्राथमिक साक्षात्कार होता है और इसी दशा को इस अध्याय के एक आगे के चित्र मैं भी दर्शाया गया है I और इस मंत्र में ऐसा कहने का एक और कारण भी है, की अंततः वह वासुकि कण्ठ् कमल से कन्धों तक ही विराजमान होता है I

 

 

यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः ।

यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः ॥६॥

जहां भी देवों का निवास है वहां शिव है, जो सर्वव्यापक महान ईश्वर है I

जो सभी देवताओं के गुरु हैं, उन यकार स्वरूप शिव को नमस्कार है ॥६॥

टिपण्णी: यहाँ जो यकार शब्द आया है, वह ॐ नमः शिवाय मंत्र का अक्षर है।

आगे बढ़ता हूँ…

 

अब शिव अष्टाक्षर मंत्र बताता हूँ…

इस कलियुग की काली काया के कारण, शिव अष्टाक्षर में भी अब बहुत भ्रांतियां आ गई हैं, इसलिए अब इस शिव अष्टाक्षर का वास्तविक स्वरूप कुछ बिंदुओं में ही अंकित करता हूँ…

  • शिव पंचाक्षर मंत्र में नमः शिवाय है I
  • शिव षडक्षर में ओम नमः शिवाय है I
  • और जब हम शिव षडक्षर मंत्र के ॐ को, अकार, उकार और मकार स्वरूप में साक्षात्कार करते हैं (अर्थात इन तीनों के पृथक स्वरूपों में, ओ३म् को लम्बा करके बोलते हैं), तो यही शिव षडक्षर मंत्र, शिव अष्टाक्षर मंत्र स्वरूप धारण कर लेता है I
  • लेकिन यह तो वही जाना होगा, जिसने इनका सीधा-सीधा साक्षात्कार किया होगा, न कि कोई धर्म शास्त्री, अथवा कोई वेदविक I

लेकिन इसी शिव षडक्षर मंत्र का तो दशाक्षर स्वरूप भी होता है I किन्तु इस स्वरूप को मैं नहीं बतलाऊँगा, क्यूंकि इसमें धारणा में ही वह दो अतिरिक्त अक्षर होते हैं, न कि शब्दों में I

आगे बढ़ता हूँ…

 

आदिशेष सिद्धि मार्ग, आदिशेष सिद्धि का मार्ग, … वासुकी सिद्धि मार्ग, वासुकी सिद्धि का मार्ग, नाग राज, नागराजन वासुकी, नागराज सिद्धि का मार्ग, नागराज सिद्धि मार्ग, नाग सम्राट सिद्धि का मार्ग, नाग सम्राट सिद्धि मार्ग, वासुकी नाग सिद्धि का मार्ग, श्श्श नाद सिद्धि, शिव के कण्ठ् का नाग सिद्धि, सर्पराज सिद्धि मार्ग, सर्पराज सिद्धि का मार्ग, योग वासुकी सिद्धि मार्ग,  … श्श्श नाद का साक्षात्कार, हृदय का श्श्श नाद, …

 

यहाँ पर आदिशेष और वासुकी सिद्धियों के योगमार्ग को बताया जाएगा I

आजकल कोई बोलता है कि वह आदिशेष का अवतार है, और कोई बोलता है कि वह वासुकी का अवतार है, तो ऐसे मनीषियों के प्रपंच से बचने के लिए ही यह भाग लिखा जा रहा है… ताकि इन सिद्धियों के वास्तविक योगपथ को बताया जा सके I

 

आगे बढ़ता हूँ…

  • पूर्व की अध्याय श्रंखला जिसका नाम जगदगुरु शारदा मार्ग था, उसके एक अध्याय में (जिसका नाम अनंताकाश और ब्रह्माकाश भी था) श्श्श नाद के बारे में बताया गया था I
  • उस अध्याय में यह भी बताया गया था, कि जब योगी अपनी ही हृदय कैवल्य गुफा में बैठकर, अंततः उस हृदय गुफा के अग्रभाग से ऊपर की ओर उठते हुए उस विशालकाय प्रकाश के सागर को (जिसको अनंताकाश का नाम भी दिया गया था) देखता है, तब उस योगी की चेतना अपना उस समय का स्थान त्यागकर, उस हृदय गुफा में आगे बढ़ती है और हृदय में ही बसे हुए अहमाकाश से होकर, आगे के शून्याकाश में चली जाती है I
  • और इस शून्याकाश से वह चेतना, विसर्ग मार्ग पर जाकर, हृदय मोक्ष गुफा के अग्रभाग में, हृदय के नीचे से जो हृदय के ऊपर की ओर उठता हुआ ब्रह्माकाश है, उसमें ही लय हो जाती है I इसी दशा को कुछ योगीजनों ने महामानव से जोड़कर भी बताया है और ऐसे योगीजनों ने कहा भी है, कि ऐसा योगी महामानव पद को पाता है I
  • उस अध्याय श्रंखला में, इस लय होने के समय पर एक नाद बताया गया था, जिसको श्श्श्श्श के शब्द से बताया गया था I यही यहाँ बताया जा रहा श्श्श नाद भी कहा गया है, क्यूंकि यह ऐसा ही सुनाई देता है जब साधक की चेतना उस हृदय के अग्रभाग में ऊपर की ओर उठते हुए विशालकाय ब्रह्माकाश में ही लय हो जाती है I और उसी पूर्व के अध्याय में इस नाद को आदिशेष का शब्द स्वरूप भी कहा गया था I
  • और उस अध्याय में यह भी कहा गया था, कि यह श्श्श का शब्द, इसकी गंतव्य सिद्धि नहीं है I
  • यही श्श्श नाद (अर्थात श्श्श का शब्द), जो योगमार्ग में आदिशेष का शब्दात्मक स्वरूप, वह इस शब्द का पूर्ण साक्षात्कार इसलिए भी नहीं है, क्यूंकि इस श्श्श नाद का अंतिम साक्षात्कार ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में तब होता है जब साधक की चेतना, ब्रह्मतत्त्व (अर्थात शुद्ध चेतन तत्त्व) से आगे जाकर, ॐ के लिपिलिंग स्वरूप में (जो ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही ॐ के ब्रह्म एकाक्षर रूप में लिखा हुआ होता है) जो ऊपर का बिंदु होता है, उसमें ही लय हो जाती है I
  • इसलिए यह श्श्श का शब्द उसी विशालकाय प्रकाश से नाता रखता है, जो साधक के हृदय के अग्रभाग से आगे की ओर, और ऊपर उठ रहा होता है I
  • और वह विशालकाय प्रकाश, हृदय क्षेत्र के नीचे के भाग से (अर्थात नाभि कमल से हृदय कमल तक के क्षेत्र के भाग से) ऊपर उठता है, और हृदय के अग्रभाग की ओर, एक विशालकाय प्रकाश के सागर रूप में दिखाई देता है I
  • और उस विशालकाय प्रकाश में साधक की चेतना के लय होने पर, जब इस श्श्श शब्द का प्राथमिक साक्षात्कार होता है, तो साधक अपने ही हृदय के अग्रभाग से इसी प्रकाश की रश्मियों का आलम्बन लेकर, ऊपर की ओर उठने लगता है (अर्थात साधक की चेतना हृदय से मस्तिष्क की ओर उठने लगती है) I
  • ऊपर उठता हुआ साधक, उसके अपने मस्तिष्क के भीतर के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में चला जाता है I
  • उस ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में वह साधक अकार, उकार, मकार सहित, शुद्ध चेतन तत्त्व (अर्थात प्रणव या ब्रह्मतत्त्व) और ॐ के लिपिलिंग स्वरूप का साक्षात्कार करता है I
  • जब साधक की चेतना, शुद्ध चेतन तत्त्व (अर्थात ब्रह्मतत्त्व या प्रणव) से जाकर, ॐ के लिपिलिंगात्मक स्वरूप (अर्थात ॐ का लिपिलिंग रूप) के ऊपर के बिन्दु में लय हो जाती है, तब साधक इस श्श्श शब्द को पुनः सुनता है I और यह साक्षात्कार इस श्श्श शब्द का गंतव्य स्वरूप होता है I
  • ऐसे समय पर साधक की चेतना, जो ॐ के लिपिलिंगात्मक स्वरूप के ऊपर के बिन्दु में लय हुई होती है, वह स्वयं ही स्वयं को देख नहीं पाती I इसका अर्थ हुआ, कि वह चेतना ऐसे लय हो जाती है, जैसे वह ॐ के अक्षर शब्द के ऊपर का बिंदु ही हो I
  • और इस गंतव्य स्वरूप के साक्षात्कार के पश्चात, साधक की चेतना ब्रह्मरंध्र कमल (अर्थात सहस्रार चक्र) में चली जाती है I यह सहस्रार चक्र, सहस्र दल कमल (अर्थात हजार पत्तों का कमल) के स्वरूप में ही होता है I

और यही था वासुकी सिद्धि और आदिशेष सिद्धि का योगमार्ग I

इसलिए अब आगे बढ़ता हूँ और इन सिद्धियों के साक्षात्कार और स्वरूप को बताता हूँ I

 

आदिशेष सिद्धि क्या है, योगमार्ग का आदिशेष, आंतरिक आदिशेष क्या है, … आदिशेष और श्री विष्णु, श्री विष्णु और क्षीर सागर, क्षीर सागर सिद्धि, योग आदिशेष क्या है, आदिशेष योग, …

 

आदिशेष सिद्धि, आदिशेष, भगवान् आदिशेष
आदिशेष सिद्धि, आदिशेष, भगवान् आदिशेष, भगवान् आदिशेष की दशा

 

और ऐसी लय की दशा से आगे जो होता है, अब उसको बताता हूँ…

  • वह चेतना ब्रह्मरंध्र चक्र (अर्थात सहस्रार चक्र) में प्रवेश करती है I
  • वह सहस्रार चक्र, सहस्र दल कमल (अर्थात हजार पत्तों के कमल) रूप में ही होता है I
  • और जब उस सहस्र दल कमल में वह चेतना प्रवेश करती है, तब उस चेतना के साथ, वह नाभि कलश (अर्थात नाभि लिंग), जो नाभि क्षेत्र से ऊपर उठा था, वह भी प्रवेश कर जाता है I
  • नाभि लिंग के सहस्रार चक्र में प्रवेश करने के पश्चात, वह मस्तिष्क के ऊपर का सहस्र दल कमल (अर्थात हजार पत्तों वाला कमल) खिल उठता है I
  • ऐसी दशा में इस सहस्र दल कमल के वह हजार पत्ते, एक हजार फन के सर्प के मुखों के समान दाएं बाएं और ऊपर नीचेकी ओर हिलने लगते हैं I
  • और उस समय, वह एक हजार फन वाला सर्प रूपी सहस्र दल कमल, साधक के मस्तिष्क के ऊपर के भाग में मद्धम-मद्धम ही सही, लेकिन फुफकारने लगता है I यह हलकी फुफकार उस कमल के पत्तों में गति करती हुई ऊर्जा से होती है, जो साधक के मेरुदण्ड के नीचे के भाग से ऊपर उठती हुई, सहस्रार में पहुँचती जाती है I
  • यही अदि शेष सिद्धि है, जिसमें साधक के मस्तिष्क के ऊपर के सहस्र दल कमल के वह हजार पत्ते ही आदिशेष के हज़ार मुखों के समान हो जाते हैं I और इसी आदिशेष को सिद्ध योगीजनों के मस्तिष्क के ऊपर, कई मुखों वाले सर्प रूप में दिखाया जाता है I इसी को ऊपर के चित्र में भी दिखाया गया है I
  • और इसके अतिरिक्त, इसी आदिशेष पर श्री विष्णु विश्राम करते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

और ब्रह्मरंध्र चक्र और क्षीर सागर का नाता बताता हूँ…

  • ऐसे समय पर जब वह श्वेत वर्ण का अमृत कलश, सहस्र दल कमल में चला जाता है, तब वह उस कमल की ऊर्जाओं को भी श्वेत सा ही बना देता है I
  • यह श्वेत वर्ण, सगुण निर्गुण ब्रह्म के सम्तावाद का भी द्योतक होता है I
  • ऐसे समय पर इस ब्रह्मरंध्र की ऊर्जाएं एक विशालकाय स्वरूप धारण करती हैं और एक श्वेत सागर के समान ही हो जाती हैं I
  • इसी को वह क्षीर सागर कहा जाता है, जिसके भीतर श्री विष्णु, आदिशेष को ही अपनी शय्या बनाकर, उन विशालकाय समतावादी ऊर्जाओं के क्षीर सागर में बैठे हुए आदिशेष पर ही विश्राम करते रहते हैं I
  • और जहाँ वह श्री विष्णु, योगी की वह चेतना ही है, जो इस साक्षात्कार मार्ग में गई थी I

आगे बढ़ता हूँ…

 

वासुकी सिद्धि की प्राप्ति, आदिशेष सिद्धि की प्राप्ति, वासुकी सिद्धि और नमः शिवाय, आदिशेष सिद्धि और नमः शिवाय, … वासुकी और नमः शिवाय, नमः शिवाय और वासुकी सिद्धि, … वासुकी नाग कौन हैं, योग वासुकी कौन हैं, योगमार्ग के वासुकी, आंतरिक वासुकी, वासुकी सिद्धि क्या है, योगमार्ग का वासुकी नाग, नाग वासुकीयोगमार्ग का वासुकी नाग, वासुकी नाग सिद्धि क्या है, सर्पराज वासुकी, सर्पराज वासुकी क्या है, सर्पराज वासुकी सिद्धि क्या है, सर्पराज सिद्धि, सर्पराज सिद्धि क्या है, नागराज वासुकी, नागराज वासुकी क्या है, नागराज वासुकी सिद्धि, नागराज सिद्धि, नाग सम्राट सिद्धि, नाग सम्राट वासुकी, नाग सम्राट वासुकी सिद्धि, वासुकी की फुफकार, शिव के कण्ठ् का नाग कौन है, कण्ठ् का नाग, … अत्यन्तिकाप्रलय क्या है, अत्यन्तिकाप्रलय क्या है, अत्यन्तिका-प्रलय: क्या है, आत्यंतिक प्रलय क्या है, आत्यन्तिक प्रलय क्या है, आत्यन्तिक-प्रलय: क्या है, …

इस भाग को मुझे कई उपभागों में बताना होगा, नहीं तो यह सब के सब बिन्दु आपस में ही घुलमिल कर, खिचड़ी बन जाएंगे I इसलिए इस अध्याय में ऐसा ही प्रयास करूंगा I

वासुकि सिद्धि, योगमार्ग का वासुकी नाग, वासुकी नाग
वासुकि सिद्धि, योगमार्ग का वासुकी नाग, वासुकी नाग

 

अब इस चित्र का वर्णन करता हूँ, …

यह चित्र शरीर को पीछे से, अर्थात मेरुदण्ड की ओर से दिखा रहा है I

जबकि इस चित्र में जो नाग दिखाया गया है, वह केवल हृदय तक ही दिखाया गया है, लेकिन उसका वास्तविक स्थान कंधे से लेकर कण्ठ् क्षेत्र तक ही है I अंततः इसी कण्ठ् क्षेत्र में ही यह नाग निवास भी करता है I

इस चित्र में दिखाया गया नाग, वह वासुकी नाग ही है, जो नागों का सम्राट है, और जो नागराज भी कहलाते हैं I

इस सब बिंदुओं के कारण, इस चित्र की दशा में वह वासुकी नाग, अपने अंतिम स्थान पर नहीं पहुंचा है I

 

  • इस चित्र का पूर्वभाग, इस चित्र का मार्ग, वासुकी साक्षात्कार का मार्ग, वासुकी साक्षात्कार मार्ग, …

यह भाग अदिशेष सिद्धि के पश्चात ही साक्षात्कार होता है I

इस सिद्धि का मार्ग ऐसा होता है…

  • साधक की चेतना जो पूर्व से ही सहस्रार चक्र में निवास कर रही होती है, वह उस सहस्र दल कमल के एक स्थान पर चली जाती है, जहां से शिवरंध्र में प्रवेश करने का मार्ग खुलता है I यह स्थान एक पूर्व के अध्याय में बताया गया था, और इसको हरिहर लिंग भी कहा गया था I
  • और इसी मार्ग से वह चेतना शिवरंध्र में ही चली जाती है I
  • इस दशा के पश्चात, साधक की चेतना (अर्थात साधक) शक्ति शिव योग में जाकर, और वज्रदण्ड में प्रवेश करके, उसी वज्रदण्ड चक्र के भीतर ऊपर उठती हुई, राम नाद का साक्षात्कार करती है, और अंततः निरालम्ब चक्र (अर्थात निरालम्बस्थान) पर ही चली जाती है I और इस दशा में वह साधक निराधार चक्र का साक्षात्कार करता है I
  • निरालम्बस्थान (अर्थात निराधारस्थान) पर वह साधक योग अश्वमेध सिद्धि को भी पूर्ण करता है I
  • इस सिद्धि के पश्चात, वह साधक असंप्रज्ञात समाधि और निर्बीज समाधि से जाता है I
  • और इसके पश्चात, उस साधक की चेतना, निरालम्ब चक्र से (अर्थात अष्टम चक्र से) नीचे की ओर आने लगती है I
  • और उस चेतना के साथ, जो अमृत कलश (अर्थात नाभि लिंग) नाभि क्षेत्र से ऊपर उठा था, वह भी नीचे की ओर आने लगता है I
  • और अंततः वह अमृत लिंग, साधक के मूलाधार के समीप और साधक की काया के गुदा और लिंग क्षेत्रों के मध्य में ही स्थापित हो जाता है I
  • ऐसे समय पर साधक एक हिरण्यमय, बहुत से लिंगों को धारण करा हुआ लिंग, गुदा और लिंग के मध्य के क्षेत्र में साक्षात्कार करता है I और यह लिंग उस साधक का ही कुण्डलिनी लिंग होता है I और जहाँ यह कुण्डलिनी लिंग, “पाताले हाटकेश्वरम” नामक वाक्य का ही द्योतक होता है I
  • इसके पश्चात, साधक के मेरुदण्ड के नीचे के भाग से एक काला सर्प, ऊपर की ओर उठने लगता है I
  • और यह सर्प अंततः साधक के कण्ठ्मणि और कंधे के मध्य तक पहुँच जाता है I लेकिन ऊपर के चित्र में, इस सर्प की वह दशा दिखाई गई है, जब यह हृदय क्षेत्र में होता है I

यही इस वासुकी सिद्धि का योगमार्ग है I

और जब यह सर्पराज वासुकी (अर्थात नागराज वासुकी) मेरुदण्ड के नीचे के भाग से ऊपर उठता हुआ, कण्ठ् मणि और कंधे के मध्य में पहुँच जाएगा, तो यही दशा वासुकी सिद्धि कहलाती है I इसी दशा में नागराज वासुकी को शिव के कण्ठ् के नाग स्वरूप में बताया जाता है I

 

वासुकी नाग का वर्णन, नागराज वासुकी का स्वरूप, सर्पराज वासुकी का स्वरूप, …

मेरुदण्ड के भीतर अकस्मात् प्रकट हुए उस काले नाग का बड़ा सा मुख होता है I

उसकी एक लम्बी सी जिह्वा होती है, जिसके आगे के भाग में दो पृथक भाग होते हैं I उसके गाढ़े रक्त वर्ण के नेत्र होते हैं और वह मेरुदण्ड के भीतर, मेरुदण्ड के नीचे के भाग के समीप से ऊपर, हृदय की ओर उठता है I

और इस नाग के ऊपर उठते समय, वह अति भयंकर फुफकार करता ही रहता है I

उस फुफकार में इतनी ऊर्जा होती है कि वह पूरे मेरुदण्ड और मस्तिष्क सहित, इन भागों से जुडी हुई सभी नाडियों तक को झंझोर कर रख देती है I

उस नाग की ऊर्जा में विद्युत्, अग्नि और वायु का योग होता है और ऐसी ही दशा में वह ऊर्जा मेरुदण्ड के नीचे से लेकर, मस्तिष्क के ऊपर तक गति करती है I

कभी तो वह ऊर्जा ऐसी होती है, जैसे असंख्य चींटियाँ विद्युत्मय अग्नि और वायु से युक्त होकर, मेरुदण्ड और इसके आसपास के क्षेत्र में चल रही हैं I और ऐसी दशा में वह ऊर्जा विसर्गी भी होती है, जिसके कारण वह सहस्रार चक्र को भी पार भी करने लगती है I और इसके अतिरिक्त, कभी ऐसा भी लगता है, जैसे कई सारे नेवले इसी क्षेत्र में दौड़ रहे हैं I

शरीर के भीतर बसे हुए इस नाग की ऐसी भयंकर फुफकार  और प्रलयंकारी ऊर्जाओं के कारण, साधक कुछ समय के लिए इसी नाग के अधीन सा ही हो जाता है I

जब यह नाग शरीर के नीचे के भाग से, हृदय के नीचे तक उठ चुका होता है, तब इसकी फुफकार में इतनी ऊर्जा आ जाती कि वह पूरे मस्तिष्क को कपाल के भीतर ही ऐसे हिलाने लगता है, जैसे कोई गेंद उछल रही है I ऐसी दशा में साधक के कपाल के ऊपर के भाग की हड्डियों पर, मस्तिष्क की ओर से (अर्थात कपाल के भीतर से) भी बहुत दबाव पड़ता है I

ऐसी दशा आने पर यदि उस साधक के रंध्र खुले नहीं होंगे, तो इस फुफकार में इतनी ऊर्जा होती है, कि वह साधक अचेतावस्था को ही पा जाएगा और अपनी सुधबुध ही खो बैठेगा I और ऐसी दशा में साधक की मृत्यु भी हो सकती है I

यह नाग धीमी गति से मेरुदण्ड के नीचे के भाग से ऊपर की ओर उठता है, और अपने प्रत्येक पड़ाव पर यह नाग वही भयंकर, नसों नाड़ियों मांसपेशियों और हड्डियों तक को हिला देने वाली फुफकार से साधक को कुछ समय के लिए तो अवश्य ही अर्धमरा सा बना देगा I

ऐसी दशा में साधक न शैया से उठ पाएगा, न ही कुछ और कर पाएगा और निकम्मा सा ही हो जाएगा I इसी के कारण ही वह दशा आती है जिसको कुण्डलिनी सिंड्रोम भी कहा जाता है I

मेरी भी कुछ ऐसी ही दशा हो गई थी, जब मेरे मेरुदण्ड में यह वासुकी भयंकर हो गया था I ऐसा तब हुआ था जब मेरा नाभि लिंग (अर्थात अमृत कलश या अमृत लिंग) अष्टम चक्र को पार करने के पश्चात, पुनः नाभि क्षेत्र में लौटकर और भी नीचे चला गया था और अंततः वह नाभि लिंग (अर्थात अमृत कलश या अमृत लिंग) गुदा और लिंग के मध्य में ही पहुँच गया था I

ऐसा होने के पश्चात ही यह वासुकी, अकस्मात् ही प्रकट हुआ था I और इस साक्षात्कार के पश्चात तो मैं कुछ समय तक न तो मैं बिस्तर से उठ पाता था, न ही कुछ और कर पाता था, और मेरे शरीर का प्रत्येक अंग और नाड़ियाँ, वैसे ही कांपती थीं, जैसे किसी वृक्ष की डालियां किसी चक्रवात के प्रभाव में आकर झूलती हैं I

और इस वासुकी के मेरुदण्ड में प्रकटीकरण और उसकी विप्लवकारी ऊर्जाओं के प्रभाव के कारण, कुछ समय तक तो मेरी सुध-बुध भी मेरे साथ नहीं रह पाई थी I और क्यूंकि इस दशा की ऊर्जाएँ विसर्गी ही होती हैं, इसलिए मुझे अपनी काया में रहना भी बहुत कठिन सा ही हो गया था I

लेकिन क्यूंकि इस समय तक, मेरी गुरुदक्षिणा भी पूर्ण नहीं हुई थी, इसलिए काया को त्यागने का मेरा मन भी नहीं था I

और ऐसा होने के कारण, मैं बस इस अत्यन्तिकाप्रलय के सामान दशा से बाहर निकलने का ही मार्ग ढूंढ रहा था I और ऐसी दशा में मैं यह भी सोचता था, कि यदि वह मार्ग प्रेमपूर्वक ख्यापित हो जाए, तो अच्छा है I

और उस समय पर मैं यह भी सोचता था, कि यदि प्रेमपूर्वक वह मार्ग ख्यापित नहीं होगा, तो भी उसको ख्यापित तो करना ही पड़ेगा I इसके लिए, चाहे कुछ भी करना पड़े, वह तो करना ही पड़ेगा क्यूंकि मेरी पूर्व जन्म से चली आ रही गुरुदक्षिणा, जिसके कारण मेरा यह परकाया प्रवेश प्रक्रिया से ही सही, लेकिन जन्म तो हुआ ही था, अभी तक पूर्ण भी नहीं हुई थी I

मैं इस वासुकी नाग से युद्धादि करने के मत में भी नहीं था, क्यूंकि यह है तो मेरे गुरु शिव का ही एक गण… और गुरु के गण भी तो अपने ही होते हैं… और अपनों से युद्ध कैसे करोगे, जबतक वह दशा न आ जाए, जिसमें युद्ध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है I

जब ऐसा कई दिन तक चला, तो एक रात मेरी सुध बुध (अर्थात चेतना) कुछ ही प्रतिशत में सही, लेकिन लौट आई थी I

उस समय मैंने इस चित्र में दिखाए गए नाग को हृदय क्षेत्र में देखा और जाना, कि यह तो मेरुदण्ड के नीचे के भाग से, शनैः शनैः ही सही, लेकिन मेरुदण्ड से ऊपर की ओर (अर्थात हृदय और कण्ठ्) की ओर उठ रहा है I और यह एक अति प्रलयंकारी ऊर्जा को मेरे ही शरीर के भीतर, छोड़ता ही जा रहा है I

और उस समय मैंने यह भी देखा, कि यह जो शून्यात्मक ऊर्जा है, वह विसर्गी भी हो रही है, इसलिए वह ऊर्जा सहस्रार चक्र को पार भी करती जा रही है, जिसके कारण मेरी सुध-बुध भी पूर्णरूपेण मेरे साथ नहीं रह पाती है I

और उस समय मैंने यह भी पाया, कि यदि उस विसर्गी ऊर्जा को उस शून्य में, जो सहस्रार के परे (अर्थात ऊपर) होता है, उसमें प्रवेश करने से रोका नहीं जाएगा, तो निश्चित ही मेरी मृत्यु कुछ ही समय में ही हो जाएगी I

और मैं मृत्यु के लिए तैयार भी नहीं था, क्यूंकि पूर्व जन्म की मेरी वह गुरुदक्षिणा, जिसके कारण मेरा यह जन्म परकाया प्रवेश से ही सही, लेकिन हुआ है, वह अभी तक पूर्ण भी नहीं हुई थी I

और यदि मैं इस जन्म में वह पूर्ण नहीं कर पाया, तो एक और जन्म लेना पड़ेगा, जिसके लिए मैं तैयार भी नहीं था… और कलयुग की काली काया से पूर्णरूपेण ग्रसित इस मृत्यु लोक में एक बार और आने का अर्थ है, पुनः इसी नारकीय तंत्र में लौटना और इसके लिए तो मैं अभी भी, बिलकुल भी तैयार नहीं हूँ I

तो उसी रात से मेरी स्थूल काया के भीतर ही, मेरा इस वासुकी से युद्ध चल पड़ा क्यूंकि मैं यह जान चुका था, कि यदि इसको मैंने और ढील दे दी, तो यह मुझपर ही काबू कर लेगा I इसलिए अच्छा है, कि मैं ही इसको पराजित करके, इसपर अपना अधिपत्य स्थापित कर दूँ I

कई दिवस तक मेरा यह युद्ध, मेरे ही शरीर के भीतर चलता गया I और अंततः मैंने इस नाग पर अपना अधिपत्य बना ही लिया I जब ऐसा हुआ, तो मैंने इस नाग को पुनः मेरुदण्ड के सबसे नीचे के भाग में भेजकर,  उसके ऊपर अपनी ही एक विकराल ऊर्जा डाल दी, और उसको वहीँ मेरुदण्ड के सबसे नीचे के भाग में ठोक कर बैठा दिया I

और इसके पश्चात, उसको सभी ओर से, अपने भाव साम्राज्य का आलम्बन लेकर ही, मेरुदण्ड के नीचे के भाग में ही बाँध दिया, और मन में इसको कई वर्षों के लिए ऐसा ही रहने को कहा I यहाँ पर “कई वर्षों”, ऐसा कहा है, क्यूंकि मैं इसकी वास्तविक संख्या बताना नहीं चाहता हूँ I

और अपने उस भाव साम्राज्य में, जिसका नाता उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति की सार्वभौम और सर्वव्यापक इच्छा शक्ति से ही होता है, और जो इस समस्त ब्रह्म रचना की मुलात्मक दिव्यता ही है, यह भी बोल दिया, कि जबतक मैं स्वयं ही इस बंधन को नहीं खोलूंगा, तबतक इसको कोई भी खोल नहीं पाएगा I

लेकिन इसके पश्चात, जब मेरा शरीर पुनः ठीक होने लगा, तो ही मैं इस सर्पराज वासुकी पर मेरे द्वारा ही डाला गया, मेरे ही भाव साम्राज्य का वह बंधन, शनैः शनैः खोलने लगा I और तब ही यह नाग अपने वास्तविक स्थान पर आकर (अर्थात कण्ठ् क्षेत्र में आकर), शांत होकर बैठ गया I

और ऐसी दशा में भी, कभी-कभी यह उत्तेजित होता है, जिसके कारण इन नागराज की ऊर्जा पुनः भयंकर हो जाती है, लेकिन अब तो मेरे स्थूलादि देहों को इसकी ऊर्जा की आदत भी हो गई है I

इसलिए यदि यह कण्ठ् क्षेत्र के नागराज उत्तेजित भी हो जाएं, तो भी मुझे अब अधिक पीड़ा नहीं होती I बस ऐसी दशा में इनकी भयंकर ऊर्जाओं के कारण, मुझे खांसी लग जाती है और कण्ठ् की अन्न और स्वास आदि नालियों में उस भयंकर ऊर्जा के कारण, थोड़ी पीड़ा भी होती है I लेकिन क्यूंकि अब शरीर उस ऊर्जा के आदी भी हो गया है, इसलिए अब मुझे वह भयंकर पीड़ा नहीं होती, जो तब हुई थी जब यह वासुकी नाग मेरे शरीर के भीतर बस प्रकट हुआ ही था I

 

और एक बात…

शिव के पंचाक्षरी मंत्र, अर्थात नमः शिवाय के जाप से यह ऊर्जा शांत भी होती है, किन्तु इस नमः शिवाय के शिव पंचाक्षरी मंत्र में, अंतिम शब्द (अर्थात या का शब्द) पर जोर डालकर (अर्थात लम्बा करके) बोलना होता है I

ऐसा इसलिए है क्यूंकि शिव पंचाक्षरी मंत्र में, या का शब्द उस कण्ठ् कमल का ही होता है, जिसके क्षेत्र में यह नागराज वासुकी निवास कर रहे होते हैं I

आगे बढ़ता हूँ…

वासुकी की गति, योगमार्ग में वासुकी की गति, … आदिशेष की गति, योगमार्ग में आदि शेष की गति, … आदिशेष और वासुकी का योग, आदिशेष वासुकी योग, वासुकी और आदिशेष का योग, वासुकी आदिशेष योग, … वासुकी नागराज क्यूँ कहलाए हैं, वासुकी नाग सम्राट क्यूँ कहलाए हैं, वासुकी सर्पराज क्यूँ कहलाए हैं, … ब्रह्माण्ड प्रदक्षिणा, ब्रह्माण्ड परिक्रमा, योगमार्ग की ब्रह्माण्ड प्रदक्षिणा, योगमार्ग की ब्रह्माण्ड परिक्रमा, …

पूर्व में बताया आया था, कि योगमार्ग में…

  • आदि शेष, सहस्र दल कमल (अर्थात सहस्रार चक्र के हजार पत्तों) की दशा है I
  • वासुकी, कण्ठ् कमल की दशा है I

 

और पूर्व में यह भी बताया गया था कि…

  • आदिशेष का नाता मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक है I
  • और वासुकी का नाता, मूलाधार से से लेकर विशुद्ध चक्र तक है I

 

लेकिन पूर्व में तो यह भी बताया था, कि…

  • यह मूलाधार से कण्ठ् कमल तक की गति, तब आती है, जब वह चेतना मूलाधार से सहस्रार तक जाकर, पुनः मूलाधार में लौटती है, और इसके पश्चात वह पुनः मूलाधार से कण्ठ् कमल तक जाती है I
  • इसलिए जबकि वासुकी सिद्धि का स्थान कण्ठ् कमल में है, जो आदिशेष सिद्धि के सहस्रार चक्र से नीचे का ही चक्र है, लेकिन तब भी वासुकी सिद्धि की प्राप्ति, आदि शेष सिद्धि कहीं आगे जाकर ही होती है… क्यूंकि यह आदिशेष सिद्धि के बाद की ही दशा है I

 

और पूर्व में यह भी बताया गया था कि…

  • शिव षडाक्षरी मंत्र, मूलाधार से सहस्रार तक के योगमार्ग को दर्शाता है I
  • शिव पंचाक्षरी मंत्र, मूलाधार चक्र से (अर्थात मेरुदण्ड के नीचे के भाग से) कण्ठ् कमल तक के योगमार्ग को दर्शाता है I

 

लेकिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जब वासुकी सिद्धि से नाता होता है, तो उसकी जो दशा होती है, वह ऐसी ही होती है…

  • पहले शिव षडक्षर मंत्र से चेतना सहस्रार पर जाएगी I
  • इसके पश्चात वह चेतना, राम नाद से जाकर, खकार नाद में भी जाएगी I
  • उसके पश्चात वह चेतना, डकार नाड और गकार नाद से जाकर, पुनः मूलाधार में जाएगी I
  • और इसके पश्चात, जब वह चेतना पुनः शिव पंचाक्षर मंत्र में जाएगी, तब ही यह वासुकी सिद्धि की प्राप्ति होती है I
  • क्यूंकि वासुकी की दशा अंत में जाकर ही आती है, इसलिए यह अंतिम नाग सिद्धि भी है, अर्थात नाग सिद्धियों की गंतव्य सिद्धि ही है I
  • यही कारण था, कि योगीजनों और वेद मनीषियों ने आदिशेष को नहीं, बल्कि वासुकी को नागराज, नाद सम्राट, सर्पराज आदि उपदियों से पुकारा था I
  • और ऐसी तब ही था, जब योगमार्ग और चक्रों की स्थिति में वासुकी का स्थान आदिशेष से नीचे का ही है I

 

ऊपर बताए गए बिंदुओं के कारण, इसका यह भी अर्थ हुआ कि…

  • योगमार्ग के आदिशेष और वासुकी, दोनों का नाता शिव से ही है I
  • इस योगमार्ग का नाता, शिव पंचाक्षर मंत्र और शिव षडक्षर मंत्र, दोनों से ही है I
  • और सहस्रार चक्र की पूर्ण जागृत हुई दशा की श्वेत वर्ण की समतावादी ऊर्जाओं के सागर रूप को ही क्षीर सागर कहा जाता है I
  • और उसी क्षीर सागर में, आदिशेष के शय्या स्वरूप पर ही श्री विष्णु शयन करते हैं I
  • इसलिए, यदि इस पूरी योगमार्ग की प्रक्रिया को जानोगे, तो यही पाओगे कि इस योगमार्ग में…

शिव के मूल में विष्णु हैं और विष्णु के मूल में शिव ही हैं I

शिव के गंतव्य में विष्णु हैं और विष्णु के गंतव्य में शिव ही हैं I

शिवत्व पथ से विष्णुत्व सिद्ध होता है और विष्णुत्व पथ से शिवत्व I

शिवत्व का मार्ग विष्णुत्व से जाता है, और विष्णुत्व का मार्ग शिवत्व से I

शिव का पथ विष्णु की ओर, और विष्णु का पथ भी शिव की ओर ही जाता है I

शिव और विष्णु के ऐसे मूल, पथ और गंतव्य एकवाद के कारण, वह दोनों एक हैं I

 

  • और यह योगमार्ग अपने मूल, पथ और गंतव्य, तीनों से ही शिव का होने पर भी, उन शिव ने श्री विष्णु के नाग को अपने नाग से भी ऊपर का स्थान दिया है I
  • इससे यह भी स्पष्ट होता है, कि शिव का विष्णु से कोई विवाद भी नहीं है, बल्कि इसके विपरीत दोनों में परस्पर प्रेमभाव, सम्मान और एकवाद ही है I

 

और यही वह कारण है, कि…

  • इस मार्ग में शिवत्व और विष्णुत्व का एक घनिष्ट संबंध भी होता है, जिसके कारण यह मार्ग हरिहर सिद्धि का ही होता है I
  • और यही वह कारण था, कि इस अध्याय श्रृंखला को भगवान् हरिहर से ही प्रारम्भ किया गया था I
  • और क्यूंकि इस मार्ग में साधक की चेतना से साथ वह नाभि लिंग भी गति करता है, और निरालम्ब चक्र से आगे जाकर, वह अमृत कलश स्वरूप में प्रतिष्ठित भी होता है, और क्यूंकि वह नाभि लिंग ही आदि शक्ति हैं, जिनका नाता वामदेव ब्रह्म से होता है, इसलिए…

शिवत्व और विष्णुत्व को जो शक्ति जोड़ती हैं, वही आदिशक्ति हैं I

विष्णुनुजा के स्वरूप में वह आदि शक्ति ही पराशक्ति कहलाई गई हैं I

जब वह पराशक्ति महेश्वर की अर्धांगनी होती है, तो वही महेश्वरी कहलाती है I

 

  • यही कारण है, कि वह पराशक्ति जो माँ पार्वती हैं, और जो विष्णुनुजा ही हैं, जब शिव से विवाह कर लेती है, तो वही पराशक्ति, महेश्वरी कहलाती हैं I और इसी स्वरूप में वह पराशक्ति, विष्णुत्व और शिवत्व की योगदशा को साधक की काया के भीतर ही प्रतिष्ठित करती हैं, और जिसका मार्ग भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माणी योग ही है I
  • यह हिरण्यगर्भ ब्रह्माणी मार्ग जो इस पूरी अध्याय शृंखला का ही है, वह उन्ही आदि शक्ति के पराशक्ति स्वरूप (अर्थात माँ पार्वती स्वरूप या हिमपुत्री स्वरूप) का ही है, जो साधक के नाभि क्षेत्र में नाभि लिंग स्वरूप में स्वयं प्रकट होती हैं, और इसके पश्चात वह उस साधक को अपने ही देवत्व स्वरूप, अर्थात शाक्तत्व से संपन्न करके, उस साधक को विष्णुत्व और शिवत्व की योगदशा में लेकर जाती हैं I

 

पराशक्ति के महेश्वरी स्वरूप से प्रशस्त मार्ग में जब साधक गमन करता है, तो वह साधक जैसा होता है, उसको वह अब बताता हूँ…

भीतर से शाक्त, बाहर से शैव और धरा पर ब्राह्मण I

भीतर से शाक्तत्व, बाहर से शिवत्व और धरा पर विष्णुत्व I

और इसी मार्ग के अंत में साधक की जो दशा होगी, वह भी ऐसी ही होगी…

भीतर से आत्मना, बाहर से सर्वा और महाब्रह्माण्ड में ब्राह्मणा I

भीतर से महेश्वरी, बाहर से महेश्वर और इस महाब्रह्माण्ड में महाविष्णु I

भीतर से ब्रह्मशक्ति, बाहर से महाब्रह्मऔर समस्त महाब्रह्माण्ड में परब्रह्म I

आगे बढ़ता हूँ…

क्यूंकि ब्रह्माण्ड भी उसके अपने प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में साधक की काया के भीतर ही निवास करता है, इसलिए इस अध्याय में बताए गए मार्ग में साधक उसकी अपनी काया के भीतर के ब्रह्माण्ड की ही प्रदक्षिणा कर बैठता है I

ऐसी प्रदक्षिणा इसलिए होती है, क्यूंकि इस अध्याय के सिद्धि मार्ग में, साधक की चेतना उसकी काया में ही ऊपर, फिर नीचे और फिर ऊपर जाती हुई दशा में, उस साधक की काया के भीतर ही बसे हुए सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड की ही प्रदक्षिणा कर बैठती है, जिसका प्रादुर्भाव ब्रह्म की इच्छा शक्ति से हुआ था और जो इस संपूर्ण ब्रह्म रचना में ब्रह्माण्ड की वह प्राथमिक दशा था, जिससे ब्रह्माण्ड के अन्य सभी स्वरूपों का प्रादुर्भाव हुआ था, और जो योगीजनों और वेद मनीषियों द्वारा कारण जगत (अर्थात दैविक जगत), सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत के नामों से बताए जाते हैं I

इसलिए इस अध्याय का मार्ग भी इसी आंतरिक ब्रह्माण्ड प्रदक्षिणा का ही है I इस अध्याय का मार्ग वह योगमार्ग भी है, जिसमें साधक उसकी काया के भीतर बसे हुए ब्रह्माण्ड (आंतरिक ब्रह्माण्ड) की ही परिक्रमा कर लेता है I

तो अब यहीं पर यह अध्याय समाप्त होता है और मैं अगले अध्याय पर जाता हूँ, जिसका नाम अमृत कलश होगा I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

 

 

लिंक:

ब्रह्मकल्प, Brahma Kalpa, Kalpa ,

अत्यन्तिकाप्रलय, Atyantika Pralaya,

ब्रह्म, Brahm, Brahman,

 

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