उकार, ओकार, ओ३म् का दूसरा बीज, कार्य ब्रह्म, कार्यब्रह्म, सृष्टिकर्ता, सदाशिव का तत्पुरुष मुख, महेश्वर, योगेश्वर, योगीराज, योगसम्राट, योग गुरु, योगर्षि, सगुण ब्रह्म, रचनाकर्ता, धर्मकाया, अमिताभ बुद्ध, अहुरा मज़्दा, तैजस, वायु

उकार, ओकार, ओ३म् का दूसरा बीज, कार्य ब्रह्म, कार्यब्रह्म, सृष्टिकर्ता, सदाशिव का तत्पुरुष मुख, महेश्वर, योगेश्वर, योगीराज, योगसम्राट, योग गुरु, योगर्षि, सगुण ब्रह्म, रचनाकर्ता, धर्मकाया, अमिताभ बुद्ध, अहुरा मज़्दा, तैजस, वायु

इस अध्याय में उकार या ओकार पर बात होगी, जो ओ३म का दूसरा बीज है, और जो उन हिरण्यगर्भ ब्रह्म का कार्य ब्रह्म स्वरूप है, और जो इस जीव जगत के वास्तविक रचैता हैं, अर्थात इस जीव जगत के सृष्टिकर्ता, रचनाकर्ता भी हैं I पञ्च मुखी सदाशिव में यही उकार, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कहलाया है I यही महेश्वर, योगेश्वर, सगुण ब्रह्म और सगुणत्मक ब्रह्म हैं I बौद्ध मार्ग में, यही धर्मकाया और अमिताभ बुद्ध हैं I उकार की दिव्यता को ही सविता, सवितुर आदि शब्दों से दर्शाया गया है, और यही सूर्य, आदित्य नामक शब्दों से भी जुड़े हुए हैं I इन्ही उकार को योगीराज, योगसम्राट, योग गुरु, योगर्षि आदि भी कहा जाता है I

और इनसब के अतिरिक्त, मेरे पूर्वजों के क्षेत्र में उत्पन्न हुए पंथ जिसको पारसी या ज़ोरोएस्ट्रिनिज़म (Zoroastrianism) कहते हैं, उसमें यही अहुरा मज़्दा के नाम से भी पुकारे जाते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

माँ सावित्री सरस्वती के द्वारा,  इस बार जिस कुल में मैं परकाया प्रवेश से लौटाया गया हूँ, वो कुल अपने मूल से शाकद्वीप के सौर्य सारस्वत ब्राह्मणों का है I

वेदों के शाकद्वीप की सीमा आज के अफ़ग़ानिस्तान से लेकर, ईरान से होती हुई इज़रायल तक थी I

आज के भारत के पंजाब में, वेदों के वही शाकद्वीपीय सौर्य सारस्वत ब्राह्मण, मोहयाल ब्राह्मण कहे जाते हैं I

इस कलियुग के आगमन और इससे थोड़ा पूर्व से, हम शाकद्वीप सौर्य सारस्वत ब्राह्मणों में से बहुत सारे पंथ निकले थे, जिनमे से एक ज़ोरोएस्ट्रिनिज़म (Zoroastrianism) है I

और कुछ पूर्व कालों में, आज के अरब के क्षेत्र में यही मोहयाल ब्राह्मण, हुसैनी ब्राह्मण भी कहलाए थे I

कुछ और पूर्व कालों में, पुरातन फारस में यही ब्राह्मण, शहंशाही कहलाते थे I

और पुरातन इज़रायल में यही ब्राह्मण मोक्षे कहलाते थे, जिससे मसीह मूसा (Moses, मोसेस) का नाम मोशे कहा गया था I

संस्कृत भाषा का मोक्षे शब्द, जिससे मसीह मूसा (मोसेस, Moses) का नाम मोशे कहा गया था, उसका साधारण भाषा में अर्थ होता है “जीवन्मुक्त”,… अर्थात “वो जो जीवित होता हुआ भी मुक्त हो गया हो” I पर जीवन्मुक्त नामक शब्द के तो और भी बहुत गहरे अर्थ होते है, लेकिन उनको यहाँ नहीं बताया जाएगा, क्यूंकि उनका इस अध्याय से कुछ भी लेना देना नहीं है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

भगवान् बुद्ध के साथ भी यह ब्राह्मण तब आए थे, जब उनको मारने का षड़यंत्र रचा जा रहा था I वैसे मेरे इस जन्म से पहले के जन्म में, मैं भगवान बुद्ध का शिष्य था I

उस पूर्व जन्म में जब मैं बाल्यावस्था में ही था, तब मेरे ब्राह्मण माता पिता ने मुझे भगवान बुद्ध को सौंप दिया था I

और जिन भगवान बुद्ध की बात मैं यहाँ कर रहा हूँ, उनका जन्म 1914 ईसा पूर्व से 2.7 वर्षों के भीतर, एक ब्राह्मण कुल में हुआ था, इसलिए यहाँ पर उन महात्मा बुद्ध की बात नहीं हो रही है, जिनको आज के बौद्ध मनीषी मानते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

गुरुदेव आदि शंकराचार्य के साथ भी, एक काल खंड में जब वैदिक धर्म को पुनर्स्थापित किया जा रहा था, यह ब्राह्मण वर्ण था I वैसे एक बात बता हूँ, कि इस जन्म में मेरे बहुत सारे सूक्ष्म गुरूजनों में से, आदि शंकराचार्य भी एक गुरू हैं I और इस जन्म में, इन्ही गुरूदेव आदि शंकराचार्य के मार्गदर्शन से, मैं रकार मार्ग (रा नाद) और उस मार्ग से संबद्ध योग अश्वमेध पर भी गया था I

और उस बालक के जन्म से पूर्व जिसके शरीर में इस बार मुझे परकाया प्रवेश से लौटाया गया है, और जब मैं देवी माँ के आदेश पर, इस सूर्य की आकाश गंगा में कोई 108 से 109 वर्षों तक था, और जब मुझे इस शाकद्वीप सौर्य सारस्वत ब्राह्मणों के वर्ण में भेजा जा रहा था भी था, तब ब्रह्माण्ड की एक दिव्यता (देवी माँ) ने यह भी कहा था, कि इस कलियुग के पूरे इतिहास में, कोई ऐसा संत या महात्मा हुआ ही नहीं, जिनके साथ यह अस्त्रधारी ब्राह्मण वर्ण नहीं था I

इसा-मसीहा को भी जेरिसलेम से निकाल कर, यही ब्राह्मण वर्ण भारत के कश्मीर क्षेत्र में लाया था, और यहीं पर ईसा मसीह कई दशकों तक रहे थे और बाद में इसी कश्मीर के क्षेत्र में उन्होंने अपना देहत्याग भी किया था, जब वो इक्यासी वर्ष की आयु के समीप थे I

 

अब ईसा मसीह का एक किस्सा सुनाता हूँ …

वैसे तो किस्से बहुत हैं, लेकिन यहाँ बस एक की ही बात करूंगा I

अपने कार्य का कारण, मैंने कोई एक सौ सत्तर देशों से भी अधिक घूमे हैं I और आज का भारत खंड भी लगभग पूरा ही घूम लिया है I

देश और विदेश दोनों में, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले हैं, जो भगवान् या माँ प्रकृति की प्रेरणा से मेरे पास आए थे I

 

तो अब उन बहुत सारे किस्सों में से, एक को बताता हूँ …

यह कोई 2009 ईस्वी की बात है I

एक बार जब मैं एक पानी के जहाज का कप्तान था, तब मेरा जहाज क्विनाना (Kwinana) नामक बंदरगाह पर था, जो ऑस्ट्रेलिया में है I

मुझे घर जाना था और मुझे छोड़ने के लिए नए कप्तान साहब आ चुके थे I

वो जहाज ऑस्ट्रेलिया के तट के समीप ही कार्यरत था, इसलिए हम कई माह से ऑस्ट्रेलिया के तट पर, एक बंदरगाह से दूसरे तक ही चला करते थे I

जब मैं जहाज को छोड़ने के समय, जहाज से नीचे बन्दरगाह पर उतर रहा था, तो एक टैक्सी वाला जो मुझे औरपोर्ट तक लेके जाने को आया था, वो जहाज के नीचे खड़ा हुआ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था I

जहाज को दुसरे कप्तान साहब को सौंपकर, जब मैं घर लौटने के लिए, जहाज को छोड़ रहा था…, यह किस्सा तब का है I

जब मैं जहाज की सीडी (गैंगवे, Gangway) से नीचे उतर रहा था, तो एक टैक्सी वाला, जो मुझे जहाज से निकट के शहर के वायुयान क्षेत्र तक लेके जाने को आया था, वो मेरे सर के ऊपर के भाग को अपनी आँखे टेढ़ी कर के देख रहा था I मैं समझ गया, वो मेरे शरीर के भीतर झाँकने का प्रयत्न कर रहा है I

जब मैं टैक्सी में बैठ गया, और वो गाड़ी चल पड़ी, तो मैंने उसको बोला…, किसी के भीतर उसकी अनुमति और इच्छा के विरुद्ध देखना नहीं चाहिए, क्यूंकि ऐसे कर्मों से, करने वाले के सत्कर्मों का नाश होता है I उस वाहन चालक ने मेरी यह बात सुन तो ली, लेकिन इसपर उसने कोई भी प्रतिक्रिया या उत्तर नहीं दिया, जिससे मैं जान गया कि वो मेरे वक्तव्य को समझ गया है I

कुछ ही समय पश्चात, गाड़ी चलाते चलाते उसने मुझे बोला, कि कुछ दूरी पर उसकी धर्मपत्नी सड़क पर खड़ी हैं, और मेरी प्रतीक्षा कर रही है…, उसकी धर्मपत्नी मुझसे मिलना चाहती है I

उसने यह भी बोला की वो टैक्सी का चालक नहीं है…, बस इस बार वो आया है, क्यूंकि उन दोनों पति पत्नी को मुझसे मिलना था I वो इस स्थान का भी नहीं है…, उसका घर यहाँ से बहुत दूर है I

और वो वाहन चालक यह भी बोला, कि जब मेरा जहाज ऑस्ट्रेलिया के समीप घूम रहा था, तब से वो लोग उनकी अपनी ध्यानावस्था में मुझे देखते हैं I

वाहन में चलते चलते, वो बोला कि उसकी पत्नी जे-सी (JC) की माध्यम (Medium) है I

इसपर मैंने पुछा…, जे-सी (JC) कौन? I

वो बोला जीसस क्राइस्ट (Jesus Christ) I

लेकिन इस बात पर मेरे पास कुछ बोलने को था ही नहीं, इसलिए मैं चुप् ही रह गया I

फिर उसने पुछा, कि क्या आप दूसरों के दुःख दर्द भी दूर करते हो? I

मैंने उत्तर दिया…, “नहीं”…, क्यूंकि मुझे यह काम ठीक नहीं लगता I

मैंने उसको बोला, कि ऐसे कर्मों से दूसरों के कर्मों का आदान प्रदान होता है, और मैं कर्मातीत मुक्ति के मार्ग पर हूँ I जबतक मैं कर्म और कर्मफलों के आधीन था, या उनसे सम्बद्ध कर्माधीन मुक्ति के मार्ग पर था, तबतक ही करता था…, लेकिन अब नहीं I

फिर उसने पुछा, कि आपने कैटरीना नामक चक्रवात को डार्विन नामक स्थान की ओर क्यूँ घुमाया I

इस बात पर मैं चुप ही रहा, क्यूंकि वो कैटरीना नामक चक्रवात के सत्य को आधा ही जानता था…, पूरा नहीं I

कुछ समय के पश्चात, हम उस स्थान पर पहुँच गए, जहाँ उस वाहन चालक की धर्मपत्नी सड़क पर ही खड़ी हुई थी I उस चालक ने वाहन रोक कर कहा…, वो मेरी धर्मपत्नी है…, और वो ही आपसे मिलना चाहती है I वो बहुत समय से आपसे मिलने को इच्छुक है, और इसीलिए मैं आज आपका वाहन चालक बनकर आया हूँ, जबकि वास्तव में मैं इस वाहन की पूरी कंपनी का मालिक ही हूँ I आपसे मिलने को बस यही विकल्प मिला था हम दोनों पति पत्नी को I

उस टैक्सी चालक ने यह भी बोला, कि कई वर्षों के बाद मै किसी का वाहन चालक हुआ हूँ, और वो भी इसलिए, क्यूंकि मेरी धर्मपत्नी को आपसे मिलना ही था, चाहे कुछ भी हो जाए और मुझे कुछ भी करना पड़े I और इसलिए मैंने आपके एजेंट से सौदा भी बहुत कम पैसे में किया है I और आपसे मिलने को, मैं ऑस्ट्रेलिया देश के दुसरे छोर से, गाडी चला के यहाँ आया हूँ, ताकि मेरी धर्मपत्नी आपसे मिल सके I

उस टैक्सी चालक की यह बात सुनकर, मैं उसकी टैक्सी से बाहर निकल गया, और उन वृद्धावस्था में बसी हुई देवी, जो उस वाहन चालक की धर्मपत्नी थीं, उनको प्रणाम भी किया I

इसके बाद वो देवी जो कुछ दूरी पर खड़ी थी, मेरी पास आ गयी और मुझसे हाथ मिलाके, एकटक दृष्टि से मुझे, ऊपर से नीचे तक देखने लगी I और वो बस इतना ही बोली, कि मैं यहाँ पर कई घंटों से आपकी प्रतीक्षा कर रही हूँ I

मैं भी उनको देख रहा था, कि यह कौन हैं, जो इस धरा पर लौटी हैं, और मुझे मिलने के लिए, इस सुनसान सड़क पर ही कई घंटों से खड़ी हुई हैं I

उन देवी के शरीर से एक विचित्र प्रकार का प्रकाश बाहर निकल रहा था, जैसे किसी अंधकारमयी शून्यावस्था में पिङ्गल रंग घुल मिल गया हो I उनके शरीर से बाहर की ओर निकलते हुए परमाणु भी उसी अंधकारमय शून्य में बसे हुए, जिसने उनके शरीर को घेरा हुआ था, और वो परमाणु भी पिङ्गल वर्ण के बिंदु के समान थे I वो देवी न तो गोरी थीं और न ही काली…, बस बीच के रंग की थीं I

उन्होंने जो कपड़े पहने हुए थे, उनमें से ऊपर का भाग सोने के रंग का था, और नीचे का भाग में चांदी के रंग की लम्बी सी स्कर्ट थी I और उस दशा में, वो चमक रहीं थीं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

कुछ समय बाद, वो बस चार शब्द बोली, जिनको मैं बताना नहीं चाहता हूँ I

उन चार शब्दों में से वही अन्धकारमय अवस्था के भीतर पिङ्गल वर्ण की ऊर्जा निकली और मेरे स्थूल देह को आर पार ही कर गई I

ऐसी ऊर्जा से, मेरे स्थूल देह के भीतर बसा हुआ सूक्ष्म शरीर भी घूम गया I

लेकिन क्यूंकि मैंने पूर्व मे ही सोच रखा था, कि इन देवी के विरुद्ध कुछ प्रयोग नहीं करूंगा, इसलिए मैंने मेरे सूक्ष्म शरीर को घूमने भी दिया I

कुछ समय बाद जब वो ऊर्जा समाप्त हुई, और सूक्ष्म शरीर पुनः सीधा हो गया, तो मैंने उन देवी को अपनी असहमति बतला दी…, कि मैं आपकी is बात और कर्म से सहमत नहीं हूँ I

इसपर वो देवी थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई, और मुझे वहीं से ही एकटक होकर देखने लगी I

तब मैंने उनको बोला, कि रचैता ने कुछ भी अनुचित नहीं बनाया है…, उचित और अनुचित तो हमारे मतों के अनुसार होते हैं I

मैंने उनको बोला…, कि रचैता ने कुछ भी अनुचित नहीं बनाया, इसलिए रचना में जो भी है, सब उचित ही है I उचित और अनुचित तो केवल मतानुसार होता है I मेरे ऐसा कहने का कारण है, कि रचैता ही तो रचना और रचना का तंत्र हुआ है, इसलिए यदि रचना या उस रचना के तंत्र को बुरा बोलोगे, तो स्वयं को, अपने रचैता को और उनकी सार्वभौम रचनात्मक शक्ति को ही बुरा बोलोगे I और यही कारण है, कि मैं न तो आपके और न ही किसी और के मत को…, न तो मानता हूँ, और न ही नहीं मानता हूं I

इसपर उन देवी में अपना सर हाँ में हिलाया, लेकिन वो बोली कुछ भी नहीं I

और अंततः मैंने उनको बोला, कि किसी की अपनी ऊर्जा, उसपर ही प्रयोग नहीं की जा सकती…, और इसके बाद मैं पुनः गाडी में बैठ गया I

लेकिन मैंने तब देखा, कि मेरी स्वास प्रस्वास जो कई माह से भारी चलती थी…, अब हलकी हो गई है I

मेरी गाड़ी चली और वो देवी भी अपनी गाडी में हमसे थोड़ा आगे चलती रही I

चलते चलते कुछ समत पश्चात, वो वाहन चालक बोला, कि शायद वो पूर्व जन्म में भारत में था I

इसपर मैंने बोला, कि पूर्व जन्म का सिद्धांत तो ईसाई पंथ में है ही नहीं I

और इस उत्तर पर वो वाहन चालक खुलकर हंसा और बोला, हो सकता है, मैं पूर्व जन्म में हिमालय में था I

गाडी चलते चलते, हम बातें करते रहे, और इसके बाद गाडी उस औरपोर्ट पहुँच गई, जहाँ से मुझे हवाईजहाज पकड़ के, अपने घर लौटना था I

जब औरपोर्ट पहुंचा, तो वो देवी वहीँ खड़ी हुई मेरी प्रतीक्षा कर रही थी I

मैं उन देवी के पास पुनः गया, अंतिम नमस्कार करने को I

हमने हाथ मिलाया, और उस समय उन देवी को एक छोटी सी चक्रवाती ऊर्जा ने घेरा हुआ था I

जब उस वाहन चालक ने मुझे औरपोर्ट के भवन के मुख्य द्वार तक छोड़ा, तब उसने कहा, कि देखो, वो अभी भी आपको एकटक दृष्टि से देख रही है I

तब जब मैंने उसकी धर्मपत्नी, जो कुछ दूरी पर खड़ी थी, उनको देखा, तो जाना की वो वाहन चालक सही बोल रहा था I

मैं औरपोर्ट भवन में प्रवेश कर गया, और इसके पश्चात उन दोनों पति पत्नी को कभी नहीं मिला I

 

अब जो बोल रहा हूँ, उसपर ध्यान दो …

जब कोई कर्माधीन मुक्ति को पाया हुआ योगी, ऐसा संस्कार बना देता है, जो उस योगी के मृत्युलोक से आगे गमन करने के बाद भी (अर्थात उस योगी के देह त्याग के पश्चात भी) उस लोक की चित्त-काया में रह जाता है, तब वो संस्कार ही उस पूर्व कालों के योगी के नाम पर, वो योगी बन जाता है (जिसने उस संस्कार को पूर्व कालों में बनाया था) I

और क्यूँकि कर्माधीन मुक्ति के संस्कार फलित भी होने होते हैं, इसलिए जब उस संस्कार के फलित होने का समय आता है, तब वो संस्कार ही माध्यमता (मेडियंशीप, Mediumship) का कारण बन जाता है, और उस माध्यमता में वो संस्कार ही वो योगी कहलाता है (जिसने पूर्व कालों में उस संस्कार का निर्माण किया था) I

लेकिन ऐसा होने पर भी वो संस्कार…, वो योगी तो बिलकुल नहीं होता I

और ऐसे संस्कार की शक्ति का प्रयोग, उस योगी पर बिलकुल नहीं हो सकता, जो अपने पूर्व कालों में, उस संस्कार का वास्तविक जनक था I

ऐसे संस्कार का प्रयोग उस योगी पर भी बिलकुल नहीं हो सकता, जो परकाया प्रवेश से, काल की प्रेरणा से और महाकाली की शक्ति से, किसी मानव या किसी और जीव देह में लौटाया गया है I

ऐसे संस्कार की शक्ति का प्रयोग उस योगी पर भी बिलकुल नहीं हो सकता, जो प्रजापति या देवराज इंद्र का स्वरूप हो, या जो पञ्च ब्रह्म या माँ गायत्री के पाँच मुखों या पञ्च विद्या का साक्षात्कारी हो I

ऐसे संस्कार की शक्ति का प्रयोग उस योगी पर भी बिलकुल नहीं हो सकता, जो पञ्च मुखा सदाशिव, और उनके मुखों में बसी हुई दिव्यताओं (या देवीयों या शक्तियों) का साक्षात्कारी अथवा धारक हो I

ऐसे संस्कार की शक्ति का प्रयोग उस योगी पर भी बिलकुल नहीं हो सकता, जो  कर्मातीत मुक्ति को पा चुका है I

और अंत में…, जब वो योगी जिसकी पूर्व की कर्माधीन मुक्ति का संस्कार, मध्यमता का कारण बना था, स्वयं ही कर्मातीत हो जाएगा, तब उस योगी के समस्त संस्कारों का आलम्बन लेके, मध्यमता भी नहीं हो पाएगी I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

यहाँ दिखलाया गया चित्र, हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति का है, जो जीव और जगत के रचैता कहलाते हैं I

यहाँ बतलाए जा रहे उकार या ओकार का साक्षात्कार भी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही होता है, और वो भी तब, जब साधक की चेतना अकार को पार करके, अर्थात अकार से ऊपर की ओर उठ के, उकार में जाती है I

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला था।

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

यह भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और यह भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगीराज, योगर्षि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिण्डात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

यह अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का सत्तावनवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, यह भाग, ओ३म् सावित्री मार्ग की श्रृंखला का चौथा अध्याय है।

 

कार्यब्रह्म, हिरण्यगर्भ, महेश्वर, योगेश्वर, सगुण ब्रह्म, धर्मकाया, अमिताभ बुद्ध, तैजस, वायु
कार्यब्रह्म, हिरण्यगर्भ, महेश्वर, योगेश्वर, सगुण ब्रह्म, धर्मकाया, अमिताभ बुद्ध, तैजस, वायु

 

 

उकार या ओकार साक्षात्कार का स्थान और मार्ग, …

पूर्व में बतलाए गए अकार के समान, यह दशा भी साधक के सहस्र दल कमल या ब्रह्मरंध्र में होती है, जो साधक के मस्तिष्क के ऊपर के भाग में होता है I

पूर्व के अध्याय में बतलाए गए अकार के समान, यहां बताए जा रहे उकार का साक्षात्कार भी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है I

ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष पीले वर्ण का अतिप्रकाशमान केंद्र होता है, जो साधक के मस्तिष्क के मध्य भाग से थोड़ा सा ऊपर की ओर होता है I

वैसे तो इस ॐ सावित्री मार्ग श्रंखला में बतलाए जा रहे ॐ मार्ग के सभी बिंदुओं का साक्षात्कार भी इसी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है I

जब साधक की चेतना, जिसके लिए मैंने योगी शब्द का प्रयोग किया है, वह अकार का साक्षात्कार करके, अकार से भी आगे की ओर बढ़ती है (अर्थात अकार से ऊपर जो कपाल ही हड्डी होती है, उसकी ओर बढ़ती है) तो वह साक्षात्कार के उस अगले पड़ाव पर पहुँच जाती है, जिसको उकार या ओकार कहा गया है I

ओकार या उकार, ओ३म् सावित्री मार्ग में साक्षात्कार का दूसरा पद है I

 

उकार क्या है, ओकार क्या है, ओकार किसे कहते हैं, उकार किसे कहते हैं,  ओ३म् का दूसरा बीज क्या है, …

जब योगी की चेतना ओकार में पहुँच जाती है, तो उसे एक नाद सुनाई देता है।

यह नाद ओ शब्द का है, जो कि ोोोोो…, ऐसा होता है।

इस बीज शब्द के दृष्टिकोण से, यह ओकार कहलाया है।

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन इसको तो उकार भी कहते हैं, तो अब इस शब्द के बारे में बताता हूं…

जैसे ही योगी ओकार नाद में स्थित होता है, अर्थात उकार के लाल रंग के प्रकाश में प्रवेश करता है, तो उसकी चेतना बहुत प्रबल हो जाती है।

इसके बाद योगी की चेतना को एक बहुत बड़ा और ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगति का) उछाल आता है, और वो चेतना तीव्र गति से ऊपर की ओर जाने लगती है।

क्योंकि उस चेतना की गति, ऊपर की ओर तीव्रता से हो जाती है, और क्योंकि उस योगी को अपनी गति पर नियंत्रण ही नहीं रहता, इसलिए योगीजनों ने इस दशा को उकार कहा था ।

उकार शबद का अर्थ होता है, “वो जो साधक की चेतना को ऊपर की ओर ले जाए, या वो जो उर्धवगति में तीव्रता से ले जाए, या वो जो उत्कर्ष मार्ग पर तीव्रता से ले जाए” ।

 

ओकार का वर्णन, उकार का हिरण्यगर्भ और कार्य ब्रह्म स्वरूप, …

ओकार कैसा होता है?…, अब इसको बताता हूं ।

 वैसे तो उकार या ओकार निराकारी है I

लेकिन ब्रह्मरंध्र के विज्ञानमय कोष में यह साकारी होता है।

लेकिन साकार मस्तिष्क के ब्रह्मरंध्र में, निराकार को कैसे-कैसे ठूंसा जा सकता है?। यह तो वहीं बात हो गई न, कि चींटी के भीतर हाथी घुसा दिया…, फट नहीं जाएगी वो चींटी।

इसीलिए यहाँ कहा गया है, कि, जबकि ओकार वास्तव में निराकारी होता है…, लेकिन ब्रह्मरंध्र के विज्ञानमय कोश में, यह साकार रूप में ही होता है।

साकार और निराकार का नाता भी वैसा ही होता है, जैसे इन्द्रियां निराकारी होती हुई भी, पञ्च कोष में साकारी ही होती हैं I पञ्च कोष की इंद्रियां, प्रकाश रूप में होती हैं I और जहाँ पञ्च कर्मेंद्रियां लाल रंग के प्रकाश में दिखाई देती हैं और पञ्च ज्ञानेंद्रियां, हलके नील वर्ण के प्रकाश में साक्षात्कार होती है I और जहाँ कर्मेन्द्रियों के लाल रंग के प्रकाश बिंदु और ज्ञानेन्द्रियों के नीले रंग के प्रकाश बिंदु, एक दुसरे से एकान्तरिक होते हैं I

वैसे तो साकारी के भीतर, निराकारी ही साकारी हो जाता है, जैसे भूख और प्यास निराकारी होती हुई भी, साकारी भोजन और पानी के संपर्क में आकर, साकारी ही हो जाती है I इसी साकारी अवस्था में, वो निराकारी भूख और प्यास, साकारी भोजन और पानी से ही तृप्त होती है I

वैसे ही, इच्छाएं निराकारी होती हुई भी, साकारी मस्तिष्क से उत्पन्न होती हैं, और इच्छाओं की गति भी साकारी शरीर के कर्मों से ही होती है I

तो यह था साकारी और निराकारी का नाता, जहाँ साकारी की प्राथमिक उत्पत्ति निराकारी से होती है, और ऐसी उत्पत्ति के पश्चात, साकारी ही निराकारी की गति, तृप्ति और मुक्ति का कारण बनता है, जिससे उस साकारी की भी मुक्ति हो जाती है, और जहाँ वो मुक्ति भी निराकार में ही होती है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इस ओकार के बाहर की ओर एक लाल रंग का प्रकाश होता है, जो कि उबाल मार रहा होता है, और बाहर की ओर फट-फट के निकल रहा होता है I

और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे उसमें एक के बाद एक विस्फ़ोट होते ही जा रहे हैं, जिसके कारण इसके भीतर से लाल रंग की ऊर्जाएं बाहर को निकल रही हैं। इसी गाढ़े लाल रंग ने इस चित्र की पूरी दशा को घेरा भी होता है।

यह लाल रंग रजोगुण को दर्शता है। यह लाल रंग का रजोगुण, प्रकृति का वो गुण होता है, जिसके कारण समस्त जीव और जगत चलायमान या गतिशील होता है।

पुराणों में ब्रह्माजी को लाल रंग का और रजोगुणी ही बताया गया है I इस चित्र में दिखलाया गया उकार ही वह ब्रह्माजी हैं, जो लाल रंग के होते हैं, और जो कार्य ब्रह्म भी कहलाते हैं I

पुराणों के ब्रह्माजी को जो लाल वर्ण का कहा गया है, वो वास्तव में कार्य ब्रह्म हैं…, न कि हिरण्यगर्भ ब्रह्म I

कार्य ब्रह्म ही ब्रह्मा जी का वो स्वरूप है, जो जीव जगत का रचैता होता है I इसलिए इस अध्याय में दिखलाया गया चित्र, कार्य ब्रह्म का ही है…, न की हिरण्यगर्भ ब्रह्म का I

हिरण्यगर्भ ब्रह्म से ही कार्य ब्रह्म की अभिव्यक्ति हुई थी, और वो भी तब, जब हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी होकर, रचैता कहलाए थे I कार्य ब्रह्म ही सृष्टिकर्ता कहलाए हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में, तैंतीसवें देवता जो प्रजापति कहलाते हैं, उनकी प्राथमिक दैविक अभिव्यक्ति को हिरण्यगर्भ ब्रह्म कहा गया था I हिरण्यगर्भ ब्रह्म के रजोगुणी स्वरूप को ही कार्य ब्रह्म, रचैता, सृष्टिकर्ता आदि कहा गया है I

हिरण्यगर्भ ब्रह्म की अभिव्यक्ति उसी शून्य ब्रह्म के भीतर हुई थी, जो श्रीमन नारायण कहलाते हैं I

शून्य ब्रह्म में, शून्य ही अनंत होता है…, और अनंत ही शून्य I

यही शून्य ब्रह्म, निर्गुण निराकार ब्रह्म की वास्तविक अभिव्यक्ति है, जो इस जीव जगत के प्रादुर्भाव से भी पूर्व की दशा है, और इसीलिए शून्य ब्रह्म, अनादि अनंत और सनतान भी कहलाता है I सनातन शब्द श्रीमन नारायण का ही वाचक है I

शून्य ब्रह्म में, शून्य का शब्द प्रकृति का द्योतक है, जो उसी निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्राथमिक अभिव्यक्ति है I और शून्य ब्रह्म में जो ब्रह्म शब्द कहा गया है, वही निर्गुण निराकार है I

इसलिए शून्य ब्रह्म, प्रकृति और भगवान् की सनातन योगावस्था को भी दर्शाता है I और यही शून्य ब्रह्म श्रीमन नारायण कहलाया था I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन जीव जगत के प्रादुर्भाव के लिए जब हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी होते हैं, तो वो कार्य ब्रह्म कहलाते हैं I

क्यूंकि रजोगुण का वर्ण लाल होता है, इसलिए पुराणों में उन्ही कार्य ब्रह्म को लाल रंग के ब्रह्मा कहा गया है I

उन कार्य ब्रह्म को सृष्टिकर्ता भी कहा जाता है क्यूंकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म, रजोगुणी होकर ही रचैता बनते हैं…, अन्यथा नहीं I

इन्ही रजोगुणी ब्रह्मा, अर्थात सृष्टिकर्ता भगवान् को जीव जगत का रचैता कहा जाता है…, और किसी को भी नहीं I

जबतब हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी नहीं होते, तबतक वो कार्य ब्रह्म या सृष्टिकर्ता भी नहीं हो पाते I

इस अध्याय के चित्र में उन्ही कार्य ब्रह्म या सृष्टिकर्ता भगवान् को, जो उकार हैं … उनको ही दर्शाया गया है I

इस कार्य ब्रह्म के चित्र में, सुनहरा रंग हिरण्यगर्भ ब्रह्म का है, और उस सुनहरे रंग को घेरे हुए जो लाल रंग है, वो प्रकृति का रजोगुण ही है I

इसलिए अपने कार्य ब्रह्म स्वरूप में, हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म, पुरुष और प्रकृति के ब्रह्माण्डीय योग को भी दर्शाते हैं I

और क्यूँकि कार्य ब्रह्म के मूल में, हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म ही होते हैं, इसलिए योगीजनों ने इन उकार या कार्य ब्रह्म को ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म भी कहा था I

ऐसा कहने का कारण यह था, कि मूल का कोई और मूल नहीं होता I

ऐसा होने के कारण ही जब मूल के बिन्दुओं का आलम्बन लेके उत्कर्ष मार्ग को बतलाया (या उत्कर्ष मार्ग पर जाया) जाता है, तब वो मूल ही अमूल गंतव्य का मार्ग हो जाता है, अर्थात मुक्तिमार्ग हो जाता है I

 

ओकार का वर्णन, उकार का हिरण्यगर्भ ब्रह्म स्वरूप, उकार का कार्य ब्रह्म स्वरूप, उकार और हिरण्यगर्भ ब्रह्म, उकार और कार्य ब्रह्म, …

इस लाल रंग के भीतर, एक अण्डाकार स्वर्ण रंग के गर्भ समान अवस्था होती है।

यह लाल रंग के अंदर के सोने के रंग की स्थिति को ही शास्त्रों ने हिरण्यगर्भ कहा है। हिरण्य का अर्थ होता है, सोने के रंग के समान, स्वर्ण समान, इत्यादि।

इसीलिए हिरण्यगर्भ का अर्थ है, सोने के रंग का गर्भ, स्वर्ण के समान गर्भ, स्वर्णिम गर्भ, इत्यादि ।

इसी सोने के गर्भ, अर्थत, हिरण्यगर्भ के भीतर, ब्रह्माण्ड की स्वयं उत्पत्ती हुई थी। इसीलिए, यह हिरण्यगर्भ ही ब्रह्माण्ड का गर्भ है।

पितामह ब्रह्म के गर्भ में समस्त ब्रह्माण्ड बस हुआ है। इस चित्र में दिखलाया गया उकार, उसी गर्भ की पिण्डावस्था है…, अर्थात पिण्ड रूपी रजोगुणी सृष्टिकर्ता की अवस्था है, और जिसको कार्य ब्रह्म कहा गया था ।

 

उकार का त्रिशक्ति स्वरूप, उकार का शिव की त्रिशक्ति से नाता, उकार का त्रिशक्ति से नाता, …

शिव के तीन शक्तियां होती हैं, जो ज्ञान शक्ति, चेतन शक्ति और क्रिया शक्ति कहलाती हैं …

इस अध्याय में दिखाए गए उकार के चित्र में…,

  • शिव की चेतन शक्ति और ज्ञान शक्ति, चेतन शक्ति और ज्ञान शक्ति, चेतना शक्ति, चेतन शक्ति, ज्ञान शक्ति, इस चित्र में जो सुनहरा रंग है, वो चमकदार पीले रंग की वृतिहीन बुद्धि और श्वेत रंग के संस्कार रहित चित्त के योग का वाचक है I पीला रंग शिव की ज्ञान शक्ति, और श्वेत रंग शिव की चेतन शक्ति से नाता रखता है I

जब चित्त श्वेत वर्ण का (सत्त्वगुणी) होकर, संस्कार रहित हो जाता है, और इसके पश्चात वो चित्त विशुद्ध सत्त्व को धारण करता है, तो वो हीरे के समान प्रकाश जैसा होता है I

ऐसी दशा में, वो हीरे के समान प्रकाशित विशुद्ध सत्त्व को धारण किया हुआ संस्कार रहित चित्त, पीले रंग की बुद्धि से सूक्ष्म हो जाता है I

सूक्ष्म होने के कारण, वो चित्त उस बुद्धि के भीतर बस जाता है, अर्थात ऐसी दशा में पीले रंग की बुद्धि, उस चित्त को घेरे हुए होती है I

और ऐसा होने पर चित्त को घेरे हुए, अर्थात चित्त के बाहर की ओर की जो पीले वर्ण की बुद्धि होती है, उसका रंग सुनहरा हो जाता है I यही स्वर्णिम दशा इस उकार के चित्र में भी दिखाई गई है I

इस चित्र में भी वो चमकदार श्वेत वर्ण, सुनहरे रंग के भीतर है I पीले वर्ण की बुद्धि के भीतर श्वेत वर्ण का चित्त होने के कारण ही वो पीला रंग, सुनहरा हो गया है I इसी सुनहरे वर्ण के उकार को हिरण्यगर्भ कहा जाता है I और इस सुनहरे वर्ण का नाता, सद्योजात ब्रह्म से भी होता है I

और ऐसी दशा में, वो हिरण्यगर्भ, शिव की चेतन शक्ति और ज्ञान शक्ति की योगावस्था का भी द्योतक होता है क्यूंकि उसमें इन दोनों शक्तियों का योग होता है I

  • शिव की क्रिया शक्ति, क्रिया शक्ति, … इस चित्र में जो लाल रंग दिखाया गया है, वो रजोगुण को दर्शाता है I यह रंग, शिव की क्रिया शक्ति का भी वाचक है I

इन्ही बताए गए कारणों से, उकार शिव की त्रिशक्ति, अर्थात ज्ञान शक्ति, चेतन शक्ति और क्रिया शक्ति को धारण किया हुआ है I

और जब योगी की चेतना उकार को जाती है, तब इन सभी बताए गए तथ्यों के प्रमाण भी मिलते हैं I

 

उकार की दो प्रधान दशाएँ, … हिरण्यगर्भ ब्रह्म कौन हैं, सगुणत्मक ब्रह्म कौन हैं, सगुण ब्रह्म कौन हैं, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कौन हैं, … हिरण्यगर्भ ब्रह्म क्या है, सगुणत्मक ब्रह्म क्या है, सगुण ब्रह्म क्या है, सदाशिव का तत्पुरुष मुख क्या है, … हिरण्यगर्भ ब्रह्म किसे कहते हैं, सगुणत्मक ब्रह्म किसे कहते हैं, सगुण ब्रह्म किसे कहते हैं, सदाशिव का तत्पुरुष मुख किसे कहते हैं, महेश्वर किसे कहते हैं, महेश्वर क्या है, महेश्वर कौन हैं, … सृष्टिकर्ता क्या है, सदाशिव का तत्पुरुष मुख क्या है, महेश्वर क्या है, योगेश्वर क्या है, धर्मकाया क्या है, अमिताभ बुद्ध क्या है, अहुरा मज़्दा क्या है, … सृष्टिकर्ता कौन हैं, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कौन हैं, महेश्वर कौन हैं, योगेश्वर कौन हैं, धर्मकाया कौन हैं, अमिताभ बुद्ध कौन हैं, अहुरा मज़्दा कौन हैं, … सृष्टिकर्ता किसे कहते हैं, सदाशिव का तत्पुरुष मुख किसे कहते हैं, महेश्वर किसे कहते हैं, योगेश्वर किसे कहते हैं, धर्मकाया किसे कहते हैं, अमिताभ बुद्ध किसे कहते हैं, अहुरा मज़्दा किसे कहते हैं,कार्य ब्रह्म कौन हैं, कार्य ब्रह्म कौन हैं, कार्य ब्रह्म किसे कहते हैं, कार्य ब्रह्म किसे कहते हैं, कार्य ब्रह्म क्या है, कार्य ब्रह्म क्या है, रचनाकर्ता किसे कहते हैं, रचनाकर्ता कौन हैं, रचनाकर्ता क्या है, योगीराज कौन हैं, योगसम्राट कौन हैं, योग गुरु कौन हैं, योगर्षि कौन हैं, योगीराज किसे कहते हैं, योगसम्राट किसे कहते हैं, योग गुरु किसे कहते हैं, योगर्षि किसे कहते हैं, योगीराज कौन, योगसम्राट कौन, योग गुरु कौन, योगर्षि कौन, …

उकार की दो नहीं बल्कि तीन प्रधान दशाएँ होती है, लेकिन इस भाग में मैं केवल दो की ही बात करूँगा I

 

तो अब इन दशाओं को बतलाता हूँ…

  • हिरण्यगर्भ ब्रह्म कौन, सगुणत्मक ब्रह्म कौन, सगुण ब्रह्म कौन, हिरण्यगर्भ ब्रह्म क्या, सगुणत्मक ब्रह्म क्या, सगुण ब्रह्म क्या, योगीराज कौन, योगसम्राट कौन, योग गुरु कौन, योगर्षि कौन, रचनाकर्ता कौन, सृष्टिकर्ता कौन, रचनाकर्ता किसे कहते हैं, सृष्टिकर्ता किसे कहते हैं, रचनाकर्ता कौन होते हैं, सृष्टिकर्ता कौन होते हैं,

एक दशा वह होती है, जिसमें यह अण्डा रूपी उकार, सुनहरे रंग का होता है, और इसके बाहर की ओर, कोई भी लाल रंग का प्रकाश नहीं होता I

यह दशा ही पितामह ब्रह्म की वो दशा है, जिसको शास्त्रों में हिरण्यगर्भ कहा गया है और इस दशा का नाता सद्योजात ब्रह्म से भी है I यहाँ बताई गई दिशा भी निराकार सद्योजात ब्रह्म की साकार अवस्था है I

यह हिरण्यगर्भ, आत्मा की सबसे ऊंची साकारी अवस्था है, जिसके बारे में किसी और अध्याय में बतलाऊँगा I

इन्ही कार्य ब्रह्म को रचनाकर्ता, सृष्टिकर्ता, योगीराज, योगसम्राट, योग गुरु, योगर्षि आदि नामों से भी पुकारा जाता सकता है I

  • कार्य ब्रह्म कौन, कार्य ब्रह्म क्या, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कौन, महेश्वर कौन, सृष्टिकर्ता कौन, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कौन, महेश्वर कौन, योगेश्वर कौन, धर्मकाया कौन, अमिताभ बुद्ध कौन, अहुरा मज़्दा कौन, सदाशिव का तत्पुरुष मुख क्या, महेश्वर क्या, सृष्टिकर्ता क्या, सदाशिव का तत्पुरुष मुख क्या, महेश्वर क्या, योगेश्वर क्या, धर्मकाया क्या, अमिताभ बुद्ध क्या, अहुरा मज़्दा क्या, रचनाकर्ता कौन, रचनाकर्ता क्या, ब्रह्म का सगुणत्मक स्वरूप, ब्रह्म का सगुण स्वरूप, …

और दूसरी दशा में, इसी सुनहरे हिरण्यगर्भ के बाहर को ओर, रक्त के समान, लाल रंग का प्रकाश फूट-फूट कर निकल रहा होता है I

जैसे पहले बतलाया था, यह लाल रंग का प्रकाश रजोगुण का है, अर्थात, इस अवस्था में हिरण्यगर्भ, रजोगुणी होते हैं I

उस रजोगुणी हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म को ही शास्त्रों में कार्य ब्रह्म कहा गया है I

और पुराणों में पितामह ब्रह्म की इसी अवस्था को लाल रंग के ब्रह्मा जी…, ऐसा भी बतलाया गया है I

कार्य ब्रह्म ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म का वो स्वरूप है, जो इस ब्रह्माण्ड का रचैता है I

इसी स्वरूप में ब्रह्मा जी को जीव और जगत का रचनाकर्ता कहा गया है I और यही स्थिति इस अध्याय के चित्र में भी दिखाई गई है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी को वो राजयोगी साधक, जो पाशुपत मार्ग के अनुयायी हैं, उन्होंने सदाशिव का तत्पुरुष मुख कहा है I तत्पुरुष नामक शब्द का अर्थ होता है, सगुण ब्रह्म I तत्पुरुष शब्द, ब्रह्म के सगुणत्मक स्वरूप का ही वाचक है I

उसी तत्पुरुष को वेद मनीषीयों ने महेश्वर कहा है I जब वेदों में महा शब्द का प्रयोग होता है, तो उसे परम ही मानना चाहिए, क्यूंकि दो महा कभी नहीं हो सकते I इसीलिए जो महा है…, वही परम होता है I

इसी को योगेश्वर भी कहा जाता है, क्यूंकि यही हिरण्यगर्भ, प्रकृति के रजोगुणी स्वरूप से योग लगाके, सृष्टिकर्ता या कार्य ब्रह्म कहलाता है, और ब्रह्माण्ड के दृष्टिकोण से ऐसा योग प्राथमिक होने के कारण, यही उस प्राथमिक योग, जिसको प्रकृति पुरुष योग कहा जाता है…, उसका अंग भी है I

क्यूंकि संपूर्ण ब्रह्माण्ड ही इन हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म नामक अभिव्यक्ति के गर्भ में ही बसा हुआ है, इसलिए यही महेश्वर है I

इसीलिए योगीजनों ने हिरण्यगर्भ ब्रह्म की रजोगुणी अभिव्यक्ति, अर्थात कार्य ब्रह्म को महेश्वर शब्द से भी संबोधित किया था I

धाम चतुष्टय में इन कार्य ब्रह्म या महेश्वर या सृष्टिकर्ता का धाम, जगन्नाथ पुरी कहलाता है I पीठ चतुष्टय में, इनकी पीठ गोवर्धन मठ पुरी है, और वेदों में इनका ऋग्वेद है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

तो अब मैं इस भाग को संगठित करके बतलाता हूँ …

  • उकार की दो दशाएं होती हैं, एक हिरण्यगर्भ और दूसरी कार्य ब्रह्म I
  • पहली वाली उकार की प्रधान या मूल दशा है, जो ब्रह्मा जी की ज्ञानमय और चेतनमय अवस्था है I
  • और दूसरा स्वरूप, जो ब्रह्मा जी की क्रियामय अवस्था है, जो कार्य ब्रह्म है, और जो ब्रह्मा जी के उत्पत्ति कृत्य का धारक है I

इसीलिए कार्य ब्रह्म ही ब्रह्मा जी हैं I

जब हिरण्यगर्भ, रचैता का कार्य करते हैं, तो वो हिरण्यगर्भ लाल वर्ण का रजोगुणी स्वरूप धारण करके, कार्य ब्रह्म कहलाते हैं I

इसीलिए कुछ वेद और योग मनीषी कह गए, कि हिरण्यगर्भ लाल वर्ण के होते हैं I लेकिन यह लाल वर्ण का हिरण्यगर्भ, वास्तव में कार्य ब्रह्म ही है…, अर्थात इस जीव जगत का वास्तविक रचैता ही है I

 

उकार कार्य ब्रह्म का लिंगात्मक स्वरूप है … कार्य ब्रह्मलिंग, ब्रह्म का लिंगात्मक स्वरूप, …

लिंग शब्द का अर्थ होता है, चिन्ह, सूचक, जो किसी और का संकेत दे, द्योतक, इत्यादि I वह लिंग स्थूल, सूक्ष्म, दैविक आदि भी हो सकता है, और शब्दात्मक लिपिलिंगात्मक भी हो सकता है, और अन्य किसी स्वरूप में भी हो सकता है I

ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में, साधक की काया के भीतर बसे हुए उकार का साक्षात्कार होता है I इस दशा में उकार लाल रंग के कार्य ब्रह्म के लिंगात्मक स्वरूप में ही दिखाई देता है I

इसलिए, साधक के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में, उकार लिंगात्मक स्वरूप में ही होता है, और उसका ऐसा स्वरूप, कार्य ब्रह्मलिंग रूप ही होता है I

 

उकार का अकार से नाता, … उकार का माँ सावित्री से नाता, … कार्य ब्रह्म और माँ सावित्री, …

पूर्व के अध्याय में बतलाई गई अकार की देवी, अर्थात माँ सावित्री सरस्वती ही उकार की सगुण साकार रूप में दिव्यता, शक्ति और अर्धांगिनी हैं I

इसका अर्थ हुआ, कि कार्य ब्रह्म की दिव्यता, शक्ति और अर्धांगिनी को ही सावित्री विद्या और सावित्री सरस्वती कहा गया है I

 

उकार के नामों का वर्णन, …

अपनी वास्तविकता में, शिव ही ब्रह्म हैं I ब्रह्म या शिव के पाँच मुख होते हैं I

इनमें से चार मुख, चारो दिशाओं को देखते हैं, और एक बीच वाला मुख, ऊपर (अर्थात आकाश या गंतव्य या मुक्ति) की ओर देखता है I

इन मुखों में, पूर्व दिशा की ओर देखने वाले मुख को पञ्च ब्रह्मोपनिषद ने सद्योजात कहा है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

विभिन्न मार्गो में, ओकार या उकार को पृथक प्रकारों से बतलाया गया है, तो अब इसी बिंदु पर ओकार का वर्णन करता हूँ …

  • उकार ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म नामक अभिव्यक्ति है I इसलिए उकार के दृष्टिकोण से हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही वह कार्य ब्रह्म हैं, जो उकार कहलाए हैं I
  • उकार को ही वेदों में ब्रह्मा कहा गया है I
  • उकार को ही सूर्य पुराण में सूर्य, आदित्यादि नामों से पुकारा गया है I सूर्य के 108 नामों के मूल में, यही उकार है I
  • उकार को ही पुराणों में, खखोल्काय नामक शब्द से पुकारा गया है I यह खखोल्काय शब्द, इसी उकार के गंतव्य, अर्थात, हिरण्यगर्भात्मक स्वरूप को दर्शाता है I खखोल्काय नामक शब्द का ब्रह्मास्त्र की लघु अवस्था, अर्थात लघु ब्रह्मास्त्र को काटने की विद्या से नाता भी है I
  • उकार को ही वेद मनीषी, महेश्वर कहते हैं I
  • उकार को ही योगीजनों ने सगुण ब्रह्म और सगुणत्मक ब्रह्म भी कहा है I
  • उकार ही योगीजनों के योगेश्वर, योग गुरु, योगसम्राट, योगर्षि, योग और योग तंत्र हैं I इसलिए कोई योगी हुआ ही नहीं, जो उकार का नहीं था I जो उकार का नहीं, वो योगी भी नहीं I
  • उकार को ही रचनाकर्ता और सृष्टिकर्ता शब्द से सम्बोधित किया जाता है I
  • उकार का नाता जगन्नाथ भगवान् से भी है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

उकार साक्षात्कार मार्ग और पञ्च ब्रह्मोपनिषद, …

यही उकार वेदान्तियों का ‘ब्रह्म का पूर्वी मुख’, सद्योजात है, जिसका वर्णन पञ्च ब्रह्मोपनिषद में किया गया है, जो मैंने ही अपने एक पूर्व जन्म में दिया था, और वो भी अपने उस जन्म के गुरुदेव, महादेव के आदेशानुसार I

यहाँ जो महादेव शब्द कहा गया है, वो सदाशिव के अघोर मुख का भी वाचक है I

और उस जन्म में मैं पीपल के वृक्ष के नाम वाला, अघोर मार्ग का, लेकिन वैष्णव योगी था I और उस जन्म में, महादेव, अर्थात, शिव का अघोर मुख मेरे गुरु थे I

मैं उस पूर्व जन्म में, मैं वैष्णव अघोरी था, इसीलिए उस पूर्व के जन्म में, मैं ऐसा था …

भीतर से शैव, बाहर से शाक्त और इस धरा पर वैष्णव I

 

और उसी जन्म में, इस मार्ग के गंतव्य में, मैं ऐसा था …

भीतर से सर्वा, बाहर से आत्मना और इस ब्रह्माण्ड में ब्राह्मणा I

 

और क्यूंकि, इस ब्रह्माण्ड में ब्राह्मण था, इसीलिए, ब्रह्मर्षि कहलाया था I

ऐसा मनीषी स्वयं के लिए तो कल्याणकारी होता है…, लेकिन वो जीव जगत के लिए तबतक हानिकारक रहेगा, जबतक वो स्वयं को ही जीव और जगत नहीं मान लेगा I

इसका अर्थ हुआ, कि उसको जीवत्व और जगतत्व सिद्धियों को पाना ही पड़ेगा…, नहीं तो वो जीव जगत के लिए हानिकारक ही रहेगा I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन इस जन्म में, वैष्णव राजयोगी हूँ, इसीलिए इस जन्म की अवस्था पूर्व जन्म से भिन्न है I इस जन्म में मैं ऐसा हूँ …

भीतर से शाक्त, बाहर से शैव, और इस धरा पर वैष्णव I

 

और इस जन्म में, इस मार्ग के गंतव्य में, मैं ऐसा ऐसा हूँ …

भीतर से आत्मना, बाहर से सर्वा और इस ब्रह्माण्ड में ब्राह्मणा I

 

ब्राह्मणा का अर्थ होता है, “वेदों के तत्त्व” का साक्षात्कारी I ऐसा मनीषी कोई बाहर के चिन्हों का प्रयोग नहीं करता I

ऐसा मनीषी, जीव जगत के लिए तो कल्याणकारी होता है, लेकिन स्वयं के लिए हानिकारक होता है I

ऐसा मनीषी भी जबतक जीव जगत को स्वयं के भीतर ही मानके, उस भीतर के जीव जगत को अपनी साधनाओं के साक्षात्कारों में जान नहीं लेगा, तबतक वो स्वयं के लिए हानिकारक रहेगा I

इसका अर्थ हुआ कि उसको जीवत्व और जगतत्व सिद्धियों को पाना ही पड़ेगा…, नहीं तो वो स्वयं के लिए हानिकारक ही रहेगा, अर्थात नहीं तो वो स्वयं ही स्वयं का संहारक बनेगा I

 

  • पञ्च ब्रह्मोपनिषद साक्षात्कार मार्ग

अब मैं पञ्च ब्रह्मोपनिषद के साक्षात्कार का मार्ग बतलाता हूँ, जिसका ज्ञान, मैंने अपने ही एक पूर्व जन्म में दिया था I और इसी ज्ञान को आधार बनाके, वेद अपने चतुष्टय स्वरूप में आया था, और आम्नाय चतुष्टय, धाम चतुष्टय आदि स्थापित करे गए हैं I

इस उपनिषद् का तब साक्षात्कार होता है जब योगी सदाशिव के दक्षिण की ओर देखने वाले, नील वर्ण के, अघोर मुख में स्थित होके, बाकी सारे मुखों का साक्षात्कार करता है I इसलिए, इस उपनिषद् के मूल में, सदाशिव का अघोर मुख ही है I

इसके कारण इस उपनिषद् में जो भी बतलाया गया है, उसका साक्षात्कार अघोर मुख में बसकर ही होता है I

इस उपनिषद् में जो भी बतलाया गया है, वह सदाशिव के दक्षिण मुख में बसकर ही बतलाया गया है I योगीजन, इसी दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए मुख को महादेव कहते हैं I

शिव के पाँच मुखों में से अघोर मुख का प्रादुर्भाव सबसे अंत में हुआ था, जिसके कारण अन्य सभी मुखों के समस्त बिंदु भी अघोर मुख में, सूक्ष्म रूप से ही सही, लेकिन बसे हुए हैं I यही कारण है कि अघोर मुख में ही सारे मुखों का साक्षात्कार हो सकता है, क्यूंकि अघोर ही पूर्ण मुख है…, मेरे परमगुरु सदाशिव का I

अघोर मुख में समस्त मुखों का और उनकी दिव्यताओं का (अर्थात देवताओं का, या पञ्च देव का) साक्षात्कार भी वैसे ही होता है, जैसे पृथ्वी महाभूत का आलम्बन लेके (अर्थात भू महाभूत में बसकर) समस्त महाभूतों और उनके तन्मात्रों का साक्षात्कार किया जाता है I यह भी वैसे ही है, जैसे पृथ्वी महाभूत का प्रादुर्भाव भी सबसे अंत में ही हुआ था, जिसके कारण पृथ्वी महाभूत के भीतर ही सभी महाभूत और पञ्च तन्मात्र भी बसे हुए हैं, और ऐसा होने के कारण ही पृथ्वी महाभूत में बसकर समस्त महाभूतों और तन्मात्रों का साक्षात्कार हो सकता है I

 

  • अघोर मुख में ही पञ्च ब्रह्म का साक्षात्कार होता है,

इसको बताने के लिए, वैदिक कालचक्र में जाना पडेगा, इसलिए अब इसको संक्षेप में बताता हूं, ताकि जो मैं अंत में बताना चाहता हूं, उसका एक उचित आधार डाला जा सके ।

लेकिन वैदिक कालचक्र का ज्ञान अब लगभग समाप्त ही हो चुका है…, इस कलियुग के अभी के कालखंड में तो इस ज्ञान के बस कुछ ही सिद्धांत बचे हैं क्यूंकि अभी के समय पर चल रहे कलियुग की काली काया ने इस ज्ञान को लगभग ढक सा ही लिया है I

ब्रह्माण्ड का कोई भी भाग, उस भाग के सूर्य की गति और दशा पर निर्भर करता है। यह वैदिक कालचक्र का एक मुख्य बिंदु है, जो ज्योतिष का मूल भी है और जिसके कारण ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्माकारक कहा गया था और उसी सूर्य को राजा भी कहा गया था I

सूर्य का स्वयं प्रदुरभाव, ब्रह्म के पूर्वी मुख से होता है, और वो भी आकाश गंगा के मध्य में बसे हुए, “बिंदुशून्य तत्व” के समीप के स्थान से।

यह बिंदु शून्य एक बहुत दबाव वाली शून्यावस्था है, जिसकी देवी दस हाथ वाली माँ महाकाली हैं। भौतिक ब्रह्माण्डीय विज्ञान में, इसी बिंदु शून्य को डार्क मैंटर (Dark Matter) कहा जाता है I

लेकिन इस तथ्य के बारे में, एक बाद के अध्याय में बताऊंगा जब जड़ अदि समाधियों की बात होगी I

 

तो अब आगे बढ़ता हूं…

ऐसे बिंदु शून्य से स्वयं उदय होने के पश्चात, सूर्य उसी शून्य ब्रह्म में ही घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में ही गति करता है I

उदय होने के पश्चात भी सूर्य, आकाश गंगा के उस मध्य भाग तक ही सीमित रहता है, जहां उसका उदय हुआ था।

आकाश गंगा का यह मध्य भाग, प्रकाश रहित बिंदुशून्य का ही होता है जिसमें ब्रह्माण्डीय ऊर्जा बहुत दबाव में होती है और इसलिए आकाश गंगा के मध्य भाग में वह ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएं गठी हुई होती है I

इस स्थान पर यदि साधक, सूक्ष्म शरीर गमन के मार्ग से चला जाए, तो इस संगठित दबाव वाली ऊर्जा में ही फँस जाएगा और बहुत समय तक, इससे बाहर भी निकल नहीं पाएगा I इसी की समाधि को जड़ समाधि कहते हैं, क्यूंकि यही ब्रह्माण्ड की जड़ावस्था है I

उदय होने के पश्चात, सूर्य जब इस बिन्दुशून्य के भितर घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में गति करता है, तो वो भी इसमें फसा रहता है, लेकिन केवल तबतक, जबतक सूर्य ब्रह्म के उत्तरी मुख जिसको तत्पुरुष कहते हैं, उसमें न पहुँच जाए I

इसका अर्थ हुआ, कि उदय होने के पश्चात भी सूर्य आकाश गंगा के उस मध्य प्रकाश रहित भाग से बाहर नहीं निकलता I और इसीलिए, ऐसे समय पर जबकि सूर्य का प्रादुर्भाव हो चुका होता है, लेकिन वो सूर्य, आकाश गंगा में दिखाई नहीं देता I

ब्रह्म के पूर्वी मुख से स्वयं उदय होने के पश्चात, जैसे जैसे सूर्य आगे की ओर गति करता है, वो ब्रह्म के उत्तर मुख की ओर जाता है I

जब सूर्य इस उत्तर मुख पर पहुंच जाता है, तो ही वो सूर्य उस बिंदुशून्य से बाहर निकल पाता है।

और बाहर निकालने के पश्चात ही वो सूर्य आकाश गंगा में दिखता है…, इससे पूर्व नहीं।

इसीलिए, कुछ शास्त्रों में सूर्य का ब्रह्माण्ड में प्रादुर्भाव (ब्रह्माण्ड में उदय), उत्तर दिशा में बताया गया है और किसी और मार्ग में सूर्य का प्रादुर्भाव पूर्व दिशा से बताया गया है ।

प्रादुर्भाव होने के पश्चात, वो सूर्य उसी आकाश गंगा में, पहले की दिशा में ही गति करता है, अर्थात घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में ही गति करता रहता है।

एक ब्रह्मकल्प में, सूर्य आकाश गंगा के साठ चक्कर, दो बार लगता है, अर्थात, एक सौ बीस चक्कर लगता है। यह साथ चक्कर दो बार भी ऐसे होते हैं, जैसे गणित में अनंत का चिन्ह होता है, जिसमें दो शून्य जुड़े हुए होते हैं और इसलिए यह एक सौ बीस शून्य रूप के चक्कर के समान बताए गए हैं I

यह एक सौ बीस चक्कर, दो जुड़े हुए शून्य के आकार में होते हैं, अर्थात इनकी दशा ऐसी होती है, जैसे दो शून्य आपस में जुड़े हुए हैं, जिसके कारण यदि हम सूर्य की गति पूर्णरूप में आकाश गंगा में देखेंगे, तो वो गति की दिशा गणित के अनंत के चिन्ह (∞) के समान होगी ।

आकाश गंगा में सूर्य के एक चक्कर की समय सीमा, पचास महायुगों की आयु के बराबर होती है I इसका अर्थ हुआ, कि आकाश गंगा में सूर्य का एक चक्कर … 43.2 लाख x 50 = 21.6 करोड़ वर्षों का होता है I

इसलिए वैदिक गणित की इकाई में, सूर्य के आकाश गंगा में एक चक्कर की समय सीमा 21.6 करोड़ वर्ष की होती है, जो आज की समय इकाई में ऐसी हो जाएगी…

[(21.6 x 71.6)/66.66666667] = 23.198399988 करोड़ वर्ष (या 231.98399988 मिलियन वर्ष) I

इस गणित के कुछ लिंक नीचे डाल रहा हूं, मन करे तो पड़ लेना, लेकिन वो लिंक अंग्रेजी की वेबसाइट के हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूं…

आज के समय में इस पृथ्वीलोक का सूर्य, ब्रह्म के उत्तरी मुख से उदय होकर, दक्षिण मुख के समीप पहुंच चुका है।

इसके कारण, इस सूर्य और पृथ्वी लोक पर पञ्च मुखा सदाशिव का जो मुख प्रधानतः लागू हो रहा है, वो दक्षिण दिशा की ओर देखने वाला, अघोर मुख है।

पञ्च ब्रह्मोपनिषद में जो पञ्च ब्रह्म को बतलाया गया है, वो इसी दक्षिण मुख, अर्थात अघोर में बसकर ही बताया गया है, जिसके कारण, पञ्च ब्रह्मोपनिषद में जो पञ्च ब्रह्म बताए गए हैं, वो अघोर मुख में बसकर ही साक्षात्कार होते हैं।

 

अब आगे बढ़ता हूं…

सूर्य की आकाश गंगा में जो गति होती है, अब उसे बताता हूं…

सूर्य, ब्रह्म के पूर्वी मुख से उदय होकर, उत्तर को जाकार, पश्चिम को जाता है, और अंततः दक्षिण को पहुँचता है, और जिसके पश्चात वो सूर्य, पुन: पूर्वी मुख को जाकार अपना एक चक्कर पूरा करता है।

इसलिए, सूर्य की गति में, दक्षिण मुख अंतिम मुख होता है।

जो अंतिम होता है, उसमें बाकी सारे मुखों के बीज, सूक्ष्म रूप में सही, लेकिन होते ही हैं I

यह वैसे ही होता है जैसे पृथ्वी महाभूत जो महाभूतों की उत्पत्ति के दृष्टिकोण से अंतिम महाभूत है, उसमें ही बाकी चार महाभूतों के सूक्ष्म बिन्दु, तन्मात्रादि बसे होते हैं।

यही कारण है, कि जो अंतिम होता है, वो ब्रह्माण्ड के दृष्टिकोण से, पूर्ण भी होता है। इसलिए, अघोर जो अंतिम मुख है, वही पूर्ण मुख भी है।

किसी भी पूर्ण दशा के भीतर बसकर, उससे सम्बंधित और उससे पूर्व की समस्त दशाओं जो जाना जा सकता है, क्योंकि बाकी सभी दशाएं किसी न किसी सूक्ष्मादि रूपों में, उसी अंतिम दशा में बसी होती है।

यही पञ्च ब्रह्मोपनिषद में बताए गए पञ्च ब्रह्म का सत्य भी है, क्योंकि पञ्च ब्रह्मोपनिषद के पञ्च ब्रह्म का साक्षातकार भी अघोर मुख का अलंबन लेके ही किया गया था।

जब पञ्च ब्रह्मोपनिषद का ज्ञान साक्षात्कार किया और बाँटा गया था, तब भी आज के समान, सूर्य दक्षिण मुख, अर्थात अघोर के ही समीप था I

और क्योंकि अघोर को ही महादेव कहते हैं, इसलिए पञ्च ब्रह्मोपनिषद में इसी अघोर मुख, अर्थात महादेव के ज्ञान को ही बतलाया गया है।

यही कारण है कि जबकि यह उपनिषद् पञ्च ब्रह्म को बतलाता है, लेकिन इसको महादेव (अघोर मुख) के साथ जोड़ा गया था I

जब हम अघोर मुख से उन पञ्च ब्रह्म का साक्षातकार करते हैं, जो अघोर मुख में ही बसे हुए हैं, तो जैसे वो पञ्च ब्रह्म साक्षातकार होते हैं, वैसे ही इन पञ्च ब्रह्म को इस उपनिषद में बताया गया था।

इसलिए, पञ्च ब्रह्मोपनिषद का ज्ञान, अघोर मुख के भीतर बस कर ही बताया गया था। और क्योंकि अघोर मुख ही महादेव कहलाता है, इसलिए इस उपनिषद में, महादेव के नाम पर ही इस ज्ञान को बताया गया था। और उस जन्म में तो महादेव ही मेरे गुरु थे (और आज भी हैं ही) I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और यदि कोई साधक अघोर मुख से परे या आगे जाके, पञ्च ब्रह्मोपनिषद के पञ्च ब्रह्म का साक्षातकार करेगा, तो वो साक्षातकार वैसा ही होगा, जैसा पाशुपत मार्ग में बसकर राजयोगी करते हैं।

ऐसी दशा में उन्ही पञ्च ब्रह्मोपनिषद के पञ्च ब्रह्म को, पञ्च मुखा सदाशिव कहा जाता है। और उस पाशुपत मार्ग में, पञ्च ब्रह्मोपनिषद का सद्योजात ब्रह्म, सदाशिव का तत्पुरुष मुख कहलाता है।

इसलिए पञ्च मुखा सदाशिव का ज्ञान उस दशा का है, जिसमें साधक की चेतना, अघोर से बाहर जाके (या अघोर को ही पार करके), उन मुखों का साक्षातकार करती है।

और ऐसी दशा में, जो पञ्च ब्रह्मोपनिषद का सद्योजात मुख है, वो ही सदाशिव का तत्पुरुष मुख कहा गया है।

 

टिप्पणियां: पञ्चब्रह्म में और पञ्च मुखी सदाशिव के मुखों में,मुखों की दिशाओं में और मुखों की स्थिति में कुछ अंतर भी होता है, तो अब उस अंतर को संक्षेप में बताता हूँ …

  • पञ्च ब्रह्म के चार दिशाओं के चार ब्रह्म, अपने भीतर की ओर, अर्थात उनके मध्य में जो ईशान ब्रह्म हैं, उन ईशान की ओर देखते हैं I और इसके विपरीत पञ्च मुखी सदाशिव के चार दिशाओं के मुख, बाहर की ओर देखते हैं I
  • ऐसा होने के कारण, इन मुखों के वेद, महाभूत और तन्मात्र भी पृथक ही हो जाते हैं, अर्थात पञ्च ब्रह्म के एक दिशा का तत्त्व, उनकी उलटी (विपरीत) दिशा के सदाशिव मुख में ही पाए जाएंगे I और ऐसा ही इनके वेदों के लिए भी पाया जाएगा I
  • इसके साथ साथ, इनकी दिशाओं में भी अंतर होता है, अर्थात यह बिलकुल एक समान नहीं होती हैं I यह अंतर पृथ्वी की धुरी के 5 डिग्री और मन्वन्तर के 9 डिग्री को जोड़कर जो अंक आता है, वही होता है I इसका अर्थ हुआ की यह दिशा में अंतर, 32.5 डिग्री का होता है I और पञ्च मुखी सदाशिव के बाहर की ओर देखने वाले मुखों में यह अंतर, पञ्च ब्रह्म की दिशाओं से दक्षिण दिशा की ओर होता है I इसलिए भी इन मुखों की दिशाएं विपरीत भी पूरी तरह नहीं होती, बल्कि इनकी दिशाईं में 32.5 डिग्री का अंतर पाया जाएगा I
  • और जहां विपरीत दिशा के वेद के लागू होने पर भी, उस दिशा में जो महावाक्य लागू होता है, वह पञ्च ब्रह्म के वेद से संबद्ध ही होता है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि महावाक्य स्वयं ही स्वयं में के मार्ग के गंतव्य के द्योतक ही होते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

इसलिए साधक का मार्ग चाहे कोई भी हो, लेकिन उस मार्ग में…

  • पूर्वी दिशा का महावाक्य ऋग्वेद का ही रहता है I
  • उत्तरी दिशा का महावाक्य अथर्ववेद का ही रहता है I
  • पश्चिम दिशा का महावाक्य सामवेद का ही रहता है I
  • दक्षिण दिशा का महावाक्य यजुर्वेद का ही रहता है I

और इसी बात का प्रमाण वैदिक वाङ्मय में भी मिलता है, जैसे एक वेद के मंत्र, किसी दुसरे वेद में भी मिलेंगे I

 

और यही उकार…

  • राजयोग और पशुपत मार्ग के साधकों का तत्पुरुष है। और वो तत्पुरुष ही वेदान्तियों के हिरण्यगर्भ की कार्य ब्रह्म नामक अभिव्यक्ति है।
  • ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में इसी उकार या हिरण्यगर्भ की अण्डाकार दशा के कारण, इसको सोने का अण्डा भी कहा गया है।
  • इसका नाता पञ्च ब्रह्मोपनिषद के सद्योजात ब्रह्म से भी है, क्योंकि सद्योजात ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म है ।

अब आगे बढ़ता हूं…

 

उकार के स्वरूप, कार्य ब्रह्म के स्वरूप, योगेश्वर के स्वरूप, महेश्वर के स्वरूप, …

उकार को तीन स्वरूपों में जाना जा सकता है, जो साकार, निराकार और लिंग रूप हैं I तो अब इनको बतलाता हूँ…

 

  • उकार का साकारी और निराकारी स्वरूप, सदाशिव के तत्पुरुष मुख का साकारी और निराकारी स्वरूप, उकार का साकारी स्वरूप, उकार का निराकारी स्वरूप, सदाशिव के तत्पुरुष मुख का साकारी स्वरूप, सदाशिव के तत्पुरुष मुख का निराकारी स्वरूप, कार्य ब्रह्म का साकारी और निराकारी स्वरूप, कार्य ब्रह्म का साकारी स्वरूप, कार्य ब्रह्म का निराकारी स्वरूप, महेश्वर का साकारी और निराकारी स्वरूप, महेश्वर का साकारी स्वरूप, महेश्वर का निराकारी स्वरूप, योगेश्वर का साकारी और निराकारी स्वरूप, योगेश्वर का साकारी स्वरूप, योगेश्वर का निराकारी स्वरूप,

तत्पुरुष शब्द, दो शब्दों से बना है…, तत और पुरुष।

तत शब्द का अर्थ “वह या वो” होता है, और पुरुष शब्द का अर्थ सगुणत्मक ब्रह्म होता है, तो इसी आधार पर, तत्पुरुष का अर्थ होता है, “वह ब्रह्म, या ब्रह्म का सगुणत्मक स्वरूप”, अर्थात, सगुण ब्रह्म होता है ।

यही कारण है, कि तत्पुरुष ही सगुणत्मक ब्रह्म है।

सगुण के दो भेद है, एक साकार और दूसरा निराकार।

साधक की काया के भीतर, अपने साकार स्वरूप में, तत्पुरुष एक सुनहरे वर्ण के सिद्ध शरीरी रूप में होते हैं । इस सोने के समान शरीर को तत्पुरुष शरीर, हिरण्यगर्भ शरीर या महेश्वर शरीर भी कह सकते हैं। और बौद्ध मार्ग में इसी सुनहरे शरीर को, बुद्ध का सुनहरा शरीर (golden body of buddha) या बुद्धत्व शरीर (Buddha body of reality) भी कहा जाता है।

और वो ही उकार या तत्पुरुष अपने निराकार रूप में, कार्य ब्रह्म और महेश्वर कहलाते हैं।

महेश्वर ही योगीराज, योगसम्राट, योगर्षि, योग गुरु, योगेश्वर, योग और योग तंत्र होते हैं।

यह सभी नाम महेश्वर के ही है, इसीलिए किसी भी वास्तविक योगी ने इन नामों को या इन नामों की उपाधियां को कभी भी धारण नहीं किया है, क्यूंकि ऐसे योगी को पता होता है, कि यह नाम केवल महेश्वर के ही है, जो हर एक योगी के गुरुस्वरूप ही होते हैं, और जो योगियों द्वारा, योग, योगतंत्र और योगियों के योग ईश्वर और महा ईश्वर, अर्थात महेश्वर और योगेश्वर ही माने जाते हैं ।

ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास का, एक सत्य बता रहा हूँ, कि कोई सर्व साक्षात्कारी, और आत्मसाक्षात्कारी योगी हुआ ही नहीं, जो महेश्वर, अर्थात योगेश्वर या उकार का नहीं था।

कोई साधक बोले की वो योगी है, लेकिन महेश्वर को नहीं मानता या महेश्वर के मार्ग पर नहीं जाता, तो वे योगी है ही नहीं।

समस्त योगी जन के एकमात्र गुरु, महेश्वर ही होते हैं। मैं भी उनको परमगुरु शिव रूप में ही मानता हूं।

 

  • उकार का लिंगात्मक स्वरूप, कार्य ब्रह्म का लिंगात्मक स्वरूप, उकारलिंग, उकारलिंग क्या है, कार्य ब्रह्मलिंग, कार्य ब्रह्मलिंग क्या है, उकार का लिंगात्मक स्वरूप क्या है, …

योगी के मस्तिष्क के भीतर, जो ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष होता है, उसमें यही उकार अपने लिंग रूप में साक्षककार होता है I

उस ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर का उकार, कार्य ब्रह्म का लिंगात्मक स्वरूप ही है I

और यही उकारलिंग या उकार का लिंगात्मक स्वरूप, इस अध्याय के प्रथम चित्र में भी दिखलाया गया है I

 

आत्ममार्ग में प्रजापति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का नाता, …

इसको कई दृष्टिकोणों से बतलाया जा सकता है I

इसलिए अध्याय के इस भाग के कई उप-भाग होंगे, क्यूंकि इसके बिंदुओं को कई प्रकार से और कई मार्गों में जाकर जाना जा सकता है I

तो अब उन सभी प्रकारों और मार्गों में से कुछ प्रधान दृष्टिकोणों को बताता हूँ…

 

  • चित्त बुद्धि और गुणों के दृष्टिकोण से हिरण्यगर्भ और कार्य ब्रह्म का नाता, हिरण्यगर्भ और कार्यब्रह्म का नाता, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का नाता, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्यब्रह्म का नाता,

अंतःकरण चतुष्टय विज्ञान में, चित्त ही संस्कारों को धारण करता है, अर्थात समस्त जीव जगत के संस्कारों का धारक चित्त ही होता है I

ब्रह्माण्ड के उदय से पूर्व, जब चित्त और बुद्धि का प्राथमिक स्वयं उदय हुआ था, तो चित्त का उदय बुद्धि से पूर्व में हुआ था I

ऐसे समय पर, चित्त ने कोई ब्रह्माण्डीय संस्कार भी धारण नहीं किए थे, इसलिए चित्त का वो प्राथमिक स्वरूप, उस चित्त के पश्चात उदय हुई बुद्धि से सूक्ष्म था I

ऐसे समय पर, चित्त का बुद्धि से सूक्ष्म होने के कारण, चित्त ने बुद्धि को भेद के, बुद्धि के भीतर ही अपने को बसाया हुआ था I चित्त का बुद्धि के भीतर बसे होने का कारण यह था, कि जो सूक्ष्म होता है, वो अपने से स्थूल के भीतर भी बसा हुआ होता है I

जो सूक्ष्म होता है, वो अपने से स्थूल अवस्था को भेदता है, और इसीलिए वो अपने से स्थूल अवस्था के भीतर भी पाया जाता है I

यही कारण है, कि अपनी प्राथमिक उदयावस्था में, चित्त संस्कार रहित होने के कारण, बुद्धि से सूक्ष्म था, और बुद्धि के भीतर भी बसा हुआ था I

लेकिन जब ब्रह्माण्ड की सूक्ष्म और स्थूल अवस्थाएँ बनती चली गई, तब चित्त ने ही उन ब्रह्माण्डीय अवस्थाओं (अर्थात उन रचित जीव जगत की अवस्थाओं) के संस्कारों को अपने भीतर बसाया था I

लेकिन यह संस्कार, चित्त की तुलना में चित्त जितने सूक्ष्म नहीं थे I इसलिए जैसे-जैसे यह संस्कार, जो चित्त के समान सूक्ष्म नहीं थे, वो चित के भीतर बसते ही चले गए, वैसे-वैसे वो चित्त भी अपनी पूर्व की सूक्ष्म स्थिति को त्यागता ही चला गया, जिससे वो चित्त उतना सूक्ष्म नहीं रह पाया I

जब चित्त ने उन ब्रह्माण्डीय संस्कारों को, जो उस (चित्त) से अधिक स्थूल थे, अपने भीतर बसाया, तो इसके पश्चात, चित्त की परिणामी स्थिति भी अपनी मूल सूक्ष्मता को खोती ही चली गई I जिसके कारण वो चित्त अपनी प्राथमिक अतिसूक्ष्म उदयावस्था की तुलना में, स्थूल होता ही चला गया I

और जब ब्रह्माण्ड के बहुत सारे संस्कार चित्त में निवास करने लगे, तो चित्त उस परिणामजन्य स्थिति में आ गया, जिसमें बुद्धि ही उस चित्त से सूक्ष्म होकर, चित्त के भीतर निवास करने लगी I

इसलिए, ब्रह्माण्ड के संस्करों ने चित्त को उसके उदय समय के सूक्ष्म स्वरूप में नहीं रहने दिया, जिसके फलस्वरूप बुद्धि ही चित्त से सापेक्षिक सूक्ष्मता में आ गई, अर्थात चित्त के ब्रह्माण्डीय संस्कारों को धारण करने के पश्चात, बुद्धि ही चित्त से सूक्ष्म हो गई I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जब ब्रह्माण्ड की समस्त दशाओं के संस्कारों ने चित्त में अपना घर बना लिया, तो जो चित्त की अवस्था आई, वो चित्त के पूर्व के (अर्थात उदय समय के) समान बुद्धि से सूक्ष्म नहीं रह पाई थी I

ऐसी अवस्था में, जब चित्त में समस्त संस्कार बस गए, तब चित्त और बुद्धि की तुलना में, बुद्धि सूक्ष्म हो गयी I

और ऐसी अवस्था में, बुद्धि ने चित्त के भीतर अपना घर बना लिया, अर्थात, बुद्धि चित्त के भीतर दिखाई देने लगी I

चित्त को उसकी प्राथमिक सूक्ष्मता में पुनः लेके जाने के लिए, उत्कर्ष मार्गों को स्थापित किया गया था I इन उत्कर्ष मार्गों में से, जो मार्ग प्रथम स्थापित किया गया था, वो वेद मार्ग कहलाता था I उत्कर्ष के दृष्टिकोण से, वेद शब्द का अर्थ मुक्तिमार्ग भी होता है I

 

समस्त उत्कर्ष मार्ग, चित्त की प्राथमिक सूक्ष्म संस्कार रहित अवस्था की ओर ही लेके जाते हैं I

 

इसके कारण, चित्त के दृष्टिकोण से …

जो मार्ग चित्त को उसकी प्राथमिक सूक्ष्म संस्कार रहित अवस्था की ओर लेके जायह, वही उत्कर्ष मार्ग कहलाता है I

और जो उत्कर्ष मार्ग होता है, वो साधक के मुक्तिमार्ग का अंग भी होता ही है I

 

चित्त के दृष्टिकोण से …

जब चित्त समस्त संस्कारों से रहित हो जाए, तो उस दशा को ही मुक्ति कहते हैं I

इसलिए, संस्कार रहित चित्त भी कैवल्य मोक्ष को ही दर्शाता है I

मुक्ति या कैवल्य की दशा में, चित्त अपने उस प्राथमिक संस्कार रहित स्वरूप को पाता है, जो तब था जब ब्रह्म की रचना में चित्त का स्वयंउदय हुआ था I

 

और योग शास्त्रों में, …

चित्त की इसी संस्कार रहित अवस्था को चित्त का निरोध कहा गया है I

 

इसलिए, चित्त के दृष्टिकोण से …

जो मार्ग चित्त को उसकी अपनी ब्रह्माण्डोदय के समय की प्राथमिक संस्कार रहित अवस्था की ओर लेके जाता है, वही चित्त नोरोध मार्ग है, जो योग कहलाता है I

 

इसका अर्थ हुआ की आज के योगियों के वेश में बनियों द्वारा, योग और उसके योगमार्ग के नाम पर, जो बन्दर का नाच और सांड की श्वास चल रही है…, वो योग है ही नहीं, जिसके बारे में योगतंत्र बतलाता है I

 

चित्त के संस्कारों के दृष्टिकोण से…

जो चित्त को उसके विशुद्ध स्वरूप में स्थापित कर दे और उसकी प्राथमिक स्वयंउदय अवस्था की संस्कार रहित स्थिति को लेके जाए, वो योग कहलाता है I

चित के दृष्टिकोण से, यही योग शब्द की परिभाषा है I

 

और इसके अंतर्गत जो योगी शब्द की परिभाषा है, वो अब बतलाता हूँ …

जिस साधक का चित्त निरोध हो गया, वो ही योगी I

जिस साधक का चित्त ही संस्कार रहित हो गया, वही योगी है I

ऐसे योगी का चित्त, खुरदरे श्वेत वर्ण का होता है I चित्त के ऐसे खुरदरे श्वेत वर्ण का मूल सत्त्वगुण की ऐसी दशा का होता है जिसके भीतर चौबीस रेखाऐं होती है, जो काले और श्वेत वर्ण के मिश्रित वर्ण की होती हैं, और जो चौबीस तत्त्वों और चौबीस गुणों की निर्बीज अवस्था को दर्शाती हैं I

और उस चित्त को रजोगुणी बुद्धि (अर्थात पीले रंग की बुद्धि और लाल रंग के रजोगुण की योगावस्था) ने घेरा भी होता है I इसी दशा को मेरे पूर्व जन्म के गुरुदेव, भगवान् बुद्ध ने बोधिचित्त कहा था I

वेदों के दृष्टिकोण से बोधिचित्त का श्वेत वर्ण प्रजापति का वाचक है, पीला वर्ण हिरण्यगर्भ का और पीले-लाल रंग की योगावस्था कार्य ब्रह्म को दर्शाती है, इसलिए बोधिचित्त प्रजापति, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म के नाते की सात्विक योगावस्था को भी दर्शाता भी है I इस बोधिचित्त के बारे में, एक बाद के अध्याय में बात होगी I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जब पीले रंग की बुद्धि का योग, श्वेत रंग के चित्त से होता है, तो जो दशा बनती है, वो सुनहरी होती है I जब इस योगदशा को इस दशा के बाहर से देखा जाएगा, तो वो सुनहरी ही दिखेगी I

लेकिन ऐसी सुनहरी दशा के समय पर, चित्त संस्कार रहित होता है, इसलिए अपनी वास्तविक सूक्ष्मता में होता है, जिसके कारण चित्त, बुद्धि से सूक्ष्म भी होता है I

और ऐसी दशा में चित्त का बुद्धि से सूक्ष्म होने के कारण, वो चित्त उस बुद्धि को भेद कर, बुद्धि के भीतर बसा हुआ होता है I

ऐसी दशा में यदि बुद्धि और चित्त के योग का साक्षात्कार किया जाएगा, तो श्वेत वर्ण का चित्त, पीले वर्ण की बुद्धि के भीतर ही बसा हुआ पाया जाएगा, अर्थात चित्त की ऐसी संस्कार रहित अवस्था में, बुद्धि ने चित्त को घेरा होगा I

जब श्वेत वर्ण का सत्त्वगुणी चित्त, संस्कार रहित होता है, तब वो चित्त पीले रंग की बुद्धि के भीतर बस जाता है I

और चित्त और बुद्धि के ऐसे योग को यदि बाहर से देखोगे, तो वो दशा सुनेहरी दिखाई देगी, अर्थात, बाहर से इस योगावस्था की दशा सोने के रंग की होगी I

और यदि इसी दशा को, इस दशा के भीतर से देखोगे, अर्थात अपनी चेतना को इस दशा के भीतर जो संस्कार रहित चित्त है, उसमें बैठा कर के देखोगे, तो इसका मध्य भाग श्वेत वर्ण का होगा, जिसको एक पीले और लाल वर्णों की रश्मियों के समान प्रकाश ने घेरा होगा I यह श्वेत वर्ण, सत्त्वगुणी चित्त का है…, और पीला रंग, बुद्धि का है I

ऐसी चित्त और बुद्धि की योगदशा में, चित्त श्वेत वर्ण के प्रकाश को धारण करता हैI

जब श्वेत वर्ण का संस्कार रहित चित्त, उस पीली रंग की बुद्धि से सूक्ष्म होकर, उस बुद्धि के भीतर बसा होता है, तो वो पीले रंग की बुद्धि को भी चमकदार बनाता है I और ऐसी दशा में बुद्धि सुनहरे रंग की दिखाई देती है I

वेदों में इसी बुद्धि और चित्त के योग को हिरण्यगर्भ ब्रह्म कहा गया था, जो संस्कार रहित चित्त और वृत्तिहीन बुद्धि की योगावस्था को ही दर्शाता है I और उन्ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म को जब रजोगुण ने घेरा होता है, अर्थात वह हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी होते हैं, तब वही हिरण्यगर्भ, कार्य ब्रह्मा कहलाते हैं और जो हिरण्यगर्भ का ही सृष्टिकर्ता, रचनाकर्ता, योगीराज, योग गुरु, योगसम्राट, योगर्षि, योगेश्वर और महेश्वर स्वरूप है I ब्रह्म की रचना में, इसी हिरण्यगर्भ ब्रह्म के भीतर (अर्थात गर्भ में), समस्त जीव जगत को बसाया गया है I

और क्यूँकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म, संस्कार रहित चित्त और वृत्तिहीन बुद्धि का ही योग हैं, इसलिए वो अनाभिमानी देवता ही है I

लेकिन जब वही हिरण्यगर्भ ब्रह्म, अर्थात संस्कार रहित चित्त और वृतिहीन बुद्धि का योग, रजोगुणी हो जाता है, तो पीले रंग की बुद्धि में ही एक लाल रंग का प्रकाश आ जाता है…, जिसके कारण वो पीले रंग की बुद्धि में ही लाल रंग का रजोगुण दिखाई देने लगता है I

और क्यूंकि इस दशा में भी वो चित्त संस्कार रहित ही होता है, इसलिए चित्त में यह लाल रंग नहीं दिखाई देता है, जिसके कारण वो चित्त एक खुरदरे श्वेत रंग का दिखाई देता है I हिरण्यगर्भ ब्रह्म की ऐसी दशा को ही कार्य ब्रह्म कहा गया था I

अनाभिमानी देवता जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म हैं, उनका रजोगुणी स्वरूप ही अभिमानी देवता होता है, जो कार्य ब्रह्म कहलाता है I जबतक हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी होकर अभिमानी देवता नहीं होते, तबतक वो जीव जगत के रचैता, अर्थात कार्य ब्रह्म भी नहीं हो पाते I

कार्य ब्रह्म, उन अनाभिमानी हिरण्यगर्भ ब्रह्म का ही वो अभिमानी रजोगुणी स्वरूप होते हैं, जिनको इस जीव जगत का रचैता कहा जाता है I इन्ही कार्य ब्रह्म का चित्र इस अध्याय में दिखाया गया है I

और इस चित्र को घेरे हुए लाल रंग को यदि निकाल दोगे, तो यही चित्र हिरण्यगर्भ ब्रह्म को दर्शाने लगेगा I

यही कार्य ब्रह्म, ब्रह्म की इच्छा शक्ति सहित, चित्त शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति को धारण करे हुए होते हैं, इसलिए इनको ही योगेश्वर कहा जाता है I ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्यूंकि यह चार शक्तियां ही वास्तविक शक्तियां हैं, इस समस्त ब्रह्म रचना की I और जिसमें इन चारों को ही धारण कर लिया, वही महेश्वर और योगेश्वर आदि नामों से पुकारे जाने का पात्र होता है I किन्तु अपनी ऐसी दशा में वह योगेश्वर, अभिमानी भी पाए जाएंगे और अनाभिमानी भी, इसलिए उनको ऐसी दशा में, हिरण्यगर्भ के समान, अभिमानी और अनाभिमानी दोनों ही कहा जाता है I

 

  • मूल के दृष्टिकोण से प्रजापति का हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का नाता, प्रजापति का हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म से नाता, प्रजापति का हिरण्यगर्भ ब्रह्म से नाता, प्रजापति का कार्य ब्रह्म से नाता,

अपने मूल से, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म, दोनों ही वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में तैंतीसवें देवता, जो सर्वसम प्रजापति केहलाता हैं, उनकी अभिव्यक्ति होते हैं I

यहाँ जो प्रजापति शब्द का प्रयोग किया गया है, वो सर्वसम, चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म ही हैं…, जो हीरे के समान प्रकाशमान होते हैं I

आज के वेदान्ती जो कहते हैं, की हिरण्यगर्भ ही चतुर्मुखा हैं, वह मेरे साक्षात्कारों में नहीं है, क्यूंकि मैंने हिरण्यगर्भ ब्रह्म को एक मुखा स्वरूप में ही साक्षात्कार किया है, और वह भी अपने सगुण आत्मा के लल्ला (अर्थात बालक) स्वरूप में, और जिनका निवास स्थान ब्रह्मरंध्र के भीतर बसे हुए उस बत्तीसदल कमल में है, जिसको लल्लाना चक्र ही कहते हैं, और इसी चक्र में वह हिरण्यगर्भ ब्रह्म अपने मानव शरीरी बालरूप में बैठे होते हैं I

उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति के लोक को ही ब्रह्मलोक कहा गया है, न की हिरण्यगर्भ ब्रह्म के लोक को I ब्रह्मलोक, बीस लोकों का समूह है और इन बीस लोकों के ऊपर, ब्रह्मलोक का ही इक्कीसवाँ लोक होता है जहां पर केवल सर्वसम चतुर्मुखा पितामह और सर्वसमतामई माँ सरस्वती निवास करती हैं I ब्रह्मलोक को शून्य ब्रह्म ने घेरा होता है I

शून्य ब्रह्म में शून्य और ब्रह्म, अर्थात शून्य और अनंत का ऐसा योग होता है, कि शून्य ही अनंत होता है, और अनंत ही शून्य I

शून्य अनंत ही नारायण कहलाया था, और इसी शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म में ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म सहित, समस्त जीव जगत बसाया गया था I

ब्रह्म लोक के इन बीस लोकों में से, नीचे के सोलह लोक होते हैं, और ऊपर के चार लोक होते हैं I और इन ऊपर के चार लोकों में से, किसी एक लोक में एक गुप्त द्वार होता है, जो उस इक्कीसवें भाग की ओर जाता है I

ब्रह्मलोक के नीचे के सोलह लोक, सोलह कलाएं दर्शाते हैं, और ऊपर के चार लोक पुरुषार्थ चतुष्टय के वाचक हैं I और ब्रह्मलोक का इक्कीसवाँ भाग, सर्वसम चतुर्मुखा पितामाह प्रजापति और सर्वसमतामई माँ सरस्वती का निवास स्थान है I जब सोलह कलाओं का पुरुषार्थ के चार अंगों से योग होता है, तो पूर्व की वो सोलह कला, चौसठ कला हो जाती हैं I

इन ऊपर के चार लोकों में से एक गुप्त मार्ग जाता है, जिसमें साधक की चेतना अकस्मात् ही प्रवेश कर जाती है I और इस गुप्त मार्ग से ही उन सर्वसम, चतुर्मुखा पितामह प्रजापति के पास जाया जाता है, अर्थात उनका साक्षात्कार किया जाता है I

जब पितामह ब्रह्म अपने प्रजापति स्वरूप में होते हैं, तो वह सर्वसम होते हैं I और अपनी ऐसी सर्वसम दशा में न तो वो अभिमानी होते हैं, और न ही अनाभिमानी ही होते हैं I

मेरे पूर्व जन्मों के पुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण में भी हैं क्यूंकि मैं प्रबुद्ध योगभ्रष्ट हूँ…, पितामह प्रजापति की इसी दशा को विशुध्द सत् कहा गया था I

और इसी विशुद्ध सत् की सगुण निराकार अवस्था को, ब्रह्मलोक कहा गया था, जिसके कारण, इस चतुर्दश भुवन रूपी ब्रह्म की रचना में, ब्रह्मलोक ही सत्लोक कहलाया था I

और इसी विशुद्ध सत् की सगुण साकार चतुर्मुखा अवस्था को, प्रजापति और पितामह ब्रह्म कहा गया था I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इन बताए गए बिंदुओं पर ध्यान देना, क्यूंकि यहाँ पर मैं कुछ ऐसा बता रहा हूँ, जिसका ज्ञान अब लुप्त हो चुका है…

  • जब पितामह ब्रह्म, न तो अनाभिमानी होते हैं, और न ही अभिमानी ही होते हैं, तब वो वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में तैंतीसवें देवता, प्रजापति कहलाते हैं I और ऐसी अवस्था में पितामह प्रजापति सर्वसम ही होते हैं और वो हीरे के प्रकाश के समान ही होते हैं I
  • जब वही पितामह प्रजापति, अनाभिमानी देवता होते हैं, तब वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म कहलाते हैं I ऐसी अवस्था में पितामह प्रजापति संस्कार रहित चित्त और वृत्तिहीन बुद्धि की योगावस्था में होते हैं, और सुनहरे वर्ण के होते हैं I
  • और जब वही पितामह प्रजापति, अभिमानी देवता होते हैं, तब वो कार्य ब्रह्म कहलाते हैं I ऐसी अवस्था में वही पितामह प्रजापति, लाल वर्ण के रजोगुण को धारण करके, जीव जगत के रचैता कहलाते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

आत्ममार्ग, अद्वैत सिद्धांत के अंतर्गत चलायमान होता है I और उस अद्वैत सिद्धांत के अंतर्गत …

सगुण साकार देवता का सगुण निराकार स्वरूप ही उनका देवलोक कहलाता है I

सगुण निराकार देवलोक का सगुण साकार स्वरूप ही, उसका देवता कहलाता है I

इसलिए…

वास्तविकता में देवता का दिव्य शरीर उनके अपने देवलोक से पृथक नहीं होता I

अपने साकारी रूप में देवता, उनके सगुण निराकार लोक से पृथक नहीं होता I

यही कारण है, कि…

चाहे देवता को सगुण साकार या सगुण निराकार रूप में मानो, फल एक ही होगा I

 

यही कारण है, कि…

देवत्व के साकारी और निराकारी बिन्दुओं की साधनाओं और उनके मार्गों में अंतर होने पर भी, उनके फलों में अंतर नहीं होता, अर्थात उनके फल एक जैसे ही होंगे I

 

लेकिन…,

सगुण निराकार की तुलना में, सगुण साकार पर साधना सरल होती है I

और यही कारण था कि वैदिक वाङ्मय में, तत्त्वदर्शी वेद मनिषियों ने अर्चाविग्रह, अर्थात मूर्ति पूजन का साधनामार्ग और उसका सिद्धांत ख्यापित किया था I

 

एक और बात…

देवता या उनके लोक की साधनाओं में, मार्ग और साधक की मनोस्थिति का अंतर होते हुए भी, उन साधनाओं के फलों में अंतर नहीं होता I

 

इसलिए जो कहते हैं, कि अर्चा विग्रह या मूर्तियों का पूजन ऐसा या वैसा है, वो सभी मूर्ख हैं I जिन्होंने ऐसा कभी भी कहा था या आगे कभी कहेंगे, वो सभी अपने ऐसे वाक्यों में, अपनी मूर्खता का ही प्रमाण दे रहे हैं I

ऐसे अर्चा विग्रह के विरोधी यह प्रमाण भी दे रहे हैं, कि उनको साधना पूजन आदि सिद्धांतों का ही ज्ञान नहीं है I चाहे आज के कलियुगी मानव या उनके कलियुगी पंथ कुछ भी मानें, लेकिन वास्तविकता वही है जो यहाँ बतलाई गई है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन …

यदि उस लोक के तत्त्व की साधना होगी…, तो ऐसी साधना में, और देवता या देवलोक की साधनाओं में, फल का तारतम्य अवश्य होगा I

 

इस तारतम्य का कारण है, कि…

देवता या उनके लोक पर साधना की तुलना में, देवताओं या उनके लोकों के तत्त्वों की साधनाएं, थोड़ा आगे तक लेके जाती है I

और यह फल का तारतम्य तब भी होता है, जब देवता और उनके लोक में वही तत्त्व होते हैं, जिनकी तत्त्व साधना की जाती है I

देवत्व के मार्ग से ही जीवत्व का मार्ग प्रसस्त होता है, जिसका आलम्बन लेके उस जगतत्व को पाया जाता है, जिससे साधक की तत्त्व साधना का संबंध होता है I

और जगतत्व सिद्धि का आलम्बन लेके ही बुद्धत्व (या बुद्धता) को पाया जाता है…, जो ब्रह्मत्व का मार्ग होता है I

 

इन सबमें से…

ब्रह्मत्व की तो कोई सिद्धि ही नहीं होती, क्यूंकि वो तो प्रत्येक जीव है ही I

जो तुम हो ही, उसको कैसे सिद्ध करोगे…, उसका तो होना पड़ेगा न I

और ऐसा होने का मार्ग भी तो साधक के भाव से ही जाता है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

इसी कारणवश इस समस्त जीव जगत में…

लोकी, उसके उस समय के लोक से पृथक नहीं होता I

जैसा लोक होता है, वैसा ही उस लोकी का शरीरी रूप भी होता है I

इसलिए जब जीव किसी देवलोक जाएगा तो उस देवलोक का दिव्यशरीर भी पाएगा I

यही कारण है, कि ब्रह्म की समस्त रचना में…

लोक और लोकी के शरीर की सूक्ष्मता या स्थूलता का अनुपात सदैव ही स्थिर है I

लेकिन मैं इस अनुपात के स्थिर अंक को नहीं बतलाऊँगा, क्यूंकि आज के कलियुगी मानव या कलियुग के कालखंड में आए किसी भी कलियुगी पंथ में, उस स्थिर अंक का सदुपयोग करने की क्षमता ही नहीं है I

इसी सिद्धांत पर ही ब्रह्म की रचना, लोक और लोकी के स्वरूपों में बनाई गई थी, जो बाहर से तो पृथक ही दिखाई देते थे…, लेकिन मूल से एक ही थे I

और क्यूँकि ब्रह्म की रचना में, ब्रह्मलोक से लेकर समस्त लोकों तक, यहाँ बताया गया सिद्धांत व्यापक रूप में है, इसलिए इस सम्पूर्ण जीव जगत में, इस सिद्धांत का प्रभाव भी सार्वभौम ही है I

और इस सिद्धांत के प्रभाव से बचने के लिए ही परकाया प्रवेश का मार्ग अपनाया जाता है, ताकि शरीरी रूप में उस लोक का लोकी होते हुए भी, वास्तविकता में उस लोक का न हुआ जाए I

लेकिन यह परकाया प्रवेश का मार्ग भी तब अपनाया जा सकता है, जब उस काल की प्रेरणा हो, जिसके गर्भ में यह समस्त जीव जगत और उसके समस्त सिद्धांत भी बसे हुए हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

पितामह प्रजापति ने अपना लोक, अर्थात ब्रह्मलोक भी इसी सिद्धांत पर बनाया था, जिसके कारण…

सर्वसम सगुण निराकार ब्रह्मलोक का सगुण साकार स्वरूप ही चतुर्मुखा प्रजापति हैं I

सर्वसम सगुण साकार प्रजापति का सगुण निराकार स्वरूप ही उनका ब्रह्मलोक है I

ब्रह्मलोक के बारे में एक बाद के अध्याय में बताया जाएगा, जब सदाशिव के सद्योजात मुख पर बात होगी I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जबकि जो यहाँ बताया जा रहा है, वो इस अध्याय के इस भाग का अंग नहीं है…, लेकिन तब भी इसमें जोड़ रहा हूँ…, नहीं तो यह भाग पूर्ण नहीं होगा…

सभी उत्कर्ष मार्गों के मूल में, साधक का भाव ही होता है I

ब्रह्माण्ड और उसकी प्राथमिक दिव्यताएं, भावनात्मक ऊर्जा से भी सम्बंधित हैं I

ब्रह्माण्ड और उसकी दिव्यताओं से, भाव से भी जुड़ा जाता है I

इसलिए, मुमुक्षुओं के उत्कर्ष मार्गों के मूल में, मुक्तिभाव ही होना चाहिए I

मुमुक्षुओं के मुक्तिभाव को ही ब्रह्म भावपन और आत्मभावपन कहा जाता है I

 

और कुछ बिंदु…

जबतक साधकों की भावनात्मक स्थिति समान है…, फलों का अंतर नहीं होगा I

साधकों की भावनात्मक स्थिति के अंतर से भी फलों का अंतर होता है I

इसका अर्थ हुआ, कि मार्ग कोई भी हो, इष्ट कोई भी हो, मंत्र कोई भी हो, भाषाएँ कोई भी हों, आसन कोई भी हो, देश और काल कोई भी हो, साधकों की लौकिक या पारलौकिक स्थितियाँ कोई भी हों, लेकिन जब तक साधकों के भाव समान रहेंगे, तबतक सभी साधकों को फल भी समान ही मिलेंगे I

 

और अब जो बोल रहा हूँ, उसपर ध्यान देना…

लेकिन ऐसा होने के पश्चात भी, वो साधकगण जो अपनी जीवन शैली और साधनाओं में ब्रह्माण्ड की भाषा, अर्थात संस्कृत भाषा का प्रयोग करेंगे, उनके फल दूसरों की तुलना में शीघ्र मिलेंगे I

इसका कारण है, कि ऐसी भाषा के प्रयोग से, साधक का साथ, वो ब्रह्माण्ड ही देने लगता है, जिसमें साधक अपने काया स्वरूप में बसा होता है I और और जहाँ ब्रह्माण्ड भी उसके अपने सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में उस साधक की काया के भीतर भी होता है I

इसलिए, जबकि साधकों के भाव समान होने पर फलों में अंतर नहीं होगा, लेकिन तब भी ब्रह्माण्ड की भाषा का प्रयोग करके, फलों को कुछ अधिक शीघ्रता से पाया जा सकता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और ऐसे भावनात्मक ऊर्जा के मार्ग में, जो गुरु होंगे, वो भी ऐसा ही होंगे…

  • मूलगुरु – विराट महाब्रह्म प्रजापति का पञ्च ब्रह्म स्वरूप ही होगा I
  • परमगुरु – विराट परब्रह्म पञ्च मुखा सदाशिव होंगे I
  • पितामह गुरु – पितामह प्रजापति के हिरण्यगर्भ स्वरूप होंगे I
  • योग और कर्म गुरु– पितामह प्रजापति के कार्य ब्रह्म स्वरूप, योगेश्वर होंगे I
  • सनातन गुरु – शून्य ब्रह्म स्वरूप में श्रीमन नारायण होंगे I
  • मातृ गुरु – पञ्च विद्या में से सभी, या कोई भी एक हो सकती हैं I

लेकिन पञ्च सरस्वती में से, यदि सभी को एकसाथ मानोगे, तो उसका मार्ग भी आना चाहिए, नहीं तो “वो उत्कर्ष का विस्फोट” होगा, जिसे पुरातन कालों मे उत्कर्ष की छलांग कहा जाता है, और जिसके कारण, साधक की मुक्ति बहुत विलम्ब से ही होती है, क्यूंकि अधिकांश साधकों को इस उत्कर्ष की छलांग के अधम प्रभाव से बाहर निकलने को कई ब्रह्मकल्प या कई ब्रह्मवर्ष भी लग सकते हैं I

  • सखा गुरु और सखी गुरु – देवत्व, जीवत्व, जगतत्व, बुद्धत्व में से किसी एक या एक से अधिक को पाए हुए, देवराज इंद्र और देवी इंद्राणी सहित, ब्रह्माण्ड के देवी देवता और गंतव्य प्राप्त योगीजन होंगे I

साधकों का ऐसा मार्ग, ब्रह्मत्व को ही लेके जाएगा I

और ऐसे उत्कर्ष मार्ग में, अंततः, इन समस्त ब्रह्माण्डों की समस्त दिव्यताओं में, वो साधक, उसके अपने ही आत्मस्वरूप में …, उन सर्वसम, सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति का ही स्वरूप कहलाएगा I

ऐसा साधक के आत्मस्वरूप में, पञ्च ब्रह्म विराजमान होते हैं, और इसी को पञ्च ब्रह्मोपनिषद में, कुछ स्पष्ट और कुछ सांकेतिक रूप में भी बतलाया गया था I मेरा ऐसा कहने का कारण यह है, कि…

तुम वो ही हो, जिसका तुमने, तुम्हारी अपनी साधनाओं में साक्षात्कार किया है I

 

ऐसा साधक वो स्वरूप को पाएगा, जो इन समस्त ब्रह्माण्डों के समस्त इतिहास में, मुट्ठी भर योगी भी नहीं पाए हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन ऐसी स्वरूप प्राप्ति के पश्चात भी, ऐसा साधक पूर्ण संन्यासी होके ही शेष रहता है I

ऐसी पूर्ण प्राप्ति के पश्चात, साधक के पूर्ण संन्यासी होने का जो कारण है, वो अब बताता हूँ…, इसलिए इसपर ध्यान देना…

एक ही रचना के समस्त ब्रह्माण्डों में, एक समयखंड में… प्रजापति एक ही होते हैं I

एक रचना में, एक समयखंड में, समस्त ब्रह्माण्डों में… प्रजापति अनेक नहीं होते हैं I

 

अब ऐसा होने के सैद्धांतिक कारण बताता हूँ…

एक ही रचना में, एक ही कालखंड में, शिखर पर एक ही योगी हो सकता है I

और वो शिखर का योगी भी, समस्त ब्रह्माण्डों का रचैता, प्रजापति ही हो सकता है I

और क्यूँकि शिखर पर एक ही हो सकता है, जो उस समय पर उस जीव जगत के पितामह प्रजापति ही होते हैं, इसलिए जो योगी पितामह प्रजापति के ही स्वरूप को धारण कर चुका है, उसके पास पूर्ण संन्यास के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं होता है I

वैदिक वाङ्मय में, उस पूर्ण संन्यासी को ही निर्गुण निराकार ब्रह्म कहा गया है, जो एकमात्र, अनादि अनंत, सनातन एकेश्वर, अद्वैत सर्वव्यापक, सर्वसाक्षी ही होता है I

आत्मपथ में वो निर्गुण ब्रह्म जैसा होता है वह अब बताता हूँ…

  • समस्त सिद्धियों का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, सिद्धितीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, चेतन चतुष्टय का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, तुरीयातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, अन्तःकरण चतुष्टय का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, कारणातीत ही होता है, जिसके कारण वो मनातीत, बुद्धितीत, चित्तातीत और अहमातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, देवत्व का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, देवत्वातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, जीवत्व और जगतत्व का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, जीवातीत और जगतातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, बुद्धत्व का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, बुद्धतीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म, आयाम चतुष्टय, अर्थात दिशा, दशा, आकाश और काल का मूल और गंतव्य, दोनों होता हुआ भी, दिशातीत, दशातीत, अकाशातीत और कालातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म गुणों आदि में बसा हुआ भी, गुणातीत ही होता है I
  • वो निर्गुण ब्रह्म अपनी ही रचना से अतीत होने के कारण, रचनातीत और कर्मातीत होता हुआ, अपने जीव जगत स्वरूप का एकमात्र सर्वसाक्षी ही होता है I
  • और अंततः, ऐसा ही वो योगी भी हो जाता है, जो इस ॐ सावित्री मार्ग के गंतव्य को अपने साधनात्मक साक्षात्कारों में पाएगा I ऐसा योगी उस निर्गुण ब्रह्म के समान, सर्वस्व त्यागी ही हो जाएगा और ऐसे त्याग के पश्चात ही वो, कैवल्य मुक्ति को अपने आत्मस्वरूप में ही पाएगा I

और ऐसा ही वो योगी हो जाता है, जो यहाँ बताए गए मार्ग के गंतव्य को उसके अपने योगमार्ग से पाया होता है, और इसके पश्चात, वो योगी पूर्ण संन्यास को ही अपने भावनात्मक स्थिति में धारण करता है, क्यूंकि इस प्राप्ति के पश्चात, उसके पास कोई और विकल्प होता ही नहीं है I

इस पूर्ण संन्यास का कारण भी वही है जो पूर्व में बताया था, कि एक ही रचना में, एक ही कालखंड में, समस्त ब्रह्माण्डों (अर्थात महाब्रह्माण्ड) के शिखर पर दो प्रजापति हो ही नहीं सकते I

जब योगमार्ग से साधक, निर्विकल्प को पाता है, तो निर्विकल्प में बसने के सिवा उसके पास कोई और मार्ग या विकल्प होता भी नहीं है I

इसीलिए, जबतक एक ब्रह्मा की आयु होती है, तबतक उन ब्रह्मा की अवस्था को यदि कोई योगी पा भी गया, तब भी वो योगी इस अवस्था को धारण नहीं कर पाएगा, क्यूंकि इसे धारण करने से पूर्व ही वो योगी, निर्गुण निराकार को चला जाएगा I

यही कारण है, कि वैदिक वाङ्मय के समस्त मार्गों में, ब्रह्म को ही सर्वोपरि रखा गया है, क्यूंकि योगमार्ग से उस ब्रह्म की समस्त अभिव्यक्तियों को पाने के पश्चात, योगी के लिए वही निर्गुण निराकार ही एकमात्र विकल्प रह जाता है, जो कैवल्य मोक्ष कहलाता है I

 

और इस भाग के अंत में …

जैसा ब्रह्म है, वैसा ही ब्रह्म का लोक भी है I

जैसा ब्रह्म है, वैसा ही उस ब्रह्म और मार्ग भी है I

न तो लोक और न ही मार्ग, उनके गंतव्य से पृथक हो सकते हैं I

लोकों और मार्गों में अंतर होने पर भी, उनका मूल और गंतव्य एक होता है I

लेकिन इन बिंदुओं को वो ही योगी जानेगा, जो उस निर्गुण निराकार ब्रह्म में बस विलीन होने ही वाला होगा…, और कोई भी नहीं I

तो अब और भी आगे बढ़ता हूँ…

 

  • अभिमान और अनाभिमान के दृष्टिकोण से प्रजापति, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का नाता,

जैसे पूर्व में बताया था, कि…

  • जब पितामह ब्रह्म, रचैता का कार्य कर रहे होते हैं, तो वो रजोगुणी होकर, अभिमानी होते हैं I पितामह ब्रह्म की ऐसी विज्ञानमय चेतनमय क्रियामय रजोगुणी अभिमानी अभिव्यक्ति को ही कार्य ब्रह्म कहा जाता है I
  • जब पितामह ब्रह्म, रचैता का कार्य नहीं कर रहे होते हैं, तो वो रजोगुण को त्यागकर, अनाभिमानी होते हैं I पितामह ब्रह्म की इस विज्ञानमय चेतनमयह निष्क्रिय अनाभिमानी अवस्था को ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म कहा जाता है I
  • और जब वही पितामह ब्रह्म, न तो अभिमानी रह पाते हैं और न ही अनाभिमानी होते है, तब वो स्वयं से, अपनी रचना और उस रचना के तंत्र से सर्वसम होकर ही रहते हैं, और ऐसी दशा में वो वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में, तैंतीसवें देवता, प्रजापति कहलाते हैं I
  • और जब वही पितामह ब्रह्म अपने जीव जगत स्वरूप में तमोगुण को धारण करके आते हैं, तब वही विश्वरूप ब्रह्म कहलाते हैं I

 

  • वैष्णव मार्गों में प्रजापति, हिरण्यगर्भ और कार्य ब्रह्म का नाता,

अब उकार के एक और बिंदु पर प्रकाश डालने के लिए आगे बढ़ता हूँ…

वैष्णवगण…

  • उस विशुद्ध सत्त्व को धारण किए हुए, हीरे के समान प्रकाश वाले सर्वसम प्रजापति को ही क्षीरोदक्शायी विष्णु या परमात्मा कहते हैं I
  • हिरण्यगर्भ ब्रह्म को ही सूर्य नारायण, और गर्भोदकशायी विष्णु कहते हैं, जिनका वर्ण स्वर्मिण है I
  • और इसके अतिरिक्त, कार्य ब्रह्म को महाविष्णु और करनोदकशायी भी कहते हैं, जो लाल वर्ण के होते हैं I

 

अब ध्यान देना…

जब हीरे के समान प्रकाशित, तैंतीस कोटि देवताओं में तैंतीसवें देवता, जो सर्वसम चतुर्मुखा प्रजापति हैं, एक सुनहरे वर्ण में स्वयं अभिव्यक्त होते हैं, तो ऐसी अभिव्यक्ति के पश्चात ही वो सर्वसम प्रजापति, हिरण्यगर्भ कहलाते हैं I

वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में तैंतीसवें देवता, सर्वसम चतुर्मुखा प्रजापति को ही वैष्णवगण क्षीरोदक्शायी विष्णु या परमात्मा कहते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

उन हिरण्यगर्भ से ही आदित्यों, सूर्यादि की अभिव्यक्ति होती है, जो ॐ के तृतीय बीज शब्द, अर्थात मकार नमक दशा और सिद्धि का अंग होती है I

इस मकार को आगे की किसी अध्याय में बतलाऊँगा I और उन हिरण्यगर्भ ब्रह्म को ही वैष्णवगण, सूर्य नारायण और गर्भोदकशायी विष्णु कहते हैं I

यही कारण है, कि गर्भ रूपी सूर्य से ही सभी गृह उत्पन्न हुए थे I सूर्य और ग्रहों के उत्पन्न होने की गणना के लिंक नीचे डाल रहा हूँ I लेकिन यह गणना कालचक्र विज्ञान की है, जो कलियुग की काली काय के प्रभाव के कारण, अब लगभग लुप्त हो चुका है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और इसके पश्चात, जब हिरण्यगर्भ ब्रह्म स्वयं को रचैता के स्वरूप में स्वयं अभिव्यक्त करते हैं, अर्थात वो उत्पत्ति कृत्य को धारण करते हैं (या रचना का कार्य करते हैं), तो वही हिरण्यगर्भ, रजोगुणी होकर, अर्थात लाल रंग के होकर ही ऐसा कर पाते हैं I

हिरण्यगर्भ ब्रह्म के ऐसे रजोगुणी लाल रंग के स्वरूप को ही कार्य ब्रह्म कहा गया है I और वो कार्य ब्रह्म को ही वैष्णवगण, महाविष्णु और करनोदकशायीविष्णु कहते हैं I

और इस अध्याय के प्रथम चित्र में, उन्ही रजोगुणी, लाल रंग के कार्य ब्रह्म (अर्थात, वैष्णवों के महाविष्णु और करनोदकशायी विष्णु) को दर्शाया गया है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और उन लाल रंग के रजोगुणी कार्य ब्रह्म के भीतर, अर्थात कार्य ब्रह्म के भीतर, चमकदार सुनहरे रंग के हिरण्यगर्भ होते है, जैसा इस अध्याय के प्रथम चित्र में भी दर्शाया गया है I

और इसके अतिरिक्त, उन चमकदार हिरण्यगर्भ ब्रह्म के भीतर या मूल में, वो सर्वसम प्रजापति होते हैं, जो हीरे के समान होते हैं, और जैसे इस अध्याय के प्रथम चित्र में भी दिखाया गया है I

तो उकार साक्षात्कार में, यह था प्रजापति, हिरण्यगर्भ और कार्य ब्रह्म का वैष्णव मार्ग से नाता I

इस नाते से एक बात तो स्पष्ट होती ही है, कि वैष्णवों के श्री विष्णु के यह तीन स्वरूप, वेदों के प्रजापति, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म ही हैं I बस इन सबके नामों में अंतर है, नाकि इन सब की वास्तविकता में I

अपने ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर बस कर, जो योगी उकार को जाता है, वो वैसा ही साक्षात्कार करता है… जैसा यहाँ बताया गया है I

 

  • उकार मार्ग में प्रजापति, हिरण्यगर्भ और कार्य ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप,

अब तक बताई गई बातों का आलम्बन लेके और भी आगे बढ़ता हूँ…

इस अध्याय के प्रथम चित्र में दिखाया गया ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष का उकार,  जैसा होता है, वो अब बता रहा हूँ…

  • बाहर से कार्य ब्रह्म I
  • मध्य से हिरण्यगर्भ I
  • और अपने मूल और अमूल गंतव्य, दोनों से ही, वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में प्रजापति I

और क्यूंकि उकार साक्षात्कार की मध्यदशा में हिरण्यगर्भ ही होते हैं, इसलिए योगीजनों ने उकार को हिरण्यगर्भ कहा गया था I

 

तो अब उकार साक्षात्कार में जैसा होता है, वो अब बता रहा हूँ…

  • मूल और अमूल गंतव्य, दोनों में प्रजापति, … अर्थात वैष्णवों के क्षीरोदक्शायीविष्णु या परमात्मा I
  • स्वयंप्रकट स्वरूप में हिरण्यगर्भ, … अर्थात वैष्णवों के सूर्य नारायण और गर्भोदकशायीविष्णु I
  • ब्रह्माण्डीय कर्मों में कार्य ब्रह्म… अर्थात वैष्णवों के महाविष्णु और करनोदकशायीविष्णु I

 

और इन तीनों का नाता जैसा होता है, वो अब बता रहा हूँ…

  • रजोगुणी कार्य ब्रह्म का नाता तत्पुरुष ब्रह्म और सद्योजात ब्रह्म से है, और जहां सद्योजात ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म हैं I
  • निष्कलंक चेतना और वृत्तिहीन बुद्धि की योगावस्था से संयुक्त हिरण्यगर्भ ब्रह्म की स्वयं अभिव्यक्ति ईशान ब्रह्म से हुई थी I
  • और सर्वसम होने के कारण वही पितामह प्रजापति, रचैता होते हुए भी, अपनी रचना और रचना के तंत्र से अतीत हैं, स्वतंत्र सत्ता हैं, जो वेदों के तैंतीस कोटि देवताओं में, अंतिम दशा या गंतव्य को दर्शाते हुए, तैंतीसवें देवता हैं I

 

उकार का पञ्च विद्या सरस्वती से नाता, …

उकार का योगी जैसा होता है, अब वो बता रहा हूँ …

  • अपनी कर्मेद्रियों के दृष्टिकोण से, कर्मों में कार्य ब्रह्म, अर्थात सर्वत्र और विशुद्ध कर्मपथ गामी I
  • ज्ञानेन्द्रियों के दृष्टिकोण से, अपनी बुद्धि और ज्ञान में सबको अपने भीतर समाया हुआ, अर्थात निष्कलंक ज्ञान मार्गी I
  • अपने मन से पूर्ण संन्यासी, अर्थात सर्वत्र का त्यागी और जो स्वयं सहित, इस समस्त जीव जगत को उसके अपने सर्वव्याप्त साक्षी भाव में ही देखता है I
  • अपने चित्त से संस्कार रहित, अर्थात जिसने अपने चित्त का निरोध कर लिया है I
  • अपने अहम् से (अर्थात अहंकार से) विशुद्ध, अर्थात जिसका अहम् सर्वव्यापत भेदरहित हो चुका है I
  • और अपने प्राणों के दृष्टिकोण से, सार्वभौम शक्ति, अर्थात जिसके भीतर प्राण शक्ति ही उसकी आत्मा रूपी ब्रह्म की अर्धांगिनी स्वरूप में हैं I

ऐसे योगी की प्राणशक्ति भी प्रजापति में ही विलीन होके, प्रजापति के समान सर्वसम होके, हीरे के समान प्रकाशमान होती है I ऐसे योगी के पञ्च प्राणों और पञ्च उपप्राणों के भेद भी समाप्त होते हैं I

जब ऐसा होता है, तब उस योगी के प्राणों के तारतम्य भी समाप्त होता हैं, जिसके पश्चात वो अपने शरीर के भीतर ही, अपने प्राण हीरे जैसे प्रकाश रूप में देखता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी के प्राण ऐसे हो जाते हैं, उसने ही…

  • ऐसे योगी के भीतर जो ब्रह्माण्ड होता है, वो सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में होता है, जो उस योगी के आत्मस्वरूप सर्वेश्वर का साम्राज्य और उन्ही सर्वेश्वर की पीठ भी होता है, और जो वैदिक भारत कहलाता है, और जिसकी दिव्यता और शक्ति, माँ भारती सरस्वती (देवी भारती (भारती विद्या या देवी भारती) होती हैं I

ऐसे योगी की काया के भीतर उस भारत रूपी सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड के सम्राट, सर्वेश्वर महाब्रह्म प्रजापति ही होते हैं, जो उन प्रजापति के ही पञ्च ब्रह्म स्वरूप में होते हैं, और जिनमें वेद चतुष्टय सहित, पीठ चतुष्टय, धाम चतुष्टय और पुर्यष्टक भी प्रकाशित हो रहे होते हैं I

  • ऐसा योगी पञ्च विद्या में द्वितीय विद्या, अर्थात देवी शारदा (शारदा विद्या या शारदा सरस्वती) को अपनी काया के भीतर, अपने गुरु रूप में पाता है I

ऐसे योगी के भीतर, उस योगी के गुरु रूप में, माँ शारदा सरस्वती होती हैं I

ऐसे योगी के भीतर के ब्रह्माण्ड के गुरुपिता भी सर्वेश्वर महाब्रह्म के सदानंद ब्रह्मा स्वरूप होते हैं I

  • ऐसे योगी की वाणी में माँ गायत्री गायत्री सरस्वति होती हैं, जो उस योगी की काया के भीतर स्थापित हुए वैदिक वाङ्मय की वेदमाता होती हैं I

इसके साथ साथ, वही गायत्री विद्या उस योगी की काया के भीतर बसी हुई दिव्यताओं और देवताओं की आदिमाता, देवमाता भी होती हैं I

वही माँ गायत्री, उस योगी की काया के भीतर, सूक्ष्म रूप में बसे हुए वेद चतुष्टय और मठ चतुष्टय की दिव्यता रूप में भी साक्षात्कार होती हैं I

और इसके साथ साथ, वही गायत्री सरस्वति उस योगी की काया के भीतर, एक निर्गुण प्रकाश रूप में भी साक्षात्कार होती हैं, जो सर्वव्यापक निरंग जल के समान होता है, और जो वैदिक वाङ्मय में निर्गुण निराकार कहलाया गया है I

वैसे एक बात बता दूं, कि निर्गुण वो होता है जो सबको प्रकाशित करता हुआ भी, सबमें और सबके परे, छिपा हुआ रहता है I ऐसा होने के कारण ही, इस महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, बस मुट्ठी भर योगी ही उस निर्गुण को साक्षात्कार कर पाए हैं I

वही पञ्च मुखा गायत्री उस योगी के भीतर बसे हुए पञ्च देवों की सार्वभौम शक्ति रूप में होती हैं I इसलिए यदि कोई योगी गायत्री साधना के शिखर पर ही विराजमान हो जाएगा, तो ऐसा गायत्री योगी, पञ्च कृत्यों (पञ्च कृत्य) का धारक भी हो सकता है I

जो योगी पाँचों कृत्यों में ही समाया हुआ, उन पञ्च कृत्यों का समान रूप में धारक होता है, उसे ही अतिमानव कहा जाता है I अतिमानव नामक सिद्धि ही गायत्री साधना का गंतव्य है I

और जो योगी, इन पञ्च कृत्यों में से, एक या एक से अधिक का ही धारक होता है, अर्थात उसने पाँचों कृत्यों को सिद्ध नहीं किया होता है, उसको ही महामानव नामक श्रेणी में रखा जाता है I  यह महामानव नामक सिद्धि भी गायत्री विद्या सरस्वती साधना के अंतर्गत ही आती है I

  • ऐसे योगी की दृष्टि और शब्द में माँ सावित्री सरस्वती होती, जो उस योगी के त्रिनेत्र क्षेत्र के समीप, अर्चन, शब्दात्मक, सगुण साकार और सगुण निराकार स्वरूपों के साथ साथ, एक निरंग झिल्ली के समान, निर्गुण स्वरूप में भी होती हैं I

ऐसे पूर्ण स्वरूप में माँ सावित्री विद्या, उस योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में बसे हुए उकार के लिंगात्मक स्वरूप की एकमात्र दिव्यता, अर्थात अर्धांगिनी शक्ति भी होती हैं, और जो अकार (या अकार की देवी) कहलाती हैं, जिनके बारे में पूर्व के अध्याय में बताया गया था I

उकार का यही लिंगात्मक स्वरूप इस अध्याय के प्रथम चित्र में दिखलाया है I

  • और ऐसे योगी के गंतव्य में, अर्थात ब्रह्मरंध्र में, माँ ब्रह्माणी सरस्वती ही होती हैं, जो सगुण साकार, और सगुण निराकार स्वरूपों के साथ साथ, एक निरंग झिल्ली के समान, निर्गुण स्वरूप में भी होती हैं I

और इन बताए गए स्वरूपों के अतिरिक्त, वही माँ ब्रह्माणी विद्या (अर्थात ब्रह्माणी सरस्वती) उस योगी में मस्तिष्क के ऊपर के भाग में एक “उलटे लटके हुए” हिरण्यगर्भात्मक लिंग स्वरूप की दिव्यता भी होती हैं I

यह हिरण्यगर्भात्मक लिंग इस प्रकार से उल्टा होता है, जैसे योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर के आकाश तत्त्व में यह उल्टा लटका हुआ है I इसके बारे में एक बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

 

अब ध्यान देना …

वैसे तो समस्त पञ्च विद्याओं के मार्गों में, उन सभी पञ्च विद्याओं के सगुण और निर्गुण स्वरूपों के साक्षात्कार के साथ साथ, साकार और निराकार, सगुण-निर्गुण और लिंगात्मक स्वरूपों के साक्षात्कार भी होते हैं…, लेकिन यहाँ पर और इस पूरे ग्रंथ में, मैंने जानबूझ कर इस बिंदु को विस्तारपूर्वक नहीं बताया I

इसका कारण है, कि कुछ योग बिन्दुओं को साधकगण अपने साक्षात्कारों में ही जाना करते हैं…, न कि किसी ग्रंथ से I

 

पृथक मार्गों में उकार के पृथक नाम, … अमिताभ बुद्ध कौन, धर्मकाया क्या, अहुरा मज़्दा कौन, पीली कचिना क्या, अमीदा बुद्ध कौन,

उकार, जो हिरण्यगर्भ हैं, जो ब्रह्मा भी कहलाते हैं, जो वेदान्तियों का सद्योजात ब्रह्म और जो पाशुपत मार्ग के राजयोगियों के सदाशिव का तत्पुरुष मुख भी हैं…, उन्हें ही महेश्वर कहा जाता है I

जो महेश्वर हैं, वो ही सर्वोच्च योगी हैं, योग स्वामी हैं, समस्त योग तंत्रों के मूल और तत्त्व हैं I और उन्हीं महेश्वर को योगेश्वर, योगीराज, योगर्षि और योगसम्राट भी कहा जाता है I

उकार ही हिरण्यगर्भ हैं, और कार्य ब्रह्म भी हैं, और यह दोनों उन्ही सर्वसम प्रजापति की ही पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं I

हिरण्यगर्भ स्वरूप में उकार अनाभिमानी देवता हैं, और कार्य ब्रह्म स्वरूप में वही उकार, अभिमानी देवता होते हैं I

लेकिन जब हिरयणागर्भ ब्रह्म को ही कार्य ब्रह्म माना जाता है, तब हिरण्यगर्भ अभिमानी और अनाभिमानी दोनों स्वरूपों में होते हैं I

हिरण्यगर्भ ब्रह्म जब रजोगुणी होते हैं, तो वही हिरण्यगर्भ, कार्य ब्रह्म कहलाते हैं, इसलिए इस दृष्टिकोण से हिरण्यगर्भ ही कार्य ब्रह्म हैं I

 

अब उन्ही उकार या महेश्वर या योगेश्वर के और कुछ बिंदुओं को बतलाता हूँ…

  • बौद्ध मार्ग में, उकार को ही अमिताभ बुद्ध कहा गया है I अमिताभ शब्द का अर्थ होता है, वो आभा (या प्रकाश) जो अमिट हो, निरंतर हो, निराकार में व्याप्त हो इसलिए ब्रह्माण्ड में व्यापी हो I
  • और इसी बौद्ध मार्ग में, उकार को धर्मकाया भी कहा गया है I
  • ज़ोरोस्ट्रियनिस्म या पारसी मार्ग में, इसी उकार को अहुरा मज़्दा भी कहते हैं I अहुरा मज़्दा का भी वही अर्थ होता है, जो अमिताभ शब्द का बतलाया गया है I
  • इन्ही उकार को जापान में अमीदा बुद्ध भी कहा जाता है, जिसका अर्थ भी वही होता है, जो अमिताभ शब्द का बतलाया गया है I
  • इन्ही उकार को कुछ पुरातन दक्षिण अमरीकी मूल सभ्यताओं में, सोमप्रकाश (Homo-luminous) भी कहा जाता है I
  • और उत्तरी अमेरिका की कुछ पुरातन मूल सभ्यताओं में, इन्ही उकार के सगुण साकार स्वरूप को पीली कचिना (yellow Kachina) कहा जाता है I

 

हिरण्यगर्भ ब्रह्म का नाड़ी स्वरूप, … हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी,

अब आगे बढ़ता हूँ, और उस नाड़ी को बताता हूँ, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म से संबंध रखती है…

  • जब सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर की ओर चली जाती है, तब वो सुषुम्ना नाड़ी स्वर्ण के जैसी चमकदार होती है I इस अवस्था में, इसी नाड़ी को सिद्धों ने वज्रदण्ड और वज्रदण्ड चक्र भी कहा है I
  • यह सुनहरी नाड़ी, हिरण्यगर्भ के नाड़ी रूप को दर्शाती है I
  • इस नाड़ी से सम्बंधित उत्कर्ष मार्ग और उस उत्कर्ष मार्ग का गंतव्य, जो कुछ गंतव्य मार्गी ब्राह्मणों के ज्ञान मार्ग में है, वही गंतव्य क्षत्रियों के अस्त्र मार्ग में भी है I और वही गंतव्य वैश्यों के पारम्परिक अर्थ मार्ग और शूद्रों के पारम्परिक सेवा मार्ग में होता है I

 

इसीलिए ब्रह्मद्रष्टा वेद मनीषी कह गए, कि…

वर्णों और उनके कर्मों में तारतम्य होते हुए भी, उनके गंतव्य में तारतम्य नहीं है I

 

इसका कारण है, कि वर्णों और उनके कर्मों में तारतम्य होते हुए भी, उस गंतव्य से किसी भी वर्ण को वंचित नहीं रखा गया है I

वो गंतव्य जिसके बारे में वेद मनीषीयों ने बताया है, इन्ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म को दर्शाता है, जिनके स्वर्णिम नाड़ी स्वरूप को यहां बताया जा रहा है, और जिनकी क्रियामय दशा को ही कार्य ब्रह्म या उकार कहा जाता है I

लेकिन, जो ब्राह्मण क्षत्रिय या क्षत्रिय ब्राह्मण वर्णों का होता है, उसके लिए ज्ञान ही अस्त्र होता है, और अस्त्र ही ज्ञान I

लेकिन जो ब्राह्मण वैश्य और वैश्य ब्राह्मण होता है, उसके लिए ज्ञान, अर्थ नहीं होता I ऐसा होने का कारण है, कि ज्ञान जो गंतव्य सत्ता है, वो प्रत्यक्ष और प्ररोक्ष, दोनों स्वरूपों में ही व्यापार से परे है I और यही बात योग (अर्थात मूल सत्ता) पर भी लागू होती है I लेकिन योग तो महेश्वर (योगेश्वर) ही हैं, इसलिए उनके बिन्दुओं का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में, व्यापार नहीं होना चाहिए I

इसी नाड़ी की व्यक्त दिव्यता के अस्त्र स्वरूप को वज्रास्त्र कहते हैं, जो देवराज इंद्र का अस्त्र है I इसी नाड़ी की मूल दिव्यता के अस्त्र स्वरूप को ब्रह्मास्त्र कहते हैं I इसी नाड़ी की व्यक्त दिव्यता के अस्त्र स्वरूप को ब्रह्माण्डास्त्र कहते हैं I और इसी नाड़ी के सार्वभौम दिव्यता के अस्त्र स्वरूप को ब्रह्मशिरास्त्र कहते हैं I और इसी नाड़ी के तारक स्वरूप को, शिव तारक मंत्र या राम नाद कहते हैं, जिसके बारे में एक बाद की अध्याय श्रंखला में बताया जाएगा I

  • इस सुनहरे वर्ण की सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक चमकदार हीरे जैसे प्रकाश की नाड़ी होती है I योगमार्ग में इस नाड़ी का बहुत बड़ा महत्व होता है I

बौद्ध पंथ का वज्रयान मार्ग भी इसी सुनहरी नाड़ी का मार्ग है I

 

हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का भगवान् राम से नाता.

यह चित्र, रा नाद को दर्शाता है, जो साधक के ब्रह्मरंध्र से ऊपर जो एक सुनहरी नाड़ी होती है, उसका नाद है I इस नाड़ी को भी इस चित्र में सांकेतिक रूप में दिखाया गया है I

इसके अतिरिक्त यह चित्र सियाराम के स्वयंवर को भी दर्शाता है, जो आत्ममार्ग में साधक की स्थूल काया के भीतर ही होता है, और जिसमे राम भगवान् और माँ सीता का साधक की काया के भीतर ही योग होता है I

 

रा नाद, राम नाद, राम का शब्द, सीता राम का साधक के शरीर में योग, सियाराम योगावस्था
रा नाद, राम नाद, राम का शब्द, सीता राम का साधक के शरीर में योग, सियाराम योगावस्था

 

 

यही चित्र रकार मार्ग को भी दर्शाता है, जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

जब साधक के शरीर के भीतर ही, नीले वर्ण के भगवान राम से जब श्वेत वर्ण की आदिशक्ति स्वरूप सीता माता योग लगाती हैं, तब साधक के शरीर के भीतर जो दशा बनती है, वही इस चित्र में दिखलाई गई है I और यही चित्र शक्ति शिव योग को भी दर्शाता है I

इस चित्र के नीचे के भाग में, नीले वर्ण की दशा, साधक का शरीर है और श्वेत वर्ण का प्रकाश जो साधक के शरीर के नीचे से, ऊपर की ओर जाता है, वो प्राणमय कोष है, जिसमे प्राण समतावादी ही चुके हैं, इसलिए श्वेत वर्ण के दिखाए गए हैं I यह प्राण मूलाधार चक्र से ऊपर की ओर, अर्थात सहस्रार चक्र की ओर जा रहे हैं I

इस चित्र के ऊपर के भाग में, जो श्वेत कमल के पत्ते दिखाए गए हैं, वो सहस्रदल कमल है (लेकिन इस कमल के केवल दस पत्ते ही दिखाए गए हैं) I

इस चित्र के ऊपर के भाग में, जो सोने के वर्ण की नाड़ी है, वो हिरण्यगर्भ नाड़ी है, जिसके बारे में यहाँ पर बात हो रही है, और जिसको वज्रदण्ड और वज्रदण्ड चक्र भी कहा जाता है I

इस चित्र के ऊपर के भाग में, जो योगी दिखाए गए हैं, वो मेरे इस जन्म के सूक्ष्म गुरु, आदि शंकराचार्य हैं, जिनके कहने पर मैं इस मार्ग पर गया था I

अब आगे बढ़ता हूँ…

 

  • हिरण्यगर्भ नाड़ी का बीजशब्द, … हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी का शब्दात्मक स्वरूप हिरण्यगर्भ नाड़ी का भगवान् राम से नाता,हिरण्यगर्भ नाड़ी और भगवान् राम,

अब इस सुनहरी नाड़ी या सोने की नाड़ी, जो ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर की ओर जा रही होती है, उसके शब्द को बतलाता हूँ…

उस सुनहरी हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी में, जिसको वज्रदण्ड कहा जाता है, और जो मस्तिष्क के ऊपर के भाग में बसे हुए ब्रह्मरंध्र चक्र से भी ऊपर की दशा में होती है, उसमें रा नाद सुनाई देता है I

यह रा नाद ऐसा होता है…,  रररररराआआआआ I

लेकिन इस रा नाद और उसके रकार मार्ग के बारे में विस्तारपूर्वक किसी बाद के अध्याय में बतलाऊँगा, क्यूंकि यह दशा इस अध्याय के बिन्दुओं से आगे की है I

जब योगी की चेतना, इस सोने की नाड़ी में प्रवेश करती है, तो उस योगी को जो शब्द सुनाई देता है, वो रा शब्द होता है, जिसको रकार भी कहा जाता है I

इसीलिए, उस सुनहरी नाड़ी का शब्द या नाद, रा है, और इसका मार्ग रकार कहलाता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और जब योगी की चेतना इस सुनहरी नाड़ी के भीतर बसकर, इस सुनहरी नाड़ी का रा शब्द सुन रही होती है, तब उसको सुदूर से आता हुआ एक और शब्द भी सुनाई देता है I

यह सुदूर से आता हुआ शब्द मममममम का होता है, जो मकार नामक मार्ग को दर्शाता है, और जिसे ब्रह्मनाद भी कहते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इसी रा नाद और ममममममम नाद की योगावस्था को राम कहते हैं I

इस हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी में, यह रा शब्द और ममममममम शब्द, दोनों एक साथ ही सुनाई देते हैं I

इसलिए, जब रकार नामक नाद का मकार नामक नाद से योग होता है, तो राम सिद्धि को पाया जाता है I

राम शब्द के मूल में रकार और मकार का योग है I जो साधक इस योगावस्था को अपनी काया के भीतर पा गया, वो साधक उसके अपने आत्मिक योगमार्ग में सम्पूर्ण रामायण को ही अपनी काया के भीतर चलता हुआ देखेगा I

इस सिद्धि में, भगवान् राम, नील वर्ण के शब्दात्मक स्वरूप में होते हैं, और माँ सीता श्वेत वर्ण की, उसी शब्द की ऊर्जा और दिव्यता होती हैं I और ऐसी दशा में, वो राम का शब्द ही ब्रह्मात्मक होता है, अर्थात समस्त जीव जगत का शब्दात्मा, या शब्द रुपी आत्मा होता है I

इस राम शब्द में, रा शब्द उस सोने के समान नाड़ी का है, और मममम शब्द मकार का है, जिसके बारे में एक बाद के अध्याय में बताया जाएगा I मकार ही ब्रह्मनाद होता है I

ब्रह्मनाद, पुरुष और प्रकृति, दोनों का ही होता है I नाद रूप में वो प्रकृति का होता है, और गंतव्य रूप में वो ब्रह्म या पुरुष को ही दर्शाता है I

जिस भी योगी ने उसके अपने ब्रह्मरंध्र में रा शब्द और मममममम शब्द दोनों एक साथ सुन लिए, वो योगी इस राम शब्द का धारक भी हो जाता है I

यह राम शब्द, गुरु शिव का तारक मंत्र भी है, इसलिए जिस योगी ने इसका साक्षात्कार किया है, वो योगी शिव तारक मंत्र का सगुण साकार स्वरूप (या शरीरी रूप) भी होता है I ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में, वो योगी ऐसे भी जाना जाता है I

तो अब आत्ममार्ग के दृष्टिकोण से, मैंने हिरण्यगर्भ ब्रह्म का राम भगवान् के साथ संबंध, कुछ स्पष्ट और कुछ सांकेतिक रूप में बतला दिया I और ऐसे स्वरूप में भगवान राम का नाता, हिरण्यगर्भ ब्रह्म के रजोगुणी स्वरूप, अर्थात कार्य ब्रह्म स्वरूप से भी  होता है I

 

 

  • हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का राजा जनक और माँ सीता से नाता,

 

नाभि लिंग और माँ सीता
नाभि लिंग और माँ सीता, नाभिलिंग और माँ सीता

 

यह चित्र नाभि लिंग (अर्थात नाभि क्षेत्र के लिंग का है) …

 

अब ऐसे योगी का संबंध माता सीता के साथ बतलाता हूँ …

मेरुदंड के नीचे के भाग में, एक चार पत्तों वाला कमल दल होता है, जो मूलाधार चक्र कहलाता है, और जिसके चारों पत्ते श्वेत वर्ण के होते हैं, और जिसके मध्य में, एक लहु के समान लाल बिंदु रूप में, तत्पुरुष ब्रह्म निवास करते हैं I

मणिपुर चक्र में, जिसका वर्ण पीला होता है, उसमें सद्योजात (या हिरण्यगर्भ) ब्रह्म निवास करते हैं I

जब हिरण्यगर्भ और तत्पुरुष ब्रह्म का योग होता है, तब उस योगदशा को कार्य ब्रह्म और सदाशिव का तत्पुरुष मुख कहते हैं I माँ सीता का प्रादुर्भाव उनके पिता राजा जनक से हुआ था, जिनका नाम भी कार्य ब्रह्म का ही वाचक है और जिनका नाता मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से होता है, और जिसका महाभूत पृथ्वी ही है I

और वो माँ सीता भगवान् राम से योग लगाने के पश्चात, अंततः इसी पृथ्वी महाभूत में समायी भी थी I

इसी मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र में, माता सीता श्वेत रूप में रहती हैं… इन दोनों चक्रों के पत्तों की श्वेत ऊर्जा स्वरूप में I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

नाभि क्षेत्र में, लेकिन नाभि के पीछे की ओर और मेरुदंड के समीप, एक स्थान होता है जिसमें साधक के शरीर के भीतर की तैंतीस कोटि नाड़ियाँ आपस में जुड़ती हैं I

जिस स्थान पर यह नाड़ियां जुड़ती हैं, वहां एक शिवलिंगाकार आकृति होती है, जो साधक के शरीर के पीछे की ओर (अर्थात मेरुदण्ड की ओर) झुकी हुई होती है I

ऐसा पीछे या मेरुदंड की ओर झुके होने के कारण, वो श्वेत वर्ण का शिवलिंग ऊपर से थोड़ा टेढ़ा होता है I

इसी को नाभिलिंग कहा जाता है, जहाँ तैंतीस कोटि नाड़ियों की दिव्यताएं, जो साधक के शरीर के भीतर ही बसे हुए तैंतीस कोटि देवी देवताओं को दर्शाती हैं… उन दिव्यताओं का समतावादी, अर्थात उनके सगुण निर्गुण स्वरूप में योग होता है I

यह सगुण निर्गुण दशा श्वेत वर्ण की ही होती है, जो प्रकृति के नवम कोष, अर्थात परा प्रकृति (अदिशक्ति) से ही सम्बंधित होती है I

इस नाभिलिंग की ऊर्जाएं, मूलतः मूलाधार चक्र से लेकर स्वाधिष्ठान चक्र और मणिपुर चक्र के पत्तों की ही होती हैं, इसलिए अधिकांश मात्रा में यह दिव्यताएं श्वेत वर्ण की होती हैं I और क्यूंकि पूर्व में बताए गए शक्ति शिव योग में इन तीनों चक्रों के पत्तों का वर्ण भी श्वेत ही हो जाता है, इसलिए यहाँ पर इन तीनों चक्रों की ऊर्जाओं को श्वेत ही बताया गया है I इन दिव्यताओं के योग से इस नाभि लिंग का श्वेत वर्ण बनता है I

लेकिन इन तीनो चक्रों की मूल दिव्यता तो देवी भारती सरस्वती ही हैं, इसलिए अपने मूल स्वरूप से यही नाभिलिंग, देवी भारती सरस्वती और उनके पतिदेव, जो भारत नामक ब्रह्म हैं, उन दोनों की योगावस्था का समतावादी लिंगात्मक स्वरूप है I और जहां माँ भारती विद्या, उस मणिका नाड़ी में निवास करती हैं, जो मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्रों को जोड़ती है और जो पीले वर्ण की ही होती है I और जब यह नाभिलिंग साक्षरकार करने की पात्रता आती है, तब यही पीले वर्ण का प्रकाश, जो भारती विद्या सरस्वती का ही है, वह मूलाधार से भी नीचे की ओर दिखाई देता है I और ऐसा होने के पश्चात ही साधक की काया में शिव शक्ति योग सम्पन्न हो पाता है, जिसका नाद भी राम ही होता है I

जब साधक राम नाद को जाने का (अर्थात राम नाद को साक्षात्कार करने का) पात्र बनता है, तब साधक के मूलाधार चक्र और उससे थोड़ा सा नीचे की ओर, बहुत सूक्ष्म पीले वर्ण का प्रकाश स्वयंप्रकट होता है I और ऐसे समय पर यह नाभि का शिवलिंग, पूर्णतः श्वेत वर्ण का हो जाता है, अर्थात पूर्ण सत्त्वगुणी हो जाता है I

ऐसी समय पर इस लिंग को देख कर ऐसा लगता है, जैसे इसपर किसी ने भर भर कर श्वेत वर्ण का चूना डाल दिया है, जिसके कारण इस नाभिलिंग पर श्वेत वर्ण की धूल जैसा कुछ पड़ा हुआ भी दिखाई देता है I ऐसी श्वेत दशा इस लिंग की सत्त्वगुणी अवस्था को दर्शाती है, और यही दशा इस लिंग की पूर्ण समतावादी स्थिति को भी दर्शाती है I

यह लिंग भी माँ सीता का है, और वो भी माँ सीता के उस स्वरूप में, जब वो आदिशक्ति होती हैं, जो श्वेत वर्ण के सत्त्वगुणी आकाश में निवास करती हैं, और जो आकाश, प्रकृति का नवम कोष और परा प्रकृति भी कहलाता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जब साधक की चेतना, राम नाद के साक्षात्कार को जा रही होती है, तब यह नाभि लिंग की दिव्यताएँ भी उस चेतना के साथ, नाभि से ऊपर उठकर, ब्रह्मरंध्र चक्र को पार करके, सुनेहरे वर्ण के वज्रदण्ड में ही चली जाती हैं I

जैसा पूर्व में बताया था…, इस वज्रदण्ड का नाद, राम शब्द का होता है, जो शिव तारक मंत्र भी कहलाता है I इस राम नामक शब्द का संबंध, काशी के भगवान शिव के विश्वनाथ स्वरूप से भी है, और साधक के आंतरिक योगमार्ग में वो काशी भी साधक के भ्रूमध्य के समीप ही होती है I

यह नाभिलिंग, नाभि क्षेत्र से ऊपर उठता हुआ, शिवरंध्र के स्थान से सहस्रार चक्र पार करता है, और वज्रदण्ड में प्रवेश करता है जहाँ रा नाद और ममम नाद अपनी योगावस्था में, राम नाद के स्वरूप में सुनाई देता है I और वज्रदण्ड चक्र से होता हुआ, यह अंततः उस अष्टम चक्र को जाता है, जिसका संकेत अथर्ववेद के दसवें खण्ड के दूसरे सूक्त के एकत्तीसवें मंत्र में दिया हुआ है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

उस समय, जो ब्रह्मनाद सुनाई देता है और जैसा पूर्व में भी बतलाया था, वो इसी नाभि लिंग में समाता जाता है, और इसी नाभि लिंग का ही हो जाता है I

यह नाभि लिंग की दिव्यताएँ जो ब्रह्मरंध्र से ऊपर को जाके, वज्रदण्ड में भगवान् राम के शब्दात्मक स्वरूप से योग करती हैं, अर्थात राम नाद से योग करती है, और अंततः अष्टम चक्र को जाकर, इस चक्र को भी पार कर जाती हैं, वो योग तीन बार होता है I और तीन बार के पश्चात, यह आधी बार और होता है I

इस योगावस्था में बताया हुआ योग जो तीन बार होता है, उसका…

  • पहला शब्द, ख नाद का होता है, जो खकार कहलाता है I
  • दूसरा शब्द, ड नाद का होता है, जो डकार कहलाता है I
  • और तीसरा शब्द, ग नाद का होता है, जो गकार कहलाता है I
  • इन तीनों शब्दों का योग ही, खड़क या खड्ग कहलाता है I इसी को खड़क या खड्ग सिद्धि कहा जाता है, जिसके आदिदेव परमगुरु शिव ही होते हैं I
  • राम शब्द के योगमार्ग में, आत्ममार्गी साधक इसी खड़क नामक अस्त्र को उस अस्त्र के ही शब्दात्मक स्वरूप, अर्थात नाद रूप में पाता है I ब्रह्म की रचना में, नाद ही मूल है, इसलिए यह सिद्धि भी मांत्रिक ही है I
  • आत्मयोग के मार्ग में, यह खड़क या खड्ग नामक अस्त्र, शब्द ब्रह्म स्वरूप का ही है…, न कि किसी स्थूल रूप का I और इस खड्ग नामक अस्त्र के अधिष्टा गुरुशिव ही होते हैं I

और इसके पश्चात, वही खकार नाद जो अदि पराशक्ति को दर्शाता है, उस आधे भाग में पुनः आता है, जिसके बारे में पहले बताया गया था I

 

अब आगे बढ़ता हूँ, और पूर्ण अवतार का खड़क या खड्ग शब्द से संबंध बतलाता हूँ

ऊपर बताए हुए बिन्दु भी वो कारण हैं, कि वेदों में तीन पूर्ण अवतार ही बताए गए हैं, क्यूंकि उन तीनों अवतारों का मूल (अर्थात उनकी शक्ति) एक ही हैं, लेकिन तब भी वो पूर्ण अवतार और उनकी त्रिशक्ति, पृथक नामों से पुकारी गई हैं I

 

इस खडग शब्द के तीन बीजों के अनुसार, उन तीन पूर्ण अवतारों में से…

राम भगवान्…, खकार नाद को दर्शाते थे I

कृष्ण भगवान्…, खकार और डकार, दोनों शब्दों को दर्शाते थे I

और आगामी अवतार (कल्कि भगवान्)…, खकार, डकार और गकार तीनों शब्द को दर्शाएंगे I

और ब्रह्मरंध्र से ऊपर की ओर जो वज्रदण्ड है, और उस वज्रदण्ड से परे जो अष्टम चक्र है, उसमें हुए इस योग के पश्चात, यह नाभि लिंग की दिव्यताएँ पुनः नाभि में आ जाती हैं, अर्थात यह नाभि लिंग की दिव्यताएं पुनः उसी स्थान पर लौट आती हैं, जहाँ से यह दिव्यताएं मस्तिष्क से भी ऊपर बसे हुए वज्रदण्ड और अष्टम चक्र की ओर उठी थी…, राम नाद से योग करने के लिए (क्यूंकि उस सुनहरे वर्ण के हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी रूपी वज्रदण्ड के नाद को ही राम शब्द से कहा जाता है) I

अष्टम चक्र से नीचे की ओर आती हुई यह दिव्यताएं, नाभि में लौट जाती हैं I नाभि में पुनः लौटने के कुछ ही समय में, इस नाभि लिंग की यह दिव्यताएँ, उसी चार पत्तों वाले चक्र, अर्थात मूलाधार चक्र में चली जाती हैं I

 

अब ध्यान देना …

क्यूंकि मैं अब माँ सीता के स्वयंप्रादुर्भाव और स्वयंसमाधि बता रहा हूँ और वो भी आत्मसाधना या आत्मपथ के दृष्टिकोण से…

भगवान् राम श्री विष्णु के पूर्ण अवतार हैं, लेकिन तब भी वो शिवत्व को दर्शाते हैं, जिसके कारण वो राम भगवान्, भद्र भी कहलाते हैं, और जहाँ भद्र नामक शब्द परमगुरु शिव को भी दर्शाता है I इसीलिए, राम नाद ही वो ज्ञानमय चेतनमय और क्रियामय मुक्तिकारक शिव तारक मंत्र है I

और यही भद्र का शब्द, सनातन गुरु श्री विष्णु, को भी दर्शाता है, इसलिए धर्मकारक भी है I

इसलिए राम नाद, गुरु शिव और गुरु विष्णु की उस सनातन योगावस्था को भी दर्शाता है, जो भगवान हरिहर कहलाते हैं I

माँ आदि शक्ति जब भगवान राम से योग लगाने आती हैं, तो वो भूमि अर्थात पृथ्वी महाभूत से जन्म लेती हैं, जिसका नाता मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से भी है I

जैसा पूर्व में बताया था, कि मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र के देवता, कार्य ब्रह्म होते हैं, जो उन जन्मी आदिशक्ति (अर्थात माँ सीता) के पिता भी होते हैं I लेकिन उनके पिता राजा जनक का नाम, हिरयणागर्भ ब्रह्म के ही कार्य ब्रह्म या सृष्टिकर्ता स्वरूप का एक नाम है I

उस कार्य ब्रह्म को ही योगेश्वर कहा जाता है, इसलिए राजा जनक के पास भी कई ऋषि और ऋषि शिष्य आते थे, उस योगेश्वर ब्रह्म, अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति को और उनके योगमार्ग को जानने के लिए… और जहां वह कार्य ब्रह्म, अर्थात योगेश्वर भी सीता माता के पिता, राजा जनक स्वयं ही थे I इसलिए जब कार्य ब्रह्म, राजा जनक के रूप में इस धरा पर आए थे, तब ऋषिगण कहते भी थे, कि यदि इस-इस योग और ज्ञान बिन्दुओं को जानना है, तो राजा जनक के पास जाओ I इसका कारण भी वही था, कि कार्य ब्रह्म ही योगेश्वर होते हैं, और जो त्रेतायुग में राजा जनक के रूप में आए थे I

जब भी हिरण्यगर्भ ब्रह्म अपनी कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति में, किसी शरीरी रूप में लौट के आते हैं, तो वो केवल ब्राह्मण क्षत्रिय या क्षत्रिय ब्राह्मण वर्णों में ही आ सकते हैं I राजा जनक भी इन्ही दो वर्णों में से, एक में लौट के आए थे I

 

अब ध्यान देना क्यूंकि मैं कुछ ऐसे बिंदु बता रहा हूँ, जो केवल आत्मपथ में ही साक्षात्कार होते हैं…

हिरण्यगर्भ ब्रह्म संस्कार रहित चित्त और वृत्तिहीन बुद्धि की योगावस्था होती हैं…, ऐसा पूर्व में बतलाया जा चुका है I

इसलिए हिरण्यगर्भ ब्रह्म, शिव की चेतना शक्ति और ज्ञान शक्ति के योग को दर्शाते हैं, जिसके कारण वो पुरुषोत्तम भगवान् कहलाते हैं, और जिनके भीतर ही यह समस्त जीव जगत बसा होता है I और इसके साथ साथ, वो पुरुषोत्तम भगवान् भी अपने समानरूप में उस समस्त जीव जगत के भीतर भी बसे होते है, उसी जीव जगत के सर्वव्यापक आत्माराम के स्वरूप में I

और कार्य ब्रह्म, हिरण्यगर्भ ब्रह्म की ही रजोगुणी, अर्थात क्रियात्मक सृष्टिकर्ता अभिव्यक्ति हैं, जो उन्ही शिव की क्रिया शक्ति को दर्शाते है I और क्यूँकि कार्य ब्रह्म भी हिरण्यगर्भ ब्रह्म के रजोगुणी स्वरूप ही हैं, इसलिए कार्य ब्रह्म में हिरण्यगर्भ ब्रह्म की चित्त शक्ति और ज्ञान शक्ति भी है ही I ऐसा होने के कारण ही वह कार्य ब्रह्म, त्रिशक्ति को दर्शाते हैं (अर्थात क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और चेतनशक्ति, तीनों की योगदशा को दर्शाते हैं) और ऐसा होने के कारण ही कार्य ब्रह्म, महेश्वर और योगेश्वर कहलाते हैं I

इसी क्रिया शक्ति का आलम्बन लेके, कार्य ब्रह्म अपनी पुत्री, माँ त्रिकाली का स्वयं उदय करते हैं I इसीलिए, वेद मनीषी कह गए, कि कालचक्र की अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म (अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्म के रचैता स्वरूप या कार्य ब्रह्म स्वरूप) से हुई थी I जो शक्ति त्रिकाल के समस्त कालों में समान रूप में बसी होती हैं, उनकी अभिव्यक्ति को ही अदिशक्ति कहा जाता है, और जो साधक के नाभि कमल के समीप अपने ही लिंगात्मक रूप में निवास करती हैं, और उस साधक की नाभि क्षेत्र में, साधक की काया के भीतर नाभिलिंग में ही उदय होती हैं I

उस रामायण में जो आत्मपथगामी साधक के शरीर में भी चलित होती है, वो कार्य ब्रह्म ही राजा जनक थे, और वो कार्य ब्रह्म की सुपुत्री, माँ त्रिकाली स्वरूप आदिशक्ति ही माँ सीता के रूप में स्वयंउत्पन्न हुई थीं I

ऐसा ही आत्मपथगामी साधक के शरीर के भीतर भी होता है, जो एक लिंग रूप में होता है, जो नाभिलिंग कहलाता है और जैसा इस अध्याय के एक चित्र में भी दिखाया गया है I

कुछ वेद मनीषी, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म को एक ही मानते हैं I ऐसा भी इसलिए है क्यूंकि एक, दुसरे की अभिव्यक्ति है… और दूसरा, एक के भीतर ही बसा हुआ है I

कार्य ब्रह्म, हिरण्यगर्भ की अभिव्यक्ति हैं, और इसके साथ साथ हिरण्यगर्भ ब्रह्म, कार्य ब्रह्म के भीतर वैसे ही बसे हुए हैं, जैसे इस अध्याय के प्रथम चित्र में भी दिखाया गया है I

रामायण के समय पर वो त्रिकाली शक्ति धारण करके, आदिशक्ति ही माँ सीता के रूप में आई थी I

और ब्रह्माण्ड की रचना के समय पर, वही कार्य ब्रह्म, प्रकृति के नवम कोष को सर्वप्रथम स्वयं उत्पन्न करते हैं, जिसकी दिव्यता (या शक्ति) को ही आदिशक्ति कहते हैं I

वो अदि शक्ति ही कार्य ब्रह्म (या उकार) की पुत्री, त्रिकाली शक्ति स्वरूप में अभिव्यक्त होती हैं Iजो रामायण के समय पर राजा जनक थे, वह भी कार्य ब्रह्म के शरीरी स्वरूप ही थे, और उनकी सुपुत्री पुरोषत्तम भगवन की अर्धांगिनी, माँ सीता के रूप में लौटी थी I

और उसी रामायण के समय पर वही हिरण्यगर्भ ब्रह्म, जिनकी नाड़ी वज्रदण्ड है, और जिसका नाद राम है, पुरुषोत्तम भगवान् के स्वरूप में लौटे थे I

और उसी रामायण के समय पर वो कार्य ब्रह्म, जो इस जीव जगत के भीतर बसे हुए हैं और जिनके भीतर यह जीव जगत भी बसा हुआ है, जिनका नाद उकार है, जो सृष्टिकर्ता भगवान् ही हैं, जिनका वास्तविक स्वरूप पञ्च ब्रह्म ही है, जो महाब्रह्म भी कहलाते हैं, और जिनकी महाब्रह्माण्डीय उपाधि योगेश्वर है, वो उन राजा जनक के रूप में लौटे थे, जिनके उस समय के शिष्यों की लंबी सूची में, कई ऋषिगण, देवगणादि भी थे I

 

आगे बढ़ता हूँ…

लेकिन इन सभी बातों के मूल में, जो सार्वभौम ब्रह्माण्डीय दिव्यता है, उन्हें पञ्च विद्या तंत्र में, माँ भारती कहा जाता है I और यही बात महाभारत के कालखंड के सभी पात्रों पर भी लागू होती है I

क्यूंकि मैं पञ्च विद्या मार्गी हूँ, इसलिए मेरे स्वयं ही स्वयं में, के मार्ग और उसके साक्षात्कारों में…, ऐसा ही है I

स्वयं ही स्वयं की यात्रा में, पृथक मार्गों में जाके, उनके बारे में लिखते लिखते, उनके चित्र बनाते बनाते, क्यूंकि पूर्व जन्मों की शेष गुरुदक्षिणा के अनुसार मुझे इस जन्म में ऐसा ही करना था, जब मैंने उस मूलमार्ग की दिव्यता को अपनी इस नश्वर मानव रूपी काया के भीतर ही खोजा, तो उन सभी के अमूल गंतव्य में, मैंने पञ्च विद्या (अर्थात पञ्च सरस्वती) को ही पाया I

और मैं जान गया, कि त्रिकालों के किसी भी कालखंड में, चाहे कोई साधक किसी भी मार्ग में हो, उस मार्ग की मूल दिव्यता, माँ सरस्वती ही हैं I

ब्रह्म और उनकी रचना के समस्त बिंदु, उनके अपने मूल और उनके अपने अमूल गंतव्य… दोनों से… सारस्वत ही है I

ब्रह्म और उनकी रचना में, माँ सरस्वती के सिवा, कोई और मूल दिव्यता है ही नहीं… न तो कभी पूर्व में थी, और न ही कभी किसी भविष्य में हो पाएगी I

इसलिए, अपने मूल और अमूल गंतव्य, दोनों से ही यह समस्त जीव जगत, सदा ही सारस्वत था, सारस्वत है और आगे भी सारस्वत ही रहेगा I

और ऐसा तब भी होगा, जब विश्वकर्मा ब्राह्मण गुरुगद्दियों पर विराजमान हो जाएंगे, जैसा कि आगामी गुरुयुग में होना ही है I

लेकिन क्यूंकि वो विश्वकर्मा ब्राह्मण भी आज के सारस्वत ब्राह्मणों से निकलेंगे, इसलिए अपने मूल और अपने अमूल गंतव्य, दोनों से ही वो विश्वकर्मा ब्राह्मणगण सारस्वत होंगे I

विश्वकर्मा नामक शब्द, गुरु के शब्द को ही दर्शाता है, इसलिए गुरु का वास्तविक स्वरूप विश्वकर्मा ही होता है I और यही विश्वकर्मा ब्राह्मण, आगामी गुरुयुग में आम्नाय पीठों पर विराजमान होंगे, नाकि आज के पढ़े-लिखे, कर्मकांडों में फंसे हुए, मंत्र के मंथन तक सीमित और व्यर्थ के प्रवचन देते हुए सारस्वत ब्राह्मण I बनियों के समान आज के वेद मनिषियों के प्रवचनों का उत्कर्ष मार्ग से सीमित नाता है, न कि पूर्ण नाता, इसलिए वो मुक्तिमार्ग को भी नहीं दर्शाते है I

क्यूंकि आगामी गुरुयुग, आत्ममार्ग का युग है, इसलिए उस युग में आज के सारस्वत ब्राह्मण अपने आज के स्वरूप में नहीं होंगे I

उस गुरुयुग के थोड़ा पूर्व और उस गुरु युग के पूरे समय पर, इन्ही सारस्वत ब्राह्मणों में से, कुछ योगी निकलेंगे, जो वेददृष्टा, धर्मद्रष्टा, कारण और महाकारण द्रष्टा, ब्रह्माण्ड द्रष्टा, देवदृष्टा, आत्मद्रष्टा, ब्रह्मदृष्टा आदि होंगे, और जो आम्नाय पीठों में प्रतष्ठित होंगे और इस मृत्युलोक के जीवों के मार्गदर्शक बनेंगे I

और उस गुरु युग के अदिष्ठा भगवान् भी योगेश्वर, अर्थात कार्य ब्रह्म अपने ही महेश्वर स्वरूप में होंगे I जब ऐसा होगा, तो आज के समस्त प्रपंच भी समाप्त हो जाएंगे I

 

उस आगामी गुरुयुग में…

योगी बनिया नहीं होगा और बनिया भी योगी नहीं कहलाएगा I

न तो योग और न ही ग्रंथ का, प्रत्यक्ष, परोक्ष और सांकेतिक व्यापार होगा I

अब इसी तथ्य पर आगे बढ़ता हूँ …

साधक के शरीर में यह पृथ्वी महाभूत, मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र में ही होता है, जिसके देवता कार्य ब्रह्म होते हैं, जो इस जीव जगत के वास्तविक रचैता होते हैं, और जिनके गुणो पर, माँ सीता के पिताजी, राजा जनक कहलाए थे I

जनक शब्द सृष्टिकर्ता, अर्थात जीव जगत के रचैता, कार्य ब्रह्म का द्योतक है I

इसलिए, आत्मपथ या आत्ममार्ग में, माँ आदि शक्ति का सीता माता के रूप में जन्म, मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र का अंग है, और वो भी तब, जब माँ आदिशक्ति मूलाधार चक्र से नाभि लिंग में प्रवेश करती हैं I

और जब माँ आदि शक्ति, माँ सीता के स्वरूप में राम भद्र से योग लगाती हैं, तो वो उस राम नाद की ओर जाती हैं, जो ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर, सुनहरे वर्ण के वज्रदण्ड चक्र में होता है I

जब वो नाभि लिंग की दिव्यताएं, राम नाद से योग लगाती हैं, तो यह दशा माँ सीता और भगवान राम के स्वयंवर का द्योतक होती है, और जो उस आत्ममार्गी साधक की काया के भीतर ही होता है I और यही योग इस अध्याय के राम नाद के चित्र में भी दर्शाया गया है, जहाँ श्वेत वर्ण की माँ सीता, नील वर्ण के भगवान् राम से योग लगाके बैठ चुकी हैं I

और इसी योग को तिब्बत के बौद्ध पंथ में समंतभद्री समंतभद्र योग कहा गया है, जो इस अध्याय के राम नाद के चित्र में, श्वेत वर्ण की बुद्ध समंतभद्री और नील वर्ण के बुद्ध समंतभद्र के रूप में भी दर्शाया गया है I

और आत्ममार्ग के दृष्टिकोण से, यही योग श्वेत वर्ण की समतावादी प्राण शक्ति और नील वर्ण के मनस के भी होता है I

इस नाभि लिंग में तैंतीस कोटि नाड़ियां और उनकी दिव्यताएं आपस में मिलती हैं I इस मिलन से, पञ्च प्राण समतावादी हो जाते हैं I जो समतावादी हो जाता है, वो उस सगुण निर्गुण स्वरूप को पाता है, जो श्वेत वर्ण का होता है I

जब साधक के शरीर में सीता राम का योग बस होना ही होता है, तो इससे पूर्व साधक के नाभि क्षेत्र में, यह नाभि लिंग समतावाद को जाके श्वेत हो जाता है, जिसके कारण साधक की प्राणशक्ति भी श्वेत हो जाती है I इसी श्वेत अवस्था में साधक की प्राणशक्ति, मेरुदंड में ऊपर उठकर, राम नाद को जाती है I

आत्मपथ में, यही योग सीता राम के स्वयंवर को दर्शाता है, जो साधक के शरीर में ही होता है I लेकिन इस योग के कई और बिंदु हैं, जिनके बारे में एक बाद के अध्याय (योग अश्वमेध मार्ग) में बताया जाएगा I

 

हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी या वज्रदण्ड चक्र का राम नाद और निर्बीज समाधि से नाता, हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी का राम नाद से नाता, हिरण्यगर्भात्मक नाड़ी का निर्बीज समाधि से नाता, वज्रदण्ड चक्र का राम नाद से नाता, वज्रदण्ड चक्र का निर्बीज समाधि से नाता,

मस्तिष्क के सहस्र दल कमल (या सहस्रार चक्र) से भी ऊपर, जो सुनहरे वर्ण का वज्रदण्ड चक्र होता है, और जिसका नाद ही राम होता है, उस राम नाद से योग से लगाने के कुछ समय पश्चात, माँ सीता रूपी अदिशक्ति पुनः मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र में बसे हुए भू महाभूत (अर्थात भूमि) में लौट जाती हैं I और इसी को रामायण ग्रंथ में, माँ सीता की भू समाधि कहा गया है, जो योगमार्ग में साधक की आंतरिक महासमाधि का भी द्योतक होती है I

यही रकार या राम नाद का मार्ग, जो आंतरिक अश्वमेध यज्ञ (अर्थात योग अश्वमेध) को भी दर्शाता है, सम्प्रज्ञात समाधि से असम्प्रज्ञात समाधि, शून्य समाधि, शून्य ब्रह्म समाधि और अंततः निर्बीज समाधि को लेके जाता है, जिनके बारे में किसी बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

इन सब समधियों के मूल और अमूल गंतव्य, दोनों में, वही कार्य ब्रह्म जिनके बारे में इस अध्याय में बतलाया जा रहा है, योगेश्वर गुरुवेश्वर होकर, पञ्चदेव स्वरूप में भी होते हैं I

लेकिन यहाँ पर मैं केवल निर्बीज समाधि की एक दशा का वर्णन कर रहा हूँ, क्यूंकि इस समाधि में, उन कार्य ब्रह्म योगेश्वर का अनुग्रह होता ही है I

 

निर्बीज समाधि को पाया हुआ साधक…

होता हुआ भी… नहीं होता है I

नहीं होता हुआ भी…, सदैव ही होता है I

यदि ऐसा साधक के बारे में कोई भी जीव या जगत ही, माँ प्रकृति से पूछेगा, कि अब वो कहाँ है, तो उत्तर यही मिलेगा…

वो थापरन्तु अब नहीं है I

वो नहीं होता हुआ भी… सदैव ही रहेगा I

वो स्वयं ही स्वयं में जाके, सदैव होता हुआ भी… अब नहीं है I

तो अब मैंने सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन उन निर्बीज ब्रह्म में लय हुए साधक की दशा को को बतला दिया I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

आत्मज्ञान के दृष्टिकोण से यही है भगवान् राम और माँ सीता की कहानी, जो स्वयं ही स्वयं में, के मार्ग में, योगी के शरीर में ही चलित होती है, और जिसमें रामायण के ग्रंथ में बतलाए गए सारे किरदार भी, अपने अपने योगमार्गी स्वरूप में ही होते हैं I

सनातन वैदिक आर्य धर्म में कोई देवी देवता, ग्रंथ या मार्ग है ही नहीं, जो योगी के शरीर में चलित नहीं होता I

इसलिए योगमार्ग के गंतव्य से, जिसे आत्ममार्ग कहा जाता है, योगी अमुक अमुक ग्रंथों के पथ से भी एक-एक करके जाता है I लेकिन यहाँ तो बात आत्ममार्गी योगी के शरीर में चलित हुए रामायण नामक ग्रंथ की हुई है… न कि किसी और ग्रंथ की I

यहाँ पर तो मैंने आत्मपथ में जाते हुए योगी के भीतर चल रही रामायण के बस कुछ बिंदु ही बताइए, न कि पूरी रामायण, जिसको योगमार्ग से पार करके, योगी उस आत्मस्वरूप को पाता है, जो समस्त महाब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में, पुरुषोत्तम कहलाता है I

और ऐसे स्वरूप स्थिति के पश्चात, योगी का शरीर ही उस महाब्रह्माण्ड का पुरुषोत्तम क्षेत्र कहलाता है, जिसका चित्र पूर्व में, इसी अध्याय में दिखलाया गया था I

इसी आत्ममार्ग में, योगी समस्त रामायण और महाभारत को अपने शरीर के भीतर ही साक्षात्कार करेगा I और इन दोनों ग्रंथों की दशाओं सहित, वह योगी उनके पात्रों को भी अपनी काया में ही, उनके सूक्ष्म स्वरूपों में चलित होता हुआ पाएगा I

स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य में जाने वाले योगी को, कोई भी ग्रंथ पढ़ने या जानने की आवश्यकता नहीं होती, क्यूंकि समस्त वैदिक वाङ्मय उस योगी के शरीर में ही चलित होता है, और इसीलिए उस योगी की काया के भीतर ही साक्षात्कार होता है (या पाया जाता है) I

और ऐसी शरीर रूपी वैदिक ग्रंथागार तुल्य स्थिति में वो योगी उसकी अपनी आंतरिक दशाओं के दृष्टिकोण से उन ग्रंथों की अवस्थाओं से भी होकर जाता है I

 

इसलिए, आत्ममार्ग नामक योगमार्ग में…

  • साधक के शरीर में, अदि शक्ति स्वरूप माँ सीता के स्वयंप्रादुर्भाव की स्थिति, तब कही जाती है, जब वो उस नाभि लिंग में स्वयं प्रकट होती हैं, जिसके कारण वो नाभि लिंग श्वेत वर्ण का हो जाता है I
  • माँ सीता का भगवान् राम से स्वयंवर तब कहा जाता है, जब वो नाभिलिंग की दिव्यताएँ, उस सुनहरे वज्रदण्ड चक्र रूपी नाड़ी में प्रवेश करके, राम नाद से योग लगाती हैं I
  • इसी स्वयंवर में, भगवान् राम, परमगुरु शिव का धनुष उठा के तोड़ते हैं I ऐसा तब होता है, जब योगी की चेतना सुषुम्ना नाड़ी रूपी धनुष को पार कर जाती है, जिससे सुषुम्ना नाड़ी टूट सी ही जाती है I

 

अब एक सांकेतिक बात बोल रहा हूँ…

योगी के मेरुदण्ड में सुषुम्ना नाड़ी ही उस धनुष का सूचक है, और योगी के शरीर के आगे के भाग में जो एक नाड़ी, मस्तिष्क को मूलाधार चक्र से जोड़ती है, वो ही उस धनुष की तार है I

योगी के भीतर बसा हुआ अमृत कलश, जो वास्तव में नाभि लिंग ही है, इस धनुष से जाकर राम नाद से योग करता है I आत्मपथ में, यही सीता राम स्वयंवर है I

  • माँ सीता की भू समाधि तब कही जाती है, जब वो दिव्यताएँ राम नाद से योग लगाके, पुनः नाभि क्षेत्र में लौटके, मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र में पुनः चली जाती हैं, जिसका तत्त्व भू महाभूत (या पृथ्वी महाभूत) कहलाता है I

 

और इस भाग के अंत में …

पूर्व में बतलाया था, कि वो चेतना तीन बार योग लगाती है, जिसके कारण श्री विष्णु के केवल तीन अवतार ही पूर्णावतार कहलाए गए हैं I

लेकिन, उस पूर्व में बतलाए गए तीसरे योग के पश्चात, आदिशक्ति रूपी माँ सीता का भगवान् राम से एक अर्धयोग भी होता है, जिसका अर्धखकार नाद होता है, और जिसकी दिव्यता के बारे में मैं बताना ही नहीं चाहता I

इस ना बताने का कारण है, कि यह एक गुप्त ज्ञान है, जिसका आलम्बन लेके वो योगेश्वर महाब्रह्म प्रजापति किसी विष्णुत्व, शिवत्व और ब्रह्मत्व, तीनों सिद्धियों से से सुसज्जित योगी (अर्थात हरिहरब्रह्मा स्वरूप योगी) के स्थूल शरीर के भीतर, गुप्तरूप में ही सही, लेकिन स्वयंप्रकट होते हैं I

और योगी के भीतर महाब्रह्म के ऐसे स्वयं प्रकटीकरण के पश्चात, वो योगी ही एक चलते हुए कलियुग को स्तंभित करके, गुरुयुग को प्रकाश करने का बीज रूप हो जाता है I

और क्यूंकि कलियुग के 432,000 वर्षों के कालखंड में, अट्ठारह गुरुयुग आते हैं, और इन अठारह गुरुयुगों की श्रृंखला में, आगामी गुरुयुग प्रथम होगा, इसलिए मैं इस अर्धखकार नाद के ज्ञान को बता ही नहीं रहा हूँ I

इस न बताने का कारण है, कि मैं उन सभी आगामी गुरुयुगों की प्रकटीकरण प्रक्रिया में बाधा नहीं बनना चाहता हूँ I

 

हिरण्यगर्भ का त्रिदेव से नाता, … हिरण्यगर्भ का ब्रह्मा जी से नाता, हिरण्यगर्भ का परमगुरु शिव से नाता, हिरण्यगर्भ का सनातनगुरु श्री विष्णु से नाता, हिरण्यगर्भ का ब्रह्मा से नाता, हिरण्यगर्भ का शिव से नाता, हिरण्यगर्भ का विष्णु से नाता, …

अब ध्यान से सुनना क्यूंकि यह उकार नाद से जाते हुए आत्ममार्ग का एक बहुत महत्त्वपूर्ण बिंदु है…

  • ऐसे योगी के शिवरंध्र के ऊपर जो सोने जैसी नाड़ी होती है, और जो वज्रदण्ड और वज्रदण्ड चक्र भी कहलाती है, उस सुनहरी नाड़ी में भगवत तत्त्व का शब्दात्मक गंतव्य, भगवान् राम के शब्द स्वरूप में होता है I

और राम भगवान् का यही शब्दात्मक स्वरूप, शिव तारक मंत्र कहलाता है I

यही कारण है, कि राम भगवान् हैं तो सनातन गुरुदेव विष्णु के अवतार, लेकिन उनको रामभद्र के नाम से भी पुकारा जाता है, जो वास्तव में, अर्थात मूल से, परमगुरु शिव का ही वाचक है I

  • और इसके अतिरिक्त, ऐसे योगी के शिवरंध्र के ऊपर के भाग में, जहाँ शिवरंध्र समाप्त होता है, और वो सोने जैसा चमकदार वज्रदण्ड प्रारम्भ होता है, महामृत्युंजय मंत्र सुनाई देता है I

इसी कारण से, महामृत्युंजय मंत्र का स्थान शिवरंध्र और वज्रदण्ड के योग को भी दर्शाता है I इसका अर्थ हुआ, कि साधक की काया के भीतर, जहाँ पर महामृत्युंजय मंत्र सुनाई देता है, वो स्थान परमगुरु शिव और पुरषोत्तम विष्णु अवतार भगवान् राम के योग को भी दर्शाता है I यही कारण है, कि महामृत्युंजय मंत्र, हरिहर का भी वाचक है I

और क्यूंकि राम नाम, रा और म शब्दों का योग है, जिनमें से र शब्द वज्रदण्ड का है और म शब्द ॐ का है, जो ब्रह्मरंध्र में साक्षात्कार होता है, इसलिए यह राम नामक शब्द, ॐ शब्द जो ब्रह्मरंध्र का है, और रा शब्द जो वज्रदण्ड का है (जिसका नाता शिवरंध्र से ही है)…, इनके योग को भी दर्शाता है I

और इसलिए, मस्तिष्क के ऊपर के भाग में, जहाँ ब्रह्मरंध्र और शिवरंध्र की दिव्यताओं की योगावस्था होती है, उस स्थान पर ही महामृत्युंजय मंत्र सुनाई देता है और साधक के शरीर के भीतर, यही स्थान हरिहर क्षेत्र भी कहलाता है I

इसी क्षेत्र में भगवान हरिहर का साक्षात्कार होता है, और जहाँ वो हरिहर भी, साधक के सगुण आत्मस्वरूप में ही होते हैं I

इस स्थान में हरिहर, एक लिंग स्वरूप में होते है, जो सोने के समान प्रकाशमान होता है, और वो लिंग उल्टा होता है… अर्थात उस लिंग का ऊपर का भाग नीचे की ओर होता है, और नीचे का भाग ऊपर की ओर होता है I

और क्यूंकि यह दोनों ही शब्द, अर्थात ॐ और राम, मुक्ति को ही दर्शाते है, इसलिए वेदों में, महामृत्युंजय मंत्र का स्थान बहुत बड़ा बतलाया गया है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

लेकिन इस साक्षात्कार से पूर्व, योगी अपने त्रिनेत्र में ही भगवान् अर्धनारीश्वर को पाता है, और वो अर्धनारीश्वर, जो शिवशक्ति योग ही हैं, उस योगी के ही सगुण आत्मस्वरूप होते हैं I

ऊपर बताए गए कारणों से, ऐसा साक्षात्कारी योगी, जो सगुणत्मक अर्धनारीश्वर स्वरूप होता हुआ, हरिहर स्वरूप को भी पाता है, वह योगी महाब्रह्माण्ड की दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, समस्त जीव जगत का तारक स्वरूप भी होता है I यही महामृत्युंजय मंत्र का सार है I

लेकिन अपनी वास्तविकता में, उकार का साक्षात्कार योगी, कार्य ब्रह्म ही होता है, जो महाब्रह्माण्ड की दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, योगेश्वर स्वरूप ही कहलाता है I योगेश्वर को महेश्वर भी कहा जाता है और महेश्वर ही प्रत्येक योगी के गुरु और ईश्वर होते हैं I

लेकिन ऐसे होता हुआ भी, वो स्वयं ही स्वयं में रमण करता हुआ योगी, स्वयं को ऐसा नहीं मानता क्यूंकि उसको पता है, कि यह योगेश्वर नामक उपाधि, केवल और केवल उन हिरण्यगर्भात्मक कार्य ब्रह्म की है, जो महेश्वर कहलाते हैं और जिनकोयोगगुरु, योगर्षि, योगीराज, योगसम्राट, योग गंतव्य, योग मूल, योग और योगतंत्र भी कहा गया है I

इसलिए, ऐसा योगी अपने कार्य भी गुप्त में करता है… वो स्वयं को एक स्वयं जनित तिरोधान में ही डाल कर रखता है I

और जबतक वो ऐसे तिरोधान में रहता है, तबतक उस योगी को माया की बहुत सारी अभिव्यक्तियां, देवियाँ घेर कर रखती है, अर्थात जीव जगत से छिपा कर रखती हैं I ऐसी दशा में वो वोगी एक अतिसाधारण मानव, या बुद्धू के समान रहता हुआ, इस चतुर्दश भुवन में, एक अतिसूक्ष्म लेकिन पूर्ण प्रभावी नींव, उस आगामी गुरुयुग के लिए डालता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

एक बात और बताता हूँ, कि यदि कार्य ब्रह्म अन्य सभी देवताओं के समान, अन्य जीवों के सामने भी न आएं, तब भी वह उनकी अपनी ब्रह्माण्डीय वस्तुस्थिति के कारण, अपना कार्य कर लेंगे I इसलिए कार्य ब्रह्म जो महेश्वर और योगेश्वर ही हैं, वह गुप्त में रहकर भी अपने कार्य कर लेते हैं, अर्थात उनको किसी और के प्रत्यक्ष या परोक्ष सानिध्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ती I

यही कारण है, कि जबकि कार्य ब्रह्म कई बार इस धरा पर लौटे हैं, लेकिन तब भी उनको कोई भी, उनके कार्य ब्रह्म स्वरूप में जान नहीं पाया है I

कभी वो कार्य ब्रह्म, राजा के रूप में, तो कभी गुरु रूप में और कभी दोनों के रूप में आते हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही बार, वो अपनी वास्तविकता के बारे में किसी उत्कृष्ट योगी को बताते हैं I

मैंने इस अध्याय में केवल उनके एक आगमन का उद्धरण दिया है, जब वो राजा जनक के रूप में आए थे I लेकिन इस ब्रह्माण्ड की इतिहास में तो वो तो कई बार अपनी सृष्टि को देखने को लौटे हैं, और लौटने के पश्चात, वह अधिकांशतः गुप्त होकर ही रहे हैं I

इसका कारण है, कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि कार्य ब्रह्म, उनके स्वयं जनित तिरोधान को धारण किए बिना ही आ गए हों I और ऐसा ही कार्य ब्रह्म सिद्ध (अर्थात उकार सिद्ध) योगी भी होता है I

 

पुरातन कालों की साधनाएं, …

इधर थोड़ा भटक रहा हूँ, क्यूंकि यह भी आवश्यक है I

आज के वेद और योग मार्गी मनीषीयों के समान, पुरातन कालों में, वैदिक मनीषीयों की साधनाएं, किसी देव या देवी तक ही सीमित नहीं होती थी, बल्कि, उनके तत्त्वों पर भी उनकी आंतरिक साधनाएं होती थी I

इसका कारण था, कि उस समय के योगीजन जानते थे, कि यदि केवल किसी दिव्यता, देवी या देव पर ही अपनी साधना सीमित करोगे, तो उन्ही देवी देव और उनके लोकों तक ही सीमित रह जाओगे, और उन लोकों या दशाओं के आगे की (अर्थात उनकी मूलावस्था से संबंधित) दशाएँ कभी नहीं जान पाओगे I

इसीलिए, उस पुरातन समय में, साधनाएँ तत्त्वों पर भी होती थी, न कि आज के समान देवी देवताओं तक सीमित हीं होती थी I

जिसने तत्त्व को ही जान लिया, वो उस तत्त्व की दिव्यता, अर्थात, उस तत्त्व के देवी देव और उनके लोक को भी जान ही लेता है I

लेकिन जिसने देवी देवता पर ही अपनी साधना सीमित की होगी, वो उस देवी देव के तत्त्व को पूर्णरूपेण जान पाएगा या नहीं… योग तंत्र के अनादि इतिहास में इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है I

पुरातन वैदिक मार्ग में, भगवान् को उनके मूल तत्त्वों से जाना जाता था, न कि आज के समान, बस उनके किसी देवी देव स्वरूप का कोई मंत्र रट लिया, या उस मंत्र की कोई सिद्धि पा ली I

यह तो पतन का ही मार्ग है, क्यूंकि इसमें साधक का साक्षात्कार कभी भी पूर्ण नहीं होता I

जो साक्षात्कार पूर्ण नहीं होता, वो गंतव्य का मार्ग भी नहीं होता I

जिस मार्ग की गति गंतव्य तक नहीं होती, उसकी गति ही दुर्गति कहलाती है I

इसलिए उन पुरातन कालों में,उन तत्त्वों को जानकर, उनकी दिव्यताओं पर साधना होती थी, और यही दिव्यताएँ, वैदिक वाङ्‌मय के देवी और देव कहलाए हैं I ऐसे वैदिक देवी देवताओं की सत्ता सार्वभौम और सर्वव्यापक ही होती है, अर्थात साधक की काया के भीतर और ब्रह्माण्ड, दोनों में ही होती है I

उन पुरातन कालों में, इन सब देवी देवताओं का कोई सीधा अध्ययन नहीं होता था, बल्कि इनको जानने के लिए, उनके तत्त्वों पर साधना होती थी I

जैसे भू तत्त्व या भू महाभूत की देवी, भू देवी को जानने के लिए, पृथ्वी तत्त्व पर साधना होती है, वैसे ही उन पुरातन कालों में, जो मेरे पूर्व के जन्मों के थे, सभी वैदिक देवी देव के तत्त्वों की साधना होती थी I

इन साधनाओं में, वह साधक, तत्त्व सिद्धि तो प्राप्त करते थे, लेकिन इसके साथ साथ, वो साधकगण उन तत्त्वों की दिव्यता (अर्थात, उन तत्त्वों के देवी देव और उनके देवलोकों) की भी सिद्धियों को पाते थे I

लेकिन केवल देवी देवता तक सीमित साधना में, ऐसी पूर्णता कभी नहीं होती, और इसी कारण से, ऐसे देवी देवताओं के अधिकांश साधक, उन तत्त्वों के भगवत स्वरूप की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं I ऐसी देवी देव पर (या तक) सीमित साधनाएँ, वैदिक ऋषिगण बहुत कम ही करते थे I

इसीलिए, उन पुरातन कालों में, जिनकी बात यहाँ हो रही है, और जो मेरे पूर्व जन्मों के थे, उनमें देवी देवता का साक्षात्कार उनके तत्त्व को जानने के पश्चात ही होता था… तत्त्व को जानने से पूर्व नहीं I

जिसने दैविक तत्त्व जो जान लिया, वह मनीषी उस तत्त्व की दिव्यता (अर्थात, उस तत्त्व के देवी देव और उन देवी देव के लोकों) का स्वरूप हो जाता है, और ऐसा मनीषी जीव और जगत का तारक कहलाता है I

 

और कुछ महत्वपूर्ण बातें…

जो साधक, किसी भी एक दैविक तत्त्व का साक्षात्कारी होता है, वह साधक जीवन्मुक्त हो ही जाता है I

जो मार्ग जीवनमुक्ति ही न प्रदान करवा सके, उस मार्ग का इस जीव और जगत को क्या लाभ I

जो मार्ग जीवनमुक्ति ही न प्रदान करवा सके, वही तो अपूर्ण उत्कर्ष मार्ग है, जिसके कारण उसमें अपकर्ष के बिंदु भी होंगे ही I

ऐसे अपूर्ण मार्गों में, मुमुक्षु साधकगण को अपना दुर्लभ मानव जीवन व्यर्थ में ही व्यय नहीं करना चाहिए I

मैंने यह सब अपने पूर्व जन्मों के ज्ञान से बतलाया है, क्यूंकि प्रबुद्ध योगभ्रष्ट होने के कारण, मुझे पूर्व के बहुत सारे जन्म स्मरण हैं I

 

उकार का मार्ग, उकारमार्ग, उकार साक्षात्कार, उकार साक्षात्कार और तैजस, उकार और तैजस, …

 

उकार में जीवात्मा की गति, उकार का मार्ग, उकारमार्ग, उकार और तैजस
उकार में जीवात्मा की गति, उकार का मार्ग, उकारमार्ग, उकार और तैजस

 

अब उकार का मार्ग बताता हूँ…

योगी की काया के भीतर, उकार ब्रह्मरंध्र के विज्ञानमय कोष में निवास करते हैं, इसलिए यह मार्ग भी ब्रह्मरंध्र के विज्ञानमय कोष का ही है और ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही चलित होता है I

उकार हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म दोनों से ही सम्बंधित है I और उकार हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म दोनों की दिव्यता या शक्ति भी है I

यह चित्र जीवात्मा की उकार के भीतर ही हो रही उत्कर्ष नामक गतिशील अवस्था को दर्शा रहा है, अर्थात यह चित्र, साधक की चेतना की उस दशा को दर्शा रहा है, जब वो चेतना उकार से जा रही होती है I

और इस दशा से जाते हुए वो चेतना शाश्वत प्रणाम में वैसे ही होती है, जैसा इस चित्र में दिखाया गया है I

जब कोई योगी (अर्थात, साधक की चेतना), अकार को पार करके आगे या ऊपर की ओर गति करता है, तो वह योगी उकार का साक्षात्कार करता है I इसलिए, उकार का साक्षात्कार, अकार के बाद में ही होता है I

जैसे की पहले बतलाया था, उकार का शब्द ओओओओओ है, इसलिए इस दशा से जाते समय उस योगी को यही नाद सुनाई देता है I

इस समय पर, उस योगी के मेरुदंड की ओर दाएं हाथ की नाड़ी, जिसे पिङ्गला नाड़ी और सूर्य नाड़ी भी कहते हैं, उसमें एक भगवे रंग प्रकाश होता है I यह प्रकाश तैजस है I

तैजस का अर्थ होता है, प्रकाशमय अग्नि I तैजस अग्नि का ही तत्त्व है, और यह तैजस, रुद्र को भी दर्शाता है I इस तैजस का भगवा वर्ण, पीले वर्ण की बुद्धि और लाल वर्ण के रजोगुण के योग को ही दर्शाता है I

इस तैजस का भगवा वर्ण, पीले वर्ण के सद्योजात ब्रह्म और लाल वर्ण के तत्पुरुष ब्रह्म के कार्य ब्रह्म नामक योग की भी द्योतक होता है और जहां यह योगदशा ही इस अध्याय के प्रथम चित्र में दर्शाई गई है, अर्थात उकार के चित्र में दिखाई गई है I

जबतक यह तैजस तत्त्व, योगी की पिङ्गला नाड़ी में स्वयंप्रकट नहीं होगा, यह साक्षात्कार भी नहीं हो सकता I

लेकिन इस तैजस की प्रकटिकरण प्रक्रिया और प्रकटीकरण के बाद की दशा भी, अतिसंकटमय ही है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस दशा में साधक के मेरुदण्ड से लेकर मस्तिष्क तक, और इनकी नाडियों तक एक अग्निमय और विद्युत्मय वायु चलने लगती है, जिसको नियंत्रण करना और जिसके आदि होना बहुत ही कठिन होता है I

 

उकार और बुद्धि, उकार और विज्ञानमय कोष, बुद्धि और जीवात्मा, …

अब इस अवस्था की बुद्धि की दशा के बारे में बतलाता हूँ…

अपने शाश्वत स्वरूप में, बुद्धि पीले रंग की होती है I

इस मार्ग पर जाने से पूर्व, जहाँ बुद्धि विलीन होती है, उसे इंद्रलोक कहते हैं I

जो यहाँ बुद्धि शब्द कहा गया है, वो साधक के विज्ञानमय कोष को भी दर्शाता है I

विज्ञानमय कोष, मूलाधार चक्र से लेकर, ब्रह्मरंध्र चक्र तक होता हुआ, और इससे आगे अष्टम चक्र तक (अर्थात अष्टम चक्र के नीचे तक) भी होता है I

मूलाधार से ब्रह्मरंध्र चक्र तक के विज्ञानमय कोष में अंतर बस इतना है, कि उस विज्ञानमय कोष का स्वरूप परिवर्तित होता जाता है I जैसे-जैसे साधक की चेतना मूलाधार चक्र से ऊपर की ओर उठती जाती है, वैसे-वैसे साधक का विज्ञानमय कोष भी विशुद्ध होता चला जाता है I जैसे-जैसे विज्ञानमय कोष विशुद्ध होता चला जाता है, वैसे-वैसे साधक के अन्य कोश भी पवित्रता को पाते चले जाते हैं I

और अंततः, जब वो विज्ञानमय कोष ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के स्वरूप में, साधक की काया के भीतर ही स्वयंप्रकट होता है, तो वो विशुद्ध होकर, ब्रह्मपाथगामी हो जाता है I

और ऐसे विशुद्ध विज्ञानमय कोष का धारक योगी ही अकार, उकार, मकार और ब्रह्मतत्त्व से जाकर, ॐ का साक्षात्कार करता है और अंततः, ॐ के लिपीलिंग स्वरूप के ऊपर के बिन्दु में ही विलीन हो जाता है I

विलीन होने के पश्चात, वो साधक स्वयं ही स्वयं को देख नहीं पाता है I इसी दशा को निर्विकल्प समाधि भी कहा जाता है, जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बात होगी I

वेद मनीषीयों द्वारा, उस विशुद्ध विज्ञानमय कोष को ही जीवात्मा कहा गया था I इसका अर्थ हुआ, कि निष्कलंक बुद्धि को ही जीवात्मा कहते हैं I

और इस दशा की प्राप्ति से पूर्व, वो जीवात्मा इंद्रलोक में ही विलीन होती है क्यूंकि इंद्रलोक ही ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया है I

इंद्रलोक ही तत्त्व ब्रह्म अर्थात ब्रह्म तत्त्व कहलाया गया था I इस तत्त्व ब्रह्म को पाकर ही जीवात्मा, ॐ के लिपीलिंगात्मक स्वरूप के ऊपर लिखे हुए बिंदु में विलीन होती है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

बुद्धि या विज्ञानमय कोष और उसका ब्रह्माण्डीय कोष जो इंद्रलोक है, सब के सब ऋग्वेद के अंग हैं I इसीलिए ऋग्वेद का महावाक्य, जो प्रज्ञानं ब्रह्म है, इंद्रलोक से भी सम्बद्ध है I

और ऐसा होने के पश्चात भी, वह महावाक्य, उकार या हिरण्यगर्भ का ही होता है I इसका कारण है, कि इंद्रलोक, हिरण्यगर्भ ब्रह्म या उकार से ही स्वयंउत्पन्न हुआ था, और वो भी ब्रह्माण्ड की बुद्धि काया के स्वरूप में I

और इस महावाक्य में, प्रज्ञानं शब्द, विशुद्ध बुद्धि का वाचक होने के साथ साथ, वृत्तिहीन चित्त, निष्काम अहम् और ब्रह्मलीन मनस तत्त्व का भी वाचक है I और इस महावाक्य में, प्रज्ञानं शब्द, प्राणों के सर्वसम अवस्था का भी सूचक और द्योतक है I

 

अब ध्यान देना…

  • निष्कलंक बुद्धि, उस बुद्धि के इंद्रलोक से योग को भी दर्शाती है I
  • वृत्तिहीन चित्त, उस चित्त के वैकुण्ठ लोक से योग को भी दर्शाता है I
  • निष्काम अहम्, उस अहम् के रूद्र लोक से योग को दर्शाता है I
  • ब्रह्मलीन मनस, उस मनस के ब्रह्मलोक से योग को भी दर्शाता है I
  • और प्राणों की सर्वसम अवस्था, उन प्राणों के सर्वस्व से योग, और सर्वस्व के मूल से योग, दोनों को दर्शाता है I

इसीलिए ऋग्वेद के महावाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म में, ज्ञान ब्रह्म, चेतन ब्रह्म, अहम् अस्मि और अहम् ब्रह्म, मन ब्रह्म और प्राण ब्रह्म, सभी वाक्यों का समावेश है I इसका कारण है, कि उस निर्गुण ब्रह्म में ही सब बसा होता है और वो निर्गुण ब्रह्म ही सबमें बसा होता है, जो इस ऋग्वेदीय महावाक्य में सांकेतिक रूप में बताया गया है और जो स्व:प्रकाश कहलाता है I

जो योगी उकार को पा गया, वह योगी इन चारों वाक्यों का साकारी या देह स्वरूप होता है I उसका मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और प्राण, उस ब्रह्म में ही विलीन होके, उस ब्रह्म सरीका होके ही शेष रह जाते हैं I

इसीलिए, जिस योगी ने अपने मन, बुद्धि, चित्त, अहम् और प्राण को ब्रह्म की ओर अग्रसर कर दिया, वो योगी ही उस योगेश्वर के उकार स्वरूप का साक्षात्कारी हो पाता है, और इन सभी बताए गए ब्रह्मपदों को अकस्मात् ही पा जाता है I

 

और पञ्च मुखा सदाशिव के मार्गानुसार, ऐसा योगी …

  • जिस योगी का अहम् विशुद्ध हो गया, वो सदाशिव के नील वर्ण के, दक्षिण दिशा को देखने वाले अघोर मुख में विलीन होता है, और ऐसा योगी अहम् अस्मि और अहम् ब्रह्म को पाता है I
  • जिस योगी का चित्त वृत्तिहीन हो गया, वो सदाशिव के धूम्र वर्ण के, उत्तर दिशा को देखने वाले वामदेव मुख में विलीन होता है, और ऐसा योगी चेतन ब्रह्म को पाता है I
  • जिस योगी का मन ब्रह्मलीन हो गया, वो सदाशिव के हीरे के समान वर्ण के, पश्चिम दिशा को देखने वाले सद्योजात मुख में विलीन होता है, और ऐसा योगी मन ब्रह्म को पाता है I
  • जिस योगी की बुद्धी निष्कलंक हो गई, वो सदाशिव के सुनहरे और लाल वर्ण के, पूर्व दिशा को देखने वाले तत्पुरुष मुख में विलीन होता है, और ऐसा योगी ज्ञान ब्रह्म को पाता है I
  • जिस योगी के प्राण सर्वसम हो गए, वो योगी महाब्रह्माण्ड योग से जाकर, सदाशिव के ईशान मुख की सर्वात्मशक्ति, माँ अदिपराशक्ति में विलीन होता है, और ऐसा योगी प्राण ब्रह्म को पाता है I
  • और वो विरला से भी विरला योगी, जो इन पांचों की योगावस्था को पाया हुआ है, वो उस ब्रह्मत्व को पाता है, जिसमें वो ब्रह्म, सगुण साकार, सगुण निराकार, सगुण निर्गुण साकार, सगुण निर्गुण निराकार, शून्य, शून्य ब्रह्म और निर्गुण निराकार भी होते है I ऐसे योगी की योगदशा ही पूर्ण कहलाती है I
  • और यह योगदशा भी उसी ॐ मार्ग से होकर जाती है, जिसको यहाँ पर बताया जा रहा है I

 

अब उकार मार्ग की बुद्धि का स्वरूप बतलाता हूँ

इंद्र की स्वयंउत्पत्ति, सदाशिव के पूर्वी मुख, तत्पुरुष से हुई थी, जो पञ्च ब्रह्मोपनिषद के सद्योजात नामक ब्रह्म भी हैं I

इंद्र ही बुद्धि के देवता हैं, और इंद्रलोक की प्राप्ति ही बुद्धि की ब्रह्माण्डीय गंतव्य दशा होती है I

जो बुद्धि इंद्रमय हो गयी, वो बुद्धि अपने गंतव्य, अर्थात देवराज इंद्र के लोक को पा ही लेती है I इंद्रलोक ही तत्त्व ब्रह्म, अर्थात ब्रह्मतत्त्व कहलाया गया था I इस तत्त्व ब्रह्म को पाकर ही जीवात्मा ॐ के लिपीलिंगात्मक स्वरूप के ऊपर लिखे हुए बिंदु में विलीन होती है I

जब पीले वर्ण की बुद्धि में लाल वर्ण का रजोगुण समाहित होता है, तो उस बुद्धि का रंग भगवा हो जाता है I भगवा रंग आगे बढ़ने वाली बुद्धि का होता है, अर्थात, उत्कर्ष मार्गी बुद्धि का होता है I

जो आगे बढे, अर्थात जो उत्कर्ष मार्ग पर लेके जाए, उसे ही “प्र शब्द” से सम्भोदित किया जाता है I साधारणतः “प्र शब्द” का अर्थ उत्कर्ष मार्गी, गंतव्य मार्ग इत्यादि होता है I

इसलिए, जिसकी बुद्धि आगे की ओर बढ़ती हो, अर्थात उत्कर्ष मार्गी बुद्धि वाला, उसे प्रबुद्ध पथगामी भी कहते हैं I

लेकिन प्रबुद्ध शब्द भी देवराज इंद्र से नाता रखता है, क्यूंकि इस शब्द में भी बुद्धि रुपी इंद्र ही हैं I

और इसके साथ-साथ, इस प्रबुद्ध शब्द के कार्यों में, आत्मकारक सूर्यदेव ही हैं I ऐसे योगी की पीले रंग की बुद्धि में लाल (अथवा भगवा) रंग पाया जाता है I

और ऐसी योगी की बुद्धि ही सनातन तत्त्वदर्शी होती है, और उस सनातन तत्त्व में ही स्थित होती है, क्यूंकि ऐसा योगी अस्मिता समाधि को पा जाता है I

ऐसा सनातन तत्त्वदर्शी, उस सनातन तत्त्व का और उसके मार्ग का धारक भी हो सकता है, जिसे अज कहा गया था I

 

अब इसी उकार के मार्ग में बढ़ता हूँ

इस शाश्वत प्रणाम की अवस्था में, अकार को पार करके, जब योगी उकार पे पहुँचता है, तो उसे वो उकार, कार्य ब्रह्म सरीका ही साक्षात्कार होता है I

कार्य ब्रह्म ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म का रजोगुणी स्वरूप है, जो उत्पत्ति कृत्य के धारक भी होते हैं I ऐसी अवस्था में, वो सुनहरा हिरण्यगर्भ भी लाल रंग से घिरा हुआ दिखलाई देता है I

और जब वह योगी उकार के उस लाल रंग के भीतर प्रवेश करके, उसके मूल तत्त्व को भीतर से देखता है, तो ही उसे सुनहरे रंग के हिरण्यगर्भ का साक्षात्कार होता है I यही इस अध्याय के प्रथम चित्र में भी दिखलाया गया है, जिसमें सुनहरा रंग का हिरण्यगर्भ, लाल रंग में बसा हुआ है I

और इस अवस्था को जब योगी जाता है, तो उसका जीवात्मा शाश्वत प्रणाम की अवस्था में ही होके ही जाता है, जैसा की इस चित्र में दिखलाया गया है I

वास्तव में, वेदों में जो जीवात्मा शब्द कहा गया है, उसका संबंध विज्ञानमय कोष से भी है, जो पीले वर्ण का होता है और जो अंततः ओम में ही विलीन होता है I

इसलिए, इस ॐ श्रंखला में बताए जा रहे ओ३म् के भाग, वास्तव में जीवात्मा मार्ग या जीवात्मा का उत्कर्ष मार्ग और मुक्तिमार्ग ही है, और जिसका संबंध साधक के विज्ञानमय कोष से भी होता है I

 

जीवात्मा हिरण्यगर्भ में स्थापित, जीवात्मा उकार में स्थापित, उकार में जीवात्मा, उकार में स्थापित जीवात्मा, हिरण्यगर्भ में स्थापित जीवात्मा, … जीवात्मा कार्य ब्रह्म में स्थापित, जीवात्मा उकार में स्थापित, उकार में जीवात्मा, उकार में स्थापित जीवात्मा, कार्य ब्रह्म में स्थापित जीवात्मा, …

उकार ही वह कार्य ब्रह्म हैं, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की रजोगुणी दशा को दर्शाते हैं I

अब जीवात्मा की चमकदार पीली (सुनहरी) अवस्था का, जिसका हिरण्यगर्भ ब्रह्म से सीधा नाता है, उसका वर्णन करता हूँ, इसलिए इस दिखलाए गए चित्र पर ध्यान केंद्रित करो I

इस चित्र में बहुत सूक्ष्म रूप से, ब्रह्मरंध्र चक्र (या सहस्र दल कमल) के भीतर, जीवात्मा का वो सुनहरा शरीर स्वरूप दिखलाया गया है I यह अवस्था भी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही साक्षात्कार होती है I

इस चित्र से, जो साधक उस गंतव्य मार्ग को जाने का पात्र नहीं होगा, वो साधक उस गंतव्य को जा भी नहीं पाएगा I

सारे योग और वेद मनिषियों का एक सिद्धांत होता ही है… कि, जो पात्र नहीं है, उसको कुछ मत दो I इस और बाकी सभी वर्णन और उनके चित्रों में भी, इसी सिद्धांत का पालन किया गया है I

 

जब जीवात्मा हिरण्यगर्भ में स्थापित होता है, जीवात्मा उकार में स्थापित
जब जीवात्मा हिरण्यगर्भ में स्थापित होता है, जीवात्मा उकार में स्थापित

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जब साधक अपने भीतर के परमार्थ की ओर अग्रसर होता है, तो उसको अपने ही ब्रह्मरंध्र में, अपनी जीवात्मा सुनहरे रंग की दिखती है I

उस समय, ब्रह्मरंध्र के भीतर उस योगी को, तीन छोटे छोटे चक्र दिखाई देते है, जो एक के ऊपर एक स्थापित हुए होते हैं I

इन तीनो में से बीच वाला चक्र, बत्तीस दल कमल समान होता है I इस बत्तीस दल कलमल के मध्य में, वह योगी, स्वयं ही स्वयं की जीवात्मा के सुनहरे सगुण साकार स्वरूप का साक्षात्कार करता है I

यह आत्मा का ही सोने जैसा शरीरी स्वरूप है, अर्थात, आत्मा का ही हिरण्यमय (या सुनहरा) सगुण साकार स्वरूप है I इस साक्षात्कार और दशा को सगुण साकार हिरण्यगर्भ सिद्धि, (अर्थात हिरण्यगर्भात्मक सगुण साकार स्वरूप सिद्धि) भी कह सकते हैं I

यह सिद्धि कर्मों से परे है, क्यूंकि इसके मूल, मार्ग और गंतव्य, तीनों में अनुग्रह ही होता है I यही कारण है, कि इसको कर्मों में रहकर पाया ही नहीं जा सकता है, क्यूंकि यह दशा केवल और केवल अनुग्रह से की प्राप्त होती है I

योगमार्ग में कुछ ऐसे बिंदु होते हैं, को कर्मों से परे…, अर्थात कृपा के होते हैं I यह चित्र भी उसी कृपा मार्ग का है, न कि साधक के कर्म मार्ग का I

और इसमें कृपा के देवता भी वो सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति की ही हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म और कार्यात्मक ब्रह्म अभिव्यक्तियाँ हैं I

ऐसा साधक, पञ्च कृत्य का धारक हो जाता है, अर्थात वो साधक उत्पत्ति, स्थिति संहार, तिरोधान या निग्रह और अनुग्रह कृत्यों का धारक बन जाता है I

 

इन पञ्च कृत्यों में से …

  • उत्पत्ति कृत्य, चतुर्मुखा पितामह प्रजापति का है I इसी कृत्य से पितामह प्रजापति समस्त जीव और जगत को उत्पन्न करते हैं I
  • स्थिति कृत्य, श्री विष्णु का है, अर्थात, सनातन गुरुदेव का है I इसी कृत्य से श्री विष्णु, इस उत्पन्न जीव और जगत को स्थित रखते है I
  • संहार कृत्य, रुद्र देव का है I इसी कृत्य से रुद्र, समस्त जीव और जगत की वृत्तियों का और अंततः, जीव जगत का ही संहार करते हैं I
  • तिरोधान या निग्रह कृत्य, देवी का है I तिरोधान या निग्रह शब्द का अर्थ होता है, छिपा लेना या ढक लेना I इसी कृत्य से देवी सत्य को छिपाती हैं, परन्तु केवल उन सबसे, जो उस सत्य को जानने के पात्र नहीं होते I

और इसी निग्रह कृत्य के विश्वव्यापी प्रभाव के कारण, जबतक कोई साधक सत्य के साक्षात्कार का पात्र नहीं बनता, तबतक वह साधक उस सत्य जो भी जान नहीं पाता है I

इसी देवी या शक्ति के तिरोधान कृत्य का सम्मान करने के लिए, वैदिक मार्गों में, जो पात्र नहीं होता, उसको कोई भी दीक्षा नहीं दी जाती है I

  • अनुग्रह कृत्य, गणपति देव का है I अनुग्रह का अर्थ आशीर्वाद और मुक्ति भी होता है I मुमुक्षु के लिए अनुग्रह ही अंतिम कृत्य है I

इसलिए किसी भी धर्म कार्य को करने से पूर्व, गणेश भगवान् की स्तुति बतलाई गयी है, ताकि उस कार्य के प्रारम्भ से ही उस कार्य पर गणपति देव का अनुग्रह बना रहे I

जिस योगी ने अपनी ही आत्मा का स्वर्णिम प्रकाशमयी सगुण साकार स्वरूप अपने ही ब्रह्मरंध्र में जान लिया, वह योगी इस पांचो कृत्यों का धारक होता हुआ भी, वास्तव में उसके मन से मुमुक्षु ही रहता है, जिसके कारण ऐसा योगी इस जीव जगत को साक्षी होकर ही देखता है I

इसके कारण, वो न तो अपनी जीवत्व सिद्धि में लिप्त होता है, और न ही जगतत्व सिद्धि में I वो इन सिद्धियों को भी उसके अपने साक्षीभाव में ही रखता है I

वो इन पञ्च कृत्यों का धारक होता हुआ भी, इनका तबतक कभी भी प्रयोग नहीं करता जबतक कोई और विकल्प ही न रह जाए I

 

उकार और स्वर्णिम सिद्ध शरीर, उकार और स्वर्णिम आत्मस्वरूप, उकार और स्वर्ण सिद्ध शरीर, उकार और स्वर्ण आत्मस्वरूप, …

अब इस स्वर्णिम शरीर के बारे में बतलाता हूँ…

यह चित्र ब्रह्मरंध्र के भीतर (अर्थात कपाल के भीतर के ब्रह्म के द्वार) का है, जहाँ तीन छोटे छोटे चक्र, एक के ऊपर एक… ऐसे होते हैं I

 

उकार और स्वर्णिम सिद्ध शरीर, स्वर्णिम शरीर, उकार और स्वर्णिम आत्मस्वरूप, सुनहरा शरीर
उकार और स्वर्णिम सिद्ध शरीर, स्वर्णिम शरीर, उकार और स्वर्णिम आत्मस्वरूप, सुनहरा शरीर

 

इस स्वर्णिम शरीर (या सुनहरे शरीर) को कई प्रकार से वर्णन कर सकते हैं…, तो अब उनमें से कुछ को यहाँ बतलाता हूँ I

इस चित्र में…

  • नीचे का गोल भाग, साधक के मस्तिष्क को दर्शा रहा है, जो माँ सीता (अदि शक्ति) की सत्त्वगुणी ऊर्जा से भरा हुआ है I
  • जो श्वेत वर्ण के दस पत्ते जैसे है, वो साधक के सहस्र दल कमल को दर्शा रहे हैं I
  • जो गुलाबी रंग है, वो अव्यक्त प्रकृति के अव्यक्त प्राण स्वरूप को, अर्थात माया शक्ति को दर्शा रहा है, जिनका कृत्य तिरोधान होता है I
  • जो सुनहरे वर्ण के डंडे जैसा है, वो मस्तिष्क और सहस्रार कमल दल के ऊपर, जो वज्रदण्ड चक्र है, उसको दर्शा रहा है I
  • जो रात्रि के समान, काले रंग का भाग है, जिसने इस चित्र को घेरा हुआ है, वो शून्य ब्रह्म है I
  • और इस चित्र में जो सुनेहरा शरीर है, वो उस ब्रह्मरंध्र या सहस्रार से बस बाहर निकलने ही वाला है I

 

इस सुनहरे शरीर के बारे में ही यहाँ बात होगी…

  • यह स्वर्ण शरीर, योगी का सगुण साकार, स्वर्णिम आत्मस्वरूप है I
  • वेदों के दृष्टिकोण से, इसी शरीर को हिरण्यगर्भ शरीर या हिरण्यगर्भ ब्रह्म शरीर भी कह सकता हूँ I
  • इसी को मेरे पूर्व जन्म के गुरुदेव, जिन्हें बुद्ध अवतार भी कहते है, उन्होंने धर्मकाया शरीर कहा था I बौद्ध धर्म की धर्मकाया, वेदों के हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही हैं I
  • और इसी को बुद्धता शरीर या बुद्धत्व शरीर भी कहा जाता है I और अंग्रेजी में, इसी को “Buddha body of reality” भी कहते हैं I
  • वेदांत के दृष्टिकोण से, अर्थात पञ्च ब्रह्मोपनिषद के दृष्टिकोण से, इसी को सद्योजात शरीर भी कह सकते हैं I
  • और मेरे इस जन्म के राजयोग के पाशुपत मार्ग के अनुसार, मैंने इसे तत्पुरुष शरीर भी कहा है I इस बिंदु के बारे में तब बात करूंगा, जब पञ्च मुखा सदाशिव का वर्णन होगा I
  • कई ऋषियों और सिद्धों ने इस सिद्ध शरीर को सुनहरे रंग की आत्मा (अर्थात स्वर्णिम आत्मा) भी कहा है I
  • इसी शरीर का सूक्ष्म वर्णन, सिद्ध सिद्धांत पद्धति में भी किया गया है I
  • इसी शरीर को महेश्वर शरीर, योगेश्वर शरीर और साधकगण योगीजनों का योगगुरु शरीर भी कहा जा सकता है I
  • इसी शरीर को हिरण्यगर्भ शरीर, हिरण्यगर्भ ब्रह्म का सगुण साकार स्वरूप, हिरण्यगर्भात्मक सगुण साकार आत्मा, आदि भी कहा जा सकता है I
  • यह शारीर राम नाद, अर्थात शिव तारक मंत्र से जाकर ही प्राप्त होता है, इसलिए इसको तारका शरीर, और उसको राम शरीर, पुरुषोत्तमा शरीर भी कहा जा सकता है I यह शरीर साधक की आत्मा के रामलला स्वरूप को भी दर्शाता है, इसलिए इसलिए रामलला शरीर, रामलला का आत्मा रूपी शरीर आदि भी कहा जा सकता है I
  • इस शरीर का नाता माँ ब्रह्माणी सरस्वती से भी है, इसलिए इसको ब्रह्माणी शक्ति शरीर, ब्रह्माणी शरीर, ब्रह्माणी सरस्वती शरीर, ब्रह्माणी विद्या शरीर, इत्यादि भी कहा जा सकता है I और क्यूंकि ब्राह्मणी विद्या सरस्वती कैवल्य मोक्ष को दर्शाती है, इसलिए इसको मोक्ष शरीर, मुक्तात्मा का शरीर, कैवल्य शरीर भी कहा जा सकता है I

लेकिन यह सभी पृथक नाम, पृथक वर्णन और पृथक रूप में बतलाई गई सिद्धियां, वास्तव में उन्ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म और उनकी कार्य ब्रह्म अभिययाक्ति को दर्शाती हैं, जिनके बारे में इस अध्याय में बतलाया जा रहा है I

 

उकार किसका जनक है,

  • उकार जो हिरण्यगर्भ है, उसी से इंद्रासन या इंद्रलोक की स्वयं उत्पत्ति हुई थी, इसीलिए, इंद्रासन पर हिरण्यगर्भ का अनुग्रह है I इंद्रलोक को ही ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया कहते हैं, जो साधक की काया में, विज्ञानमय कोष के स्वरूप में होती है I
  • उकार से ही काल अपने कालचक्र स्वरूप में स्वयं प्रकट हुआ था I और इसी कालचक्र में समस्त जीव जगत बसाया गया था, जिसके कारण सबकुछ कालगर्भित्त ही है I इसीलिए, यह समस्त जीव जगत, उकारगर्भित भी है I
  • उकार, जो तैंतीस कोटि देवी देव में प्रजापति के हिरण्यगर्भ स्वरूप का ही कार्य ब्रह्म स्वरूप है, उनसे समस्त देवी देवता भी सम्बंधित हैं I

इसलिए, जिस साधक ने उकार सिद्धि पा ली, वो साधक इन तैंतीस कोटि देवी देव की सिद्धियों का भी धारक हो जाता है I

सारी सिद्धियाँ, कहीं न कहीं, कैसे न कैसे, उकार से जुडी होती हैं I और यही कारण है, कि योगमार्ग में, उकार साक्षात्कार बहुत बड़ी उपलब्धि होती है I

 

हिरण्यगर्भ ब्रह्म और काल, काल और कालात्मा सिद्धि, काल ब्रह्म सिद्धि, काल ब्रह्म क्या है, कालात्मा सिद्धि क्या है, कार्य ब्रह्म और काल, कार्य ब्रह्म और कालचक्र, कार्य ब्रह्म और कालचक्र का प्रादुर्भाव, …

अब हिरण्यगर्भ के योगमार्ग से कालात्मा सिद्धि को बतलाता हूँ…

योगमार्ग की साधनाओं में…

  • जब काल को अपनी काया से बाहर की ओर देखा जाता है, तब वो काल एक खण्डित, चक्र स्वरूप में साक्षात्कार होता है I ऐसी दशा में साधक उस काल को उस काल के कालचक्र, अर्थात सदैव गतिशील या परिवर्तनशील स्वरूप में साक्षात्कार करता है I

काल का सदैव परिवर्तनशील गतिशील स्वरूप ही जगत कहलाता है, जिसमें समस्त जीव बसे होते हैं और जो समस्त जीवों के भीतर भी अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड स्वरूप में बसा होता है I सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड भी वही प्राथमिक ब्रह्माण्ड है, जो ब्रह्म की इच्छा शक्ति से उत्पन्न हुआ था और जिससे दैविक या कारण जगत, सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत की उत्पत्ति हुई थी I

 

परन्तु आगे बढ़ने से पूर्व, जगत शब्द की मूल परिभाषा बतानी होगी…

जगत शब्द दो शब्दों से बना है, जो जा (या ज) और गत् हैं I

इन दोनों शब्दों में से जा शब्द का अर्थ, अजा (या अज या अजन्मा) शब्द से विपरीत होता है, इसलिए इस जा शब्द का अर्थ, “वो जो जन्मा है”, aisa hota hai…,और गत् शब्द का अर्थ, गतिशीत परिवर्तनशील होता है I

इसलिए “वो जो जन्मा और परिवर्तनशील गतिशील है, उसे ही जगत कहते हैं” I

लेकिन यही तो काल का चक्र रूप, अर्थात कालचक्र भी है I इसलिए चाहे कालचक्र बोलो या जगत बोलो… बात एक ही है I

कालचक्र, जो उस अखण्ड सनातन काल से संबंधित है और उस अखण्ड सनातन काल का ही अंग है, और जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म से ही स्वयंप्रकट हुआ था, वो कालचक्र ही जगत कहलाता है और जहां वह जगत रूपी कालचक्र भी उस चक्ररूप से रहित, अनादि अनंत अखण्ड सनातन काल में ही बसा हुआ है… अर्थात कालगर्भित है I

यही कारण है, कि वेद मनीषीयों ने, जीव जगत को कालगर्भित कहा है I

ऐसा ही काल साधना में तब साक्षात्कार होगा, जब साधक इस काल को अपनी काया से बाहर साक्षात्कार करेगा I

  • और जब उसी काल को योगी उसकी अपनी काया के भीतर, साधनामार्ग से अध्ययन करेगा, तो वही पूर्व का खण्डित कालचक्र स्वरूप, उसके अपने गंतव्य अखण्डित रूप में योगी के आत्मस्वरूप में ही साक्षात्कार किया जाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसी अखण्ड काल को महाकाल कहा जाता है, और इसी अखण्ड काल अर्थात महाकाल की दिव्यता को महाकाली कहा गया था I महाकाली ही ब्रह्माण्ड की वह दिव्यता है, जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा कहलाती है और ऐसी दशा में वह महाकाली, हाथ वाली देवी रूप में ही साक्षात्कार होती हैं I

इसी उकार या हिरण्यगर्भ से काल स्वयंउत्पन्न हुआ था, अपने तीन विभाजित या खण्डित स्वरूपों में I

काल के त्रिकाल रूपी खण्डित स्वरूप को त्रिकाल कहा जाता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में होता है I पञ्च मुखी सदाशिव मार्ग पर, त्रिकाल की शक्ति, अर्थात त्रिकाली शक्ति हैं, जो हिरण्यगर्भ की सुपुत्री हैं और उन्ही त्रिकाली को महाकाली भी कहा गया है I

हिरण्यगर्भ से स्वयंउत्पन्न होने से पूर्व, वह काल अखण्डित था I ऐसे अखण्डित स्वरूप में, काल अपने मूल शाश्वत, अनादि-अनंत सनातन रूप में था I और हिरन्यगर्भ से कालचक्र स्वरूप में स्वयं प्रकट होने के पश्चात, वाही अखण्ड काल अपने त्रिकाल रूप में आया था, और जहां वह त्रिकाल स्वरूप कालचक्र उसी अखण्ड जगतातीत काल का ही जगत स्वरूप हुआ था I

उकार मार्ग पर गमन करता हुआ योगी, उकार को साक्षात्कार करके और उसको धारण करने से पूर्व, उसके अपने ही जगत स्वरूप में कालचक्र को पाएगा I और इस कालचक्र से ही आगे जाकर (अर्थात पार करके) वो योगी उस काल को पाएगा, जो अखण्ड सनतान, महाकाल कहलाता है I

इस महाकाल को पाने से पूर्व, योगी उस योगतंत्र में जाएगा, जिसे मैंने महाकाल महाकाली योग, ऐसा कहा है, जो योगी के आज्ञा चक्र के समीप होता है और जिसमें योगी का अन्तःकरण चतुष्टय भी विलीन होता है I इस महाकाली महाकाल योग के बारे में किसी बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

जो योगी कालचक्र के खण्डित चक्र स्वरूप और उसी काल के अखण्ड सनातन स्वरूप, दोनों को ही पा गया, और इसके बाद उस योगी का अंतःकरण चतुष्टय भी उसी “काल और काल की दिव्यता की योगावस्था में (अर्थात महाकाल महाकाली योग में)” विलीन (या लय) भी हो गया, तब महाब्रह्माण्ड की दिव्ताओं में वो योगी  कालात्मा भी कहलाता है I

ऐसा योगी, काल को ही ब्रह्म रूप में, अपने आत्मस्वरूप में पाता है I आश्रम चतुष्टय में, यह कालात्मा नामक सिद्धि गृहस्त आश्रम की सिद्धि है I मेरे पूर्व जन्मों के उन पुरातन कालों में, इस सिद्धि को काल ब्रह्म भी कहा जाता था I

यही कारण है कि उकार मार्ग, कालात्मा सिद्धि का मार्ग भी है I

जिस योगी की चेतना उकार में विलीन ही हो गई, वो भी उसी महाब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में कालात्मा कहलाता है I

कालात्मा का साधारण अर्थ होता है, अखण्ड काल रूपी आत्मा और आत्मा रूपी अखण्ड काल, जो कालचक्र के प्रत्येक भाग में बसा होता है और जिसमें कालचक्र के समस्त भाग भी बसे हुए होते हैं I और ऐसा होता हुआ वह कालचक्र का नियंत्रक होता है, और नियंत्रक होता हुआ भी वह उस कालचक्र रूपी जीव जगत का साक्षी मात्र ही रहता है I

अखण्ड काल रूपी ब्रह्म ही कालचक्र रूपी जीव जगत हुआ है, और ऐसा होता हुआ भी, वह अखण्ड काल ब्रह्म अपनी ही कालचक्र रूपी जीव जगत नामक अभिव्यक्ति का साक्षीमात्र ही रहा है… और ऐसा ही वह कालात्मा भी होता है I

और क्यूंकि कल को उसके चक्र रूप में हिरण्यगर्भ ब्रह्म तभी अभिव्यक्त कर पाए थे, जब वह रजोगुणी होके, जीव जगत के रचैता हुए थे, और क्यूँकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म के रचैता स्वरूप को ही कार्य ब्रह्म कहा जाता है, इसलिए इन सभी बिंदुओं का नाता उन कार्य ब्रह्म से भी है I

कार्य ब्रह्म जो इस जीव जगत के रचैता हैं, वही कालचक्र के प्रादुर्भाव के कारण और कारक भी हैं, और इसीलिए वह कालचक्र के समस्त भागों से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण वह समस्त जीव जगत से भी योग किए हुए हैं और योगेश्वर कहलाए हैं I

 

उकार और योग मार्ग, हिरण्यगर्भ और योग मार्ग, कार्य ब्रह्म और योग मार्ग, योगेश्वर और योग मार्ग, …

योग तंत्र ही मूल मार्ग होता है I सभी उत्कर्ष मार्गों के मूल में योग होता है I

आज के समय के, बन्दर के समान नाच या सांड के समान स्वास प्रश्वास प्रक्रिया को योग नहीं कहते I यह तो योग के नाम पर ही प्रपञ्च फैलाया गया है I

अपनी वास्तविकता में, योग आंतरिक होता है…, न कि बाहर का कुछ I

आंतरिक योग वो होता है, जो साधक के भीतर की दिव्यताओं को जागृत कर दे, और इसके पश्चात साधक की काया के भीतर के ब्रह्माण्ड को ही, उस ब्रह्माण्ड से जोड़ दे, जिसमें साधक अपने उस समय के काया रूप में बसा हुआ है I

इसका अर्थ हुआ, जो मार्ग साधक के पिण्ड के भीतर ही उस सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड को जागृत कर दे, जो पितामह ब्रह्म की रचना में सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड कहलाया था, और जो पितामह ब्रह्म के भाव रूपी इच्छा शक्ति से, उनके साधन स्वरूप में ही स्वयंउत्पन्न हुआ था…, वो योग मार्ग कहलाता है I

और ऐसे मार्ग का सिद्ध साधक, अंततः, ब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में योगी कहलाता है I

जीवों के दृष्टिकोण से, योगी शब्द से बड़ी कोई उपाधि भी नहीं होती, क्यूंकि योग ही सब उत्कर्ष मार्गों और उनकी उपाधियों का ऐसा मूल है, जिसका कोई और मूल ही नहीं है I

और ऐसे योगमार्ग पर गमन करता हुआ साधक, अंततः, अपनी ही आत्मा को ब्रह्मरूप में पाता है, और अपने ही पिण्ड के भीतर के तत्त्वों को, ब्रह्माण्ड रूप में I

जो वास्तविक योगी है, वो कभी भी योग तंत्र का या योगमार्ग का बनिया नहीं होता, अर्थात योगी कभी भी योग (या ज्ञान या किसी भी उत्कर्ष मार्ग) का व्यापार नहीं करता, क्यूंकि उसको पता है, कि न तो ब्रह्माण्ड में उत्कर्ष मार्ग के मूल का, और न ही आत्मा या ब्रह्म का कभी व्यापार किया जा सकता है I

जो साधक योगमार्गी नहीं, अर्थात योगी नहीं, वह किसी भी तत्त्व का साक्षात्कारी हो ही नहीं सकता I

जो साधक अपने मार्ग की वास्तविकता में योगी ही नहीं होता, वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म का साक्षात्कारी भी नहीं होता I

इसलिए, इस अध्याय के मार्ग पर केवल योगीजन ही गमन और रमण कर सकते हैं, क्यूंकि जहाँ तक इस अध्याय की बात है…, योगी के सिवा, और किसी भी माई के लाल की औकात ही नहीं, कि इस अध्याय में आ सके, या इसके बिन्दुओं को अपनी साधनाओं में पा सके (अर्थात साक्षात्कार करके धारण कर सके) I

 

उकार और वायु, उकार और प्राण वायु,

ऐसे मार्ग पर, साधक अपने पिण्ड में बसे हुए वायु तत्त्व का आलम्बन लेके ही जाता है I लेकिन इस उकार के मार्ग में, साधक के शरीर के भीतर ही, उस वायु की अभिव्यक्ति भी एक भयंकर तैजस धारी प्राणवायु (अर्थात प्राणों) के स्वरूप में ही होती है I

जब योगी की चेतना, उकार में पहुँच जाती है, तब अकस्मात् ही उस योगी के प्राण प्रबल हो जाते हैं, जिससे वो प्राण, उस योगी की चेतना को ऊपर की ओर, अर्थात मकार और शुद्ध चेतन तत्त्व (या ब्रह्मतत्त्व) से लेकर, ॐ के शब्दात्मक और लिपीलिंगात्मक स्वरूप की ओर ढकेल (या ठेल) देते हैं I

ऐसी दशा में, उकार साक्षात्कार के कारण, वो प्रबल हुई प्राणवायु, उस साधक की चेतना को अकस्मात् ही एक विस्फोटक धक्का देती हैं, जिससे वो चेतना तीव्रगति से, अपने उत्कर्ष मार्ग पर उकार (या कार्य ब्रह्म या योगेश्वर) से भी आगे की ओर जाने लगती है I

ऐसी दशा में, जो साक्षात्कार पूर्व में धीरे धीरे चल रहे थे, वो भी तीव्रता से, एक के बाद एक, अकस्मात् ही होने लगते हैं I

यही कारण था, कि कार्य ब्रह्म (या योगेश्वर) को उकार शब्द से पुकारा गया था, जिसका अर्थ है, “वो जो चेतना को ऊपर की ओर, अर्थात उत्कर्ष की ओर अति तीव्रगति से लेके जाए” I

तो अब इसी बिंदु पर यह अध्याय समाप्त करता हूँ I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय I

 

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