तृष्णा, इच्छा शक्ति, सर्वसमता गुफा, भावना, मूल कारण गुफा, कारक गुफा, कारण गुफा, जीवों की मूल इच्छा, प्रकृति की प्रथम इच्छा, बृहत्तर पूर्णता गुफा, महत्तर पूर्णता गुफा, पितामह ब्रह्मा गुफा, ब्रह्मा गुफा

तृष्णा, इच्छा शक्ति, सर्वसमता गुफा, भावना, मूल कारण गुफा, कारक गुफा, कारण गुफा, जीवों की मूल इच्छा, प्रकृति की प्रथम इच्छा, बृहत्तर पूर्णता गुफा, महत्तर पूर्णता गुफा, पितामह ब्रह्मा गुफा, ब्रह्मा गुफा

यहाँ पर हृदयाकाश गर्भ की तृष्णा, इच्छा शक्ति, इच्छा गुफा, सर्वसमता गुफा, भावना गुफा, इच्छा शक्ति गुफा, मूल कारण गुफा, मूलकारण गुफा, कारक गुफा, कारण गुफा, तृष्णा गुफा, जीवों की मूल इच्छा, प्रकृति की प्रथम इच्छा आदि बिंदुओं पर बात होगी I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2011 ईस्वी के प्रारम्भ का है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भत्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भत्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकेर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का सैंतालीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये अध्याय आंतरिक यज्ञमार्ग की श्रृंखला का चौदहवाँ अध्याय है।

 

तृष्णा, इच्छा शक्ति, इच्छा गुफा, सर्वसमता गुफा, भावना गुफा
तृष्णा, इच्छा शक्ति, इच्छा गुफा, सर्वसमता गुफा, भावना गुफा

 

हृदयाकाश गर्भ की इच्छा गुफा, इच्छा शक्ति की गुफा, हृदयाकाश गर्भ की भावना गुफा, भावनाओं की गुफा, हृदयाकाश गर्भ की इच्छा शक्ति गुफा, तृष्णा की गुफा, भावना की गुफा, … मूलकारण की गुफा, मूल कारण गुफा क्या है, मूल कारण की गुफा, कारक गुफा क्या है, तृष्णा गुफा क्या है, भावना गुफा क्या है, कारण गुफा क्या है, … इच्छा गुफा, तृष्णा  गुफा, इच्छा शक्ति गुफा, इच्छा गुफा, भावना गुफा, …

सनातन गुरुदेव बोले… सबका मूल इच्छा ही होती है, इसलिए इच्छा से ही सबकुछ चलित हुआ है I ब्रह्म की इच्छा शक्ति से ही यह ब्रह्मरचना हुई है, और ऐसा होने के कारण, जो भी इस जीव जगत में है, वह ब्रह्म इच्छा के कारण, अर्थात ब्रह्म की इच्छा शक्ति के कारण ही उत्पन्न हुआ है I इसी इच्छा शक्ति की गुफा में ही तृष्णा निवास करती है, इसलिए उसको तृष्णा गुफा भी कहा जा सकता है I इसी इच्छा शक्ति से भावनाओं का नाता होता है, इसलिए इसको भावना गुफा भी कहा जा सकता है I इच्छा शक्ति ही जीव जगत के प्रादुर्भाव का मूल कारण है, इसलिए इसको कारण गुफा और मूल कारण गुफा भी कहा जा सकता है I इसी इच्छा शक्ति के दृष्टिकोण से, यही इच्छा रूपी कारण ही जीव जगत के कारक रूप में स्वयंप्रकट होती है, इसलिए इसको कारक गुफा भी कहा जा सकता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इच्छा का सीधा-सीधा नाता (अर्थात प्रत्यक्ष नाता) बुद्धि और चित्त दोनों से ही समान रूप में होता है, इसलिए इस इच्छा गुफ़ा का स्थान भी बुद्धि गुफा (विज्ञान गुफा) और चित्त गुफा, दोनों के मध्य में ही होता है I इच्छा का घूमता हुआ नाता (अर्थात अप्रत्यक्ष या परोक्ष) नाता सत्त्वगुण और रजोगुण से होता है, इसलिए बुद्धि और चित्त गुफाओं, दोनों की ओर सत्त्वगुण और रजोगुण की गुफाएं होती है I इन सत्त्वगुण और रजोगुण के प्रभाव में आकर, इच्छाएं मन और सिद्धांत से चालित होती हैं, इसलिए इन सत्त्वगुण और रजोगुण गुफाओं के दोनों ओर, सिद्धांत और मन की गुफाएँ होती हैं I ऐसा होने पर ही यह इच्छाएं तमोगुण में कारण, अपनी दशा को स्थिर करके, पञ्च महाभूत से निर्मित जीव जगत में प्रवेश करके, उन जीव जगत के कर्ममय स्वरूप में क्रियान्वित होती हैं, और उन कर्मों का कारण और कारक, दोनों बनती हैं I और जहां ऐसे क्रियान्वित होने के लिए, उनका नाता प्राणों से होता है, जो सीधा-सीधा रजोगुण से नाता रखते हैं और इसीलिए प्राण गुफा, रजोगुण गुफा के समीप ही होती है I  और जब साधक कर्मातीत मुक्ति का मार्ग पर जाने का पात्र बनता है, तब ही वह साधक हृदयाकाश गर्भ तंत्र में जाकर, योगाग्नि गुफा का आलम्बन लेकर, समस्त कर्मों, उनके फलों, कर्मफलों के बीज रूप जो चित्त के संस्कार होते हैं, और उन संस्कारों की मार्ग रुपी ऊर्जाओं से भी अतीत होने की ओर चल पड़ता है, और जिसका मार्ग भी सर्वसम तत्त्व की गुफा (अर्थात सर्वसम गुफा) से ही होकर जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह सर्वसम गुफा (अर्थात सर्वसमता गुफा) इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र का वह उत्कर्ष पथ है, जिसका आलम्बन लेकर साधक अपने मुक्तिमार्ग पर ही चल पड़ता है, इसीलिए यह सर्वसमता की गुफा ही इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र का अंतिम भाग और ज्ञान है I हृदयाकाश गर्भ तंत्र नामक उत्कर्ष पथ के दृष्टिकोण से, इस सर्वसम गुफा को पार करके ही साधक का ब्रह्मपथ प्रशस्त होता है और ऐसा इसलिए होता है, क्यूंकि इस सर्वसम गुफ़ा का नाता ब्रह्मलोक से, वामदेव ब्रह्म से और सदाशिव के सद्योजात मुख से भी है I और ऐसा होने के कारण, इस सर्वसम गुफ़ा का नाता, उन सर्वसम, सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति से ही है I

और इसके पश्चात सनातन गुरुदेव बोले… यही सब गुफाएँ इस हृदयाकाश गर्भ में भी पाई जाती हैं I

 

हृदयाकाश गर्भ की सर्वसमता गुफा, सर्वसमता की गुफा, सर्वसमता गुफा क्या है, सर्वसम गुफा क्या है, हृदयाकाश गर्भ की सर्वसम गुफा,मुक्तिमार्ग गुफा, ब्रह्मपथ गुफा, बृहत्तर पूर्णता गुफा क्या है, बृहत्तर पूर्णता की गुफा, महत्तर पूर्णता गुफा क्या है, महत्तर पूर्णता की गुफा, … प्रजापति गुफा, ब्रह्मलोक गुफा, पितामह ब्रह्मा गुफा क्या है, ब्रह्मा गुफा क्या है, … सर्वसम गुफा और ब्रह्मपथ, सर्वसम गुफा और मुक्तिपथ, सर्वसम गुफा और मुक्तिमार्गसर्वसम गुफा और शारदा सरस्वती, सर्वसम गुफा और माँ शारदा, सर्वसम गुफा और शारदा विद्या, …

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह सर्वसम गुफा हीरे के समान प्रकाशमान है, और इसी ने इस हृदयाकाश गर्भ के समस्त भागों को घेरा हुआ है I जबतक योगी की चेतना इस सर्वसम गुफा में प्रवेश करके, इसको पार नहीं करेगी, तबतक वह योगी ब्रह्मपथ पर गमन करने का पात्र भी नहीं कहलाया जा सकता I इसलिए यह सर्वसम गुफा की सिद्धि ही ब्रह्मपथ पर गमन करने की पात्रता को दर्शाती है I ब्रह्मपथ ही मुक्तिमार्ग है, इसलिए जबतक ब्रह्मपथ की पात्रता ही नहीं मिली, तबतक वह योगी मुक्तिपथ पर गमन करने का पात्र भी नहीं हो सकता है I जबतक योगी मुक्तिमार्ग का ही पात्र नहीं होता, तबतक वह कैवल्य मुक्ति को प्राप्त भी नहीं होगा I इसीलिए इस सर्वसम गुफ़ा को मुक्तिमार्ग गुफा, ब्रह्मपथ गुफा आदि भी कहा जा सकता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि इस सर्वसम गुफ़ा ने ही समस्त हृदयाकाश को घेरा हुआ है, इसलिए हृदयाकाश गर्भ तंत्र के दृष्टिकोण से यह अंतिम साक्षात्कार ही है I और क्यूंकि यही सर्वसम तत्त्व ने समस्त चलित ब्रह्माण्ड (अर्थात संसार) को घेरा हुआ है, और क्यूंकि सर्वसम होकर ही इस बहुवादी भवसागर रूपी ब्रह्माण्ड को पार किया जाता है, और क्यूंकि इसी सर्वसम गुफा की ओर यह समस्त संसार और उसका तंत्र चलित भी हो रहा है, और क्यूंकि जो भी सर्वसमता के समीप आता है, वह सर्वसम ही ही जाता है, इसलिए इस सर्वसम गुफा को बृहत्तर पूर्णता गुफा, बृहत्तर पूर्णता की गुफा, महत्तर पूर्णता गुफा, महत्तर पूर्णता की गुफा आदि भी कहा जा सकता है I क्यूंकि तैंतीस कोटि देवी देवताओं में सबसे ऊपर के (अर्थात शिखर के) देवता, सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म ही हैं, इसलिए ह्रदय आकाश गर्भ में जो समस्त ब्रह्मरचना, अर्थात सम्पूर्ण पिण्ड ब्रह्माण्ड का ही द्योतक है, वह भी यही यह सर्वसम तत्त्व की गुफा है, और ऐसा होने के कारण ही यह गुफा हृदयाकाश गर्भ तंत्र के अंतर्गत आते हुए अंतिम साक्षात्कार को भी दर्शाती है I जिस योगी ने इस सर्वसम तत्त्व की गुफा का साक्षात्कार करके, उसको पार किया है, वह योगी ब्रह्माण्ड योग से अतीत होने का मार्ग पर ही चल पड़ता है I और जहां वह ब्रह्माण्ड से अतीत होने का मार्ग ही मुक्तिमार्ग या ब्रह्मपथ कहलाता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

इसके पश्चात गुरुदेव बोले… और इसी मार्ग पर चलकर, तुम भी (अर्थात नन्हा विद्यार्थी भी) अपना ब्रह्मपथ, “स्वयं ही स्वयं में” रहकर ही प्रसस्त करोगे, क्यूंकि उस कर्मातीत ब्रह्म का मार्ग इससे ही प्रशस्त होता है I जब तुम इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को सिद्ध करके, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य के भावार्थ में रहकर, इस हृदयाकाश गर्भ से आगे जाओगे, तो ब्रह्मपथ पर ही जाओगे, क्यूंकि इस हृदयाकाश गर्भ से आगे ही वह ब्रह्मपथ है, जिसकी स्वामिनी और दिव्यता वह जगदगुरु माता, शारदा सरस्वती ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… योगीजनों और साधकगणों का कर्म केवल जगदगुरु माता, शारदा विद्या तक ही पहुंचना होता है, क्यूंकि जब योगी उन जगदगुरु माता के पास पहुँच जाता है, तब वह जगदगुरु माता, शारदा विद्या सरस्वती ही उस योगी का हाथ पकड़कर, उस योगी को अपने संपूर्ण माया जगत से आगे लेकर जाती हैं I यह भी वह कारण है, कि कोई योगी हुआ ही नहीं जिसनें समस्त माया जगत पार किया था, और उस योगी का हाथ पकड़कर जगदगुरु माता, शारदा सरस्वती विद्या उस योगी को अपने माया जगत से पार लेकर नहीं गई थीं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… प्रत्येक ब्रह्मपाथगामी योगी के अंतिम पथहीन भागहीन पथ, अर्थात ब्रह्मपथ या मुक्तिमार्ग की गुरुदेवी, दिव्यता, ज्ञान शक्ति, चेतना शक्ति, क्रिया शक्ति, रक्षक और मातृ शक्ति को ही माँ शारदा देवी (या देवी शारदा) कहा जाता है I इसलिए किसी भी योगी का कर्म भी तब ही समाप्त माना जाता है, जब वह योगी माँ शारदा के उस लोक में पहुँच जाता है, जो भ्रूमध्य से थोड़ा सा ऊपर की ओर होता है, और जिसका मार्ग उन्ही माँ शारदा के उस स्थान से निकलता है, हो हृदय क्षेत्र में होता है. और जिसका संकेत ब्रह्मसूत्र के चौथे अध्याय में दिया गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र भी उन्हीं जगदगुरु माता शारदा तक लेकर जाने वाला मार्ग ही है I माँ शारदा ही उस योगी को अपने माया जगत से अतीत लेकर जाती है, और इसीलिए माँ शारदा ही जगदगुरु कहलाती है, जो प्रत्येक योगी की अंतिम गुरु भी होती है I जिस योगी ने माँ शारदा के स्थान चतुष्टय का साक्षात्कार किया होगा, और उस योगी की चेतना इन स्थान चतुष्टय से भी गई होगी, उसी योगी पर माँ शारदा का पूर्ण अनुग्रह आता है I माँ शारदा के स्थान चतुष्टय में स्वाधिष्ठान चक्र, व्यान प्राण, ह्रदय कैवल्य गुफा सहित, उनका अंतिम स्थान, भ्रूमध्य से थोड़ा सा ऊपर बसा हुआ एक लोक भी होता है I जिस योगी ने भ्रूमध्य के ऊपर बसे हुए माँ शारदा के उस लोक को भी प्राप्त कर लिया है, उस योगी की अंतिम गुरुदेवी को ही जगद्गुरु माँ शारदा कहा गया है I माँ शारदा इस इस चतुर्दश भुवनात्मक ब्रह्माण्ड की गुरुमाई हैं, और माँ शारदा जी जगदगुरु नामक शब्द की वातविकता को दर्शाती हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इस संपूर्ण ब्रह्मरचना में, माँ शारदा सरस्वती ही एकमात्र जगदगुरु हैं I जो योगी शारदा विद्या के भ्रूमध्य के समीप जो स्थान है, उसपर ही पहुँच जाते हैं, उनके लिए तो माँ शारदा साक्षात पञ्चब्रह्म भी हैं, और वही शारदा विद्या साक्षात् पञ्च सरस्वती भी है… और अपने ऐसे उत्कृष्ट शिष्यों के लिए तो देवी शारदा पूर्ण ब्रह्म भी हैं I इसलिए जब तुम इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की सिद्धि के पश्चात, तुम्हारे अपने ही भ्रूमध्य से थोड़ा ऊपर जो उनका लोक है, उसमें पहुँच जाओगे, तो तुम भी माँ शारदा के शिष्य होकर ही रहना  I और जबकि तुम इस स्थान पर अकेले ही बैठे हुए होंगे, परन्तु तब भी उस स्थान पर अपना अधिपत्य मत ज़माना नहीं तो तुम माँ शारदा विद्या की इस परीक्षा में उत्तीर्ण ही नहीं हो पाओगे और ऐसा होने पर तुम उन जगदगुरु माँ शारदा को प्राप्त होकर भी, उनका मुक्तिपथ नामक अनुग्रह प्राप्त नहीं करोगे I जो योगी उन शारदा विद्या की इस अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, वही माँ शारदा का शिष्य होने का पात्र बनता है, और अपने शिष्यों पर उन जगदगुरु माता, पूर्ण ब्रह्म शारदा सरस्वती का परिपूर्ण अनुग्रह रहता ही है I इसी अनुग्रह को प्राप्त करके ही योगी का मुक्तिपथ प्रशस्त होता है, और अंततः वह योगी कैवल्य मोक्ष को भी प्राप्त होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… उन जगदगुरु माता के लोक का मार्ग भी तब ही प्रशस्त होता है, जब साधक इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की सर्वसम गुफा को पार करके, ब्रह्मसूत्र के चौथे अध्याय में जाकर, और इसके पश्चात कुछ और दशाओं को पार करके, माँ शारदा सरस्वती के उस लोक में पहुँच जाता है, जिसमें माँ शारदा जगदगुरु स्वरूप में निवास करती हैं I और इस मानव काया के दृष्टिकोण से, माँ शारदा का वह लोक, भ्रूमध्य से थोड़ा सा ऊपर होता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

हृदयाकाश गर्भ की मूल कारण की गुफा, हृदयाकाश गर्भ की मूलकारण गुफा, हृदयाकाश गर्भ की कारक गुफा, हृदयाकाश गर्भ की कारण की गुफा, हृदयाकाश गर्भ की कारण गुफा, हृदयाकाश गर्भ की कारक गुफा, …

सनातन गुरुदेव बोले… (जैसे ऊपर के चित्र में दिखाया गया है) यह गुफा, चित गुफा के समीप है I चित्त गुफा में ही संस्कार निवास करते हैं और जहां वह संस्कार, पूर्व कर्मों के बीजस्वरूप फल ही होते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब साधक को कोई इच्छा होती है, तो इस चित्त गुफ़ा में जो संस्कार उस इच्छा के अनुसार होते हैं, वह चलित होने लगते हैं I और इसके अतिरिक्त, इच्छाएं भी वही होती हैं, जिनके संस्कारों को चलित होना होता है,अर्थात उन संस्कारों के कर्मों में फलित होने का समय और दशा आ गई होती है I और चलित होकर चित्त के उन संस्कारों को अगले कर्मों का कारण और कारक भी बनना होता है I जब संस्कार अगले कर्मों के करक बनते हैं, तब ही कोई इच्छा प्रकट होती है, और उन इच्छाओं से कर्म होते हैं, जिनसे कर्मफल प्राप्त होते है और जहां वह कर्मफल भी चित्त में एक संस्कार रूप में ही पुनर्स्थापित हो जाते है I जब कोई संस्कार फलित होता है, तब वह अपनी पूर्व की दशा से सूक्ष्म भी हो जाता है I

संस्तान गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि संस्कार ही इच्छाओं के कारक होते हैं, इसलिए संस्कार रहित चित्त को पाया हुआ साधक चित्तातीत भी होता है और इच्छातीत भी हो ही जाता है I क्यूँकि संस्कार ही कर्मों के कारण होते हैं, इसलिए संस्कार रहित चित्त को पाया हुआ साधक कर्मातीत ही होता है I और क्यूँकि संस्कार ही उन कर्मो के कारण होते हैं, जिनसे कर्म फलों का उदय होता है, इसलिए संस्कार रहित चित्त को पाया हुआ साधक फलातीत ही होता है I क्यूँकि फलातीत दशा ही कर्मातीत और संस्कारतीत दशाओं को दर्शाती है, जो इच्छातीत अवस्ता का भी द्योतक होती है, इसलिए…

कर्मातीत मुक्ति ही इच्छातीत, भावातीत, फलातीत, भोगातीत, संस्कारातीत है I

और जहां यह सबके सब शब्द, निर्बीज ब्रह्म के ही द्योतक हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब इच्छाएं प्रकट होती हैं, तब जो संस्कार उससे नाता रखते हैं, वह भी जागृत हो जाते हैं I जागृत होने के पश्चात, उस संस्कार पर प्राण गुफा का प्रभाव आता है, और चालित होकर अंततः वह संस्कार मनस गुफा में पहुँच जाता है I ऐसा होने पर इन संस्कारों का प्रभाव इन्द्रियों पर आता है I इच्छा की सापेक्ष सुक्ष्मता, संस्कारों से अधिक होती है, इसलिए इच्छा संस्कारों को भेदती है, और ऐसा तब भी होता है, जब उस संस्कार की ऊर्जात्मक कम्पन मन के गोले में ही पहुँच जाती है I जो सूक्ष्म होता है, वही अपने से स्थूल का चालक भी होता है, इसलिए इच्छा से ही यह संस्कार चलित होकर, कर्म और कर्म फल के स्वरूप में आते हैं I इस समस्त कर्म और कर्मफल की प्रक्रिया के मूल में, इच्छा ही होती है I और ऐसा होने पर भी, इच्छा भी उसी प्रकार की होती है, जिसके अनुरूप किसी संस्कार के फलित होने का समय आ जाता है, और जहां यह फलित होने की प्रक्रिया भी कर्म रूप में आकर, कर्मफल का स्वरूप ही धारण करती है I और जहां वह कर्मफल भी चित्त के भीतर, एक संस्कार स्वरूप में ही प्रतिष्ठित हो जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब उस संस्कार की ऊर्जा मन में बसी हुई ज्ञानेंद्रियों और कर्मेन्द्रियों पर आती है, तो वह इन्द्रियां उन्हीं कर्मों को करने को बाध्य हो जाती है, जिससे संबंधित वह संस्कार की ऊर्जा होती है क्यूंकि जबतक ऐसे कर्मों को नहीं किया जाएगा, तबतक उस संस्कार की ऊर्जाओं का प्रभाव भी इंद्रियों पर समाप्त नहीं होगा I इसलिए चित्त में निवास करते हुए संस्कार जो पूर्व में करे गए कर्मों के फलरूप ही थे, वही किसी आगामी समय में अगले कर्मों के कारण बन जाते हैं I और जहां वह कर्म भी इसीलिए किए जाते हैं, ताकि उन संस्कारों की ऊर्जाएं जो इंद्रियों पर प्रभाव डाल रही है, उनसे इन्द्रियों और मन को छुटकारा मिल सके I इसलिए कर्मों का कारण जो संस्कार ही होता है, वह कर्म भी इसलिए क्रियान्वित होते हैं ताकि वह संस्कारों के प्रभाव को मन और इंद्रियों से दूर कर सकें I ऐसा भी इसलिए होता है, क्यूंकि मन और इन्द्रिया उन सांस्कारिक ऊर्जा को पाकर विचलित होती है, और उन्हें अपने से दूर करने के लिए जो भी करना पड़े, वह करती है, और यही अगले कर्मों का कारण बन जाता है I जितनी सूक्ष्म उन संस्कारों की दशा होगी, उतनी ही उच्च उनकी ऊर्जाओं होंगी, और उतने की व्यापक वह भाव होंगे जिनको साधक पाएगा और उतने ही सार्वभौम कर्म भी किए जाएंगे I और उन कर्मों से जो फल रूपी बीज चित्त के संस्कार रूप में प्रकट होंगे, वह भी अपनी पूर्व की दशाओं से अधिक सूक्ष्म ही होंगे I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

विचारहीन और इच्छारहित अवस्थाविचारहीन अवस्था, इच्छारहित अवस्था, चित्त की संस्कार रहित अवस्था, विचारहीन और इच्छारहित दशाविचारहीन दशा, इच्छारहित दशा, संस्कार रहित अवस्थाचित्त की संस्कार रहित दशा, संस्कार रहित दशा, निर्बीज ब्रह्म कौन,

सनातन गुरु बोले… ब्रह्मरचना मे जब चीत और बुद्धि का उदय हुआ था, तब चित्त बुद्धि से सापेक्ष सूक्ष्मता (अर्थात चित्त की बुद्धि से अधिक सूक्ष्मता थी) को धारण किया हुआ था, और ऐसा इसलिए था, क्यूंकि उदयावस्था की दशा में चित्त संस्कार रहित ही था I परन्तु जैसे-जैसे ब्रह्मरचना की प्रक्रिया आगे की ओर चलित होती गई, वैसे-वैसे चित्त उस ब्रह्माण्डोदय के समय जो संस्कार बनते चले गए, उनको धारण करता चला गया, और इससे चित्त की सूक्ष्मता भी न्यून होती चली गई I और इस प्रक्रिया के अंत में वह दशा आई जिसमें बुद्धि ही चित्त से सूक्ष्म हो गई थी I समस्त उत्कर्ष पथ चित को उसकी प्राथमिक उदयावस्था की सूक्ष्मता में स्थापित करने हेतु ही होते हैं, इसलिए…

जो चित्त को उसकी प्राथमिक सूक्ष्मता की ओर लेकर जाए, वही उत्कर्षपथ होता है I

जो चित्त को संस्कारातीत कर दे, अर्थात निर्बीज ही कर दे, वही मुक्तिपथ है I

संस्कारातीत, अर्थात संस्कार रहित चित्त, निर्बीज ब्रह्म का द्योतक है I

निर्बीज ब्रह्म का मार्ग निर्बीज समाधि से ही प्रशस्त होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब चित्त और बुद्धि का उदय हुआ था, तब जो चित्त था,वह बुद्धि से सूक्ष्म था I सूक्ष्म ही अपने से स्थूल के भीतर निवास करके, उस स्थूल का चालक होता है I उदयावस्था के समय में चित्त के बुद्धि से सापेक्ष सूक्ष्म होने के कारण, चित का श्वेत वर्ण, बुद्धि के पेले वर्ण के भीतर दिखाई देता था I इसलिए उदयावस्था के दृष्टिकोण से चित्त बुद्धि का चालक ही था I और ब्रह्माण्ड के उदय समय से, संस्कारों को धारण करता करता, जब वह चित्त उस दशा में आ गया जिसमें बुद्धि ही चित्त से सूक्ष्म हो गई, तो ऐसी दशा में बुद्धि  ही चित्त को भेदकर, चित्त के भीतर दिखाई देने लगी थी I लेकिन उस वास्तविकता में, जो ब्रह्माण्डोदय के समय की थी, ऐसा नहीं था, क्यूंकि उस समय पर चित्त ही बुद्धि का चालक था, और संस्कार रहित चित्त के प्रभाव से ही बुद्धि चलित होती थी I यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र, चित्त को उसकी वास्तविक उदयावस्था में लेकर जाने का मार्ग ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब इस भाग के बिन्दुओं पर आते हैं… उस सूक्ष्म सांस्कारिक ऊर्जा से पिण्ड छुड़ाने के लिए, मन के पास बस दो ही विकल्प होते हैं…

  • प्रथम विकल्प… साधारण मार्ग का है I इस विकल्प में वह संस्कारिक ऊर्जा जो ज्ञानेन्द्रिय में घुस चुकी है, उसको कर्मेन्द्रिय में भेजकर, ऐसे कर्मों को करा जाता है जिससे वह संस्कार ही फलित हो जाए, और फलित होकर और सूक्ष्म भी हो जाए I जब कोई संस्कार फलित होता है, तो वह अपनी फलित होने के पूर्व की दशा से अधिक सूक्ष्मता को पाता है I जब ऐसा होता है तब वह चित्त जिसके भीतर वह संस्कार पड़ा हुआ होता है, वह भी अपनी पूर्व दशा से कुछ ही सही, लेकिन अधिक सापेक्ष सूक्ष्मता को पाता है, और जहां यह सापेक्ष सूक्ष्मता भी उतनी ही होती है, जितना प्रभाव उस सूक्ष्म हुए संस्कार का चित्त पर पड़ता है I इसी प्रक्रिया से और शनैः शनैः, चित्त अपने प्राथमिक संस्कार रहित स्वरूप को भी पा जाता है I इस प्रक्रिया में बसे हुए पथ भी उत्कर्ष पथ ही कहलाते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जबकि यह संस्कारों की क्रियाएं इन्द्रियों और उनकी अतीन्द्रि, अर्थात मन में ही चालित होती हैं, लेकिन तब भी इसका प्रभाव चित्त पर ही पड़ता है I और इस प्रभाव का प्रमाण भी चित्त को उसकी उस वास्तविक (अर्थात प्राथमिक) स्थिति में लेकर जाता है, जो ब्रह्माण्डोदय के समय पर थी, और जिसमें वह चित्त संस्कार रहित ही था I

 

  • द्वितीय विकल्प… इसमें साधक को योगी होना होगा क्यूंकि यह योगमार्ग के अंतर्गत आता हुआ पथ है I इस विकल्प में वह साधक अपने तप और योगादि बल से ही स्वयं को उन चित्त की सांस्कारिक ऊर्जाओं से अतीत करता है I और इस प्रक्रिया में वह साधक उन संस्कारिक ऊर्जाओं को पुनः चित्त में भी भेज देता है, और वहीँ पर स्तम्भित भी कर देता है I जब ऐसा बारम बार किया जाता है, तब वह संस्कार जो चित्त में होते है, तब भी फलित नहीं हो पाते, जब उनके फलित होने का समय और दशा, दोनों ही आ चुकी होती हैं I इसका अर्थ हुआ, कि वह संस्कार तब भी अगले कर्मों के कारण नहीं बन पाते हैं, जब उनको बनना होता है, अर्थात जब उनको कर्ममय होना होता है, तब भी वह संस्कार कर्मों के कारक नहीं हो पाते हैंI इसलिए यदि यह प्रक्रिया बारम बार करी जाएगी, तो वह दशा ही आ जाएगी, जिसमें वह संस्कार फलित न होने के कारण, जड़ता को ही पा जाएंगे I ऐसा इसलिए होगा क्यूंकि इस प्रक्रिया से वह चित्त ही ऐसी मरुभूमि हो जाएगा, जिसमें कोई भी बीज रूपी संस्कार फलित ही नहीं हो पाएगा I इसलिए इस प्रक्रिया में चित्त नामक भूमि ही संस्कारों को फलित करने योग्य नहीं रहेगी और ऐसा होने के कारण, जितने भी बीज रूपी संस्कार उस चित्त में बसे हुए होंगे, वह सब के सब एक घनघोर तमोमय जड़त्व को पाकर, निर्बीज सरीके ही हो जाएंगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले…और जब ऐसा हो जाएगा, तो साधक उस संस्कार रहित चित्त को शनैः शनैः ही सही, लेकिन पा जाएगा, जिसको योगीजन निर्भाव और निर्बीज आदि समाधि से ही पाया करते हैं I और क्यूंकि इस संस्कार रहित दशा का मार्ग, संस्कारों के जड़ होने से जाता है, इसलिए ऐसा संस्कार किसी भी आगामी समय में फलित भी नहीं हो पाएंगे I जब संस्कारों की फलित होने की प्रक्रिया ही स्तम्भित हो जाती है, तो वह संस्कार नपुंसक से हो जाते है और अंततः नष्ट ही होते हैं I और जब चित्त के समस्त समकार ऐसी दशा को पा जाते हैं, तो वह चित्त शनैः सनेह ही सही, लेकिन संस्कार रहित हुए बिना रह भी नहीं पाता है, अर्थात अंततः संस्कार रहित ही हो जाता है I यदि किसी भी जन्म में और किसी भी साधक का चित्त, एक बार भी संस्कार रहित हो गया, तो उसमें आगामी किसी भी समय में संस्कार पुनः न तो निवास कर सकते हैं, और न ही उस चित्त में बसकर फलित ही हो सकते हैं I इसलिए संस्कार रहित चित्त को पाया हुआ साधक, अनादि कालों तक संस्कार रहित ही रहता है I

सनातन गुरुदेव बोले… जब किसी संस्कार के फलित होने का समय और दशा आ गई और उसके पश्चात भी वह फलित न हो, तो ऐसी दशा में वह संस्कार अपनी ऊर्जाओं को ही त्याग देता है, और जड़ सा ही होकर, नपुंसक से ही होकर, नष्ट भी होता है I ऐसी दशा में उस संस्कार की अभी की अवस्था तक आते आते, जितनी भी इच्छाएँ, भाव, कर्म और फल रहे होंगे, उनके बीज भी नष्ट हो जाते हैं I और ऐसा होने के कारण वह संस्कार आगामी किसी भी समय में फलित भी नहीं हो सकता है I अपने फलित होने के समय पर भी फलित न होने के कारण, वह नष्ट ही हो जाता है I इसलिए इस योगमार्ग से वह संस्कार ही नहीं, बल्कि उसकी मूल इच्छा, भाव, कर्म और फल तक नष्ट हो जाते हैं I जब वह मूल ही उस संस्कार के साथ न रहे, तो उसकी कोई और आगे की कोई कर्ममय दशा, या अकर्म में ही कोई दशा कैसे हो सकती है? I

सनातन गुरुदेव बोले… यह दूसरा विकल्प ही उत्तम विकल्प है क्यूंकि इसमें साधक मुक्तिमार्ग का भी ज्ञाता होता है, और मुक्ति का भी I मुक्तिमार्ग का ज्ञाता होने के अनुसार, जबतक वह साधक कायाधारी होकर रहेगा, तबतक वह प्रकृति गुरु (सिद्ध गुरु) सरीका होकर रहेगा… और कायातीत होने के पश्चात प्राप्त हुई मुक्ति (अर्थात विदेह मुक्ति) के अनुसार, वह साधक सर्वातीत भी होगा I ऐसा साधक अपने जीवन काल में ही कई सारे सिद्ध खड़े करने का तप और योग आदि बल रखता है, जिसके कारण उसके देहावसान के पश्चात भी कई सहस्र वर्षों तक उस पृथ्वीलोक में योगमार्ग स्थापित रह जाता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जीवों के चीत के भीतर बसे हुए संस्कारों के प्रतिबिम्ब उन जीवों के लोक की चित्तकाया में भी दिखाई देते हैं और ऐसा इसलिए होता है, क्यूंकि अपनी वास्तविकता में और ब्रह्मरचना में चित्त एक ही है I जैसे जब बहुत सारे गुब्बारे बनाए जाते हैं, तो उनके भीतर की वायु पृथक सी प्रतीत होती हुई भी, उसी वायुमण्डल का अभिन्न अंश ही होती है, जिससे उन गुब्बारों में वह वायु भरी गई थी, वैसे ही जीवों और अन्य सभी पिंण्डों के चित्त पृथक से प्रतीत होते हुए भी, वास्तव में वही ब्रह्माण्डीय चित्त काया ही है I जैसे समुद्र और उसकी सभी लहरें भी वही समुद्र ही होती हैं, वैसे ही जीवों और अन्य सभी पिंण्डों के चित्त और ब्रह्माण्डीय चित्त काया का नाता होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और क्यूँकि लोक की चित भी ब्रह्माण्डीय चित्त काया का अंग होती है, इसलिए जीवों के चित्त के भीतर बसे हुए यह संस्कार, ब्रह्माण्डीय चित्त काया में भी दिखाई देते हैं I जो इस संस्कार विज्ञान के पूर्ण ज्ञाता होते हैं, वह इन चित्त के संस्कारों का अध्ययन करके जान सकते हैं, कि किसी लोकादि का उत्कर्ष पथ पर क्या स्थान है और ब्रह्माण्ड के किस लोक में किस जीव का कौन सा संस्कार, किस लोक या ब्रह्माण्डीय स्थिति या दशा का कारण बना है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यदि किसी स्थूल लोक में (जैसे यह पृथ्वी लोक) बहुत सारे साधकगण यहाँ बताई गई सिद्धि को पा गए, तो आज के समय में इस पृथ्वीलोक के चित्त में जो विकृत संस्कारों के सागर से बने हुए हैं, वह भी नहीं रह पाएंगे, अर्थात वह भी नष्ट ही हो जाएंगे I ऐसा होने से जो होगा, अब उसको बताता हूँ…

  • जो योग और वेदों का प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यापार हो रहा है, वह नहीं हो पाएगा I ऐसा होने पर योग और वेदमार्ग अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाएंगे, जो मुक्तिमार्ग ही होता है I
  • जो अभी के समय पर धर्म के नाम पर अधर्म, विधर्म, वैकल्पिक धर्म और वैकल्पिक विधर्म तक आ गए हैं, वह भी नष्ट होंगे I जब ऐसा होगा, तो इस लोक में धर्म का ही प्रकाश आएगा, और वह भी उस धर्म के वास्तविक आध्यात्मिक आत्मिक स्वरूप में I
  • जो अभी के समय पर अर्थ के नाम पर विनर्थ और भिन्नार्थ प्रक्रिया हो रही है और जो अनर्थ का ही द्योतक हैं, वह भी समाप्त होंगी और ऐसी दशा में इस पृथ्वीलोक में जो अर्थ की मूल, अर्थात प्रकृति को विकृत करके अनर्थ ख्यापित हो रहा है, उसका भी अंत हो जाएगा I
  • जो अभी के समय पर काम के नाम पर विकृतियां और व्याधियाँ आ रही है, वह भी समाप्त हो जाएंगी I और जब ऐसा होगा तब काम पुनः पुरुषार्थ का अंग होकर, अपने वास्तविक निष्काम स्वरूप में ख्यापित भी हो जाएगा I
  • जो अभी के समय पर मोक्ष के नाम पर प्रपञ्च और वैकल्पिक विधाएं प्रचलित हो रही हैं, वह भी नस्ट होंगी I और जक ऐसा हो जाएगा, तो मुक्तिमार्ग ही अपने पारम्परिक बहुवादी अद्वैत रूपों में प्रशस्त हो जाएगा I
  • पर यह भी तभी हो पाएगा, जब इस लोक के बहुत सारे साधक, प्रत्याहार आदि योगबिन्दुओं को धारण करेंगे और इसके पश्चात वह यहाँ बताए जा रहे हृदयाकाश गर्भ तंत्र में जाऐंगे I यह मार्ग ही चित्त के संस्कारों के नाश से, लोक चित्त और ब्रह्माण्डीय चित्त काया के न्यून प्रकारों के संस्कारों के नाश का मार्ग है, और इसी मार्ग से जाकर साधक अपने, अपने लोक और ब्रह्माण्ड के, और उनके जीवों का भी उत्कर्ष मार्ग प्रशस्त कर पाता है I और ऐसा भी तब होता है, जब लोक की चित्त काया के समस्त अधम संस्कारों का नाश होता है… इससे पूर्व नहीं I और जहां इस नाश का मार्ग भी साधक के हृदयाकाश गर्भ से ही होकर जाता है और उतनी ही सीमा में होता है, जितना उस साधक के चित्त के संस्कारों का नाता, उन संस्कारों के लोक चित्त में प्रतिबिम्ब से होता है I
  • जब इस मार्ग से जाकर कोई साधक अपनी चित्त को संस्कार रहित कर लेता है, तब उस साधक के संस्कारों के प्रतिबिम्ब जो लोक चित्त काया सहित, ब्रह्माण्डीय चित्त काया में होते हैं, वह भी नष्ट हो जाते हैं I और उस लोक के जब बहुत सारे साधक इस मार्ग पर जाएंगे, तो उस लोक के चित्त के ससंस्कारों की शुद्धिकरण प्रक्रिया भी स्वतः ही चलित हो जाएगी I
  • परन्तु आज के समय पर (अर्थात 2011 ईस्वी में) जब तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) इस विज्ञान को लिख रहे हो, इसके बारे में इससे आगे मत बताना क्यूंकि आज की मानव आदि जातियों का अधिकांश का भी अधिकांश भाग इसपर जाने का पात्र नहीं है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

सनातन गुरुदेव बोले… यह इच्छा गुफा, बुद्धि गुफा के भी समीप बसी हुई है I ऐसा इलसिए है क्यूंकि जब यह इच्छाएँ चालित होती हैं, तो बुद्धि से संबद्ध होकर ही यह चलित हो पाती हैं I और ऐसा इसलिए भी है, क्यूंकि जबतक बुद्धि इन इच्छाओं से संबद्ध संस्कारों को भेदकर इन संस्कारों से संबद्ध नहीं होती, तबतक ऐसा माना ही नहीं जा सकता, की यह इच्छाएं चलित हो गई हैं I इसलिए ब्रह्माण्ड के भीतर बसे हुए पिण्डों में बुद्धि ही इच्छाओं और उन इच्छाओं से संबद्ध संस्कारों को भेदती हुई भी पाई जाती है I जब ऐसा होता है, तब ही कोई संस्कार अपनी फलित होने की प्रक्रिया में चलित होता है, जिससे वह संस्कार अगले कर्मों का कारण और कारक भी हो जाता है I इसलिए इच्छाओं और उन इच्छाओं से संबद्ध संस्कारों के कारक और कारण नामक कर्ममय स्वरूप के मूल में, इच्छा ही है I ऐसा होने के कारण ही इच्छा गुफा को कारक गुफा और कारण गुफा कहा जा सकता है I इच्छाएं भी संस्कारों को भेदकर, उनको चलित करने का मूल कारण बनती हैं, और जब ऐसा होता है, तब ही उन संस्कारों के ऊपर बुद्धि और चित्तादि का प्रभाव आने लगता है… इससे पूर्व नहीं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब कोई संस्कार बारम बार फलित होता-होता, इतना सूक्ष्म हो जाता है, कि वह उस पूर्व की इच्छा से भी सूक्ष्म हो जाता है जो उस संस्कार के पूर्व कालों में चलित होने का कारण थी, तब उसपर उस पूर्व की इच्छा का प्रभाव ही नहीं पड़ता I ऐसी दशा में कोई और सूक्ष्म इच्छा ही उस संस्कार को चलित कर पाएगी, क्यूंकि पूर्व की इच्छा अब उस संस्कार से सापेक्ष स्थूल ही हो गई है I इच्छा शक्ति के अनुसार, यही इच्छा और संस्कार का नाता दर्शाता हुआ उत्कर्ष पथ है I और ऐसी दशा में उस साधक से जो कर्म होंगे, वह भी सूक्ष्म ही होंगे, अर्थात उच्च कोटि के होंगे और जिनका नाता जीव जगत के किसी बड़े भाग के उत्कर्ष से होगा अथवा समस्त जीव जगत के उत्कर्ष से ही होगा I ऐसे साधक ही जीव जगत के किसी बड़े भाग का उत्कर्ष मार्ग प्रशस्त कर पाते हैं I और इसी उत्कर्ष मार्ग पर शनैः शनैः ही सही, लेकिन प्रगति करते-करते, वह साधक इस समस्त जीव जगत का ही उत्कर्ष पथ प्रशस्त करने की क्षमता पा जाता है I लेकिन ऐसे साधक जो समस्त जीव जगत का उत्कर्ष मार्ग ही प्रशस्त कर दे, वह विरले ही होते हैं I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

निर्विचार समाधि और निर्भाव समाधि, निर्विचार और निर्भाव, निर्विचार ब्रह्म और निर्भाव ब्रह्म,

सनातन गुरुदेव बोले… अधिकतर साधक गणों की इच्छा गुफा में बहुत सारे वर्ण दिखाई देते हैं I और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनका मन ही अस्थिर होता है जिससे उनकी इच्छाएं बहुत प्रकार की भी होती हैं I और प्रत्येक प्रकार की इच्छा का उस इच्छा की कम्पन आवृत्ति और कम्पन आयाम के अनुसार एक वर्ण भी होता है I जितनी अधिक इच्छाओं की कम्पन आवृत्ति होगी, उतनी न्यून वह इच्छा होगी और उतनी ही कम व्यापक उस इच्छा का प्रभाव भी होगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और वह साधकगण जिनके संस्कार सूक्ष्म हुए हैं, उनकी इच्छा गुफा का वरण अधिकांशतः श्वेत ही होता है I जब इच्छाएँ सूक्ष्म होती हैं, अर्थात जीव जगत की किसी व्यापक दशा से संबंधित होती हैं, तब उन इच्छाओं की ऊर्जाएं ज्यावक्रीय तरंगों के समान भी गति न करके, सीधी अवस्था में ही गति करती हैं I और यह दशा इस बात का प्रमाण भी होती है, कि उस साधक का मन स्थिरता को पा चुका है, अर्थात उस साधक के मन की भटकने समाप्त हुई हैं I जब मन ब्रह्मलीन होता है तब उस मन की तनंग सीधा गति करती है I और जब वही मन अस्थिर होता है तब उसकी तनंग की गति ज्यावक्रीय होती है, जिसके कारण उस गति में कोई एक विशेष प्रकार की कम्पन आवृत्ति और कम्पन आयाम  भी पाया जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब मन पूर्ण स्थिर होता है, तब ही निर्भाव दशा की प्राप्ति होती है I इसी निर्भाव दशा में निर्भाव समाधि की प्राप्ति होती है I इस निर्भाव दशा में मन की तरंगों की गति में ज्यावक्रीय दशा भी नहीं होती है, और इसी दशा से मन के ब्रह्मलीन होने का का मार्ग भी प्रशस्त होता है I जब साधक ब्रह्म भावापन होता है, तब ही इस निर्भाव समाधि नामक सिद्धि की प्राप्ति होती है… इससे पूर्व नहीं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… निर्भाव समाधि से ही निर्विचार दशा की प्राप्ति होती है और जिसका मार्ग निर्विचार समाधि नामक सिद्धि से होकर ही जाता है I यह निर्विचार और निर्भाव के शब्द, निर्गुण ब्रह्म के ही द्योतक हैं I और क्यूंकि इनका मार्ग मन से ही सम्बंधित है, इसलिए मन की ब्रह्मलीन दशा भी इन दोनों दशाओं का सिद्धि मार्ग मै I जब तक मन ब्रह्म भावापन होकर, ब्रह्मलीन नहीं होता, तब तक इन दोनों दशाओं की सिद्धि ही नहीं हो पाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ब्रह्म की इच्छा शक्ति समस्त जीव जगत के प्रादुर्भाव का कारण थी, इसलिए जब साधक इच्छाओं से अतीत ही हो गया, तो वह साधक जीवतीत और जागतातीत हुए बिना भी नहीं रह पाता है I इसलिए जिन साधकगणों में इच्छा और भाव ही नहीं हैं, वह पुनर्जन्म भी नहीं ले पाते हैं I यही कारण है, कि इच्छातीत नामक सिद्धि भी मुक्तिमार्ग का अंग ही है I ऐसे साधक इस संसार (अर्थात चलित ब्रह्माण्ड) से अतीत होकर, अचलित ब्रह्माण्ड में जाकर, जीवन मरण चक्र से आगे जाकर, मुक्ति को प्राप्त भी ही जाते हैं I और जहां चलित ब्रह्माण्ड से चालित ब्रह्माण्ड तक जाने वाले मार्ग में वह सर्वसम ब्रह्माण्ड भी आता है, जो सर्वसम प्रजापति से संबंधित होता है I और इन सिद्धियों का मार्ग भी निर्भाव समाधि और निर्विचार समाधि ही होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… निर्भाव और निर्विचार नामक दशाएँ भी योगमार्ग से ही प्राप्त होती हैं, और यह इच्छातीत सिद्धि को भी दर्शाती है, जिसके कारण यह उस इच्छा शक्ति से भी अतीत दशा है, जिसका आलम्बन लेकर ब्रह्मा ने इस जीव जगत का प्रादुर्भाव करा था I यदि यह इच्छातीत दशा कुछ ही समय के लिए स्थिर कर दी जाए, तो साधक उस संस्कार रहित चित नामक सिद्धि को भी प्राप्त कर लेता है, जो मुक्तपथ भी है, और मुक्ति नामक दशा को भी दर्शाती है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि जब संस्कार ही नहीं रहे, तो वह साधक उस प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक ब्रह्माण्ड से भी अतीत हो जाता है, जो ब्रह्मरचना में ब्रह्माण्ड का प्राथमिक स्वरूप था, और जिससे दैविक या कारण, सूक्ष्म और स्थूल जगत का उदय हुआ था I ऐसा साधक, देवातीत और कर्मातीत दशा को प्राप्त होकर, उस कर्मातीत में ही निवास करने लगता है, जो पिण्डातीत और ब्रह्माण्डातीत ही है और जो मुक्तिपथ सहित, मुक्ति का भी द्योतक है I पर इन सिद्धियों का मार्ग भी निर्विचार समाधि और निर्भाव समाधि से होकर ही जाता है, और यह मार्ग भी चित्त को संस्कार रहित दशा मिलकर जाने का मार्ग ही है I यहाँ पर जो निर्विचार और निर्भाव शब्द कहे गए हैं, वह उन निर्विकार ब्रह्म और निर्भाव ब्रह्म के ही द्योतक है और जिनको निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है  I और इन्ही सिद्धियों का मार्ग यहाँ बताया जा रहा हृदयाकाश गर्भ तंत्र भी है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

पिण्डों की मूल इच्छा, जीवों की मूल इच्छा, ब्रह्मरचना से पूर्व पिण्डों की मूल इच्छा, ब्रह्मरचना से पूर्व जीवों की मूल इच्छा, … ‘मुक्त होनेकी इच्छा, मुक्ति को प्राप्त होने की इच्छा, मुक्ति की इच्छा,कर्ममुक्ति, कर्मातीत मोक्ष, कर्ममुक्ति की इच्छा, कर्मातीत मोक्ष की इच्छा, मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, मुक्ति को प्राप्त करा ही नहीं जा सकता है, मुक्ति को प्राप्त नहीं करा जा सकता, मुक्त हुआ जाता है, मुक्त पद प्राप्त किया नहीं जाता है, मुक्त पद प्राप्त किया नहीं जाता है बल्कि मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, … जीवों की मूल इच्छा और ब्रह्म की इच्छा शक्ति, जीवों की मूल इच्छा ही ब्रह्म की इच्छा शक्ति है, …

सनातन गुरुदेव आगे बोले.. इसी इच्छा गुफा के भीतर, समस्त पिण्डों या जीवों की मूल इच्छा निवास करती है I जीवात्माओं की जो मूल इच्छा थी, वह ब्रह्माण्ड के प्रादुर्भाव से भी पूर्व की ही है I इस मूल इच्छा में जीवात्माओं ने एकसुर में बसकर मुक्ति को प्राप्त होने की इच्छा करी थी, न कि मुक्ति को प्राप्त करने की इच्छा I ऐसा इसलिए था, क्यूंकि जो वह जीवात्माएं उनकी अपनी वास्तविकता में थीं ही, उसको वह प्राप्त कैसे कर सकती थीं I जो तुम वास्तव में हो ही, उसको प्राप्त कैसे कर सकते हो, उसको तो प्राप्त होना पड़ेगा न? I इस मूल इच्छा के कारण ही मुक्ति कर्मातीत रही है I परन्तु ब्रह्माण्ड में अपने प्रादुर्भाव के पश्चात, जीव इस इच्छा को भूल गए और इसीलिए वह मुक्ति को प्राप्त करने की चेष्टा करने लगे I और यही कारण है कि इस कलियुग में, ऐसे ही मूर्खों ने ही मुक्तिपथ को कर्मों से ही प्रतिष्ठित करने की चेष्टा कर है करी है, और जो असंभव ही है क्यूंकि पिण्ड ब्रह्माण्ड के उदय से भी पूर्व से, मुक्ति तो कर्मातीत ही रही है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि…

जो समस्त जीव तब भी थे जब वह पिण्ड रूपों में नहीं थे, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

जो समस्त जीव तब भी रहे हैं, जब वह पिण्ड रूपों में हैं, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

जो समस्त जीव तब भी होंगे, जब वह पिण्डातीत हो चुके होंगे, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर ध्यान देना …

तुम्हारा आत्मस्वरूप मुक्तात्मा ही है, इसलिए तुम मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते I

जो समस्त जीवों का शाश्वत स्वरूपआत्मस्वरूप है ही, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

जो तुम अनादि कालों से और अनंत कालों तक हो ही, उसको प्राप्त कैसे करोगे I

प्राप्त उसको किया जाता है, जो तुम नहीं हीन कि उसको, जो तुम हो ही I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर भी ध्यान देना …

मोक्ष जो तुम हो ही, उसको प्राप्त हुआ जाता हैन कि प्राप्त किया जाता है I

जो तुम अपनी वास्तविकता में हो ही, उसको अपने कर्मों से प्राप्त कैसे करोगे I

जो तुम अपने आत्मस्वरूप में हो ही, उसका कर्मों और फलों से क्या लेना देना I

मोक्ष को प्राप्त होने और उसी मोक्ष प्राप्त करने के मार्गों में बहुत अंतर होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर भी ध्यान केन्द्रित करना…

मोक्ष को प्राप्त होने का मार्ग ब्रह्म भावापन हैप्राप्त करने का मार्ग कर्म भावापन I

क्यूंकि मोक्ष को प्राप्त हुआ जाता है, इसलिए ब्रह्म भावापन दशा ही मुक्तिमार्ग है I

मुक्ति को प्राप्त करा नहीं जा सकता, इसलिए कर्मों और फलों में मुक्ति नहीं है I

आत्मस्वरूप जो कर्मातीत, फलातीत और संस्कारातीत है वह कैवल्य मोक्ष है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब सभी बिंदुओं पर ध्यान देना, नहीं तो उस मूल इच्छा को समझ ही नहीं पाओगे I

ब्रह्माण्डोदय से पूर्व जीवों की मूल इच्छा, मुक्ति को प्राप्त करने की थी ही नहीं I

ब्रह्माण्डोदय से पूर्व जो जीवों की मूल इच्छा थी, वह मुक्ति को प्राप्त होने की थी I

परन्तु ऐसा होने के लिए तो ब्रह्माण्ड भी ऐसा चाहिए था, जो कैवल्य मुक्त ही था I

कैवल्य मुक्त ही अनादि अनंत सनातन होता है, ऐसा ही समस्त जीव जगत भी है I

वह ब्रह्म जो कैवल्य मुक्त ही है, वह कैवल्य के सिवा कुछ बना ही नहीं पाया था I

यह समस्त जीव जगत भी उस कैवल्य मुक्त ब्रह्म के समान, कैवल्य मुक्त ही है I

इस समस्त ब्रह्मरचना में, बंधन नामक कोई दशा, न तो कभी थी और न ही होगी I

इस ब्रह्मरचना में जो भी था है या होगा, वह सब अपने आत्मस्वरूप में मुक्त ही है I

बंधन और मुक्ति के बारे में जो भी बताया गया है, वह मनोलोक की उत्पत्ति ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर ध्यान देना…

जबतक ब्रह्माण्ड ही मुक्त नहीं होगा, तबतक जीव मुक्ति को प्राप्त नहीं हो पाएंगे I

ऐसे अमुक्त ब्रह्माण्ड में ही मुक्ति को प्राप्त करने के मार्गों की आवश्यकता होगी I

परन्तु ब्रह्मरचना में जो ब्रह्माण्ड का उदय हुआ था, वह भी कैवल्य मुक्त ही था I

इसलिए ब्रह्मरचना में मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, न कि प्राप्त किया जाता है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ब्रह्मरचना के वास्तविक मुक्त स्वरूप को बताया जा रहा है, इसलिए इन बिंदुओं पर ध्यान देना…

मुक्त ब्रह्माण्ड के भीतर ही जीवों के मुक्त आत्मस्वरूप, जीवों में ही बसे हुए हैं I

सब जीव मुक्तात्मा ही है बस हुआ यह है कि उनको इस बात का ज्ञान नहीं है I

ब्रह्म की रचना में कुछ है ही नहीं, जो मुक्त नहीं हैब्रह्मरचना भी मुक्त ही है I

कैवल्य मुक्त ब्रह्म तो कुछ ऐसा बना ही नहीं पाया था, जो उसके समान नहीं था I

इसलिए, ब्रह्मरचना में जो भी है, जिधर है, जिस भी कालखंड में है वह मुक्त है I

जीवों के उदय से पूर्व से, उनके उदय और रचनातीत दशा तक, वह मुक्त ही रहे हैं I

तुम और मैं भी मुक्त ही हैं, अंतर केवल इतना है कि मुझे ज्ञान है और तुम्हे नहीं I

सनातन मुक्तात्मा ही यह समस्त जगत है, और इस जगत के समस्त जीव भी हैं I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… ऐसा इसलिए है, क्यूंकि उस दशा में जो ब्रह्माण्डोदय से पूर्व की थी, उसमें भी समस्त जीव जगत मुक्त ही था I लेकिन मुक्त होने पर भी उनको इस बात का ज्ञान नहीं था, कि वह मुक्त हैं I और अज्ञान के कारण उन्होंने मुक्ति को प्राप्त होने की इच्छा प्रकट कर थी, जिसके कारण वही इच्छा को ब्रह्मा ने धारण किया था और इसके पश्चात ही यह इच्छा, ब्रह्म की इच्छा शक्ति रूप में प्रकट हुई थी I इसी इच्छा शक्ति का आलम्बन लेकर ब्रह्म से ही इस जीव जगत का प्रादुर्भाव हुआ था I इसलिए…

इस जीव जगत के प्रादुर्भाव के मूल में जीवों की वह मूल इच्छा ही थी I

वह मूल इच्छा मुक्ति को प्राप्त होने की थी, न की मुक्ति को प्राप्त करने की I

जब ब्रह्म ने मूल इच्छा को धारण किया था, तो यही उनकी इच्छा शक्ति हुई थी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर भी ध्यान देना…

मुक्ति को प्राप्त होने का मार्ग भावों में है, इसलिए मुक्तिपथ भावनात्मक है I

मुक्ति को कर्मों से प्राप्त करने का मार्ग है ही नहीं, इसलिए कर्म मिथ्या ही हैं I

ब्रह्मरचना में कर्म ही वह अथाह चक्रव्युह है, जो अज्ञान रूपी बंधन कारक ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना…

जीवों की मूलइच्छा से जिस मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, वह कर्मातीत ही है I

अज्ञानमय कर्म मार्गों से जिस मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, वह कर्माधीन ही है I

कर्मातीत मुक्ति ही वह कैवल्य मोक्ष है जिसका नाता जीवों की मूल इच्छा से है I

कर्मातीत ही उस आत्मस्वरूप की द्योतक है, जो कैवल्य मोक्ष स्वरूप पूर्ण ब्रह्म हैं I

कर्माधीन ही वह असत्य है, जिसमें जीव किसी न किसी लोक में निवास करता है I

कर्माधीन न तो जीवातीत और न जागतातीत है, यह बंधनअसत्य की द्योतक है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… मूल इच्छा जो जीवों की थी, वह मुक्ति को प्राप्त होने की थी, इसलिए मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है न की प्राप्त किया जाता है I प्राप्त करने का मार्ग कर्म हैं और प्राप्त उसको किया जाया है, जो तुम नहीं हो, न की उसको जो तुम अनादी कालों से हो ही I वह मुक्ति जो तुम सदैव ही हो, उसको तो तुम केवल प्राप्त हो सकते हो और जहां यह प्राप्त होने का मार्ग भी इच्छामय (अर्थात भावनामय) ही होगा, न की कर्ममय I ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस रचना के प्रादुर्भाव के समय, इस जीव जगत के रचैता ने कोई कर्म नहीं किए थे, बल्कि यह उनकी भावनात्मक रचना है I जब अपने मूल स्वरूप से यह ब्रह्मरचना ही भावनात्मक है, तो उसको पार करने का, अर्थात उससे अतीत जाने का मार्ग भी तो भावना से ही जाएगा… न कि कर्म से I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जहां उस मार्ग का गंतव्य भी तो वही होगा, जो इस ब्रह्मरचना के प्रादुर्भाव से भी पूर्व जीवों की मूल इच्छा थी, और जिसका आलम्बन लेकर इस ब्रह्म भावापन जीव जगत का प्रादुर्भाव करा गया था I उत्पत्ति के मार्ग से विपरीत दिशा या गति में ही तो मुक्तिमार्ग होता है I और क्यूंकि उत्पत्ति के मूल में ही जीवात्माओं का भाव था, कि उन्हें मुक्ति को प्राप्त होना है और जिसका आलम्बन लेकर यह ब्रह्मरचना प्रादुर्भाव हुई थी, इसलिए मुक्तिमार्ग भी तो उसी भाव का आलम्बन लेकर आगे बढ़ेगा, और उस मुक्तिमार्ग को उत्पत्ति से विपरीत दिशा में भी होना होगा I यही कारण है, कि मुक्तिमार्ग ब्रह्म भावापन होकर ही प्रशस्त होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि उस समय जब जीवात्माओं में यह मूल इच्छा प्रकट हुई थी, तब तो न जीव था और न ही जगत, बस जीवात्मा ही थी, इसलिए इस इच्छा के समय भी वह जीवात्माएँ “स्वयं ही स्वयं में” बसी हुई थी I इस मूल इच्छा के प्राकट्य के समय वह जीवात्माएँ “स्वयं ही स्वयं में” इसलिए बसी हुई थी, क्यूंकि उस समय उनके सिवा और कुछ था ही नहीं I और क्यूंकि इसी मूल इच्छा का आलम्बन लेकर, ब्रह्म ने इस जीव जगत का प्राकट्य करा था, इसलिए यह जीव जगत ब्रह्म भावापन होकर ही उत्पन्न हुआ था I और क्यूँकि उत्पत्ति मार्ग से विपरीत दिशा का मुक्तिमार्ग होता है, इसलिए वह मुक्तिपथ भी, स्वयं ही स्वयं में बसकर, और ब्रह्म भावापन होकर ही प्रशस्त होगा I उस मुक्तिपथ में साधक को “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य के सार में बसकर ही जाना होगा I और उस मुक्तिपथ के गंतव्य में वही मुक्ति पाई जाएगी जो जीवात्माओं की वह मूल इच्छा थी, जिसके कारण ब्रह्म को इस जीव जगत का प्रादुर्भाव इसी इचछा का आलम्बन लेकर ही करना पड़ गया था, और जहां जीवात्माओं की वह मूल इच्छा ही ब्रह्म की इच्छा शक्ति कहलाई थी, और जो इस जीव जगत की उत्पत्ति प्रक्रिया में भी जीवात्माओं की वही मूल इच्छा, इस जीव जगत की ही मूल शक्ति हुई थी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि उस समय जब जीवात्माओं ने यह मूल इच्छा प्रकट करी थी, तब वह सब जीवात्माएँ मुक्त ही थी, और ऐसा होने पर भी क्यूंकि उनको उनकी इस मुक्ति का ज्ञान नहीं था, इसीलिए उन्होंने अपनी यह मूल इच्छा प्रकट करी थी I यदि उन जीवात्माओं को अपनी उस समय की मुक्त दशा का ज्ञान होता, तो वह अपनी ऐसी इच्छा प्रकट ही नहीं करती I इसलिए इस जीव जगत के प्रादुर्भाव का मूल कारण भी वह अज्ञान ही था, कि हम मुक्त नहीं हैं I और यही कारण है, कि मुक्ति का ज्ञान ही मुक्ति है I जिसको यह ज्ञान नहीं, वही बंधन में होता है I और जो इस सत्य को जान गया, कि मैं अनादि कालों से और अनंत कालों तक मुक्त ही हूँ, वही मुक्तात्मा होता है I जिसको यह ज्ञान प्राप्त हो गया कि कैवल्य मोक्ष को दर्शाता हुआ वह ब्रह्म, ऐसा कुछ बना ही नहीं पाया था जो उस जैसा मुक्त नहीं था, वही मुक्त है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और क्यूंकि इस मूल इच्छा के प्राकट्य के समय पर भी वह जीवात्माएँ मुक्त ही थी, इसलिए उनकी इच्छा भी इस प्रकार प्रकट हुई थी… हमें मुक्ति को प्राप्त होना है I मुक्ति होने पर भी उस मुक्ति का ज्ञान न होने के कारण, उनकी इच्छा “मुक्ति को प्राप्त होने की थी”, न की मुक्ति को प्राप्त करने की I इसलिए भी मुक्ति को प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्यूंकि ऐसा तो कभी भी उन जीवात्माओं ने माँगा ही नहीं था I उस दशा में जिसमें यह मूल इच्छा प्रकट हुई थी, वह जीवात्माएँ मुक्ति को प्राप्त करने की इच्छा कर भी नहीं सकती थी, क्यूँकि प्राप्त करने का मार्ग तो कर्मों से होकर जाता है, जो उस दशा में थे ही नहीं जिसमें बसी हुई जीवात्माओं ने यह मूल इच्छा प्रकट करी थी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले…  क्यूंकि उस समय जब न कोई दैविक, सूक्ष्म या स्थूल जीव थे, और न ही इन दशाओं का कोई जगत ही था, जीवात्माओं ने यह मूल इच्छा प्रकट करी थी, तब उनके न कर्म थे और न ही फल ही थे, इसलिए जिस दशा में वह जीवात्माएँ निवास कर रही थी, वह कर्ममुक्त ही थी I इसलिए जब कोई भी जीव अपनी अंतगति को जाएगा, तो जिस दशा को वह पाएगा, वह दशा भी कर्ममुक्ति की ही होती I यही कारण है कि कर्ममुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि वह दिशा जिसमें यह मूल इच्छा जीवात्माओं द्वारा प्रकट हुई थी, वह जीवातीत और जगत जीत ही थी, अर्थात वह दशा जीव जगत से अतीत ही थी, इसलिए उस दशा में जीवात्माएँ कर्ममय नहीं थीं I और क्यूंकि उस मूल इच्छा से जो जीव जगत प्रकट हुआ है, वह कर्मप्रदेश ही है, अर्थात कर्ममय है, इसलिए इस जीव जगत में कर्म ही प्रधान रहा है I पर क्यूँकि ब्रह्म भावापन रहित कर्मों से मुक्ति कर्मातीत नहीं हो सकती, इस लिए ऐसी मुक्ति जो कर्माधीन ही होती है, वह न जीवतीत होती है, और न ही जगतातीत I ऐसी कर्माधीन मुक्ति में भी जीवात्मा कर्ममय जीव जगत में ही रह जाती है, जिसके कारण यह मुक्ति, वह वास्तविक मुक्ति ही नहीं होती जो कर्मों से अतीत ही होती है, अर्थात कर्मातीत होती है I ऐसी कर्माधीन मुक्ति में जीवात्मा किसी न किसी देवादि लोक में ही निवास करती है, और वही पर उस लोक के अनुसार कर्म करती है, जिसके कारण वह जीवात्मा न तो लोकातीत कहलाई जा सकती है, और न ही ब्रह्माण्डातीत I ऐसी कर्ममुक्ति में जीवात्मा पिण्डात्मक स्वरूप में ही निवास करती है, इसलिए इस मुक्ति में वह जीवतीत भी नहीं होती I इसिलिए कर्माधीन मुक्ति का नाता पिण्ड ब्रह्माण्ड से ही होता है, जिसके कारण यह वास्तविक मुक्ति भी नहीं होती, जो पिण्डातीत और ब्रह्माण्डातीत ही है I ऐसा होने के कारण यह मुक्ति न तो कर्म और कर्मफल न्याय से अतीत होती है, और न ही इस न्याय के मूल सिद्धांत जो आश्रित उत्पत्ति सिद्धांत है (अर्थात प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत है), उससे ही अतीत होती है I और ऐसा होने के कारण, ऐसी मुक्ति न तो न्यायातीत होती है, न तंत्राताईत और न ही सिद्धांततीत ही होती है I जो ऐसी है, वह तो मुक्ति की वास्तविकता भी नहीं होती, जिसके कारण वह पूर्णमुक्ति भी नहीं कहलाई जा सकती I कर्मातीत मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है, क्यूंकि इस मुक्ति में न कोई ब्रह्माण्डीय नियम और न्याय होता है, न ही कोई ब्रह्माण्डीय तंत्र या सिद्धांत I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जो मुक्ति वास्तविक मुक्ति है, अर्थात कैवल्य है, उसको प्राप्त होने का मार्ग, निर्भाव समाधि और निर्विचार समाधि से भी प्रशस्त होता है I और यह दोनों समाधि भी उसी कर्मातीत मुक्तिमार्ग को भी दर्शाती हैं, जो निर्गुण ब्रह्म की भी द्योतक है, और उस पूर्ण नामक शब्द की भी द्योतक हैं, जो ब्रह्म ही है I कर्मातीत मुक्ति, अर्थात कर्ममुक्ति ही मूल इच्छा से संबंधित मुक्ति है, और इसका मार्ग निर्विचार समाधि से जाने के कारण, इसका भावनात्मक नाता ज्ञानमय वाक्य से भी है, जो ऐसा होता है…

अब कुछ करने को, कहीं जाने को और कुछ बनने को नहीं रह गया है I

यह ज्ञानमय वाक्य उन पूर्ण संन्यासी, कैवल्य मोक्ष स्वरूप ब्रह्म को ही दर्शाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इस वाक्य की भावनात्मक दशा में साधक कर्ममुक्ति का पात्र भी बन जाता है, और पात्र बनने के पश्चात, वह साधक आत्मभावापन होकर, स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य के सार में बसकर, कर्मातीत मुक्ति को भी प्राप्त होता है I वह कर्मातीत मुक्ति ही उन पूर्ण संन्यासी, कैवल्य मोक्ष स्वरूप ब्रह्म की द्योतक है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ध्यान देना क्यूंकि उन पूर्ण संन्यासी ब्रह्म की बात हो रही है, जो कैवल्य मोक्ष ही हैं I

जब साधक के पिण्ड में बसी हुई समस्त ब्रह्माण्डीय दशाएं उनके अपने कारणों में लीन होती हैं, तब साधक आत्मभावापन होकर, “स्वयं ही स्वयं में रमण करता है I

जब आत्मभावापन साधक, उसके अपने भाव में ही संपूर्ण ब्रह्मरचना से अतीत होता है, तब वह साधक उसके अपने आत्मस्वरूप में ही ब्रह्म को प्राप्त होता है I

ऐसी दशा में आत्मभावापन ही ब्रह्मभावापन कहलाता है, जिसमें में स्वयं ही स्वयं में का वाक्य ही ब्रह्म ही ब्रह्म में के वाक्य का द्योतक होता है I

इसका मार्ग भी, ज्ञानमय वाक्य में बसकर, “स्वयं ही स्वयं में होकर जाता है I

इस साक्षात्कार में साधक का आत्मस्वरूप ही कर्मातीत और पूर्णब्रह्म होता है I

इस साक्षात्कार में साधक का आत्मस्वरूप, पिण्डातीत और ब्रह्माण्डातीत होता है I

जब साधक को साधनाओं में जीव जगत ही न दिखे, तो वह कर्मातीत मुक्ति ही है I

जब पिण्ड रूप में, ब्रह्माण्ड में बसे हुए साधक को उसकी भावनाओं में भी पिण्ड और ब्रह्माण्ड न दिखे, तो वह कैवल्य ब्रह्म है, जो भावातीत और इच्छातीत ही है

ऐसी दशा से जाकर भी वैदिक महावाक्यों का ज्ञानमय साक्षात्कार हो सकता है I

इन बिंदुओं का नाता, मूलतः जीवात्माओं की उस मूल इच्छा से ही है, जिसमें उन्होंने मुक्त होते हुए भी, अज्ञानवश मुक्ति को प्राप्त होने की इच्छा कर थी, और जो इस ब्रह्मरचना का इस जीव और जगत स्वरूप में प्राकट्य का कारण हुआ था I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

प्रकृति की प्रथम इच्छाहोने की इच्छा, मुझे होना है, मुझे मैं हूँ होना है,

सनातन गुरुदेव बोले… लेकिन जिस दशा में जीवात्माएँ निवास कर रही थी, वह तो प्रकृति की प्रथम इच्छा ही थी I वह दशा जिसमें जीवात्माओं ने बसकर अपनी मूल इच्छा प्रकट कर थी, वह तो प्रकृति की प्रथम इच्छा के अंतर्गत ही थी I वह दशा जिसमें बसकर जेवात्माओं ने अपनी मूल इच्छा प्रकट करी थी, वह प्रकृति की प्रथम इच्छा थी, जिसमें प्रकृति ने मुझे होना है, ऐसा कहा था I और इसी प्रथम इच्छा से प्रकृति, वह सबकुछ हुई थी जो पिण्ड ब्रह्माण्ड कहलाता है I और जहां वह पिण्ड ब्रह्माण्ड संस्कारिक जगत से प्रारम्भ होकर, कारण से जाकर, सूक्ष्म से होकर ही स्थूल रूप में प्रादुर्भाव हुआ था I वह दशा जिसमे प्रकृति उस समय थी, जब प्रकृति में यह प्रथम इच्छा प्रकट हुई थी, वही महाकारण कहलाया था I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ध्यान देना क्यूंकि प्रकृति की इच्छा के सार्वभौम और शाश्वत स्वरूप को बताया जा रहा है…

प्रकृति की प्रथम इच्छा अंतर्निहित स्वरूप में थी, जो मुझे होना हैऐसी थी I

इस इच्छा का परोक्ष रूप भी था, जिसमें प्रकृति ने, मुझे मैं हूँ होना है, कहा था I

इस इच्छा में प्रकृति का कोई बंधन नहीं था, कि यह होना है, या यह नहीं होना है I

इसलिए यह इच्छा, अंतर्निहित रूप में भी प्रकृति की परिपूर्णता की द्योतक ही थी I

इस इच्छा के प्रकट रूप में, प्रकृति व्यापक सनातन सार्वभौम ब्रह्मशक्ति हुई थी I

इसलिए जो कुछ भी ब्रह्मशक्ति से संबद्ध है, उसका अस्तित्व भी शाश्वत ही रहा है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब ध्यान देना क्यूँकि प्रकृति की इस प्रथम इच्छा के सर्वस्व और ब्रह्मशक्ति स्वरूप को बताया जा रहा है…

यह प्रथम इच्छा भी तब प्रकट हुई थी जब न तो जीव था और न ही जगत ही था I

यही कारण है कि प्रकृति उतनी ही व्यापक और सनातन है, जितना सनातन ब्रह्म है I

ऐसा होने के लिए, प्रकृति को ही ब्रह्मशक्ति रूप में स्वयंप्रकट होना पड़ गया था I

ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति में बसी हुई जीवात्माओं में उनकी मूल इच्छा प्रकट हुई थी I

इसलिए, जीवात्माओं की मूल इच्छा के मूल में भी वही ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति हैं I

वह ब्रह्मशक्ति स्वरूप प्रकृति ही ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, पूर्ण शक्ति, सार्वभौम दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और प्रमुख दूती भी थी I

 पिण्ड ब्रह्माण्ड में भी वह ब्रह्मशक्ति स्वरूप प्रकृति, ब्रह्म से योग लगाई हुई थी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… प्रकृति की यह प्रथम इच्छा, जिसमें प्रकृति ने मुझे होना है, ऐसा कहा था, उसी से प्रकृति ही ब्रह्मशक्ति स्वरूप होकर, सब कुछ हुई थी, इसलिए वह प्रकृति ही त्रिकाली हुई थी, त्रिगुणात्मक और भूतात्मक जीव जगत भी हुई थी, वही प्रकृति सर्वकाया हुई थी, वही प्रकृति सगुण साकार हुई थी और सगुण निराकार भी वही प्रकृति थी, इस जीव जगत का तंत्र भी वही प्रकृति ही थी और वही प्रकृति पञ्च कृत्य भी हुई थी I इसी प्रथम इच्छा के प्रकट स्वरूप में प्रकृति ही सर्वव्यापक, सार्वभौम सनातन और अनादि अनंत समय के तीनों स्वरूपों में व्यापक  हुई थी, और उस त्रिकाली शक्ति को दर्शाता हुआ कालचक्र भी कहलाई थी I ऐसी दशा में…

ब्रह्म सनातन काल है, जिसके गर्भ में प्रकृति सहित समस्त जीव जगत बसा है I

कालब्रह्म की अभिव्यक्ति जो ब्रह्मशक्ति रूप में प्रकृति थी, वही कालचक्र हुई थी I

कालब्रह्म में बसा हुआ ब्रह्मशक्ति रूपी कालचक्र भी ब्रह्म के समान सनातन था I

इसलिए प्रकृति उतनी ही सनातन है, जितना सनातन उसका अभिव्यक्ता ब्रह्म है I

ऐसा होने के कारण, प्राकृत ब्रह्मरचना भी उसी प्रकृति के समान सनातन ही है I

इसलिए, इस ब्रह्मरचना में कुछ है ही नहीं, जो ब्रह्म के समान सनातन नहीं है I

यह ब्रह्मरचना भी उतनी अनादि अनंत, सनातन है, जितना सनातन काल ब्रह्म है I

इस सनातनता के मूल में भी प्रकृति की प्रथम इच्छा है, जो मुझे होना है, ऐसा थी I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… प्रकृति की इसी अंतर्निहित प्रथम इच्छा की प्रकट दशा ही अनादि अनंत, सार्वभौम, सर्वव्यापक और सनातन स्वरूप हुआ था, और जो जीव जगत कहलाता है I और क्यूँकि जीव जगत एक ही जन्म में अनादि अनंत कालों तक जीवित नहीं रह पाता है, इसलिए उसका जीवन मृत्यु चक्र आया था, और जहां वह जीवन मृत्यु चक्र, खंडित रूप में दिखाई देता हुआ भी, वास्तव में अखंड ही था, अर्थात वह जीव जगत का जीवन मरण चक्र टूटा हुआ प्रतीत होता हुआ भी, अखंड ही था I इसके जिसके कारण जीव जगत जीवन मरण चक्र में बसा हुआ प्रतीत होता हुआ भी, ब्रह्म के समान सनातन ही रहा है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि…

जीवों का किसी लोक में जन्म, उनके किसी और लोक में मरण से ही हो पाता है I

यह जीवन मरण का चक्र खण्डित प्रतीत होता हुआ भी, अखंड ही चलता रहता है I

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि जीव अपने जीव काल में लोक लोकांतर में घुमते रहते हैं I

यह भी प्रकृति की प्रथम इच्छा का प्रकट रूप है, कि मुझे सर्वस्व, सनातन होना है I

समस्त जीव भी प्रकृति की प्रथम इच्छा के आधीन होने के कारण, सनातन ही हैं I

और वह जगत भी प्रकृति की प्रथम इच्छा के आधीन होने के कारण, सनातन ही हैं I

इसी कारण जगत प्रादुर्भाव और महाप्रलय के चक्र में बसा हुआ, सनातन ही रहा है I

 

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर ऊँगली करके बोले…

ब्रह्म ने अपनी सनातनता में ही सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वही ब्रह्म हैं I

ब्रह्म ने अपनी सर्वव्यापकता में सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वह ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने अपनी सनातनता में सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वही ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने अपनी सर्वसक्षमता में सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वह ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने अपनी सार्वभौमता में सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वही ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने अपनी सर्वज्ञता में ही सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वही ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने सर्वप्रकार प्रकृति रूप में ही सबकुछ बसाया है तू और मैं भी ब्रह्म ही हैं I

निर्गुण ब्रह्म ही सगुण निराकार और सगुण साकार है तू और मैं भी वह ब्रह्म ही हैं I

एकरूप निर्गुण ब्रह्म ही सर्वरूप हुआ है आत्मस्वरूप में तू और मैं भी ब्रह्म ही हैं I

ब्रह्म ने अपनी परिपूर्णता में ही सबकुछ बसाया है तू और मैं भी वह ब्रह्म ही हैं I

यह भी इसलिए हुआ है क्यूंकि प्रकृति में वह प्रथम इच्छा आई थी, कि मुझे होना है I

और इसी इच्छा के प्रकट स्वरूप में जाकर प्रकृति रूपी ब्रह्मशक्ति, सबकुछ हुई थी I

ब्रह्म इस सृष्टि के पूर्व से लेकर, इसके पश्चात तक होगा वह तू है, वही मैं भी हूँ I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इन सबके के कारण…

प्रकृति जीवों की त्रिकाया आदि के रूप में, और ब्रह्म जीवों के आत्मस्वरूप में है I

जीव प्रकृति से संबंधित प्रतीत होते हुए भी, ब्रह्म से भी समान रूप में संबद्ध हैं I

इसलिए जीव इस लोक या कहीं और रहें, उनकी ब्रह्माण्डीय विद्यमानता शाश्वत है I

लोकादि पृथकता के दृष्टिकोण से ब्रह्माण्ड खण्डित सा होते हुए भी, अखण्ड ही हैं I

ब्रह्माण्ड चाहे प्रादुर्भाव होकर रहे, या महाप्रलय को जाए, इसकी सत्ता भी शाश्वत हैं I

इसीलिए, जीव चाहे ब्रह्माण्ड में रहें या महाप्रलय में, उनकी विद्यमानता शाश्वत है I

इसलिए चाहे कोई जीवित हो या न हो, उसकी ब्रह्माण्डीय विद्यमानता शाश्वत ही है I

यह इसलिए है क्यूंकि प्रकृति ने प्रथम इच्छा में ही मांग लिया था, कि मुझे होना है I

और जीव भी प्रकृति और ब्रह्म, दोनों से संबद्ध होने के कारण, शाश्वत ही रहे हैं I

 

सनातन गुरुदेव अपने नन्हें विद्यार्थी की ओर उंगली दिखाकर आगे भी बोले… अब इन बिंदुओं पर भी ध्यान देना…

इसलिए, ब्रह्मरचना में जो भी है, जहां है, जैसा भी है, उसका अस्तित्व शाश्वत है I

इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह जीव है या जगतजो भी है, वह शाश्वत है I

जब जीव मोक्ष को पाएगा, तब भी उसकी ब्रह्माण्डीय विद्यमानता शाश्वत ही होगी I

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि ब्रह्म अपनी अभिव्यक्ति जीव जगत से पृथक हुआ ही नहीं I

अभिव्यक्ता ब्रह्म ही अपनी अभिव्यक्ति प्रकृति हैअभिव्यक्ति भी अभिव्यक्ता ही है I

अभिव्यक्ता और अभिव्यक्ति की योगदशा में ब्रह्मरचना हैतू और मैं भी वही हैं I

ब्रह्म समस्त ब्रह्मरचना होते हुए भी, रचनातीत भी ब्रह्म ही हैतू और मैं भी हैं I

यह सब सुनकर, वह नन्हा विद्यार्थी अपनी अचम्भित शब्दरहित दशा में ही अपने गुरुदेव के मुख की ओर देखता गया I

 

हृदयाकाश गर्भ की सर्वसमता गुफा, हृदयाकाश गर्भ की सर्वसम तत्त्व गुफा, सर्वसम तत्त्व गुफाहृदयाकाश गर्भ की प्रजापति गुफा, सर्वसम तत्त्व की गुफा, समता गुफा, सम तत्त्व की गुफा, …

सनातन गुरुदेव बोले…जैसा पूर्व में बताया था, यह गुफा हीरे के समान प्रकाशमान होती है I यह सर्वसम तत्त्व की गुफा ऐसी भी प्रतीत होती है जैसे कोई राजत प्रकाशमान हो रहा हो I हृदयाकाश गर्भ की यह सर्वसम गुफा अन्य सभी गुफाओं को घेरे हुए होती है I यह गुफा उस साक्षात्कार का प्रमाण भी है, कि साधक ने उस सर्वसम तत्त्व को पाया है, जो तैंतीस कोटि देवी देवताओं में प्रजापति कहलाए हैं I इसलिए इस गुफा का साक्षात्कार उन सर्वसम, सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति की सिद्धि सहित, उन प्रजापति के ब्रह्मलोक सिद्धि का भी द्योतक है I इसी ह्रदय गुफा के साक्षात्कार से साधक के समस्त द्वैतवाद समाप्त होते हैं, जिसके कारण वह साधक उन अद्वैत ब्रह्म को प्राप्त होने हेतु ही चलने लगता है I इस गुफा के साक्षात्कार के पश्चात, साधक का प्रजापति और उनके ब्रह्मलोक के सिवा, ब्रह्मरचना के किसी और भाग से नाता भी नहीं रहता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि सर्वसमता से ही ब्रह्मरचना का वास्तविक प्रारंभ हुआ था, और अपने प्रादुर्भाव के पश्चात इसी सर्वसमता की ओर ही समस्त ब्रह्मरचना अग्रसर भी रही है, इसलिए यह सर्वसम गुफा, बृहत्तर-संपूर्ण शब्द की भी घोतक है I ब्रह्मरचना के उदय होने से पूर्व, यही बृहत्तर संपूर्ण तत्त्व ही था, जो हीरे के समान प्रकाशमान था और इसी तत्त्व से पृथक दशाएं उदय हुई थी I और सबकुछ उदय होने के पश्चात भी यह सर्वसम तत्त्व जैसा पूर्व में था, वैसा ही रहा है I इसी तत्त्व की ओर समस्त ब्रह्मरचना अग्रसर भी रही है, और तब से ऐसी रही है जब से उसका प्रादुर्भाव हुआ था I और इसी बृहत्तर संपूर्ण गुफा के सर्वसम तत्त्व के साक्षात्कार से, साधक स्वतः और अकस्मात् ही ब्रह्माण्डातीत होने के मार्ग पर चल पड़ता है I परन्तु इस ब्रह्माण्डातीत दशा की ओर जाते हुए मार्ग में, बहुत सारे बिंदु और उनके साक्षात्कार भी आते हैं, जिनपर तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) भी तब ही जाओगे, जब इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को सिद्ध कर लोगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इस सर्वसम तत्त्व में साधक न चलित ब्रह्माण्ड (अर्थात संसार) के, न ही जड़ ब्रह्माण्ड के और न ही उस अचलित (अर्थात सनातन ब्रह्माण्ड) के ही अंतर्गत होता है I इसलिए यह सर्वसम गुफा एक विचित्र गुफा ही है और इस गुफा का सीधा-सीधा नाता केवल और केवल ब्रह्मलोक से है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जो योगीजन इस सर्वसम तत्त्व में निवास करते हैं, वह मुक्त होते हुए भी, जब वह योगीजन भी चाहें, जिस भी लोक में चाहें, वह जन्म ले सकते हैं I और किसी भी लोक में जन्म लेने के पश्चात भी वह मुक्ति रहते हैं I परन्तु इस सर्वसम तत्त्व में बसे हुए योगीजन, तब ही जन्म लेते हैं जब किसी नीचे के लोक में उत्कर्ष मार्ग ही लुप्त हो गए हों I जिस भी लोक में मुक्ति मार्ग लुप्त हो चुके होंगे, उस लोक में इस सर्वसम तत्त्व के जीव लौटेंगे ही, ताकि उन लोक में मुक्तिमार्गों को स्थापित और ख्यापित किया जा सके I और जैसे ही वह सर्वसम तत्त्व के जीव अपने कार्य पूर्ण कर लेंगे, वैसे ही वह योगादि मार्गों से उस नीचे के लोक की काया का त्याग भी कर देते हैं, क्यूंकि उनको पता आता है कि कार्य पूर्ण होने के पश्चात, उनके उस नीचे के लोक में कोई और कर्म शेष ही नहीं रहा है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब कोई योगी अपने मुक्तिमार्ग पर जाता है और ऐसी दशा में जब वह केवल होकर, ज्ञानमय वाक्य में बसकर, स्वयं ही स्वयं में बसकर जा रहा होता है, तो ही वो योगी इस सर्वसम तत्त्व को पार कर पाता है… अन्यथा नहीं I इसलिए जो योगी इस बिंदु में नहीं होगा, वह सर्वसम तत्त्व को प्राप्त तो हो जाएगा, परन्तु उसको पार नहीं कर पाएगा I ऐसे योगीजन ही इस सर्वसम तत्त्व के लोक, अर्थात ब्रह्मलोक में निवास करते हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जो योगी इस सर्वसम तत्त्व के लोक, अर्थात ब्रह्मलोक को पार कर जाते हैं, वही सनातन ब्रह्माण्ड से होते हुए, शून्य नामक प्रकृति से जाकर, अंततः शून्य ब्रह्म में निवास कर पाते हैंI और जहां वह शून्य ब्रह्म ही श्रीमन नारायण कहलाए गए हैं I उस शून्य ब्रह्म के अधिष्टा देवता को ही विराट कहा गया है, जो काले वर्ण के होते हैं, अर्थात रात्रि के समान होते हैं और जो श्री कृष्ण कहलाए हैं I जब तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) यहाँ बताए गए मार्ग पर जाओगे, तब तुम भी उनका साक्षात्कार करोगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इसलिए यह गुफा न तो चलित ब्रह्माण्ड और संसार की है, और न ही अचलित ब्रह्माण्ड (या सनातन ब्रह्माण्ड) की है I और यह गुफा न शून्य की और न ही सून्य ब्रह्म की है I लेकिन ऐसा होते हुए भी, इस गुफा को शून्य तत्त्व और उस शून्य से भी आगे जो शून्य ब्रह्म हैं, उन्होंने ही घेरा हुआ है I इसलिए इस गुफा से आगे वह शून्य साक्षात्कार होता है, जिसका मार्ग शून्य समाधि कहलाता है I और उस शून्य साक्षात्कार से आगे ही शून्य ब्रह्म साक्षात्कार होता है, जिसका मार्ग असम्प्रज्ञात समाधि होता है I और जहां तक सर्वसम तत्त्व के साक्षात्कार के समाधि मार्ग का प्रश्न है, उसको सम्प्रज्ञात समाधि ही कहा जाता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव बोले… अब यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र समाप्त हुआ और तुम्हारे समस्त कर्म, कर्म फल, उनके संस्कार और संस्कार मार्ग भी नष्ट हुए हैं, इसलिए तुम्हारा चित्त अब संस्कार रहित ही हुआ है I यदि किसी भी जनम या लोकादि में, साधक का चित्त संस्कार रहित हो जाए, तो वह चित्त अनादि कालों तक संस्कार रहित ही रहता है… और ऐसा ही तुम्हारे साथ भी होगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) उस मार्ग पर जाओ, जिसको मैंने (अर्थात सनातन गुरुदेव ने) स्वयं ही स्वयं में… ऐसा कहा है I यह मार्ग ही केवल मार्ग है, इसलिए इसपर अपने भाव में केवल होकर ही रमण करना I इस स्वयं ही स्वयं में के मार्ग का नाता उस ब्रह्मपथ से है, जिसके गंतव्य में कैवल्य मोक्ष नामक ब्रह्म ही होंगे I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… तुम (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) उसी कैवल्य मार्ग पर जाने के पात्र भी हो चुके हो, जिसके गंतव्य में वैदिक महावाक्यों का ज्ञानमय साक्षात्कार होता है I इसका मार्ग भी ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति के समान,पथहीन भागहीन ही होता है I

नन्हें विद्यार्थी तो अब तक पूर्णरूपेण अचंभित हो चुका था, और उस अचम्भित दशा में उसने अपने गुरुदेव को प्रणाम करके, ऐसा कहा…

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरु देवो महेश्वर:

गुरु साक्षात् परब्रह्म:तस्मै श्रI गुरुवे नम :

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वर हैं I

गुरु साक्षात् परब्रह्म ही हैं, उन गुरुदेव को नमन करता हूँ I

ऐसे नमाण कहते ही, उस नन्हें विद्यार्थी ने अपना आत्मबल एकत्रित करके, अपने सनातन गुरुदेव से प्रश्न किया … भगवन् आप कौन हैं? I मुझे तो अब विशवास सा ही हो गया है, कि आप वह वृद्ध से, पतले से साधुबाबा हो ही नहीं सकते, जिनके परिधान में अभी आप मुझे दिखाई दे रहे हो I इसलिए कृपया करके अपना वास्तविक स्वरूप दिखाएं I

सनातन गुरुदेव बोले… तथास्तु I

और ऐसा बोलकर वह अपने उस विराट स्वरूप में आए, जिसके भीतर यह ब्रह्माण्ड ही नहीं, बल्कि ऐसा असंख्य ब्रह्माण्ड थे I और कुछ समय के पश्चात, वह पुनः अपने साधु रूप में आ गए I

अपने सनातन गुरुदेव के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करके, अपनी पूर्ण अचंभित दशा में ही उस नन्हें विद्यार्थी ने गुरुदेव साष्टांग प्रणाम किया I

उस समय वह नन्हा विद्यार्थी इतना अचंभित सा हो गया था कि वह सबकुछ भूल सा ही गया था I ऐसी स्थिति में, उसके मस्तिष्क में अष्टाक्षर नारायण मंत्र के सिवा और कुछ बचा भी नहीं था… इसलिए उसने ऐसा कहा…

ओम् नमो नारायणाय I

 

असतो मा सद्गमय I

 

error: Content is protected !!