हृदय प्राण गुफा, हृदय प्राणमय गुफा, प्राण अनश्वर है, प्राण ही जीव जगत है, प्राण और पदार्थ अंतरपरिवर्तनीय हैं, प्राण ही प्राणी है, प्राण ही जीवन है, प्राण ही जीवनी शक्ति है, प्राण और वायु महाभूत

हृदय प्राण गुफा, हृदय प्राणमय गुफा, प्राण अनश्वर है, प्राण ही जीव जगत है, प्राण और पदार्थ अंतरपरिवर्तनीय हैं, प्राण ही प्राणी है, प्राण ही जीवन है, प्राण ही जीवनी शक्ति है, प्राण और वायु महाभूत

यहाँ पर हृदय प्राण गुफा (हृदय की प्राण गुफा, हृदयाकाश की प्राण गुफा), हृदय प्राणमय गुफा (हृदय की प्राणमय गुफा, हृदयाकाश की प्राणमय गुफा), प्राण को न उत्पन्न करा जा सकता है और न ही नष्ट, प्राण की उत्पत्ति नहीं होती, प्राण नाशरहित है, प्राण उत्पत्ति रहित है, प्राण अनश्वर है, प्राण ही जीव जगत है,  प्राण और भौतिक पदार्थ अंतरपरिवर्तनीय हैं (अर्थात प्राण और पदार्थ अंतरपरिवर्तनीय हैं), प्राण ही प्राणी है, प्राण ही जीवन है, प्राण ही जीवनी शक्ति है, प्राण और वायु महाभूत आदि बिंदुओं पर बात होगी I

 

हृदयाकाश गर्भ के भाग और प्राणमय गुफा
हृदयाकाश गर्भ के भाग और प्राणमय गुफा

 

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2011 ईस्वी के प्रारम्भ का है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भत्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भत्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकेर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का छत्तीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये अध्याय आंतरिक यज्ञमार्ग की श्रृंखला का तीसरा अध्याय है।

 

हृदय प्राणमय गुफा
हृदय प्राणमय गुफा

 

 

हृदयाकाश गर्भ तंत्र में, … गुरु ही शिष्य है, शिष्य ही गुरु है, भक्त ही इष्ट है, इष्ट ही भक्त है, गुरु ही अपना शिष्य है, शिष्य ही अपना गुरु है, भक्त ही अपना इष्ट है, इष्ट ही अपना भक्त है, …

इस अध्याय श्रंखला, आंतरिक यज्ञ मार्ग में शिष्य के भीतर ही गुरु स्वयंप्रकट होते हैं, इसलिए शिष्य ही गुरु होता है I

और उसी आंतरिक मार्ग में, गुरु ही शिष्य का गंतव्य होता है, इसलिए शिष्य का वास्तविक स्वरूप, उसका अपना गुरु ही होता है I

हृदयाकाश गर्भ तंत्र का ज्ञान भी इसी बात का प्रमाण है I 

इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को मेरे हृदयगुफा के भीतर बसे हुए गुरु ने बताया था, इसलिए मैं इसको गुरु शिष्य संवाद रूप में ही बतलाऊँगा I और इसी रूप में साधकगण इसको ग्रहण करें ताकि उनको ज्ञान हो, कि अंततः गुरु अपने शिष्य के हृदय क्षेत्र में ही स्वयंप्रकट होते हैं, और इस स्वयं प्रकटीकरण के पश्चात, वही हृदय गुरु उस शिष्य को गंतव्य मार्ग दिखाते भी है, और उस मार्ग पर हाथ पकड़कर लेके भी जाते हैं I

इस संवाद में जो गुरु हैं वह साधक के हृदय गुफा में बसे हुए साधक के आंतरिक गुरु हैं I और साधक उसके हृदय में बसे हुए सनातन गुरुदेव का ही नन्हा विद्यार्थी I

इसलिए, इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में साधक, शिष्य रूप में अपने हृदय में जाता है और वहां अपने ही आंतरिक गुरुतत्त्व को सगुण साकार स्वरूप में पाकर, उन्हीं सगुण साकार गुरु के सानिध्य से इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को सफलतापूर्वक पार करके, अपने मुक्तिमार्ग पर चला जाता है I

जैसा-जैसा गुरु उस शिष्य को बोलते हैं, वैसा वैसा वह शिष्य करता है और जहाँ यह सबकुछ शिष्य के हृदयाकाश गर्भ में ही चलित हो रहा होता है I इसलिए यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र नामक मार्ग, आंतरिक मार्गों में सर्वोत्तम भी है क्यूंकि इस मार्ग में…

शिष्य अपने वास्तविक स्वरूप में, अपना ही गुरु होता है I

और गुरु भी अपने उत्कर्षपथ गामी स्वरूप में, अपना ही शिष्य होता है I 

 

इस हृदयाकाश गर्भ नामक तंत्र में, …

गुरु ही अपने शिष्य की हृदय गुफा में स्वयं प्रकट हो जाएगा I

इसलिए गुरु अपना ही शिष्य है, और शिष्य भी अपना ही गुरु है I

इसलिए इस मार्ग में, गुरु और शिष्य नामक पृथकता भी नहीं होती I

और इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र नामक आंतरिक पथ को सिद्ध करके, जो अंततः होता है वह अब बताता हूँ …

इष्ट ही अपने भक्त की हृदय गुफा में स्वयं प्रकट हो जाएगा I

इसलिए भक्त ही अपना इष्ट हो जाएगा और इष्ट ही अपना भक्त I

इसलिए इस मार्ग में, भक्त और इष्ट नामक पृथकता समाप्त होती है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

हृदय का प्राणमय कोष
हृदय का प्राणमय कोष, हृदय का प्राणमय गुफा

 

प्राणमय गुफा का स्वरूप, हृदय प्राणमय गुफा का स्वरूप, प्राण गुफा का स्वरूप, हृदय प्राण गुफा का स्वरूप, … हृदय में प्राणों की गुफा, हृदय में उपप्राणों की गुफा, प्राण और उपप्राण की गुफा, … प्राणमय गुफा, हृदय प्राणमय गुफा, हृदयाकाश की प्राणमय गुफा, हृदय प्राणमय कोष, हृदय प्राणमय गुफा क्या है, हृदय प्राणमय कोष क्या है, …

 

हृदय प्राणमय कोष तंत्र
हृदय प्राणमय कोष तंत्र

 

जैसे जैसे गुरु अपने नन्हे विद्यार्थी का हाथ पकड़कर चलते हुए हृदयाकाश के प्राणों की गुफा के समीप जाते गए, तो एक गुलाबी प्रकाश दिखाई दिया I

सनातन गुरु ने उस गुलाबी प्रकाश की ओर ऊँगली दिखाकर कहा… हृदयाकाश गर्भ की यही प्राण गुफा है, और इस गुफा का नाता प्राणमय कोष से है I इस गुफा में पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण एक के भीतर एक, ऐसे निवास करते हैं, और सबसे बाहर का प्राण गुलाबी वर्ण का व्यान है, जिसका प्रकाश यहाँ से दिखाई दे रहा है I जब हम इस गुफा में के भीतर जाएंगे, तो इसमें सभी पञ्च प्राण (अर्थात व्यान, उदान, प्राण, समान, अपान) के  साथ पञ्च उपप्राण (अर्थात  धनञ्जय, देवदत्त, नाग, कृकल और कूर्म) एक के भीतर एक पाए जाएंगे I

नन्हे विद्यार्थी ने गुरु के दिशा संकेत से बताई गई दशा की ओर देखा और समझ कर उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर, गुरु को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

इसके पश्चात सनातन गुरु ने नन्हे विद्यार्थी का हाथ पकड़ कर बोला… अब हमें हृदयाकाश से ही इसका अध्ययन करना होगा, और ऐसा कहकर गुरु और शिष्य पुनः उसी स्थान पर लौट गए जहाँ बैठकर पूर्व में भी गुरु इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को बता रहे थे I

हृदयाकाश गर्भ के मध्य में पहुंचकर, गुरु और शिष्य बैठ गए और इसके पश्चात गुरु बोले… अब प्राणमय गुफा का अध्ययन करो और इस गुफा का पूर्व में बताई गई चित्त गुफा से तुलनात्मक अध्ययन भी करो I

अध्ययन करके नन्हा विद्यार्थी बोला… यह प्राणमय गुफा प्रकाशमान दशा है, और ऐसी प्रतीत होती है  जैसे यह जीवन से (अर्थात जीवन शक्ति से) भरी हुई है I इसके कुछ स्थानों पर तो जीवनी शक्ति की अधिकता भी है और कुछ भागों में जीवनी शक्ति ही न्यून सी प्रतीत हो रही है I इस प्राणमय गुफ़ा को चित्त गुफा, विज्ञान गुफा और सत्त्वगुण गुफा के प्रकाश भी भेद रहे हैं, और यह तीनों इस प्राण गुफ़ा के भीतर भी दिखाई दे रहे हैं I इस गुफा में कुछ संस्कार, उनके पथ और भाग भी दिखाई दे रहे हैं, इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि पूर्व में यह संस्कार भी इस गुफा से संबंधित रहे होंगे, या इस गुफा से निकलकर गए होंगे या इस गुफा के भीतर से गति किए होंगे या इस गुफा की प्राण शक्ति को धारण करके ही अपनी गति किए होंगे, और यह भाग भी भरपूर मात्रा में दिखाई दे रहे हैं I लेकिन यह भाग तभी दिखाई दिए थे जब मैंने इस गुफा को ध्यानपूर्वक देखा, इससे पूर्व यह दिखाई नहीं दिए थे I ऐसा लग रहा है कि यह संस्कार और उनके पथ वह अवशेष हैं, जो किसी पूर्व संस्कार और उनकी इस प्राणमय गुफ़ा में जो पूर्व कालों में गाती रही होगी, उससे नाता रखते हैं… इसलिए यह अभी के नहीं होंगे, ऐसा प्रतीत हो रहा है I

ऐसा कहकर उस नन्हे शिष्य ने अपने गुरुदेव के मुख की ओर देखा I

इसपर गुरु बोले… यह संस्कारों और उनकी गति के शेष भाग तभी दिखाई देते हैं जब चित्त गुफा का शुद्धिकरण हो जाता है, इससे पूर्व नहीं I इसीलिए जबकि यह सूक्ष्म संस्कार और उनकी पूर्व की गति के मार्ग हृदयाकाश की सभी गुफाओं में होते हैं, लेकिन तब भी यह उन गुफाओं में तबतक दिखाई नहीं देते जबतब चित्त गुफा का शुद्धिकरण न हो जाए I यही कारण है कि हमनें हृदयाकाश गर्भ की चित्त गुफा का शुद्धिकरण सर्वप्रथम किया था, और इसके पश्चात हम सीधा इसी प्राण गुफा में, इसका शुद्धिकरण करने को आए हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… संस्कारों और उनके पथ के यही शेष भाग अदृश्य संस्कार कहलाए गए हैं, और यह भी तब दृश्यमान होते हैं जब चित्त गुफा के संस्कारो का अधिकांश रूप में नाश हो जाता है I जब संस्कार किसी भी गुफा (या क्षेत्र) के भीतर से गति करके उससे आगे चले जाते हैं, तब भी उनकी ऊर्जाएँ उस क्षेत्र में रह जाती है I इसलिए यह ऊर्जाएँ तब भी रहती हैं जब वह संस्कार किसी क्षेत्र से जा चुके होते है, और उन संकारिक ऊर्जाओं के यही अवशेष, अदृश्य संस्कार कहलाते हैं I इन सबका नाश भी साधक को करना ही होता है, ताकि साधक संस्कार रहित अवस्था को पा सके I

गुरु आगे बोले… जब ब्रह्मा ने जीव जगत की रचना करी थी, तो अपनी इच्छा शक्ति से करी थी I इस इच्छा शक्ति से जो ब्रह्माण्ड सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ था, वह सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड था, और यही वह प्राथमिक ब्रह्माण्ड था जिससे आगे के समय खण्डों में, कारण या दैविक ब्रह्माण्ड, सूक्ष्म ब्रह्माण्ड और स्थूल ब्रह्माण्ड की इसी क्रम में उत्पत्ति हुई थी I और क्यूंकि इस ब्रह्म रचना में, यह सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड ही प्राथमिक ब्रह्माण्ड था, इसलिए यह सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड, अन्य सभी ब्रह्माण्डों और उनके समस्त जीवों में बसाया भी गया था, ताकि जीव और ब्रह्माण्ड में कोई द्वैतवाद न रह जाए, जिसके कारण जीवों का समय ब्रह्माण्ड में सुखपूर्वक बीते I

गुरु आगे बोले… सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड का नाता इन समकारों से भी है I इसलिए जब किसी जीव के चित्त के संस्कारों का ही नाश हो जाता है, तब उस जीव जा नाता इस प्राथमिक ब्रह्माण्ड सहित, इस प्राथमिक ब्रह्माण्ड से उत्पन्न हुए अन्य ब्रह्माण्ड स्वरूपों और उनके समस्त भागों और उनके जीवों से भी टूट जाता है, और इस दशा में वह जीव ब्रह्माण्डातीत दशा को पा लेता है I जब जीव ब्रह्माण्ड से ही अतीत हो जाता है, तो वह जीव मुक्तात्मा कहलाता है I और क्यूंकि यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र समस्त संस्कारों के नाश का मार्ग ही है, इसलिए यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र जिसका ज्ञान अभी बताया जा रहा है, इसकी अपनी वास्तविकता में मुक्तिपथ ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और क्यूंकि यह मुक्तिपथ साधक को उस प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड से ही अतीत कर देता है, और क्यूंकि यही वास्तविक ब्रह्माण्डातीत दशा है, जो उस रचैता ब्रह्म की ही है, इसलिए यही हृदयाकाश मार्ग, ब्रह्मत्व पथ भी है I इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की अंत दशा में न तो दृष्य संस्कार चित्त में रहेंगे और न ही अदृश्य संस्कार शेष रहेंगे, इसलिए इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की अंत दशा में साधक संस्कार रहित चित्त को भी पाता है I इसलिए इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र के अंत ने, साधक संस्कारातीत होकर, ब्रह्माण्डातीत ब्रह्म को ही प्राप्त हो जायेगा I

सनातन गुरु आगे और भी बोले… यदि यह संस्कार रहित चित्त की दशा, साधक जीवित ही पा जाएगा, तो वह साधक जीवन्मुक्त कहलाएगा I और यदि इस दशा को साधक देहावसान के समय या इसके पश्चात पाएगा, तो वह साधक विदेहमुक्त कहलाएगा I इसलिए, इस हृदयाकाश गर्भ का सिद्ध साधक चाहे जीवित होते हुए या देहत्याग के समय ही इस हृदयाकाश तंत्र से परे जाए, लेकिन जबतब उस साधक ने इस तंत्र को सफलतापूर्वक पार किया होगा, उसकी मुक्ति निश्चित ही होगी I यही इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की वास्तविक महिमा है, कि जिसनें भी इसको सफलतापूर्वक पार किया होगा, उसकी मुक्ति निश्चित ही होगी I

सनातन गुरु आगे बोले… इस बिंदु के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनना और अपने स्मरण में भी रखना जबतक तुम उस ब्रह्मपथ के गंतव्य, अर्थात निर्गुण ब्रह्म में ही विलीन न हो जाओ I निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापक है, इसलिए उसका पथ ही पथहीन पथ कहलाता है… सर्वव्यापक के कोई एक या अनेक पथ कैसे हो सकते हैं?I जब किसी साधक के समस्त दृश्य और अदृश्य संस्कार, उनकी ऊर्जाएँ और उनके पथ आदि भी नष्ट हो जाते हैं, तब ही वह साधक उस अंतिम सर्वव्यापक पथहीन पथ पर जाता है, जो साधक के भीतर से ही प्रशस्त होता है… और जो ब्रह्मपथ कहलाता है I और क्यूंकि वह ब्रह्मपथ साधक की काया के भीतर से ही प्रशस्त होता है, इसलिए वही आत्मपथ और आत्ममार्ग भी कहलाता है I आत्ममार्ग ही वह गंतव्य मार्ग है, जो ब्रह्मत्व पथ कहलाया गया है I और जहाँ उस ब्रह्मत्व पथ में साधक, स्वयं ही स्वयं को जाता हुआ, स्वयं ही स्वयं में लय ही हो जाता है I और जहाँ साधक का स्व:तत्त्व ही साधक का वास्तविक स्वरूप (या आत्मस्वरूप) होता है, जो पूर्ण और ब्रह्म कहलाता है और जो सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार सभी स्वरूपों सहित, प्रकृति और भगवान् रूप मैं भी साक्षात्कार किया जाता है I यह बिन्दु भी इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की सार्वभौमिक और सर्वव्यापी अद्वैत महिमा ही बताता है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया, कि यह अद्वैत मार्ग ही है, इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर, अपने गुरुदेव को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

इसके पश्चात गुरु बोले… अब आगे बताओ की इस प्राण गुफ़ा के क्या-क्या दिखाई देता है I

नन्हे शिष्य ने अध्ययन किया और बोला… यह गुफा अदृश्य और दृश्य संस्कारों, उनके मार्गों आदि से भरी हुई है I यह गुफा इतनी ऊर्जाओं से भरी हुई है कि प्रतीत हो रहा है, जैसे इसकी ऊर्जाएँ ही अन्य सभी गुफाओं में जाकर उनके तंत्रादि को चलित भी कर रही हैं इसलिए ऐसा भी प्रतीत हो रहा है, जैसे इस प्राण गुफा की ऊर्जा ही अन्य सभी गुफाओं के कार्यों को चलायमान रखती हैं I इस प्राणमय गुफ़ा में दो प्रधान रंग है, जो लाल-पीला और नीला हैं, और इनको हल्के नीले और हल्के गुलाबी वर्णों ने घेरा भी हुआ है I इस हृदयाकाश गर्भ के स्थान से जहाँ मैं आपके साथ बैठा हुआ हूँ, मुझे यही दिखाई दे रहा है I

और ऐसा बोलकर, उस नन्हे शिष्य ने अपने पूज्य गुरुदेव के मुख की ओर, भक्ति से युक्त और श्रद्धा-समर्पण से संयुक्त भाव से प्रेमपूर्वक देखा, क्यूंकि वह नन्हा विद्यार्थी अब जानने भी लगा था, कि उसके हृदय में बसे हुए गुरुदेव कोई साधारण योगी तो बिलकुल नहीं हैं… वह शिष्य जानने लगा था, कि उसके हृदय में बसे हुए गुरुदेव, कोई बहुत बड़ी सत्ता ही होंगे I

इसपर गुरु मुस्कुराते हुए अपने नन्हे शिष्य का हाथ पकड़कर बोले… अति उत्तम I यह गुफा ब्रह्म शक्ति की परिपूर्णता सहित, उन पूर्ण ब्रह्म को भी दर्शाती है I यह गुफा उस ब्रह्मशक्ति की ऊर्जाओं से भी परिपूर्ण है I इस गुफा से उत्तम कोई शाक्त मार्ग न हुआ है, और न ही कभी होगा I यही शक्ति है, जो प्राण स्वरूप में स्वयंप्रकट हुई है और इसका सिद्ध प्राणात्मा भी कहलाता है I यही गुफा ब्रह्मरचना में भी है, और इसी से ब्रह्माण्ड के समस्त भाग अपनी ऊर्जा को पाकर, चलायमान रहते हैं I और यही एकमात्र गुफा है, जिसमें अदृश्य संस्कार मूलतः निवास करते हैं… अन्य किसी भी गुफा में अदृश्य संस्कार अपने मूल रूप में नहीं पाए जाएंगे, और यदि पाए भी जाएंगे, तब भी उनका नाता इसी प्राण गुफा से ही होगा I

 

प्राणमय गुफा का शुद्धिकरण, प्राण गुफा का शुद्धिकरण, प्राणमय गुफा शुद्धि, प्राण गुफा शुद्धि, प्राणमय गुफा शुद्धि प्रक्रिया, प्राण गुफा शुद्धि प्रक्रिया, जीवनी शक्ति शुद्धि प्रक्रिया,

…  

सनातन गुरुदेव ने अपने नन्हे विद्यार्थी का हाथ पकड़कर बोला… अब इस हृदयाकाश गर्भ में बसी हुई प्राण गुफा का शुद्धिकरण करना होगा I इसलिए इसके समस्त भागों को उसी योगाग्नि गुफा में भेज दो I

और सनातन गुरु बोले… ऐसा करते समय, पूर्व के चित्त शुद्धिकरण के कर्म से जो कर्मफल और उसका संस्कार उत्पन्न हुआ है, उसी फल रूपी संस्कार को इस गुफा के शुद्धिकरण के कर्म रूप में देखकर, उसका प्रयोग करो ताकि इस प्रक्रिया में कोई नया कर्मफल या संस्कार न उत्पन्न हो जाए  I और ऐसे प्रयोग से वह पूर्व का संस्कार फलित हो, और इस प्रक्रिया में वह और भी शुद्ध होकर, अभी से भी अधिक सूक्ष्मता को पाए I

और इसके पश्चात, गुरु ने ऊँगली को एक दिशा में दिखाकर बोला… वह देखो, उस पूर्व के चित्त शुद्धिकरण का फल, जो चित्त गुफा के भीतर भी एक संस्कार रूप में दिखाई दे रहा है I तुम उसी संस्कार का प्रयोग करना इस प्राण गुफ़ा की  शुद्धिकरण प्रक्रिया में I

और गुरु यह भी बोले… यह संस्कार जो अभी के समय उस चित्त गुफा में दिखाई दे रहा है, वह चित्त शुद्धि के कर्म का फल रूपी संस्कार ही है I जब तुमने अपने चित्त गुफा के समस्त संस्कारों का शुद्धिकरण किया था, तब चित्त के उन सभी संस्कारों के नाश से, अर्थात उसी शुद्धिकरण के कर्म से यही एकमात्र संस्कार प्रकट हुआ था I चित्त की शुद्धिकरण से पूर्व, उस चित्त में जो बहुत सारे संस्कार थे, और यह संस्कार जिसका इस शुद्धिकरण प्रक्रिया में प्रयोग करने को कहा जा रहा है, वह उन सभी का परिणामी (या अंतिम परिणामस्वरूप) ही है I और अभी के समय पर यही संस्कार ही उस चित्त गुफा में दिखाई दे रहा है I उसी परिणामी (या अंतिम परिणामस्वरूप) संस्कार का इस प्राणमय गुफ़ा के शुद्धिकरण कर्म में प्रयोंग करो, ताकि वह संस्कार ही इस प्राण गुफ़ा के शुद्धिकरण कर्म का मूल बने और इस प्रक्रिया में कोई और कर्म या फल न उत्पन्न हो जाए I

गुरु आगे बोले… पूर्व के चित्त गुफा के शुद्धिकरण प्रक्रिया से चित्त के सभी संस्कार नष्ट हुए थे, लेकिन उस शुद्धिकरण प्रक्रिया के कर्मफल स्वरूप से यही एक संस्कार उत्पन्न हुआ था, जो उस पूर्व की शुद्धिकरण प्रक्रिया का एकमात्र परिणामी (या अंतिम परिणामस्वरूप) संस्कार था I और अभी के समय पर यही संस्कार उस चित्त गुफा में दिखाई दे रहा है, इसलिए इस प्राण गुफ़ा के शुद्धिकरण में, इसी संस्कार का कर्म के कारक रूप में प्रयोग करना और ऐसा मानना कि यह पूर्व शुद्धिकरण का कर्मफल रूपी संस्कार ही इस प्राण गुफ़ा के शुद्धिकरण प्रक्रिया का कर्म रूप हुआ है I ऐसा करने से इस प्राण गुफ़ा की शुद्धिकरण प्रक्रिया में कोई नया संस्कार नहीं उत्पन्न होगा I ऐसा करने से चित्त गुफा का यह संस्कार ही प्राण गुफा के शुद्धिकरण के पश्चात, एक नया स्वरूप धारण करेगा और इस संस्कार का वह नया स्वरूप ही इस प्राण गुफ़ा के शुद्धिकरण प्रक्रिया का कर्मफल होगा I

गुरु आगे बोले… और ऐसा ही प्रत्येक गुफ़ा के शुद्धिकरण में भी किया जाएगा, ताकि पूर्व शुद्धिकरण के कर्मफल स्वरूप में जो संस्कार प्रकट हुआ था, वही अगले शुद्धिकरण के कर्मों का कारण होकर, एक नए कर्मफल स्वरूप में प्रकट होगा I और ऐसा ही जब इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में बारबार होगा, तो जब इसके अंत में, सभी गुफाओं से सभी संस्कारों के नष्ट हो जाएंगे, तब बस एक ही संस्कार शेष रह जाएगा, जो इस पूरी शुद्धिकरण प्रक्रिया से और इस प्रक्रिया के अंत में प्रकट हुआ तुम्हारा अंतिम संस्कार होगा I

सनातन गुरु आगे बोले… यह अंतिम संस्कार ही इस हृदयाकाश गर्भ का परिणामी (या अंतिम परिणामस्वरूप) अर्थात एकमात्र संस्कार होगा, जो उस नन्हे बालक को (जिसने अपनी स्थूल काया को इस नन्हें विद्यार्थी को दान किया था और जिसकी काया में अभी यह नन्हा विद्यार्थी बैठा हुआ है) तब लौटाया जाएगा, जब तुम हृदयाकाश गर्भ तंत्र को पूर्ण करके, इससे आगे की दशाओं में जाओगे, जो राम नाद और उससे भी आगे के अष्टम चक्र (या निरलम्बा चक्र) साक्षात्कार की होंगी I और ऐसे आगे जाकर, यह संस्कार तुम्हारे कपाल के शिवरंध्र नामक स्थान से बहार निकलेगा और उस नन्हे बालक के चित्त में ही लौट जाएगा, जिसके शरीर में तुम अपने इस जन्म में परकाया प्रवेश प्रक्रिया से, तुम्हारी माता, सावित्री विद्या सरस्वती द्वारा लौटाए गए हो I

गुरु आगे बोले… और इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को पूर्ण करके (अर्थात इस प्रक्रिया के अंत में) उसी अंतिम संस्कार के भीतर ही, परन्तु एक सूक्ष्म रूप में इस प्रक्रिया का समस्त तंत्र भी होगा, और इस प्रक्रिया में नष्ट हुए समस्त समकारों के सूक्ष्म बिंदु भी होंगे I और यही अंतिम संस्कार उस नन्हे बालक को लौटाया जाएगा, जिसके शरीर में बैठ कर तुम यह ज्ञान पा रहे हो और साक्षात्कार भी कर रहे हो I जो योगी इस अंतिम संस्कार से ही छूट गया, वह मुक्तिमार्ग पर ही चला जाता है I

गुरु और भी बोले… इस काया में आने से पूर्व, तुम संस्कार रहित चित्त के धारक ही थे I और क्यूंकि एक बार भी यदि चित्त संस्कार रहित हो जाए, तो वह कभी भी संस्कारों को धारण करके रख ही नहीं पाता है, इसलिए यदि ऐसा योगी पुनः स्थूल काया में कुछ विशेष कर्म करने हेतु लौटाया जाएगा, तो उस योगी को इस हृदयाकाश गर्भ प्रक्रिया का पात्र ही माना जाएगा, क्यूंकि यही तंत्र संस्कारों के समूल नाश का मार्ग है I ऐसा होने के कारण ही मेरा (अर्थात सनातन गुरुदेव का) आंतरिक अवतरण ऐसे योगी की हृदय गुफा में होता है I यही कारण है कि तुम्हारे हृदय में भी मेरा (अर्थात सनातन गुरुदेव का) आंतरिक अवतरण हुआ है, क्यूंकि इस समस्त ब्रह्म रचना में, इस संस्कार रहित दशा की प्राप्ति का मार्ग, मेरे सिवा किसी और को पता भी नहीं है I और क्यूँकि जिस हिरण्यगर्भ लोक से तुम इस स्थूल काया में परकाया प्रवेश प्रक्रिया से लौटाए गए हो, उसके उत्कर्षपथ में नीचे की गति होती ही नहीं है, इसलिए तुम्हे तुम्हारे जीवन के पूर्ण होने से पूर्व ही पुनः अपनी जन्म लेने से पूर्व की संस्कार रहित दशा को पाना ही है, नहीं तो इस जीव जगत के अनादि अनंत उत्कर्षपथ में ही त्रुटि आ जाएगी I इस त्रुटि से बचने हेतु भी मुझे तुम्हारे भीतर आंतरिक अवतरण करना पड़ा है, ताकि इस जीव जगत का उत्कर्षपथ वैसे ही सुरक्षित रह सके, जैसा वह अनादि कालों से रहा है I

सनातन गुरु आगे बोले… और क्यूंकि तुम अपने समस्त जीव इतिहास में सिद्धादि होते हुए भी, सदैव ही अपने को सिद्धियों से विमुख रखा है, इसलिए महाकारण ब्रह्माण्ड की दिव्यताओं ने जब भी तुम्हे कोई जन्म दिया था, तब भी मैं ही तुम्हारे ह्रदय गुफा में आंतरिक अवतरण किया ही था I उन सभी आंतरिक अवतरणों का भी वही कारण था जो अभी के आंतरिक अवतरण का है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि हमें पता था, कि तुम पूर्णतः सिद्ध होते हुए भी, सिद्धियों को धारण नहीं करते हो, जिसके कारण तुम नन्हे विद्यार्थी स्वरूप में ही स्वयं को देखते हो I इसलिए भी मुझे तुम्हारे मार्गदर्शन हेतु तुम्हारी हृदय गुफा में आंतरिक अवतरण करना पड़ता है, जब जब तुम किसी स्थूल शरीर में उन्ही महाब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा परकाया प्रवेश मार्ग से ही सही, लेकिन लौटाए जाते हो I इसलिए, जब जब तुम किसी स्थूल काया में लौटाए गए, तब तब मैं भी तुम्हारे भीतर आंतरिक अवतरण करके, तुम्हारे गुरु रूप से लौटा हूँ I और क्यूंकि ऐसा कई बार हुआ है, इसलिए यह पहला तो बिलकुल नहीं है I

सनातन गुरु आगे बोले… जो सिद्ध निरालम्ब चक्र को पाकर भी अपनी मुक्ति से विमुख रहता है, और ऐसी विमुख दशा में वह किसी स्थूलादि लोक में ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा लौटाया जाता है, तो उसके हृदय गुफा में मेरा अवतरण होता है I और इसलिए भी मैं तुम्हारी हृदय गुफा में आंतरिक अवतरण मार्ग से स्वयंप्रकट हुआ हूँ I निरालम्ब चक्र सिद्धि को आंतरिक अश्वमेध सिद्धि भी कहा जाता है I इस जन्म तक और इस ब्रह्म कल्प के समयखण्ड में ही तुमनें इस सिद्धि को एक सौ बार पाया है, और एक सौ बार पाकर भी तुम अपनी मुक्ति से विमुख भी हुए थे I इसी कारणवश तुम्हारे इस जन्म सहित, मेरा आंतरिक अवतरण तुम्हारे भीतर एक सौ बार हो चुका है I

सनातन गुरु आगे बोले… इस आंतरिक अश्वमेध यज्ञ सिद्धि को बस एक बार पाने पर ही योगी मुक्ति का पात्र हो जाता है I परन्तु कुछ पगले योगी भी होते हैं, जो मुक्ति के पात्र होने पर भी मुक्ति से विमुख हो जाते हैं I तुम अपने पूर्व जन्म के मानस पिता, ब्रह्मर्षि क्रतु की आज्ञा से ऐसे ही योगी रहे हो I ऐसे पगले योगीजनों की हृदय गुफा में ही मैं आंतरिक अवतरण करता हूँ I जब ऐसा योगी उसके अपने समस्त जीव इतिहास में इस आंतरिक अश्वमेध यज्ञ को निन्यानवें बार सिद्ध करते हैं, तो वह रूद्र के समस्त स्वरूपों के धारक हो जाता हैं I और जब इसी आंतरिक यज्ञ को वह योगी एक सौ बार पूर्ण करेगा, तो वह इन्द्र स्वरूप होगा I और जब वह योगी इसी आंतरिक यज्ञ को एक सौ एक बार सिद्ध करेगा, तो वह प्रजापति स्वरूप को ही पा जाएगा I प्रजापति स्वरूप को पाकर वह योगी किसी भी लोक का निवासी नहीं हो पाएगा, और ऐसा होने के कारण जिस योगी ने ऐसा स्वरूप पाया होगा, उसका वह अंतिम जन्म ही होगा I इस जन्म में तुमने भी इस आंतरिक यज्ञ को एक सौ एकवी बार सिद्ध करना है और जब तुम ऐसा कर लोगे, तो तुम्हारा यह जन्म भी अंतिम ही होगा, जिसके कारण तुम इस समस्त महाब्रह्माण्ड के किसी भी भाग या लोक में, पुनः किसी भी जीव रूप में लौट भी नहीं पाओगे I प्रजापति स्वरूप को पाया हुआ योगी निर्गुण ब्रह्म के समान एक निरंग निराकार शरीर को पाता है जिसके कारण ऐसा योगी ब्रह्म की समस्त सगुण, साकारी और निराकारी अभिव्यक्तियों से ही अतीत होकर रह जाता है I  ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि प्रजापति स्वरूप से आगे कोई सिद्धि होती ही नहीं है, और यही वह कारण है कि इसको प्राप्त होने के पश्चात योगी इस महाब्रह्माण्ड से ही अतीत होकर शेष रह जाता है I पञ्च ब्रह्म गायत्री सिद्धान्तानुसार, यही ईशान ब्रह्म की सिद्धि कहलाती है I और पञ्च मुखी सदाशिव मार्ग के अनुसार, इसी सिद्धि को सदाशिव के ईशान मुख की सिद्धि कहा गया है I इस समस्त ब्रह्म रचना में यही एक सौ एकवी आंतरिक अश्वमेध यज्ञ सिद्धि, अंतिम सिद्धि होती है I इसी सिद्धि को प्राप्त होने हेतु तुम्हें पञ्च विद्या सरस्वती में से एक विद्या, जो सावित्री सरस्वति कहलाती हैं, उनके द्वारा ही इस सगुण साकार स्थूल काया रूप में लगाया गया है I

गुरुवाणी से यह नन्हा विद्यार्थी अब जान गया, कि उसने अपने आंतरिक गुरु को सनातन गुरु जैसा क्यूँ पाया था I नन्हा शिष्य यह भी जान गया, कि गुरु को उस शून्य गुफा में पहली बार देखते ही, उसको क्यों लगा था, कि यह सनातन गुरु ही हैं I हो सकता है पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण ही उस नन्हे विद्यार्थी को उन बुड्ढे साधुबाबा में सनातन गुरु स्वरूप दिखाई दिया था I

यह सोचकर उस नन्हे विद्यार्थी ने गुरु को सर हिलाकर संकेत दिया, कि अब मुझे समझ में आ गया है I

आगे बढ़ता हूँ …

 

इसके पश्चात गुरु बोले…  अब ध्यान देना …

कर्म ही कर्मफल को धारण किया है, इसलिए कर्म के भीतर ही कर्मफल बसा है I

ऐसा होने पर भी वह कर्मफल तब ही प्रकट होगा, जब कर्म किया जाएगा I

यह कर्म और कर्मफल सिद्धांत का प्रथम बिन्दु है I

और इस समस्त जीव जगत के इतिहास में जो भी कर्म किए गए हैं, या करे जाएंगे, उन सबका नाता रचैता के उस प्रथम कर्म से है, जिससे यह जीव जगत उत्पन्न हुआ था I

रचैता के उस कर्म से जो जीव जगत प्रथम उत्पन्न हुआ था, वह जीव जगत सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड के स्वरूप में ही था, और यही प्राथमिक ब्रह्माण्ड उन रचैता के उत्पत्ति कृत्य का कर्मफल स्वरूप था I यह भी वह कारण है कि किसी भी जीव के कर्मों के फल भी एक संस्कार रूप में ही प्रकट होते हैं I

पूर्व का कर्मफल ही अगले कर्मों का मूल कारण बनता है I

कर्मफल में ही अगले कर्म बसे हुए हैं, जिसके कारण कर्मफल ही कर्म मूल है I

यह कर्म और कर्मफल सिद्धांत का द्वितीय बिंदु है I

इसलिए, इस जीव जगत के समस्त इतिहास में जो भी कर्म किए गए हैं या आगे कभी भी किए जाएंगे, उन सबके मूल में वह सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड ही है, जो रचैता की इच्छा शक्ति रूपी प्राथमिक सूक्ष्म कर्म से, उसके कर्मफल रूप में स्वयंप्रकट हुआ था I

समस्त कर्म इसी सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड से ही जुड़े होते हैं, क्यूंकि इस प्राथमिक ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का मार्ग भी रचैता की इच्छा शक्ति के स्वरूप में रचैता का प्राथमिक कर्म ही था, और जिसके फलस्वरूप भी वह प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड ही था, और जिससे कारण (दैविक), सूक्ष्म और स्थूल ब्रह्माण्ड और उनके समस्त पिण्ड उत्पन्न हुए थे I

वह संस्कारिक ब्रह्माण्ड रचैता की इच्छा शक्ति रूपी कर्म का फल था I

संस्कारिक स्वरूप में ही सभी कर्मफल, चित्त में संस्कार रूप में ही बसे हैं I

यह संस्कार विज्ञान ही कर्म और कर्मफल सिद्धांत का वास्तविक ज्ञान है I

चित्त के संस्कारों के नाश का विज्ञान ही उत्कर्ष मार्गों का अंतिम विज्ञान है I

संस्कार नाश साधक की चेतना को ब्रह्माण्ड से अतीत दशा में लेके जाता है I

वह ब्रह्माण्डातीत दशा भी इस जीव जगत के रचैता कार्यब्रह्म, योगेश्वर की है I

ब्रह्माण्डातीत दशा प्राप्ति का मार्ग भी, यहाँ बताया जा रहा हृदयाकाश गर्भ तंत्र है I

कार्य ब्रह्म ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म की रजोगुणी, सर्वक्रियात्मक सर्वघ्न अभिव्यक्ति हैं I

हिरण्यगर्भ संस्कारातीत होते हुए भी, समस्त संस्कारों के करक और कारण भी हैं I

इसलिए, अंतगति के अनुसार, यह मार्ग उन हिरण्यगर्भ की ओर ही लेके जाएगा I

वह हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म, साधक के सुनहरे सगुण आत्मस्वरूप में साक्षात्कार होंगे I

इसलिए, हृदयाकाश गर्भ तंत्र, उन हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म के मार्ग का प्रारम्भ ही है I

यही सब बिंदु इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र के मूल, सार और गंतव्य को भी दर्शाते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

गुरु बोले…

  • क्यूंकि यह मार्ग संस्कारतीत दशा में ही लेकर जाता है, इसलिए इस मार्ग में पूर्व के कर्मों द्वारा जो संस्कारिक कर्मफ़ल उत्पन्न होते है, उन्ही का प्रयोग अगले कर्मों में किया जाता है I
  • ऐसा करने से वही पूर्व का संस्कार, कर्म और कर्मफल में प्रतिष्ठित होकर, अन्य सभी संस्कारों के नाश के पश्चात भी, अंतिम संस्कार स्वरूप में प्रकट हो जाएगा I
  • उस अंतिम संस्कार के साथ कोई और संस्कार भी नहीं होगा, क्यूंकि इस अंतिम संस्कार की दशा तक आते आते, अन्य सभी पूर्व संस्कारों का नाश भी हो चुका होगा I
  • इसलिए इस मार्ग में, पूर्व के संस्कार नाश के कर्म से उत्पन्न हुए कर्मफ़ल रूपी संस्कार का बारम बार प्रयोग, अगले कर्मों के कारण रूप में होता है I
  • और ऐसा करने से जब सभी संस्कार नष्ट हो जाएंगे, तब बस एक संस्कार ही शेष रहेगा और यह संस्कार ही साधक के चित्त में बसा हुआ, एकमात्र संस्कार होगा, जो अंतिम संस्कार कहलाएगा I
  • जब अन्य सभी संस्कारों को नष्ट करते समय, एक ही संस्कार का बारम बार प्रयोग होता है, तब अंततः बस वही संस्कार शेष रह जाता है I इसी को अंतिम संस्कार कहा गया है I
  • इस अंतिम संस्कार का आलम्बन लेके ही साधक इस हृदयाकाश गर्भ को पार करता है, और इस हृदयाकाश गर्भ से भी आगे की दशाओं में गति करता है I
  • और जहाँ वह आगे की गति भी हृदय कैवल्य गुफा (अर्थात हृदय मोक्ष गुफा या हृदय निर्वाण गुफा) से जाकर, ॐ मार्ग से होकर, राम नाद को पार करके, अंततः निरालम्बस्थान में ही साधक की चेतना को पहुंचा देती है I

नन्हे विद्यार्थी को यह समझ आ गया, और उसने अपने गुरु को ऐसा कह भी दिया I

इसपर गुरु बोले … यही वह मार्ग है जिसमें साधक अंततः ऐसा ही जानेगा कि …

ब्रह्म का ज्ञाता केवल ब्रह्म है I

केवल ब्रह्म ही ब्रह्म का ज्ञाता है I

ब्रह्म होकर ही ब्रह्म को जाना जाता है I

यदि ब्रह्म को जानना है, तो ब्रह्म ही हो जाओ I

ब्रह्म को जानने और प्राप्ति का कोई और मार्ग है ही नहीं I

इसलिए, ब्रह्म का ज्ञाता, अपने आत्मस्वरूप में ही ब्रह्म को पाता है I

जिस योगी की आंतरिक दशा ब्रह्म सरीकी नहीं, वह ब्रह्म का ज्ञाता भी नहीं है I

यह साक्षात्कार ही इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र और इसके मार्ग का एक उत्कृष्ट बिंदु है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसके पश्चात, सनातन गुरु बोले… जिस साधक ने इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र को पूर्ण किया होगा, उसके जीव जगत रूपी अस्तिव्त का ही अंत हो जाएगा I ऐसा होने के पश्चात, वह साधक ही मुक्तात्मा कहलाएगा I इसलिए यह मार्ग, साधक के जीव रूपी अस्तित्व और जगत नाम के अस्तित्व, दोनों का ही अंत कर देता है, जिसके कारण साधक न जीव रूप में रहता है, और न ही जगत रूप में निवास कर पाता है I ऐसा साधक पिंडातीत और ब्रह्माण्डातीत, दोनों का अद्वैत स्वरूप होकर ही शेष रह जाता है I ऐसा होने के कारण, …

हृदयाकाश गर्भ का सिद्ध साधक, रचना, रचना का तंत्र और रचनातीत भी होता है I

वह रचनातीत होता हुआ भी, रचना, रचना का मूल और गंतव्य, तीनों ही होता है I

जो रचनातीत होता हुआ भी, रचना, रचना का मूल और गंतव्य है, वही ब्रह्म है I

ऐसा साधक ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप में पाकर, सर्वाघन होकर रहता है I

नन्हे विद्यार्थी ने गुरु से पूछा… इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र के मार्ग को पूर्ण करके क्या मेरा अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा? I

इसपर गुरु हंसकर बोले… तुम तो इस जन्म के पूर्व से ही अस्तित्वहीन थे I जो पूर्व से ही ऐसा हो, उसके लिए क्या प्राप्ति और क्या समाप्ति, क्या गति और क्या अवरोध,क्या स्थिति और क्या दशा… उसके लिए तो कुछ होता ही नहीं है I यह काय रूप धारण से पूर्व में भी तुम्हारे भीतर न तो कोई संस्कार था और न ही तुम्हारे किसी पूर्व के संस्कार का कोई भाग ब्रह्माण्ड की चित्त काया में ही था I जो संस्कार साधक की काया के भीतर होता है, उसका प्रतिबिंब ही ब्रह्माण्ड की चित्त काया में पाया जाता है I इसलिए चित्त काया का अध्ययन करके, किसी भी जीव (या जगत के भाग) के संस्कारों का अध्ययन किया जा सकता है I लेकिन जब किसी जीव (या जगत के भाग) का चित्त संस्कार रहित होता है, तो उस जीव के संस्कार भी ब्रह्माण्ड की चित्त काया में दिखाई नहीं देते I इसलिए जब किसी जीव का चित्त संस्कार रहित दशा को प्राप्त होता है, तब उस जीव के चित्त से जुड़े हुए ब्रह्माण्ड की चित्त काया में भी उसके कोई संस्कार नहीं दिखाई देते I यह भी इस हृदय आकाश गर्भ तंत्र की सिद्धि मार्ग का एक बिंदु है, कि जैसे ही साधक के चित्त के भीतर के संस्कार नष्ट हो जाएंगे, वैसे ही उस साधक के चित्त से जुड़े हुए ब्रह्माण्डीय चित्त काया के भाग में भी वह संस्कार, शून्य हो जाएंगे I इसलिए संस्कार विज्ञान के दृष्टिकोण से तो तुम्हारे लिए न कोई उत्पत्ति है, न स्थिति, न ही कोई नाश ही है I

इसपर नन्हे विद्यार्थी ने पूछा… क्या इन चित्त के भीतर संस्कारों के नाश से ब्रह्माण्डीय चित्त के समस्त संस्कार भी नाश हो जाते हैं? I

इसपर गुरु ठहाके मारके हँसे और बोले… ऐसा हो ही नहीं सकता, क्यूंकि साधक अपने चित्त के संस्कारों के नाश से ब्रह्माण्डीय चित्त के उतने ही संस्कारों का नाश कर सकता है, जो उसके अपने चित्त के संस्कारों के प्रतिबिंब हैं (और ऐसे ही प्रतिबिंब रूप में वह संस्कार उस ब्रह्माण्डीय चित्त में निवास कर रहे होते हैं) I इसलिए ब्रह्माण्डीय चित्त के समस्त संस्कारों का समूल नाश, साधक के चित्त के संस्कारों के नाश से हो ही नहीं सकता है I इस हृदय आकाश गर्भ तंत्र से, बस उतने ही ब्रह्माण्डीय संस्कार नाश होंगे, जो साधक के चित्त में बसे हुए संस्कारों के ब्रह्माण्डीय चित्त काया में प्रतिबिंब होंगे… न इससे अधिक और न ही इससे न्यून कुछ भी हो सकता है I

गुरु आगे बोले… इसलिए निश्चिंत रहो, हृदयाकाश गर्भ नामक तंत्र में, ब्रह्माण्डीय संस्कारों का समूल नाश असंभव ही है, क्यूंकि यहाँ केवल तुम्हारी चित्त आदि गुफ़ाओं के संस्कार नष्ट करे जा रहे हैं, न कि ब्रह्माण्डीय चित्त काया के समस्त संस्कारों का नाश किया जा रहा है I कोई भी जीव ब्रह्माण्डीय चित्त काया के भागों को उतना ही छू सकता है, जितना उस जीव के चित्तादि भागों में बसे हुए संस्कारों से संभव है… न इससे अधिक और न ही इससे न्यून I

 

प्राण गुफा का शुद्धिकरण, प्राणमय गुफा का शुद्धिकरण, दृश्य और अदृश्य संस्कारों का नाश, प्राण गुफा के दृश्य और अदृश्य संस्कारों का नाश, प्राणमय गुफा के दृश्य और अदृश्य संस्कारों का नाश, प्राणमय गुफा के संस्कारों का नाश, प्राण गुफा के संस्कारों का नाश, …

गुरु बोले… चलो अब इस प्राणमय गुफ़ा के समस्त दृश्य और अदृश्य संस्कारों को वैसे ही नष्ट करो, जैसा पूर्व में तुम्हे बताया था I

इसके पश्चात उस नन्हे शिष्य ने वैसा ही किया I और जैसे ही उस नन्हे विद्यार्थी ने ऐसा किया, वैसे ही योगाग्नि बहुत विकराल और विशालकाय स्वरूप धारण कर गई I इस स्वरूप में वह सब कुछ जो उस योग अग्नि में अर्पित किया आया था, बम पटाखों के साथ स्वाहा होने लगा I योगाग्नि की ऐसी प्रचण्ड दशा को देखकर, उस नन्हे विद्यार्थी में अपने गुरु के मुख की ओर देखा I

इसपर गुरु बोले… पुनः प्राण गुफा की ओर देखो, वहां पर अभी भी कुछ भाग शेष है और उस शेष भाग को भी इसी योगाग्नि में वैसे ही भावादी में बसकर अर्पण करो जैसे पूर्व में किया था I

नन्हे विद्यार्थी ने उस दिशा में देखा, जिसमें गुरु अपनी ऊँगली से दिखा रहे थे, और वह नन्हा शिष्य गुरुदेव को बोला… जी, पांचों प्राणों के मध्य में, जो हल्के नीले वर्ण का उपप्राण है, उसमें अभी कुछ संस्कारिक भाग शेष रह गए हैं I पञ्च वायु और पञ्च उपवायु में भी कुछ संस्कारिक भाग शेष रह गया है, और इनके मध्य के स्थानों में जहाँ पञ्च वायु और पञ्च लघुवायु का मिलन होता है, वहां भी कुछ संस्कारिक भाग शेष रह गए हैं I

इसपर हृदय गुफा में बैठे सनातन गुरु बोले… हाँ, इन सभी में कुछ संस्कारिक भाग शेष रह गए हैं I इनको भी नष्ट करो I और इनके नाश के लिए वही पूर्व के नाश करने वाले कर्म के कर्मफल रूपी संस्कार का ही प्रयोग करो I यही कर्मफल जो एक संस्कार रूप में चित्त गुफा में निवास कर रहा है, उसको ही अपने अगले कर्म का कारण बनाओ I

और गुरु बोले… इस संस्कार नाश रूपी कर्म में भी वैसे ही अनासक्त रहो, जैसे पूर्व के संस्कार नाश में रहे थे I यदि ऐसा अनासक्त नहीं रहोगे तो इस कर्म का कर्मफल भी भोगना पड़ जाएगा, और वह कर्मफल ही विचित्र प्रकार की पीड़ाओं के स्वरूप में तुम्हारी काया में प्रकट हो जाएगा I जो योगी इस आंतरिक यज्ञमार्ग के समय अनासक्त रहते है, वह कर्म करते हुए भी कर्मफलों के न तो अधिकारी रहते है और न ही उन कर्मफलों के भोगता ही रह पाते हैं I और योगी की यही कर्मों से अनासक्ति ही इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में सफलता का मूल कारण भी है I ऐसे करे गए कर्म ही निष्काम कर्म कहलाते है I निष्कर्म कर्म से जो फल उत्पन्न होता है, वह योगी को प्रभावित भी नहीं करता है I

सनातन गुरु आगे बोले… इस संस्कार नाश प्रक्रिया में यह भी अपने स्मरण में रखो, कि प्राणादि गुफाओं में, जहां जहां अधिक ऊर्जा प्रवाह दिखाई दे रहा है, वहीँ पर ही वह संस्कारिक दशाएं होंगी, जो अभी तक नाश नहीं हुई है I और क्यूंकि ऐसा ऊर्जा प्रवाह दिखाई भी दे रहा है, इसलिए प्राणमय गुफा के संस्कारों और उनके मार्ग रूपी ऊर्जाओं का समूल नाश भी अभी तक नहीं हुआ है I

ऐसी गुरूवाणी सुनकर, नन्हे विद्यार्थी ने कर्मों से अनासक्त होके, अपनी इच्छा शक्ति से प्राण गुफा के भीतर जो भी संस्कार और संस्कार ऊर्जा के पथ आदि शेष थे, और जो भी ज्ञान, विज्ञान, चित्त, मन आदि नहीं था, उसको भाव में एकत्रित किया और वह सबकुछ उसी योगाग्नि गुफा में अर्पित कर दिया I

और ऐसा करने के पश्चात उस नन्हे विद्यार्थी ने पाया, कि इस बार तो वह सब भी योगाग्नि में चला गया, जो पूर्व में उस प्राण गुफा के भीतर दिखाई ही नहीं दे रहा था I जैसे ही यह सबकुछ योयगाग्नि में गया, वैसे ही वह योगाग्नि प्रचण्ड रूप में पुनः आ गई और इसी स्वरूप में वह सबकुछ जो योगाग्नि में अर्पण किया गया था, वह फट-फट कर ध्वस्त होने लगा, जैसे दीपावली के कई सारे पटाखे फोड़े जा रहे हैं I

ऐसी दशा में नन्हे विद्यार्थी ने यह भी देखा, कि वह सब कुछ जो अभी योगाग्नि में अर्पण किया गया था, उसके साथ-साथ हृदयाकाश की और बहुत सारी गुफाओं से भी संस्कारादि दशाएं उसी योग अग्नि में स्वतः ही प्रवेश करने लग गई हैं, और इनमें तो वह दशाएँ भी हैं, जिनके बारे में उस नन्हे विद्यात्रहि को इस वाले संस्कार नाश कर्म से पूर्व में पता भी नहीं था I

जब ऐसा देखा तो वह नन्हा शिष्य सोचने भी लगा, कि यह क्या हो रहा है? I और ऐसी विडम्बना में उस नन्हे शिष्य ने पुनः अपने गुरु के मुख की ओर देखा I

इसपर गुरु जो यह सबकुछ देख रहे थे, वह बोले… अब एक ही बार में इस हृदयाकाश की समस्त गुफ़ाओं के सभी संस्कार और उनके मार्ग इसी योगग्नि में अर्पण दो I और ऐसा करते समय भी उसी पूर्व के नाश कर्म से उत्पन्न हुए संस्कार का प्रयोग, पूर्व के अनासक्त भाव को पुनः धारण करके ही करना I

नन्हे विद्यार्थी ने पुनः वैसे ही किया, जैसा उसके गुरुदेव ने आदेश दिया था I और इस प्रक्रिया में अन्य सभी गुफाओं के दृश्य और अदृश्य संस्कारों सहित, उनके मार्गादि भी उसी योगग्नि गुफा में प्रवेश कर गए I

जैसे ही ऐसा हुआ, तो वह योगाग्नि पुनः एक विराट रूप में स्वयंप्रकट हो गई और संपूर्ण हृदयाकाश और उस हृदयाकाश की समस्त गुफाओं में भी प्रवेश करने लगी I उस योगाग्नि ने ऐसा विशालकाय स्वरूप धारण कर लिया, कि वह अपनी गुफा से भी बाहर निकल गई और सनातन गुरु सहित, उस अग्नि ने नन्हे विद्यार्थी को भी घेर लिया I और शनैः शनैः उस हृदयाकाश गर्भ में सबकुछ उस योगाग्नि में समाया हुआ सा (बसा हुआ सा) ही प्रतीत होने लगा I और उस विराट योगाग्नि में सारे संस्कार, संस्कार मार्ग और उनसे संबद्ध दशाएं ध्वस्त भी होने लगीं I जैसे ही वह संस्कार आदि नष्ट हुए, योगाग्नि भी शांत हुई और इसके पश्चात, वह योगाग्नि पुनः अपनी गुफा में प्रतिष्ठित हो गई I

 

प्राण को न उत्पन्न करा जा सकता है और न ही नष्ट, प्राण की उत्पत्ति नहीं होती, प्राण का नाश नहीं होता, प्राण नाशरहित है, प्राण उत्पत्ति रहित है, प्राण अनश्वर है, प्राण का अनश्वर स्वरूप, प्राण ही जीव जगत है, जीव जगत के मूल में प्राण है, उत्पत्ति स्थिति और लय तीनों प्राणों के कारण ही होते हैं, उत्पत्ति स्थिति और संहार तीनों प्राणों के कारण ही होते हैं, उत्पत्ति स्थिति और लय प्राणों के कारण ही होते हैं, भौतिक द्रव्यों के मूल में प्राण है, भौतिक पदार्थों के मूल में प्राण है, भौतिक पदार्थ और प्राण अंतरपरिवर्तनीय हैं, भौतिक द्रव्य और प्राण अंतरपरिवर्तनीय हैं, पदार्थ और प्राण की अंतरपरिवर्तनीय अवस्था, प्राण विज्ञान, प्राण ही प्राणी हुआ है, प्राण ही प्राणी है, प्राण ही जीवन है, जीवन के मूल में प्राण है, प्राण ही जीवनी शक्ति है, जीवनी शक्ति ही प्राण है, प्राण और वायु महाभूत का नाता, प्राण ही वायु है, वायु ही प्राण है, प्राण और वायु महाभूत अंतरपरिवर्तनीय हैं, प्राण का वायु महाभूत से नाता, प्राण और वायु महाभूत,प्राण उत्पत्ति रहित है, प्राण नाश रहित है, प्रकृति प्राण है, प्राण ही प्रकृति ही है, प्रकृति अनश्वर है, प्रकृति ही शक्ति है, प्राण ही शक्ति है, प्राण ही सबकुछ है, प्राण ही जीव जगत रूप में प्रकट हुआ है, प्राण ही दुर्गा है, प्राण ही अपराजिता है, …

सनातन गुरु बोले… प्राण ही जीवनी शक्ति है, इसलिए इन प्राणों का शुद्धिकरण समयबद्ध प्रकार से कई बार भी हो सकता है, और यह शुद्धिकरण प्रक्रिया भी तबतक चलेगी जबतक यह शुद्धिकरण हो न जाए I यही कारण है कि तुम्हे भी यह अधिक बार करनी पड़ी है I

प्राण गुफा की शुद्धिकरण प्रक्रिया से नन्हा विद्यार्थी यह जान गया था, इसलिए उसने गुरु को अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका स्वीकारात्मक संकेत भी दिया I

सनातन गुरु आगे वाले… प्राण को न तो उत्पन्न करा जा सकता है, और न ही नष्ट I और ऐसा होने के कारण प्राण उत्पत्ति रहित है, और नाश रहित भी I प्रकृति का मूल स्वरूप भी ऊर्जा है, जो प्राण ही हैं और प्राण अनश्वर ही है I जिसकी उत्पत्ति ही न हो, उसका कैसा नाश और इसीलिए प्राण एक अनश्वर सत्ता ही है I यह प्राण ही जीव जगत की क्रियाशील अवस्था का मूल है, और उत्पत्ति स्थिति और लय, यह तीनो भी प्राण के कारण ही होते हैं I समस्त भौतिक द्रव्यों के मूल में प्राण ही हैं, और ऐसा होने के अतिरिक्त भौतिक पदार्थ और प्राण अंतरपरिवर्तनीय भी हैं I प्राण ही भौतिक द्रव्य रूप में प्रकट हुआ है, इसलिए समस्त भौतिक पदार्थ भी प्राणमय ही हैं I प्राण ही जीवन है और ऐसा इसलिए है क्यूंकि जीवन के मूल में प्राण ही हैं I जो कुछ भी इस जीव जगत में स्थूल या सूक्ष्म रूप में है, वह सब के सब उनके मूल से प्राण ही हैं I इसलिए प्राण ही सबकुछ है I प्राण ही जीव जगत रूप में प्रकट हुआ है, प्राण ही दुर्गा है, प्राण ही अपराजिता है, और इसके अतिरिक्त उत्कर्ष मार्गों पर गमन करने के कारण भी प्राण ही हैं I

गुरु आगे बोले… हृदयाकाश में बसी हुई प्राणमय गुफा में इन प्राणों का विस्तार और प्रभाव रजोगुण गुफा और तमोगुण गुफा से भी अधिक होता है I लेकिन ऐसा होने पर भी यह प्राण, तमोगुण और रजोगुण से उत्कृष्ट नहीं है क्यूंकि यह गुण ही प्राणों की गति के कारण हैं, और ऐसा होने पर भी प्राण ही इन गुणों की सार्वभौम शक्ति हैं I इस प्राकृत जीव जगत में, प्राण ही सबकुछ गतिशील रखते हैं, लेकिन ऐसा होने पर भी प्राणों की क्रियाशीलता सहित संतुलकता का आधार भी त्रिगुणा ही हैं I पञ्च प्राण रजोगुणी होते हैं और पञ्च लघुप्राण तमोगुणी होते हैं, और जिन स्थानों पर प्राण और लघु प्राण का मिलन होता है, उस स्थान पर सत्त्वगुण की प्रतिष्ठा हो जाता है I

सनातन गुरु आगे बोले… प्राणों की गठी हुई स्थूलादि दशा ही पदार्थ है, और द्रव्यों की विस्तार हुई वास्तविक दशा ही प्राण हैं I जब प्राण इकट्ठे होते हैं और इसके पश्चात उनका विस्तार एक छोटे से स्थान पर संकुचित हो जाता है, तब उसी दशा से स्थूल जगत के पदार्थों का उदय होता है I और जब पदार्थ अपने वास्तविक विस्तार को पुनः पाते हैं, तब वह पदार्थ अपने भौतिक स्वरूप को त्यागकर, पुनः प्राणों में परिवत्रित हो जाते हैं I इसलिए ब्रह्माण्ड के सभी भौतिक आदि पदाथ और प्राण अंतरपरिवत्तिनिय हैं I

गुरु आगे बोले… जबतक प्राण को सत्त्वगुण, विज्ञान, चेतना भेदते नहीं और ऐसा होने के साथ साथ प्राणों का नाता तमोगुण और रजोगुण से नहीं होता, तबतक प्राण विध्वंसक ही बने रहते हैं I और ऐसी दशा में आत्ममार्ग कभी भी पञ्च वायु और पञ्च लघुवायु से होकर नहीं जाएगा I लेकिन ऐसा होता नहीं है क्यूंकि प्राणों का भेदन सत्त्वगुम, विज्ञान और चेतना करते ही हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… जब वायु शरीर से बाहर की ओर होती है, तो वह वायु महाभूत है I और जब वही वायु शरीर के भीतर प्रवेश करती है, तो वह प्राण कहलाती है I और जहां यह शरीर का शब्द, ब्रह्म के ब्रह्माण्डीय स्वरूप के शरीर को भी दर्शाता है I इसलिए प्राण ही वायु है, और वायु ही प्राण है I शरीर से बहार का प्राण, वायु महाभूत है… और शरीर के भीतर का वायु महाभूत ही प्राण है I इसलिए प्राण और वायु महाभूत भी अंतरपरिवर्तनीय हैं I ऐसा होने के कारण ही प्राणायाम योगतंत्र का अंग हुआ था I

नन्हा विद्यार्थी यह सब बिंदु भी समझ गया, इसलिए उसने गुरु को पुष्टिकारी संकेत भी दे दिया I

सनातन गुरु बोले… अब ध्यान देना… वायु महाभूत का वह चलित स्वरूप जो प्राण है उसमें उस वायु का नाता सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, विज्ञान, चेतना और क्रिया सबसे से बना होता है, और प्राणों की ऐसी दशा को ही प्राण ब्रह्म के वाक्य से दर्शाया जाता है I और इसके अतिरिक्त, प्राणों का वह भाग जो ऐसा नहीं होता, वही वायु महाभूत है I किन्तु ऐसा होने पर भी वायु महाभूत प्राणों से नीचे नहीं होता, क्यूंकि यह दोनों (अर्थात वायु महाभूत और प्राण) उन्ही ब्रह्म की समान अभिव्यक्ति हैं, और उन्ही ब्रह्म की इन दोनों (प्राण और वायु) के स्वरूपों में अभिव्यक्ति भी हुई है, जिसके कारण इन दोनों में वही ब्रह्म स्थित है I

सनातन गुरु आगे बोले… ब्रह्माण्डीय खण्डों और जीवों के भीतर प्राणों की गति में पृथकता होने पर भी, ब्रह्माण्डीय प्राणों के समूह का परिणामी (परिणामजन्य) स्वरूप समतावाद में ही बसा होता है I और क्यूँकि सम्तावाद सत्त्वगुण को ही दर्शाता है, इसलिए प्राणों का परिणामी (परिणामजन्य) स्वरूप सतोगुण का ही है I सत्त्वगुण ही ब्रह्माण्ड ज्ञान कहलाता है, इसलिए सत्त्वगुण ही भवसागर से पार होने का मार्ग भी है, और यही सत्त्वगुण को मूल बनाकर, प्राकृत ब्रह्माण्ड की रचना परा नामक प्रकृति (अर्थात प्रकृति के नवम कोष) से प्रारम्भ हुई थी I इसलिए प्राणों का अंतिम या परिणामी (परिणामजन्य) स्वरूप, जो सत्त्वगुण ही है, वह मुक्तिमार्ग भी है I यही कारण है कि प्राण विज्ञान, मुक्ति का मार्ग ही है और जहां सत्त्वगुण से जाता हुआ वह मुक्तिमार्ग, समतावाद का ही है I लेकिन ऐसा समतावादी मुक्तिमार्ग भी बहुवादी अद्वैत में ही बसा होता है I समता से रहित उत्कर्षपथ कलह कलेशों से होकर ही जाते हैं, और जहाँ ऐसे मार्गों में कलह कलेश आते ही रहते हैं I

हृदय गुरु आगे बोले… ब्रह्माण्ड में प्राणों का निवास स्थान आकाश महाभूत ही है और पिण्डों के भीतर यह प्राण घटाकाश में ही निवास करते हैं I और जहाँ यह घटाकाश का एक भाग अभी बताया जा रहा हृदयाकाश गर्भ है I घटाकाश और आकाश महाभूत में ही प्राणमय ऊर्जाएँ बसी हुई होती है, और यही प्राणमय ऊर्जाएँ घटाकाश को आकाश महाभूत से जोड़कर भी रखती है I लेकिन आकाश भी तो अव्यक्त के भीतर ही निवास करता है, इसलिए अंततः योगी यही जानेंगे की प्राणों का निवास स्थान, अव्यक्त है I

इसके पश्चात सनातन गुरु बोले… इस प्राण गुफ़ा में सभी प्राणों को हलके गुलाबी वर्ण की व्यान वायु ने घेरा होता है, इसलिए बाहर से देखने पर यह प्राण गुफा हलके गुलाबी वर्ण की ही दिखाई देती है I लेकिन जब हम इस प्राणमय गुफ़ा में प्रवेश करके इसको देखेंगे, तो सभी प्राणों के वर्ण पृथक दिखाई देंगे और इसके साथ-साथ सभी प्राणों के साथ उनकी उपवायु भी दिखाई देंगी, जो मूलतः हलके नीले वर्ण की होंगी I इसलिए अब हम इस प्राण गुफ़ा में जाकर, इन पञ्च प्राण और पञ्च लघुप्राणों को एक-एक करके जानेंगे I

 

प्राण गुफा में प्रवेश, प्राणमय गुफा में प्रवेश, प्राण गुफा के भीतर प्रवेश, प्राणमय गुफा के भीतर प्रवेश, …

ऐसा बोलते ही सनातन गुरु ने नन्हे शिष्य का हाथ पकड़ा और वह दोनों (अर्थात गुरु और उनका नन्हा शिष्य) अपने उस स्थान से उठे जहाँ वह हृदयाकाश गुफा के मध्य में बैठे हुए थे, और इसके पश्चात, वह प्राण गुफा की ओर चल पड़े I

चलते चलते सनातन गुरु बोले… प्राण गुफा बहुत ही मोहित करने वाली गुफा है क्यूंकि इसका नाता माया से भी है I जब हम इस गुफा के भीतर जाएंगे, तो सबसे पहले हमें उसी हलके गुलाबी वर्ण के व्यान प्राण से जाना होगा I और इस व्यान प्राण का अध्ययन करके ही हम अन्य सभी प्राणों को एक-एक करके देखेंगे और जानेंगे I

सनातन गुरु आगे बोले… जब तुम इस प्राण गुफ़ा में प्रवेश करोगे, तो समता के भाव में बसकर ही प्रवेश करना और यह समता का भाव तबतक बनाकर रखना, जबतक तुम इस गुफा में हो I इस गुफा में प्राणों और उपप्राणों के पदानुक्रम (या महान्तशाही) होती है, इसलिए यदि इस समता को धारण करके नहीं रहे, तो इन प्राणों के उन पदानुक्रम (या महान्तशाही) के प्रभाव में आ जाओगे और उत्कर्ष मार्ग के स्थान पर अपकर्ष मार्ग को ही पाओगे I इसलिए जबतक तुम इस गुफा में रहोगे, समता में बसकर ही रहोगे I इस बिंदु को अपने स्मरण में रखना नहीं तो इस गुफा का दुष्प्रभाव तुमपर आ जाएगा और तुम्हारा उत्कर्ष मार्ग ही तुम्हे अपकर्ष को ले जाएगा I जब प्राण संस्कार रहित होते हैं, तब वह प्राण अपने वर्ण को त्याग करके, परा प्रकृति के सामान ही श्वेत वर्ण के हो जाते हैं I परा प्रकृति ही समता को दर्शाती हैं, और जहाँ उस समता का नाता सगुण-निर्गुण ब्रह्म से भी होता है I

गुरु आगे बोले… जब साधक इस परा प्रकृति को पार करता है, तब ही वह साधक उस सर्वसमता को प्राप्त होता है जिसका वर्ण हेरे के समान होता है I उस सर्वसमता का

नाता सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति के लोक, अर्थात ब्रह्मलोक से है I और ऐसी दशा में यह सभी प्राण भी हीरे के समान प्रकाशमान हो जाते हैं I यही प्राणों की सर्वसम (अर्थात सत से युक्त) दशा है और इसी दशा को वह साधक भी पाता है जो हृदयाकाश गर्भ तंत्र का सिद्ध होता है I प्राणों की ऐसी दशा में साधक यह भी जान जाता है, कि प्राणों के पदानुक्रम (या महान्तशाही) से अतीत दशा को ही ब्रह्मलोक कहा जाता है I

नन्हे विदरार्थी ने गुरु वाणी को समझकर अपना सर हिलाकर गुरु को इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

अब इसी बात पर यह अध्याय समाप्त होता है, और अब अगले अध्याय पर जाते हैं जिसका नाम “व्यान प्राण और धनञ्जय उपप्राण” होगा I

 

असतो मा सद्गमय I

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