शून्याकाश, शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप, गुहा कृष्ण, हृदय कृष्ण गुफा, मुक्ति पथ, मुक्ति गुफा

शून्याकाश, शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप, गुहा कृष्ण, हृदय कृष्ण गुफा, मुक्ति पथ, मुक्ति गुफा

यहाँ हृदय मुक्ति गुफा या हृदय की मुक्ति गुफा के चौथे बिंदु, जो शून्य और शून्य ब्रह्म है, और जो शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप है, और जिसको शून्य अनंत और अनंत शून्य भी कहा जा सकता है…, उसका वर्णन होगा । यहाँ बताए गए मार्ग को मुक्ति पथ या मुक्ति मार्ग भी कहा जा सकता है। ये मुक्ति गुफा या गुहा मुक्ति, हृदय की सबसे अन्दर की गुफा होती है, जिसको योगी हृदय की समस्त गुफ़ाओं को पार करके ही साक्षात्कार करता है। अब इस कैवल्य गुफा या मुक्ति गुफा या मोक्ष गुफा या निर्वाण गुफा के साक्षात्कार और चित्र के चौथे भाग को बतलाता हूं, जिसमें साधक इस मुक्ति गुफा का कृष्णमय स्वरूप साक्षात्कार करता है, जिसके कारण इसी मुक्ति गुफा को कृष्णमय गुफा, कृष्ण गुफा, गुहा कृष्ण और शून्याकाश भी कहा जा सकता है । कृष्ण शब्द का अर्थ काला होता है और साक्षात्कार में जब कृष्ण शब्द कहा जाता है, तो वो रात्रि के समान काला मानकर कहा जाता है ।

इसी गुफा के साक्षात्कार से साधक, शून्य और शून्य ब्रह्म का साक्षात्कार करता है, और वो भी उस शून्य ब्रह्म के कृष्णमय स्वरूप में, जिसको शून्य अनंत और अनंत शून्य भी कहा जा सकता है ।

मूल रूप में, ब्रह्म की रचना इसी शून्य अनंत और अनंत शून्य में ही बसाई गई थी, जो कृष्ण नारायण का ही निराकार स्वरूप है, और इसी शून्य अनंत और अनंत शून्य रूपी निराकार स्वरूप में कृष्ण नारायण ही निर्गुण ब्रह्म की वो प्रचीन या अनादी अभिव्यक्ति है, जो इस ब्रह्माण्ड से भी कहीं पूर्व की दशा है ।

इस गुफा के बारे में, ब्रह्मसूत्र चतुर्थ अध्याय में सूक्ष्म सांकेतिक रूप में बताया गया है, इसलिए जो भी साधक इस अध्याय श्रंखला, जिसको मैंने ॐ मार्ग कहा है, उसका साक्षात्कार करेगा, वो इस समस्त श्रंखला के ज्ञान के मूल में ब्रह्मऋषि और भगवान् वेद व्यास, और उनके ब्रहमसूत्र को ही पाएगा ।

ऐसे साक्षात्कार के समय, ये भी हो सकता है, कि गुरुदेव भगवान् वेद व्यास, साधक के नाक की नोक पर बैठे हों, और साधक को एक उत्कृष्ट अनुग्रह दृष्टि से देख रहे हों I

यह कैवल्य गुफा या मोक्ष गुफा, मुक्तिमार्ग या मोक्ष मार्ग में गति की प्रारंभिक अवस्था को दर्शाती है, क्यूंकि इसी गुफा से ही ओ३म् साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है ।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

ये ज्ञान मेरे पूर्व जन्म के गुरुदेव, जिनको आज की मानव जाती गौतम बुद्ध के नाम से पुकारती है, उनके हृदय प्रज्ञापारमिता सूत्र का एक अभिन्न अंग भी है ।

बौद्ध मार्ग में, इसी शून्य अनंत को, जो अनंत शून्य भी होता है, शून्यता कहा कहा गया है ।

इस शून्यता में, शून्य ही अनंत होता है…, और अनंत ही शून्य होता है ।

वेदों में इस अनंत को ही पूर्ण कहा जाता है ।

और क्यूंकि मूल से तो बौद्ध मार्ग भी उससे पूर्व के वेदों से ही उत्पन्न हुआ था, इसलिए बौद्ध कहते भी हैं की उनकी शून्यता, अर्थात बौद्धों का शून्य, पूर्ण ही होता है । बौद्ध कहते हैं, शून्य भरा हुआ होता है, जिसके कारण बौद्ध मार्ग में, शून्यता से ही जगत और जीवों की उत्पत्ति कही गई है ।

लेकिन मूल रूप में तो ये वैदिक नारायण या शून्य ब्रह्म सिद्धांत है…, नाकि बौद्ध सिद्धान्त ।

वेदों में इसी बौद्धा मार्ग की शून्यता को, शून्य अनंत, अनंत शून्य और शून्य ब्रह्म कहा गया था, जो उस पूर्ण तत्त्व, जिसको वेदों में निर्गुण ब्रह्म कहा गया है, उसकी वो अभिव्यक्ति है, जो ब्रह्माण्ड से भी पूर्व में हुई थी, और जो नारायण कहलाया था ।

इसलिए बौद्धों की शून्यता, वेदों का नारायण है…, जो शून्य और अनंत, दोनों ही है ।

वो नारायण, साक्षात्कार तो शून्य सरीका होता है, लेकिन वास्तव में, वो अनंत ब्रह्म ही है ।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

वास्तव में तो निर्गुण ब्रह्म ही वो वेदों का पूर्ण है, जिससे शून्य ब्रह्म सहित, ये समस्त जीव जगत स्वयंउत्पन्न हुआ था, और वो भी उस निर्गुण ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरूप में ।

ये शून्य ब्रह्म ही उस निर्गुण ब्रह्म की इस जीव जगत के स्वयंउत्पन्न होने से भी पूर्व की अभिव्यक्ति है ।

जिसको बौद्ध मार्ग में शून्यता कहा गया है, वो ही वेदों का नारायण या शून्य ब्रह्म है और जिसका सिद्धांत तब भी था, जब बौद्ध मार्ग आया ही नहीं था ।

बस शब्द बदल के, मूल थोड़ी न बदला जा सकता है । मूल से तो बौद्धों का शून्यता सिद्धांत, वेद बिन्दुओं को ही धारण किया हुआ है ।

और क्यूंकि मूल ही तो वास्तविक दशा होती है, इसलिए ये बौध मार्ग भी वेदों का एक अंग है ।

और पिछली बार जब वो शून्य ब्रह्म, एक सगुण साकार मानव रूप धारण करके अपने पूर्ण स्वरूप में इस धरा पर आये थे, तब वोही श्री कृष्ण कहलाये थे ।

शून्य ब्रह्म में शून्य का तत्त्व, रात्रि के समान काला होता है, और इस रात्रि के समान शून्य के भीतर एक निरंग झिल्ली के समान अनंत प्रकाश व्याप्त होता है, जो ब्रह्म को दर्शाता है । इसलिए शून्य ब्रह्म में, शून्य और अनंत की योगावस्था होती है ।

और क्यूंकि शून्य और अनंत, दोनों ही अदि, अंतरहित और सनातन हैं, इसलिए साधक इन दोनों में से किसी को भी माने, वो साधक पाएगा तो उसी अदि और अंतरहित शून्य ब्रह्म या नारायण को ।

इस शून्य ब्रह्म के साक्षात्कार में, रात्रि के समान काला स्वरूप, शून्य को दर्शाता है । और इसी शून्य अनंत के साक्षात्कार में, वो निरंग झिल्ली जो इस काले अंधकारमय शून्य स्वरूप के भीतर साक्षात्कार होती है, और जो अनंत होती है, उसको ही वेदों में निर्गुण ब्रह्म कहा गया है ।

शून्य और अनंत की ऐसी योगावस्था को ही वेद मनीषि शून्य ब्रह्म और नारायण कहते थे ।

शून्य ब्रह्म में शून्य रूपी प्राथमिक प्रकृति और अनन्त ब्रह्म की सनातन योगावस्था होती है, और जो तब भी थी, जब न ये जगत था और न ही कोई जीव ही था । और यही कारण है, कि शून्य ब्रह्म या नारायण को ही सनातन गुरु कहा जाता है ।

और क्यूंकि जो शून्य और अनंत दोनों ही होता है, वो सनातन अनश्वर ही होता है, इसीलिए वेद मनीषी यह भी कह गए, की जब ये समस्त सृष्टि और उसके जीव, महाप्रलय को पाते हैं, तब भी ये  सब एक सूक्ष्म रूप में, उसी सनातन गुरु नारायण में विलीन होकर रहते हैं ।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला थाI

ये अध्याय भी आत्मपथ, ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अंग है, जो पूर्व के अध्याय से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जो भी जुड़ा हुआ है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को समरपित करता हूं।

ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु कहलाते हैं, जो योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट, योगगुरु और महेश्वर भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनाकि अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मस्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का इक्यावनवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा ।

ये अध्याय, इस जगद्गुरु शारदा मार्ग का चौथा अध्याय भी है ।

 

शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप, गुहा कृष्ण, कृष्ण गुफा, मुक्ति पथ, मुक्ति गुफा, शून्याकाश …

 

मुक्ति पथ,हृदय मुक्ति गुफा, मुक्ति गुफा, हृदय मुक्ति पथ
मुक्ति पथ,हृदय मुक्ति गुफा, मुक्ति गुफा, हृदय मुक्ति पथ

 

अब तक बतलायी गई सभी अवस्थाओं को घेरे हुए, एक प्रकाश रहित अवस्था होती है…, ये प्रकाश रहित अवस्था, शून्य है।

यही शून्य जिसने इस गुफा को घेरा हुआ है, इस मुक्ति गुफ़ा का कृष्णमय स्वरूप है, जिसके कारण इस गुफा को शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप, गुहा कृष्ण और कृष्ण गुफा भी कहा जा सकता है। और इस गुफा का शून्य, उस विराट सीमा रहित, शून्याकाश के सामान ही होता है।

इस शून्याकाश का साक्षात्कार भी तब होता है, जब योगी की चेतना सहस्रार चक्र से भी परे या ऊपर चली जाती है। और क्यूंकि सहस्रार चक्र से परे, वो शून्याकाश ही है, इसीलिए, सहस्रार या ब्रह्मरन्ध्र चक्र को शून्य चक्र भी कहा गया है।

उस शून्याकाश में, शून्य ही अनंत होता है और अनंत ही शून्य, जिसके कारण इसको शून्य अनन्तः अनंत शून्यः…, ऐसा भी कहा जा सकता है।

कैवल्य गुफा में, इसी शून्य ने, सब कुछ घेरा हुआ है। इसलिए, इस चित्र में जो भी दिखलाया गया है, वो सब इसी प्रकाश रहित शून्य में ही बसा हुआ है।

 

और एक बात …

जो प्रकाश इस चित्र के ऊपर के भाग में दिखलाया गया है, वह इस कैवल्य गुफा में सामने से उदय होने वाला प्रकाश है। लेकिन उसके उदय होने से पूर्व, वहां पर भी, यही प्रकाश रहित शून्य था ।

लेकिन इस चित्र में, उस प्रकाश के उदय के बाद की दशा दिखलायी गई है, इसलिए इस चित्र के सामने के भाग में, वह विशाल्काय प्रकाश दिखलाया गया है।

 

शून्य आकाश … शून्य का कृष्णमय स्वरूप …

 

शून्याकाश, शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप
शून्याकाश, शून्य ब्रह्म का कृष्णमय स्वरूप, शून्य आकाश

 

अब इसी मुक्ति गुफा में, शून्य का कृष्णमय स्वरूप…, जो शून्याकाश या शून्य आकाश है, उसको बतलाता हूं …

ये शून्य, प्रकाश रहित होता है, रात्रि के समान होता है, अति सूक्ष्म होता है और अनंत सरीका होता है ।

इसलिए हृदय की कैवल्य गुफा का शून्य, अपने ही अनंत स्वरूप में होता है ।

जो शून्य ही अनंत होता है, उसे ही शून्य अनंत कहा जाता है ।

शून्य अनंत का शब्द, शून्य ब्रह्म या श्रीमन नारायण का भी वाचक है ।

और क्योंकि ये शून्य अनंत, एक प्रकाश रहित रात्री के समान, कृष्ण वर्ण का होता है, इसलिए ये शून्य अनंत ही, श्रीमन नारायण का कृष्णमय स्वरूप है। कृष्ण शब्द का अर्थ, काला होता है, जो रात्री के समान होता है।

इसीलिए, श्रीमन कृष्ण नारायण को ही, शून्य ब्रह्म या शून्य अनंत कहते हैं।

ब्रह्माण्ड के उदय से पूर्व, जब प्रकृति शून्य थी, तब उसी शून्य रूपी प्रकृति का योग, अनंत ब्रह्म से हुआ था, और इसी योगवास्थ से, शून्य अनंत का स्वयंउदय हुआ था ।

इसी शून्य अनंत को, निर्गुण निराकार ब्रह्म की वास्तविक अभिव्यक्ति भी कह सकते हैं, और ये अभिव्यक्ति, ब्रह्माण्ड के उदय से भी पूर्व में हुई थी ।

इसी शून्य अनंत को, श्रीमन नारायण का कृष्णमय स्वरूप भी कह सकते है ।

वास्तव में तो श्रीमन कृष्ण नारायण ही, इस कैवल्य गुफा में शून्य अनंत स्वरूप में निवास करते हैं, और इस कैवल्य गुफा को ढक कर रखते हैं, ताकी इसके ज्ञान का जो पात्र नहीं है, वो इसको पहचान न पाए, जान न पाए । जो इसका पात्र होगा, वो ही इस कैवल्य गुफा में पहुंच पाएगा ।

श्रीमन् कृष्ण नारायण बोल भी गए थे, कि वो प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। हृदय की कैवल्य गुफा का ये शून्य, जो अनंत सरीका होता है, वही श्रीमन नारायण का कृष्णमय स्वरूप है।

इस शून्य अनंत का वास्तविक स्वरूप, शून्य अनंतः अनंत शून्यः…, ऐसा होता है।

 

शून्य अनंत का ज्ञानमय स्वरूप

तो अब शून्य अनंत के वास्तविक ज्ञानमये स्वरूप को दर्शाता हूँ …

यहां कहे गए ज्ञान शब्द का अर्थ, आत्मज्ञान, स्वयं का ज्ञान या वेद ज्ञान, ऐसा ही मानना ​​चाहिए ।

लेकिन यहां पर, इस बात को, उसके अति सूक्ष्म स्वरूप में बतलाया गया है। तो अब इन बातों पर ध्यान देना …

 

मूल में शून्य होता है, और गंतव्य में अनंत ।

और एक बात …

कोई ऐसा गंतव्य प्राप्त, वैदिक ऋषि नहीं हुआ, जिसके मूल में योग नहीं था ।

कोई ऐसा सिद्ध योगी नहीं हुआ, जिसके गंतव्य में वेद या ज्ञान नहीं था ।

इसलिए, मूल में योग होता है, और गंतव्य में आत्मा ज्ञान या वेद ।

और इनसब के साथ साथ …

मूल प्रकृति होती है और गंतव्य, ब्रह्म होता है ।

जो मूल, अर्थात, प्रकृति का नहीं होता…, वह गंतव्य, अर्थात, ब्रह्म का भी नहीं होता ।

मूल में उत्कर्ष, मार्ग रूप में होता है…, और गंतव्य में मुक्ति आत्मस्वरूपा-ब्रह्म रूप में ।

 

इसीलिए, जिस मार्ग में प्रकृति और पुरुष, दोनो ही अपने समान, सनातन योगावस्था में नहीं होते, वह मार्ग उत्कर्ष का मार्ग भी नहीं होता ।

जो मार्ग, उत्कर्ष को नहीं जाता, वह मुक्तिमार्ग भी नहीं होता ।

उत्कर्ष मार्ग से परे, जो गंतव्य अवस्था है, उसे ही मुक्ति कहते हैं ।

लेकिन, वैदिक वाङ्मय ही एकमात्र मार्ग है, जिसमे प्रकृति के तारतम्य का अलम्बन लेके भी, मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है।

और यही कारण है, कि, वैदिक वाङ्मय में, प्रकृति के तत्व और दशाओं की भी साधना होती है।

आज भी, जो मार्ग ऐसा है, उन सभी को उनके मूल से, वैदिक ही मानना ​​चाहिए ।

 

प्रकृति की साधना

अब वैदिक मार्ग में, प्रकृति की साधना को बतलाता हूँ …

वैदिक वाङ्मय ही ऐसा मार्ग है, जिसमे प्रकृति अपने मूल स्वरूप में, ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, पूर्ण शक्ति, सर्वव्याप्त दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और प्रमुख दूति होती है ।

इसीलिए, उन पुरातन कालो में, जो मेरे पूर्व जन्म के थे, और जो मुझे स्मरण भी हैं क्योंकि मैं योगभ्रष्ट हूं और प्रबुद्ध भी हूं, वैदिक ऋषिगण, प्रकृति को माँ, जगत जननी, सर्व माता, मातृ शक्ति, चिन्मयी, इतियादि शब्द से पुकारते हैं।

और उन पुरातन काल में, अधिकाँश ऋषियों की साधनाएं, प्रकृति के तत्त्वों पर होती थी..,, नाकि किसी देव या देवी पर ।

 

साधना, साधना मार्ग, योग और योगी शब्दों की परिभाषा …

अब इन कही गयी बातों पर ध्यान देना, क्यूंकि यहाँ पर योग और योगी शब्दों को बतला रहा हूँ …

जब हम तत्व पर साधना करते हैं, तो उन तत्वों की दिव्यता पर साधना, स्वतः ही हो जाती है । ऐसी साधना ही पूर्ण शब्द के गंतव्य की ओर लेके जाती है ।

जो साधना मार्ग पूर्ण हो सकता है, अर्थात गंतव्य प्राप्ति करवा सकता है, वो ही ब्रह्मपथ कहलाता है…, और ऐसी साधना ही ब्रह्मत्व को लेकर जाती है ।

लेकिन जब हम केवल तत्वों की दिव्यताओं, जैसे किसी देव या देवी पर साधना करते हैं, तो उनके तत्वों पर साधना, स्वतः ही नहीं होती । इसलिए, ऐसी साधना, पूर्ण नहीं कहलाती ।` ऐसी साधना अंततः, साधक के आराध्य देवी या देव के लोक को लेके जाती है, और उस आराध्य देव या देवी के देवत्व बिंदु भी, उस साधक को प्रदान करती है ।

इससे भी उत्कृष्ट साधना, पुरुष और प्रकृति की सनातन योगावस्था पर होती हैं, जो साधक के शरीर में भी होते हैं और जिसमें समस्त रचना, रचैता और रचना के तंत्र सहित, सारे तत्व और उनकी दिव्यताएं एक साथ ही समायी हुई होती हैं । यह साधना अंततः निर्बीज ब्रह्म को लेके जाती है, और इसका मार्ग निर्बीज समाधी का होता है ।

लेकिन इस निर्बीज समाधि का मार्ग भी कृष्ण समाधी या असम्प्रज्ञात समाधी या शुन्य ब्रह्म समाधी से ही होकर जाता है और जिसका मार्ग सम्प्रज्ञात समाधी से ही होकर जाता है ।

और इससे भी उत्कृष्ट साधना, स्वयं ही स्वयं में जाकर, अपनी ही आत्मा पर होती है, जिसकी अभिव्यक्ति यह समस्त जीव जगत है । यह साधना अंततः निर्विकल्प ब्रह्म को लेके जाती है, और इसका मार्ग निर्विकल्प समाधी का होता है ।

मैं आज भी पुरुष और प्रकृति की सर्वोच्च सनातन योगावस्था, जो शरीर के भीतर भी होती है, आत्मा और आत्मशक्ति के स्वरूप में, उसपर ही साधना करता हूं । लेकिन ऐसी साधनाओं में, मैं कर्ता नहीं होता, क्यूंकि आत्मा की साधना में, जिसकी अभिव्यक्ति यह समस्ती है, उसमें कर्तापन का भाव नहीं होता…, केवल साक्षीभाव होता है ।

और ऐसी साधना में, समस्त तत्त्व और उनकी दिव्यताएँ, देवी और देवता, प्रकृति और भगवान्, सभी गुरु स्वरूप में होते हैं ।

ऐसी साधनाओं में साधक का पिंड ही ब्रह्मण्ड होता है । और इसके साथ साथ, साधक की आत्मा ही सर्वात्मा होती है, जिसमे समस्त प्रकृति, पूर्ण ब्रह्म शक्ति के स्वरूप में होती है ।

और इसके साथ साथ, वही आत्मा रूपी सर्वात्मा, समस्त प्रकृति में, समान रूप में होता है । ऐसी साधनाओं में साधक की चेतना, सामान रूप में, सबमें होती और सब साधक की चेतना में होते है । ऐसी साधना ही पूर्णा कहलाती है ।

इसीलिए, ऐसी साधना, उसी पूर्ण शब्द के गंतव्य, निर्गुण निराकार ब्रह्म को लेकर जाति है, जिसमे, वही ब्रह्म, योगी के आत्मस्वरूप में होता है ।

जो भी साधक, ऐसी साधना में, सिद्धि पाता है, वास्तव में वो ही योगी कहलाता है ।

ऐसा साधक, एक ही स्थान पर बैठा हुआ…, विश्व खेलता है ।

जो एक ही स्थान पर बैठ कर, विश्व खेलना जानता है, वो साधक ही, योगी कहलाता है, क्योंकि ऐसा योगी, अपने भीतर के ब्रह्मांड से ही योग लगाके बैठा होता है, और उसी भीतर के ब्रह्मांड में विश्व खेलता है । और उसका यह भीतर का खेल, बहार के विश्व में भी दीखता है, क्यूंकि उस साधक के भीतर का विश्व ही वो प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक ब्रह्माण्ड है, जिससे दैविक, सूक्ष्म और स्थूल ब्रह्माण्डों और समस्त जीवों की उत्पत्ति हुई थी ।

जो योगी, अपने पिंड रूपी शरीर में ही ब्रह्माण्ड का साक्षात्कार करता है, और वो योगी ही अपनी आत्मशक्ति स्वरूप में मूल प्रकृति को पाता है, और ऐसा योगी ही उसके अपने आत्मस्वरूप में, निर्गुण निराकार गंतव्य को पाता है ।

लेकिन उस निर्गुण निराकार गंतव्य को, वो योगी, सर्वसाक्षी भाव में स्थित होके ही जाता है । ऐसे योगी के भाव में ही, उसका साधन होता है ।

वो योगी जिसके भाव में ही उसका साधन होता है, वो योगी वैसा ही होता है, जैसे सर्वसम, सगुण साकार, चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म हुए थे, जब उन्होंने इस जीव जगत की रचना की थी ।

उस समय, चतुरमुखा पितामह ने, अपनी ही भावरूपी इच्छा शक्ति का अलम्बन लेके, एक साधन स्वयंउत्पन्न किया था, जो उनका उत्पत्ति कृत्य कहलाया था, और जिससे समस्त जीव जगत स्वयंउत्पन्न हुआ था ।

वास्तव में तो, जगत के रचैता पितामह ब्रह्म भी योगी ही हैं, इसलिए, यह बतलाया गया योगमार्ग भी, उनके ब्रह्मत्व को ही जाता है ।

तो ये थी योग और योगी शब्द की परिभाषा…

 

अब आगे बढ़ता हूं…

ऐसी साधनाओं में, योगी की आत्मा, समस्त प्रकृति में, सर्वात्मा स्वरूप में होती है । और साथ साथ, संपूर्ण प्रकृति, योगी की ही आत्मा में, आत्मशक्ति के स्वरूप में होती है ।

ऐसी अवस्था को ही, ब्रह्म और प्रकृति का प्राथमिक योग कहा जाता है, जिससे प्राथमिक ब्रह्मांड स्वयंउत्पन्न हुआ था, जो सूक्ष्म संस्कारिक अवस्था में था ।

इसी को, ब्रह्म की इच्छा शक्ति साधना कहते हैं, जिससे ये समस्त जीव जगत स्वयंउत्पन्न हुआ था । और इसीलिए, इस जीव जगत की उत्पत्ति के मूल में, ब्रह्म की  इच्छा शक्ति रूपी सर्व भावनात्मक साधना ही है ।

ऐसी साधनाओं में, योगी की आत्मा ही, सर्वात्मा होके, समस्त देवी और देवताओं सहित, सारे जीव और जगत की भी आत्मा होती है । यही कारण है, कि ऐसी साधनाओं में, किसी भी तत्व और दिव्यता से, ना तो लगाव होता है, ना ही अलगाव ।

ऐसी साधनाओं में योगी, पूर्ण या सर्वत्र का उपासक होता है, जिसके मूल और गंतव्य, दोनो में ही, वो योगी होता है ।

ऐसी साधनाओं में योगी की आत्मशक्ति ही जीव जगत के मूल में होती है, अर्थात, मूल प्रकृति या जाव जगत की मूल ऊर्जा स्वरूप में होती है । और इसके साथ साथ, उसी योगी का आत्मस्वरूप ही समस्त जीव जगत का गंतव्य होता है, अर्थात ब्रह्म होता है ।

ऐसी परिपूर्ण साधना में, साधक उस अद्वैत गंतव्य, कैवल्य मोक्ष को ही जाता है, और उस कैवल्य मुक्ति को स्वतः ही, अपने आत्मस्वरूप में पाता है ।

ऐसी साधना में, भगवान् और प्रकृति, परमगुरु शिव और सार्वभौम गुरुमाई शक्ति, नारायण और नारायणी, पितामह ब्रह्म और महामाया, इन्द्र और इन्द्राणी, और गणपति देव और माँ अदि पराशक्ति, सब के सब समान रूप में योगी की काया में ही बसे होते हैं । इसलिए, ऐसी साधना, पंच कृत्य सिद्धि को भी प्रदान करती है ।

ये पंच कृत्य, पंच मुखा सदाशिव के होते हैं, जो विराट परब्रह्म और विश्वकर्मा के नाम से भी पुकारे जाते हैं, जो और ऐसे योगी के परमगुरु होते हैं, और ऐसा योगी, उनका ही स्वरूप होता है । इस स्वरूप स्तिथि के बारे में कभी और बताऊंगा क्यूंकि ये स्तिथि सर्वव्याप्त विराट परब्रह्म पंच मुखा सदाशिव का ज्ञान है, जो यहाँ नहीं बताया जा सकता ।

और ऐसी साधना भी, उसी शून्य ब्रह्म के साक्षातकार से होकर ही जाती है, जिसके बारे में यहां पर बताया जा रहा है ।

 

अब थोड़ा भटक रहा हूं

और जो बतला रहा हूं, उसके अंत में, मूल प्रकृति की वाणी है…, समस्त मानव जाति के लिए …

आज ऐसे मुक्तिमार्ग बचे ही नहीं, इसीलिए, आज का मानव, प्रकृति भक्षी हो गया है, और अपने पतन की ओर ही चल पड़ा है ।

जब मैं सूक्ष्म लोकों में भ्रमण कर्ता हूं, तो ऐसा प्रतीत होता है, कि अब मानव, मुक्ति को प्राप्त ही नहीं हो रहा है ।

और इसका मूल कारण है, कि आज का मानव, प्रकृति भक्षी हो गया है ।

मैं 170 देश से भी अधिक में घूम कर बोल रहा हूं, कि आज के मानव के समस्त तंत्र, चाहे वो अर्थ तंत्र हो, चाहे राज तंत्र हो, चाहे सुरक्षा तंत्र हो, ये सेवा तंत्र हो या इन सबका मूल तंत्र, शिक्षा तंत्र ही हो…, सब के सब प्रकृति भक्षी हैं ।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

कुछ वर्ष पूर्व, मेरी एक साधना में, माँ मूल प्रकृति बोली थी, कि बेटा, मेरी ये बात, मानव जाति को बतला देना ।

तो उस बात को मैं अब बोल रहा हूं…

जीवित सनातनी हो जाओ, नहीं तो दाह संस्कार सनातनी होंगे ।

 

इसलिए अब एक बात पर ध्यान दो…

यदि मानव ने, शीघ्र ही, अपने सभी प्रकृति भक्षी मार्गों को त्यागा नहीं, तो कुछ ही वर्षों में, इस विकृत मानव जाति के अधिकांश भाग का अंत हो जाएगा ।

वो काल खंड, जो विश्वव्याप्त होता हुआ भी, अमुक अमुक खंड विप्लवों का है, और जिसमें ये सब होना है, वो अब इस विश्व के द्वार पर खड़ा हो चूका है, और माँ मूलप्रकृति के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है ।

इसके आगे मैं बोल नहीं पाऊंगा, इसलिए आप स्वयं ही अनुमान लगा को ।

आगे बढ़ता हूं।

 

शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म का मूल और गंतव्य स्वरूप

अब इसी शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म को, उसके ही मूल और गंतव्य स्वरूप में बतलाता हूँ …

इसपर ध्यान देना, क्योंकि यहां पर मैं, उस ब्रह्म शक्ति, जो मूल प्रकृति है, उसके ही ब्रह्मत्व बिंदु को अति सूक्ष्म रूप में, संकेतिक स्वरूप में बतला रहा हूं …

 

अपने अभिव्यक्त स्वरूप में, अभिव्यक्ति उसका अभिव्यक्ता नहीं होती ।

लेकिन अपने वास्तविक मूल स्वरूप में, अभिव्यक्ति ही उसका अभिव्यक्ता होती है ।

और अपने अमूल गंतव्य स्वरूप में भी, अभिव्यक्ति ही उसका अभिव्यक्ता होती है ।

अभिव्यक्त होने के पश्चात, अभिव्यक्ति के मूल आकर्षण में, केवल उसका अभिव्यक्ता ही होता है ।

उत्कर्ष मार्ग में, प्रत्येक अभिव्यक्ति उस एकमात्र अभिव्यक्ता, ब्रह्म की ओर ही अग्रसर रहती है ।

अभिव्यक्ति का उत्कर्ष मार्ग कोई भी हो, अंततः वो अपने अभिव्यक्ता को ही जा रही होगी ।

और अंततः, वो अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता, ब्रह्म को अपने ही आत्मस्वरूप में पाएगी ।

और ऐसे साक्षात्कार का पश्चात, वो अभिव्यक्ति वैदिक महावाक्यों के सार को ही गंतव्य में पाएगी ।

 

और इन बतलाए गए बिंदुओं के आधार पर …

मैं उनको, जो वास्तविक मुमुक्षुजन है, आत्मसाधना या मुक्तिमार्ग के कुछ मूल बिंदु बता रहा हूँ …

 

अपने मूल और गंतव्य दोनों से ही, सब कुछ ब्रह्म की अभिव्यक्ति…, ब्रह्म ही है ।

साधक को इसी भाव में बस कर, इस जीव जगत और अपने को…, ऐसे ही देखना चाहिए ।

यही मार्ग है स्वयं ही स्वयं में जाने का है…, जो आत्मपथ और ब्रह्मपथ कहलाता है ।

और इसी मार्ग से, साधक उस ब्रह्म को अपने ही आत्मस्वरूप में साक्षात्कार करता है ।

और इस मार्ग के गंतव्य को पाया हुआ साधक…, जीवन्मुक्त कहलाता है ।

जो मार्ग जीवनमुक्ति की प्राप्ति ही न करवा सके…, वो व्यर्थ है ।

ऐसे मार्गों में अपने अतिदुर्लभ मानव जीवन को, व्यर्थ में ही व्यय नहीं करना चाहिए ।

मुमुक्षु के लिए, विदेहमुक्ति का क्या लाभ ।

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन, क्योंकि प्रकृति सहित, समस्त जीव जगत, उसी अभिव्यक्ता ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, इसलिए, प्रकृति और जीव जगत के मूल में, वही अभिव्यक्ता ब्रह्म है ।

इसलिए, मूल के दर्शाताकोण से, अभिव्यक्ति ही अभिव्यक्ता होती है । इसी सत्य को वैदिक महावाक्य भी दर्शाते हैं।

मार्ग उत्कर्ष का भी तब होता है, जब वो अभिव्यक्ति को, उसके ही मूल, अर्थात अभिव्यक्ता की ओर ही लेकर जाता है ।

लेकिन, जब अभिव्यक्ति अपने मूल को चली जाती है, तो वो उसी अभिव्यक्ता को ही पाती है । और इस दशा में, वो अभिव्यक्ता ही उस अभिव्यक्ति का गंतव्य होता है ।

इसका अर्थ हुआ, कि, अभिव्यक्ति के उत्कर्ष मार्ग में, उसका वो मूल, जो उसके अभिव्यक्त होने से पूर्व में था…, वही उसका गंतव्य होता है ।

यही कारण है, कि अभिव्यक्ति के दर्शाताकोण से, उसका मूल ही उसका गंतव्य होता है ।

और ऐसे अद्वैत साक्षात्कार में ऐसे साक्षातकार में, वो अभिव्यक्ति, अपना ही मूल और गंतव्य के अद्वैत ब्रह्म स्वरूप में ही बसी हुई होती है ।

ऐसी अवस्था या साक्षात्कार में, मूल और गंतव्य के पूर्व के तारतम्य समाप्त होते हैं, जिसके कारण मूल ही गंतव्य स्वरूप में पाया जाता है । इसलिए, इस साक्षात्कार में, केवल अद्वैत ब्रह्म ही होता है, और जो उस अभिव्यक्ति का आत्मस्वरूप ही होता है ।

ऐसे अद्वैत साक्षात्कार में, वो अभिव्यक्ति उसके अपने प्राचीन मूल को ही उसके अंत साक्षात्कार के अमूल गंतव्य स्वरूप में पाती है ।

और इस साक्षात्कार के पश्चात, वो अभिव्यक्ति जान भी जाती है, कि न तो मूल का कोई मूल होता है, और न ही गंतव्य का ही कोई गंतव्य होता है ।

लेकिन, अभिव्यक्ति के उत्कर्ष मार्ग में, इस सब का साक्षात्कार भी, उस अभिव्यक्ति को शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म से ही लेकर जाता है ।

 

इसीलिए, अब इसपर ध्यान दो …

ब्रह्मत्व केवल ब्रह्म का नहीं होता है, उस ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, मूलप्रकृति का भी होता है ।

इसीलिए, वैदिक वाङ्मय में, प्रकृति को ब्रह्म भी कहा गया है ।

लेकिन ऐसा साक्षातकार, केवल ब्रह्मपथगामी मुमुक्षु को होता है…, और किसी को भी नहीं ।

पहले तो इन दो बिंदुओं को जानो…

जब निर्गुण शब्द के साथ, निराकार शब्द का प्रयोग होता है, तब वो निराकार ही अनंत होता है ।

लेकिन जब, सगुण शब्द के साथ, निराकार शब्द का प्रयोग होता है, तब वह निराकार, अनंत ही होगा…, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है ।

अब जो बोल रहा हूँ, उसपर भी ध्यान देना …

वैदिक उत्कर्ष मार्ग में, वो मूल प्रकृति ही, अमूल ब्रह्म शक्ति होती है ।

और इस उत्कर्ष मार्ग के गंतव्य में, वोही निराधार, निरालंब, निर्गुण निराकार ब्रह्म होता है ।

वास्तव में, न मूल का कोई मूल होता है, न ही गंतव्य का कोई गंतव्य ही होता है ।

जिस मूल का कोई और मूल होता है, वो वास्तव में मूल ही नहीं होता है ।

और जिस गंतव्य का, कोई और गंतव्य होता है…, वो भी वास्तव में, गंतव्य नहीं होता है।

 

इसलिए, वैदिक मूल और गंतव्य का कोई विकल्प नहीं होता है, जिसके कारण ये मूल और गंतव्य, दोनों ही निर्विकल्प कहलाते हैं ।

और इस निर्विकल्प का मार्ग भी, उसी अमूल ब्रह्म शक्ति, माँ प्रकृति से होकर जाता है ।

 

मूल में ब्रह्मशक्ति, प्रकृति स्वरूप होता है…, गंतव्य में सर्वसाक्षी ब्रह्म होता है ।

इसीलिए, वैदिक वाङ्मय का उत्कर्ष मार्ग, प्रकृति से होकर ही, गंतव्य ब्रह्म को जाता है ।

और यही कारण है, कि, मूल प्रकृति भी, ब्रह्मपथ कहलाती है ।

 

वो प्रकृति, मूल में शून्य होती है, और वो ब्रह्म, जो अनंत होता है, प्रकृति का ही गंतव्य कहलाता है । इसीलिए, जबतक साधक प्रकृति का नहीं होगा, तबतक वो प्रकृति के गंतव्य, ब्रह्म का भी नहीं हो पायेगा ।

इसका कारण है, कि मूल रूप में समस्त गंतव्य मार्ग प्रकृति से ही होकर जाते हैं …, ना कि किसी जीव या देवी देवता का । यहाँ कहे गए जीव शब्द को सगुण साकार और सगुण निराकार दोनों ही माना जाना चाहिए ।

 

इसलिए, जो प्रकृति का नहीं होता, वो गंतव्य को भी नहीं पाता ।

 

और क्योंकि कलियुग में, जितने भी मार्ग आए, उनमें से कोई भी प्रकृति का नहीं था, इसलिए, उन सब में, मुक्ति अंत काल में ही होती है। और यही कारण है, कि उन सब कलियुग के मार्गो में, न सद्योमुक्ति न जीवनमुक्ति ना ही विदेमुक्ति के कोई बिंदु पाए जाते हैं ।

ऐसे मूल और गंतव्य के अद्वैत मार्ग में, वो मूल प्रकृति ही योगी होकर, ब्रह्म से योग लगाती है ।

इसलिए, ऐसे मार्ग के मूल में, शून्य रूपी योग होता है…, और गंतव्य में, ज्ञान रूपी, अनंत ब्रह्म ।

ब्रह्मपथ और आश्रम चतुष्टय

अब इस मार्ग के, उस ब्रह्म साक्षातकार को आश्रम चतुष्टय में बतलाता हूं …

आश्रम चार होते हैं, जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास कहलाते हैं ।

तो अब इन आश्रमों के अनुसार, शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म में, ब्रह्म साक्षातकार को बतलाता हूं …

  • संन्यास आश्रम में, वो गंतव्य का ब्रह्म, सत्यम ज्ञानम अनंतम, ऐसा होता है । ये वैदिक महावाक्य, सत्यम ज्ञानम अनंतम, आत्मा की ही ब्रह्म अवस्था को दर्शता है । इसमें योगी की आत्मा ही तुरियातीत ब्रह्म होती है ।

तुरीयातीत शब्द, मुक्तात्मा को दर्शता है ।

 

मुक्तात्मा को ही ब्रह्म कहा जाता है, जो सिद्धियों से भी अतीत होता है ।

वास्तव में मुक्त कभी सिद्ध नहीं होता… मुक्तात्मा, सिद्धियों से भी मुक्त होता है, अतीत होता है ।

 

जो साधक सिद्धियों से मुक्त नहीं होता है, वो वास्तव में मुक्तात्मा भी नहीं होता है…, मुक्तात्मा को सिद्धियों से क्या लेना देना ।

वो मुक्ति, पूर्णमुक्ति कैसे होगी जबतक वो सिद्धियों से भी मुक्त नहीं होगी …, इसलिए मुक्तात्मा केवल उस सर्वसाक्षी ब्रह्म सरीखा ही होता है, जिसमे न तो कर्तापन होता है, और न ही अकर्तापन होता है ।

मोक्ष की कोई सिद्धि नहीं होती, क्योंकि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में तो प्रत्येक जीव और समस्त जगत मुक्त है ही ।

 

जो तुम अपनी वास्तवविक्ता में हो ही, उसको सिद्ध कैसे करोगे ।

इसलिए, वास्तव में, सिद्ध कभी मुक्त नहीं होता ।

जो सिद्ध ही हो गया, उसे मुक्ति या बंधन से क्या लेना देना ।

 

अब इन बातों पर भी ध्यान दो …

उस सर्वमुक्त ब्रह्म ने कुछ भी नहीं बनाया, जो किसी भी बंधन में था ।

पूर्णमुक्त भी कभी बंधन कारक या बंधन कारण हो सकता है… थोड़ा सोचो तो ।

 

इसलिए जो भी है उस ब्रह्म की रचना में, अर्थात इस जीव जगत के स्वरूप में, वो अपने वास्तविक स्वरूप में, या आत्मस्वरूप में…, वो सब मुक्तात्मा ही है ।

 

आत्मा ही तो ब्रह्म होता है ।

मुक्तात्मा जो निर्गुण स्वरूप है, कभी भी गुरु या भगवान् नहीं होता ।

गुरु और भगवान् केवल सिद्ध होता है।

जो मुक्त है, उसे गुरु शिष्य, देवी देवता, जीव जगत से क्या लेना देना है ।

जो इन सब उपाधियों, स्तिथियों, तारतम्यों से ही अतीत नहीं है, वो मुक्तात्मा कैसे हो सकता है ।

 

और यही संन्यास आश्रम का मूल बिंदु भी है ।

और इस संन्यास आश्रम में, वोही ब्रह्म, उसके अपने पूर्ण संयासी, सर्वसाक्षी सत् स्वरूप में, अर्थात आत्मस्वरूप में साक्षात्कार होता है, जिसके ज्ञानरूपी साक्षात्कार को ही निर्गुण निराकार कहा गया है ।

 

  • वानप्रस्थ आश्रम में, वो ही संन्यास आश्रम का सत् स्वरूप ब्रह्म, चिदात्मक आनंद स्वरूप का होता है, और यही सच्चिदानंद कहलाता है ।

यह वैदिक महावाक्य जो सच्चिदानंद कहा गया है, वो आत्मा की ही गंतव्य अवस्था, गुनातीत कहलाता है, और इसका साक्षात्कारी योगी, गुणात्मा कहलाता है ।

  • गृहस्थ्य आश्रम में, वो ही वानप्रस्थ आश्रम का आनंदमय ब्रह्म, काल रूप में होता है, इसलिए, अनादि अनंत, सनातन कहलाता है ।

जब साधक, काल को अपने भीतर ही पाता है, तो वोही काल, सनातन आत्मा के स्वरूप में साक्षातकार होता है, जो महाकाल कहलाता है, और जिसकी सिद्धि का धारक, कालात्मा कहलाता है ।

ये कालात्मा सिद्धि, गृहस्त्य आश्रम की सिद्धि है, और ये सिद्धि, समस्त सिद्धियों का मूल भी होती है, और यही कारण है, कि, सारे पूर्ण अवतार, विवाहित होते है ।

इस सिद्धि का धारक योगी, अपनी काया के अनुसार कालचक्र के तारतम्य में बसा हुआ भी, अपनी वास्तविकता में उसी काल के अनादि अनन्त स्वरूप में ही बसा होता है, इसलिए ऐसा योगी, ब्रह्माण्ड की दिव्यताओं में कालातीत ही कहलाता है ।

  • और ब्रह्मचर्य आश्रम में, वो ही गृहस्थ्य आश्रम का अनादि अनंत, सनातन काल रूपी ब्रह्म, वेद और ज्ञान शब्दों से पुकारा जाता है । इसलिए वेदादी शास्त्रों का अध्ययन, ब्रह्मचर्य आश्रम में ही होना चाहिए ।

इसीलिए, ब्रह्मचर्य आश्रम का जो गंतव्य है, वो ज्ञान ब्रह्म कहलाता है ।

और यही ज्ञान ब्रह्म, सन्यास आश्रम के गंतव्य, सत्यम ज्ञानम अनंतम, का मध्य बिन्दु भी होता है ।

इसीलिए, वैदिक वाङ्मय में, जो ब्रह्मचर्य आश्रम में नहीं गया, वो परिव्राजक सन्यासी भी नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसे सन्यास के मूल में, ब्रह्मचर्य आश्रम ही होता है ।

और यह वैसे यही ही होता है, जैसे संन्यास आश्रम के गंतव्य, सत्यम ज्ञानम अनंतम, के मूल में, ब्रह्मचर्य आश्रम का गंतव्य, ज्ञान ब्रह्म ही होता है ।

 

अब आगे बढ़ता हूं…

योग की मूलावस्था शून्य होती है, और गंतव्य अवस्था, अनंत ब्रह्म होता है ।

इसी मूल और गंतव्य के योग को, शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म कहा जाता है ।

यही शून्य ब्रह्म या शून्य अनंत, निर्गुण निराकार ब्रह्म की वास्तविक अभिव्यक्ति है, जिसमे प्रकृति, अपने ही मूल, शून्य स्वरूप में ही, उस अनंत ब्रह्म से योग लगाए होती है ।

ये प्रकृति और निर्गुण ब्रह्म का योग, उतना ही सनातन है, जितना सनातन ब्रह्म है…, इसीलिए, वैदिक वाङ्मय में, प्रकृति को भी सनातन कहा गया है ।

लेकिन प्रकृति को सनातन इसीलिए कहा गया है, क्योंकि शून्य रूपी प्रकृति भी गृहस्थ आश्रम में ही होती है, जब वो अनंत ब्रह्म से योग लगाए होती है ।

और जैसे पूर्व में बतलाया था, कि गृहस्थ आश्रम का गंतव्य, अनादि अनंत सनातन, अखंड काल रूपी ब्रह्म होता है, इसीलिए ब्रह्म की अर्धांगनी रूप में, प्रकृति सनातन ही होती है ।

अपनी इस अनादि अनंत, सनातन योगस्थिति में, प्रकृति ही ब्रह्मत्व का मार्ग होती है ।

ऐसी प्रकृति, जो ब्रह्मत्व का मार्ग होती है, वो ब्रह्म प्राणमयी, मूल शक्ति रूप होती है, और साधक की आत्मशक्ति कहलाती है ।

ऐसा साधक, भीतर से शाक्त ही होता है ।

इसी ब्रह्म प्राणमयी आत्मशक्ति के जो 11 प्रधान स्वरूप होते हैं, वो ही एकादश रुद्र केहलाते हैं ।

और उसी रुद्र की, एक अवस्था, जो कृष्ण पिंगला कहलाती है, उसके बारे में कभी और बताउंगा, जब अहम और आला, के बीज शब्दों पर बात होगी ।

और, इसी ब्रह्म प्राणमयी आत्मशक्ति की जो ब्रह्म से अद्वैत सनातन योगावस्था है, उससे ही प्रणव कहा जाता है, जो ब्रह्मतत्त्व ही है, और जिसको शुद्ध चेतन तत्त्व भी कहा गया है ।

 

अब इसी शून्य अनंत में, प्रकृति की बिंदु शून्य दशा को बतलाता हूं

निर्गुण निराकार ब्रह्म ने, जब अपने भीतर से ही, अपनी ही शक्ति रूपी प्रकृति को अभिव्यक्त किया था, तो वो प्रकृति एक बिंदु शून्य स्वरूप में थी ।

वह बिन्दु शून्य ही, इस जीव और जगत का मूलाधार बना, जो मूल प्रकृति कहलाया था ।

उसी बिंदु शून्य में, इस जगत की समस्त ऊर्जा बसाई गई थी ।

और इसी बिन्दु शून्य को, मूल शक्ति और मूल प्रकृति भी कहते हैं ।

इसी ऊर्जवान शून्य बिन्दु से, समस्त जगत की रचना हुई थी ।

यही कारण है, कि वेद मनीषी कह गए, जब ये ब्रह्मण्ड अपने इस विशालकाए स्वरूप में नहीं था, तब भी ये ब्रह्माण्ड था, लेकिन उसकी दशा उस समय पर उसका आकार, एक सुई के नोक के समान था । यही प्रकृति की बिंदु शून्य अवस्था थी जो काले रंग की अन्धकारमय अवस्था थी, उन अनगिनत बिन्दुओं के स्वरूप में, जो ब्रह्माण्ड के लगभग सभी स्थानों पर थे ।

बिंदु शून्य की देवी, 10 हाथ वाली माँ महाकाली है ।

 

प्रकृति और ब्रह्म की योगावस्था

अब इसी शून्य अनंत में, प्रकृति और ब्रह्म के योग की दशा को बतलाता हूं…

वो मूल प्रकृति, जो उस अनादि काल में, बिंदु शून्य के स्वरूप में थी, उस प्रकृति ने, उसी निर्गुण निराकार ब्रह्म से योग किया था जिसकी वो अभिव्यक्ति भी थी ।

और यही करण है, कि, वैदिक वाङ्मय में ऐसा ही बतलाया गया है, कि ब्रह्म ने अपनी पुत्री से ही योग किया था ।

लेकिन इस पवित्र योग को, इतने विकृत रूप में बतलाया गया है, कि वेद मनीषी ही इसको अनुचित मान बैठे हैं ।

 

तो अब, इस योग की वस्तविक्ता बताता हूं, जिसका साक्षातकार भी, इसी कैवल्य गुफा के शून्य अनंत में होता है ।

प्रकृति जो ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, उसका जो ब्रह्म से योग हुआ था…, अब इसको बतलाता हूं ।

 

इस बतलायी गई दशा में, अभिव्यक्ति ने अपने ही अभिव्यक्ता से योग किया था ।

वास्तव में, अभिव्यक्ति, अपने अभिव्यक्ता की, अभिन्न अंश होती है, अभिन्न अंग होती है ।

अभिव्यक्ति, अंश होती है…, और अभिव्यक्ता, अंशी होता है ।

अंशी का अभिन्न अंग होने के कारण, अभिव्यक्त होने के पूर्व से, अंश अपने अंशी में ही बसा था ।

और इसीलिए, अभिव्यक्त होने के पूर्वा भी, अंश आपने अंशी से योग किया होता है ।

और क्यूँकि अंश के मूल में ये योग ही है, इसलिए भी, अंश अपने अंशी की ओर अग्रसर रहता है ।

कोई अंश हुआ ही नहीं, जो जब से अभिव्यक्त हुआ है, उसके अंशी की ओर अग्रसर नहीं रहा है ।

 

जब वो अंश, उसके ही अंशी से अभिव्यक्त होता है, तब से ही वो अंश, अपने अंशी की ओर अग्रसर अग्रसर हो जाता है । इसका कारण ये है कि अंश अपने अंशी का ही अभिव्यक्त स्वरूप होता है, और अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक कभी भी नहीं होती है ।

और वास्तव में, क्यूंकि अंश या अभिव्यक्ति अपने अंशी या अभिव्यक्ति का ही अभिन्न अंग होती है, इसलिए अंश के अंश स्वरूप में अभिव्यक्त होने के पश्चात, अंश का अंशी से योग होना भी तो स्वाभाविक ही है ।

इसलिए, अंश का अपने अंशी में लय होना, अर्थात योग होना, स्वाभिक ही था ।

लेकिन इसको जो कमुखता के मार्ग से बतलाया गया है, वो विकृत है ।

मेरा ऐसा कहने का कारण है की जैसे बूंद, सागर में और जैसे भक्त अपने भगवान् में लय होता है, वैसे ही ये अभिव्यक्ता ब्रह्म और उसकी अभिव्यक्ति प्रकृति का योग भी था ।

अपने अभिव्यक्त स्वरूप में, प्रकृति, अपने ही अभिव्यक्ता का, या अंशी का, अभिन्न अंश थी, इसलिए, अभिव्यक्त होने के पश्चात, प्रकृति का निर्गुण ब्रह्म से योग होना भी स्वाभाविक था, क्योंकि अंश सदैव ही अपने अंशी की ओर अग्रसर होता है ।

इसीलिए, ये प्रकृति और ब्रह्म का योग, स्वाभाविक योग है, इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है ।

और ये योग, वैसा ही है, जैसा भक्त का उसके इष्ट से होता है। जैसा बूंद का सागर से होता है, जैसे पिंड का ब्रह्मांड से होता है और जैसा आत्मा और ब्रह्म का सनातन योग है ।

जैसे एक भक्त, अपने इष्ट से, योग सिद्धि लाभ करके, इष्ट स्वरूप होके शेष रह जाता है, वैसी ही प्रकृति, अपने ही अभिव्यक्ता ब्रह्म से, निष्काम योग करके, ब्रह्म सरीकी ही हो गई थी ।

यह भी एक कारण है कि वेद मनीषियों ने, संकेतिक रूप में ही सही, लेकिन प्रकृति को ब्रह्म ही कहा गया है ।

और इसका कारण भी यही है, कि अंश अपने अंशी का अभिन्न अंग होता है, इसीलिए, अंश की वास्तविकता, अंशी ही होता है ।

और इसी वास्तविक स्वरूप को पाने के लिए, अंश, अपनी अंशी की ओर अग्रसर हुए बिना रह ही नहीं पाता है ।

और इसी के आधार पर, अभिव्यक्ति की वास्तविकता भी अभिव्यक्ता ही होता है । अपने इसी वास्तविक स्वरूप को पाने के लिए, प्रकृति ने ब्रह्म से योग किया था, जिसका वो अभिन्न अंग भी थी, और तब से थी, जब से वह अभिव्यक्त भी नहीं हुई थी ।

 

अच्छा, अब इस योग को ऐसे सोचो…

एक बूंद है जो सागर में पड़ी हुई है ।

अब यदि आप उसे बूंद के रूप में देखोगे, तो वो उसी सागर के अंश या अभिव्यक्ति रूप में दिखेगी…, लेकिन वास्तव में वो बूंद ही तो सागर है ना? ।

अब अगर आप उससे बूंद मान के, ये बोलो कि उस बूँद ने अपने ही अभिव्यक्ता सागर से योग किया, तो इस योग की वास्तविकता को समझने में गलती किसकी है, आपकी या बूंद की ।

यह वैसे ही है, जैसे तुम्हारे शरीर की कोशिका भी तुम ही हो ।

बस यही अद्वैत योग हुआ था, प्रकृति और ब्रह्म के योग में ।

यही अद्वैत सिद्धांत कहलाया था, कि वास्तव में, इस जीव जगत में जो कुछ भी है, वह सब अभिव्यक्ता, ब्रह्म ही है । और इसी सत्य रूपी गंतव्य को, वैदिक महावाक्य भी दर्शाते हैं ।

लेकिन इस कलियुग में, कुछ वैदिक ग्रंथों में, इस योग को बहुत ही विकृत स्वरूप में बताया गया है, कि उन चतुर्मुखा पितामह ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री से विवाह किया था ।

 

लेकिन, प्रकृति और निर्गुण ब्रह्म का योग, काम से रहित था, इसीलिए निष्काम था ।

ये योग इसीलिए हुआ था, क्योंकि इसके बिना, जीवों के उद्धार का मार्ग नहीं बनता, क्योंकि वही प्रकृति जीवों के भीतर भी थी ।

अपने से उत्पन्न जीवों के उद्धार के लिए हे, प्रकृति ने ब्रह्म से ये योग किया था ।

यादि प्रकृति और ब्रह्म का योग ही नहीं होता, तो प्राकृत जीव के उत्कर्ष का मार्ग ही प्रशस्त नहीं होता । इसीलिए, ये योग, काम से रहित था और निष्काम था ।

ऐसा निष्काम काम ही, पुरुषार्थ चतुष्टय अंग हुआ था ।

पुरुषार्थ चतुष्टय में ,यही निष्काम काम, काम नामक शब्द से बतलाया गया था ।

 

पुरुषार्थ चतुष्टय का निष्काम काम पुरुषार्थ

अब उसी शून्य अनंत में, उस निष्काम योग को बताता हूं, जो पुरुषार्थ चतुष्टय का अंग हुआ था …

पुरुषार्थ चतुष्टय में, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष…, ये चार बिंदु पुरुषार्थ रूप में होते हैं।

और इसी पुरुषार्थ चतुष्टय में, काम शब्द, मोक्ष शब्द से पूर्व कहा गया है, क्योंकि अंतिम मोक्ष और पुरुषार्थ में बसा हुआ काम, एक दूसरे के पूरक होते हैं ।

 

पुरुषार्थ चतुष्टय का काम पुरुषार्थ और मोक्ष पुरुषार्थ, एक दूसरे के पूरक होते हैं …

अब इस बिंदु को बतलाता हूं, कि ये एक दूसरे के पूरक कैसे होते हैं ।

पुरुषार्थ चतुष्टय में, काम शब्द, मोक्ष शब्द के पूर्व बतलाया गया था ।

इसका कारण है, कि जब काम ही निष्काम हो जाता है, तो वो निष्काम काम, पुरुषार्थ पूरक होके, सीधा-सीधा साधक का मुक्तिमार्ग ही हो जाता है ।

इसीलिए, जीव जो प्रक्रित है, प्रकृति का ही अंग है, उनके मुक्तिमार्ग को प्रशस्त करने के लिए ही, प्रकृति ने वो योग किया था, अपने ही अभिव्यक्त ब्रह्म से ।

प्रकृति जिसमें जीव और जगत बसा हुआ है, वो जीव और जगत के भीतर भी होती है ।

इसीलिए, यदि प्रकृति ऐसा योग नहीं करती, तो जीव और जगत के उद्धार का मार्ग भी नहीं होता, जिसके कारण समस्त ब्रह्माण्ड में, कोई भी मुक्ति का मार्ग भी नहीं होता ।

और क्योंकि ये प्रकृति पुरुष योग, प्रकृति से उत्पन्न हुए जीवों के उत्कर्ष मार्ग को प्रकट करने के लिए था, अर्थात समस्त जीवों के मुक्तिमार्ग को प्रकट करने के लिए था, इसलिए ये योग प्रकृति के निष्काम काम का वाचक था, जिसके कारण, वो काम ही पुरुषार्थ चतुष्टय का अंग हुआ था, और काम नामक शब्द से बतलाया गया था ।

इसलिए, प्रकृति का निर्गुण ब्रह्म से निष्काम योग, उस प्रकृति और उसके समस्त प्राकृत जीवों का, मुक्तिमार्ग स्वरुप ही है ।

और यही कारण है, कि वैदिक वाङ्मय का मुक्तिमार्ग, प्रकृति से हो कर तो जाता है, लेकिन इसके बाद भी, मुक्ति प्रकृति के तारतम्य में नहीं होती ।

मुक्ति, प्रकृति के तारतम्य से अतीत की अवस्था है क्यूंकि उस कैवल्य मोक्ष में, प्रकृति और ब्रह्म में कोई अंतर ही नहीं होता, जिसके कारण उस अद्वैत कैवल्य अवस्था में, प्रकृति ही ब्रह्म होती है और ब्रह्म ही प्रकृति ।

 

अब ध्यान से सुनो…

पुरुषार्थ के निष्काम काम से वह मुक्तिमार्ग प्रकट होता है, इसलिए पुरुषार्थ चतुष्टय में, काम शब्द को मोक्ष शब्द के पूर्व में कहा जाता है ।

और यही सिद्धांत, पुरुषार्थ के चारों बिंदुओं पर भी लागू होता है…, तो अब इसको बताता हूं

पुरुषार्थ चतुष्टय में, धर्म के बाद अर्थ सिद्धि, अर्थ के बाद काम सिद्धि और काम के बाद मोक्ष सिद्धि होती है ।

 

इसीलिए …

  • जिस अर्थ में धर्म के बिन्दु नहीं होते, वो अर्थ वास्तव में अनर्थ ही होता है ।

और ऐसा अनर्थ, गंतव्य रूपी मोक्ष को भी नहीं जाता है। इस अर्थ नामक पुरुषार्थ के अनुसार, समस्त प्रकृति ही अर्थ शब्द का गंतव्य, परमार्थ केहलती है ।

परमार्थ शब्द में, परम शब्द ब्रह्म का वाचक है और अर्थ शब्द, प्रकृति का वाचक है ।

इसलिए, परमार्थ शब्द, प्रकृति और ब्रह्म के योग का ही वाचक है ।

और यह ब्रह्म और प्रकृति के योग का साक्षात्कार भी, इसी शून्य अनंत या शून्य ब्रह्म से होकर जाता है ।

 

  • जिस काम में, अर्थ अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं होता है, वो काम भी गंतव्यमार्ग अर्थात मुक्तिमार्ग नहीं होता है ।

इसलिए ऐसा मार्ग, मोक्ष नामक पुरुषार्थ का मार्ग भी नहीं होता ।

इस काम नामक पुरुषार्थ के अनुसार, समस्त प्रकृति ही काम शब्द की गंतव्य सिद्धि, निष्काम कहलाती है ।

और निष्काम शब्द, ब्रह्म का ही वाचक है ।

  • जिस मार्ग में, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, अपने विशुद्ध, निष्कलंक, ब्रह्मात्मक स्वरूप में नहीं होते, वो पुरुषार्थ नहीं होता, इसलिए वो मार्ग, मुक्तिमार्ग भी नहीं होता ।

 

ब्रह्म और प्रकृति के योग का कृष्णमय गुरु स्वरूप

अब उसी ब्रह्म और प्रकृति के योग के, कृष्णमय गुरु स्वरूप को बतलाता हूं…

इस योग का कारण ये है, कि…,

अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक नहीं होती ।

अभिव्यक्ती अपने अभिव्यक्ता का ही अभिन्न अंग होती है ।

अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता का ही अभिन्न अंश होती है ।

 

अंश सदैव ही, अपने अंशी की ओर अग्रसर होता है, और ये अग्रसर होने का मार्ग ही, उस अंश का उत्कर्ष मार्ग कहलाता है ।

ऐसे उत्कर्ष मार्ग में, अंतः, अभिव्यक्ति या अंश, अपने अभिव्यक्ता या अंशी को ही पाता है, और इस पाने के पश्चात, अर्थात लय होने के पश्चात, अभिव्यक्ति या अंश अपने अभिव्यक्ता या अंशी का ही स्वरूप हो जाता है ।

इसी को मुक्तिमार्ग कहते हैं, जो साधक के उत्कर्षमार्ग को भी अपने भीतर समाए हुए होता है ।

इसलिए, जो मार्ग ऐसा नहीं होता, वह उत्कर्ष मार्ग भी नहीं होता ।

 

जो मार्ग उत्कर्ष कि ओर लेके नहि जाता, वो मुक्तिमार्ग भी नहीं होता ।

और जो मुक्तिमार्ग नहीं होता, वो पुरुषार्थ के गंतव्य, मोक्ष का भी नहीं होता ।

अब आगे बढ़ता हूँ …

ऐसे अद्वैत योग के बाद ही, प्रकृति अपने शून्य अनंत स्वरूप में आई थी, जो शून्य ब्रह्म केहलाया था ।

सारे योग और उत्कर्ष मार्ग, इसी शून्य ब्रह्म से होकर जाते हैं, जो कृष्ण नारायण, इस नाम से भी जाने जाते हैं ।

और वो श्रीमन कृष्ण नारायण, समस्त प्राणियों के भगवान् होते हैं, जो प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं ।

और वो कृष्ण नारायण, शून्य अनंतः, अनंत शून्य:, इस वाक्य के, सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार, समस्त स्वरूपों में साक्षातकार होते हैं ।

इसीलिए, इस चित्र का शून्य अनंत, कृष्ण तू भगवान् स्वयं…, ऐसा भी दर्शाता है ।

 

जो भगवान्, अपने साधक का गुरु न हो सके, वो भगवान् कैसा ।

और जो गुरु, अपने शिष्य का भगवान् न हो सके, वो गुरु कैसा ।

जो भगवान् और गुरु, दोनो ही, समान रूप से हो सके, वो ही साधक के भीतर बसा हुआ कृष्ण तत्व कहलाता है, जो इस हृदय कैवल्य गुफा के चित्र में दिखलाया गया है ।

और ऐसा भागवत गुरु ही जगद्गुरु कहलाता है, इसीलिए, यदि कोई वास्तविक जगदगुरु है, तो वो यहाँ बतलाया जा रहा हृदय कैवल्य गुफा का कृष्ण तत्त्व ही है ।

जगद्गुरु कोई हो ही नहीं सकता, जबतक वो जगत में ही सार्वभौम नहीं होता ।

लेकिन ऐसा जगद्गुरु होने के लिए, उससे प्राणियों के भीतर भी होना होगा, क्यूंकि ब्रह्म की रचना का वो प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक जगत तो प्राणियों के भीतर भी होता है ।

जीव जगत में बसा होता है, और जगत जीवों में बसा होता है ।

इसलिए, जो दोनों का एक सार्वभौम गुरु होता है, वो ही वास्तव में जगद्गुरु होता है, जो श्रीमान कृष्ण नारायण ही हैं, क्योंकि वे प्राणियो के हृदय में, यहाँ बतलाये जा रहे, शून्य अनंत रूप में ही निवास करते हैं ।

वेदों में, जो श्रीमन नारायण कहे गए हैं, वो ही पंचमुखा सदाशिव, विराट परब्रह्म और वो ही विश्वकर्मा हैं ।

लेकिन, विश्वकर्मा शब्द का वास्तविक अर्थ, गुरु होता है, इसलिए श्रीमन नारायण ही, समस्त प्राणियों के सनातन गुरु कहलाते हैं ।

 

शून्य अनंत में मूल और गंतव्य के योग की अंतगति…

अब शून्य अनंत में, मूल और गंतव्य के योग की, अंत गति को बतलाता हूँ …

 

मूल प्रकृति होती है, और गंतव्य ब्रह्म होता है ।

मूल योगमय होता है, और गंतव्य ज्ञानमय ।

शून्य ब्रह्म या शून्य अनंत में, शून्य का शब्द, मूल शक्ति रूपी, ब्रह्म की अभिव्यक्ति, प्रकृति का होता है, और अनंत का शब्द, ब्रह्म का होता है ।

ऐसे योग में, अपने गंतव्य स्वरूप में मूल ही अमूल होता है ।

 

वो मूल जो अमूल होता है, उसे ही निराधार, निर्विकल्प और निरालंब कहते हैं, जो ब्रह्म नामक शब्द का वाचक होता है ।

इसलिए, इस मूल और गंतव्य के योग में, अर्थात, प्रकृति और ब्रह्म के योग में, दोनो ही, उसी अद्वैत ब्रह्म को दर्शते हैं ।

 

शून्य अनंत योगमार्ग … शून्य समाधि, असमप्रज्ञात समाधी, निर्बीज समाधी, निर्विकल्प समाधि

अब इस मुक्ति गुफा में, शून्य अनंत के योगमार्ग को बताता हूं …

शून्य जीव और जगत का मूल होता है, जिसका ज्ञान, उसकी ही समाधि, शून्य समाधि से होता है ।

अनंत को ही ब्रह्म कहते हैं, जो कैवल्य, निर्वाण और मुक्ति कहलाता है, और जिसका ज्ञान, निर्विकल्प समाधि से होता है ।

और इन शून्य और अनंत की योगावस्था, जो शून्य अनंत है, उसी को शून्य ब्रह्म  कहते हैं, जिसका ज्ञान, असमप्रज्ञात समाधि से होता है ।

 

अब ध्यान दो …

जब शून्य और अनंत का योग, साधक के पिंड के भीतर ही होता है, तब जैसा होता है, वो अब बताता हूं …

तब शून्य ही अनंत होता…, और मूल रूपी शून्य, अपने ही अमूल गंतव्य, अनंत ब्रह्म को पाता है।

 

और इसी समय पर, अर्थात इसके साथ साथ …

अनंत, मूल रूपी शून्य में समा जाता है…, और वो अनंत, अपने ही मूल, शून्य सरीका होता है।

 

लेकिन, जब योगी के पिंड रूपी शरीर में, ये बतायी गई अवस्था चलित होती है, तो इसी अवस्था में, उस योगी के ही शरीर में, वो मूल प्रकृति, जिसे दुर्गा और ब्रह्म शक्ति कहते हैं, वह अपने ही स्वामी, उस अनंत या ब्रह्म से योग कर बैठती है…, जो योगी के ब्रह्मरन्ध्र में बसा होता है ।

लेकिन उस ब्रह्म शक्ति या दुर्गा के योगी के ब्रह्मरन्ध्र में ऐसे स्थित होने से पूर्व, उस योगी के मणिपुर चक्र या नाभि चक्र में जो ब्रह्मपदार्थ अपने सद्योजात रुपी सदाशिव लिंगात्मक स्वरुप में होता है, वो सत्त्वगुणी हो जाता है…, और इसलिए वो ब्रह्मपदार्थ रुपी नाभि लिंग श्वेत वर्ण का हो जाता है, जैसे उसपर किसी ने बहुत सारा चूने का चूरा डाल दिया है ।

इसके पश्चात, वो ब्रह्मपदार्थ नाभि से ऊपर को उठता है और अंततः, उस योगी के ब्रह्मरंध्र और उस योगी के ब्रह्मरन्ध्र में ही पहुँच कर, us ब्रह्मरन्ध्र में ही स्थापित हो जाता है ।

इसके पश्चात ही वो ब्रह्म शक्ति या दुर्गा, जो योगी की काया के भीतर भी होती है, योगी के मेरुदण्ड के नीचे के भाग से ऊपर उठती है, और ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाती है…, जहाँ वो अपने स्वामी ब्रह्म से योग लगाती है ।

ऐसी अवस्था में, योगी के मेरुदंड के नीचे के भाग में, बसी हुई दुर्गा या ब्रह्म शक्ति, जागृत हो जाती है, और योगी के मस्तिष्क की ओर चली जाती है, और अंतः, वो मूल प्रकृति, दुर्गा या ब्रह्म शक्ति उस योगी के ही, सहस्रदल कमल में स्थित हो जाति है ।

जब उस योगी के भीतर बसी हुई, दुर्गा या ब्रह्म शक्ति, सहस्र दल कमल में पंहुच जाती है, और इससे भी ऊपर की ओर उठ जाती है, तब वह योगी शून्य अनंत की समाधि, जिसे असमप्रज्ञात समाधि कहते हैं, उससे पा लेता है ।

ऐसे समय पर, योगी के प्राण विसर्गी होके, सहस्र दल कमल से भी परे जाने लगते हैं ।

और अंततः, योगी की चेतना, उस विराट कृष्ण नारायण की हथेली पर बैठ कर, उनका साक्षातकार करती है, और वो भी उसी शून्य ब्रह्म में, जो ब्रह्मरंध्र से भी ऊप्पर को होता है और जो निराकार नारायण भी कहलाता है ।

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

और इसि असमप्रज्ञात समाधि से, वो गंतव्य मार्गी योगी, निर्बीज समाधि को पाता है ।

निर्बिज समाधि के मार्ग में, सगुण परमेश्वरी रूपी प्रकृति, अपने ही स्वामी, सगुण परमेश्वर ब्रह्म से योग करके, सहस्रार से भी ऊपर के, वज्रदंड चक्र को चली जाती है, जहां नाद, राम नामक शब्द का होता है और जो शिव तारका मंत्र भी कहलाता है ।

और अंततः, वो योगी के भीतर बसी हुई ब्रह्म शक्ति या गुरुमाई दुर्गा उस ब्रह्मपदार्थ को ब्रह्मरंध्र से और भी ऊपर उठा कर, अष्टम चक्र में पहुंच जाती है, जिसका वर्णन अथर्ववेद के दसवें अध्याय में सूक्ष्म रूप से किया गया है…, लेकिन, इस बिंदु के बारे में, कभी और बतलाऊँगा ।

 

अब ध्यान देना…

योग तंत्र में, निर्बीज समाधि ही गंतव्य की समाधि कहलाती है ।

लेकिन ऐसे कहने के कई सारे कारण हैं, जो अब बतलाता हूँ …

  • इस निर्बीज समाधि से, चित्त संस्कार रहित हो जाता है ।

जब चित्त संस्कार रहित हो जाता है, तब समस्त कर्म और उनके फल, समाप्त होते हैं, जिसके करण योगी, कर्मातीत मुक्ति को पाता है ।

उसके भीतर बौद्ध मार्गी में बतलाया गया बोधिचित्त स्वयंप्रकट होता है, जिसके बारे में कभी और बात होगी ।

और और इस दशा के पश्चात, उसका चित्त ही चिदाकाश के समान हो जाता है ।

जब ऐसा होता है, तब योगी अयम् आत्मा ब्रह्म नामक महावाक्य के अर्थ में ही समा जाता है ।

 

  • इसी निर्बीज समाधि से, अहम् विशुद्ध होता है, इसीलिए ब्रह्म सरीका होके, साधक का अहम् सर्व व्याप्त हो जाता है ।

और इसके कुछ बाद में, वो योगी, अहम् ब्रह्मास्मि नामक महावाक्य के अर्थ में ही समा जाता है ।

 

  • इसी निर्बीज समाधि से, बुद्धि वृत्तिहीन हो जाती है।

और योगी, ज्ञान ब्रह्म के अर्थ को साक्षातकार करके, प्रज्ञानम् ब्रह्म नामक महावाक्य में ही समा जाता है ।

 

  • इसी निर्बीज समाधि से, मन स्थिर होके, ब्रह्ममये होके, ब्रह्मलीन होता है।

और योगी, मन ब्रह्म के अर्थ को साक्षातकार करके, तत् त्वम् असि नामक वैदिक महावाक्य के अर्थ में ही समा जाता है ।

 

  • और इस सबके साथ साथ, प्राण अपनी ही पूर्णता को पाता है, और महा भयानक, अति विक्राल हो जाता है ।

और ऐसा योगी, प्राण ब्रह्म के अर्थ को साक्षातकार करके, अपने चक्र पिंडों में, नमः शिवाय के पंचाक्षरी मंत्र को, शक्ति रूप में पाता है ।

और अंतः, सोऽहम् नामक महावाक्य के अर्थ में ही समा जाता है, और अपने ही गंतव्य, में शिवतत्व को पाता है ।

 

  • जो योगी इन सभी बिंदुओं के साक्षातकारी होता है, योगमार्ग में उससे ही, कालात्मा, गुणात्मा, प्राणात्मा, ज्ञानात्मा, चिदात्मा, भूतात्मा इतियादी शब्दों से बतलाया जाता है । लेकिन इन शब्दों के योगार्थ बारे में, कभी और बात होगी ।

लेकिन एक बात जान लो, की, इस निर्बीज समाधि के पश्चात, ऐसी भयंकर पीड़ाएं आती हैं, कि अधिकांश योगी, उनको सहन ही नहीं कर पाते हैं, और अपनी काया को त्याग कर देते हैं ।

और यदि ये निर्बिज समाधि, अकस्मात् होती है, तो ये समाधि, सद्योमुक्ति को ही लेके जाएगी, जिसके पश्चात, 3-4 सप्तह के भीतर ही, योगीजन अपनी काया का ही त्याग कर देते हैं ।

बहुत बिरले योगी होते हैं, जो निर्बिज समाधि के सिद्ध होने के बाद भी…, अपनी काया में रहते हैं या अपनी काया को रख पाते हैं ।

लेकिन ये निर्बीज समाधि का मार्ग, ॐ साक्षातकार से ही होकर जाता है, जिसको बतलाने को, इस कैवल्य गुफा के ज्ञान की नीव, यहां डाली जा रही है ।

 

यत पिण्डे तत ब्रह्माण्डे

अब मै एक वाक्य, यत पिण्डे तत ब्रह्माण्डे को इसी चित्र से बतलाता हूँ …

हृदय कैवल्य गुफा के चित्र में, जो प्रकाशरहित अवस्था है, वह शून्य ब्रह्म के शून्याकाश स्वरुप को दर्शाती है ।

इसी मूल रूपी शून्य और गंतव्य रूपी ब्रह्म, के बीच में, समस्त ब्रह्माण्ड बस हुआ है, अर्थात, समस्त जीव जगत, इन्हीं दोनो के बीच में बसा हुआ है ।

और ये चित्र, उस ब्रह्माण्ड को भी दर्शाता है, जो योगी के शरीर रूपी पिंड में बसा होता है ।

ये ब्रह्मांड जो योगी के भीतर ही होता है, उसे पुरातन कालों में, ऐसे कहा गया था …

यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे

 

जिसका अर्थ है कि…

जैसा पिंड या शरीर होता है, वैसा ही ब्रह्मंड होता है

जैसा ब्रह्माण्ड होता है, वैसा ही शरीर होता है

लेकिन, ऐसा इसीलिए होता है, क्योंकि वह ब्रह्माण्ड उसकी प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक अवस्था में साधक के पिंड में ही बसा होता है ।

और इसके साथ साथ, पिंड भी उस विशालकाय ब्रह्मांड में बसा हुआ होता है ।

लेकिन योगमार्ग में, इस वाक्य के कई सारे स्वरूप होते हैं, पर यहां पर एक ही स्वरूप को बतलाता गया है ।

तो अब इस कैवल्य गुफा के, अंतिम या पांचवे भाग को बताता हूं, जो ब्रह्माकाश का है …

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

 

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