भगवान् राम, राम नाद, शिव तारक मंत्र, राम का शब्द, योग मार्ग के राम, शिव का तारक मंत्र, यौगिक राम, योग काशी, योगमार्ग की काशी, योग मार्ग का प्रयागराज, योग प्रयागराज, रकार मार्ग, मोक्ष नाद, मोक्ष का शब्द, सहस्रार चक्र की परिभाषा

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यहाँ पर राम नाद, शिव तारक मंत्र, राम का शब्द, भगवान् राम, योग मार्ग के राम, शिव का तारक मंत्र, यौगिक राम, योग काशी,  योगमार्ग की काशी, योग मार्ग का प्रयागराज, योग प्रयागराज, रकार मार्ग, मोक्ष नाद, मोक्ष का शब्द, सहस्रार चक्र की परिभाषा, आदि बिंदुओं पर बात होगी I

और इसी अध्याय में मैं आगे बताई जाने वाली और इस पूरी अध्याय श्रंखला का आधार डालूँगा, नहीं तो साधकगणों को यह पूरी अध्याय श्रंखला समझ ही नहीं आएगी I यही कारण है कि इसी अध्याय में इस श्रंखला के कई सारे बिंदु भी संक्षेप में ही सही, लेकिन डाले जाएंगे I

राम शब्द केवल उन भगवान् राम का नहीं है, बल्कि योगमार्ग में यह शब्द काशी के शिव (अर्थात भगवान् विश्वनाथ) का भी है, और इसके कारण यह काशी के शिव का तारक मंत्र भी कहलाया जा सकता है I

योगमार्ग में यह राम नामक शब्द, साधक की स्थूल काया के भीतर एक विकराल स्वरूप में प्रकाशित होता है I यह राम का शब्द, शिवरंध्र से लेकर वज्रदण्ड के भीतर तक प्रकाशित होता है I शिवरंध्र का वर्णन तो एक पूर्व के अध्याय में किया हुआ है, और वज्रदण्ड चक्र का वर्णन आगे के किसी अध्याय में किया जाएगा I

इस राम शब्द का नाता उन हरिहर से भी होता है, जो सनातन गुरुदेव श्री विष्णु और परमगुरु शिव की योगावस्था का द्योतक होते हैं और जिनमें विष्णु ही शिव हैं, और विष्णुत्व ही शिवत्व के स्वरूप में प्रकाशित होता है I

साधक की काया के भीतर, उन हरिहर का स्थान मस्तिष्क के ऊपर के भाग में, जहाँ शिवरंध्र होता है, उस शिव के रंध्र के समीप और थोड़ा सा नीचे की ओर ही होता है, और इसी स्थान पर शिवत्व ही विष्णुत्व होता है, और हर ही हरी रूप में प्रकाशित होते हैं I

और उन हरिहर के इसी स्थान पर, ऋग्वेद में दर्शाया गया वह महामृत्युञ्जय मंत्र भी सुनाई देता रहता है, जो मेरे एक पूर्व जन्म के गुरुदेव, ब्रम्हार्षि विश्वामित्र द्वारा उद्भासित करा गया था और जब मैं वह इक्ष्वाकु वंश का सम्राट था, जिसका नाम सत्यव्रत था और जो त्रिशङ्कु कहलाया था, और जहाँ वह सत्यव्रत उसके अपने ही सूर्यवंश के उस चक्रवर्ती सम्राट का पुनर्जन्म था I त्रिशङ्कु नामक दशा और उसकी सिद्धि के बारे में एक बाद के अध्याय में बताया जाएगा I

हरिहर के शिवरंध्र के समीप के स्थान पर एक उल्टा लटका हुआ सुनहरा शिवलिंग होता है, जिसके भीतर और जिसके समीप तक यह महामृत्युञ्जय मंत्र सुनाई देता रहता है I

और उन्ही हरिहर के स्थान के उस उलटे लटके हुए सुनहरे वर्ण के शिवलिंग से आगे जाकर ही साधक की चेतना वज्रदण्ड चक्र में जाती है, और इसी वज्रदण्ड के भीतर ही वह साधक यहाँ बताए जा रहे राम नाद का साक्षात्कार करता है I वह राम नाद भी भगवान् राम के शब्दात्मक और मंत्रात्मक स्वरूप में साक्षात्कार होता है, और जहाँ यह राम नाद ही शिव तारक मंत्र है I

क्योंकि  योगमार्ग के राम का नाता परमगुरु शिव और सनातन गुरु श्री विष्णु से होता है, और क्यूंकि यह भद्र नामक शब्द विष्णु और शिव दोनों को ही दर्शाता है, इसलिए योगमार्ग में उन्हीं राम को भद्र भी कहा जाता है I

भद्र का शब्द शिव का भी द्योतक है और विष्णु को भी दर्शाता है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि विष्णु और शिव, दोनों ही भद्र है, अर्थात विष्णु और शिव उस विराट कल्याणकारी सत्ता को दर्शाते हैं, जिनकी योगावस्था को हरिहर कहा गया है I उन भगवान् हरिहर के लिंग रूप (अर्थात हरिहर लिंग) का वर्णन एक पूर्व के अध्याय में करा जा चुका है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय और यह पूरी श्रंखला भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला था I

यह अध्याय भी आत्मपथ, ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अंग है, जो पूर्व के अध्याय से चली आ रही है ।

यह भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जो भी जुड़ा हुआ है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को समरपित करता हूं ।

और यह भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट, योगगुरु और योगेश्वर भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिण्डात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वह उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ बुद्धत्व से भी होकर जाता है ।

यह अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का चौसठवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

यह अध्याय इस हिरण्यगर्भ ब्रह्माणि मार्ग का दूसरा अध्याय है I

 

राम नाद, शिव तारक मंत्र
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यह अध्याय श्रंखला का साक्षात्कार तब होता है जब पूर्व की अध्यय श्रंखला, जो ॐ सावित्री मार्ग की थी, उसको पार कर लिया जाता है I इसलिए योगमार्ग से इस अध्याय श्रंखला का साक्षात्कार, पूर्व में बताए गए ॐ सावित्री मार्ग से आगे जाकर ही होता है I

जब साधक की चेतना ॐ के ऊपर के बिंदु में ऐसे लय होती है, कि उसके पश्चात वह स्वयं ही स्वयं को देख नहीं पाती है, तब इस लय होने के कुछ दिनों के पश्चात वह चेतना इस अध्याय श्रंखला का कुछ वैसे ही साक्षात्कार करती है, जैसा इस अध्याय श्रंखला में बताया जाएगा I

इसका यह भी अर्थ हुआ, कि जब साधक की चेतना ॐ के ऊपर के बिन्दु में लय होकर,  स्वयं ही स्वयं को देख नहीं पाती है, तब ही वह चेतना इस अध्याय श्रंखला में बताए गए बिंदुओं के साक्षात्कार का पात्र बनती है… इससे पूर्व नहीं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

और अब इस अध्याय के चित्र का साक्षात्कार मार्ग, संक्षेप में ही सही… लेकिन बताता हूँ I

ॐ के ऊपर के बिन्दु में लय होने के पश्चात, मेरा शरीर पीला सा पड़ गया था I उस समय पर मेरे स्थूल शरीर के नीचे के भाग में जहाँ मूलाधार चक्र होता है, उस चक्र से थोड़ा सा नीचे एक अतिसूक्ष्म लेकिन चमकदार पीले वर्ण का प्रकाश आ गया था I

और उस प्रकाश ने मेरे गुदा से लेकर लिंग तक और पौरुष ग्रंथि (या पुरस्थग्रंथि) तक और इस ग्रंथि से नीचे के स्थान को भी घेरा हुआ था I यही इस अध्याय श्रंखला के साक्षात्कार का प्रथम बिंदु भी है क्योंकि जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक इस अध्याय श्रंखला के योगमार्ग में साधक की चेतना गमन भी नहीं कर पाएगी I

जब ऐसी दशा स्वयंप्रकट हुई थी, तो एक रात जब मैं शयन कर रहा था और अर्धनिद्रा की अवस्था में था, तब मेरी स्थूल काया के भीतर, अकस्मात् ही एक विकराल शब्द प्रकट होने लगा, जो राम नाम की बीजावस्था का था, और जिसके दो भाग थे, जिनमें से प्रथम भाग रा शब्द का था और दूसरा भाग मममम शब्द का था I इन दोनों शब्दों की योगावस्था को ही योगमार्ग में राम कहा जाता है I

इसी योगमार्ग में साक्षात्कार करे गए राम नाद के बारे में इस अध्याय श्रंखला में बताया जाएगा I

यदि मैं इस अध्याय श्रंखला की सिद्धियाँ गिनवाना प्रारम्भ करूँगा, तो वह असंख्य ही हो जाएंगी, इसलिए इस अध्याय श्रंखला में मैं कुछ ही सिद्धियों को बतलाऊँगा… सभी सिद्धियों को नहीं I

और जो सिद्धियाँ यहाँ बताई जाएंगी, वह वो होंगी जो केवल और केवल मुक्तिमार्ग और उस मुक्तिमार्ग के देवत्व बिंदुओं से संबद्ध होंगी I

 

ऊपर के चित्र में…

  • जो स्थूल शारीर दिखाया गया है, वह साधक का शरीर है I
  • उस स्थूल शरीर के भीतर जो नीला वर्ण दिखाया गया है, वह मनोमय कोष है, जो शिवरूप हुआ है I

टिप्पणी 1: जबकि सूर्य का वास्तविक प्रादुर्भाव आकाश गंगा के मध्यभाग के, पूर्व दिशा की ओर के सद्योजात ब्रह्म में होता है, लेकिन ऐसा होने पर भी वह सूर्य आकाश गंगा में पूर्व दिशा में दिखाई नहीं देता है I ऐसा इसलिए होता है, क्यूंकि आकाश गंगा के मध्य पूर्वी भाग में उदय होने के पश्चाय, सूर्य उस आकाश गंगा के मध्य भाग के भीतर निवास करता हुआ ही अप्रदक्षिणा मार्ग से गति करता रहता है, इसलिए उदय होने के पश्चात भी वह सूर्य आकाश गंगा के मध्य भाग से बाहर नहीं निकलता है I आकाश गंगा के मध्य भाग से बाहर न निकलने के कारण वह सूर्य आकाश गंगा में तब भी दिखाई भी नहीं देता है जब उसका प्रादुर्भाव हो चुका होता है I और जब इस अपरिक्रमा मार्ग में जाते-जाते वह सूर्य उत्तर के तत्पुरुष ब्रह्म में पहुँच जाता है, तब ही वह आकाश गंगा के उस मध्य भाग को त्यागकर, उससे बाहर निकलता है, और इसके पश्चात ही वह आकाश गंगा में दिखाई देने लगता है I इसलिए जबकि आकाश गंगा में सूर्य का प्रादुर्भाव, पूर्वी दिशा में ही होता है, लेकिन सूर्य का आकाश गंगा में उदय उत्तर दिशा से ही होता है I इसलिए जहाँ तक सूर्य के प्रादुर्भाव की बात है, वह पूर्व के सद्योजात ब्रह्म (अर्थात हिरण्यगर्भ) से ही हुआ है I और जहाँ तक सूर्य के आकाश गंगा में दिखाई देने की बात है, वह उत्तर के तत्पुरुष ब्रह्म में पहुंचकर ही हो पाता है I इसलिए वास्तविक दृष्टिकोण से सूर्य का प्रादुर्भाग पूर्व दिशा से है, और आकाश गंगा के भीतर लौकिक दृष्टिकोण से सूर्य का उदय उत्तर दिशा से ही होता है I

टिप्पणी 2: ब्रह्माण्ड के इस भाग में मनोमय कोष नीला ही होता है, और ऐसा भी इसलिए है क्योंकि अभी के समय पर सूर्य की इस आकाश गंगा में उदयावस्था की तुलना में, उसकी स्थिति 180 डिग्री के समीप है I ऐसा होने के कारण कारण इस सूर्य मंडल पर प्रधानतः नीले वर्ण का अघोर मुख ही लागू होता है I और क्योंकि मन तो “गंगा गए गंगाराम और यमुना गए यमुनादास” सा ही होता है, इसलिए अभी के समय पर, इस पृथ्वीलोक के जीवों का मन भी अघोर के समान नीले वर्ण का ही पाया जाता है (और ऐसा तब भी है, जब मन का वास्तविक नाता वामदेव ब्रह्म और उनसे संबद्ध परा प्रकृति से है और ऐसा होने के कारण मन का वास्तविक वर्ण भी श्वेत ही होता है) I और क्यूँकि सूक्ष्म शरीर के उन्निस भागों में से, मन ही प्रमुख भाग होता है, इसलिए ब्रह्माण्ड के उस स्थान पर जहाँ सूर्य अभी के समय गति कर रहा है, इस पृथ्वी लोक के जीवों का सूक्ष्म शरीर भी नीले वर्ण का ही होता है I

अब आगे बढ़ता हूँ…

 

  • और उसी शरीर के भीतर जो श्वेत वर्ण का प्रकाश दिखाया गया है, वह सत्त्वगुण को पाया हुआ, समता में स्थापित हुआ, आदिशक्ति स्वरूप प्राणमय कोष है I
  • इसलिए यह चित्र में दिखाए गए नीले वर्ण के भीतर जो श्वेत वर्ण का प्रकाश है, वह उस शिव शक्ति योग का द्योतक है, जो साधक की स्थूल काया के भीतर ही होता है और जो साधक के शिवमय मन और शक्तिमय प्राण की योगदशा से ही चलित होता है I ऐसा होने के कारण, यह साधक की काया के भीतर ही चलित होता हुआ, शक्ति शिव योग भी कहलाता जा सकता है, और इसी को प्राणमय मनोमय योग ही कहा जा सकता है I
  • क्योंकि शिव ही सर्वव्यापक कल्याणकारी हैं, और शक्ति उन कल्याणकारी शिव की सार्वभौम दिव्यता हैं, इसलिए यह चित्र ऐसी ही कल्याणकारी योगदशा को दर्शा रहा है I और जहाँ वह कल्याण शब्द का अर्थ, मुक्ति ही है I
  • इस चित्र में जो मुख (अर्थात सर या मस्तिष्क) का भाग है, उसके भीतर जो श्वेत वर्ण का गोला दिखाया गया है और जिसके भीतर नीले वर्ण की धारियाँ भी दिखाई गई हैं, वह वो नाभि लिंग है, जो नाभि क्षेत्र से ऊपर उठकर, इस स्थान पर चला गया है, और इस चित्र की दशा में वह नाभि लिंग बस शिवरंध्र में प्रवेश करने ही वाला है I
  • इस चित्र में मस्तिष्क के ऊपर की ओर जो श्वेत वर्ण के दस पत्तों जैसी दशा दिखाई गई है, वह सहस्र दल कमल के द्योतक है (अर्थात मस्तिष्क के ऊपर के एक हजार पत्तों के कमल का द्योतक है) I इस साक्षात्कार के समय, यह सहस्रार चक्र के एक हजार पत्ते, विशालकाय सागर के समान दिखाई देते हैं, इसलिए इन पत्तों को सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन बहुत बड़े आकार का दिखाया गया है I
  • और इस सहस्रार चक्र के सागर स्वरूप के भीतर से जाकर, वह चेतना इससे आगे के सुनहरे वज्रदण्ड में जाती है I इस चित्र में जो सुनहरे वर्ण का दण्ड मस्तिष्क के ऊपर दिखाया गया है, वही वज्रदण्ड चक्र है I
  • इसी वज्रदण्ड से जाकर वह चेतना राम नाद का साक्षात्कार करती है I वज्रदण्ड चक्र का नाद रूप ही राम होता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ…

और इस चित्र की दशा के साक्षात्कार के समय पर साधक की जो मनोस्थिती होती है, उसके बारे में बताता हूँ…

जब साधक की चेतना, इस चित्र में दिखाए गए सुनहरे वर्ण के वज्रदण्ड से जा रही होती है, तब यह राम नाद एक बहुत विकराल शब्द के रूप में साक्षात्कार होता है I इस साक्षात्कार में यह राम का शब्द साधक के मन, बुद्धि, चित्त और अहम् तक को बिलकुल झंझोर देता है जिसके कारण साधक को बिलकुल भी समझ नहीं आता, कि उसके साथ क्या हो रहा है, और जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है I

जब ऐसी दशा आई, तो मैंने समस्त देवी देवताओं का आवाहन किया I जब मेरी चेतना इस दशा के भीतर से जा रही थी, और वह राम का शब्द अपने घोर ऊर्जात्मक विकराल रूप में मेरे शरीर के भीतर चलित हो रहा था, तो ऐसा कोई देवी या देवता है ही नहीं, जिसको मैंने पुकारा नहीं था I ऐसा इसलिए पुकारा था, क्योंकि साधारणतः उस दशा को और उसकी विकराल ऊर्जाओं को झेलना संभव ही नहीं हो पाता है I

जब मैंने ऐसा पुकारा, तो आदि शंकराचार्य मेरे गुरु स्वरूप में आए I उन्ही गुरु स्वरूप भगवान् आदि शंकराचार्य को इस चित्र के ऊपर के भाग में बायीं ओर दिखाया है I उस दशा में जब गुरु आदि शंकराचार्य मेरे द्वारा किया गए देवी देवताओं के आवाहन के समय पर आए, तो वह थे को खड़े हुए, लेकिन इस चित्र में मैंने उन्हें बैठा हुआ ही दिखाया है I

जब भगवान् आदि शंकराचार्य मेरे गुरु बनकर आए थे, तो उन्होंने गरजकर कहा… उसको बहार निकालो… इसको अपने आंतरिक बल से बाहर धकेलो … इस दशा से बाहर निकलो I

उस समय मुझे यह समझ तो नहीं आया, कि किसको बाहर निकलो या किस से बाहर निकलो I लेकिन उस घोर दिवुधा में भी मैं यह बात तो समझ ही गया, कि बाहर निकलना है I

और क्योंकि मुझे अनुमान हो रहा था, कि उस विकराल दशा में मेरी चेतना ऊपर की और (अर्थात मस्तिष्क से भी ऊपर की ओर) ही उठ रही है, इसलिए मैं यह तो जान ही गया कि मस्तिष्क के ऊपर की ओर से इस विकराल दशा को पार करने का मार्ग है I

और क्योंकि इस दशा के साक्षात्कार के समय मुझे यह भी ज्ञान हो रहा था, कि मेरी चेतना जो इस दशा से आगे कहीं पर जा रही है, वह शरीरी रूप में ही है, इसलिए मुझे यह भी ज्ञान हुआ कि यदि ऐसा ही है, तो उस शरीरी चेतना के हस्त आदि अंग भी होंगे ही I

इस दशा में, शंकराचार्य के आदेशानुसार, मैंने अपनी चेतना का दायाँ हाथ ऊपर की ओर उठाया, और अपने तपोबल, योगबल, मनोबल और आत्मबल आदि को एकत्रिक किया और इन बलों का प्रयाग करके, उस चेतना को ऊपर की ओर धकेल दिया I

जब ऐसा हुआ, तो वह चेतना उस सुनहरे वज्रदण्ड को, जो मस्तिष्क के ऊपर के भाग में होता है, उसको पार कर गई और उस दशा में पहुँच गई, जिसका सूक्ष्म सांकेतिक वर्णन अथर्ववेद के दसवें अध्याय के दूसरे खण्ड के इकत्तीसवें, बत्तीसवें और तैंतीसवें मंत्रों (अर्थात अथर्ववेद 10.2.31, 10.2.32 और 10.2.33) में किया गया है, और जो योगमार्ग के भगवान् राम और उनकी अयोध्यापुरी के द्योतक हैं, और जो शिव तारक मंत्र की गंतव्य दशा हैं I इसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बतलाऊँगा I

इसलिए, इस साक्षात्कार से मैं यह भी जान गया, कि भगवान् आदि शंकराचार्य उन सभी देवी देवताओं के स्वरूप, हैं, जिनका मैंने आवाहन किया था I यदि ऐसा नहीं होता, तो उन सभी देवी देवताओं के आह्वान से आदि शंकराचार्य आ भी नहीं सकते थे I इसलिए में यह भी मानता हूँ, की चाहे उन सभी वैदिक देवी देवताओं को मानों या भगवान् आदि शंकराचार्य को, बात एक ही है I

और उसी रात्रि से, जिसमें मैंने इस अध्याय श्रंखला का पूर्णरूपेण साक्षात्कार किया था, आदि शंकराचार्य मेरे गुरुदेव हुए… और आज भी हैं I और उन भगवान् आदि शंकराचार्य के मार्गदर्शन के पश्चात मैं यह भी जान गया, कि जब उनका प्रादुर्भाव इस धरा पर हुआ होगा, तब वह भगवान् ही होंगे… न कि कोई साधारण मानव I ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि वह तो मेरे द्वारा उन सभी देवी देवताओं के आह्वान के कारण ही, मेरा उस विकराल दशा से आगे जाने का मार्ग प्रशस्त करने हेतु ही आए थे I

जो यहाँ पर संक्षेप में ही बताया गया है, उनमें से कुछ प्रधान बिन्दुओं को बाद के अध्यायों में विस्तारपूर्वक बताया जाएगा I

 

राम नाद कैसा होता है, शिव तारक मंत्र क्या है, राम का शब्द क्या है, मोक्ष नाद क्या है, मोक्ष का शब्द क्या है, योगमार्ग के राम कौन हैं, यौगिक राम का शब्द क्या है, राम और हरिहर का नाता, … राम नाद क्या है, शिव तारक मंत्र कैसा होता है, शिव का तारक मंत्र क्या है, रा शब्द, रा का शब्द, रा नामक शब्द, मममम नामक शब्द, म नामक  शब्द, म का शब्द, रा और मममम का योग ही राम है, रा और मममम का योग, रा और मममम का योग, रा और म का योग, रकार मार्ग क्या है, रकार का मार्ग, रकार मार्ग पर गति, रकार क्या है, रकार किसे कहते हैं, रकार का स्वरूप,

राम का शब्द, अर्थात राम नाद ही मोक्ष नाद या मोक्ष का शब्द है I

योगमार्ग में यह राम का शब्द, साधक के शरीर में ही स्वयं प्रकट होता है, और आंतरिक योगमार्ग में इसी शब्द को शिव तारक मंत्र, अर्थात परमगुरु शिव का तारक मंत्र भी कहा जाता है I

जो शिव तारक मंत्र है, वह अपने मंत्रात्मक और शब्दात्मक स्वरूप में शिव का होता हुआ भी, श्री विष्णु के अवतार श्री राम का ही है I इसलिए योग मार्ग में श्री राम, श्री विष्णु के अवतार होते हुए भी, अपने शब्दात्मक और मंत्रात्मक स्वरूप में परमगुरु शिव ही हैं I इसलिए यौगिक दृष्टिकोण से राम भगवान्, हरिहर भी हैं I

जैसे पर्व के अध्याय जिसका नाम भगवान हरिहर था, उसने बताया गया था कि हरिहर लिंग (शिखर लिंग) से जाकर ही वज्रदण्ड में जाया जाता है और वज्रदण्ड में ही राम नाद का साक्षात्कार होता है, इसलिए राम नाद के साक्षात्कार मार्ग में, हरिहर के लिंगात्मक स्वरूप की वह दशा जो पूर्व के अध्याय में बताई गई थी, वह आएगी ही I

 

आगे बढ़ता हूँ…

उस वज्रदण्ड चक्र में जाते समय, जो राम शब्द सुनाई देता है, वह दो शब्दों से बना हुआ पाया जाता है और जहाँ यह दोनों शब्द बिलकुल पृथक से होते हुए भी, आपस में योग लगा कर बैठे हुए होते हैं, इसलिए यह दोनों शब्द एक साथ ही सुनाई देते हैं I

 

तो अब इन दोनों शब्दों के स्वरूप को बताता हूँ…

  • रा का शब्द, रा का शब्द क्या है, रा शब्द का अर्थ, रा शब्द का वज्रदण्ड से नाता, रा का शब्द और रकार मार्ग, राम और रकार, …

मस्तिष्क से ऊपर जो वज्रदण्ड होता है, उसका शब्द रा होता है I इसलिए जब चेतना उस वज्रदण्ड चक्र में प्रवेश कर जाती है, तब ही यह रा का शब्द सुनाई देता है I

यह रा का शब्द बहुत विकराल सा ही होता है I ये इतने उच्च स्वर का होता है कि इस नाद से साधक के मन, बुद्धि, चित्त और अहम्, चारों के चारों स्तंभित से ही हो जाते हैं I

इस रा के स्वर में रा का शब्द कानफोड़, नाड़ीतोड़, अतिभयावह, मन बुद्धि चित्त और अहम् को झंझोड़ने वाला, प्राणों को उत्तेजित करने वाला और बहुत लम्बा सा होता है, और यह शब्द रररररराआIIII ऐसा सुनाई देता है I यह रा का शब्द बहुत विकराल ऊर्जाओं को धारण करा हुआ है I यह शब्द की ऊर्जा साधक के भीतर जो सूक्ष्म और दैविक जगत हैं, उन दोनोंको झंझोर के ही रख देता है I

इस राम नाद के साक्षात्कार में ऐसा भी लगता है जैसे यह रा का शब्द,  उस वज्रदण्ड के भीतर से जाती हुई साधक की चेतना के बहुत ही समीप है I

इस शब्द का नाता हिरण्यगर्भ ब्रह्म से है, और इसी शब्द का नाता सूर्य देव से भी है I इसी शब्द को खखोल्काय नामक शब्द से भी दर्शाया गया है I

इसी शब्द को मिस्र की प्राचीन सभ्यता में सूर्य देव से भी जोड़ा गया था I लेकिन उस सभ्यता में एक त्रुटि हो गई थी, कि उन्होंने इसका वर्ण सुनहरा नहीं, बल्कि लाल वर्ण का बताया था I ऐसे होने के कारण वह सभ्यता इस शब्द को उचित प्रकार से धारण नहीं कर पाई थी I और जैसे-जैसे वह सभ्यता आगे बढ़ती है, वैसे वैसे इस त्रुटि के कारण उस सभ्यता की सूक्ष्म ऊर्जाओं में ही विकृति आ गई थी I और इसी त्रुटि के कारण जो विकृति आया था, वह आगे चलकर उस सभ्यता के नाश का कारण भी बन गई थी I इसलिए जब्कि अपने समय की वह मिस्र की सभ्यता और साम्राज्य बहुत बलवान था, किन्तु इस एक अकेलि त्रुटि से उस सभ्यता का जो नाश हुआ था, वह लगभग समूल नाश जैसा ही था I

 

  • मममम शब्द क्या है, मममम शब्द का अर्थ, मममम शब्द का प्रकृति से नाता, मममम शब्द का ब्रह्माण्ड से नाता, म शब्द क्या है, म शब्द का अर्थ, …

राम नाद के साक्षात्कार में यह शब्द जो मममम जैसा सुनाई देता है, और यह एक शान्ति दायक शब्द है I

वेद और योग मनीषियों ने इस शब्द को ही ब्रह्मनाद कहा है I और इसी शब्द को ॐ का तीसरा बीज, माकर भी कहा गया है I

इस राम नाद के साक्षात्कार में जब साधक की चेतना वज्रदण्ड चक्र से जा रही होती है, तब ऐसा भी लगता है जैसे यह मममम का शब्द, उस वज्रदण्ड के बाहर से आ रहा है, और ऐसा भी लगता है, जैसे यह शब्द बहुत सुदूर से ही आ रहा है I

इस मकार के साक्षात्कार में, अर्थात ब्रह्मनाद के साक्षात्कार में एक विशेषता भी है, कि यदि इसका किसी साधक ने एक बार भी साक्षात्कार कर लिया, तो आगामी किसी भी समय में जब भी वह साधक शांत चित्त होगा, तब यह ब्रह्मनाद उसे सुनाई देने लगेगा, और उस साधक को ऐसे भी प्रतीत होगा, जैसे यह नाद उस साधक की काया के भीतर से ही स्वप्रकट हो रहा है I

यह ब्रह्मनाद इसका प्रमाण भी है, कि साधक का ब्रह्माण्ड योग सिद्ध हुआ है I और क्यूँकि ब्रह्माण्ड योग का मार्ग भी ब्रह्माण्ड धारणा ही होता है, इसलिए यह मकार का नाद इस बात का प्रमाण भी होता है कि उस साधक की ब्रह्माण्ड धारणा भी सिद्ध हुई है I

 

  • रा और मममम की योगदशा ही राम नाद है, राम नाद में रा शब्द और मममम शब्द का योग होता है,

उस सुनहरे वज्रदण्ड में जब साधक की चेतना गति कर रही होती है और जब साधक रा और मममम शब्दों को एक साथ और एक ही समय पर सुनता है, तब ही वह राम नामक शब्द को जान पाता है I

और क्यूँकि मानव इतिहास में इस योगदशा को बहुत कम साधक ही जाने हैं, और क्यूंकि इसको जानकार मृत्यूलाभ न करने वाले साधकगण अतिविरले ही होते हैं, इसलिए किसी भी लोक में इस राम के शब्दात्मक स्वरूप के जीवित ज्ञाता बहुत कठिनाई से ही मिलते हैं और यदि मिलेंगे भी, तो वह बहुत बड़े समय अंतराल के पश्चात ही मिलेंगे I

जबकि अपनी साधनाओं में योगीजन साधरणतः राम भगवान् का अथवा उनके साकेत लोक का तो साक्षात्कार कर लेते हैं, किन्तु राम शब्द के नाद रूप के पूर्ण साक्षात्कारी अतिविरले ही होते हैं I

मिस्र की सभ्यता जिसके बारे में पूर्व में बताया था, उसके पास रा शब्द का ज्ञान तो था, किन्तु मममम शब्द का नहीं था I और ऐसा होने के कारण वह सभ्यता राम नाद को भी नहीं जानती थी I और ऐसा होने के कारण वह अपने उत्कर्ष पथ में पूर्ण भी नहीं थी I और यह भी एक कारण बना था, जिससे उसका समूल सा ही नाश हो गया था I

राम नाद की दशा ज्ञान सिद्धांत, चेतन सिद्धांत और क्रिया सिद्धांत की योगावस्था को भी दर्शाती है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि इसी नाद के शब्दात्मक स्वरूप में ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति और चेतन शक्ति, तीनों ही अपनी अद्वैत योगावस्था में पाई जाती है I और ऐसी अद्वैत योगदशा होने के कारण, यह राम नाद भी अद्वैत मार्ग ही है I

योगमार्ग से राम नाद का साक्षात्कार भाव विह्वल करने वाला (अर्थात साधक की भाव दशा के दृष्टिकोण से कुचल डालने वाला) अनुभव (अनुभूति) ही है, इसलिए कोई भी साधक जो इस नाद से गया होगा वह यह तो बिलकुल नहीं बोल पाएगा, कि यह हुआ ही नहीं है I और योगमार्ग से राम नाद के साक्षात्कार के पश्चात कोई यह भी नहीं बोल पाएगा, कि मुझे पता नहीं है… कि यह हुआ है या नहीं I

यह अनुभव इतना प्रभावशाली होता है कि यदि कोई साधक उस घोर तमोमयी गहरी सुसुप्ति में भी हो और वह इस मार्ग पर चला जाए, तो वह भी जान जाएगा कि यह अनुभव उसको हुआ है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

वज्रदण्ड के भीतर जो राम नाद है, उसपर साधक की चेतना का योगमार्ग से गमन को ही रकार कहा गया है… किन्तु शब्द ज्ञान के दृष्टिकोण से यह रकार शब्द का नाता राम के रा शब्द से ही होता है I

इसलिए रकार मार्ग पर, पूर्ण ब्रह्म स्वरूप में राम का शब्द है, और शब्द ब्रह्म के सीमित रूप में रा का शब्द I

जबकि कुछ पूर्व कालों के योगी कह गए कि रा का शब्द देवी सत्ता का है और म का शब्द देव सत्ता का, लेकिन रकार मार्ग पर (अर्थात वज्रदण्ड के भीतर) जो साक्षात्कार होता है, उसमें रा का शब्द हिरण्यगर्भ ब्रह्म का (अर्थात देव सत्ता का) और म का शब्द प्रकृति (अर्थात शक्ति या देवी सत्ता) का है I

और रकार मार्ग में ऐसा होने पर भी, ॐ मार्ग में यही म का शब्द, त्रिदेव का भी द्योतक है… और यही म का शब्द उस ब्रह्मतत्त्व का भी द्योतक है, जो प्रणव कहलाता है और जो देव और देवी दोनों ही सत्ताओं का समानरूपेण और पूर्णरूपेण द्योतक होता है I

 

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मुख्यतः अष्ट चक्र होते हैं, जिनमें से सप्त चक्र शरीर के भीतर होते हैं और आठवाँ चक्र शरीर से बाहर होता है I

लेकिन अब राम नाद के स्थान को जाने से पूर्व, इन चक्रों को बताना पड़ेगा I

  • मूलाधार चक्र… यह मेरुदण्ड के सबसे नीचे के भाग की ओर होता है I और इसका स्थान लिंग और गुदा के मध्य में, गुदा के अति समीप ही होता है I इसी चक्र का चित्त और उसके भीतर बसे हुए संस्कारों से नाता होता है, इसलिए यह मूल कमल भी कहलाता है I पञ्च सरस्वती विद्या में इस चक्र की दिव्यता भारती सरस्वती हैं I इस चक्र के देवता कार्य ब्रह्म हैं I
  • स्वाधिष्ठान चक्र… यह मूलाधार से कोई 3-4 ऊँगली ऊपर की ओर होता है I यह काम कमल भी कहलाता है I मुख्यतः इसी चक्र का प्राण से नाता होता है और पञ्च प्राण में भी इसका नाता मुख्यतः व्यान प्राण से होता है I पञ्च सरस्वती विद्या में इस चक्र की दिव्यता भारती विद्या सरस्वती हैं I इस चक्र के देवता निराकार सदानंद ब्रह्म हैं, जिनको सच्चिदानंद भी कहा जाता है I
  • मणिपुर चक्र… यह नाभि क्षेत्र में, मेरुदण्ड में ही होता है, इसलिए यह नाभि कमल भी कहलाता है I इसी से मन का नाता होता है और इसी चक्र से थोड़ा सा आगे की ओर अमृत कलश होता है I मन, हृदय या मस्तिष्क में नहीं, बल्कि नाभि क्षेत्र में ही होता है I मन के देवता सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति हैं I पञ्च विद्या सरस्वती में इस चक्र की दिव्यता भारती विद्या हैं I इस चक्र के देवता हिरण्यगर्भ ब्रह्म है I
  • अनाहत चक्र… यह हृदय क्षेत्र में होता है, इसलिए यह हृदय कमल भी कहलाता है I पञ्च सरस्वति में इस चक्र की दिव्यता शारदा सरस्वति हैं I इस चक्र के देवता परब्रह्म हैं I
  • विशुद्ध चक्र… यह कंठ क्षेत्र में होता है, इसलिए यह कंठ कमल भी कहलाता है I पञ्च विद्या में इस चक्र की दिव्यता पञ्च मुखा गायत्री (गायत्री सरस्वती) हैं I इस चक्र के देवता विश्वरूप ब्रह्म हैं I
  • आज्ञा चक्र… यह भ्रूमध्य में होता है, इसलिए यह नैन कमल भी कहलाता है I इस चक्र के देवता अर्धनारिश्वर हैं, जो सगुण आत्म हैं I पञ्च विद्या में इस चक्र की दिव्यता सावित्री सरस्वती हैं I
  • सहस्रार चक्र… यह मस्तिष्क से ऊपर और मूलतः थोड़ा आगे के भाग में होता है I क्यूंकि यह शिखर पर ही होता है, इसलिए यह शिखर कमल भी कहलाता है I और क्यूँकि मस्तिष्क के ऊपर और थोड़ा आगे के भाग की कपाल की हड्डी में बसे हुए ब्रह्मरंध्र को पार करके शून्य का साक्षात्कार होता है, इसलिए यह शून्य चक्र या शून्य कमल भी कहलाता है I पञ्च सरस्वती विद्या में इस चक्र की दिव्यता ब्रह्माणि सरस्वती हैं I इस चक्र के देवता पूर्णब्रह्म हैं I
  • वज्रदण्ड से आगे निरालंब चक्र… यह आठवाँ चक्र है, जो सहस्रार के शिवरंध्र नामक स्थान से ऊपर जो सुनेहरा दण्ड है और जो वज्रदण्ड कहलाता है, उससे भी आगे (अर्थात ऊपर) होता है I क्यूंकि यह कमल आधार रहित होता है, अर्थात उस शून्य ब्रह्म में ही लटका सा रहता है इसलिए इसको निरालंब चक्र और निराधार चक्र कहा गया है I पञ्च विद्या सरस्वती विद्या में इस चक्र की दिव्यता ब्रह्माणि विद्या विद्या हैं I इस चक्र के देवता शून्य ब्रह्म हैं I

 

तो अब इन अष्ट चक्रों को आधार बनाकर, राम नाद के साक्षात्कार स्थान को बताता हूँ…

जब साधक की चेतना, सहस्रार को शिवरंध्र से स्थान से पार करके उस सुनहरे दण्ड में चली जाती है, जो शिवरंध्र से ऊपर की ओर (अर्थात कपाल से बाहर और ऊपर की ओर) होता है, तब वह चेतना राम नाद का शब्दात्मक और प्रकाश रूप में साक्षात्कार करती है I इस सुनहरे दण्ड को वज्रदण्ड कहा गया है और इसी वज्रदण्ड में ही राम नाद का साक्षात्कार होता है I

यह वज्रदण्ड ऊपर के चित्र में एक सुनहरे डंडे के समान, सर के ऊपर दिखाया गया है और यह सुनहरा वज्रदण्ड शून्य में ही निवास करता है, अर्थात इसको शून्य ने ही घेरा हुआ होता है, और जहाँ वह शून्य भी शून्याकाश सरीका होता है I

इस साक्षात्कार में पाया जाता है कि राम नाद, शिवरंध्र से ऊपर और निरालंब चक्र से नीचे तक ही साक्षात्कार होता है I

यह राम नाद न तो वज्रदण्ड से नीचे जो सहस्रार है, उसमें साक्षात्कार होगा और न ही वज्रदण्ड से आगे (या ऊपर) जो निरालंब चक्र है, उसमें साक्षात्कार होगा I

इसका यह भी अर्थ हुआ, कि राम का शब्द केवल वज्रदण्ड की सीमा में ही साक्षात्कार होता है I

 

राम नाद से आगे की दशा, राम के शब्द से आगे की दशा, राम नाद से आगे शून्य ब्रह्म है, राम शब्द से आगे शून्य ब्रह्म,

राम नाद से आगे वह शून्य है जो अनंत होता है, और वह अनंत भी है जो शून्य ही होता है I

वह अनंत जो शून्य है और वह शून्य जो अनंत ही है, उसको ही शून्य ब्रह्म कहा जाता है I यह शून्य ब्रह्म श्रीमन नारायण को ही दर्शाता है और इसके देवता भी विराट कृष्ण ही होते हैं I

वह विराट कृष्ण रात्रि के समान काले वर्ण के होते हैं और उनका आकार इतना बड़ा होता है, की यदि साधक की चेतना उनके हास्त पर ही बैठ जाए, तो वह हस्त हाती के सामान बड़ा होगा और वह चेतना चींटी के समान छोटी I

 

राम नाद का मूल नाता, राम के शब्द का मूल नाता, … राम का ॐ से नाता, राम ही ब्रह्म हैं, राम और ब्रह्म का नाता, राम और ॐ का नाता, राम और ब्रह्म, राम और ॐ, राम नाद और ॐ नाद, …

जैसे पूर्व में बताया था, कि राम का शब्द दो बीजों से बना है, जो रा और मममम हैं I

इनमें दोनों बीजों में से…

  • रा का शब्द… सुनहरे वज्रदण्ड का होता है और जहाँ वह सुनहरा वर्ण उन्ही कार्य ब्रह्म का द्योतक है, जिनका नाद ॐ नाद का दोसरे बीज है और जो उकार कहलाता है… और जो अोोो… ऐसा सुनाई देता है I
  • मममम का शब्द… ॐ नाद के तीसरे बीज मकार का द्योतक है I

इसलिए योगमार्ग में शब्द के दृष्टिकोण राम का शब्द ॐ की दशा को ही दर्शाता है I

और ऐसा होने पर भी राम के शब्दात्मक स्वरूप का साक्षात्कार और उस राम नाद पर गमन, ॐ के अकार, उकार, मकार, शुद्ध चेतन तत्त्व (ब्रह्मतत्त्व) और ओमकार के साक्षात्कार के पश्चात ही होता है और वह भी तब, जब साधक की चेतना ॐ के ऊपर के बिंदु में ऐसी लय हो जाती है कि इसके पश्चात वह स्वयं ही स्वयं को देख नहीं पाती है I

क्यूंकि ॐ लिपिलिंगात्मक और शब्दलिंगात्मक ब्रह्म भी होता है, इसलिए योगमार्ग में राम का शब्द जो ॐ का योगपर्यायवाची और योगसमानार्थक शब्द ही है, वह भी उन्हीं ब्रह्म का द्योतक है I

 

राम नाद के साक्षात्कार मार्ग में दशावतार, राम नाद और दशावतार, …

राम नाद साक्षात्कार का मार्ग मूलाधार से प्रारम्भ होकर, सहस्रार तक जाकर, निरालंब चक्र में ही पहुंचा देता है I

तो अब इस मार्ग के अनुसार को दशावतार की दशाएं होती हैं, अब उनको बताता हूँ …

  • मूलाधार चक्र… यहाँ मत्स्य अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • स्वाधिष्ठान चक्र… यहाँ कूर्म अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • मणिपुर चक्र… यहाँ वराह अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • अनाहत चक्र… यहाँ नरसिंह अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • विशुद्ध चक्र… यहाँ वामन अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • आज्ञा चक्र… यहाँ परशुराम अवतार का साक्षात्कार होता है I
  • ब्रह्मरंध्र के भीतर का ललाना चक्र… यहाँ राम अवतार के रामलला स्वरूप का साक्षात्कार होता है I
  • निरालंब चक्र से आगे के शून्य ब्रह्म… यहाँ कृष्ण अवतार के विराट स्वरूप का साक्षात्कार होता है I

और बालकृष्ण का साक्षात्कार आकाश गंगाओं का जो अंधकारमय, अतिऊर्जावान और उफान मारते हुए सागर के समान मध्य भाग है, उसमें होता है I

और इस स्थान पर वह बालकृष्ण गोलमटोल से दिखाई देते हैं, उनका शरीर हलके नीले वर्ण का होता है जिसमें पिङ्गल वर्ण की धारियां होती है, वह एक बांस की लकड़ी जैसी टोकरी में टांग पर टांग चढाकर और अपने हाथों का ही तकिया बनाकर, पीपल के पत्तों के समान पत्तों से निर्मित गद्दे पर मंदहास धारण किए हुए जो भी साधक उनके लोक में पहुँच जाता है, उसको प्रेममय दृष्टि से देखते रहते हैं I उन बालकृष्ण से सुन्दर बालक तो कभी हुआ ही नहीं I

इस परकाया प्रवेश से प्राप्त हुए जन्म से पूर्व, जब मैं माँ सावित्री सरस्वती के आदेशानुसार इस सूर्य लोक से संबद्ध आकाश गंगा में जन्म लेने के लिए प्रतीक्षा कर रहा था, तब मैंने बालकृष्ण को इसी आकाश गंगा के मध्य भाग में बसे हुए अतिऊर्जावान, उफान मारते हुए सागर में देखा था I

और जन्म लेने के पश्चात भी, एक सूक्ष्म गमन में जब मैं उनके समक्ष चला गया, तो भी वह बालकृष्ण उसी बाँस जैसी लकड़ी की टोकरी पर लेटे लेटे मुझे प्रेम दृष्टि से ही देखते रहे I

और इन दोनों बार, जब मैं उनकी टोकरी के समीप खड़ा हुआ था और उसको देख रहा था, तो कुछ ही समय में उनकी टोकरी, जिसमें वह लेटे हुए थे, वह उस उफान मारते हुए अन्धकारमय ऊर्जाओं के सागर में आगे की ओर जाने लगी और कुछ ही समय में वह इतनी गति पकड़ गई, कि मैं उस दशा की ऊर्जाओं के उफान के कारण, उनका पीछा ही नहीं कर पाया I इसलिए इन दोनों बार, वह बालकृष्ण उनकी टोकरी सहित, उस अंधकारमय और उफान मारते हुए ऊर्जावान सागर में लुप्त भी हो गए थे I

  • जब चेतना निरालंब चक्र से आगे जाकर पुनः उसी निरालंब पर लौटती है, तब बुद्धावतार के सुनहरे सिद्ध शरीरी स्वरूप का साक्षात्कार होता है I
  • दसवें अवतार (कल्कि) का पता नहीं… जब आ जाएंगे, तब ही बतला पाऊंगा I वैसे वह कल्कि श्री विष्णु के अवतार होते हुए भी, वास्तव में हिरण्यगर्भात्मक ही होंगे I ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि उस आत्ममार्ग में, जिसका आलम्बन लेकर में यह सब बताया हूँ, बुद्धावतार की दशा के पश्चात, जो भी दशाएं आती हैं, वह हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म से ही संबद्ध होती हैं I और जहाँ वह हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म उनके अपने लिंग चतुष्टय स्वरूप में भी साक्षात्कार होते हैं I लेकिन यह तो आत्ममार्ग के अनुसार मेरे साक्षात्कारों के अनुसार मेरा कथन है I

 

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आंतरिक योगमार्ग के साक्षात्कारों के दृष्टिकोण से…

  • जिससे आगे सहस्र रा का शब्द सुनाई दे, वह सहस्रार I
  • जिससे आगे जाकर साधक की चेतना ऐसा पाए कि रा का शब्द सहस्र सिंहों की दहाड़ के समान है, वह सहस्रार I
  • जिससे आगे रा का शब्द एक होता हुआ भी, ऐसा प्रतीत हो कि वह सहस्र मुखों से पुकारा जा रहा है, वह सहस्रार I
  • जिससे आगे एक ही समय पर, एक ही रा का शब्द बोला हुआ भी, उसकी शक्ति सहस्र गुना होकर सुनाई दे, वह सहस्रार I
  • जिससे आगे रकार मार्ग प्रारंभ होता है, और जहाँ उस रकार की शक्ति सहस्र गुना ही हो जाती है, वह सहस्रार I
  • जो सहस्र रा नामक नाद रूपी शक्ति की गद्दी ही हो, वह सहस्रार I
  • जिस स्थान (या आसन) से रा शब्द सहस्र गुना शक्तिमय हो जाए, वह सहस्रार I जो सहस्र रा का स्थान (या आसन) हो, वह सहस्रार I
  • यहाँ हो सहस्र का शब्द कहा गया है, वह हजार भी होता है और असंख्य को भी दर्शाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

इस रा के शब्द में इतनी भयंकर दिव्यता (शक्ति) है, कि वह एक ही झटके में साधक की चेतना को समस्त बंधनों से अतीत कर सकता है I

और इस रा के शब्द के साथ साथ सुनाई देता हुआ ममम का शब्द इतना शांतिदायक होता है, कि यह रा शब्द की ऊर्जाओं में फँसी हुई चेतना को विचलित भी नहीं होने देता है I

इसलिए इस राम शब्द में, जहाँ रा का शब्द सहस्र सिंहों की दहाड़ के समान होता है, वहीँ मममम का शब्द जो रा के शब्द के साथ साथ ही सुनाई देता है, वह शांतिदायक होता है I

इसलिए इस राम के शब्द के दोनों बीज जो रा और मममम हैं, एक दुसरे के गुणों के सन्तुलक होते हैं I

इसी स्वयं संतुलित अवस्था में बसाकार, साधक की चेतना उस वज्रदण्ड को पार करती है, जिसके भीतर यह राम नाद अपने द्विबीज स्वरूप में ही चलित हो रहा होता है I

और जैसे ही वह चेतना वज्रदण्ड को पार करती है, वह अष्टम चक्र अर्थात निरालंब चक्र पर ही पहुँच जाती है, जो चार पत्तों वाला चक्र है और जिसके चार पत्ते ब्रह्मलोक के ऊपर के चार लोकों के समान ही व्यवस्थित होते हैं, अर्थात उन चार पत्तों में से तीन एक ओर होते हैं और चौथा उलटी ओर (अर्थात विपरीत दिशा की ओर) होता है और इसी दशा में ब्रह्मलोक के ऊपर के चार लोक भी व्यवस्थित होते हैं I

 

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शिव शक्ति योग से जो उनका पुत्र उत्पन्न होता है, वह शब्द है जो राम का है और यही शब्द उसके माता पिता के वास्तविक स्वरूप को दर्शाता है I

पिता शिव और माँ शक्ति की योगदशा में जो शब्द उत्पन्न हुआ था, वही राम नाद था जो शिव तारक मंत्र कहलाया था I इसी शब्द को बाइबिल नामक ग्रन्थ में पिता, माता और पुत्र के नाम से दर्शाया गया है I

लेकिन यह ज्ञान, कि शब्द पुत्र है केवल बाइबिल तक ही सीमित नहीं है I कई सारी आदिवासी सभ्यताओं में भी ऐसा ही माना जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

इस योगदशा से जो शब्द उत्पन्न हुआ था, वह भी ब्रह्म ही था I

ऐसा इसलिए था, क्यूंकि शब्द की अभिव्यक्त के मूल में ब्रह्म (शिव) और ब्रह्मशक्ति (शक्ति) की योगदशा थी, और अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक भी नहीं होती I

इसके अतिरिक्त ब्रह्म रचना में स्वयंप्रकट हुए तन्मात्रों के दृष्टिकोण से शब्द ही प्रथम था, और यह शब्द उन ब्रह्म स्वरूप शिव और ब्रह्मशक्ति (अर्थात ब्रह्म की दिव्यता) स्वरूप शक्ति की योगदशा से ही अभिव्यक्ति हुआ था, और क्यूंकि यह योगदशा अद्वैत ही थी (अर्थात इसमें शिव या ब्रह्म ही शक्ति थे और शक्ति या ब्रह्म की दिव्यता ही शिव थी) इसलिए वह शब्द भी ब्रह्म ही था I

और क्यूंकि यह शब्द भी राम नाद का स्वरूप मे ही प्रकट हुआ था, इसलिए वह नाद ब्रह्म स्वरूप में ही था I

ऐसे प्रकट होने के कारण, अपनी ऐसी शब्द ब्रह्म (या नाद ब्रह्म) की दशा में वह शब्द भी श्रुति रूप में था, और जहाँ यह श्रुति भी शब्द की उच्चतम दशा ही था, जो शिव के तारक मंत्र के स्वरूप में थी I

 

शिव शक्ति योग ही राम नाद है, राम नाद ही शिव शक्ति योग है, शिव शक्ति योग से राम नाद का साक्षात्कार, राम नाद से शिव शक्ति योग का साक्षात्कार, …

राम नाम का साक्षात्कार मार्ग शिव शक्ति योग है, जो साधक की काया के भीतर होता है I और शिव शक्ति योग का साक्षात्कार मार्ग भी राम नाद के साक्षात्कार से होकर ही जाता है, और जहाँ वह राम नाद भी साधक के वज्रदण्ड के भीतर ही सुनाई देता है I

शक्ति शिव योग, राम नाद का कारक है और इसके अतिरिक्त, राम नाद भी शक्ति शिव योग का  ही कारक हैI

यही कारण है कि इन दोनों में से, केवल एक जाना भी नहीं जाएगाI यदि कोई साधक इसको जानेगा (अर्थात इसका साक्षात्कार करेगा), तो दोनों को ही एक के बाद एक, ऐसे जानेगा I

इसलिए, जिसने ऐसा नहीं जाना, उसने इस योग और इस नाद को पूर्णरूपेण जाना हुआ है, ऐसा माना ही नहीं जा सकता है I

 

शिव शक्ति की अद्वैत योगदशा, शिव शक्ति का अद्वैत योग, राम नाद में शिव शक्ति की अद्वैत योगदशा, शिव शक्ति की अद्वैत योगदशा ही राम नाद है, राम नाद और मुक्तिमार्ग, …

जब शिव शक्ति का योग हुआ था, तब उन शिव शक्ति की दशा अद्वैत ही थी, अर्थात उस योगदशा में शिव ही शक्ति थे और शक्ति ही शिव थी, इसलिए ऐसी दशा से स्वयं प्रकट हुआ राम का शब्द भी अद्वैत ही था I यही इस राम नाद की अद्वैत योगदशा का द्योतक है I

और क्यूँकि अद्वैत ही कैवल्य मुक्ति कहलाता है, इसलिए यह राम नाद ही कैवल्य मोक्ष था I यही कारण है कि जब साधक इस शब्द को साक्षात्कार करता है, तब वह साधक कैवल्य मुक्ता हुए बिना भी नहीं रह पाता I

 

आगे बढ़ता हूँ और इस शब्द की महिमा का एक और बिंदु बताता हूँ I

यदि साधक इस शब्द का साक्षात्कार…

  • अपनी मृत्यु शय्या पर साक्षात्कार करेगा, तो वह विदेहमुक्त हो जाएगा I
  • और यदि इस शब्द को साक्षात्कार करके और इस शब्द की दशा से जाकर भी उस साधक के देहावसान नहीं होगा, तो वह साधक जीवन्मुक्त होकर ही रहेगा I

लेकिन यह शब्द भी तब ही साक्षात्कार होगा, जब साधक शिव शक्ति योग को सिद्ध करेगा I और वह साधक शिव शक्ति योग को भी तब ही सिद्ध करेगा, जब वह इस शब्द के साक्षात्कार का पात्र बनेगा I

इसलिए राम नाद का साक्षात्कार और शिवः शक्ति योग एक दुसरे के पूरक ही हैंI और जहाँ यह शक्ति शिव योग भी साधक की काया के भीतर ही होता है… न कि कहीं और I

 

शक्ति शिव योग के सिद्ध अतिदुर्लभ ही होते हैं, राम नाद के सिद्ध योगीजन योगी अतिदुर्लभ हैं, राम नाद ही भगवान राम की मूल सिद्धि है, आंतरिक शिव शक्ति योग ही शिव और शक्ति की मूल सिद्धि है, …

ब्रह्माण्डीय इतिहास में जैसा हुआ है, अब उस सत्य को बताता हूँ…

समस्त जीवों में से कुछ ही जीव साधक हुए हैं I

उन साधकगण में से कुछ ही वास्तविक योगी हुए हैं I

उन योगीजनों में से कुछ ही इस श्रंखला के साक्षात्कारी हुए हैं I

उन साक्षात्कारियों में से कुछ ही हुए हैं जो इसको जानकर जीवित रहे हैं I

उन जीवीत में से कुछ ही हुए हैं, जिन्होंने इसके बारे में किसी और को बताया है I

 

इसलिए ऐसे योगीजन जो इस अध्याय श्रंखला को जानकर (अर्थात साक्षात्कार करके) भी जीवित रहते हैं, और इसके ज्ञान को दुसरे साधकगणों के लिए लिखकर या बोलकर ही देहावसान करते हैं, वह ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में अतिदुर्लभ ही हैं I ऐसे योगीजन काल की प्रेरणा से और कालशक्ति के आलम्बन से ही ऐसा कर पाते हैं, क्यूंकि यदि यह प्रेरणा ही नहीं होगी, तो कोई भी योगी ऐसा कर ही नहीं पाएगा I

और ऐसे योगीजनों के द्वारा प्रशस्त उत्कर्ष मार्ग भी आगामी समय की मानव जाती का मूल पथ ही हो जाता है और यही इस अध्याय श्रंखला की महिमा भी है I पर क्यूँकि ब्रह्माण्डीय इतिहास में ऐसे योगीजन अधिकांशतः हुए ही नहीं हैं, इसलिए यह ज्ञान जो इस अध्याय श्रृंखला में बताया जाएगा, वह एक अतिदुर्लभ ज्ञान ही है I

 

राम नाद के कुछ बिंदु, साधक के भीतर बसे हुए भगवान् राम, साधक की काया में भगवान् राम, राम ही आत्मा हैं, राम नाद ही आत्मा राम का शब्दात्मक स्वरूप है, …

  • आत्मा को ही राम कहते हैं, और उस आत्मा राम के शब्द रूप को ही नाद ब्रह्म या शब्द ब्रह्म कहते हैं I
  • साधक की काया के भीतर, उन आत्मा राम का गंतव्य शब्दरूप ही राम का नाद है I इसलिए अपने शब्दात्मक स्वरूप में, राम का नाद ही राम है, और वह शब्द रूप के राम ही साधक का शब्दात्मा हैं, अर्थात शब्द रूपी आत्मा हैं I
  • और क्यूँकि आत्मा भी वह ब्रह्म होता है, जिसकी अभिव्यक्ति पिण्ड ब्रह्माण्ड है, इसलिए यही राम नामक शब्द जो साधक की काया के भीतर सुनाई देता है, वह मुक्तिमार्ग को भी दर्शाता है, और जहाँ वह मुक्तिमार्ग भी ब्रह्म की समस्त अभिव्यक्ति (अर्थात जीव जगत) से अतीत लेकर जाता है I
  • और जहाँ ऐसे राम नाद के मुक्तिमार्ग पर गति करते हुआ साधक यह भी जान जाता है, कि यही राम का शब्द साधक की काया के भीतर बसी हुई दिव्यताओं का ही है, और जीव जगत की दिव्यताओं का भी है, और जहाँ यह दोनों दिव्यताएं भी एक ही हैं I ऐसे साक्षात्कार से ही वह साधक जान जाता है, कि राम नाद ही जीवों का और जगत का शब्दात्मा है, अर्थात शब्द रूपी आत्मा है I
  • और इसी ज्ञान से साधक यह भी जान जाता है कि राम का शब्द रूप ही जीव और जगत की योगदशा नामक सिद्धि का द्योतक है I इससे साधक यह भी जान जाता है कि राम नाद पिण्ड ब्रह्माण्ड नामक योगसिद्धि का भी एक द्योतक ही है I
  • और इससे आगे जो जाना जाता है, उसमें साधक यह भी जानता है कि आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आत्मा हैं, आत्मा को ही ब्रह्म कहते हैं और ब्रह्म को ही आत्मा कहा जाता है I
  • और जहां वह आत्मा रूपी राम ही वह आत्मा राम है, जो साधक के आत्मस्वरूप में भी ब्रह्म कहलाया है I और इसके अतिरिक्त वह ब्रह्म रूपी राम ही साधक का वास्तविक स्वरूप, अर्थात आत्मस्वरूप कहलाया है I इसलिए इस साक्षात्कार से साधक यह भी जान जाता है, कि राम ही साधक का आत्मस्वरूप ब्रह्म है… और वही राम ऐसे साधक का ब्रह्मस्वरूप आत्मा भी हैं I

ऐसा होने के कारण ही राम नाद स्वरूप शब्द ब्रह्म को प्राप्त हुए योगीजनों और उत्कृष्ट साधकगणों की साधना सिद्धियों के दृष्टिकोण से…

आत्मस्वरूप में राम ही ब्रह्म हैं I

ब्रह्मस्वरूप में राम ही आत्माराम हैं I

राम ही आत्मा हैं, जो ब्रह्म कहलाता है I

ज्ञानी योगी का शब्दात्म स्वरूप राम नाद है I

हिरण्यमय आत्मा का सगुण साकार रूप रामलला है I

साक्षात्कारी योगी का हिरण्मय आत्मा ही राम कहलाता है I

योगी का अष्टचक्र और नवद्वार वाला स्थूलदेह अयोध्यापुरी है I

आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत योग का हिरण्यगर्भात्मक स्वरूप राम हैं I

आत्मा और ब्रह्म की ब्रह्माण्डीय योगदशा का शब्दात्मक स्वरूप ही राम नाद है I

जिस साधक नै योगमार्ग से राम नाद का साक्षात्कार करा होगा, वाही ऊपर बताए गए साँकेतिक बिन्दुओं का वास्तविक अद्वैत अर्थ जान पाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

  • राम नाद साधक के भीतर बैठे हुए भगवान राम का नाद ब्रह्म स्वरूप है, अर्थात यह राम नाद साधक के भीतर बसे हुए भगवान् राम का शब्दात्मक स्वरूप ही हैं I
  • वैसे तो इस राम के शब्द का नाता साधक की काया के भीतर बसे हुए जीव जगत से ही होता है, इसलिए इस शब्द का नाता साधक के समस्त चक्रों, नाड़ियों… और उन चक्रों और नाड़ियों की ऊर्जात्मक दिव्यताओं से भी होता ही है I
  • लेकिन ऐसा होने पर भी मूलतः इस राम नाद का नाता साधक के वज्रदण्ड चक्र से ही है I और ऐसा होने पर भी राम नाद वज्रदण्ड में ही चलित होता है, और ऐसे चालित होकर, यही राम नाद सप्तचक्र में व्यापक सा भी प्रतीत होता है I

 

राम नाद के आंतरिक योगमार्ग और उसके साक्षात्कार से वैदिक महावाक्यों का ज्ञान भी स्वतः ही प्राप्त हो जाता है I तो अब इसको बताता हूँ…

  • जब राम नामक साधक की सगुण आत्मा नील वर्ण की होती है, तब वह यजुर्वेद के महावाक्य अहम् ब्रह्मास्मि को दर्शाती है I

और ऐसी दशा में साधक यजुर्वेद के अघोर ब्रह्म से जाता हुआ, सामवेद के वामदेव ब्रह्म में ही स्थापित हो जाता है I

  • जब वही राम नामक साधक की आत्मा श्वेत या काले (या इन दोनों के मिश्रित) वर्ण की होती है, तब वह सामवेद के महावाक्य तत् त्वम् असि को दर्शाती है I

और ऐसी दशा में साधक सामवेद के वामदेव ब्रह्म से जाता हुआ, अथर्ववेद के तत्पुरुष ब्रह्म में ही स्थापित हो जाता है I

  • जब वही राम नामक साधक की आत्मा लाल वर्ण की होती है, तब वह अथर्ववेद के महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म को दर्शाती है I

और ऐसी दशा में साधक अथर्ववेद के तत्पुरुष ब्रह्म से जाता हुआ, ऋग्वेद के सद्योजात ब्रह्म में ही स्थापित हो जाता है I

  • और जब वही राम नामक साधक की आत्मा प्रकाशमान पीले (अथवा सुनहरे) वर्ण की होती है, तब वह ऋग्वेद के महावाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म को दर्शाती है I

और ऐसी दशा में साधक ऋग्वेद के सद्योजात ब्रह्म से जाता हुआ, सर्ववेद के गंतव्य और वेदातीत, सर्वव्यापक और सर्वसाक्षी निरंग स्फटिक के समान ईशान ब्रह्म में ही स्थापित हो जाता है I और जहाँ वह ईशान नामक ब्रह्म ही निर्गुण निराकार ब्रह्म कहलाए हैं I

  • पञ्च ब्रह्म प्रदक्षिणा मार्ग पर, राम नाद से जाता हुआ यही वास्तविक मुक्तिमार्ग है, जिससे जाकर साधक अंततः उन कैवल्य मोक्ष स्वरूप निर्गुण ब्रह्म में ही स्थापित ही जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

आज कल कुछ योग और वेदमनीषी कहते हैं, कि ब्रह्म को कौन साक्षात्कार कर पाया है? … कोई भी तो नहीं I

लेकिन मेरे मार्ग आंतरिक योगमार्ग के अनुसार, जो मैंने पाया वह ऐसा ही था…

आत्मा ही ब्रह्म है I

ब्रह्म ही ब्रह्म का ज्ञाता है I

ब्रह्म का ज्ञाता ब्रह्म ही होता है I

यदि ब्रह्म को जानना है, तो ब्रह्म ही हो जाओ I

ब्रह्म ही योगी के आत्मस्वरूप में प्रकाशित हो रहा है I

आंतरिक दशा से जो ब्रह्म नहीं, वह ब्रह्म का ज्ञाता भी नहीं होगा I

 

और ऐसे आंतरिक योगमार्ग पर जब ब्रह्म साक्षात्कार होता है, तो उसके पश्चात वह योगी ऐसा ही कहेगा…

ब्रह्म को जानकर जो मानता है कि वह पूर्णरूपेण जानता है, वह अज्ञानी ही है I

ब्रह्म को जानकर जो मानता है कि वह पूर्णरूपेण नहीं जानता है, वही ज्ञानी है I

ऊपर बताए गए दोनों बिंदुओं के कारण…

ब्रह्म को जानकर भी ज्ञानी योगी मान नहीं पाएगा कि वह पूर्णरूपेण जान गया है I

इसलिए ब्रह्म को जानकर भी योगी उस ब्रह्म को पूर्णरूपेण बतला ही नहीं पाएगा I

ऐसा इलसिए होगा क्यूँकि ब्रह्म वाक्यातीत शब्दातीत ग्रंथातीत दशातीत आदि ही है I

ऐसा होने के कारण…

जो योगी ब्रह्म को जानता है, वह अपने साक्षात्कारानुसार बताकर,शांत हो जाएगा I

जो ब्रह्म को नहीं जानता है, वह शांत होने के सिवा, बाकी सब कुछ में जाएगा I

और एक बात कि वह योगी…

जो ब्रह्म द्रष्टा है, वह उतना ही बताएगा, जितना उसने साक्षात्कारों से जाना है I

जो ब्रह्मद्रष्टा नहीं है, वह उस शब्दातीत को बताता हुआ भी मुर्ख ही कहलायेगा I

आगे बढ़ता हूँ…

 

विभिन्न मार्गों में राम का शब्द, राम नाद और विभिन्न मार्ग, …

विभिन्न मार्गों से राम नाद का साक्षात्कार हो सकता है, तो अब उनको बताता हूँ I लेकिन इन सब की विस्तारपूर्वक व्याख्याएं आगे के अध्यायों में ही करी जाएंगी I

  • शिव शक्ति योग, शक्ति शिव योग, … इस योगदशा में राम शब्द का साक्षात्कार होता है I परन्तु ऐसा होने के लिए यह योग साधक की काया के भीतर ही होना होगा I
  • भद्र भद्री योग, भद्री भद्र योग, … इस योगदशा में भी राम नाद का साक्षात्कार होता है I परन्तु ऐसा होने के लिए यह योग साधक की काया के भीतर ही होना होगा I
  • पुरुष प्रकृति योग, प्रकृति पुरुष योग, … इस योगदशा में भी राम शब्द का साक्षात्कार होता है I परन्तु ऐसा होने के लिए यह योग साधक की काया के भीतर ही होना होगा I
  • अर्धनारीश्वर योग, अर्धनारी योग, … इस योगदशा में राम शब्द का साक्षात्कार होता है I परन्तु ऐसा होने के लिए यह योग साधक की काया के भीतर ही होना होगा I
  • चीनी सभ्यता के यिन यांग योग में भी यही नाद साक्षात्कार होता है I
  • किसी भी देव और देवी योग में, जो साधक की काया के भीतर ही होगा, यही राम नाद का साक्षात्कार होगा और यह साक्षात्कार भी तब होगा जब साधक की चेतना वज्रदण्ड चक्र में चली जाएगी… इससे पूर्व नहीं I
  • मनोमय कोष प्राणमय कोष योग, प्राणमय कोष मनोमय कोष योग, … जब भी साधक के मनोमय कोष और प्राणमय कोष का योग साधक की काया के भीतर होगा, तब भी यह राम नाद का साक्षात्कार होगा I
  • प्रयागराज के क्षेत्र में भी जब साधक शिवमय (ब्रह्ममय) होकर प्राणों को त्यागता है, तब भी साधक इसी राम नाद के साक्षात्कार से जाकर, मोक्षगति को प्राप्त होता है I
  • यूनान की प्राचीन सभ्यता का ऑरोबोरोस, प्राचीन फ़ारसी सभ्यता का फ़रवहर, यहूदियों की प्राचीन सभ्यता का डेविड का सितारा (अर्थात स्टार ऑफ़ डेविड) और मोसेस की लाठी और मिस्र की प्राचीन सभ्यता का रा शब्द, इन सबका नाता इसी राम नाद और शक्ति शिव योग से भी है… और सूर्य से भी होता ही है I
  • इस नाद का नाता जागृत कुण्डलिनी से भी है I मिस्र की सभ्यता में जो उनके योगीजनों आदि के माथे पर सर्प दिखाया जाता था, वह कुण्डलिनी शक्ति को ही दर्शाता था I

जब कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से सहस्रार पर पहुंचकर, नीचे उतरती है और नाभि क्षेत्र के अमृत कलश में पहुँच जाती है, तब उस कुण्डलिनी का पथ माथे और ठोड़ी के थोड़ा नीचे जाता है I

इसलिए मिस्र की सभ्यता में, उनके योगीजनों के माथे पर जो सर्प दिखाया जाता था, वह जागृत हुई कुण्डलिनी शक्ति का द्योतक है I

और मिस्र की सभ्यता में, ठोड़ी पर जो डंडा दिखाया जाता था, वह उस दशा का द्योतक है, जिसमें वह कुण्डलिनी शक्ति पुनः नाभि के अमृत कलश में लौट गई है I

और क्यूंकि ऐसी कुण्डलिनी, मेरुदण्ड की ओर से ऊपर उठकर, शरीर के अग्रभाग से नीचे को आती है, तो वह कुण्डलिनी यह भी दर्शाती है कि उस कुण्डलिनी ने साधक की काया के भीतर बसे हुए ब्रह्माण्ड और उस ब्रह्माण्ड के ब्रह्म, दोनों की ही प्रदक्षिणा भी पूर्ण कर ली है I

  • यहूदी और ईसाई सभ्यताओं में जो हजार सिंहों की दहाड़ बताई गई है, उसका नाता भी इसी राम नाद के रा शब्द से है I
  • वेदान्तियों के एकदण्ड का नाता भी इसी राम नाद के आंतरिक साक्षात्कार मार्ग से है I त्रिदण्ड का नाता भी इसी राम नाद के आंतरिक साक्षात्कार मार्ग से है I और ऐसा ही नाता अन्य सभी दंड धरी परंपराओं में ही है I
  • वैदिक मंदिर कलश का नाता भी इसी राम नाद से जाते हुए उस गंतव्य दशा और साक्षात्कार से है, जिसमें साधक के नाभि क्षेत्र में विराजमान अमृत कलश ही निरालंब चक्र को पार किया होता है I और ऐसा भी इसलिए है क्यूंकि मंदिर उन भगवान् (अथवा/और भगवती) का देह ही होता है, जिसके भीतर वह भगवान् (अथवा/और भगवती) उस मन्दिर के आत्मस्वरूप जीव विग्रह (अथवा/और लिंग आदि) में विराजमान होते हैं I और जहाँ वह मंदिर कलश भी उस नाभि लिंग (अर्थात अमृत कलश) को ही दर्शाता है, जो सप्त चक्र से आगे के वज्रदण्ड से भी ऊपर के निरालंब चक्र को पार किया है और जिसका मूल नाता और मार्ग भी अथर्ववेद 2.31, 10.2.32 और 10.2.33 के मंत्रों से ही होता है I

आगे बढ़ता हूँ…

 

राम नाद और योगमार्ग की काशी, राम नाद और योग प्रयाग, राम नाद और योगमार्ग की काशी नगरी, राम नाद और योगमार्ग का प्रयाग, योगमार्ग का प्रयागराज, आंतरिक प्रयागराज, योग मार्ग के प्रयागराज, योग के प्रयागराज, योग प्रयाग, …

 

योग काशी, योग प्रयागराज
योग काशी, योगमार्ग की काशी, योग मार्ग का प्रयागराज, योग प्रयागराज,

 

अब प्रयागराज के शब्द का अर्थ योगमार्ग से बताता हूँ I

आंतरिक योगमार्ग में, प्रयागराज शब्द के प्रयाग नामक शब्द का जो अर्थ होता है, वह ऐसा होता है…

  • मिलन, … जहाँ दिव्यताएं मिलती हैं, वह प्रयाग है I और जहाँ उस मिलन का गंतव्य स्वरूप सर्वस्व-मिलन से ही जुड़ा हुआ होता है, और जिसका मार्ग भी समतावाद नामक आंतरिक दशा से ही होकर जाता है, और जहाँ उस समता को प्रदान करने वाला सम्प्रदाय ही कहलाता है I

टिपण्णी: इस अर्थ में, जो समता को प्रदान करने की क्षमता ही नहीं रखता, वह सम्प्रदाय नहीं कहलाया जा सकता I इसलिए जो भीतर और बाह्य, दोनों प्रकार की समता को प्रदान कर पाए, वही सम्प्रदाय कहलाता है I और ऐसे सम्प्रदाय की समता भी अंततः व्यापक स्वरूप में ही प्रकाशित होती है, जिसके कारण सम्प्रदाय शब्द का गंतव्य नाता उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति और उनके सर्वसम सगुण निराकार ब्रह्मलोक से भी होता ही है I विसमता में बसा हुआ और विसमता को प्रदान करने वाला भी क्या कभी सम्प्रदाय कहला सकता है? I और क्यूंकि कलियुग विसमता का ही युग होता है, इसलिए कलियुग के कालखण्ड में वैदिक आदि सम्प्रदाय भी अधिकांशतः, नष्ट भ्रष्ट हुए बिना भी नहीं रह पाते I

  • योग, … जहाँ योग होता है, अर्थात दिव्यताएं योग में आती हैं, वह प्रयाग है I और जहाँ उस योग का ब्रह्माण्डीय शिखर, पिण्ड ब्रह्माण्ड योग (अर्थात ब्रह्माण्ड योग) होता है, और पराब्रह्माण्डीय गंतव्य स्वरूप आत्मा ब्रह्म होता है I इन दोनों दशाओं के अद्वैत योग को ही वैदिक परंपरा कहा जाता है I

टिपण्णी: परंपरा के शब्द में, परम का शब्द निर्गुण ब्रह्म का द्योतक है और परा का शब्द, प्रकृति के नवम कोष (अर्थात परा प्रकृति) का द्योतक होता है I और जहाँ प्रकृति भी ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, पूर्ण शक्ति, सार्वभौम दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और प्रमुख दूती ही होती हैं I जिस भी उत्कर्षादि मार्ग में भगवान् और प्रकृति (अर्थात ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति) का समानरूपेण और परस्पर, पूर्णरूपेण और व्यापक योग नहीं, वह परंपरा भी नहीं कहलाई जा सकती I जो परंपरा ही नहीं, वह उत्कर्ष पथ भी नहीं जो सकता और जो उत्कर्ष का ही मार्ग नहीं है, वह मुक्तिमार्ग भी नहीं हो सकता I जो परंपरा है वह सम्प्रदाय के अर्थ में भी बसी हुई होगी, और जो सम्प्रदाय है वह परंपरा के अर्थ में भी बसा हुआ होगा, इसलिए परंपरा और संप्रदाय एक दुसरे के सूचक भी हैं, एक दुसरे के मूल भी हैं, एक दुसरे के परस्पर पूरक भी हैं, और इस के अतिरिक्त यह दोनों एक दुसरे के गंतव्य भी होते हैं I जैसे स्वच्छ जल में स्वच्छ जल घुल मिल जाता है, वैसे ही यह दोनों (अर्थात सम्प्रदाय और परंपरा) आपस में घुले मिले होते हैं I इसलिए यह दोनों (अर्थात सम्प्रदाय और परंपरा) एक दुसरे के बिना अपूर्ण है I और क्यूँकि ब्रह्म ही पूर्ण है, इसलिए अपूर्ण ब्रह्मपथ भी नहीं हो पाता, इसलिए जो इन दोनों (अर्थात सम्प्रदाय और परंपरा) की अद्वैत योगदशा में नहीं है, वह मुक्तिमार्ग भीनहीं हो सकता I किंतु कलियुग इसी अपूर्णता का ही युग होता है, इसलिए कलियुग के कालखण्ड में वैदिक आदि परंपराएं भी अधिकांशतः नष्ट भ्रष्ट हुए बिना नहीं रह पाती I

  • यज्ञ के स्थान को भी प्रयाग कहा जाता है I और जहाँ उस यज्ञ का गंतव्य स्वरूप वह आंतरिक यज्ञ ही होता है, जिसमें साधक स्वयं ही स्वयं की आहुति, स्वयं के आत्मस्वरूप के सर्वाग्नि रूप को ही देता है I
  • मेरे पूर्व जन्मों के उन अतिपुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण भी है क्यूंकि मैं प्रबुद्ध योग भ्रष्ट ही हूँ, देव सम्राट, अर्थात इड़ाद्र देव (देवराज इंद्र) का एक नाम भी देव प्रयाग ही था I
  • और इसके अतिरिक्त, वैदिक चक्रवर्ती सम्राट की काया सहित, उसके राष्ट की राजसभा भी उसके राष्ट्र का प्रयाग कहलाता है I ऐसा योगचक्रवर्ती सम्राट भी उसके राष्ट्र का प्रयाग ही कहलाता है I
  • त्रिदेव की योगदशा भी प्रयाग ही कहलाती है I
  • मकार का शब्द और उसकी दशा भी, योमार्ग का ॐ नाद में बसा हुआ प्रयाग ही है I
  • ब्रह्मनाद भी प्रयाग ही है I
  • भ्रामरी प्राणायाम भी प्रयाग की ओर जाता हुआ मार्ग है I
  • भ्रूमध्य में जहां इड़ा पिङ्गला और सुषुम्ना नाड़ियों और उनकी ऊर्जाओं का योग होता है, वह भी प्रयाग शब्द का ही द्योतक है I
  • सप्तचक्र भी प्रयाग ही हैं I
  • निरालंब चक्र में पहुंचकर, जब अमृत कलश तीन बार उस निरालंबस्थान को पार कर चुका होता है, तो यह दशा और उसकी सिद्धि भी प्रयाग को ही दर्शाती है I
  • और इसके अतिरिक्त, मेरे पूर्व जन्मों के अति पुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण भी है क्यूंकि में योग भ्रष्ट हूँ, और प्रबुद्ध भी हूँ, प्रयाग शब्द के एक अर्थ वह प्रकाश भी था, जिसके गंतव्य को स्व:प्रकाश भी कहा जाता था और जो निर्गुण ब्रह्म का ही द्योतक था I
  • प्रयाग शब्द का अर्थ पिण्ड और ब्रह्माण्ड के सनातन योग सहित, आत्मा और ब्रह्म के सनातन योग का भी द्योतक है I
  • और अंततः, पूर्ण ब्रह्म की दशा और शब्दार्थ ही सर्वप्रयाग है I

 

और उसी प्रयागराज शब्द के राज शब्द का अर्थ ऐसा होता है…

  • राज का अर्थ साम्राज्य, राजतंत्र और साम्राट तीनों ही होता है I और जहां साम्राज्य शब्द भी राष्ट्र के समस्त जीवों सहित, उस राष्ट्र के जड़ चेतन अदि बिन्दुओं को भी दर्शाता है I
  • राज शब्द का अर्थ राजधर्म भी होता है I जब राजतंत्र ही राजधर्म, साम्राज्य का सम्राट और साम्राज्य की प्रजा सहित, उस साम्राज्य के समस्त जीव और जड़ चेतन अदि बिन्दु ही हो जाएं, वही राज शब्द का प्रयाग स्वरूप है I ऐसा राजप्रयाग का राजतंत्र ही राजधर्म स्वरूप को धारण कर पाता है I
  • राज शब्द के अंतर्गत जो चार मुख्य बिंदु आते हैं, वह शिक्षा, सुरक्षा, अर्थ और सेवा होते हैं I इन चारों की योगदशा वर्ण चतुष्टय में ही परिभाषित और उद्भासित होती है I इन चारों का वर्ण चतुष्टय में योग, ही प्रयाग है I और जहां अर्थ शब्द के मूल में बहुवादी अद्वैत स्वरूप को धारक करी हुई माँ प्रकृति होती हैं, जिसके कारण इसी अर्थ शब्द के क्रियान्वित स्वरूप में बहुत के अंतर्गत कई सारे बिंदु भी आते हैं I
  • जिस राष्ट्र में, वह राज शब्द ही सम्राट, जड़ चेतन अदि प्रजा और राजतंत्र की अद्वैत योगदशा हो जाए, वही राज शब्द की प्रयाग नामक दशा है I

 

इसलिए…

  • प्रयागराज नामक शब्द, योगसम्राट के सगुण आत्मस्वरूप का भी द्योतक है I
  • और जहाँ उस सम्राट शब्द के वास्तविक अर्थ के भीतर, ब्रह्म और उनकी ब्रह्म रचना में जो भी था, है अथवा आगे कभी भी होगा, वह सब का सब ही आता है I यह भी वह कारण है कि जिस भी योगी ने उसकी काया के भीतर बसे हुआ प्रयागराज का साक्षात्कार किया होगा, वह पिण्ड ब्रह्माण्ड का योगी ही होगा I और इसके अतिरिक्त वह आत्मब्रह्म योग में भी बसा हुआ होगा I
  • इस प्रयागराज शब्द की योगदशा को प्राप्त हुआ योगी, योगेश्वर का स्वरूप भी हो सकता है I और जहाँ वह योगेश्वर ही योग सम्राट होता हैं, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति हैं I उन कार्य ब्रह्म को ही योग, योग तंत्र, योग गुरु, योगर्षि आदि कहा जाता है I और वही कार्य ब्रह्म, उकार भी कहलाए हैं, जो आंतरिक साक्षात्कारों के मार्ग में ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर बसे हुए ॐ साक्षात्कार मार्ग में द्वितीय बीज ही हैं I

यहां बताए जा रहे राम नाद का नाता, यहीं पर बताए गए प्रयागराज से भी है I

 

आगे बढ़ता हूँ…

जैसे ब्रह्माण्ड के भीतर कोई जीव अपने स्थूल शरीरी स्वरूप में निवास करता है, वैसे ही वह ब्रह्माण्ड उसके अपने सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में जीवों के स्थूल शरीर के भीतर ही निवास करता है I

जबतक जीव शरीरी होकर प्राकृत ब्रह्माण्ड के किसी लोक में निवास कर रहा है, तबतक उस जीव के स्थूल शरीर के भीतर ही वह ब्रह्माण्ड उसके अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक स्वरूप में नहीं बसा हुआ होगा I

और जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक वह स्थूल शरीरी जीव उस प्राकृत ब्रह्माण्ड के भीतर निवास करता हुआ भी, सुखी नहीं हो पाएगा I अर्थात जबतक जो दशा यहाँ पर बताई गई है, वह नहीं होगी, तबतक जीव इस जगत में निवास करता हुआ भी, सुखी नहीं हो पाएगा I

जैसे ब्रह्माण्ड में निवास करने के लिए, उस ब्रह्माण्ड को ही स्थूल शरीर में बसा होना होगा, और जहाँ वह ब्रह्माण्ड जो स्थूल शरीर में निवास करता है, वह उस ब्रह्माण्ड के अपने प्राथमिक सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में ही होता है, वैसे ही किसी भी लोक में होता है I

किसी भी लोक में निवास करने के लिए, उस लोक की दिव्यताओं को, उस लोक के स्थूल शरीर के भीतर भी होना होगा I जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक वह स्थूल शरीर उस लोक में निवास भी नहीं कर पाएगा, और यदि निवास करने भी लगेगा, तब भी वह सुखपूर्वक निवास नहीं कर पाएगा I

जबतक जीव में जगत और जगत में जीव नहीं होगा, तबतक जीव उस जगत में निवास करने पर भी सुखपूर्वक नहीं रह पाएगा I

और इसी सत्य पर आधारित यह भी होता है, कि जबतक किसी लोक में निवास करता हुआ जीव, उस लोक की दिव्यताओं को ही अपने स्थूलादि शरीरों में नहीं पाएगा, तबतक उस लोक में निवास करता हुआ भी, वह जीव सुखपूर्वक निवास नहीं रह पायेगा I

ऐसा होने के कारण, इस लोक की स्थूल काया के भीतर भी वही प्रयागराज होता है, जो इस लोक की काशी नगरी में है I और इसी काया के भीतर बसे हुए आंतरिक प्रयागराज (योगमार्ग के प्रयागराज) को यहाँ पर बताया जा रहा है I

वैसे तो वह सप्त पुरीयां, जिनमे से एक काशी भी है, वह इस पृथ्वीलोक से संबद्ध स्थूल शरीर के भीतर ही होती हैं, किन्तु यहाँ पर बस एक ही पुरी, जो काशी नगरी और उसका प्रयाग है, उनपर ही बात होगी I

इन सप्त पुरियों में से जो अन्य छह पुरियां हैं, उनके बारे में यदि मेरा मन करा, तो किसी आगे के अध्याय में बतलाऊँगा I

 

आगे बढ़ता हूँ…

इस आंतरिक प्रयागराज का नाता कई सारे शास्त्रों से है, तो अब उनको बताता हूँ…

  • अथर्ववेद 2.31 … यह प्रधान है इस राम नाद के मार्ग का I
  • बाइबिल के लुक21 , लुक 10.9, मैथ्यू 4.17, मार्क 1.15, ज़चारिआ 14.9 I इन सभी में जो साक्षात्कार (या मार्ग या ज्ञान) बताया गया है, उन सबका मूल नाता अथर्ववेद 10.2 31 के साक्षात्कार मार्ग से ही है I इसलिए बाइबिल के इन सभी भागों के मूल में वेदों का ही ज्ञान है I बाइबिल के ज्ञान में जो सर्वेश्वर का साम्राज्य कहा गया है, वह सर्वेश्वर भी भगवान् ही हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ…

  • वैदिक वाङ्मय में कहा गया है कि जो साधकगण, योगी आदि जन काशी में मृत्यूलाभ करते हैं, उनको शिव अपने तारक मंत्र से मोक्ष प्रदान करते हैं I वह शिव जो ऐसा करते हैं, वह काशी के भगवान् विश्वनाथ हैं I इसीलिए वैदिक मनीषीगण ऐसा मृत्यूलाभ करने हेतु, अपने अन्तसमय में काशी क्षेत्र में निवास करते हैं I उस काशी नगरी के शिव का तारक मंत्र भी यहाँ बताया जा रहा राम नाद ही है I
  • और इसी राम नाद से सम्बंधित अग्निदाह की अंतिम संस्कार प्रक्रिया में, शमशानों में शिवरंध्र को खोलने के लिए कपाल क्रिया करी जाती है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि शिवरंध्र खुलने के पश्चात, साधक की चेतना वज्रदण्ड में प्रवेश करके, राम नाद में जाकर, मोक्ष लाभ भी कर सकती है I अग्निदाह के समय पर जब शरीर थोड़ा गरम हो जाता है, तो उसके प्राण भी उबाल मारने लगते हैं और ऐसी दशा में कपाल क्रिया करी जाती है ताकि यदि जीव को मोक्षलाभ करना हो (अर्थात मृत शरीर की जीवात्मा यदि मुक्ति की पात्र हो) , तो वह ऐसा अग्निदाह के समय भी कर सके I

 

आगे बढ़ता हूँ…

काशी के प्रयागराज क्षेत्र में तीन नदियों का संगम होता है, जिनमें गंगा, यमुना और सरस्वती नदियां हैं I इन तीन नदियों में से सरस्वती नदी गुप्त रूप में इस संगम में हैं I

किन्तु काशी का प्रयाग तो स्थूल शरीर में भी होता है I इसका अर्थ हुआ कि स्थूल शरीर के भीतर भी काशी नगरी और उसका प्रयागराज होता है I

भ्रूमध्य के स्थान पर तीन नाड़ियों का योग होता है I इन तीन में से…

  • इड़ा नाड़ी गंगा नदी की द्योतक है I
  • पिङ्गला नाड़ी यमुना नदी की द्योतक है I
  • और सुषुम्ना नाड़ी सरस्वती नदी की द्योतक है I पुरातन कालों की सरस्वती नदी आज लुप्त हो चुकी है I किन्तु ऐसा होने पर भी, पुरातन काल में आज की सिंधु नदी, जो इंडस कहलाती है, उसका नाता सरस्वती नदी से ही था I आज की हिंडन नदी भी सुषुम्ना नाड़ी के उस भाग को दर्शाती है, जो मेरुदण्ड के नीचे से लेकर हृदय चक्र तक का होता है I
  • साधक की काया के भीतर के भ्रूमध्य क्षेत्र में, जहाँ यह तीन नदियां मिलती हैं, वही योग प्रयाग है, अर्थात योगमार्ग का प्रयागराज है और इसी को ऊपर के चित्र में अधूरे रूप में ही सही, लेकिन दिखाया गया है I

 

अब इन तीन नाड़ियों को बताता हूँ…

पिङ्गला नाड़ी, सूर्य नाड़ी, तेजस नाड़ी, ऊष्मा नाड़ी, उष्ण नाड़ी, रुद्र नाड़ी, …

  • यह नाड़ी मेरुदण्ड के निचे के भाग से ऊपर को जाती हुई, हृदय तक लाल वर्ण की होती है I ऐसी दशा में यह नाड़ी रजोगुण और अस्मिता को भी दर्शाती है I
  • हृदय से आगे (अर्थात ऊपर) भी यह नाड़ी जाती है, लेकिन ऐसी दशा में उसका वर्ण भगवा ही होता है I
  • इसका नाता रुद्रलोक से भी होता है, क्यूंकि इसके देवता रुद्रदेव ही है I
  • इस का बीज शब्द आला है (अर्थात आला नाद है) I
  • प्रकृति के नौ कोशों में से इस नाड़ी का कोष सातवां है, इसलिए यह सपताकाश की भी द्योतक है I
  • इस्लाम के देवता का संबंध भी इस नाड़ी से है I वेदों के रूद्र ही इस्लाम के अल्लाह हैं I
  • पिण्ड ब्रह्माण्ड में जितने कार्य होते हैं, उनके मूल में इसी नाड़ी की ऊर्जाएं होते हैं I
  • यह नाड़ी निन्यानवें अश्वमेध सिद्धिओं की द्योतक है I
  • क्यूंकि कलियुग के कालखण्डों में रुद्रदेव को विकृत स्वरूपमें ही अपनाया जाता है, इसलिए जैसे जैसे और जिस जिस स्थान पर यह कलियुग प्रबल होता चला गया, वैसे वैसे और उन उन स्थानों पर यमुना नदी भी अपने स्थूल स्वरूप के दृष्टिकोण से प्रदूषित होती चली गई I

 

इड़ा नाड़ी, चन्द्र नाड़ी, इंद्र नाड़ी, …

  • यह नाड़ी मेरुदण्ड के नीचे के भाग से हृदय तक नीले वर्ण की होती है, और अपनी ऐसी दशा में यह नाड़ी तमोगुण की द्योतक है I
  • इस नाड़ी का बीज शब्द अहम् नाद है I
  • बाइबिल के देवता का संबंध भी इसी नाड़ी के मेरुदण्ड के नीचे से ऊपर जाते हुए हृदय तक के भाग से है I
  • और ह्रदय से ऊपर यह नाड़ी पीले वर्ण की ही होती है I
  • पिण्ड ब्रह्माण्ड में इस नाड़ी की ऊर्जाएं स्थिरता की द्योतक हैं I
  • इस नाड़ी के देवता देवराज इंद्र हैं I
  • यह नाड़ी एक सौ अश्वमेध सिद्धियों की द्योतक हैं I
  • क्यूंकि कलियुग के कालखण्डों में इंद्रदेव को विकृत स्वरूप में ही दर्शाया जाता है, इसलिए जैसे जैसे और जिस जिस स्थान पर यह कलियुग प्रबल होता चला गया, वैसे वैसे यह गंगा नदी भी उन उन स्थानों पर, और अपने स्थूल स्वरूप के दृष्टिकोण से प्रदूषित होती चली गई I

 

सुषुम्ना नाड़ी, समता की नाड़ी, सर्वसम तत्त्व की नाड़ी, प्रजापति नाड़ी,

  • मेरुदण्ड के नीचे से ऊपर को जाती हुई यह नाड़ी, हृदय तक श्वेत वर्ण की होती है I ऐसी दशा में यह नाड़ी सत्त्वगुण को दर्शाती है I यह नाड़ी समता को दर्शाती है I
  • यह नाड़ी समता नामक तत्त्व की द्योतक है I
  • इस नाड़ी का नाता माँ आदिशक्ति से भी है I
  • इस नाड़ी का नाता सर्वसमता से और प्रजापति से भी है I
  • यहूदियों के देवता का सम्बन्ध भी इसी नाड़ी के मेरुदण्ड के नीचे से ऊपर जाते हुए हृदय तक के भाग से है I
  • और हृदय से ऊपर की ओर इस नाड़ी का वर्ण सुनहरा सा ही होता है I और अंततः यही नाड़ी निरंग सी ही पाई जाएगी और ऐसी दशा में यह नाड़ी ही निर्गुण ब्रह्म की ही द्योतक हो जाएगी I
  • यह नाड़ी एक सौ एक yog अश्वमेध सिद्धि को दर्शाती है, जिसका नाता पितामह ब्रह्मा से होता है I और यह नाड़ी ही एक सौ एकवें आंतरिक अश्वमेध से लेकर सुमेरु अश्वमेध (अर्थात एक सौ नौवें योग अश्वमेध) तक की सिद्धि को दर्शाती है I लेकिन इस नाडी के ऐसे एक सौ एक या इससे ऊपर के अंकों के योग अश्वमेध सिद्ध बहुत ही कम रहे हैं I
  • क्यूंकि कलियुग के समयखण्डों में ब्रह्मा की ओर जाता हुआ ज्ञानमार्ग नहीं होता, इसलिए भी सुषुम्ना नाड़ी को दर्शाती हुई सरस्वती नदी इस कलियुग में लुप्त हुई है I

 

 

अब इस ज्ञान से योगप्रयाग के दो साक्षात्कारों को बताता हूँ…

  • प्रथम साक्षात्कार में, यह योगप्रयाग वैसा ही दिखेगा, जैसे ऊपर के चित्र में दिखाया गया है I इसमें श्वेत और नीले वर्ण का योग पाया जाएगा I योग प्रयाग के इस प्रथम साक्षात्कार में, इड़ा नाड़ी और सुषुम्ना नाड़ी की हृदय तक की ऊर्जाओं के वर्णों का योग होता है, और वह भी पिङ्गला नाड़ी के भीतर I लेकिन ऊपर के चित्र में पिङ्गला नाड़ी के वर्ण को नहीं दिखाया गया है, इसलिए पूर्व में कहा था, कि यह चित्र अधूरा ही बनाया गया है I
  • और द्वितीय साक्षात्कार में यह योग प्रयाग वैसा ही दिखेगा, जैसा एक पूर्व के अध्याय में आज्ञारंध्र बताया गया था I योग प्रयाग के इस द्वितीय साक्षात्कार में, पिङ्गला नाड़ी और इड़ा नाड़ी के हृदय से ऊपर के भाग की ऊर्जाओं के वर्णों का योग होगा, और वह भी सुषुम्ना नाड़ी के भीतर I

 

यही दोनों दशाएं योग प्रयाग के दो प्रकार के योग की द्योतक हैं, जिसमें…

  • प्रथम योग में इन तीन नाड़ियों की हृदय क्षेत्र तक की ऊर्जाओं का आज्ञा चक्र के समीप के स्थान पर होता है I और इसी को ऊपर के चित्र में अधूरे रूप में दिखाया गया है I
  • द्वितीय योग इन तीन नाड़ियों की हृदय क्षेत्र से ऊपर के भाग की ऊर्जाओं का होता है, और जो आज्ञा चक्र के समीप के स्थान पर ही होता है I इसी को एक पूर्व के अध्याय, जिसका नाम रंध्र विज्ञानं था, उसमें आज्ञारंध्र के रूप में दिखाया गया था I

 

और क्यूंकि इन तीन नाड़ियों की दिव्यताओं का नाता, त्रिदेव से भी है और पञ्चदेव से भी होता ही है, इसलिए जिस योगी ने यहाँ बताए गए प्रयागराज का आंतरिक योगमार्ग से साक्षात्कार पूर्णरूपेण करा होगा, वह योगी उन देवताओं का स्वरूप भी पाया हुआ हो सकता है… लेकिन वह योगी ऐसा स्वरूप पाया है या नहीं, यह तो वह योगी ही जानता होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ…

क्यूंकि यह आंतरिक प्रयागराज, आज्ञा चक्र के स्थान पर होता है, और क्यूंकि जहाँ भी त्रिवेणी संगम होता है, वह क्षेत्र स्वयंजागृत ही होता है, इसीलिए योगीजनों ने आज्ञा चक्र को स्वयंजागृत चक्र कहा है I

क्यूंकि त्रिवेणी क्षेत्र गुरुशिव के त्रिशूल को भी दर्शाता है, इसलिए जितने त्रिवेणी के स्थान हैं, वहां गुरु शिव ही प्रमुख देवता देवस्वरूप में होते हैं I और ऐसे सभी स्थानों पर शिव तारक मंत्र, जो राम नाद ही है, उसका प्रभाव भी एक अलौकिक स्वरूप में होगा ही I

 

आगे बढ़ता हूँ…

जिन उत्कर्ष मार्गों में भ्रूमध्य पर आंतरिक त्राटक आदि क्रिया करी जाती हैं, वह सब इसी बिंदु में बसे होते हैं, कि आज्ञा चक्र स्वयंजागृत चक्र है I और इन सभी का नाता भ्रूमध्य के क्षेत्र में बसी हुई आंतरिक काशी (के प्रयागराज) से ही है I

 

राम नाद के साक्षात्कार, राम नाद पर गति करती हुई चेतना, राम नाद से आगे की दशा, राम नाद की दशा, …

जब साधक की चेतना राम नाद से गति कर रही होती है, तब उसको जो जो साक्षात्कार होते हैं, उनको यहाँ पर संक्षेप में ही बताया जाएगा I और इनमें से जो भी आवश्यक पाए जाएंगे, उनको में इसके बाद के अध्यायों में विस्तारपूर्वक बतलाऊँगा I

इस राम नाद का जिससे नाता होता है, अब उनमें से कुछ को अंकित करता हूँ…

  • इस राम नाद की गंतव्य दशा अथर्ववेद 2.31, अथर्ववेद 10.2.32 और अथर्ववेद 10.2.33 में सूक्ष्म रूप से ही सही, लेकिन बताई गई है I
  • इस राम नाद के साक्षात्कार के गंतव्य का नाता सिद्धों द्वारा बताए गए निरालंब स्थान, अर्थात निरालंब चक्र से भी है I
  • सिद्धों द्वारा बताए गए निरालंबस्थान का नाता ब्रह्म चक्र, अवधूत की दशा को दर्शाता हुआ चक्र (अर्थात अवधूत चक्र) से भी है I
  • राम नाद की सिद्धि से प्राप्त हुए और सिद्धों द्वारा बताए गए निरालंबस्थान का नाता तुरीयातीत अवस्था से भी है I और जहाँ तुरीयातीत शब्द साधक के हिरण्यगर्भात्मक आत्मस्वरूप सहित, निर्गुण आत्मस्वरूप का भी द्योतक होता है I तुरीयातीत योगी को समाज का, शास्त्रों का, परम्पराओं का और अन्य किसी भी विधान या संविधान का कोई अन्तर नहीं पड़ता क्यूंकि वह इन सबसे अतीत ही होता है I
  • इस राम नाद के साक्षात्कार मार्ग का नाता सिद्ध मार्गों के वज्रदण्ड (अर्थात वज्रदण्ड चक्र) से है I
  • सिख पंथ में इसी वज्रदण्ड को खण्डा साहब कहा गया है I
  • यहूदियों ने इसी वज्रदण्ड को मोसेस का दण्ड (अर्थात स्टाफ ऑफ़ मोसेस) रूप में दर्शाया है I
  • पुरातन सभ्यताओं में भी इसी वज्रदण्ड को उनके देवताओं के दण्ड स्वरूप में दर्शाया जाता था I
  • बौद्ध पंथ की वज्र और वज्र शरीर नामक सिद्धियों का नाता भी इसी राम नाद के मार्ग से है I
  • देवराज इंद्र के वज्रास्त्र का नाता भी इसी राम नाद के मार्ग से है I
  • राम नाद ही शून्य ब्रह्म के साक्षात्कार का मार्ग है I
  • राम नाद के साक्षात्कार मार्ग का नाता अमृत कलश से भी है, जो वैदिक मंदिरों के ऊपर कलश रूप में स्थापित करा जाता है I
  • राम नाद के साक्षात्कार मार्ग का नाता कुम्भ शब्द से भी होता है I
  • राम नाद के साक्षात्कार मार्ग को बाइबिल के एक्स्लेसिएस्टेस 6 में भी दर्शाया गया है I
  • इस राम नाद का नाता समाधि, शून्य समाधि, असंप्रज्ञात समाधि और अंततः निर्बीज समाधि से भी होता है I
  • ऊपर बताई गई समधियों के अतिरिक्त, इस राम नाद के साक्षात्कार मार्ग का नाता संप्रज्ञात समाधि से भी होता है और निर्विकल्प समाधि से भी राम नाद का नाता होता है I

 

राम नाद और अद्वैत ब्रह्म, राम नाद ही अद्वैत योग है, राम नाद ही योग के गंतव्य का मार्ग है, राम नाद ही योग गंतव्य मार्ग है, …

राम नाद जो वज्रदण्ड के भीतर का ही बीज शब्द है, उससे जाकर योगी निरालंबस्थान पर ही चला जाता है I

उस निरालंबस्थान (या निरालंब चक्र) पर स्थित होकर वह योगी अपने हिरण्यगर्भात्मक सगुण साकार आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है I इसी सिद्ध शरीर को बौद्ध पंथ में बुद्ध का सुनहरा शरीर (अर्थात बुद्ध शरीर या बुद्धत्व शरीर या बुद्धता शरीर या बुद्ध का वास्तविक शरीर) भी कहा जाता हैI

उस निरालंब चक्र पर स्थित होकर वह साधक अद्वैत ब्रह्म का साक्षात्कार करता है और इस साक्षात्कार का मार्ग भी राम नाद से ही जाता है I

इसी राम नाद से जाकर वह साधक निर्बीज ब्रह्म को भी प्राप्त करता है I और इसी साक्षात्कार मार्ग से वह साधक उन सर्वव्यापक निरंग स्फटिक के सामान ईशान ब्रह्म का भी साक्षात्कार कर सकता है, और जहाँ उन ईशान ब्रह्म (अर्थात सदाशिव के ईशान मुख) को ही निर्गुण निराकार ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है और उसका वर्णन ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में स्वच्छ जल के शब्द से भी सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन करा गया है I

क्यूंकि इन सभी साक्षात्कारों के मूल मार्ग में यही राम नाद का साक्षात्कार है, और क्यूँकि राम नाद का साक्षात्कार भी साधक की काया के भीतर होते हुए शिव शक्ति योग से ही होता है, और क्यूंकि इस साक्षात्कार के गंतव्य में निर्गुण निराकार ब्रह्म ही साधक के व्यापक निर्गुण आत्मस्वरूप में साक्षात्कार होते हैं और क्यूंकि निर्गुण निराकार ब्रह्म ही वास्तविक गंतव्य हैं… इसलिए शक्ति शिव योग और उसका राम नाद ही योग के गंतव्य का मार्ग है I

 

राम नाद और साधक का आत्मस्वरूप, राम नाद और तुरीयातीत योगी, …

अब राम नाद और तुरीयातीत योगी के बारे में बात होगी I जो योगी तुरीयातीत को प्राप्त हुए होता है, वह जो मानेगा उसको अब बताता हूँ…

मैं आत्मा हूँ और मैं ब्रह्म भी हूँ I

मैं ही पिण्ड हूँ, और मैं ही ब्रह्माण्ड भी हूँ I

पिण्ड और ब्रह्माण्ड मेरे आत्मस्वरूप की ही अभिव्यक्तियाँ हैं I

मैं ही सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार हुआ हूँ I

मैं जीव जगत होता हुआ भी, जीवातीत और जगतातीत हूँमैं ही सर्वस्व हूँ I

समस्त जीव जगत मेरे आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति के सिवा कुछ और नहीं है I

और वह तुरीयातीत योगी स्वयं के बारे में यह भी कहेगा…

मैं इस जीव जगत का अभिव्यक्ता हूँ, जीव जगत रूपी अभिव्यक्ति भी मैं ही हूँ I

मुझ तुरीयातीत की अभिव्यक्ति को ही जागृत, स्वप्न, सुसुप्ति और तुरिया कहते हैं I

मैं जागृत स्वप्न सुसुप्ति तुरिया होता हुआ भी, मैं इन सबसे अतीत हूँ, तुरीयातीत हूँ I

वह तुरीयातीत ही मेरा आत्मस्वरूप नामक पूर्णब्रह्म है, मैं ही मेरा आत्मस्वरूप हूँ I

आत्मस्वरूप में मैं हूँ, और नहीं भी हूँ इनके मध्य में और इनसे परे भी मैं ही हूँ I  

 

और वह तुरीयातीत योगी स्वयं के बारे में यह भी कहेगा…

मेरा जीव जगत स्वरूप ही जागृत स्वप्न सुसुप्ति और तुरिया कहलाया है I

चतुर्थ और उससे परे, जो पांचवी है, जो होती हुई भी नहीं है, सब मैं ही हूँ I

जीव जगत स्वरूप में यह तुरीयातीत मेरा वह अंतहीन अंत है, जो अनंत है I

पर मेरा वास्तविक स्वरूप ही जीवातीत और जगतातीत है, जो तुरीयातीत है I

जीव जगत, उसके अंत और उस अंत से परे जो अनंत है, उन सब में भी मैं ही हूँ I

 

अवस्था चतुष्टय से पूर्व, जब जीव जगत नामक दशाएं नहीं थीं, तब भी मैं ही था I

जब मेरे तुरीयातीत से, जीव जगत अभिव्यक्त हुआ, तब जीव जगत भी मैं ही था I

 

में सर्वमूल और सर्वस्व का अभिव्यक्ता होते हुए भी, सर्वातीत ही रहा हूँ I

मैं सनातनता जो दर्शाता हुआ भी, जीव जगत रूप में आताजाता रहता हूँ I

जन्म मृत्यु चक्र मेरी ही अभिव्यक्ति है, पर मैं इस चक्र से परे से भी परा हूँ I

ऐसा होने पर भी न मैंने कभी जन्म लिया, न ही मैं कभी मृत्युलाभ किया हूँ I

जन्म लेता और मृत्यु को प्राप्त होता हुआ भी, मैं न जन्मा हूँ और न ही नहीं हूँ I

मैं सनातन अस्तित्व होता हुआ भी, न मेरा कोई अस्तित्व  है और न ही अनस्तित्व I

 

मैं कर्ममय, फलमय, संस्कारमय जगत का अभिव्यक्ता होते हुए भी, अतीत हूँ I

मैं मेरी अभिव्यक्ति जीव जगत रूप में होता हुआ भी, इससे अतीत ही हूँ I  

न मैं कभी आया और न ही गया हूँमैं इस द्वैतवादी प्रपंच से परे हूँ I

न मेरे कोई कर्म और न कर्मफल, मैं कर्मातीत और फलातीत ही रहा हूँ I

न मेरे कोई संस्कार हैं और न ही नहीं हैंमैं संस्कारातीत ही रहा हूँ I

 

न मुझे कभी दर्शाया, न ही नहीं दर्शाया गया, मैं दर्शन में बसा हुआ दर्शनातीत हूँ I

न मेरा कभी वर्णन हुआ, ना ही नहीं हुआ है, मैं वर्णनों में बसा हुआ वर्णनातीत हूँ I

मुझे जानकर भी जो माने, कि वह मुझे पूर्णरूपेण नहीं जानता, वही मेरा ज्ञाता है I

मुझे जानकर जो माने, कि वह मुझे पूर्णरूपेण जानता है, वह मुझे नहीं जानता है I

मैं जानकर भी नहीं जाना जा सकता हूँ, और नहीं जानकार भी पूर्ण जाना जाता हूँ I

मुझे जानने, नहीं जानने, इनके मध्य की और इनके परे की दशाओं में भी, मैं ही हूँ I

मैं जानने और नहीं जानने, दोनों में हूँ, इनसे परे भी हूँ, इसी स्वरूप जाना जाता हूँ I

मुझ तुरीयातीत को न तो पूर्णरूपेण बताया जाता है, न ही नहीं बताया जा पाता है I

 

मैं न अभिमानि हूँ, और न अनाभिमानी हूँ, मैं इस द्वैतवाद से परे से भी परा हूँ I

अभिमान और अनाभिमान मेरी ही अभिव्यक्तियाँ है, जो पिण्ड ब्रह्माण्ड कहलाई हैं I

मैं पिण्ड ब्रह्माण्ड होता हुआ भी, वास्तव में पिण्डातीत हूँ और ब्रह्माण्डातीत भी हूँ I

 

जो मुझे नहीं जाना है, वह मुझे मेरी जीव जगत रूपी अभिव्यक्ति में ही जाना है I

जो मुझे जाना है, आत्मस्वरूप में ही जाना है, मैं ही आत्मा और ब्रह्म कहलाया हूँ I

जो मुझे जानता हुआ भी नहीं जाना है, नहीं जानता हुआ भी जाना है, वही जाना है I

मेरा तुरीयातीत स्वरूप जानने, नहीं जानने, और इनकी मध्य की दशा से भी परे हैं I

 

उनके लिए शास्त्रों का क्या लाभ, जो मुझे जानने के पथ पर ही नहीं चले हैं I

उनके लिए शास्त्रों का क्या लाभ, जो मुझे योगमार्ग से पूर्णरूपेण जान चुके हैं I

यह शास्त्र तो केवल उनके लिए ही हैं, जो मुझे जानने के मार्गों पर चल रहे हैं I

मेरा तुरीयातीत स्वरूप ही शास्त्रों का गंतव्य ज्ञान है, लेकिन मैं शास्त्रों में नहीं हूँ I

 

जो मेरे निर्गुण निराकार स्वरूप में ही लय हुआ है, उसके लिए कौन सा भगवान्? I

जो मेरे निर्गुण स्वरूप में बसा हुआ, मैं ही हुआ है, उसका कौन भगवान् हो सकेगा I

जो मेरे निर्गुण निराकार स्वरूप से ज्ञानादि योग में है, उसका क्या धर्मक्या अधर्म I

 

क्या तुरीयातीत किसी और की उपासना कर पाएगा? I

वह तुरीयातीत तो केवल स्वयं ही स्वयं का उपासक होता है I

उस तुरीयातीत का मार्ग भी स्वयं ही स्वयं में”… ऐसा ही होता है I

ऐसा ही स्वयं ही स्वयं में रमण करता हुआ, तुरीयातीत सिद्ध होता है I

मैं स्वयं ही स्वयं का उपासक हूँ, मैं स्वयं ही स्वयं की उपासना और उपास्य हूँ I

आराधक, आराधक, आराध्य के योगमूल, योग और योगातीत का अद्वैतयोग मैं ही हूँ I 

 

तुरीयातीत जो सर्वदिशात्मक और दिशातीत भी है, उसका क्या उत्कर्ष या अपकर्ष I

वह तुरीयातीत जो सर्वदेशात्मक और दशातीत भी है, उसका क्या लोक या परलोक I

वह तुरीयातीत जो सर्वभेद और अंतरातीत भी है, उसका क्या यह, वह या कुछ और I

वह तुरीयातीत जो सर्वकालात्मक और कालातीत भी है, उसका क्या पिण्ड या ब्रह्माण्ड I

ऐसा ही तुरीयातीत योगी होता है, जो सर्वातीत होता हुआ भी, सर्वस्व में बसा रहता है I

 

उसके लिए क्या क्या गुण और क्या अवगुण, जो गुणातीत ही हो गया I

उसके लिए क्या जीव और क्या जगत, जो सार्वभौम दिव्यता ही हो गया I

उसके लिए क्या पिण्ड और क्या ब्रह्माण्ड, जो सर्वव्यापक ब्रह्म ही हो गया I

उसके लिए क्या उत्कर्ष चक्र या अपकर्ष चक्र, जो कालातीत ब्रह्म ही हो गया I

उसके लिए क्या पद या प्रतिष्ठा, जो सर्वसाक्षी कैवल्य स्वरूप ब्रह्म ही हो गया I

उसके लिए क्या योग और क्या समाधि, जो योगातीत समाधितीत ब्रह्म हो गया I

उसके लिए क्या सिद्धि या असिद्धि, जो सर्वस्व होता हुआ भी, सर्वातीत हो गया I

ऐसा ही तुरीयातीत योगी होता है जो जीव प्रतीत होता हुआ भी, ब्रह्म ही होता है I

 

वह कैसे दर्शाओगे, जो होता हुआ भी नहीं है, और नहीं होता हुआ भी सदैव ही है I

वह कैसे जानोगे, जो नहीं है पर है, जो है पर नहीं है, और इनके योग में भी वही है I

वह कैसे बताओगे, जो नहीं है पर है, जो है पर नहीं है, और इन दोनों से परे भी है I

ऐसा ही तुरीयातीत योगी होता है जो है, नहीं है, इन दोनों में ही है और नहीं भी है I

उस तुरीयातीत की न तो कोई काल गणना, न दशा, न मार्ग और न ही गति ही है I

जो कालचक्र, दशाचक्र, दिशाचक्र और आकाशचक्र से भी अतीत है, उसका कैसा वर्णन I

 

ऐसा होने के कारण, वह तुरीयातीत योगी ऐसा ही कहेगा…

जब मैं ही परमगुरु शिव हूँ, तो मेरा आराध्य कौन हो सकता है? I

जब मैं ही देवी रूपी सर्वमाता प्रकृति हूँ, तो मेरा कौन सा एक लोक होगा? I

जब मैं ही सनातन गुरु श्री विष्णु हूँ, तो कौन सी ज्ञानादि पीठ मेरी नहीं होगी? I

जब मैं ही मोक्ष स्वरूप गणेश हूँ, तो कौन सा मुक्तिपथ मेरा हुए बिना रह पाएगा? I

जब मैं ही हिरण्यगर्भात्मक सूर्य हूँ, तो कौन सा जीव और जगत मेरा नहीं हो पाएगा I

मैं ही पञ्चदेव हूँ, पञ्च देव मुझमें ही हैं, और मैं समान रूप में पञ्चदेवात्मा भी हूँ I

मैंने ही उत्पत्ति, स्थिति, संघार, निग्रह और अनुग्रह नामक कृत्यों को धारण किया है I

मैं पञ्चदेव और उनके कृत्यों में प्रकाशित हूँ, और वह भी मुझमें ही प्रकाशित हुए है I

मैं पिण्डरूप में होता हुआ भी, पञ्चदेव और पञ्चकृत्य ही हूँ, और उनसे अतीत भी हूँ I

पञ्च देव होने के कारण मैं जानने योग्य हूँ अतीत होने के कारण मैं ज्ञान ही हूँ I

पञ्च कृत्य होने के कारण, मैं कर्मों में हूँअतीत होने के कारण मैं अकर्मा ही हूँ I

 

यहाँ बताए गए तुरीयातीत योगी की दशा के ज्ञान का मार्ग भी यही राम नाद है I

तो अब इसी बिंदु पर यह अध्याय समाप्त होता है और अब मैं अगले अध्याय पर जाता हूँ, जिसका नाम शिव शक्ति योग होगा I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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