पञ्च कोष, पञ्च कोष विज्ञान, अन्नमय कोष, पञ्च महाभूत, अन्न के प्रकार, अन्न के प्रभेद, अन्न ब्रह्म, रचना का मार्ग ब्रह्म, रचना ब्रह्म, रचैता ब्रह्म, अनुग्रह सिद्धि, कृपा सिद्धि, अनुग्रह सिद्ध, कृपा सिद्ध

पञ्च कोष, पञ्च कोष विज्ञान, अन्नमय कोष, पञ्च महाभूत, अन्न के प्रकार, अन्न के प्रभेद, अन्न ब्रह्म, रचना का मार्ग ब्रह्म, रचना ब्रह्म, रचैता ब्रह्म, अनुग्रह सिद्धि, कृपा सिद्धि, अनुग्रह सिद्ध, कृपा सिद्ध

यहाँ पर पञ्च कोष विज्ञान पर बात होगी I यहाँ पर पाँच कोष और पञ्च महाभूत, अन्न के प्रकार, अन्न के प्रभेद, अन्न ब्रह्म ही है, इसपर भी बात होगी I यहाँ पर रचना का मार्ग ब्रह्म, रचना ब्रह्म, रचैता ब्रह्म, अनुग्रह सिद्धि, कृपा सिद्धि, अनुग्रह सिद्ध, कृपा सिद्ध, इन सबपर भी बात होगी I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2007-2008 से लेकर 2011 तक का है I इतने वर्ष इसलिए लगे क्यूंकि इस अध्याय का मार्ग और साक्षात्कार कई सारी दशाओं से होकर ही जाता है, जिनके बारे में आगे की अध्यय श्रंखलाओं में बताया जाएगा I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है ।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं ।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का तीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, पञ्चब्रह्म गायत्री मार्ग श्रृंखला का सोलहवां अध्याय है ।

 

पञ्च कोष विज्ञान का सारांश, पञ्च कोष विज्ञान का सार,

यह पाँच कोष, अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोश कहलाते हैं I इनमें से …

  • अन्नमय कोष पञ्च महाभूत का द्योतक है I
  • प्राणमय कोष, पञ्च प्राण या प्राण वायु का द्योतक है जिसमें पञ्च प्राण और पञ्च उप प्राण होते हैं I
  • मनोमय कोष त्रिकाल स्थित मन का द्योतक है I
  • विज्ञानमय कोष समरस विज्ञान (अर्थात विज्ञान की समरसता) का द्योतक है I
  • और आनंदमय कोष जिसमें मन, बुद्धि, चित्त और अहम् (या अहंकार) नामक भाग होते हैं, वो प्रकृति का द्योतक है I स्थूल काया के भीतर आनंदमय कोष ही वह प्रकृति है जो ब्रह्म की ध्योतक और ब्रह्मपथ भी है I

 

यह पञ्च कोष का संबंध पञ्च विद्या सरस्वती से भी है, जैसे …

  • अन्नमय कोष का संबंध भारती विद्या सरस्वती से है I
  • प्राणमय कोष का संबंध गायत्री विद्या सरस्वती से है I
  • मनोमय कोष का संबंध शारदा विद्या सरस्वती (अर्थात जगदगुरु माता शारदा विद्या) से है I
  • विज्ञानमय कोष का संबंध सावित्री विद्या सरस्वती से है I
  • और आनंदमय कोष का संबंध ब्राह्मणी विद्या सरस्वती से है I

 

और ब्रह्म से इन कोषों के संबंध में …

  • अन्नमय कोष का संबंध महाब्रह्माण्ड (ब्रह्मा भारत) से है, जो ब्रह्म की ब्रह्माण्ड स्वरूप में अभिव्यक्ति है I
  • प्राणमय कोष का संबंध पञ्च ब्रह्म से है I
  • मनोमय कोष का संबंध सच्चिदानंद ब्रह्म (अर्थात सदानंद ब्रह्म) से है I
  • विज्ञानमय कोष का संबंध ॐ साक्षात्कार (ओमकार नामक ब्रह्म साक्षात्कार और प्रणव नामक ब्रह्म साक्षात्कार) से है I
  • और आनंदमय कोष का संबंध निर्गुण ब्रह्म से है I आनंदमय कोष ही मूल प्रकृति की अन्तःकरण चतुष्टय स्वरूप में अभिव्यक्ति है I

 

इस पञ्च कोष विज्ञान के अनुसार, जो ज्ञान होता है, अब उसको बताता हूँ …

जीव जगत में जो भी है, जब भी है, जहाँ भी है… सब ब्रह्म ही है I

ऐसा होने का कारण है, कि ब्रह्म ने अपने अतिरिक्त, कुछ और बनाया ही नहीं I

ऐसा इसलिए हुआ क्यूंकि ब्रह्म उसके अपने सिवा, और कुछ बना पाया ही नहीं I

रचैता ही रचना और रचना तंत्र हुआ है… जो था, है या होगा, वो सब ब्रह्म ही है I

इसलिए, रचैता ब्रह्म, रचना ब्रह्म और रचना का तंत्र ब्रह्म… ऐसा ही है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

पञ्च कोष क्या हैं, पञ्च कोष का विज्ञान, पञ्च कोष, पाँच कोषों का विज्ञान, … अन्नमय कोष क्या है, अन्नमय कोश किसे कहते हैं, … पञ्च कोष के भाग, पञ्च कोष की सापेक्ष सूक्ष्मता, पञ्च कोष की तुलमात्मक सूक्ष्मता, … पञ्च कोष का पञ्च विद्या से नाता, पञ्च कोष का पञ्च विद्या सरस्वती से नाता, पञ्च कोष का पञ्च सरस्वती विद्या से नाता, पञ्च कोष का पञ्च सरस्वती से नाता, … पञ्च कोष का पञ्च ब्रह्म से नाता, पञ्च कोष विज्ञान का ब्रह्मपथ से नाता, पञ्च कोष का ब्रह्मपथ से नाता, … पञ्च कोष विज्ञान और मुक्तिपथ, पञ्च कोष विज्ञान और मुक्तिमार्ग, पञ्च कोष विज्ञान और उत्कर्ष पथ, पञ्च कोष विज्ञान और उत्कर्ष मार्ग, पञ्च कोष और पञ्च ब्रह्म, …  अन्न के प्रकार, अन्न के प्रभेद, … अन्न ब्रह्म क्या है, अन्न सर्वोच्च ब्रह्म है, अन्नमय कोष ब्रह्म की पूर्ण अभिव्यक्ति है, …

पञ्च कोष होते है, जो अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोश कहलाते हैं I

 

इनमें से …

  • अन्नमय कोष और स्थूल शरीर, अन्न से निर्मित कोष, अन्न का कोष, अन्नमय कोष और पञ्च महाभूत, अन्नमय कोष और पञ्च ब्रह्म, अन्नमय कोष और ब्रह्म शक्ति,

अन्नमय कोष में पञ्च महाभूत बसे होते हैं I पञ्च महाभूत प्रकृति के पार्रिकर हैं, और प्रकृति ही ब्रह्मशक्ति हैं I

शक्ति अपने शक्तिमान से पृथक नहीं होती, इसलिए शक्ति ही शक्तिमान होती है I यही कारण है, कि प्रकृति भी ब्रह्म ही है I इसीलिए अन्नमय कोष, ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति का ही द्योतक है I

प्रकृति ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, संपूर्ण शक्ति, सार्वभौम दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और प्रमुख दूती है I

अन्नमय कोष प्रकृति के परिकरों, अर्थात ब्रह्म की शक्ति हो भी दर्शाता है I

और क्यूँकि अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्त से पृथक नहीं होती, इसलिए यह अन्नमय कोष, ब्रह्म को भी दर्शाता है I

यही कारण है, कि अन्नमय कोष ब्रह्म का भी द्योतक है I

पञ्च ब्रह्म में ही पञ्च महाभूत बसे हुए होते हैं, और पञ्च महाभूत इसी अन्नमय कोष में निवास करते हैं, इसलिए यह अन्नमय कोष, पञ्च ब्रह्म का द्योतक भी है I

क्यूंकि अन्नमय कोष में पांचो महाभूत बसे हुए होते हैं, और पञ्च महाभूत प्रकृति के परिकर होने के कारण, प्रकृति के शक्ति स्वरूप ही है, इसलिए यह अन्नमय कोष, ब्रह्म शक्ति का द्योतक होने के साथ साथ, और ब्रह्म का भी है I

 

ऊपर बताए गए बिंदुओं के कारण, अन्नमय कोष ब्रह्म भी है, और ब्रह्म शक्ति भी है, इसलिए यह अन्नमय कोष ब्रह्म की परिपूर्णता को भी दर्शाता है I

 

अन्न ही ब्रह्म है, अन्न ही सर्वोच्च ब्रह्म है, अन्न और सर्वोच्च ब्रह्म, अन्न और ब्रह्म शक्ति, …

यह अन्नमय कोष अन्न से ही निर्मित होता है, इसलिए अन्न भी ब्रह्म की परिपूर्णता को ही दर्शाता है I

इस पञ्च कोष विज्ञान के मूल में, यदि कुछ ब्रह्म की परिपूर्णता को दर्शाता है, तो वो अन्न से निर्मित अन्नमय कोष ही है I

 

पञ्च कोष विज्ञान के दृष्टिकोण से, …

अन्न ही ब्रह्म की परिपूर्णता को दर्शाता है I

ब्रह्म की परिपूर्णता में ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति की अद्वैत योगावस्था ही है I

इसलिए, अन्न ही पूर्ण ब्रह्म, अर्थात ब्रह्म का सर्वोच्च स्वरूप है I

अन्न, ब्रह्म की अभिव्यक्ति, ब्रह्मशक्ति की पूर्णता को भी दर्शाता है I

ब्रह्मशक्ति का एकेश्वरी और सार्वभौम पर तारतम्यमय स्वरूप अन्न है I

अन्न स्वरूप में, रचैता सहित, रचना और रचना का तंत्र भी ब्रह्म ही है I

ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म, अन्न के भीतर अपनी सनातन योगावस्था में हैं I

अन्न का योग भी ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति, दोनों से समान रूप में है I

 

यही कारण है, कि …

एकेश्वरी और एकेश्वर की योगदशा का लिंगात्मक स्वरूप अन्न है I

अन्न, पिण्ड और ब्रह्माण्ड भी हैब्रह्म और ब्रह्म शक्ति है भी I

ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म के योग का सनातन लिंग अन्न है I

परमेश्वरि और परमेश्वर का सनातन योगलिंग अन्न है I

अन्न स्वरूप में, देव ही देवी और देवत्व हैं I

 

अब विशेष ध्यान देना …

साधकगणों और उनके समस्त उत्कर्ष मार्गों के दृष्टिकोण से, …

वैदिक वांड्मय के समस्त ग्रंथों, उनके मार्गों और दिव्यताओं की योगदशा अन्न हैं I

इसलिए जब अकाल आता है, तब न वेद और न ही वैदिक दिव्यताएं कारगर रही हैं… ऐसा ही मानना चाहिए I

 

मुमुक्षुओं और उत्कृष्ट योगीजनों के दृष्टिकोण से …

ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म की अद्वैत योगदशा ही योगी का आत्मस्वरूप अन्न है I

ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म की योगदशा का अभिव्यक्ति रूपी अन्न ही मुमुक्षु है I

सार्वभौम ब्रह्मशक्ति ही मुमुक्षु योगी का मुक्तिमार्ग स्वरूप अन्न है I

निर्विकल्प ब्रह्म ही मुमुक्षु का कैवल्य मोक्ष नामक अन्न है I

और मुमुक्षु भी ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति का अन्न ही है I

अन्नमय कोष की महिमा, अन्नमय कोष का लाभ, अन्नमय कोष ही आवश्यकता, … अनुग्रह सिद्धि क्या है, कृपा सिद्धि क्या है, अनुग्रह सिद्धि किसे कहते हैं, कृपा सिद्धि किसे कहते हैं, अनुग्रह सिद्ध कौन है, कृपा सिद्ध कौन है, अनुग्रह सिद्ध कौन, कृपा सिद्ध कौन, अन्न साधना, अन्नमय कोष साधना, …

केवल अन्नमय कोष को धारण करके ही ऊपर बताए गए सभी बिंदुओं का साक्षात्कार किया जा सकता है I

इसी साक्षात्कार के लिए तो आत्माएँ स्थूल जीव के रूप में अभिव्यक्त हुई हैं I

इसके सिवा कोई और मूल कारण है भी तो नहीं, किसी भी निर्गुण आत्मा के स्थूलादि देह स्वरूपों को अपनाने का I

इसलिए, जब कोई जीव इन सभी बिंदुओं का सीधा-सीधा ज्ञानमय साक्षात्कार कर लेगा, तो वो जीव उसी क्षण कैवल्य मुक्ति को पाएगा, और जहाँ वो मुक्ति भी आत्यंतिक प्रलय स्वरूप में ही अकस्मात् आएगी I

और ब्रह्मांडीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से वो मुक्ति, सद्योमुक्ति ही कहलाएगी I

यदि ऐसी मुक्ति को पाया हुआ योगी, अपनी स्थूल काया को 3-4 सप्ताह से अधिक रख पाए, तो वो योगी इस समस्त महाब्रह्माण्ड में, अतिविरला ही कहलाएगा I

इसीलिए, ऐसे अतिविरले योगी के बारे में समस्त देवादि लोकों में, देवतागण, देवीगण और उन देवादि लोकों में बसे हुए योगीगण, सिद्धगण और अन्य उत्कृष्ट साधकगण आदि भी बात करते होंगे I

जब योगी इस साधना के गंतव्य पर पहुँच जाता है, तो उसको महामाया ढक कर  सुरक्षित रखती हैं I इसलिए, उसके अपने परिवार जनों को भी यह ज्ञान नहीं होगा, कि वो इस समस्त महाब्रह्माण्ड के एक अतिविरला जीव हुआ है I

और कई महायुगों के पश्चात, कोई योगी, किसी स्थूल धरा पर यहाँ बताई गई सिद्धि को प्राप्त होता है I

इस सिद्धि को कभी भी पाया नहीं जाता, बल्कि इसको प्राप्त हुआ जाता है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह सिद्धि ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति की योगदशा से स्वयंभू हुए अनुग्रह से ही आती है, और इसलिए महाब्रह्माण्ड में, ऐसा योगी ही अनुग्रह सिद्ध (कृपा सिद्ध) कहलाता है I

यह अनुग्रह सिद्धि (कृपा सिद्धि) कर्मों और कर्म फलों से परे है … कर्मातीत मुक्ति से सम्बंधित है I

और क्यूंकि इस कर्मातीत मुक्ति (या कर्ममुक्ति) में, न तो कर्म किए जाते हैं, और न ही उनके कर्मफल ही पाए जाते हैं, इसलिए कर्ममुक्त ही कालमुक्त, गुणमुक्त, भूतमुक्त, मार्गमुक्त आदि दशाओं को दर्शाता है I

और क्यूँकि अनुग्रह सिद्ध अतिविरले होते हैं, इसलिए अन्न की साधना उत्कृष्ट साधनाओं में उत्कृष्टम ही होती है I

तत्त्व साधनाओं से भी आगे की साधना को अन्न साधना कहते हैं I

 

और जहाँ उस अन्न साधना में, अन्न के प्रकार और प्रभेद भी होते हैं Iउस अन्न साधना में, …

अन्न के प्रकार और प्रभेद रूपी तारतम्य में भी, यह साधना मुक्तिमार्ग ही है I

आगे बढ़ता हूँ …

 

अन्नमय कोष और महा ब्रह्माण्ड, अन्नमय कोष और भारत ब्रह्मा, अन्नमय कोष और ब्रह्मा भारत, अन्नमय कोष और महाब्रह्माण्ड, अन्नमय कोष और भरत ब्रह्मा, अन्नमय कोष और ब्रह्मा भरत, अन्नमय कोष और वैदिक भारत, अन्नमय कोष और माँ भारती, अन्नमय कोष और महा ब्रह्माण्ड साक्षात्कार, अन्नमय कोष और भारत ब्रह्मा साक्षात्कार, अन्नमय कोष और भारती विद्या, अन्नमय कोष और भारती विद्या सरस्वती, अन्नमय कोष और भारती सरस्वती विद्या, अन्नमय कोष और भारती सरस्वती, …

इस अन्न साधना के इष्ट और गुरु, भारत ब्रह्मा और उनकी दिव्यता, माँ भारती हैं I

इसी अन्न साधना से ब्रह्मा भरत के महा ब्रह्माण्ड स्वरूप का साक्षात्कार होता है, अर्थात भारत ब्रह्मा के वैदिक भारत स्वरूप का साक्षात्कार होता है I

इसी साधना से भरत ब्रह्मा की दिव्यता और शक्ति, माँ भारती का भी साक्षात्कार होता है I और जहाँ वो माँ भारती हलके पीले वर्ण (अर्थात गोरे वर्ण) के प्रकाश रूप में साधक के मेरुदण्ड के नीचे के भाग में स्वयं प्रकट होती हैं I

देवी भारती ऐसे स्वयंप्रकटीकरण के पश्चात ही साधक निरलम्ब चक्र (अर्थात निरालम्बस्थान या अष्टम चक्र) के साक्षात्कार का पात्र बन सकता है… इससे पूर्व नहीं I

और जहाँ इस निरलम्ब चक्र का मार्ग सहस्रार चक्र से ऊपर जो वज्रदण्ड है, जिसका शब्द “राम नाद” कहलाता है… उस “राम नाद” से होकर ही जाता है I

इसी अन्न साधना के गंतव्य में भारत ब्रह्मा, अर्थात महाब्रह्माण्ड या वैदिक भारत का भी साक्षात्कार होता है I

और जहाँ वो वैदिक भारत ही ब्रह्म की संपूर्ण रचना रूपी अभिव्यक्ति है I

और जहाँ वो रचना और उसका तंत्र भी ब्रह्म ही है I

आगे बढ़ता हूँ …

 

  • प्राणमय कोष, प्राण वायु कोष, प्राण शक्ति, पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण, पञ्च प्राण, पञ्च उपप्राण, इस कोष में पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण होते हैं I

यह पञ्च प्राण और पञ्च उपप्राण, पञ्चब्रह्म की शक्ति रूपी दिव्यता को दर्शाता हैं और जहाँ पञ्चब्रह्म की दिव्यता ही पञ्च मुखा गायत्री हैं I

प्राणमय कोष का एक-एक प्राण और उस प्राण से संबंधित उप-प्राण, पञ्च मुखी गायत्री के एक-एक मुख से संबंधित होते हैं I

इसलिए यह प्राणमय कोष, पञ्च ब्रह्म की संपूर्ण दिव्यता का द्योतक भी है I

और क्यूँकि पञ्च ब्रह्म की दिव्यता ही गायत्री सरस्वती हैं, इसलिए यह प्राणमय कोष माँ गायत्री विद्या सरस्वती को ही उन गायत्री सरस्वती के परिपूर्ण स्वरूप को दर्शाता है I

और क्यूंकि देवि गायत्री ही देवमाता, वेदमाता, पञ्च ब्रह्म की संपूर्ण दिव्यता और पञ्च ब्रह्म का सम्पूर्ण देवत्व हैं, इसलिए यहाँ बताया जा रहा प्राणमय कोष भी इन्ही बिंदुओं को दर्शाता है I

और क्यों की माँ गायत्री सौम्य और उग्र, दोनों ही कोटियों की हैं, इसलिए ऐसा ही यह प्राणमय कोष भी होता है I

इसलिए जबतक इस प्राणमय कोष को छेड़ा नहीं जाएगा, तबतक यह शांत रहता है I

और जब इस प्राणमय कोष को साधक अपने भाव और कर्मों से छेड़ देगा, तो इस प्राणमय कोष के प्राण, अतिउग्र स्वरूप में आ जाते हैं, और साधक के जीवन को ही संकट में डाल देते हैं I

 

इसलिए पञ्च कोष विज्ञान के दृष्टिकोण से, …

प्राणमय कोष ही पञ्चब्रह्म की सम्पूर्ण दिव्यता है I

उन दिव्यता को ही गायत्री सरस्वती विद्या कहा गया है I

वो दिव्यता ही पञ्च ब्रह्म की संपूर्ण शक्ति और अर्धांगनी है I

वही दिव्यता ही वेदमाता, देवमाता, पञ्च ब्रह्म का देवत्व और शक्ति हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इस प्राणमय कोष के प्राणों का नाता पञ्च ब्रह्म और गायत्री सरस्वति से है I तो अब इसको बताता हूँ …

 

इस प्राणमय कोष के पञ्च प्राणों में से, …

अपान प्राण, अपान वायु, … अपान प्राण का नाता तत्पुरुष ब्रह्म से है I

अपान वायु का नाता माँ गायत्री के विद्रुमा मुख से भी है, जिसको माँ गायत्री का रक्ता मुख भी कहा जा सकता है I

यह अपान वायु लाल वर्ण का होता है, और रजोगुण को दर्शाता है I

 

समान प्राण, समान वायु, समान प्राण का नाता वामदेव ब्रह्म से है I

समान वायु का नाता माँ गायत्री के धवला मुख से भी है I

यह समान वायु श्वेत वर्ण का होता है, और सत्त्वगुण को दर्शाता है I

इस वायु का नाता शून्य तत्त्व से भी है I

 

प्राण प्राण, प्राण वायु, प्राण प्राण का नाता सद्योजात ब्रह्म से है I

और प्राण वायु का नाता माँ गायत्री के धवला मुख से भी है I

यह प्राण वायु पीले वर्ण का होता है, और विज्ञानमय तत्त्व को दर्शाता है I

 

उदान प्राण, उदान वायु, उदान प्राण का नाता अघोर ब्रह्म से है I

उदान वायु का नाता माँ गायत्री के नीला मुख (माँ गायत्री का नीला मुख) से भी है I

यह उदान वायु नीले बैंगनी वर्ण का होता है, और तमोगुण को दर्शाता है I

 

व्यान प्राण, व्यान वायु, व्यान प्राण का नाता ईशान ब्रह्म से है I

और व्यान वायु का नाता माँ गायत्री के मुक्ता मुख से भी है, जो स्वच्छ स्फटिक के समान होता है I

यह व्यान वायु हलके गुलाबी वर्ण का होता है, और ब्रह्मशक्ति के महामाया (अर्थात माया शक्ति या अव्यक्त प्रकृति) स्वरूप को भी दर्शाता है I

आगे बढ़ता हूँ …

 

  • मनोमय कोष, मन का कोष, … प्रधानतः वामदेव ब्रह्म का ही होता है, जिनकी दिव्यता माँ गायत्री का धवला मुख है I

लेकिन क्यूंकि मन की एक विशेषता है, कि गंगा गए गंगा राम और यमुना गए यमुना दास, इसीलिए जिस भी दशा में मन गति करेगा, मन उसी दशा के समान हो जाता है I

 

इसलिए, …

मन भी पञ्च ब्रह्म में से सभी का होता है I

मन का ज्ञानमय स्वरूप, सद्योजात ब्रह्म से संबंधित है I

मन का रजोगुणी स्वरूप, तत्पुरुष ब्रह्म से संबंधित है I

मन का समतावादी या सात्विक स्वरूप, वामदेव ब्रह्म से संबंधित है I

मन का तमोगुणी स्वरूप, अघोर ब्रह्म से संबंधित है I

मन का गंतव्य, अर्थात निर्गुण स्वरूप, ईशान ब्रह्म से संबंधित है I

 

ऐसा होने के कारण, …

मन की परिपूर्ण दिव्यता पञ्च मुखी गायत्री ही हैं I

मन का ज्ञानमय स्वरूप, माँ गायत्री के हेमा मुख से संबंधित है I

मन का रजोगुणी स्वरूप, माँ गायत्री के विद्रुमा मुख से संबंधित है I

मन का सात्विक स्वरूप, माँ गायत्री के धवला मुख से संबंधित है I

मन का तमोगुणी स्वरूप, माँ गायत्री के नीला मुख से संबंधित है I

मन का गंतव्य, या निर्गुण स्वरूप, माँ गायत्री के मुक्त मुख से संबंधित है I

 

इसलिए अपने परिपूर्ण स्वरूप में, …

मन पञ्चब्रह्म की परिपूर्णता का द्योतक है I

मन की संपूर्ण दिव्यता पञ्च मुखा गायत्री ही हैं I

मन के देवता सर्वसम, सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह प्रजापति ही हैं I

मन का वास्तविक लोक, सर्वसम, हीरे के समान प्रकाशमान ब्रह्मलोक है I

और ऐसा होने पर भी, उन सर्वसम चतुर्मुखा प्रजापति की अर्धांगनी, माँ सरस्वती का हीरे के समान प्रकाशमान स्वरूप ही मन की वास्तविक दिव्यता है I

 

  • विजयानमय कोष, विज्ञान का कोष, … प्रधानतः सद्योजात ब्रह्म का ही होता है, जिसकी दिव्यता माँ गायत्री का हेमा मुख है I

लेकिन क्यूंकि विज्ञानमय कोष की वास्तविकता समरस्ता ही है, इसलिए ऐसा होने के कारण, जिस भी दशा में यह विज्ञानमय कोष गति करेगा, उसी दशा से सम्बंधित हो जाता है I

 

इसलिए, पञ्च कोष विज्ञान में …

विज्ञानमय कोष पञ्च ब्रह्म का ही होता है I

विज्ञानमय कोष का ज्ञानमय स्वरूप, सद्योजात ब्रह्म से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का रजोगुणी विज्ञान स्वरूप, तत्पुरुष ब्रह्म से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष समतावादी या सात्विक विज्ञान स्वरूप, वामदेव से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष तमोगुणी विज्ञान स्वरूप, अघोर ब्रह्म से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का गंतव्य, ज्ञान (या निर्गुण) स्वरूप, ईशान से संबंधित है I

 

ऐसा होने के कारण, …

विज्ञानमय कोष की परिपूर्ण दिव्यता पञ्च मुखी गायत्री ही हैं I

विज्ञानमय कोष का ज्ञानमय स्वरूप, माँ गायत्री का हेमा मुख से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का रजोगुणी स्वरूप, माँ गायत्री का विद्रुमा मुख से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का सात्विक स्वरूप, माँ गायत्री का धवला मुख से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का तमोगुणी स्वरूप, माँ गायत्री का नीला मुख से संबंधित है I

विज्ञानमय कोष का गंतव्य निर्गुण स्वरूप, गायत्री का मुक्त मुख से संबंधित है I

 

इसलिए अपने परिपूर्ण स्वरूप में, …

विज्ञानमय कोष पञ्च ब्रह्म की परिपूर्णता का द्योतक है I

विज्ञानमय कोष की संपूर्ण दिव्यता पञ्च मुखी गायत्री ही हैं I

विज्ञानमय कोष के देवता, देवराज इन्द्र सहित, हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही हैं I

विज्ञानमय कोष का वास्तविक लोक, इन्द्रलोक सहित, हिरण्यगर्भ ब्रह्म का लोक है I

और ऐसा होने पर भी, विज्ञानमय कोष का नाता उस जीवात्मा से है, जो सावित्री सरस्वती के अकार नामक दशा से, उकार शब्द (अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्म) से होती हुई, मकार (अर्थात त्रिदेव का मणि स्वरूप) से जाकर, ब्रह्मतत्त्व (अर्थात प्रणव) में बसकर, ओमकार का साक्षात्कार करके, अंततः ॐ के ही ऊपर के बिन्दु में विलीन होती है I

और ऐसा विलीन होने के पश्चात, वह जीवात्मा “स्वयं ही स्वयं को” देख ही नहीं पाती I

 

  • आनंदमय कोष, अन्तःकरण चतुष्टय, … अन्तःकरण चतुष्टय के चार प्रधान भाग होते है, जो मन, बुद्धि, चित्त और अहम् हैं I ऐसा होने पर भी अन्तःकरण, प्रधानतः, ईशान ब्रह्म का होता है I

 

लेकिन आनंदमय कोष में, …

मन नामक भाग वामदेव ब्रह्म का है I

बुद्धि नामक भाग सद्योजात ब्रह्म का है I

चित्त नामक भाग तत्पुरुष ब्रह्म का है I

और अहम् नामक भाग अघोर ब्रह्म का है I

इन सबके मध्य में जो बिन्दु रूप प्रकाशमान होता है, वो ईशान ब्रह्म का होता है I

इसलिए अन्तःकरण चतुष्टय, पञ्च ब्रह्म में से सभी से संबंधित होता है I

 

आनंदमय कोष के,…

मन नमक भाग का सगुण निराकार स्वरूप, मनाकाश है I

बुद्धि नामक भाग का सगुण निराकार स्वरूप, ज्ञानाकाश है I

चित्त नामक भाग का सगुण निराकार स्वरूप, चिदाकाश है I

अहम् नामक भाग का सगुण निराकार स्वरूप, अहमाकाश है I

आनंदमय कोष के भागों के गंतव्य का साक्षात्कारी योगी, ऐसा होता है, …

मन के गंतव्य का साक्षात्कारी योगी, मनात्मा होकर, मन ब्रह्म को पाएगा I

बुद्धि के गंतव्य का साक्षात्कारी योगी, ज्ञानात्मा होकर, ज्ञान ब्रह्म को पाएगा I

चित्त के गंतव्य का साक्षात्कारी योगी, चिदात्मा होकर, चेतन ब्रह्म को पाएगा I

अहंकार के गंतव्य का साक्षात्कारी योगी, अहमात्मा होकर, अहम् ब्रह्म को पाएगा I

 

इस अन्तःकरण चतुष्टय के मध्य में बिंदु स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार भी होता है, और जहाँ वो आत्मा, सगुण स्वरूप में, एक प्रकाशित अवस्था में ही होती है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

पञ्च कोष की सापेक्ष सूक्ष्मता, पञ्च कोष की तुलनात्मक सूक्ष्मता, पञ्च कोषों की सापेक्ष सूक्ष्मता, पञ्च कोषों की तुलनात्मक सूक्ष्मता,

अब पञ्च कोषों की सापेक्ष सूक्ष्मता के दृष्टिकोण से इनका वर्णन करता हूँ, …

  • अन्नमय कोष, अन्न का कोष, अन्न का शरीरी रूप, … यह अन्न से बना हुआ कोष, स्थूल शरीर कहलाता है I

पञ्च कोषों की सापेक्ष (या तुलनात्मक) सूक्ष्मता के दृष्टिकोण से यह सबसे स्थूल होता है I

  • प्राणमय कोष, प्राणवायु कोष, … यह कोष अपनी स्थूल दशा से दूसरा है, अर्थात यह प्राणमय कोष, अन्नमय से सूक्ष्म होता है, और मन इस कोष से सूक्ष्म होता है I

इसलिए पञ्च कोषों की सापेक्ष (या तुलनात्मक) सूक्ष्मता के दृष्टिकोण से, यह कोष अन्नमय और मनोमय के मध्य में ही होता है I

  • मनोमय कोष, मनस कोष, … यह प्राणमय से सूक्ष्म होता है, और विज्ञानमय कोष इससे सूक्ष्म होता है I

इसलिए पञ्च कोषों की सापेक्ष (या तुलनात्मक) सूक्ष्मता के दृष्टिकोण से, यह मनोमय कोष, प्राणमय कोष और विज्ञानमय कोष के मध्य में ही होता है I

  • विज्ञानमय कोष, बुद्धि कोष, … यह मनोमय कोष से सूक्ष्म होता है, और आनंदमय कोष इससे सूक्ष्म होता है I

इसलिए पञ्च कोषों की सापेक्ष (या तुलनात्मक) सूक्ष्मता के दृष्टिकोण से, यह विज्ञानमय कोष, मनोमय और आनंदमय कोषों के मध्य में ही होता है I

  • आनंदमय कोष, अंतःकरण चतुष्टय, अंतःकरण, … पञ्च कोषों में यह सबसे सूक्ष्म होता है I यह अंतःकरण चतुष्टय ही प्रकृति की मूलावस्था है, इसलिए यह प्रकृति का ही द्योतक है I

इस अन्तःकरण चतुष्टय की प्रकृति अविद्या की द्योतक होती हुई भी, वास्तव में ब्रह्मपथ ही है I लेकिन ऐसा ब्रह्मपथ तो केवल वैदिक वाङ्मय से संबद्ध मार्गों से ही प्रशश्त होता है, न की किसी और मार्ग से I

जिस भी साधक ने इस आनंदमय कोष के अज्ञान स्वरूप को पार कर लिया, वो इसी आनंदमय कोष के मध्य में आत्मा को एक प्रकाशमान सगुण स्वरूप में, बिन्दु रूप में साक्षात्कार करेगा I

आगे बढ़ता हूँ …

 

पञ्च कोष का गंतव्य, पञ्च कोषों का गंतव्य, पञ्च कोष की गंतव्य दशा, पञ्च कोषों की गंतव्य दशा, …

अब इन पञ्च कोषों की गंतव्य दशा और उस गंतव्य दशा की मूल दिव्यता को बताता हूँ …

लेकिन यहाँ बताया हुआ मार्ग, मेरे इस जन्म के आत्ममार्ग का ही अंग है, इसलिए इसको उसी क्रम में बताया गया है, जो मेरे साक्षात्कार मार्ग का क्रम भी हुआ था I

 

  • प्राणमय कोष का गंतव्य, … पञ्च ब्रह्म और पञ्च मुखी गायत्री हैं I

इसलिए प्राणमय कोष पञ्च ब्रह्म और उनकी दिव्यता गायत्री विद्या सरस्वती को भी दर्शाता है I

 

  • मनोमय कोष का गंतव्य, … माँ शारदा सरस्वती हैं, जिनका स्वरूप श्वेत और ग़ुलाबी वर्णों के योग का है, और जिनका स्थान हृदय में है, और जो हृदय में ब्रह्म… इस वाक्य को दर्शाती हैं I

इसका अर्थ तो यह भी हुआ, कि शारदा विद्या सरस्वती का स्वरूप, श्वेत वर्ण की परा प्रकृति और हलके गुलाबी वर्ण की अव्यक्त प्रकृति की योगावस्था ही है I

शारदा विद्या का संबंध त्रिनेत्र के ऊपर जो तथागतगर्भ है, उससे भी है I लेकिन इस तथागतगर्भ (या अनादि शक्ति, या महामाया का ब्रह्माण्डीय कोष) के बारे में एक बाद के अध्याय में बताया जाएगा I

 

  • विज्ञानमय कोष का गंतव्य, … वो जीवात्मा स्वरूप है, जो अंततः प्रणव में विलीन होता है I

प्रणव से संबंधित होने के कारण, इस विज्ञानमय कोश की गंतव्य दिव्यता, माँ सावित्री सरस्वति हैं I

इनका स्थान साधक के मस्तिष्क के भीतर आज्ञा चक्र से लेकर ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष और उस ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर बसे हुए प्रणव (ब्रह्मतत्त्व), और उस ब्रह्मतत्त्व के भीतर बसे हुए ओमकार तक है I

 

  • आनंदमय कोष का गंतव्य, … वो हिरण्यगर्भात्मक आत्मा है, जो ब्रह्मरंध्र के मध्य में छोटे छोटे तीन चक्रों में से, मध्य के बत्तीस दल कमल में एक सुनहरे (स्वर्णिम) शरीरी रूप में, पद्मासन में बैठी होती है, और ऊपर की ओर (अर्थात सहस्रार से परे या ऊपर की ओर या आकाश की ओर) देखती रहती है I

और यही सुनहरा शरीर साधक का सगुण साकार हिरण्यगर्भात्मक स्वरूप है, जिसका संबंध माँ ब्राह्मणी सरस्वती से है, क्यूंकि इस सुनहरे आत्मस्वरूप की गंतव्य दिव्यता के स्वरूप में माँ ब्राह्मणी विद्या सरस्वती ही हैं I

साधक के शरीर में इनका स्थान सहस्र दल कमल (अर्थात सहस्रार चक्र) से लेकर, शिवरंध्र से ऊपर बसे हुए वज्रदण्ड तक और वज्रदण्ड चक्र से लेकर अष्ठम चक्र तक भी है I

 

  • अन्नमय कोष का गंतव्य, … पञ्च महाभूत हैं, जिनकी दिव्यता माँ भारती सरस्वती हैं, जिनका स्वरूप प्रधानतः गोरा (पीला) है, लेकिन उसमें भगवे-लाल वर्ण के बिन्दुओं का योग भी है I

इस अन्नमय कोष का गंतव्य महाब्रह्माण्ड है, जिसके देवता भारत नामक ब्रह्म हैं, और जिसकी दिव्यता, भारती विद्या सरस्वती ही हैं I

और जहाँ वो महाब्रह्माण्ड भी साधक की काया के भीतर ही प्रकाशित होता है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

पञ्च कोष विज्ञान उत्कर्षपथ है, पञ्च कोष विज्ञान उत्कर्षमार्ग है, पञ्च कोष और मुक्तिमार्ग, पञ्च कोष विज्ञान मुक्तिमार्ग है, … पञ्च कोष विज्ञान ही उत्कर्ष पथ है, पञ्च कोष विज्ञान ही उत्कर्ष मार्ग है, पञ्च कोष विज्ञान ही मुक्तिमार्ग है, पञ्च कोष विज्ञान विज्ञान और मुक्तिमार्ग, …

ऐसा होने का कारण, यह पञ्चकोष विज्ञान, वो उत्कर्ष मार्ग (उत्कर्ष पथ) भी है जो अंततः मुक्तिपथ (मुक्ति मार्ग) स्वरूप में, साधक के भीतर ही प्रकाशित होता है I

और क्यूंकि यह पञ्च कोष विज्ञान साधक के भीतर से ही प्रकाशित होता है, इसलिए यह आत्ममार्ग का ही अंग है I

इसलिए, यहाँ बताए जे रहे पञ्च कोष विज्ञान से साधकगण मुक्ति पथगामी हो जाते हैं I और इसी पञ्च कोष के विज्ञान के साक्षात्कार से, साधकगण मुक्ति को भी प्राप्त हो जाते हैं I

टिपण्णी: क्यूंकि इन पञ्च कोषों में से, अन्नमय कोष जो स्थूल शरीर कहलाता है, वो प्रत्यक्ष ही है, इसलिए इस कोष पर यहाँ बात नहीं होगी I अन्य सभी कोशों को यहाँ पर, कुछ प्रत्यक्ष रूप में और कुछ सांकेतिक रूप में ही बताया जाएगा I

 

अन्न किसे कहते हैं, अन्न की परिभाषा, अन्न के प्रकार क्या हैं, अन्न के प्रभेद क्या हैं, पञ्च कोष के अन्न, …

अन्न के प्रकार और प्रभेद भी होते हैं, तो अब इनको बताता हूँ I

 

अन्न के प्रकार क्या?, … अन्न कई प्रकार का होता है, जो ऐसे होते हैं, …

  • अन्नमय कोष का अन्न, … यह वो स्थूल अन्न है, जिसका सेवन मुंह से किया जाता है I

और इसके अतिरिक्त, यह वो सेवन किए हुए अन्न का तात्त्विक स्वरूप भी है, जो वास्तव में अन्न है, और जिसको स्थूल शरीर की कोशिकाएं अंततः पाती हैं I

  • प्राणमय कोष का अन्न, … जो वायु हम स्वास से अपने भीतर लेते हैं, वही प्राणमय कोष का अन्न है I

इसलिए, जब तक वायु स्थूल शरीर से बाहर होती है, तब तक ही वो वायु कहलाती है I और जब वही वायु श्वास के रूप में स्थूल शरीर के भीतर चली जाती है, तब वही वायु प्राण कहलाती है I

शरीर में प्राण की गति और प्रवाह के अनुसार ही पञ्च कोषों के समस्त अन्न का फैलाव और पाचन प्रक्रिया चलित होती है I

  • मनोमय कोष का अन्न, … यह साधक की इच्छा शक्ति और भाव होता है I

इसलिए, मन के भाव और इच्छा ही, मन का अन्न हैं I

  • विज्ञानमय कोष का अन्न, … यह साधक का अर्जित किया हुआ विज्ञान होता है I

और जहाँ वो विज्ञान भौतिक, आध्यात्मिक और दैविक तीनों प्रकार का होता हैं I

इसी विज्ञानमय कोष के अन्न के अनुसार ही मन के अन्न का स्वरूप होता है I

इसलिए, यदि विज्ञानमय कोष भौतिक जगत में ही रमण करेगा, तो मन के भाव और इच्छा भी भौतिकी ही होगी I और यदि विज्ञानमय कोष आध्यात्मिक या दैविक जगत में ही रमण करेगा, तो मन के भाव और इच्छा भी आध्यात्मिक या दैविक ही होंगे I

  • आनंदमय कोष का अन्न, … इसके चार भाग होते हैं, जो अंतःकरण चतुष्टय से संबंधित होते हैं … इसलिए अब इनको एक एक करके बताता हूँ …

अंतःकरण चतुष्टय के चित्त भाग का अन्न, चित्त का अन्न, … यह साधक के संस्कार होते हैं, जो साधक के कर्मों के अनुसार उन कर्मों के फलों के बीजरूप को दर्शाते हैं I

अहम् का अन्न, अंतःकरण चतुष्टय के अहम् भाग का अन्न, … यह साधक की धारणा होती है I

धारणा के मूल में संस्कार ही होते हैं, जो साधक के चित्त में ही बीजरूप में निवास करते हैं I

मन का अन्न, अंतःकरण चतुष्टय के मन भाग का अन्न, … यह साधक के भाव होते हैं I

भावों के मूल में पूर्व के कर्म फल और उनके संस्कार ही होते हैं और यही धारणा के प्रकार के कारण भी होते हैं I

अन्तःकरण चतुष्टय के बुद्धि भाग का अन्न, बुद्धि का अन्न, … यह साधक के उत्कर्ष मार्ग का वो भाग है, जो साधक के प्राप्त किए हुए समस्त ज्ञान से संबंध रखता है I

आगे बढ़ता हूँ …

 

अन्न के प्रभेद क्या?, … ऊपर बताए गए सभी अन्न के केवल तीन ही प्रभेद होते हैं, जो राजसिक, सात्विक और तामसिक कहलाते है I

इसलिए ऊपर बताए गए सभी अन्न, इन्ही तीनो प्रभेदों में ही बसे होते हैं और इन्ही तीन प्रभेद का आलम्बन लेके, इनकी व्याख्या करी जा सकती है, और इनके स्वरूपों को भी जाना जा सकता है I

 

तो अब इन तीन गुण रूपी प्रभेद के अनुसार, ऊपर बताए गए सभी अन्न के समस्त प्रभेदों को बताता हूँ …

  • अन्न का सात्विक प्रभेद, सात्विक अन्न… जो सात्विक प्रभेद है, उसमें समता निवास करती है I

इसलिए इस प्रभेद में सगुण निर्गुण ब्रह्म का निवास होता है I

और शक्ति स्वरूप में इसी अन्न में परा प्रकृति (या माँ आदि शक्ति) का वास होता है I

इसी अन्न से साधक सत्त्वगुण सिद्धि को भी पाता है I

 

  • अन्न का राजसिक प्रभेद, राजसिक अन्न, … जो राजसिक प्रभेद है, उसमें तृष्णा और क्रिया निवास करती है I

इसलिए इस अन्न में रजोगुणी ब्रह्म निवास करता हैं I

ऐसे अन्न का सेवन, तृष्णाओं को उग्र बनाता ही है I

इसी अन्न से साधक अस्मिता सिद्धि (रजोगुण सिद्धि) को भी पाता है I

 

  • अन्न का तामसिक प्रभेद, तामसिक अन्न, … जो तामसिक प्रभेद है, उसमें स्थिरता, आलस्य, निद्रा आदि निवास करती है I

इसलिए इस अन्न में तमोगुणी प्रकृति निवास करती है I

ऐसे अन्न के सेवन से, तृष्णाएं शान्त होती हैं और निद्रा की प्रधानता होती है I

इसी अन्न से साधक तमोगुण सिद्धि को भी पाता है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

पञ्च कोषों का प्रादुर्भाव मार्ग, पञ्च कोषों का विलय मार्ग, पञ्च कोष का प्रादुर्भाव मार्ग, पञ्च कोष का विलय मार्ग, पञ्च कोष का प्रादुर्भाव और विलय मार्ग, पञ्च कोषों का प्रादुर्भाव और विलय मार्ग, …

अब पञ्च कोषों के प्रादुर्भाव और विलय मार्ग को बताता हूँ …

 

अन्नमय कोष के पञ्च महाभूतों का उदय क्रम, अन्नमय कोष के पञ्च महाभूतों का लय क्रम, अन्नमय कोष में महाभूत का उदय क्रम, अन्नमय कोष में महाभूत का लय क्रम,  शून्य अनंत मार्ग, अनंत शून्य मार्ग, शून्य अनंतः, अनंत शून्यः, शून्य अनंतः अनंत शून्यः, अनंत शून्यः शून्य अनंतः, शून्य ब्रह्म मार्ग, …

पञ्च कोष विज्ञान, अन्नमय कोष, पञ्च महाभूत,
पञ्च कोष विज्ञान, अन्नमय कोष, पञ्च महाभूत,

 

इस भाग को समझने के लिए, ऊपर के चित्र से जोड़कर देखना I

पूर्व के अध्याय में बताया था, कि …

उत्पत्ति का क्रम, लय के क्रम से विपरीत होते है I

तो इस मूल ज्ञान से अन्नमय कोष में बसे हुए पञ्च महाभूत का उत्पत्ति और लय क्रम बताता हूँ …

 

अन्नमय कोष के भीतर के पांच महाभूतों का उदय क्रम, महाभूतों के उदय क्रम का दिशा संकेत,

यह उदय क्रम ऐसा होता है …

पञ्च ब्रह्म के मध्य में स्थित ईशान के आकाश महाभूत से, अघोर और वामदेव के मध्य की दक्षिण-पश्चिम दिशा के वायु महाभूत से, वामदेव और तत्पुरुष के मध्य की उत्तर पश्चिम दिशा के अग्नि-महाभूत से, अघोर और सद्योजात के मध्य की दक्षिण-पूर्व दिशा के जल महाभूत से, और अंततः सद्योजात और तत्पुरुष के मध्य के उत्तर-पूर्वी दिशा के पृथ्वी महाभूत तक I और इसके पश्चात, पुनः ईशान ब्रह्म के ईशान महाभूत तक, क्यूंकि उदय होने के पश्चात, यह सब महाभूत, आकाश में भी बसे रहते हैं I

ऐसे उदय के पश्चात, आकाश में ही इन सबका निवास होता है, अर्थात आकाश ने ही इन सबको घेरा होता है, इसलिए यह सब महाभूत, आकाश के भीतर ही बसे रहते हैं I

और यही कारण है, कि इस मार्ग के दिशा संकेत से इन सबकी अंतगति भी मध्य के ईशान के आकाश महाभूत की ओर ही जाएगी I

और यदि ऊपर बताई गई दिशाओं के अनुसार इन पञ्च महाभूतों का उदय क्रम जानेंगे, तो वो गणित के अनंत (Infinity, ∞) का चिन्ह ही हो जाएगा I

लेकिन जिसको आज का गणित में अनंत का चिंन्ह कहता है, वो वास्तव में शून्य अनंत (अर्थात शून्य ब्रह्म) का चिन्ह है I

उस शून्य अनंत में, शून्य ही अनंत होता है, और अनंत ही शून्य I

यह उदय क्रम, उस शून्य अनंत को दर्शाता है, जो अनंत शून्य ही होता है I

इस उदय क्रम में कौन सा शून्य है और कौन सा अनंत वो पता नहीं चलता I

इसलिए, यह उदय क्रम, शून्य अनंतः अनंत शून्यः के वाक्य को ही दर्शा रहा है I

इसलिए, यदि महाभूतों का उदय क्रम इन दिशाओं से जाएंगे, तो वो शुन्य अनंत स्वरूप में ही पाया जाएगा I इसलिए, …

महाभूत का उदय उस शून्य में से होता है, जो अनंत होता है I

और ऐसा होने के साथ साथ, वो अनंत भी शून्य ही होता है I

इसका अर्थ हुआ, कि महाभूत शून्य और अनंत दोनों को ही सामान रूप में दर्शाते हैं, इसलिए पञ्च महाभूत का उदय क्रम भी उसी शून्य अनंत में चलित होकर, उसी शून्य अनंत में स्थापित होता है I

इसलिए, पञ्च महाभूत उनके उदय क्रम की दिशा संकेतों के अनुसार, शून्य ब्रह्म को ही दर्शाते हैं I

और क्यूंकि शुन्य अनंत (अर्थात शून्य ब्रह्म) ही श्रीमन नारायण हैं, इसलिए जबकि पञ्च महाभूतों का प्रादुर्भाव पितामह ब्रह्मा से होता है, लेकिन तब भी इन पञ्च महाभूतों के स्वामी भी श्रीमन नारायण ही हैं I

और क्यूंकि शून्य अनंत (या शून्य ब्रह्म) ही श्रीमन नारायण हैं, इसलिए महाभूत श्रीमन नारायण के ही आधीन होते हैं I

और ऐसा तब भी है, जब महाभूतों का उदय, पितामह ब्रह्मा की इच्छा शक्ति से ही हुआ था I

और ऐसा इसलिए है क्यूंकि पितामह ब्रह्मा की इच्छा शक्ति ही वो नारायणी शक्ति हैं, जो ब्रह्मानुजा कहलाई थीं, और जिनको माँ लक्ष्मी कहा गया था, और जो प्रचुरता (परिपूर्णता या विपुलता) की ही द्योतक हैं I

 

अन्नमय कोष के भीतर के महाभूतों का लय क्रम, महाभूतों के लय क्रम का दिशा संकेत, … असंप्रज्ञात समाधि और महाभूतों का लय, निर्बीज समाधि और महाभूतों का लय, …

तो अब अन्नमय कोष के भीतर के महाभूतों के लय क्रम और उसका चिंन्ह रूप बताता हूँ …

किसी का भी विलय क्रम, उसके उदय (या उत्पत्ति) क्रम से विपरीत होता है I

लेकिन यदि इस बिंदु को दिशा संकेतों से जानेंगे, तो भी जो चित्र बनेगा, वो उदय क्रम का शून्य अनंत ही होगा I

इसका अर्थ हुआ, कि जब साधक भूतातीत होता है (अर्थात जब साधक पञ्च महाभूतों से परे जाता है), तब भी यह पञ्च महाभूत जो साधक के शरीर में ही बसे होते हैं, वो इसी शून्य अनंत (अर्थात आज के गणित का अनंत चिंन्ह, Infinity, ∞) के मार्ग पर ही उनके अपने ब्रह्माण्डीय कारणों में विलीन होते हैं I

लेकिन क्यूंकि योग साधना मार्ग में, शून्य अनंत (या शून्य ब्रह्म) का साक्षात्कार असंप्रज्ञात समाधि से ही होता है, इसलिए जब साधक के भीतर बसे हुए पञ्च महाभूत उनके अपने ब्रह्माण्डीय कारणों में विलीन होने के मार्ग पर जाएंगे, तब साधक असम्प्रज्ञात समाधि से जाकर ही इन महाभूतों को विलीन कर पाएगा I

और क्यूंकि यह विलीन होने पर साधक निर्बीज ही हो जाएगा, इसलिए जब साधक उसके अन्नमय कोष के पञ्च महाभूतों को उनके अपने अपने ब्रह्माण्डीय कारणों में विलीन करने का पात्र बनेगा,  तब वो साधक असंप्रज्ञात समाधि के तुरंत बाद, निर्बीज समाधि को भी पाएगा I

और क्यूंकि अन्नमय कोष के भीतर बसे हुए पञ्च महाभूत के उनके अपने कारणों में लय का यह एक प्रमुख बिंदु है I

और क्यूंकि यह पञ्च कोष विज्ञान सहित, पञ्च महाभूत साक्षात्कार मार्ग भी मुक्तिपथ ही है, इसलिए इस अध्याय के पञ्च महाभूत और पञ्च कोष के मार्ग रूपी मुक्तिपथ पर गमन करने पर, साधक ऊपर बताई गई दोनों समाधियों को पाएगा ही I इन समाधियों के बारे में, कुछ बाद के अध्याय में बात होगी I

तो इसी बिंदु पर यह अध्याय समाप्त होता है, और अब मैं अगले अध्याय पर जाता हूँ, जिसका नाम प्राणमय कोष, पञ्चप्राण है I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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