नचिकेताग्नि, योगाग्नि गुफा, योग अग्नि, हृदय अग्नि, नचिकेता अग्नि, तपाग्नि, साधनाग्नि, उत्कर्षाग्नि, तपस्वी की अग्नि, तेजाग्नि, धर्मराज अग्नि, धर्माग्नि, यमराज अग्नि, तप सिद्धांत, जीव जगत तपस्वी है, जीव जगत योगी है

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यहाँ पर योगाग्नि गुफा, योग अग्नि, हृदय अग्नि, नचिकेताग्नि, उत्कर्षाग्नि, नचिकेता अग्नि, तपाग्नि, साधनाग्नि, तपस्वी की अग्नि, तेजाग्नि, धर्मराज अग्नि, धर्माग्नि, यमराज अग्नि, उत्कर्षा अग्नि, उत्कर्ष पथ की अग्नि, तप सिद्धांत, जीव जगत तपस्वी है, और जीव जगत योगी है, इन बिंदुओं पर बात होगी I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2011 ईस्वी के प्रारम्भ का है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर अपने हिरण्यगर्भत्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में उनके अपने ही हिरण्यगर्भत्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकेर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का चवालीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये अध्याय आंतरिक यज्ञमार्ग की श्रृंखला का ग्यारहवाँ अध्याय है।

 

हृदयाकाश गर्भ में योगाग्नि का स्थान
हृदयाकाश गर्भ में योगाग्नि का स्थान, हृदयाकाश गर्भ में नचिकेताग्नि, हृदयाकाश में तपाग्नि, हृदयाकाश में धर्माग्नि,

 

 

योगाग्नि क्या है?, योग अग्नि क्या है?, हृदय योग अग्नि गुफा क्या है?, नचिकेताग्नि क्या है?, नचिकेता अग्नि क्या है?, नचिकेता अग्नि गुफा क्या है?, तप अग्नि क्या है?, तपाग्नि क्या है?, तप की अग्नि क्या है?, साधनाग्नि क्या है?, साधना की अग्नि क्या है?, साधना अग्नि क्या है?, साधक की अग्नि क्या है?, तेजाग्नि क्या है?, तैजस की अग्नि क्या है?, धर्मराज अग्नि क्या है?, यमराज अग्नि क्या है?, धर्माग्नि क्या है?, उत्कर्ष पथ की अग्नि क्या है?, उत्कर्षाग्नि अग्नि क्या है?, … समस्त जीव अग्निमय हैं, जीव अग्निमय है, समस्त जीव तपस्वी हैं, जीव तपस्वी हैं, योगाग्नि और तप सिद्धांत, योगाग्नि ही तप सिद्धांत का मूल है, … समस्त जगत योगी है, समस्त जीव योगी हैं, … नचिकेताग्नि और तप सिद्धांत, नचिकेता अग्नि और तप सिद्धांत, तेजाग्नि और तप सिद्धांत, योगाग्नि और तप सिद्धांत, धर्माग्नि और तप सिद्धांत, साधनाग्नि और तप सिद्धांत, …

ह्रदय आकाश गुफा में बैठे हुए सनातन गुरु योग अग्नि गुफा की ओर उंगली दिखाकर बोले… यह जो योगाग्नि गुफा है, उसकी अग्नि को ही नचिकेताग्नि कहा गया है, इसलिए इस गुफा को ह्रदय की नचिकेताग्नि गुफा भी कहा जा सकता है I क्यूंकि इस अग्नि को बल तपश्चर्या से मिलता है, इसलिए यह तपाग्नि भी है I क्यूंकि तपस का मूल साधना ही होता है, इसलिए इसको साधनाग्नि भी कहा जा सकता है I यही साधक के उत्कर्ष पथ की वास्तविक अग्नि है, और इसका मूल स्वरूप विशुद्ध, अर्थात प्रचंण्ड तेजस है, इसलिए इसको ही तैजस अग्नि और तेजाग्नि भी कहा जा सकता है I इस अग्नि का नाता धर्मराज (या यमराज) से भी है, इसलिए इस अग्नि को धर्माग्नि, धर्मराज अग्नि और यमराज अग्नि भी कहा जा सकता है I और ऐसा होते हुए भी नर्काग्नि नहीं है, क्यूंकि इस अग्नि का कोई भी नाता नर्क आदि लोकों से नहीं है I इसी अग्नि से उत्कर्ष पथ की समस्त बाधाएं ध्वस्त होती हैं, इसलिए यही उत्कर्ष मार्ग की अग्नि, उत्कर्षाग्नि भी है I

सनातन गुरु आगे बोले… इस अग्नि का नाता केवल और केवल योगी के तपबल, धर्मबल, जपबल, साधनाबल से है, और इसी बल को यह अग्नि दर्शाती भी है I जिस योगी के तपबल, जपबल, साधनाबल और धर्मादि बल अधिक होते हैं, उस योगी के हृदयाकाश गर्भ में यह अग्नि प्रचंण्ड ही पाई जाएगी I क्यूंकि इनसब बल का नाता योगी के योगमार्ग से ही होता है, इसलिए मूलतः यह अग्नि योगी की योगाग्नि को ही दर्शाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि ब्रह्म की रचना में यह अग्नि समस्त जीवों के भीतर ही बसाई गई है, इसलिए इस अग्नि अग्नि के दृष्टिकोण से, समस्त जीव योगी ही हैं, समस्त जीव तपस्वी ही हैं, समस्त जीव साधक ही हैं I क्यूंकि कार्य ब्रह्म जो इस जीव जगत के रचैता हैं, और वही योगेश्वर हैं, और क्यूंकि योगेश्वर अपने से पृथक कुछ और बना ही नहीं पाए थे, इसलिए भी समस्त जीव जगत योगी ही है, और उन्ही योगेश्वर के द्वारा ही प्रशस्त किए गए इस जीव जगत रूपी उत्कर्ष मार्ग पर ही गमन कर रहा है, और तबसे गमन कर रहा है जबसे इस ब्रह्म रचना का प्रादुर्भाव हुआ है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले…  क्यूँकि योगमार्ग, तपस्या और साधना से ही होकर जाता है, इसलिए समस्त जीव जगत साधक ही है, तपस्वी ही है I उन योगेश्वर ने इस जीव जगत को इसी तपस्वी, और साधक के स्वरूप में ही बनाया था, इसलिए समस्त जीवों और जगत के भीतर भी यही योगाग्नि स्थापित करी गई है, और वह भी इस जगत और उसके समस्त जीवों के ह्रदय आकाश गर्भ में I जैसे जीव के हृदय आकाश गर्भ में यह अग्नि होती है, वैसे ही यह अग्नि, जगत के आकाश में भी पाई जाएगी I इस कारण से भी, ब्रह्म रचना में जो भी है, जिस भी दशा में है और जिस भी कालखंड में है, वह सब योगी है, साधक है और तपस्वी ही है I और क्यूंकि यह जीव जगत ऐसा ही है, इसलिए जबतक कोई जीव तपादि मार्गों में नहीं जाएगा, तबतक उसका कल्याण भी असंभव ही है I लेकिन कलियुग के कालखण्डों में अधिकाँश साधकगणों के लिए, उस साधना, योग और तप का मार्ग, नाम जप तक ही सीमित रह जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… प्रत्याहार और त्याग आदि का प्रत्येक मार्ग भी इसी योगाग्नि से संबंधित है, इसलिए जब भी कोई योगी इन मार्गों में जाएगा, तो वह प्रत्यहार और त्याग प्रक्रिया भी उस योगी के हृदय आकाश गर्भ में बसी हुई इसी योगग्नि से ही होकर जाएगी I और जबतक योगी की ऐसा प्रक्रिया, इस अग्नि में नहीं जाएगी, तबतक वह योगी इस प्रत्याहार और त्याग भाव में पूर्णरूपेण स्थापित भी नहीं हो पाएगा I और जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक वह योगी इस जीव जगत से अतीत होने के उस मार्ग को भी नहीं पाएगा, जो मुक्तिमार्ग कहलाता है I इसलिए समस्त उत्कर्ष मार्गों सहित, मुक्तिपथ में स्थापित करने के लिए भी यह अग्नि सहायक होती है I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरु को सर हिलाकर पुष्टिकारक संकेत दिया I

 

योग अग्नि और उत्कर्ष स्थिति, योग अग्नि की प्रबलता और उत्कर्ष स्थिति, … योग अग्नि और उत्कर्ष पथ पर गति, योग अग्नि और उत्कर्ष पथ में स्थिति, योग अग्नि और उत्कर्ष पथ पर गति और स्थिति, …

सनातन गुरुदेव बोले… इस योग अग्नि की प्रबलता से ही जाना जाता है, कि योगी अपने उत्कर्ष पथ में कितना आगे तक गया है I उत्कर्ष पथ पर जितना आगे योगी गया होगा, उतनी ही प्रबल और तीक्ष्ण उस योगी के हृदयाकाश गर्भ के भीतर बसी हुई यह योगाग्नि भी होगी I इसलिए चाहे कोई अपने बारे में कुछ भी कहे, यह योगाग्नि की दशा ही उस योगी की उत्कर्ष पथ पर गति और स्थिति, दोनों को दर्शाती है I लेकिन जो योगीजन नहीं है, उनके हृदयाकाश में भी यह अग्नि अपने न्यून स्वरूप में बसी ही होती है, और ऐसा इसलिए है, क्यूंकि इस समस्त ब्रह्म रचना में कोई जीव है ही नहीं, जो इस योग अग्नि का धारक नहीं है और यही अग्नि जगत के प्रत्येक भाग के हृदयाकाश गर्भ में भी, सदैव ही निवास करती है I ऐसा होने के कारण भी, इस समस्त ब्रह्म रचना में कुछ है ही नहीं, जो योगी नहीं है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले…  यह भी वह कारण है, इस समस्त ब्रह्म रचना, और इस ब्रह्म रचना के उत्कर्ष और तंत्र मार्ग में, योग ही एकमात्र मूल है… योग ही इस जीव जगत का मूल है… योग ही सर्वमूल है I और ऐसा भी इसलिए है, क्यूंकि इस जीव जगत के रचैता जो कार्य ब्रह्म हैं, वही योगेश्वर हैं I और उन योगेश्वर ने अपने समान ही इस जीव जगत को बनाया है, जिसके कारण इस जीव जगत की वास्तविकता में, यह योगी ही है I उन योगेश्वर द्वारा रचित यह जीव जगत, योगी के सिवा और कुछ हो भी तो नहीं सकता है क्यूंकि वह रचैता, जो जीव जगत का अभिव्यक्ता है, उसकी अभिव्यक्ति भी तो उसके समान ही होगी I

नन्हा विद्यार्थी जो अपने गुरु मुख की ओर देखता हुआ, आनंदित होता हुआ यह सब सुन और समझ रहा रहा था, उसने अपने गुरुदेव को अपना सर हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

सनातन गुरु बोले… योग से ही यह अग्नि साधक के हृदयाकाश गर्भ में प्रज्वलित होती है, योग से ही तीव्र होती है, और योग से ही यह अग्नि चलित भी होती है I इस अग्नि के प्रज्वलित स्वरूप के मूल में योग है, इस अग्नि के चलित स्वरूप में योगमार्ग पर गति है, और इस अग्नि के तीव्र रूप के मूल में योग की ही सिद्धि होती है I इसलिए जो वास्तविक योगी होगा, उसकी यह अग्नि तीव्र ही होगी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जिस साधक की धारणा में समस्त ब्रह्माण्ड ही आ गया, उसकी यह अग्नि तीव्र ही होगी I और जिस साधक का ब्रह्माण्ड योग ही सिद्ध हुआ होगा, उसकी यह अग्नि प्रचंण्ड ही होगी I जितनी उच्च दशा से योग होता है, उतनी ही यह अग्नि प्रचंण्ड हो जाती है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जो साधक अपने मन बुद्धि चित्त अहम् आदि में ही संन्यास धारण करता है, उसकी यह अग्नि प्रचंण्ड हुए बिना नहीं रह पाती I इस अग्नि से ही समस्त बंधन कटते हैं I जिस योगी की आंतरिक दशा संन्यासी के समान ही हो गई, वह योगी भी उस दशा को तब पाया होगा, जब इस अग्नि ने उसके बंधन और उनके सूक्ष्मादि कारण जला दिए होंगे I इसलिए वह योगी अपनी संन्यासी की दशा को भी इस अग्नि से बंधन कटने के पश्चात ही पाया होगा I योग सिद्धि के पश्चात ही त्याग नामक दशा आती है, क्यूंकि जबतक योग ही नहीं हुआ, तबतक किसे त्यागोगे I वास्तव में तो त्यागि ही संन्यासी हो पाया है, और ऐसे संन्यासी की यह योगाग्नि प्रबल हुए बिना भी नहीं रह पाती है I इसलिए जिस साधक की यह योगाग्नि प्रबल होती है, तो यह प्रमाण भी होता है, कि उसकी आंतरिक दशा में वह संन्यासी ही है I ऐसे वास्तविक संन्यासी को उन बिंदुओं से कुछ भी लेना देना नहीं होता, जो ग्रंथ आदि के मार्गों में बताए गए हैं, क्यूंकि जो वास्तविक संन्यासी होगा, वह ग्रंथातीत, दिशातीत, दशातीत, तंत्रातीत और मार्गातीत भी होगा ही I इसलिए ऐसा वास्तविक संन्यासी चाहे समाज में रहे या दुर्गम समाज रहित स्थानों पर, उसको किसी से कुछ भी लेना देना नहीं होता I जो ऐसा है उसकी यह योगाग्नि भी अतिप्रबल ही होगी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इस योगाग्नि के देवता धर्मराज ही हैं, इसलिए यही यमराज की अग्नि है, यही धर्मराज की अग्नि है, यही धर्माग्नि भी है I और ऐसा होने के कारण, जिस योगी में यह अग्नि प्रचंण्ड होगी, उसपर धर्मराज, जो धर्म, जीवन और मृत्यु तीनों ही सामान रूप में हैं, उनका अनुग्रह भी हुआ ही होगा I यदि उन धर्मराज का अनुग्रह पाए बिना ही यह अग्नि प्रचंण्ड हो जाएगी, तो योगी का देहावसान हुआ बिना भी नहीं रह पाएगा I धर्मराज ने ही इस अग्नि को नाचिकेता नामक योगी को प्रदान किया था, इसलिए इस अग्नि का एक मूलस्वरूप नचिकेताग्नि का भी है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अंततः जो त्यागा जाता है, वह कर्म, कर्मफल और उसके संस्कार ही होते हैं I और इसका मार्ग वह हृदयाकाश गर्भ का तंत्र ही है, जिसके भीतर ही इस योगग्नि की गुफा विराजमान होती है I यही कारण है, कि जबतक योगी पूर्ण संन्यास के मार्ग पर नहीं चलता है, तबतक वह योगी, हृदयाकाश गर्भ तंत्र में पूर्ण सफलता भी नहीं पाएगा, क्यूंकि ऐसी अपूर्ण संन्यास की दशा में, उसकी योगग्नि अपने वास्तविक प्रचंण्ड स्वरूप में भी नहीं आएगी I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… योग तबतक सिद्ध नहीं होता, जबतक वह सर्वस्व से, अर्थात महाब्रह्माण्ड से नहीं होता I और ऐसा होने के लिए, वही सर्वस्व (अर्थात महाब्रह्माण्ड) उस योगी की धारणा में भी होना होगा I और जबतक ऐसा नहीं होता, योगी के लिए पूर्ण संन्यास का मार्ग भी प्रशस्त नहीं होता, जिसके कारण उस योगी के हृदयाकाश में बसी हुई यह योगाग्नि भी अपने पूर्ण प्रचंण्ड स्वरूप में नहीं आती I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया क्यूंकि उसने पूर्व में इस अग्नि के प्रचंण्ड और हृदयाकाश में व्यापक स्वरूप देखा ही था, इसलिए उसने अपना सर आगे पीछे हिलाकर, इस बिंदु के समझ में आने का पुष्टिकारी संकेत भी दिया I

सनातन गुरु बोले… अब हमें इस हृदयाकाश गर्भ की सभी गुफाओं और उनके भागों की शुद्धिकरण प्रक्रिया में जाना है I

 

रजोगुण गुफा का शुद्धिकरण,

सनातन गुरुदेव बोले… अब उस रजोगुण गुफा को देखो और जानो कि उसका जो पूर्व में शुद्धिकरण हुआ था, उससे संस्कार और उनके मार्गों का शुद्धिकरण तो हो गया है, परन्तु उसमें अभी भी भावों का आवागमन हो रहा है, जिसके कारण वह अपने विशुद्ध स्वरूप को नहीं पाई है I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और वैसे ही पाया, जैसा गुरु ने कहा था I

सनातन गुरु बोले… जब इस गुफा का शुद्धिकरण हो जाएगा, तो इसमें भाव के मार्ग भी नहीं रहेंगे I और जब ऐसा हो जाएगा, तो तुम अपने सभी पूर्व के भावों और उनकी दशाओं से भी अतीत हो जाओगे I जबतक योगी भावातीत ही नहीं होता है, तबतक वह योगी उन निर्गुण ब्रह्म के सीधे-सीधे साक्षात्कार का पात्र भी नहीं हो सकता I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि वह निर्गुण ब्रह्म, निर्भाव ही हैं और यदि उन निर्भाव ब्रह्म को प्राप्त होना है, तो उनके समान होकर ही उनको प्राप्त हो पाओगे I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि योगमार्गों में किसी दशा को प्राप्त होने के लिए, उस दशा के समान ही योगी की आंतरिक स्थिति को होना होता है I जबतक योगी अपनी आंतरिक दशा में उस देवत्वादि बिन्दु के समान नहीं होता, तबतक वह उस देवत्वादि बिन्दु का न साक्षात्कार कर पाता है, और न ही उसमें लय ही हो पाता है, अर्थात प्राप्त हो पाता है I इसलिए यदि किसी देवत्वादि बिंदु को प्राप्त होना है, तो अपनी आंतरिक स्थिति में उसी देवत्व आदि बिंदु के समान हो जाओ I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जैसा पूर्व में बताया था, कि ब्रह्म को यदि जानना है, तो अपनी आंतरिक दशा में, ब्रह्म ही हो जाओ, इसलिए उस निर्भाव ब्रह्म से योग और उसका ज्ञान भी, योगी को उस अपनी निर्भाव दशा से ही प्राप्त होता है I इसलिए जबतक योगी भावातीत ही नहीं होता, तबतक वह योगी निर्भाव ब्रह्म को जानने का पात्र भी नहीं हो सकता I जबतक कोई किसी दशा को जानने का पात्र ही नहीं हुआ, तबतक वह उस दशा को अपने साक्षात्कारों में जान भी नहीं पाता है I और क्यूँकि इस महरहमाण्ड के समस्त इतिहास में, निर्भाव ब्रह्म को जानने के पात्र बहुत की कम संख्या में हुए हैं, और क्योंकि निर्भाव ही निर्गुण होता है, इसलिए उस निर्गुण के सीधे-सीधे साक्षात्कारी योगीजन भी बहुत कम संख्या में हुए हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जो अतिविरले योगी ऐसे सीधे-सीधे साक्षात्कारी हुए भी थे, वह भी तब हो पाए थे, जब वह अपनी आंतरिक दशा में, उस निर्गुण ब्रह्म के समान, भावातीत हुए थे I इसलिए तुम भी जबतक इन भावों से अतीत नहीं होगे, तबतक निर्गुण ब्रह्म साक्षात्कार के पात्र नहीं हो पाओगे I और जबतक तुम उन निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं करोगे, तबतक तुम भी वैसे ही कहोगे, जैसे बहुत सारे योगीजन कहते हैं, कि “ब्रह्म को कौन जान पाया है… कोई भी तो नहीं” I ऐसे कहने का मूल कारण भी वही है, जो अभी बताया गया है, कि भावातीत होकर ही उस भावातीत ब्रह्म को, उसके ही निर्गुण निराकार स्वरूप में जाना जाता है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि भावातीत नामक शब्द भी निर्गुण ब्रह्म का ही द्योतक होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… भाव को चलित करने में, यही रजोगुण सहायता देता है, इसलिए अभी भी इस रजोगुण गुफ़ा के भीतर यह भाव चालित होते हुए दिखाई दे रहे हैं I परंतु जब इस गुफा का शुद्धिकरण हो जाएगा तो ऐसा नहीं दिखेगा क्यूंकि उस शुद्धिकरण प्रक्रिया में, उन पूर्व के भावों के जो पथ रहे हैं, वह सब नष्ट हो जाएंगे I ऐसा होने पर इस रजोगुण गुफ़ा का भावों से कोई नाता नहीं रहेगा और इसके कारण, यह भाव इस गुफा के रजोगुण से चालित भी नहीं हो पाएंगे I इस दशा के पश्चात ही कोई योगी भावातीत दशा को पाने का पात्र बनता है, और ऐसा योगी ही उस निर्भाव समाधि को सिद्ध करता है, जिसके पश्चात वह भावातीत होकर ही उन भावातीत ब्रह्म के निर्गुण निराकार स्वरूप को पाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… निर्गुण में और निर्गुण की कोई सिद्धि नहीं होती, क्यूंकि निर्गुण तो सिद्धितीत है I सिद्धि केवल शक्ति में होती है, जो उस निर्गुण ब्रह्म की ही पूर्ण अभिव्यक्ति है I लेकिन ऐसे अभिव्यक्त करने के पश्चात भी वह निर्गुण, सिद्धितीत ही रहा है I और ऐसा वह इसलिए रहा है, क्यूंकि वह अपने अभिव्यक्तियों का साक्षी स्वरूप ही है I जो साक्षी है, वही निर्गुण है और उस सर्वसाक्षी ब्रह्म का मार्ग भी भावातीत दशा से ही प्रशस्त होता है I जो भावातीत ही नहीं हुआ, वह कैसा साक्षी… और जो साक्षी ही नहीं है, वह तो निर्गुण भी नहीं हो सकता है I अपनी इच्छा शक्ति नामक भावनात्मक दशा में बासकर ही तो उन रचनातीत ब्रह्म ने अपनी समस्त रचना, अपनी ही अभिव्यक्ति स्वरूप में रची थी, इसलिए भावातीत दशा इस रचना से अतीत ही होती है, और यही भावातीत दशा उन रचनातीत ब्रह्म को भी दर्शाती है I और क्यूँकि रचना से अतीत तो वह निर्गुण निराकार ब्रह्म ही है, जो सर्वसाक्षी ही है, जो इस समस्त जीव जगत का एकमात्र अभिव्यक्ता होता हुआ भी, अपनी अभिव्यक्ति रूपी रचना, अर्थात जीव जगत से सुदूर ही है, इसलिए भावातीत दशा उन्ही सर्वसाक्षी निर्गुण निराकार ब्रह्म का मार्ग है I यही कारण है कि इस रजोगुण गुफ़ा में जो अभी भाव दिखाई देते हैं, वह निर्गुण ब्रह्म साक्षात्कार मार्ग के गतिअवरोधक ही है I

सनातन गुरु ने हृदयाकाश गर्भ के मध्य स्थान की ओर संकेत दिया और बोले… अब हम पुनः वहां जाएंगे और वहीँ से आगे का अध्ययन करेंगे I

और हृदयाकाश गर्भ के उस मध्य भाग में पहुँच कर, वह दोनों गुरु और शिष्य बैठ गए, जिसके पश्चात सनातन गुरु बोले… अब उन सभी दृश्य और अदृश्य मार्गों का शुद्धिकरण इसी योगाग्नि का आलम्बन लेकर करो, और इस प्रक्रिया में स्वयं को अपनी आंतरिक दशा में इस प्रक्रिया के कर्म और फल से अनासक्त रखो और इस प्रक्रिया में उसी संस्कार का आलम्बन लो, जो पूर्व के शुद्धिकरण के फलस्वरूप प्रकट हुआ था I

नन्हें विद्यार्थी ने वैसा ही किया और इसके पश्चात अपने गुरु के मुख की ओर देखा I

सनातन गुरु बस उस योगाग्नि गुफा की ओर ही देखता गए और कुछ समय पश्चात वह बोले… अब देखो, दृश्य और अदृश्य संस्कार और उनके दृश्य और अदृश्य पथ भी समाप्त हो गए हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और अपने गुरुदेव को बोला… गुरु चंद्रमा,  अब यह योगाग्नि गुफा तो स्वयं ही स्वयं को भस्म कर रही है I

और इसके पश्चात, वह योगाग्नि अपनी गुफा की सीमा का ही उलंघन कर गई और स्वयं ही स्वयं को जलाती हुई उस योगाग्नि की स्थिति सप्तरंगी हो गई I

और उस नन्हें विद्यार्थी ने यह भी देखा, कि सनातन गुरुदेव शांत हैं, और वह उस योगाग्नि गुफा को देखते जा रहे हैं I

 

मनस गुफा और तमोगुण गुफा का शुद्धिकरण, मनस गुफा का शुद्धिकरण, तमोगुण गुफा का शुद्धिकरण, हृदय की मनस गुफा और तमोगुण गुफा का शुद्धिकरण, हृदय की मनस गुफा का शुद्धिकरण, हृदय की तमोगुण गुफा का शुद्धिकरण,

कुछ समय व्यतीत हुआ और सनातन गुरुदेव बोले… अब इसी शुद्धिकरण प्रक्रिया को मनस गुफा और तमोगुण गुफा के लिए भी करो I

नन्हें विद्यार्थी ने गुरु आदेशानुसार, मनस गुफा और तमोगुण गुफा दोनों के लिए पुनः वैसा ही किया, और करने के पश्चात उसने गुरु के मुख की ओर देखा, क्यूंकि योगाग्नि अभी भी सप्तरंगि स्वरूप में ही थी I

सनातन गुरु बोले… अब इन गुफाओं का अध्ययन करो I

और कुछ ही समय में नन्हें विद्यार्थी ने देखा, कि योगाग्नि अपनी गुफा की सीमा का पुनः उलंघन कर रही है, और उस योग अग्नि से पटाखे फटने की आवाजें आ रही है I उस योगग्नि के भीतर सभी गुफाओं के दृश्य और अदृश्य संस्कार और उनके पूर्व के मार्ग भी प्रवेश कर रहे हैं, और ऐसे कुछ मार्गों में जो फंसे हुए संस्कार थे, वह भी इस योगाग्नि गुफ़ा में प्रवेश कर रहे हैं, और जैसे जैसे यह सब उस योगाग्नि में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे वैसे उस योगाग्नि गुफा में बहुत सारे पटाखे फट रहे हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने तो यह भी पाया, कि इस शुद्धिकरण प्रक्रिया के पश्चात तो हृदयाकाश गर्भ की सभी गुफाएं अपनी अपनी अशुद्धियाँ, संस्कार और उनके पूर्व के बने हुए मार्ग भी इसी योगाग्नि में त्यागती ही जा रही हैं I

जब यह चल रहा था, तो उस नन्हें विद्यार्थी ने यह भी पाया कि उसका स्थूल शरीर और मस्तिष्क हलका हो गया है I

इसपर उसने अपने गुरु से प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा,  स्थूल शरीर हल्का कैसे हो गया है? I

सनातन गुरुदेव बोले… उस योगाग्नि का अध्ययन करो I और कुछ समय पश्चात गुरु बोले… अंततः साधक की चेतना, पक्षी के समान उस अनंताकाश में उड़ान भरती है I इसलिए यदि चेतना को ऊंची उड़ान भरनी है, तो उसको हल्का भी होना होगा I ब्रह्मपथ उसी अनंताकाश में बसा हुआ मार्ग है, इसलिए उस ब्रह्मपथ में तभी गमन किया जाता है, जब अतिरिक्त भार, जैसे यह संस्कार उनके मार्ग, और भावादी हैं, उनको त्याग दिया जाता है I

नन्हें विद्यार्थी गुरु वाक्य सुनकर, गुरु के पूर्व आदेशानुसार योगाग्नि गुफा का अध्ययन करता गया I

और कुछ समय के बाद सनातन गुरु बोले… जो अब दिखाई दे रहा है, वह इस योगाग्नि का वास्तविक वर्ण और स्वरूप है I

और इसके पश्चात, सनातन गुरु ने अग्नि महाभूत गुफा, जो उसी हृदयाकाश गर्भ में बसी हुई थी, उसकी ओर उँगली से संकेत किया और बोले… देखो, इस हृदयाग्नि का वास्तविक स्वरूप, उस अग्नि महाभूत के स्वरूप से पृथक ही होता है I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और वैसा ही पाया I

कुछ समय में जब योगाग्नि शांत होकर, पुनः अपनी गुफा के भीतर प्रतिष्ठित हो गई, तब गुरु बोले… अब हम पुनः रजस गुफा में प्रवेश करके जानेंगे कि क्या वह गुफा पूर्ण शुद्ध हुई है या नहीं I

और ऐसा कहकर, वह गुरु और शिष्य अपने उस समय के स्थान से उठकर, रजस गुफ़ा की ओर चलने लगे I

अपने शिष्य का हस्त पकड़कर, रजोगुण गुफा की ओर चलते चलते सनातन गुरु यह भी बोले… देखो, इस हृदयाकाश गर्भ की सभी गुफाओं को, और जानो कि अब न तो संस्कार रहा है और न ही कोई मार्ग ही रह गया है I सब की सब गुफाएँ विशुध्द हो चुकी हैं I और अब चित्त में केवल एक ही संस्कार शेष रह गया है, जो चमक रहा है और यही तुम्हारा (अर्थात नन्हें विद्यार्थी का) अंतिम संस्कार है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब संस्कारों का कोई पूर्व का मार्ग ही नहीं रहा, तो वह संस्कार चालित होकर, योगाग्नि की ओर ही आकर्षित होते हैं, और अंततः नष्ट हो जाते हैं I ऐसी दशा में बस अंतिम संस्कार ही शेष रह जाता है, जो उस शुद्धिकरण प्रक्रिया के पूर्ण होने का प्रमाण भी होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

अपने गुरु के साथ उस रजस गुफा की ओर जाते जाते, नन्हे शिष्य ने प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा, क्यूंकि समस्त जीवों सहित, योगी का चित्त भी ब्रह्माण्डीय चित काया का अभिन्न अंग होता है, इसलिए क्या यह शुद्धिकरण प्रक्रिया ब्रह्माण्ड पर भी अपना प्रभाव डालेगी?, और क्या यह प्रक्रिया ब्रह्माण्ड की चित्त काया पर कोई प्रभाव डालती है?, और क्या इस प्रक्रिया से ब्रह्माण्डीय तंत्र भी प्रभावित हो सकता है? I

सनातन गुरुदेव ने उत्तर दिया… किसी भी जीव के अन्तःकरण चतुष्टय के चित्त आदि भागों में जो संस्कार होते हैं, उनके प्रतिबिम्ब ब्रह्माण्डीय चित्तादि काया में दिखाई देते हैं I इसलिए जब साधक अपने हृदय के भीतर जाकर, इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र के मार्ग से अपने हृदयाकाश का शुद्धिकरण करता है, तो उसके चित्तादि के संस्कार और उन संस्कारों के मार्ग भी नष्ट हो जाते हैं I और ऐसी दशा में उन संस्कारों और उनके मार्गों के प्रतिबिम्ब जो ब्रह्माण्डीय चित्त काया में होते हैं, वह भी नष्ट हो जाते हैं I पर क्यूंकि यह संस्कारादि उतने ही नष्ट होते हैं, जितने उस साधक के चित्तादि की शुद्धिकरण प्रक्रिया में जाते हैं, और क्यूंकि एक साधक के चित्तादि शुद्धिकरण में समस्त जीवों के चित्तादि भी विशुद्ध नहीं होते हैं, इसलिए निश्चिंत रहो, इस प्रक्रिया से न तो ब्रह्माण्ड के समस्त संस्कार नष्ट होंगे और न ही ब्रह्माण्डीय तंत्रादि में कुछ अधिक प्रभाव ही पड़ेगा I इस शुद्धिकरण प्रक्रिया से ब्रह्माण्डीय चित्त आदि काया भी उतनी ही सीमा में विशुद्ध होगी, जितनी दशा में उनके संस्कार साधक के हृदयाकाश में नष्ट हुए हैं… न तो इससे कुछ अधिक होगा और, न ही इससे कुछ कम ही होगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब केवल एक या कुछ जीव इस प्रक्रिया को करते हैं, तो समस्त ब्रह्माण्ड का तंत्र भी प्रभावित नहीं हो सकता I पर जब कोई योगी इस प्रक्रिया को करता है, तो ब्रह्माण्डीय दिव्यताएं इतना तो जान ही जाती हैं,  कि किसी एक लोक का कोई योगी इस शुद्धिकरण प्रक्रिया का ज्ञान पा गया है I और क्यूंकि यह शुद्धिकरण प्रक्रिया कुछ ही समय में समाप्त भी जो जाती है, और योगी के संस्कारों के साथ साथ, उन सभी संस्कारों के ब्रह्माण्डीय चित्त काया में बसे हुए प्रतिबिम्ब भी नष्ट हो जाते हैं, तो वह ब्रह्माण्डीय दिव्यताएं यह नहीं जान पाती हैं, कि किस लोक के कौन से योगी ने इस ज्ञान को पाया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… संस्कार आदि के पूर्ण नष्ट होने से योगी का ब्रह्माण्ड से नाता ही टूट जाता है, और ऐसी दशा के पश्चात, कोई कैसे जानेगा, कि वह योगी किस लोक में है, या कौन है I यही कारण था कि इस प्रक्रिया में दृश्य और अदृश्य संस्कार और उनके समस्त दृश्य और अदृश्य पथ को भी जोड़े गए थे ताकि तुम इस प्रक्रिया के पूर्ण होते ही, गुप्त हो जाओ I इसलिए इस मार्ग के योगीजनों के बारे में कोई तबतक नहीं जान पाता, जबतक वह योगी “स्वयं ही स्वयं को” ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के समक्ष और अपने पूर्णस्वरूप में ही प्रकाशित न करे I और योगी की ऐसी गुप्त दशा में, ब्रह्माण्डीय दिव्यताएं यह तो जान जाती है कि किसी लोक का कोई योगी संस्कार नाश के मार्ग को पाया है, लेकिन उस योगी को इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के पश्चात, वह ब्रह्माण्डीय दिव्यताएं ढूंढ नहीं पाती हैं क्यूंकि जब उस योगी का ब्रह्माण्ड से नाता, जो उस योगी के संस्कार और उनके मार्ग से था, वह ही नष्ट हो गया, तो उस योगी को कोई कैसे ढूंढ या जान पाएगा I

सनातन गुरु आगे बोले… लेकिन यदि इस प्रक्रिया को बहुत सारे जीव एक साथ करेंगे, तो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा आदि तंत्र अवश्य प्रभावित होगा I ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि यह तंत्र मार्ग हृदयाकाश से जुड़ा हुआ है, और इस हृदयाकाश का सीधा सीधा नाता, ब्रह्माण्डीय आकाश महाभूत से है I और क्यूँकि आकाश महाभूत ही ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं का ग्रह होता है, इसलिए यदि बहुत सारे जीव इस प्रक्रिया को एक साथ करेंगे, तो आकाश महाभूत की ऊर्जाओं पर प्रभाव पड़ेगा, जिससे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा तंत्र अवश्य ही प्रभावित होगा I और इसके साथ साथ, ब्रह्माण्डीय चित्त आदि काया की प्रक्रिया भी अवश्य प्रभित होगी, क्यूंकि साधक के चित्त आदि में बसे हुए संस्कार, उसी ब्रह्माण्ड की चित्त आदि काया में प्रतिबिंबित होते हैं I और यदि बहुत सारे जीव एक ही समय पर करेंगे, तो ब्रह्माण्डीय संस्कारों और उनके मार्गों का नाश भी अधिक मात्रा में होगा, जिससे ब्रह्माण्ड के भीतर सूक्ष्मता भी बढ़ेगी और इससे समस्त जीवों के उत्कर्ष पथ भी सूक्ष्म तत्त्वों की ओर जाएंगे और विशुद्ध होंगे I

सनातन गुरु आगे बोले… लेकिन क्यूंकि इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की सिद्धि को केवल कुछ ही साधक पाते हैं, इसलिए वह दशा जिसमें बहुत बड़ी संख्या में जीवों का इस मार्ग में आना है और ब्रह्माण्डीय तंत्र को ही प्रभावित कर देना है… वह असंभव सी ही है I इसलिए निश्चिंत रहो कि इस ज्ञान से ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्डीय तंत्र पर कोई बड़ा प्रभाव कभी नहीं पड़ने वाला है I यह अध्याय अधिक जीवों के लिए होगा भी नहीं, क्यूंकि अधिकांश साधक इसको समझ ही नहीं पाएंगे और जो इसमें आ भी गए, उनमें से उतने ही इसको सिद्ध कर पाएंगे, जितने तुम्हारी उँगलियों पर ही गिना जा सकता है I यही कारण है, कि…

पिण्ड, ब्रह्माण्ड होता हुआ भी, ब्रह्माण्ड को कभी पूर्णतः प्रभावित नहीं कर पाया है I

जीव, जगत होता हुआ भी, जगत को कभी पूर्णतः प्रभावित नहीं कर पाया है I

इसलिए, ब्रह्माण्ड रचैता के आधीन, उसकी रचना स्वरूप में ही रहा है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जितने साधक इस पथ पाए जाएंगे, उनकी संख्या भी उतनी ही होगी जिससे उस आगामी गुरुयुग की सूक्ष्मता और सूक्ष्म ऊर्जाओं को प्रकट करके, उनको उस गुरुयुग की पूर्वनिश्चित अवधि के लिए स्थापित रखा जा सके I इसलिए ऐसे साधकगण जो इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में आएँगे, उनकी संख्या न तो कभी इससे अधिक होगी, और न ही कभी इससे न्यून ही हो पाएगी I इसका कारण है कि किसी भी लोक में ब्रह्माण्ड इससे अधिक साधकगण, कभी भी नहीं भेजेगा क्यूंकि ब्रह्माण्ड को पता है कि ऐसे साधकगणों की यदि संख्या वृद्धि हो गई, तो उसका तंत्र ही प्रभावित हो जाएगा I ऐसा इसलिए है क्यूंकि…

ब्रह्माण्ड कोई मृत या जड़त्व को पाइ हुई ब्रह्म रचना है ही नहीं I

ब्रह्माण्ड ब्रह्मचेतना से युक्त, ज्ञान से संयुक्त, और क्रियामय है I

ब्रह्माण्ड, ब्रह्म की इच्छा शक्ति से भरा हुआ, ब्रह्माधीन है I

ऐसे होने के कारण से ही वह ब्रह्माण्ड, जीवतीत हुआ है I

इसलिए ब्रह्माण्ड पर जीवों का अधिक प्रभाव नहीं है I

और जीवों पर ब्रह्माण्ड का प्रभाव, पूर्ण ही होता है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब जीव और जगत के नाते को बताता हूँ, इसलिए इसपर ध्यान देना…

समस्त जीव जगत की उत्पत्ति के मूल में उन रचैता ब्रह्म की इच्छा शक्ति ही है I

ब्रह्म की इच्छा शक्ति से जो ब्रह्माण्ड उदय हुआ था, वह सूक्ष्म संस्कारिक था I

वह प्राथमिक ब्रह्माण्ड, अपने सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में जीवों के भीत है I

और स्थूलादि जीव, ब्रह्माण्ड के किसी न किसी स्वरूप के भीतर बसे हैं I

इसलिए, ब्रह्माण्ड जीवों के भीतर और जीव, ब्रह्माण्ड के भीतर हैं I

इसलिए, ब्रह्माण्ड भी जीवों का ब्रह्माण्डीय स्वरूप ही हैं I

और जीव भी ब्रह्माण्ड के पिण्ड स्वरूप ही होते हैं I

यदि एक को छुओगे तो दूसरा भी छुआ जाएगा I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और यह सब बिंदु उन सबपर भी लागू होते हैं, जो जीव शब्द के अंतर्गत होते हैं, और चाहे वह जीव कोई अवतार ही क्यों न हो I

नन्हें विद्यार्थी को अभी भी शंका थी, तो उसने पुछा… गुरु चंद्रमा, तो उस गुरुयुग में इस मार्ग पर कौन जा पाएगा और गुरुयुग क्या है? I

सनातन गुरु बोले… मानव युग चक्र का ज्ञान अब लुप्त हो गया है, क्यूंकि अब तो केवल देवयुग का ही ज्ञान बचा हुआ है और वह भी अपने अपूर्ण स्वरूप में I परन्तु वैदिक गणित में तो और बहुत सारे युग हुआ करते थे I वह युग जो पृथ्वी की धुरी के विषुव के पूर्वगमन चक्र के भीतर चलायमान होता है, वह मानव युग चक्र कहलाता है I वैदिक समय इकाई में इस पृथ्वी की धुरी के विषुव के पूर्वगमन चक्र की अवधि 24,000 वर्षों की है, जिसमें दो पूर्ण मानव युग चक्र होते है और जिनकी आयु 12,000 वर्षों की होती है I आज की समय इकाई में इसकी आयु कोई 25,776 वर्षों की है I  यही 12,000 वर्ष का युगचक्र मनु ने भी बताया था, परंतु मनु ने जो 12,000 वर्षों का समय बताया था, उसका नाता तो कई और चक्रों से भी है I तो अब इस पृथ्वी लोक से संबद्ध, उन चक्रों में से कुछ को वैदिक इकाई के अनुसार बताता हूँ…

मानव युग चक्र की आयु 12,000 सूर्य वर्ष है I

देवयुग चक्र की आयु 12,000 दिव्य वर्ष है I

दो महाकल्प की आयु 12,000 देववर्ष है I

ब्रह्मा की आयु 12,000 महाकल्प है I

खंडप्रलय 12,000 वर्षों में आती है I

यह खंड प्रलय का समय ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… वैदिक गणित में सदैव ही पृथ्वी की धुरी के विषुव के पूर्वगमन की मध्यम इकाई का प्रयोग किया गया है I ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह इकाई उन सर्वसम चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म के लोक की होती है I इस इकाई के अनुसार कलियुग की आयु 432,000 सूर्य वर्ष की है I लेकिन इस कलियुग के भीतर ही एक वैदिक मानव युग आता है, जो मानव सत्युग कहलाता है, और यही गुरुयुग है I इस गुरु की आयु दो सतयुग की आयु की होती है, अर्थात 9600 वर्ष का कालखण्ड I यह गुरुयुग का कालखण्ड पृथ्वी के प्रत्येक अग्रगमन चक्र (अर्थात पृथ्वी के विषुव के पूर्वगमन) चक्र में, एक बार आता है I और क्यूँकि उसी वैदिक इकाई में, इस विषुव के पूर्वगमन चक्र की आयु 24,000 वर्ष होती है, जिसमें दो 12,000 वर्षों के पूरे मानव चतुर्युग होते हैं, इसलिए कलियुग के कालखंड में 18 विषुव के पूर्वगमन चक्र होते हैं, और इसलिए किसी भी कलयुग में 18 गुरुयुग भी होते हैं I और आज के समय चल रही पातालपुरी की इकाई में, इस गुरुयुग की आयु 10,310 सूर्य वर्षों की है I

सनातन गुरुदेव बोले… कलियुग के कालखंड में 18 गुरुयुग होते हैं, और अभी के समयखण्ड में इन 18 में से प्रथम गुरुयुग के उदय होने का समय आ रहा है I और क्यूंकि कोई भी गुरुयुग, देवताओं के कलियुग को स्तम्भित करके ही प्रकट होता है, इसलिए कुछ ही वर्षों में अभी चल रहा देव कलियुग स्तम्भित होगा I और कुछ ही वर्षों में, उस आगामी गुरुयुग की नींव भी डाली जाएगी, और वह भी इसी पृथ्वी लोक में I गुरुयुग को वैदिक युग भी कहा जाता है, क्यूंकि इस युग में वेदमार्ग ही प्रधान मार्ग होता है I उस गुरुयुग में पञ्च मुखा सदाशिव के किसी एक मुख से और 2592 सूर्य वर्षों से 108 वर्ष के अंतराल के भीतर, कोई न कोई योगी इस भू लोक में लौटाया जाता है I वह योगी सदाशिव का योगी ही होता है I और इस गुरुयुग के आगमन से 2592 वर्ष से 108 वर्षों के पूर्व में भी सदाशिव के अघोर मुख का योगी आता है, जो आदि शंकराचार्य ही थे और जिनका आगमन 510 इसा पूर्व से 2.7 वर्षों के अंतराल में ही हुआ था I इसलिए उनके 2592 वर्षों से 108 वर्ष के अंतराल में, जो अभी का समय खंड ही है, एक हिरण्यगर्भ के कार्य ब्रह्म नामक अभिव्यक्ति के लोक का योगी भी आएगा, और वह महेश्वर का योगी होगा जो उस आगामी जो गुरुयुग का आधार डालेगा I और वह योगी तो अब इस भूलोक में आ भी चुका है I

इसके पश्चात सनातन गुरु बोले… अब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देता हूँ I इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में वही साधक जा पाएगा, जो इसका पात्र होगा… और कोई भी नहीं I

थोड़ा और चलके, गुरु और उनका नन्हा शिष्य उस रजस गुफा में प्रवेश कर गए, जिसके पश्चात सनातन गुरुदेव बोले… यह सबसे कष्टकारी गुफा है, यदि यह स्वच्छ न हो I और यही गुफा सबसे अच्छी भी होती है, जब इसका पूर्ण शुद्धिकरण हो जाता है I

और इसके बाद सनातन गुरु बोले… यहीं से देखकर बताओ, क्या हृदयाकाश गर्भ की किसी भी गुफा में तुम्हें अब कोई संस्कार या उसका मार्ग दिखाई दे रहा है? I

नन्हें विद्यार्थी ने उसी रजस गुफा से देखा, और कहा… गुरु चंद्रमा… नहीं, अब ऐसा कुछ नहीं है I

सनातन गुरुदेव मुस्कुराते हुए बोले… अब इस नन्हे शिष्य का जहाज बिना रुकावट और व्याधि के समस्त ब्रह्माण्ड रूपी सागर में गति करने लगेगा, और उसी ब्रह्माण्ड रूपी सागर से परे, शनैः शनैः ही सही, लेकिन जाने लगेगा I

इसपर नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, तो क्या यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र पूर्ण हुआ? I

इसपर सनातन गुरु बोले… प्राण रजोगुणी होते हैं, इसलिए अपनी क्रियामय स्थिति में इस रजोगुण गुफा का नाता, प्राण गुफा से भी होता है I इस रजोगुण गुफ़ा के शुद्धिकरण से, प्राणों का भी शुद्धिकरण हुआ है I और इस शुद्धिकरण प्रक्रिया से, प्राण इतने सूक्ष्म हुए हैं, कि वह इस रजोगुण को भी भेदने लगे हैं I क्यूँकि रजोगुण सबकुछ चलित रखता हुआ भी, उसका मूल स्वाभाव प्रत्याहार ही होता है, इसलिए प्राणों की ऐसी सूक्ष्मता में, रजोगुण अपनी वास्तविक दशा जो प्रत्याहार ही है, उसको को पुनः पाएगा, जिससे आगामी समयखण्डों में शरीर को अधिकांशतः प्राण ही चलाएंगे और शरीर के भीतर का रजोगुण अपने प्रत्यहार में ही जाएगा, जो उसका मूल स्वरूप है I यही वह दशा होती है जब साधक रजोगुण समाधि को पाता है I जबतक रजोगुण अपने इस मूल स्वरूप को नहीं पाता, तबतक वह शरीर के भीतर बसे हुए ब्रह्माण्ड में व्यापक और शक्तियुक्त भी नहीं हो पाता I जबतक रजोगुण व्यापक और शक्तिमान नहीं होता, तबतक साधक उसको ब्रह्माण्ड के भीतर चलायमान भी नहीं कर पाता और ऐसी दशा में साधक वह कुछ भी नहीं कर पाता है, जो रजोगुण के इस मूल स्वरूप से किया या पाया जा सकता है I ऐसी दशा को पाकर ही साधक इस रजोगुण गुफ़ा के भीतर पुनः आकर, आनंदित होता है… अन्यथा वह ऐसा आनंदित नहीं हो  पाएगा, और इसके विपरीत बहुत दुखी ही हो जायेगा I

सनातन गुरु आगे बोले… उत्कर्ष मार्गों का नाता भी इस रजोगुण से होता है, और किसी भी साधक की उत्कर्ष पथ पर गति भी इसी रजोगुण से होती है I लेकिन ऐसा होने पर भी, इस रजोगुण का मूल स्वरूप प्रत्यहार ही होता है I और अंततः, रजोगुण साधना भी इसी स्वरूप की ओर लेकर जाती है I ऐसा होने से ही साधक सर्वज्ञान को पाता है, और अस्मिता सिद्धि हो पाता है I इस अस्मिता सिद्धि से ही वह साधक जिस भी दशा को अपनी साधना में जानेगा, उस दशा का ज्ञान उस साधक के भीतर ही प्रकट होने लगेगा I ऐसा होने के कारण, रजोगुण के सिद्ध को किसी ग्रंथ या गुरु की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है I इस रजोगुण का मूल स्वभाव भी बहुवादी अद्वैत ही होता है, प्रत्यक्ष कार्मिक स्वभाव से रजोगुण बहुवादी है और मूल प्रत्याहार के स्वभाव से अद्वैत I इसलिए यह हृदय आकाश तंत्र उनके लिए तो बिलकुल नहीं हैं, जो विकृत एकवाद (अर्थात मोनोथेइसम) के मार्गों में हैं और चाहे वह विकृत एकवाद, पंथ का हो, चाहे विकृत राष्ट्रवाद का हो, या अर्थ का या किसी और बिंदु का ही हो I और क्यूँकि रजोगुण सहित, समस्त ब्रह्माण्ड की दशाओं के भी वर्ण और आश्रम होते हैं, इसलिए यह हृदयाकाश केवल उन साधकगणों के लिए ही है, जो वर्णसंकर, आश्रमसंकर और गोत्रसंकर नहीं हुए हैं I

सनातन गुरु आगे बोले… उस विकृत एकवाद के समस्त स्वरूपों से तुम्हे सुदूर रखने हेतु ही समुद्र की नौकरी दी गई थी, और उस नौकरी को करते हुए तुम इस विकृत समानव माज से भी सुदूर हुए थे I और समुद्र से छुट्टियों में, जो तुम्हारे मन में प्रेरणाएँ आती थी, जिसके कारण तुम्हारा वह अधिकांश समय हिमालय के दुर्गम स्थानों पर व्यतीत होता था, वह भी इस विकृत एकवाद के समस्त स्वरूपों से तुम्हे सुदूर रखने के लिए ही था I इसी कारण तुम्हे प्रजातंत्र के कार्य कलापों से, जो उस विकृत एकवाद के ही होते हैं, उनसे भी सुदूर रखा गया था, जिसके फलस्वरूप तुमने आज तक कभी भी अपना मत भी नहीं डाला I और भी बहुत कुछ तुम्हारे साथ समय समय पर हुआ, और वह सब भी तुम्हें इस विकृत एकवाद से सुदूर रखने के लिए ही थी I और आज भी तुम एक कमरे में बंद पड़े हो, अपनी पूर्व की साधनाओं में जाना हुआ सबकुछ लिख रहे हो I मेरा यह आदेश भी इसीलिए था, ताकि तुम ऐसे ही रहो और आज के समाज के प्रपंचों और उस समाज की समस्त व्याहारिक विकृति से सुदूर रहो, क्यूंकि आज का कलियुगी समाज अपने मनुष्यों को विकृत ही करता है I और जब यह ग्रंथ समाप्त होगा, तब भी तुम इस समाज से सुदूर ही रहोगे, क्यूंकि उस समय भी तुम्हें कोई और प्रबल प्रेरणा दी जाएगी, ताकि तुम इस आज की कलियुगी मानव जाति के विकृत स्वभावों, मार्गों और तंत्रों से सुदूर ही रहो I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह आज का कुपित स्वरूप का एकवाद ही मानव जाति की समस्त विकृतियों का कारण है, और इसी विकृत एकवाद के कारण ही आज की मानव जाति तृष्णा रूपी सागर में गोता खा रही है, और ख़ाति ही जा रही है I तृष्णाओं को त्यागकर ही तो गंतव्य मार्ग प्रशस्त होता है I लेकिन आज का विकृत एकवाद तो बहुत प्रकार से चल रहा है, क्यूंकि इसका नाता आज के राजतंत्र, राष्ट्रवाद, अर्थतंत्र, सामाजिकतंत्र, भूगोलतंत्र, सुरक्षातंत्र, शिक्षातंत्र, सेवातंत्र, वर्ण तंत्र, गोत्र तंत्र और धर्मतंत्र सहित, धर्म के सभी बिंदुओं में पाया जाता है I इसलिए आज तो कोई मार्ग इस मानव समाज के पास है ही नहीं, जो इस विकृत एकवाद के किसी न किसी विकृत स्वरूप में बसा नहीं हुआ है I और यही कारण है कि आज के समय में मानव जाति सभी प्रकार की विकृतियों को धारण करी हुई है I परन्तु आगामी गुरुयुग ऐसा नहीं होगा, इसलिए जब उस गुरुयुग के आगमन की प्रक्रिया चलने लगेगी, तब इस विकृत मानव जाति का अधिकांश भाग भी शनैः शनैः ही सही, लेकिन प्राकृतिक, दैविक और भौतिक तापों के क्रूर स्वरूप के कारण, नष्ट होगा I और उस आगामी गुरुयुग में आज की मानव जाति का केवल वह भाग ही जाएगा, जो विशुद्ध हो चुका होगा I उस आगामी गुरुयुग में न आज का भ्रष्ट प्रजातंत्र होगा, न आज का सीमित राष्ट्रवाद, न आज का कुपित अर्थतंत्र, न आज का विरूपित सामाजिक तंत्र, न ही आज के विकृत वर्ण, गोत्र और धर्म आदि तंत्र ही होंगे I

नन्हा विद्यार्थी जो यह सब शांत होकर सुन रहा था, उसने पुछा… गुरु चंद्रमा,  तो क्या इसका अर्थ हुआ कि मेरा सब कुछ आपके द्वारा नियंत्रित हो रहा था I

सनातन गुरु ने उत्तर दिया… हाँ और ना I हाँ क्यूंकि कुछ वर्षों से तो ऐसा ही हुआ है I और ना क्यूंकि इसके कारण में और बहुत सारी दिव्यताएं भी हैं, जिनके आगमन के मूल में तुम्हारे पूर्व जन्म के गुरुदेव भगवान बुद्ध ही हैं, और जिन्होंने तुम्हे उस पूर्व जन्म में कहा था, कि चाहे तुम या कोई और कुछ भी कर ले, अगले में तुम पूर्ण होगे क्यूंकि वह अगला जन्म अंतिम ही होगा I और उनके द्वारा तुम्हारे लिए की गई गुरुवाणी के अनुसार, तुम्हारा वह जन्म भी तब ही होना था, जब समुद्रों को पार करने का मार्ग सुगम हो जाएगा, क्यूंकि तुम्हारे उस पूर्वजन्म के गुरुदेव (बुद्ध अवतार) की यही वाणी थी, और इसके भी कारण, तुम्हारा कर्ममार्ग समुद्र से जोड़ा गया था I और क्यूंकि इस भू लोक के दृष्टिकोण से, तुम्हारे जैसे योगी के भीतर की ऊर्जाएं विचित्र ही होती हैं, इसलिए समुद्र मार्गों से तुम जहां भी गए, उन उन स्थानों के योगीजन, देवता आदि तुमसे मिलने भी आते थे, और कोई कोई योगी तो बहुत दूर के स्थान से भी तुमसे मिलने आया है I और ऐसा आने के पश्चात भी उनमें से किसी को भी तुम्हारी वास्तविकता नहीं पता चली, क्यूंकि तुमको उन महामाया सहित कई और दिव्यताओं ने, जैसे दुर्गाएं, चण्डीगण भैरविगण चामुंडागण, योगिनिगण, विद्याएँ और महाविद्याएँ, मुद्राएं, आदि ने ही घेर के रखा हुआ है I और यही दिव्यताएं उन सबको भी घेर लेती हैं, जो तुम्हारी वास्तविकता जो जानने का प्रयास करते हैं, जिसके कारणवश अब तक तो कोई भी जान नहीं पाया है I

सनातन गुरुदेव बोले… क्यूंकि तुमको कलियुग के तंत्रों से सुदूर ही रहना था, इसलिए तुम्हारा विवाह भी नहीं हुआ, और विवाह के भाव से ही तुमको वह भयंकर चक्कर और उल्टियां आती थी I और तुम्हारे बाद की समुद्र यात्राओं में, इस सुदूर रखने की प्रक्रिया के कारण ही तुम्हारे जहाज भी इतना बड़े हो गए थे, कि वह किनारे पर ही नहीं आते थे, और ऐसा होने का भी वही कारण था, कि तुम्हारा संपर्क इस विकृत मानव जाति और उनके तंत्रों से कम से कम ही रहे I इस समाज आदि से सुदूर रखने के एक कारण यह भी था, कि तुम्हें इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र में कोई कठिनाई न हो, क्यूंकि यह तंत्र तृष्णाओं से अतीत है, प्रत्याहार और त्याग का है, जो आज के मानव समाज और उसके तंत्रों के पास है ही नहीं I इसलिए भी तुम्हारे संपर्क इन्ही तृष्णाओं से ग्रसित आज की मानव जाति और उसके विकृत तंत्रों से बहुत सीमा तक तोड़ा गया था, और ऐसा ही कुछ समय तक रखा भी गया है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… त्रिष्णातीत होकर ही इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र की दूसरी सीढ़ी, जो पूर्ण प्रत्याहार में बसा हुआ त्याग है, उसपर जाया जाता है I और क्यूंकि कलियुग के प्रभाव में आई मानव जाति तृष्णाओं में ही फंसी हुई है, इसलिए भी तुम्हें उस मानव जाति से सुदूर ही रखा गया था I आज तो विकृत तान्त्रिक गतिविधियां भी धर्म का अंग हो गई हैं, इसलिए तुम्हे तो इन सब विकृतियों से भी दूर ही रखा गया था I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब उन तृष्णाओं के प्रभाव में इच्छा शक्ति ही विकृत हो जाती है, तब भाव की विकृति भी आती है I जब भाव ही विकृत हो जाते हैं, तो जीवन पथ विकृत हुए बिना नहीं रह पाता है I आज की मानव जाति इन सब विकृतियों से ग्रसित ही है और इन विकृतियों को ही उचित या सद्मार्ग मान बैठा है, इसलिए भी तुम्हे आज की मानव जाति से सुदूर ही रखा गया है I आज के समय पर तो, कुछ को छोड़कर, अधिकांश आचार्य, योगीजन और गुरुजन भी आंतरिक विकृतोयों से कुपित हुए हैं I आज के समय तो यदि योगमार्ग में बसे हुए, आत्मा के ज्ञान का चिराग लेकर भी घूमोगे, तो उस ज्ञान का एक पात्र मिलना भी कठिन होगा I आज के तो अधिकांश ब्राह्मणगण भी वैदिक मान बिंदुओं पर खरे नहीं उतरते हैं I  इसलिए भी तुम्हें इन सबसे सुदूर ही रखा गया था I और यह सब इसी हृदयाकाश गर्भ तंत्र में सिद्धि हेतु ही था, क्यूंकि इस जन्म में इसी हृदयाकाश गर्भ से तुम्हारा मुक्ति मार्ग प्रशस्त होना था और यही तुम्हारे प्रारब्ध में भी था, जो तुम्हें तुम्हारी वास्तविक माता, सावित्री विद्या से मिला है, क्यूंकि उन्होंने भी तुम्हे ऐसा ही कहा था, और वह भी तब जब तुम्हारा वास्तविक माता, सावित्री सरस्वती विद्या तुम्हे इस लोक में लाने के लिए अंतिम बार तुम्हारे पास, उस आकाश गंगा में आई थीं और जिसके मध्य में उन्होंने तुम्हे कोई 108-109 वर्षों के लिए निवास करने को कहा था I

नन्हा विद्यार्थी को इस जन्म से पूर्व की वह सब बातें स्मरण थीं, इसलिए उसने सर हिलाकर गुरु को इस बात का पुष्टिकारी संकेत ही दिया I

 

आगे बढ़ता हूं …

हृदयाकाश गर्भ की ब्रह्माण्डीय गुफा,

सनातन गुरु बोले… अब ध्यान देना… ऐसा कुछ ब्रह्माण्ड में है ही नहीं, जिसके अणुरूप (सूक्ष्मरूप) शरीर में नहीं मिलेगा I इसलिए जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में भी मिलेगा I यही कारण है कि इस गुफा का ब्रह्माण्डीय स्वरूप भी है I ऐसा होने के कारण ही योगीजन कह गए थे… यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरु को सर हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

 

आगे बढ़ता हूँ…

हृदयाकाश गर्भ तंत्र के अभ्यास की सीमाएँघटाकाश ही महाकाश है, महाकाश ही घटाकाश है, …

सनातन गुरु बोले… जब साधक इस तंत्र मार्ग में जाता है, तो वह इसको केवल अपने हृदयाकाश गर्भ में ही कर सकता है I इस तंत्र को ब्रह्माण्डीय आकाश में जाकर पालन नहीं करा जा सकता, क्यूंकि यह मार्ग केवल साधक के भीतर बसे हुए घटाकाश का है, न की महाकाश का I और ऐसा तब भी है, जब घटाकाश ही महाकाश होता है, और महाकाश ही घटाकाश I किसी भी उत्कर्ष मार्गी जीव को ब्रह्माण्डीय तंत्र से छेड़ छाड़ नहीं करना चाहिए, क्यूंकि इसके परिणाम भयंकर ही होंगे I ऐसा इसलिए है क्यूंकि उत्कर्ष मार्गी जीव का अधिकार केवल उसकी उत्कर्ष गति पर होता है, न की ब्रह्माण्डीय गति पर I इसलिए जीव केवल अपने हृदयाकाश गर्भ की सीमा तक ही इस तंत्र का पालन कर सकता है, और यदि वह इससे आगे ब्रह्माण्डीय आकाश में जाकर इस तंत्र का पालन करने का प्रयास करेगा, तो वह जीव विप्लव को ही पाएगा I यही कारण है कि तुम्हारे द्वारा लिखित इस ग्रंथ में इस हृदयाकाश गर्भ, और एक और गुफा के अतिरिक्त, अन्य किसी भी गुफा का वर्णन नहीं किया जाना चाहिए क्यूंकि देव कलियुग के कालखंड में वह सब ज्ञान और उनके मार्ग वर्जित ही रहते हैं I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरु को सर हिलाकर संकेत ही दिया I

 

रजोगुण गुफा के भीतर से अवलोकन,पिण्ड ही ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्ड ही पिण्ड है, …

सनातन गुरु बोले… अब हृदयाकाश गर्भ की सभी गुफाओं को देखते जाओ और बताओ की किसमें यह रजोगुण नहीं है I

नन्हा विद्यार्थी बोला… गुरु चंद्रमा, सत्त्वगुण गुफा, विज्ञान गुफा और चित्त गुफा I परन्तु चित्त गुफा में ऐसा तब ही हुआ था, जब वह संस्कार रहित हुई थी I

सनातन गुरुदेव बोले… ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह तीनों गुफाएँ रजोगुण से सूक्ष्म हैं इसलिए रजोगुण इनको नहीं भेदता, बल्कि यह रजोगुण को भेदती हैं I जब इन सभी गुफाओं में से किसी को रजोगुण नहीं भेद पाता, तब वह गुफा सत्त्वगुण को ही धारण कर लेती है I

और इसके पश्चात गुरु बोले… अब इस रजोगुण गुफ़ा के भीतर से देखकर बताओ, कि इस गुफा की ऊर्जाएं किस ओर गति करती हैं I

नन्हा विद्यार्थी बोला… गुरु चंद्रमा, सत्त्वगुण गुफा की ओर I

सनातन गुरुदेव बोले… हाँ, जब सभी विप्लवकारी दशाएं और दिशाएं त्यागी जाती है, तो सब पथ सत्त्वगुण की ओर ही गति करने लगते हैं I और जब रजोगुण शुद्ध होता है, तब वह रजोगुण ही त्याग मार्ग का बिन्दु हो जाता है I और इस दशा में साधक ज्ञानमय शब्दों के सार से जाता है, जो ऐसे होते है …

अब कुछ करने को, कहीं जाने को, कुछ पाने या बनने को नहीं रह गया है I

यह ज्ञानमय शब्द उसी पूर्ण संन्यासी को दर्शाते हैं, जो निर्गुण ब्रह्म कहलाता है I

 

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और इन शब्दों के सार में साधक साधक जान जाता है, कि सभी मार्ग उसी ब्रह्म को जाते हैं, और जहां यह जीव जगत रूपी मार्ग भी उन्ही ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है I इसलिए ऐसी दशा में साधक, साधक का जगत, साधक का उत्कर्ष मार्ग और उस उत्कर्ष मार्ग का गंतव्य, सभी ब्रह्म सरीके ही पाए जाते हैं I इस दशा से साधक के भीतर बसी हुई समस्त ब्रह्माण्डीय दशाएं अपने अपने ब्रह्माण्डीय कारणों में लय होने लगती है, और साधक अंततः ब्रह्म की इस समस्त रचना से ही अतीत हो जाता है I रचनातीत दशा ही कैवल्य मोक्ष है I इसलिए यह ज्ञानमय शब्द भी मुक्तिपथ ही हैं, और जहां उस मुक्ति की दशा में साधक शरीरातीत होकर, आत्मस्वरूप होकर ही शेष रहता है, और जहाँ साधक का वह आत्मस्वरूप ही ब्रह्म है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… अब सिद्धांत गुफा में देखो और बताओ, क्या उसमें रजोगुण है I

नन्हें विद्यार्थी ने देखा और बोले… जी गुरु चंद्रमा, सिद्धांत गुफा में रजोगुण है, और उस सिद्धांत गुफा में तो इस रजोगुण ने अपने मार्ग भी बनाए हुए हैं I

सनातन गुरु बोले… सिद्धांत जब पिण्ड और ब्रह्माण्ड में गतशील होते हैं, तो वह त्रिगुण से जुड़कर ही ऐसा हो पाते हैं I पिण्ड ब्रह्माण्ड विज्ञान में…

ब्रह्माण्ड के विखण्डित स्वरूप को ही पिण्ड कहा जाता है I

पिंण्डों के समस्त एकत्रित समूह को ब्रह्माण्ड कहते हैं I

इसलिए, पिण्ड ही ब्रह्माण्ड है और ब्रह्माण्ड ही पिण्ड I

सनातन गुरु बोले… इसलिए यह सिद्धांतों का नाता ब्रह्माण्ड से भी है और पिण्डों से भी I इसका अर्थ हुआ, कि रचना की चलित दशा में, ब्रह्माण्ड नामक वस्तु या दशा है ही नहीं, क्यूंकि ऐसी दशा में, ब्रह्मरचना में केवल पिंण्डों का प्रादुर्भाव पाया जाएगा, और उन पिण्डों का समस्त एकत्रित समूह ही ब्रह्माण्ड कहलायेगा I और ब्रह्माण्ड की अचलित दशा में, पिण्ड नामक वस्तु या दशा नहीं पाई जाएगी, क्यूंकि रचना के अचलित स्वरूप में पिण्डों का आभाव ही पाया जाएगा I इसलिए ब्रह्म रचना के गतिशील या चलित स्वरूप में केवल पिण्ड ही पाए जाते हैं, और उसी ब्रह्म रचना के अचलित स्वरूप में, केवल वह पिण्डातीत ब्रह्माण्ड ही मिलेगा I और उसी ब्रह्म रचना के समस्त स्वरूप में, पिण्ड ही ब्रह्माण्ड है, और ब्रह्माण्ड ही पिण्ड I और इन सबको जो गुण जोड़े हुए है, वह मूलतः रजोगुण ही है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इसलिए ब्रह्माण्ड के दो स्वरूप होते हैं… एक जो चलित है और संसार कहलाता है… और दूसरा जो अचलित है, और सनातन ब्रह्माण्ड कहलाता है I जो गति में ही नहीं है, उसका अंत कैसे होगा, इसलिए वह सनातन रूप में ही पाया जाता है I इसी ब्रह्माण्ड को जानकार पुरातन योग मनीषियों ने ब्रह्माण्ड को ही सनातन कह दिया है I जो गति में होता है उसी के वर्ण आदि प्रभेद होते है, पर जो किसी प्रकार की गति में गया ही नहीं है, उसके प्रभेद कैसे हो सकते हैं, क्यूंकि वह तो रात्रि के समान काला ही पाया जाएगा I इसलिए चलित ब्रह्माण्ड के वर्ण आदि प्रभेद होते हैं, और अचलित ब्रह्माण्ड रात्रि के समान काला ही होता है I अचलित के भीतर ही चलित निवास करता है, और ऐसा होने के कारण, वह चलित भी सनातनता को ही पाता है, और ऐसा तब भी है जब वह जीवन और मृत्यु चक्र में ही बसा होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… एक ही ब्रह्म रचना में, दो मूल और दो गंतव्य नहीं हो सकते I इसलिए जो चलित है (जैसे जीव) और जो अचलित है, उनका मूल और गंतव्य एक ही होना होगा I और क्यूँकि सबकुछ काल के गर्भ में ही है, इसलिए मूल और गंतव्य का समय भी एक ही होना होगा I लेकिन चलित में तो यह क्षमता ही नहीं होती, कि वह एक ही जन्म में सनातन समय तक रह पाए I इसीलिए प्रत्येक चलित में यह जीवन और मृत्यु चक्र आया है, ताकि उसकी अस्तित्व सत्ता का सम्पूर्ण समय भी उसी चलित ब्रह्माण्ड के समान हो हो जाए I इसलिए जबकि जो चलित है (जैसे जीव) और वह जीवन मृत्यु चक्र में ही निवास करता है, लेकिन तब भी जब कोई उसका संपूर्ण समय देखेगा, तो वह समय भी अचलित के समान सनातन ही पाया जाएगा I अचलित का समय सनातन के सिवा कुछ हो भी नहीं सकता, क्यूंकि वह अचलित अजन्मा ही होता है, और जिसने जन्म ही नहीं लिया, उसका अंत कैसे होगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… उस अचलित ब्रह्माण्ड को उसी ब्रह्माण्ड के खण्डों में और जीव रूप में चलित करने हेतु ही वह सनातन अखण्ड काल, अपने खण्डित चक्र स्वरूप में आया था, और उस कालचक्र के भीतर ही समस्त चलित जीव जगत बसाया गया था I यही वह कारण भी था, कि उस अखण्डित अनादि अनंत और सनातन काल को चक्र रूप में आना पड़ गया था I और जहां वह चक्र रूप के जनक भी हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही थे I और इसके कारण ही समय भी हिरण्यगर्भ पुत्र ही कहलाया था, और उस काल चक्र (समय चक्र) की दिव्यता और शक्ति को ही माँ त्रिकाली कहा गया था I यह चलित ब्रह्माण्ड अनादि काल से चलित ही है, और ऐसा ही वह अनंत कालों तक भी रहेगा I जो चलित ही नहीं हुआ, उसका अंत कैसे होगा, और ऐसा होने पर भी उस अचलित के भीतर ही चलित-ब्रह्माण्ड, चलित हो रहा है, और वह भी अनादि कालों से, और ऐसा ही वह चलित ब्रह्माण्ड अपने ही जीवन और मरण चक्र के साथ भी, अनंत कालों तक चालित होता रहेगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और यह दोनों ब्रह्माण्ड उसी समय में बसे हुए है I पर इन दोनों में अंतर बस इतना ही है, कि अचलित ब्रह्माण्ड समय के गंतव्य, अनादि अनंत सनातन स्वरूप में बसा हुआ है, और चलित ब्रह्माण्ड उसी समय के गतिशील, परिवर्तनशील, कालचक्र स्वरूप में बसा हुआ है I ऐसा होने के कारण, जबकि उस चलित ब्रह्माण्ड का कुल समय भी उसी सनातन के समान है, लेकिन ऐसा होने पर भी वह जीवन मृत्यु के अनादि और अनंत चक्र में बसा हुआ है और जहां वह जीव मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र में भी अखंड रूप में चलायमान होते रहते हैं I ऐसा इसलिए हुआ था, क्यूंकि चलित में वह क्षमता ही नहीं होती, कि वह एक ही जीवन में उतना समय व्यतीत कर सके, जितनी आयु उस अनादि अनंत सनातन अचलित ब्रह्माण्ड की है I और इसी कारण से इन दोनों ब्रह्माण्डों के मूल जो अनादि सनातन ब्रह्म हैं, और इन दोनों के गंतव्य जो अनंत सनातन ब्रह्म हैं, वह एक ही हैं I अचलित ब्रह्माण्ड जो अंधकारमय है वह गुण शून्य है… चलित ब्रह्माण्ड जो प्रकाशमय है वह गुणमय है…, और वह अनादि अनंत सनातन ब्रह्म जो स्व:प्रकाश ही हैं, वह गुणातीत हैं… और गुणों के दृष्टिकोण से यही इनमें मूल अंतर है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह ब्रह्माण्ड के प्रकार, पिण्डों में भी निवास करते हैं I लेकिन पिण्डों के भीतर जो ब्रह्माण्ड होता है, वह वो ब्रह्माण्ड है जो प्राथमिक था और जो ब्रह्म की इच्छा शक्ति से स्वयंप्रकट हुआ था और जो सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में था, और जिससे यह दोनों चलित और अचलित ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुए थे I उस सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक ब्रह्माण्ड का पिण्डों में निवास करने के कारण, उसके चलित और अचलित ब्रह्माण्ड स्वरूप भी पिंण्डों में निवास करते हैं, और जहां इन दोनों का निवास स्थान भी उसी प्राथमिक ब्रह्माण्ड के भीतर ही है और वैसा ही है, जैसा इनका निवास ब्रह्म रचना में है I और ऐसा होने के पश्चात भी, पिंण्डों के भीतर का ब्रह्माण्ड और वह ब्रह्माण्ड जिसमें पिण्ड बसे हुए हैं, वह एक ही हैं I और इसके कारण, क्यूंकि चलित की उत्पत्ति अचलित से हुई थी, और अचलित की उत्पत्ति प्राथमिक से हुई थी, इसलिए इन सबमें तारतम्य प्रतीत होने पर भी, यह उस एक ही वंश के हैं, जो ब्रह्म वंश कहलाता है और इसलिए ब्रह्माण्ड के यह सब स्वरूप उनके अपने मूल और गंतव्य में, अर्थात वास्तविकता में, एक ही हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… क्यूंकि ब्रह्माण्ड के उदय स्वरूप में केवल पिण्डों का ही प्रादुर्भाव हुआ था, और जहां उन पिंण्डों का समस्त समूह ही ब्रह्माण्ड कहलाया था, इसलिए इस दृष्टिकोण से ब्रह्माण्ड उदय में पिण्डों का ही उदय हुआ था, न की किसी ब्रह्माण्ड का I और क्यूंकि जो ब्रह्माण्ड योगशास्त्रों में बताया गया है, वह तो पिण्डों के भीतर ही बसा हुआ है, और पिण्ड भी उसी ब्रह्माण्ड के भीतर ही बसे हुए हैं, इसलिए ब्रह्माण्ड के उदय के दृष्टिकोण से, पिंण्डों की कोई ऐसी उदयावस्था है ही नहीं, जो ब्रह्माण्ड से पृथक हो I इसलिए इन दोनों के दृष्टिकोण से, पिंण्डों का उदय ब्रह्माण्डोदय का कारण था, और जहां वह ब्रह्माण्ड भी पिंण्डों के भीतर ही उदय हुआ था I और इसी दृष्टिकोण से, पिंण्डों के भीतर बसे हुए ब्रह्माण्ड का उदय ही पिण्डों के उदय का कारण भी था I यही कारण है, कि योगीजनों ने इन दोनों को एक ही सत्य के दो स्वरूप माना है I और इन दोनों स्वरूपों को चलायमान रखने वाला, रजोगुण ही है, जिसके मूल में सत्त्वगुण ही है, और इसकी अभिव्यक्ति तमोगुण स्वरूप में ही होती है I जब रजोगुण के दो चलित हो रहे भाग, आपस में मिलते हैं (अर्थात टकराते हैं), तो उनकी गति में अवरोध आता है, और इसी दशा को स्थिरता प्रदान करने वाला गुण, तमोगुण कहा जाता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… इसलिए रजोगुण से ही तमोगुण की उत्पत्ति होती है, और इन दोनों की समान रूप में योगावस्था को ही आकाश महाभूत कहा जाता है I जब लाल रंग का रजोगुण, नीले रंग के तमोगुण से योग करता है, तब ही बैंगनी वर्ण के आकाश का उदय होता है I इसलिए आकाश महाभूत, रजोगुण और तमोगुण का पुत्र ही है I और क्यूँकि रचना में, आकाश ही प्रथम महाभूत स्वरूप में उदय हुआ था, और आकाश से ही अन्य सभी महाभूतों का उदय हुआ था जिनका आलम्बन लेकर सूक्ष्म और स्थूल आदि जगत की रचना हुई थी, इसलिए महाभूतों और जीव जगत के दृष्टिकोण से गुण ही ब्रह्म हैं I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… यह भी वह कारण था कि पुरातन योग और वेद मनीषि महाभूतों और गुणों पर साधनाएँ करा करते थे, और इन्ही साधनाओं में ब्रह्म को भी जाना जाता था I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… जब रजोगुण गुफा का शुद्धिकरण हो जाता है, तब उस रजोगुण की एक ओर ही गति होती है, और वह गति भी सत्त्वगुण की ओर ही जाती है I और इस साक्षात्कार में साधक यह भी जान जाता है, कि समस्त उत्कर्ष पथ उसी एक दशा को जाते हैं, जो ब्रह्म कहलाता है, और जिसकी अभिव्यक्ति गुण भी हैं I

नन्हा विद्यार्थी समझ गया और उसने गुरु को सर हिलाकर संकेत दिया I

 

हृदयाकाश में वापसी,

सनातन गुरुदेव बोले… अब हम पुनः उसी हृदयाकाश में जाएंगे और वहां से ही सभी गुफाओं का अध्ययन करेंगे I

नन्हें विद्यार्थी ने अपने गुरु का हाथ पकड़ा और वह दोनों हृदयाकाश गर्भ के मध्य स्थान की ओर चल पड़े I

चलते चलते गुरु ने पुछा… वह क्या है जो इन सभी गुफाओं को भेदकर इनके भीतर निवास कर रहा है I

नन्हें विद्यार्थी बोला… गुरु चंद्रमा… सत्त्वगुण I

सनातन गुरु ने कहा… हाँ, सत्त्वगुण ही इन सबको भेदकर, इनके भीतर निवास करता है और इसीलिए रचना के मूल में यही सत्त्वगुण है I और यही सत्त्वगुण हृदयाकाश को भी भेदकर उसके प्रत्येक भाग के भीतर निवास करता है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा  इस ज्ञान का क्या लाभ?, क्यूंकि इस हृदयाकाश में तो इतनी गुफाएं हैं, कि इनमें एक जन्म में जाना और इनके बारे में जानना असंभव ही है I

इसपर गुरु ने उत्तर दिया… हाँ, बहुत सारी गुफाएं हैं, लेकिन इन सबमें जाने की कोई आवश्यकता भी नहीं है I इसलिए पहली सोलह में ही हम जाऐंगे I

नन्हें विद्यार्थी ने प्रश्न पूछा… गुरु चंद्रमा, और इन सोलह के बाद क्या? I

इसपर सनातन गुरु ने उत्तर दिया… जब इस ब्रह्मरचना में पिण्डों का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था, और इसलिए ब्रह्माण्ड भी अपने कारण, सूक्ष्म और स्थूल आदि ब्रह्माण्डीय स्वरूपों में उदय नहीं हुआ था, और जब केवल वह ब्रह्म की इच्छा शक्ति से स्वयंप्रकट हुआ प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड ही था,  तब से उस प्राथमिक प्रह्माण्ड ने चौबीस अंगों में बंधन स्वीकार कर लिया था I यह चौबीस अंग आकाश में ही बसाए गए थे, जिसके कारण यह सब के सब हृदयाकाश गर्भ की गुफाओं में भी पाए जाते हैं I और इन चौबीस में से हम केवल सोलह में ही जाएंगे I इन सोलह में से कुछ का अध्ययन तो हम कर ही चुके हैं, और कुछ को हम हृदयाकाश गर्भ के मध्य स्थान में बैठकर अध्ययन करेंगे, और एक का अध्ययन हम मनस गुफा से तब करेंगे, जब यह नन्हा विद्यार्थी अपने वास्तविक निरंग स्वरूप को पा चुका होगा I और इस अध्ययन के पश्चात, हम पुनः प्रकृति के अष्टम कोष में जाएंगे, जिससे हम इस हृदयाकाश गर्भ में आए हैं, और जिसका ज्ञान तुम्हारे द्वारा (अर्थात उन्हें विद्यार्थी द्वारा) इस ग्रंथ में नहीं दिया जाएगा I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और जब यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र पूर्ण होगा, तब चित्त भी संस्कार रहित हो जाएगा, और उस चित्त में केवल एक संस्कार ही शेष रहेगा, जो तुम्हारा अंतिम संस्कार होगा I इस मार्ग से तुम सबकुछ त्याग भी दोगे, इसलिए तुम्हें इस ब्रह्म रचना के किसी भी भाग में पुनः लौटने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी I समस्त ब्रह्म रचना में इस मार्ग के सिद्ध के पुनरागमन और पुनरावृत्ति के समय का गणित भी नहीं है, इसलिए इस मार्ग के सिद्ध को ऐसा ही माना जाता है, कि वह कभी नहीं लौटता I

नन्हें विद्यार्थी ने प्रश्न किया… गुरु चंद्रमा, इसका अर्थ हुआ कि यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र, उन निर्गुण का सीधा मार्ग है? I

इसपर गुरु बोले… ब्रह्मरचना में सीधा कुछ नहीं होता, क्यूंकि सब मार्ग घूम कर ही जाते हैं I इसी कारण प्रकृति में कुछ भी सीधा गति नहीं करता, सब घूमता हुआ ही जाता है I और वैसे ही इस ज्ञानपथ में कुछ मध्यवर्ती दशाएं भी होंगी I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, वह मध्यवर्ती दशाएं कौन सी हैं? I

इसपर सनातन गुरु ने उत्तर दिया… बहुत सारी हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने पुनः पूछा… गुरु चंद्रमा, पर कौन कौन सी हैं? … कितनी हैं? I

इस पेर सनातन गुरु ने उत्तर दिया… बहुत सारी हैं, लेकिन जब तुम इस ग्रंथ को लिख रहे होंगे, तो ब्रह्मपथ को ही मुक्तिमार्ग का प्रारम्भ पथ बताना, जिससे इस ग्रंथ के पात्रों को ज्ञान होगा, कि मुक्तिमार्ग का प्रारम्भ ब्रह्मपथ ही है, और इस पथ के भी कई अंग होते हैं I और ऐसा तब भी होता है, जब वह ब्रह्मपथ, पथहीन-अंशहीन ही होता है I ऐसे पथ पर केवल होकर ही जाया जाता है, इसलिए ऐसे पथहीन-अंशहीन पथ पर योगी “स्वयं ही स्वयं में” होकर ही जा पाता है I ऐसा होने के कारण, वह पथ कभी भी पूर्णरूपेण दर्शाया नहीं जाता है, क्यूंकि पृथक साधक उस पथहीन-अंशहीन पथ पर, उसी पथहीन-अंशहीन पथ के पृथक स्वरूपों से होकर ही जाते हैं I इसलिए तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर, तुम्हे तुम्हारे भीतर से ही मिलेगा और वह भी तब, जब तुम उस पथहीन-अंशहीन ब्रह्मपथ पर, उसी ब्रह्मपथ के समान और अपनी आंतरिक दशा में पथहीन-अंशहीन होकर ही जा रहे होगे, और उसकी ओर गति करोगे, जो “परे से परा से भी परे” ही है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा,  तो क्या इसका यह अर्थ हुआ, कि सनातन गुरु को इसका उत्तर पता नहीं है, या वह बताना नहीं चाहते हैं… या यह दोनों बिन्दु ही हैं? I

इसपर सनातन गुरुदेव ने उत्तर दिया… उस अंतिम पथहीन अंशहीन पथ पर साधक को अकेले ही जाना होता है, और जो गया होता है, वही उसको जानता है… और जो जानता है, वही उसको बता पाता है I और कोई भी उसको बता नहीं पाएगा, क्यूंकि पृथक साधकों के लिए वही पथहीन-अंशहीन पथ भी पृथक स्वरूपों में स्वयं प्रकट होता है, जिसके कारण पृथक साधकगणों ने उस पथहीन-अंशहीन अंतिम पथ को पृथक स्वरूपों में ही जाना है, और ऐसा ही बताया भी है I इसलिए जो उसपर जाएगा, वही उसको बता पाएगा, और वह भी उस दशा में, जिसमें वह उसपर गया होगा I और जैसे उस पथ पर मध्यवर्ती दशाएँ आई होंगी, और उन मध्यावर्ती दशाओं का क्रम हुआ होगा, वैसे ही वह साधक उसको बताएगा I

नन्हें विद्यार्थी बोले… गुरु चंद्रमा, इसका तो अर्थ हुआ कि अभी से उस अंतिम में बहुत दूरी और समय शेष है? I

सनातन गुरुदेव बोले… इतना भी दूर नहीं है, पर एक बिंदु अपने स्मरण में रखना, कि उस पथ पर केवल होकर ही जाता जाता है, अर्थात जब तुम उस अंतिम पथ पर जाओगे, तब किसी से भी लगाव या अलवाव मत करना, बस सर्वसम होकर सबका साक्षी होकर ही जाना, नहीं तो जिस दशा में इसका पालन नहीं करोगे, बस उसी दशा में फंस जाओगे और उससे आगे नहीं जा पाओगे I और इस अंतिम पथहीन-अंशहीन पथ को पार करके, यदि साधक लौटना चाहे, तो वह केवल सदाशिव के निरंग स्फटिक के समान ईशान मुख तक ही लौट पाएगा, न कि इससे नीचे की दशाओं में I और जब तुम ऐसे हो जाओगे, तब इस ज्ञान को मानव जाति को बाँट भी देना, अर्थात यह ज्ञान न प्रत्यक्ष न परोक्ष और न ही किसी और स्वरूप में बिकेगा, क्यूंकि यह योगी (अर्थात नन्हा विद्यार्थी) बनिया नहीं बनेगा, इसलिए इस कार्य के लिए इसकी वेबसाइट ही बनना और उस वेबसाइट से कोई कमाई भी नहीं करना I इसको अंग्रेजी में भी लिखना, क्यूंकि आज की मानव जाति की यह एक प्रमुख भाषा ही है I

नन्हें विद्यार्थी ने कहा… गुरु चंद्रमा, मुझे यह भाषा अच्छी प्रकार से नहीं आती, बोल सकता हूँ, लेकिन एक पूरा ग्रंथ ही इसमें लिख सकूंगा या नहीं, इसका पता नहीं I और क्यूंकि यह अंग्रेजी, न संस्कारिक, न प्राकृत, न ही दैविक भाषा है, और यह तो विकृत भाषा ही है, इसलिए इस अंग्रेजी भाषा में योगमार्ग के यह सब गूढ़ और सूक्ष्म सिद्धांत डाल पाउँगा या नहीं, योगमार्ग की उन उच्च दशाओं को दर्शाते हुए  शब्दों के विकल्प होंगे या नहीं, इसका भी मुझे अभी पता नहीं है I

सनातन गुरु बोले… इस प्रकार लिखना, जिससे यह विकृत भाषा भी सूक्ष्म सी ही प्रतीत हो, शब्दों को बदलकर ऐसा किया जा सकता है I किसी भी लेखन में, सूक्ष्मता ही मुख्य बिंदु होता है, और चाहे वह लेखन विकृत भाषा में ही क्यों न लिखा जाए I उस अंतिम पथ पर जाने से पूर्व ही साधक पसंद और नापसंद, दोनों से ही सुदूर खड़ा हो जाता है, और तुम भी ऐसे ही होगे जब उस अंतिम पथ पर जाने वाले होगे I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, क्या इस पसंद और नापसंद से सुदूर होने हेतु, आप मुझे यहाँ लाए हैं? I

सनातन गुरु बोले… जो पथ ही प्रत्याहार और सर्वस्व के त्याग का होता है, उसकी अंतगति में पसंद और नापसंद दोनों ही नहीं हो सकते I त्याग के पथ में तो ब्रह्म रचना ही नहीं, बल्कि वह इच्छा शक्ति ही नहीं होती जिसका आलम्बन लेके ब्रह्म रचैता कहलाया था I त्याग के गंतव्य में तो कोई देवत्व आदि बिंदु भी नहीं होते, इसलिए उस त्याग के गंतव्य में तो पञ्च देव और उनके पञ्च कृत्य भी नहीं मिलेंगे I त्याग के गंतव्य में केवल वह पूर्ण त्यागी, पूर्ण संन्यासी, सर्वसाक्षी स्व:प्रकाश, सर्वव्यापक किन्तु तब भी सर्वातीत, निर्गुण निराकार ब्रह्म ही पाया जाता है I और वही निर्गुण ब्रह्म, इस ब्रह्म रचना का मूल और गंतव्य दोनों होता है और जहां यह ब्रह्म रचना भी उसी निर्गुण की सगुणात्मक, शून्यात्मक और अनंतात्मक अभिव्यक्ति ही होगी, जिसके कारण वह ब्रह्म ही अपने निर्गुण सहित, अन्य सभी अभिव्यक्त स्वरूपों में समानरूपेण बसा हुआ होता है और इसके कारण ही वह पूर्ण कहलाता है I इसलिए त्याग का गंतव्य, निर्गुण ब्रह्म भी है, सगुण निर्गुण ब्रह्म भी है, सगुण ब्रह्म भी है, साकार ब्रह्म भी है और निराकार और अनंत ब्रह्म भी है, और इसी के कारण वह निर्गुण ब्रह्म भी पूर्णब्रह्म ही है I उस त्याग के गंतव्य का मार्ग भी इसी हृदयाकाश गर्भ तंत्र से प्रारम्भ होता है और जहां उस मार्ग में साधक स्वयं ही स्वयं को, स्वयं के भीतर ही हो रहे यज्ञ की आहुति रूप में देखता है, इसलिए यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र, जो उस त्याग के गंतव्य की ओर जाने के मार्ग का मूल ही है, वह आंतरिक यज्ञ मार्ग कहलाता है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, इस आंतरिक यज्ञमार्ग में, प्रारम्भ में तो संकल्प शक्ति का प्रयोग किया गया था, और प्रयोग के पश्चात, यज्ञ करने से पूर्व इस शक्ति को त्यागा भी गया था, और ऐसा ही प्रत्येक यज्ञ प्रक्रिया में किया गया था और यह भी आपके (अर्थात सनातन गुरुदेव के) आदेशानुसार ही हुआ था I तो क्या यह आलम्बन लेना और बाद में त्यागना भी उस संकल्प शक्ति का वह भाग था, जो पसंद या नापसंद से जुड़ा होता है I

सनातन गुरुदेव बोले…  अपने मूल स्वभाव से, संकल्प शक्ति समता में ही होती है, इसलिए सत्वगुणी ही होती है, लेकिन ऐसी होने पर भी वह अपने क्रियामय स्वरूप में पसंद और नापसंद से जुडी हुई ही पाई जाती है, जिसके कारण अपने क्रियामय स्वरूप में वही संकल्प शक्ति रजोगुणी और तमोगुणी ही पाई जाती है I और ऐसा ही यह समस्त जीव जगत भी है, जो अपने मूल स्वभाव से सत्त्वगुणी होता हुआ भी, अपने क्रियामय स्वरूप से रजोगुणी और तमोगुणी ही पाया जाता है I इसलिए ही योगीजनों ने रजोगुण और तमोगुण, दोनों से ही सुदूर रहने का मत बताया था, क्यूंकि यह दोनों गुण जो रजोगुण और तमोगुण कहलाते हैं, वह जीव जगत में मूल स्वाभाव नहीं, बल्कि उसकी क्रियामय दशा को दर्शाते हैं I

सनातन गुरुदेव बोले… ब्रह्म की इच्छा शक्ति का क्रियामय स्वरूप ही जीव जगत कहलाता है, जिसके कारण जीव जगत कर्मक्षेत्र या कर्मप्रदेश ही है I और उसी ब्रह्म की इच्छा शक्ति का क्रियाशून्य स्वरूप ही कैवल्य मोक्ष है, जो निर्गुण ब्रह्म कहलाया गया है और जो कर्मातीत मोक्ष ही है I क्यूंकि क्रिया, इन्द्रियों के कारण ही होती है, इसलिए यह जीव जगत इन्द्रिमय ही है, और इसके विपरीत, वह निर्गुण ब्रह्म, जो कर्मातीत है, वह इन्द्रियातीत ही है I इस बिंदु को अपने स्मरण में रखना क्यूँकि आगामी योगमार्ग में, जो इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र से आगे का है, जब तुम स्वयं ही स्वयं में, केवल होकर गति करोगे, तो उस इन्द्रियातीत ब्रह्म से होकर ही जाओगे, जिसमें साधक सब कुछ साक्षात्कार करता हुआ भी, वह जान नहीं पाता है, की वह साक्षात्कार किया हुआ क्या है, उसका क्या मार्ग है और उसका वर्णन कैसे होगा I उन ब्रह्म के इन्द्रियातीत होने के कारण ही, उनको जाना तो जा सकता है, परन्तु उनका पूर्ण वर्णन असंभव सा हो होता है, और यही कारण है कि वैदिक वांड्मय में महावाक्यों को कहा गया था I

सनातन गुरुदेव बोले… निर्गुण में क्रिया नहीं होती, और उस निर्गुण का मार्ग सम्तावाद से ही प्रशस्त होता है, क्यूंकि समता में बसकर ही उसने विपरीत दशाओं का समान रूप में प्रादुर्भाव किया था, जिसके कारण जीव जगत में अच्छा भी है और बुरा भी, दैत्य भी हैं और देव भी, सत्कर्म भी कहे गए हैं और दुष्कर्म भी, और ऐसा ही द्वैतवास सभी दशाओं में भी पाया जाता है I यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र भी इस जीव जगत में बसा होने के कारण ऐसा ही है I लेकिन क्यूंकि इस तंत्र से भी समता का मार्ग निकलता है, इसलिए यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र भी अपने क्रियामय स्वरूप में, द्वैतवाद में प्रतीत होता हुआ भी, उसी समता को जाता है, जिस से मुक्तिमार्ग प्रशस्त होता है I जीव जगत के द्वैतवाद के मूल में भी यही रजोगुण और तमोगुण हैं, इसलिए जिसने इनको विजय किया है, वही जीवातीत और जगतातीत नामक उत्कृष्ट सिद्धियों को पा सकता है I जो जीवातीत और जगतातीत है, वही उस मुक्तिमार्ग पर जा पाता है, जो पथहीन और अंशहीन ब्रह्मत्वपथ होता है I

सनातन गुरुदेव आगे बोले… और ऐसा होने के कारण यह हृदयाकाश गर्भ तंत्र का मार्ग, प्रकृति के तारतम्य में बसा होने पर भी, वास्तव में मुक्तिपथ ही है I और जिसका मूल मंत्र इस ग्रंथ का भी मूल मंत्र है और जो इस ग्रंथ के प्रारंभ पृष्ठ पर ही दिया जाना चाहिए I लेकिन वह मुक्ति, केवल विदेहमुक्ति ही नहीं होती, बल्कि जीवनमुक्ति के स्वरूप में भी हो सकती है I इसलिए उस प्रारंभिक मंत्र में बताया गया मृत्योर्मा के शब्दार्थ में जीवित स्वरूप में भी जाया जा सकता है, और जहां वह स्वरूप भी ऐसा होगा, जिसमें साधक कायामय प्रतीत होता हुआ भी, उसकी अपनी आंतरिक दशा से कायातीत ही होगा I जिस मार्ग में प्रकृति के तारतम्य में बसकर भी, कैवल्य मोक्ष को प्राप्त हुआ जा सके, वही आर्य वैदिक मार्ग कहा गया है I इस पूरे महाब्रह्माण्ड में इस आर्य मार्ग से सिवा कोई और मार्ग है ही नहीं, जो प्रकृति के तारतम्य से जाता हुआ भी, कैवल्य मोक्ष को प्रदान करवा सके I और जब कोई साधक इस हृदयाकाश गर्भ तंत्र नामक मार्ग का सिद्ध हो जाएगा, तो वह साधक उस बिंदु का भी साक्षात प्रमाण पाएगा, जो इस मार्ग के ऐसे ही वैदिक स्वरूप को दर्शाता है I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, ऐसा क्यों है कि मुझे मानव सभ्यता के शोरगुल आदि से सुदूर रहना ही ठीक लगता है, क्या यह पसंद नापसंद को दर्शाता है I

सनातन गुरुदेव बोले… नहीं, यह स्वाभाविक प्रत्यहार ही है, जो उन सबके पास नित्य ही विराजमान होता है, जो अपने अंतिम जन्म में आए होते हैं I और ऐसे साधकगण अपने उस जन्म के प्रारब्ध को पूर्ण करने के पश्चात, इस महाब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में निवास नहीं करते हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने पुछा… गुरु चंद्रमा, किसी भी लोक… आपको कैसे पता है? I

सनातन गुरुदेव ने हँसते हुए उत्तर दिया… मैं अनादि कालों से समस्त पिण्डों के भीतर ही समानरूपेण और पूर्णरूपेण निवास कर रहा हूँ, क्यूंकि मैं ही समस्त जीव रूपी पिण्डों के भीतर बसा हुआ, उन सभी पिण्डों का एकमात्र सनातन गुरु हूँ I

नन्हें विद्यार्थी ने गुरु की यह बात अनसुनी कर दी, क्यूंकि इसको बोलते समय गुरु हंस रहे थे I और ऐसे अनसुना करके, वह नन्हा विद्यार्थी, शांत बैठा हुआ अपने गुरुदेव के दिव्य मुख की ओर ही देखता रहा I

 

मनस गुफा में प्रवेश, मन की गुफा में प्रवेश, …

सनातन गुरुदेव बोले… तो अब हृदयाकाश गर्भ की इस रजस गुफ़ा का भाग समाप्त हो गया है, इसलिए अब हम मनस गुफा में जाएंगे, क्यूंकि अभी भी मनस गुफा में कुछ अदृश्य संस्कार और उनके पथ शेष रह गए हैं I

नन्हें विद्यार्थी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा… गुरु चंद्रमा, लेकिन हमने तो सब शुद्धिकरण कर दिया है… तो अब क्या शेष रह सकता है? I

इसपर सनातन गुरुदेव ने उत्तर दिया… अच्छा सब हो गया, तो चलो इस बात का प्रमाण भी इसी रजस गुफा के भीतर जाकर देखते हैं I

इसके पश्चात सनातन गुरुदेव बोले… कुछ संस्कार जो ज्ञान की भूख से संबद्ध होते हैं, वह और उनके पथ अभी भी अदृश्य रूप में शेष रह गए हैं I

नन्हें विद्यार्थी समझ गया, क्यूंकि उसकी ज्ञान की भूख तो अभी भी प्रबल ही थी I इसलिए उसने अपने गुरुदेव के दिव्य मुख की ओर देखकर, अपने सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारक संकेत भी दिया I

सनातन गुरु बोले… ज्ञान की भूख भी वृत्ति ही होती है, और जबतक इस वृत्ति का निवारण नहीं होगा, तबतक न तो तृष्णाएं ही पूर्ण शान्ति को पाएंगे और न ही वह मुक्तिमार्ग अपने अंतिम त्रिष्णातीत मार्ग के स्वरूप में ही प्रशस्त होगा I यह वृति भी तबतक दूर नहीं होती, जबतक बुद्धि का योग चित्त से नहीं होता, और जहां वह चित्त को बुद्धि ने घेरा होता है, और उस चित्त के भीतर बस एक ही संस्कार शेष रहता है, जो अंतिम संस्कार कहलाया गया है I और अंततः यह अंतिम संस्कार शिवरंध्र से बाहर निकलकर, तिरोहित हो जाता है I जब यह अंतिम संस्कार शिवरंध्र से बहार निकल जाता है, तब ही वह दशा प्राप्त होती है, जो बोधिचित्त कहलाई गई है और जो साधक के निर्वाण को दर्शाती है, और जहां उस निर्वाण को संस्कार रहित चित्त से ही प्राप्त हुआ जाता है I

नन्हें विद्यार्थी समझ गया कि अभी कुछ भाग शेष है, इसलिए उसने अपने गुरुदेव के दिव्य मुख की ओर देखते हुए, अपना सर आगे पीछे हिलाकर इसका पुष्टिकारी संकेत भी दिया I

इसके पश्चात, गुरुदेव ने अपने नन्हे शिष्य का हाथ पकड़ा, दोनों खड़े हुए और वह दोनों, गुरु और नन्हा विद्यार्थी उस मनस गुफ़ा की ओर चलने लगे, जो उसी हृदयाकाश गर्भ में बसी हुई थी, जिसके मध्य भाग में बैठकर, वह दोनों यह सब विज्ञानमय और ज्ञानमय वार्तालाप कर रहे थे I

 

असतो मा सद्गमय I

 

 

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