तुरीयातीत, सर्वातीत, कालातीत, गुणातीत, भूतातीत, तन्मात्रातीत, दिशातीत, दशातीत, कालात्मा, गुणात्मा, भूतात्मा, चेतन चतुष्टय, जाग्रत सुषुप्ति स्वप्न तुरीय, अवधूत, कालमुक्त, गुणमुक्त, भूतमुक्त, मार्गमुक्त

तुरीयातीत, सर्वातीत, कालातीत, गुणातीत, भूतातीत, तन्मात्रातीत, दिशातीत, दशातीत, कालात्मा, गुणात्मा, भूतात्मा, चेतन चतुष्टय, जाग्रत सुषुप्ति स्वप्न तुरीय, अवधूत, कालमुक्त, गुणमुक्त, भूतमुक्त, मार्गमुक्त

यह अध्याय भी ईशान नामक ब्रह्म का ही अभिन्न अंग है I यहाँ पर कई बिंदुओं पर बात होगी, जैसे तुरीयातीत, सर्वातीत, कालातीत, कालात्मा, गुणातीत, गुणात्मा, भूतातीत, भूतात्मा, तन्मात्रातीत, तन्मात्रात्मा, दिशातीत, मार्गातीत, दिशात्मा, दशातीत, लोकातीत, लोकात्मा, दशात्मा, चेतन चतुष्टय, चेतना चतुष्टय, जाग्रत सुषुप्ति स्वप्न तुरीय, अवधूत, कालमुक्ति, कालमुक्त, गुणमुक्ति, गुणमुक्त, भूतमुक्ति, भूतमुक्त, मार्गमुक्ति, मार्गमुक्त, इत्यादि I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2007-2012 ईस्वी का था I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है ।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही संबंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं ।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है ।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का सत्ताईसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा ।

और इसके साथ साथ, ये भाग, पञ्चब्रह्म गायत्री मार्ग की श्रृंखला का तेरहवां अध्याय है ।

 

तत्त्व साधना, देवत्व साधना, आर्य मार्ग,

मेरे पूर्व जन्मों के पुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण भी हैं क्यूंकि में वो योगभ्रष्ट हूँ, जो प्रबुद्ध भी होता है, वेद मनीषियों की अधिकांश साधना तत्वों पर होती थी I

लेकिन आज के समय में, इस मार्ग को कलियुग की काली काया ने ढक लिया है I इसलिए इस मार्ग का ज्ञान भी अब लुप्त हो चुका है I

यह अध्याय उन बहुत सारे मार्गों में से, कुछ प्रधान मार्गों को, उनके मूल रूप में प्रकाशित करेगा I

जबकि यह अध्याय इस मार्ग के केवल कुछ बिन्दुओं को ही प्रकाशित करेगा, लेकिन साधकगण इन्ही बिन्दुओं से जाकर, अन्य तत्त्वों के बिन्दुओं को जानकार, उन नहीं बताए गए मार्गों के साधना मार्गों पर भी जा सकते हैं I

लेकिन इन नहीं बताए गए मार्गों के गंतव्य में भी, वही तत्त्व उद्भासित और प्रकाशित होंगे, जो यहाँ बताए गए हैं I

जो मार्ग ऐसा हो, उसे ही आर्य मार्ग कहते हैं I और यही आर्य मार्ग, मूल मार्ग, उत्कृष्टम मार्ग, सनातन मार्ग और वैदिक मार्ग भी कहलाता है I

 

और जहाँ इन सारे शब्दों, उनके मार्गों और उनकी दशाओं के …

मूल में योग है और गंतव्य में ज्ञान I

मूल में योगी होगा, मध्य में वेदविक और गंतव्य में वेद I

 

जो यहाँ बताया गया है, …

वो एकमात्र मूल है, जो ब्रह्म रचना का सर्वमूल है I

और जो सर्वमूल है, उसका कोई और मूल भी नहीं है I

इसलिए जो यहाँ बताया गया जो सर्वमूल है, वही अमूल भी है I

उसी सर्वमूल से, जो अमूल ही है, अद्वैत गंतव्य प्रकाशित होता है I

वो अद्वैत गंतव्य ही कैवल्य मोक्ष, निर्गुण ब्रह्म और योगी का आत्मस्वरूप है I

 

और उन तत्त्व साधनाओं के उस अद्वैत गंतव्य में …

योगी का वास्तविक स्वरूप, अर्थात आत्मस्वरूप ही पूर्ण कहलाता है I

वो पूर्ण ही सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार भी होता है I

और इसके अतिरिक्त, वो पूर्णात्मा ही शून्य, शून्य ब्रह्म और सर्वसम भी होता है I

यह सब, उसी निर्गुण निराकार अद्वैत अभिव्यक्ता की अभिव्यक्तियां ही होती हैं I

और ऐसा होने पर भी वो आत्मस्वरूप का गंतव्य, निर्गुण निराकार ही होता है I

 

ऐसे पूर्ण स्वरूप का धारक योगी जो जानेगा, वो अब बताता हूँ …

सबकुछ उसी सर्वाधार निर्गुण निराकार ब्रह्म की अभिव्यक्ति ही है I

इसलिए, सबमें वही निर्गुण निराकार ही एकमात्र प्रकाशित हो रहा है I

जीव जगत रूप में, अभिव्यक्ति ही अभिव्यक्ता है अभिव्यक्ता ही अभिव्यक्ति I

यह सब होता हुआ भी, इसी जीव जगत में, निर्गुण निराकार ब्रह्म निराधार ही है I

इसलिए, निर्गुण ब्रह्म निरधार होता हुआ भी, जीव जगत का सर्वाधार हुआ है I

 

इसलिए, जिस योगी ने ऊपर सूक्ष्म रूप में बताए गए बिंदुओं को जाना होगा, वो यही मानेगा कि वो, …

अपने शरीरी रूप में, उसी निर्गुण निराकार ब्रह्म की उत्कृष्टम अभिव्यक्ति है I

वो उत्कृष्टम अभिव्यक्ति ही वो सबकुछ है, जो ब्रह्म की रचना स्वरूप में है I

अपने आत्मस्वरूप में, वही योगी निर्गुण के समान सर्वाधार और निराधार भी है I

जो सबकुछ, सर्वाधार और निराधार भी है, वही पूर्ण, आत्मा और ब्रह्म कहलाया था I

 

अब इस अध्याय के प्रारम्भ में ही उत्कर्ष मार्ग और साधक की गति को परिभाषित करता हूँ …

वो गति जो गंतव्य तक ही न जाए, वही दुर्गति कहलाती है I

जो मार्ग कैवल्य मोक्ष रूपी गंतव्य तक ही न जाए, वही अपकर्ष मार्ग है I

जिस मार्ग में ब्रह्म और प्रकृति, दोनों ही समानरूप में न हो, वही दुर्गति मार्ग है I

यह अध्याय जो मूल तत्त्वों की साधनाओं पर ही आधारित है, और जो सूक्ष्म सांकेतिक स्वरूप में कुछ ही उत्कृष्ट साधकगण के लिए बताया गया है, वो ऐसे अपकर्ष मार्गों को मानने वालों को बहुत ही विचित्र लगेगा I

 

आयाम साधना, तत्त्व साधना का मूल भाव, काल साधना, आकाश साधना, दिशा साधना, दशा साधना, … मूल तत्त्वों को जानने के इच्छा, भगवत् तत्त्व को ही जानने की इच्छा, एक साथ ही समस्त भगवत् बिंदुओं को जानने की इच्छा, भगवत् बिन्दुओं के मूल मार्ग, भगवत् बिंदु ज्ञान मार्ग, …

इस पृथ्वी लोक के बहुत सारे देशों में घूमने के बाद, और उनकी परम्पराओं के कुछ प्रमुख भागों को जानने के बाद, एक दिन मैं यह सोचने लगा …

 

  • काल साधना की इच्छा :

मैंने सोचा… सभी परम्पराएं, अपने भगवान् आदि दिव्यताओं को अनादि कहती हैं I

लेकिन जो अनादि होता है, वही तो अंत रहित होता है I

और जो अनादि और अंत रहित है, वही “अज” तो सनातन होता है I

काल के गंतव्य को ही तो सनातन कहा जाता है I

तो मैंने सोचा, कि क्यों न उस काल को ही जाना जाए, जिसके बल पर सभी परम्पराओं के देवता आदि स्वयं को अनादि कहते हैं I

इस भाव से मेरी काल साधना प्रारम्भ हुई I

और जब यह साधना संपन्न हुई, तो मैंने जो सोचा वो अब बताता हूँ I

 

  • आकाश साधना की इच्छा :

मैंने सोचा… लगभग सभी परम्पराएं, अपने भगवान् आदि दिव्यताओं को अनंत कहती हैं I

लेकिन जो अनंत होता है, वही तो सीमाओं से अतीत होता है I

और आकाश के गंतव्य को ही तो अनंत कहा जाता है I

तो मैंने सोचा, कि क्यों न उस आकाश को ही जाना जाए, जिसके बल पर सभी परम्पराओं के देवता आदि स्वयं को अनंत कहते हैं I

इस भाव से मेरी आकाश साधना प्रारम्भ हुई I

और जब यह साधना संपन्न हुई, तो मैंने जो सोचा वो अब बताता हूँ I

 

  • दशा साधना की इच्छा :

मैंने सोचा… बहुत सारी परम्पराएं, अपने भगवान् आदि दिव्यताओं को सर्वव्यापक भी कहती हैं I

लेकिन जो सर्वव्यापक होता है, वही तो दशा का गंतव्य होता है I

तो मैंने सोचा, कि क्यों न उस दशा को ही जाना जाए, जिसके बल पर सभी परम्पराओं के देवता आदि स्वयं को सर्वव्यापक कहते हैं I

इस भाव से मेरी दशा साधना प्रारम्भ हुई I

और जब यह साधना संपन्न हुई, तो मैंने जो सोचा वो अब बताता हूँ I

 

  • दिशा साधना की इच्छा :

मैंने सोचा… बहुत सारी परम्पराएं, अपने भगवान् आदि दिव्यताओं को सर्वदिशा या सभी मार्गों (या उत्कर्ष मार्गों) के भीतर बसा हुआ भी कहती हैं I

लेकिन जो सर्वदिशा दर्शी (या सर्वदिशा व्यापक या सर्वमार्ग व्याप्त) होता है, वही तो दिशा (या उत्कर्ष पथ) का गंतव्य होता है I

तो मैंने सोचा, कि क्यों न उस दिशा को ही जाना जाए, जिसके बल पर सभी परम्पराओं के देवता आदि स्वयं को सर्वमार्ग व्याप्त कहते हैं I

इस भाव से मेरी दिशा साधना प्रारम्भ हुई I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब यह सभी साधनाएं संपन्न हुई, तो मैंने जो जाना, वो अब संक्षेप में ही सही… लेकिन बताता हूँ I

 

कालातीत क्या है, कालात्मा क्या है, कालमुक्ति क्या है, कालमुक्त क्या है, काल ब्रह्म, काल ब्रह्म क्या है, कालात्मा क्या है, गुणातीत क्या है, गुणात्मा क्या है, गुणमुक्ति क्या है, गुणमुक्त क्या है, गुण ब्रह्म क्या है, … अवधूत, भूतातीत क्या है, भूतात्मा क्या है, भूतमुक्ति क्या है, भूतमुक्त क्या है, भूत ब्रह्म, भूत ब्रह्म क्या है, महाभूत ब्रह्म, महाभूत ब्रह्म क्या है, … तन्मात्रातीत क्या है, तन्मात्रात्मा क्या है, तन्मात्रमुक्ति क्या है, तन्मात्रमुक्त क्या है, तन्मात्र ब्रह्म, तन्मात्र ब्रह्म क्या है,दिशातीत क्या है, दिशात्मा क्या है, दिशामुक्ति क्या है, दिशामुक्त क्या है, … दशातीत क्या है, दशात्मा क्या है, दशामुक्ति क्या है,दशामुक्त क्या है, …

यहाँ जिस मार्ग और दशा को बताया जाएगा, वो कलियुग की काली काया के प्रभाव के कारण लगभग पूर्णरूपेण लुप्त ही है I

इसलिए अब इस मृत्युलोक में इन सभी के सिद्ध नहीं मिलते है I और ऐसा तब भी है, जब इन्हीं सिद्धियों में बसकर, पञ्च देव ही पञ्च ब्रह्म कहलाए थे I

इसका साथ साथ, पञ्च ब्रह्म ही तुरीयातीत कहलाई थे I

यहाँ पर केवल पांच और एक सिद्धि की ही बात होगी I

 

आगे बढ़ता हूँ …

कलियुगों में केवल कुछ ही देवताओं के मार्ग बचे हुए रहते हैं, और तत्त्वों पर साधनाओं के मार्ग लुप्त हो जाते हैं I और इस बार के कलियुग में भी कुछ ऐसा ही हुआ है I

लेकिन पूर्व के युगों में वेद मनीषि, देवताओं की साधना कम ही करते थे, क्यूंकि उस समय पर तत्त्वों की साधनाएं अधिक ही होती थी I

यही मार्ग यहाँ पर बताया जाएगा, क्यूंकि कुछ ही वर्षों में कलियुग स्तंभित होकर, आगामी युग, जो वैदिक युग है, और जिसको गुरुयुग, आम्नाय युग (अर्थात मानवता का युग) भी कहा जाता है, उसका सर्वव्यापक प्रकाश इस संपूर्ण चतुर्दश भुवन में ही होने वाला है I

और क्यूंकि उस गुरु युग (या आम्नाय युग या वैदिक युग) में यहाँ बताया गया तत्त्व-साधना मार्ग ही प्रधान मार्ग होगा, इसलिए इस भाग को इसी अध्याय में जोड़ा जा रहा है, क्यूंकि इस मार्ग से भी मुक्तिमार्ग उसके पूर्ण स्वरूप में प्रकाशित होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जब हम देवी देवताओं पर साधनाए करते हैं, तब उनके मूल तत्त्वों पर साधना स्वतः ही नहीं होती है I

लेकिन जब हम तत्त्वों पर साधनाए करते हैं, तब उन तत्त्वों के देवत्व बिंदुओं (जैसे उन तत्त्वों के देवी देवता) पर साधनाएँ स्वतः ही हो जाती हैं I

इसका अर्थ हुआ कि तत्त्वों पर साधनाएँ, देवी देवताओं पर हुई साधनाओं से श्रेष्ट ही होती है I

और इसीलिए, यहाँ बताया जा रहा साधना मार्ग, श्रेष्ठ मार्ग या आर्य मार्ग कहलाता है जो वास्तव में वैदिक मार्ग ही है I

 

और एक बात, …

जो आर्य होता है, वही सनातन हैसनातन को ही आर्य कहा जाता है I

 

इसी आर्यमार्ग के कारण, वैदिक धर्म को आर्य धर्म, सनातन धर्म, वैदिक आर्य धर्म, सनातन वैदिक आर्य धर्म इत्यादि भी कहा गया था I

तो अब इस आर्य मार्ग के कुछ ही बिंदुओं को, वैदिक साधना मार्ग से बताता हूँ I

यह मार्ग मुझे इसलिए स्मरण है, क्यूंकि मैं प्रबुद्ध योग भ्रष्ट हूँ, और इन बिंदुओं का, अपने पूर्व जन्मों से, और उन पूर्व जन्मों के गुरुजनों के अनुग्रह से ही सिद्ध हुआ हूँ I इसलिए मैं अनुग्रह सिद्ध (कृपा सिद्ध) ही हूँ I

 

  • कालातीत क्या, कालातीत कौन, कालातीत किसे कहते हैं, कालात्मा क्या, कालात्मा कौन, कालात्मा किसे कहते हैं, कालमुक्ति क्या, कालमुक्ति किसे कहते हैं, कालमुक्त कौन, कालमुक्त किसे कहते हैं, कालमुक्त, काल ब्रह्म, काल ब्रह्म कौन, काल ब्रह्म किसे कहते हैं, काल साधना से मुक्ति, काल साधना और कैवल्य मुक्ति, काल साधना और कैवल्य मोक्ष, काल और कैवल्य, काल सिद्धि, … अनादि अनंत ब्रह्म, अनादि ब्रह्म, अनंत ब्रह्म, सनातन ब्रह्म, काल, काल कौन, काल क्या?, काल क्या है?, काल किसे कहते हैं, कालातीत ब्रह्म, कालात्मा ब्रह्म, कैवल्य ब्रह्म, …

अपनी साधनाओं में जब काल को अपनी काया से बाहर की ओर देखा जाएगा, तो वो काल उसके कालचक्र स्वरूप में साक्षात्कार होगा I

और जब योगी इस कालचक्र नामक सिद्धि को उसकी अंतिम दशा की ओर लेके जाता है, तब वो योगी अपनी चेतना को कालचक्र के समस्त खण्डों (या भागों) में समान रूप में बसा हुआ पाता है I

इसके पश्चात, जब योगी कालचक्र के समस्त भागों में समान रूप में बस जाता है, तो वो योगी ऐसा पाता है, कि उसकी चेतना ही संपूर्ण कालचक्र हो गई है I

ऐसी दशा में वो कालचक्र ही जीव जगत केहलाता है, जिसका सगुण साकार स्वरूप वो योगी ही होता है I

काल साधना में यही जीव और जगत नामक सिद्धि होती है, जिसमें काल का चक्र स्वरूप ही वो जीव और जगत कहलाता है, और जो वास्तव में वो कालचक्र सिद्ध योगी ही है I

ऐसा कालचक्र सिद्ध योगी जो मानेगा, वो अब बताता हूँ …

मैं वो कालचक्र हूँ, जो जीव जगत कहलाता है I

मैं वो कालचक्र हूँ, जिसको जो श्री हरी उंगली पर धारण किए हैं I

आगे बढ़ता हूँ …

और जब योगी उसी काल को अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करता है, तो वही काल उसके गंतव्य स्वरूप में साक्षात्कार होगा I

और जहाँ काल का गंतव्य स्वरूप अनादि अनंत होता है, अर्थात अखंड सनातन ब्रह्म कहलाता है I

ऐसी दशा में वो काल ही उस योगी का सनातन आत्मा होता है, जो ब्रह्म कहलाता है I

ऐसा इसलिए होता है, क्यूंकि काल का गंतव्य, सनातन ही है, जिसका मार्ग भी आंतरिक साधना से, अर्थात स्वयं ही स्वयं में, के मार्ग से जाना जाता है I

 

इस बिन्दु का साक्षात्कारी योगी जो कहेगा, वो अब बताता हूँ …

मैं चक्र स्वरूप से अतीत काल हूँ, जो जीव जगत का आत्मा रूपी गर्भ है I

मेरे ही अनादि अनंत अखंड काल स्वरूप के भीतर जीव जगत बसाया गया था I

और जिस योगी ने ऊपर बताए गए काल के दोनों स्वरूपों का साक्षात्कार किया होगा, वो यही कहेगा …

आत्मस्वरूप में भागातीत सनातन काल हूँकाल का अज स्वरूप, अकाल ब्रह्म हूँ I

चक्र स्वरूप में, मैं ही त्रिकाल हुआ हूँजो सदैव चलायमान जीव जगत कहलाता है I

इसीलिए, यदि काल का …

जीव जगत स्वरूप सिद्ध करना है, तो अपनी साधना बहार के मार्गों से करो I

गंतव्य (सनातन) सिद्ध करना है, तो अपनी काल साधना आंतरिक मार्ग से करो I

 

ऐसी काल साधनाओं में, यदि तुम काल को अपनी काया …

से बाहर साक्षात्कार करोगे, तो काल के ही जीव जगत स्वरूप को पाओगे I

इस काल सिद्धि में, तुम जीव होते हुए भी, अपने को जगत स्वरूप में ही पाओगे I

इसमें यद् पिण्डे तद ब्रह्माण्डे सहित, यद् ब्रह्माण्डे तद पिण्डे भी सिद्ध होगा I

 

और ऐसी काल साधना में, यदि तुम काल को अपनी काया …

के भीतर साक्षात्कार करोगे, तो काल को ही अपने आत्मस्वरूप में पाओगे I

इस काल सिद्धि में, तुम्हारा आत्मस्वरूप ही अनादि अनंत सनातन ब्रह्म होगा I

और इस काल सिद्धि में तुम समस्त वैदिक महावाक्यों का ही स्वरूप हो जाओगे I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए काल के दोनों स्वरूपों का साक्षात्कार किया होगा, वो योगी भी कालात्मा ही कहलाता है I

और ऐसी दशा से वो योगी, अंततः उस काल के ऊपर बताए गए द्वैतवादों से ही अतीत होके, अर्थात कालातीत होके, कालात्मा पद को धारण करके भी, काल ब्रह्म नामक अवस्था को पाता है I

 

और जहाँ वो …

कालात्मा पद भी कैवल्य मोक्ष को ही दर्शाता है, जो योगी का आत्मस्वरूप ही है I

कालात्मा ही कालातीत होता है, और कालातीत ही काल का सर्वगर्भात्मक ब्रह्मरूप I

आत्मा रूपी ब्रह्म का सर्वाधार और निरधार स्वरूप ही काल साधना का गंतव्य है I

 

क्यूंकि सबकुछ कालगर्भित ही है और क्यूँकि वैदिक मनीषियों ने समस्त सृष्टि और उसके भागों को को ब्रह्म के गर्भ में बसा हुआ पाया था (और ऐसा ही वैदिक वाङ्मय में कहीं न कहीं कहा भी गया होगा), इसलिए काल साधना के दृष्टिकोण से काल ही ब्रह्म है I

इसी सिद्धि को इस अध्याय में काल ब्रह्म नामक वाक्य से बताया गया है I

टिपण्णी: मैंने इस जन्म में कोई भी ग्रन्थ पूरा नहीं पड़ा है…, आवश्यकता ही नहीं पड़ी I और जो योग भ्रष्ट है, और प्रबुद्ध भी है, उसको ऐसी आवश्यकता पड़ेगी भी कैसे I क्यूंकि इस जनम में ऐसा ही हुआ है, इसलिए यहाँ लिखा है, कि “ऐसा ही वैदिक वाङ्मय में कहीं न कहीं कहा भी गया होगा”,… “न कि कहा गया है”, ऐसा लिखा है I

 

और जहाँ …

कालात्मा पद उस कालातीत को दर्शाता है, जिसको कैवल्य मुक्ति भी कहते हैं I

कर्मातीत मुक्ति के अनुसार इस मुक्ति का एक नाम कालातीत ब्रह्म है I

और कर्माधीन मुक्ति के अनुसार इस मुक्ति का एक नाम कालचक्र रूपी ब्रह्म है I

 

इसका कारण है, कि …

कालात्मा, कालातीत, काल ब्रह्म के शब्द, उसी मुक्ति के स्वरूप ही है I

 

इसलिए काल साधना से भी मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है, और वो मुक्ति के कई नामों में से, कुछ नाम सनातन ब्रह्म, काल ब्रह्म, कालातीत ब्रह्म और कालात्मा भी है I और इसी दशा को कालमुक्ति भी कहते हैं, और इसके सिद्ध को कालमुक्त I

 

  • गुणातीत क्या?, गुणातीत क्या?, गुणातीत क्या?, गुणातीत कौन है?, गुणात्मा कौन है?, गुणमुक्त कौन है?, गुणमुक्ति, गुणमुक्ति क्या?, गुण ब्रह्म, गुण ब्रह्म क्या?, गुण ब्रह्म कौन?, गुणातीत किसे कहते हैं?, गुणात्मा किसे कहते हैं?, गुणमुक्त किसे कहते हैं?, गुणमुक्ति किसे कहते हैं? गुण ब्रह्म किसे कहते हैं?, गुण साधना और मोक्ष, गुण साधना और कैवल्य, गुण साधना और मुक्ति, गुण और मुक्ति, गुण सिद्धि क्या?, गुण सिद्धि, त्रिगुण सिद्धि क्या?, त्रिगुण सिद्धि, त्रिगुण सिद्ध, त्रिगुण सिद्ध किसे कहते हैं?, त्रिगुण सिद्ध कौन?, त्रिगुण सिद्धि किसे कहते हैं?, त्रिगुण सिद्धि क्या है?,

जब साधना में त्रिगुण को अपनी काया से बाहर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, तब वो गुण अपने तारतम्य में पाए जाएंगे I

और इस साधना की अंत गति में वो योगी उसकी अपनी चेतना को त्रिगुणों में समान रूप में बसा हुआ पाएगा I

यही त्रिगुण सिद्धि कहलाती है, और ऐसा योगी गुण सिद्ध ही होता है I

और इस सिद्धि का मार्ग भी त्रिगुण समाधि से होकर ही जाता है, जो तीन प्रकार की होती है I

यह तीन प्रकार जो हैं, उनमें सर्वप्रथम तमोगुण समाधि ही होगी, इसके पश्चात रजोगुण समाधि या सत्त्वगुण समाधि में से कोई भी हो सकती है I

लेकिन ब्रह्मत्व पथ में, अधिकांशतः रजोगुण समाधि अंत में ही होगी I

और इसके अतिरिक्त, यदि साधक सदाशिव मार्ग पर होगा, तो अंतिम समाधि सत्त्वगुण में ही होगी I

और यदि साधक शाक्त हुआ, तो यह समाधियां नौ प्रकार की होंगी, जिनकी अंतिम दशा सत्त्वगुण समाधि ही होगी I

जिसने त्रिगुणों को ही सिद्ध किया होगा, वही त्रिगुण स्वरूप हो जाता है I लेकिन त्रिगुणों का ऐसा साक्षात्कार एक एक करके ही होता है… इकट्ठा नहीं I

इसका अर्थ है कि इस साक्षात्कार में योगी एक-एक करके ही त्रिगुणों का साक्षात्कार करता है, और इसका मार्ग भी उस साक्षात्कार हुए गुण की समाधि से ही होकर जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इन्ही त्रिगुणों को योगी, अपनी काया से न भीतर और न ही बाहर की ओर साक्षात्कार करेगा, तो ऐसी दशा में वो त्रिगुण योगी की काया की त्वचा पर ही साक्षात्कार होंगे I ऐसी दशा में वो त्रिगुण एक के बाद एक, अटूट क्रम में ही साक्षात्कार होते चले जाएंगे I

जब कोई साधक सद्योमुक्त होता है, तब वो साधक गुणातीत ही हो जाता है I और क्यूँकि गुणातीत साधक, इस त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्ड में रह ही नहीं पाएगा, इसलिए वो गुणातीत साधक, अपनी काया को अधिक समय तक रख भी नहीं पाता है I

लेकिन जो साधक यहाँ बताई गई सिद्धि को पाया होता है, वो इसी सिद्धि से एक एक करके, गुणों को अपने मेरुदंड के दोनों कोनों में, अर्थात अपनी त्वचा पर पुनर्स्थापित करके अपनी काया को बचा भी पाता है I

इसके बारे में एक पूर्व का अध्याय, जिसमें तीर्थंकर शब्द को बताया गया था, उनमें बात करी गई है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इन्ही त्रिगुणों को योगी अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करेगा, तो वो गुण अपने मूल और अमूल गंतव्य स्वरूप में साक्षात्कार होंगे, और जहाँ वो मूल और अमूल गंतव्य स्वरूप भी एक ही होगा, जिसको निर्गुण कहा जाता है I

 

जब योगी गुणों का साक्षात्कार अपनी काया से …

बाहर करता है, तब वो योगी गुण ब्रह्म नामक सिद्धि को पाता है I

इस दशा में त्रिगुण ही ब्रह्माण्ड का आधार और ब्रह्माण्ड भी होते हैं I

और योगी का आत्मस्वरूप ही त्रिगुण होकर, गुण ब्रह्म कहलाता है I

 

जब योगी गुणों का साक्षात्कार अपनी काया के …

भीतर करता है, तो योगी का आत्मस्वरूप ही त्रिगुणातीत निर्गुण ब्रह्म होता है I

इस दशा में त्रिगुणातीत ही, त्रिगुण सहित समस्त ब्रह्माण्ड का गंतव्य होता है I

इस दशा में योगी का आत्मस्वरूप ही त्रिगुणातीत होकर, गुणातीत कहलाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं का अपनी गुण साधना में साक्षात्कार कर लिया होगा, वो योगी ही गुणमुक्त होने के मार्ग पर चला जाता है और ऐसे योगी की अंतिम आत्मस्थिति को ही गुणात्मा कहते हैं I

और जहाँ, गुणात्मा का पद उसे गुणातीत दशा को दर्शाता है, जिसको कैवल्य मुक्ति भी कहते हैं I

 

इसलिए,

त्रिगुण साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

कर्माधीन मुक्ति के अनुसार इस मुक्ति का एक नाम गुण रूपी ब्रह्म है I

और कर्मातीत मुक्ति के अनुसार इसका एक नाम निर्गुण ब्रह्म है I

कर्मातीत मुक्ति को गुणमुक्ति भी कहते हैं, और इसके सिद्ध को गुणमुक्त I

अब अगले बिंदु पर जाता हूँ …

 

  • भूतातीत क्या?, भूतातीत किसे कहते हैं?, भूतातीत कौन?, भूतात्मा क्या?, भूतात्मा किसे कहते हैं?, भूतात्मा कौन?, भूतमुक्त क्या?, भूतमुक्त किसे कहते हैं?, भूतमुक्त कौन?, भूतमुक्ति क्या?, भूतमुक्ति किसे कहते हैं?, भूतमुक्ति क्या है?, महाभूत साधना, महाभूत साधना क्या?, महाभूत साधना किसे कहते हैं?, भूत साधना, भूत साधना क्या?, भूत साधना किसे कहते हैं?, भूत ब्रह्म, भूत ब्रह्म किसे कहते हैं?, भूत ब्रह्म क्या?, भूत ब्रह्म क्या है?, महाभूत ब्रह्म, महाभूत ब्रह्म क्या?, महाभूत ब्रह्म क्या है?, महाभूत ब्रह्म किसे कहते हैं?, महाभूत साधना क्या?, महाभूत साधना क्या है?, महाभूत साधना किसे कहते हैं?, महाभूत साधना और कैवल्य, भूत साधना और मुक्ति, महाभूत साधना और मुक्ति, भूत सिद्धि, महाभूत सिद्धि, …

महाभूत साधना में जब पञ्च महाभूतों को अपनी काया से बाहर की ओर देखा जाएगा, तब वो महाभूत उनके अपने ऊर्जावान तारतम्य में पाए जाएंगे I

ऐसी दशा में जो पाया जाएगा, उसमें …

  • पृथ्वी महाभूत पीली मिटटी के वर्ण का होगा I
  • जल महाभूत हलके हरे वर्ण का होगा I
  • अग्नि महाभूत सप्तरंगि होता हुआ भी, मूलतः लाल वर्ण का होगा I
  • वायु महाभूत हलके नीले वर्ण का होगा I
  • और आकाश महाभूत बैंगनी वर्ण का पाया जाएगा I

अपनी काया से बाहर साक्षात्कार हुए महाभूत भी एक-एक करके ही साक्षात्कार किए जाएंगे I

और उन महाभूतों के साक्षात्कार का क्रम भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश…, ऐसा ही होगा I

इसका अर्थ हुआ कि जब किसी भी सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय दशा का आकाश साक्षात्कार किया जाता है, तब उस साधक ने उस दशा के अन्य चार महाभूतों का साक्षात्कार भी कर ही लिया होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन जब इन्ही महाभूतों को अपनी काया से न बाहर और न ही भीतर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, अर्थात अपनी त्वचा पर ही साक्षात्कार किया जाएगा, तब यह पांचो महाभूत एक के बाद एक, अटूट क्रम में ही साक्षात्कार होते चले जाएंगे I

और ऐसी दशा में सबसे भीतर (अर्थात त्वचा के सबसे समीप) का महाभूत पृथ्वी होगा और सबसे बाहर का महाभूत आकाश होगा I

और इन सबको एक हलके गुलाबी वर्ण ने घेरा हुआ होगा, जो व्यान प्राण को दर्शाता है, और जिसका सीधा सीधा नाता, अव्यक्त प्रकृति की ऊर्जावान दशा, जिसको अव्यक्त प्राण कहते हैं, उस से ही पाया जाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब साधक उसकी अपनी साधनाओं में इन्ही महाभूतों का साक्षात्कार, उसकी काया के भीतर करेगा, तब इन महाभूतों का तारतम्य भी समाप्त होगा I

ऐसी दशा में यह महाभूत शरीर के भीतर समान रूप में फैले हुए पाए जाएंगे और साधक के आत्मस्वरूप से संबद्ध भी होंगे I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं का अपनी महाभूत साधना में साक्षात्कार कर लिया होगा, वो योगी भूतमुक्त होने के मार्ग पर चला जाता है, और अंततः, उसकी आत्मस्थिति को ही भूतात्मा कहते हैं I

और जहाँ, भूतात्मा का पद उस भूतातीत दशा को दर्शाता है, जिसको कैवल्य मुक्ति भी कहते हैं, और जहाँ उस मुक्ति का एक नाम भूत ब्रह्म (अर्थात महाभूत ब्रह्म) भी है I

 

इसलिए भूत साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

और इसी दशा को भूतमुक्ति भी कहते हैं और इसके सिद्ध को भूतमुक्त I

इसलिए, महाभूत साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

इस मोक्ष की नीचे की दशा (अर्थात कर्माधीन मुक्ति की दशा) भूत नामक ब्रह्म है I

इसकी गंतव्य दशा (अर्थात कर्मातीत मुक्ति से संबद्ध दशा) भूतातीत ब्रह्म है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

  • तन्मात्रातीत क्या?, तन्मात्रातीत किसे कहते हैं?, तन्मात्रातीत कौन?, तन्मात्रात्मा क्या?, तन्मात्रात्मा किसे कहते हैं?, तन्मात्रात्मा कौन?, तन्मात्रात्मा, तन्मात्रमुक्त, तन्मात्रमुक्त क्या?, तन्मात्रमुक्त किसे कहते हैं?, तन्मात्रमुक्त कौन?, तन्मात्रमुक्ति, तन्मात्रमुक्ति क्या?, तन्मात्रमुक्ति किसे कहते हैं?, तन्मात्र ब्रह्म, तन्मात्र ब्रह्म क्या?, तन्मात्र ब्रह्म किसे कहते हैं?, तन्मात्र ब्रह्म कौन?, तन्मात्रातीत ब्रह्म, तन्मात्र साधना और मुक्ति, तन्मात्र साधना से मोक्ष, तन्मात्र साधना और कैवल्य, तन्मात्र साधना और कैवल्य मुक्ति, तन्मात्र साधना और कैवल्य मोक्ष, … 

तन्मात्र साधना में जब पांच तन्मात्रों को अपनी काया से बाहर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, तब वो तन्मात्र उनके अपने ऊर्जावान तारतम्य में पाए जाएंगे I

अपनी काया से बाहर साक्षात्कार हुए तन्मात्र भी एक-एक करके ही साक्षात्कार किए जाएंगे I

और उन तन्मात्रों के साक्षात्कार का क्रम भी गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द…, ऐसा ही होगा I

इसका अर्थ हुआ कि जब किसी भी सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय दशा का शब्द साक्षात्कार किया जाता है, तब उस साधक ने उस दशा के अन्य चार तन्मात्रों का साक्षात्कार भी कर ही लिया होगा I

इसका कारण है, कि तन्मात्रों के दृष्टिकोण से, शब्द तन्मात्र का साक्षात्कार अंत में ही होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन जब इन्ही तन्मात्रों को अपनी काया से न बाहर और न ही भीतर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, अर्थात अपनी त्वचा पर ही इनका साक्षात्कार किया जाएगा, तब यह पांचो तन्मात्र एक के बाद एक, अटूट क्रम में ही साक्षात्कार होते चले जाएंगे I

और ऐसी दशा में सबसे भीतर (अर्थात त्वचा के सबसे समीप) का तन्मात्र, गंध होगा और सबसे बाहर का तन्मात्र, शब्द का ही होगा I

इसका अर्थ हुआ, कि ऐसे साक्षात्कार में उस दशा की गंध सर्वप्रथम आएगी और अंत में उस दशा का शब्द सुनाई देगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब साधक उसकी अपनी साधना में इन्ही तन्मात्रों का साक्षात्कार, उसकी काया के भीतर करेगा, तब इन तन्मात्रों का तारतम्य भी समाप्त होगा I

ऐसी दशा में यह पञ्च तन्मात्र शरीर के भीतर समान रूप में साक्षात्कार किए जाएंगे, अर्थात एक साथ ही साक्षात्कार होंगे I

यही दशा तब भी होती है, जब सूक्ष्म शरीर किसी ब्रह्माण्डीय दशा में गमन करने के पश्चात, स्थूल शरीर में लौटता है, और ऐसे समय पर भी उस ब्रह्माण्डीय दशा से सम्बंधित पञ्च तन्मात्र एक साथ ही साक्षात्कार होते हैं I

और जहाँ वो साक्षात्कार हुए पांच तन्मात्र भी उसी दशा के होते हैं, जिसमें उस सूक्ष्म शरीर ने, स्थूल शरीर में लौटने से पूर्व गमन किया था I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं का अपनी तन्मात्र साधना में साक्षात्कार कर लिया होगा, वो योगी ही तन्मात्रमुक्त होने के मार्ग पर चला जाता है और अंततः, उसकी आत्मस्थिति को ही तन्मात्रात्मा कहते हैं I

और जहाँ, तन्मात्रात्मा का पद कैवल्य मुक्ति को ही दर्शाता है I

और जहाँ, तन्मात्रात्मा का पद उस तन्मात्रातीत दशा को दर्शाता है, जिसको कैवल्य ब्रह्म भी कहते हैं I

इसी दशा को तन्मात्रमुक्ति भी कहते हैं और इसके सिद्ध को तन्मात्रमुक्त I

इसलिए तन्मात्र साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

मोक्ष की नीचे की दशा (अर्थात कर्माधीन मुक्ति की दशा) तन्मात्र नामक ब्रह्म है I

 इसकी गंतव्य दशा (अर्थात कर्मातीत मुक्ति से संबध दशा) तन्मात्रातीत ब्रह्म है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

  • दिशातीत, दिशातीत क्या?, दिशातीत किसे कहते हैं?, दिशातीत कौन?, दिशात्मक, दिशात्मक क्या?,  दिशात्मक किसे कहते हैं?, दिशात्मक कौन?, दिशामुक्ति, दिशामुक्ति क्या?,  दिशामुक्ति किसे कहते हैं?, दिशामुक्त, दिशामुक्त क्या?, दिशामुक्त किसे कहते हैं?, दिशामुक्त कौन?, मार्गातीत, मार्गातीत क्या?, मार्गातीत किसे कहते हैं?, मार्गातीत कौन?, मार्गात्मा, मार्गात्मा क्या?, मार्गात्मा किसे कहते हैं?, मार्गात्मा कौन?, मार्गमुक्त, मार्गमुक्त क्या?, मार्गमुक्त किसे कहते हैं?, मार्गमुक्त कौन?, मार्गमुक्ति, मार्गमुक्ति क्या?, मार्गमुक्ति किसे कहते हैं?, ग्रंथ मुक्त, ग्रंथातीत, दिशा साधना और मुक्ति, दिशा साधना और मोक्ष, दिशा साधना और कैवल्य, दिशा साधना से कैवल्य मोक्ष, दिशा साधना से कैवल्य मुक्ति, सर्वदिशा दर्शी, सर्वदिशा दर्शी आत्मा, सर्वदिशा दर्शी ब्रह्म, सर्वदिशा साक्षी, सर्वदिशा साक्षी आत्मा, सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म, …

यहाँ कहा गया दिशा शब्द, उत्कर्ष मार्ग और उसके ग्रंथों को भी सूक्ष्म रूप में दर्शाता है I

इसलिए जबकि यहाँ शब्द तो दिशा का ही प्रयोग किया गया है, लेकिन इसका सूक्ष्म रूप वो मार्ग और उसका ग्रन्थ भी है, जो उत्कर्ष पथ कहलाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जब साधना में दिशा नामक आयाम को अपनी काया से बाहर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, तो वो सर्व दिशाओं के तारतम्य से सुसज्जित, दिशाचक्र स्वरूप में ही साक्षात्कार होगा I

और जब इस दिशा चक्र को पूर्व में साक्षात्कार किए हुए कालचक्र के साथ रखकर देखा जाएगा, तब यह भी पाया जाएगा कि इस दिशा चक्र में विभिन्न कालखंडों की दिशाएं (अर्थात उत्कर्षादि मार्ग) एक दुसरे से पृथक हैं I

यही कारण रहा है, कि विभिन्न कालखंडों में विभिन्न पंथों (अर्थात उत्कर्ष मार्गों और उनके ग्रंथों) का उदय होता है, और जहाँ वो पंथों के मार्ग और उनके ग्रंथ भी उस कालखंड की ऊर्जा (या दिव्यता) के अनुसार ही होते हैं I

और ऐसे दिशा साक्षात्कार से साधक यह भी जान जाता है, कि दिशाचक्र के दृष्टिकोण से, इस दिशाचक्र को ही जीव जगत का मार्ग (या जीवन शैली) कहा कहा गया है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इसी साधना में दिशा को अपनी काया से न बाहर और न भीतर की ओर देखा जाएगा, अर्थात अपने शरीर की त्वचा पर ही साक्षात्कार किया जाएगा, तब यह दिशाएं एक के बाद एक, अटूट क्रम में ही साक्षात्कार होती ही चली जाएंगी I

और ऐसा होने पर भी वो दिशाएं एक दुसरे से पृथक ही होंगी, क्यूंकि वो सभी दिशाएं (या उत्कर्ष मार्ग) उनके अपने कालखण्डों के साथ योग लगाके ही बैठी होंगी, और उसी कालखंड के लिए और उसी कालखंड में ही कार्यरत पाई जाएंगी I

इसलिए जब वो कालखण्ड व्यतीत हो जाएगा, तब उस कालखंड की दिशा (अर्थात मार्ग और ग्रन्थ) भी लुप्त हो जाएगा I

 

टिपण्णी: क्यूंकि अभी के समय में, कलियुग स्तंभित किया जा रहा है, इसलिए आगामी समय में कलियुग के कालखंड में आए सभी मार्ग (ग्रन्थ या दिशाएं) भी लुप्त हो जाएँगी I और जब ऐसा हो रहा होगा, तो आगामी गुरुयुग का मार्ग भी प्रकट किया जाएगा I इसलिए आगामी समय में, इस पृथ्वी लोक में उत्कर्ष और जीवन पथ का आमूलचूल परिवर्तन निश्चित ही है I और इसी परिवर्तन प्रक्रिया में, कलियुग के कालखंड में जो भी आया था, वो सब परिवर्तन को जाएगा और जहाँ वो परिवर्तन भी आगामी कालखंड के, अर्थात आगामी गुरुयुग की आवश्यकताओं के अनुसार ही होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इसी साधना में, दिशा आयाम को शरीर के भीतर साक्षात्कार किया जाएगा, तब एक ही दिशा पाई जाएगी, जो सर्वदिशा व्यापक होगी I

दिशा आयाम के अंतर्गत, सर्वदिशा व्यापक ही साधक का आत्मस्वरूप है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं का अपनी दिशा साधना में साक्षात्कार कर लिया होगा, वो योगी ही दिशामुक्त होने के मार्ग पर चला जाता है I

 

और अंततः वह योगी …

दिशाओं के अतीत होकर, दिशातीत हो जाएगा I

दिशातीत ही मार्गातीत, ग्रंथातीत, पथातीत इत्यादि होता है I

ऐसे योगी की आत्मस्थिति को ही दिशात्मा कहते हैं I

और जहाँ, दिशातमा का पद कैवल्य मुक्ति को ही दर्शाता है, क्यूंकि वो दिशात्मा की स्थिति सर्वदिशा व्यापक ही होती है I

और जहाँ, दिशातमा का पद उस दिशातीत (अर्थात मार्गातीत, ग्रंथातीत) अवस्था को ही दर्शाता है, जिसको कैवल्य मुक्ति भी कहते हैं I

जो दिशातीत है, उसमें कोई एक या अनेक दिशा (या उत्कर्ष पथ) नहीं होती हैं I

वह दिशातीत, सर्वदिशा व्यापक ही होता है, और ऐसे होने पर भी वो समस्त दिशाओं (या उत्कर्ष मार्गों) का साक्षी स्वरूप ही होता है I

और ऐसा होने पर भी, सभी दिशाएं (या मार्ग) उसी दिशातीत की ओर ही जाती हैं I

इसका अर्थ हुआ, कि समस्त उत्कर्ष पथ, इसी दिशातीत की ओर ही जाते हैं I और इसीलिए अंततः, साधक का उत्कर्ष पथ इसी दिशातीत में ही जाएगा I

उस दिशातीत में न उत्कर्ष का कोई बिंदु होता है, और न ही कोई उत्कर्ष का मार्ग I और जहाँ वो दिशातीत, उत्कर्ष से भी अतीत, समस्त मार्गों से स्वतंत्र, मार्गआत्मा ही है I

जब कोई उत्कर्ष की दिशा (अर्थात उत्कर्ष पथ या उत्कर्ष मार्ग) ही न रहे, तो वो मुक्ति ही तो है I

इसी अवस्था को दिशामुक्ति भी कहते हैं और इसके सिद्ध दिशामुक्त I

इसलिए दिशा साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

वो मुक्ति का नाम सर्वदिशा व्यापक और सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म भी है I

और इस अवस्था में, वो साधक अपने उत्कर्ष मार्ग को ही त्रिकाल के समस्त समयखण्डों के सर्वदिशाओं (अर्थात सभी उत्कर्ष मार्गों) में समान रूप से व्याप्त पाता है I

और ऐसा होने पर भी वो साधक, अपने आत्मस्वरूप को सर्वदिशा साक्षी रूप में, सर्वदिशा से अतीत ही पाता है I

 

इसीलिए, …

सर्वदिशा व्याप्त, सर्वदिशा दर्शी, दिशामुक्ति, दिशामुक्त, दिशातीत आदि शब्द, कैवल्य मोक्ष रुपी ब्रह्म को ही दर्शाते हैं I

 

ऐसा सिद्ध योगी, …

उन ब्रह्म के समान, अपने दिशातीत आत्मस्वरूप को सर्वदिशा दर्शी देखता है I

अंततः उसी आत्मस्वरूप में वो दिशातीत साधक, सर्वदिशा साक्षी ही हो जाता है I

ऐसे योगी का किसी भी उत्कर्ष पथ या ग्रन्थ से कुछ भी लेना देना नहीं रहता, क्यूंकि वो योगी उन समस्त उत्कर्ष मार्गों का आत्मा, दिशात्मा होकर ही शेष रह जाता है I

 

ऐसे योगीजनों के लिए ही ऐसा कहा गया था, …

जो ग्रंथों के गंतव्य को पाया है, उसके लिए किसी ग्रन्थ का क्या लाभ I

जो कैवल्य मोक्ष को ही प्राप्त हुआ है, उसके लिए क्या उत्कर्ष पथ I

आत्मा के ब्रह्मरूप को जानने के पश्चात, उत्कर्ष या अपकर्ष से क्या लेना देना I

आगे बढ़ता हूँ …

 

  • दशातीत, दशातीत क्या?, दशातीत किसे कहते हैं?, दशातीत कौन?, दशात्मा, दशात्मा क्या?, दशात्मा किसे कहते हैं?, दशात्मा कौन?, दशामुक्ति , दशामुक्ति क्या?, दशामुक्ति किसे कहते हैं?, दशामुक्त , दशामुक्त क्या?, दशामुक्त किसे कहते हैं?, दशामुक्त कौन?, लोकातीत, लोकातीत क्या?, लोकातीत किसे कहते हैं?, लोकातीत कौन?, लोकात्मा, लोकात्मा क्या?, लोकात्मा किसे कहते हैं?, लोकात्मा कौन?, दशा साधना और मुक्ति, दशा साधना और मोक्ष, दशा साधना और कैवल्य, दशा साधना से कैवल्य मोक्ष, दशा साधना से कैवल्य मुक्ति, सर्वदशा दर्शी, सर्वदशा दर्शी आत्मा, सर्वदशा दर्शी ब्रह्म, सर्वदशा साक्षी आत्मा, सर्वदशा साक्षी ब्रह्म, सर्वव्यापी ब्रह्म, सर्वव्यापक ब्रह्म, सर्वव्यापी आत्मा, सर्वव्यापक आत्मा, …

यहाँ कहा गया दशा शब्द, उत्कर्ष स्थिति (या उत्कर्ष दशा या उत्कर्ष की अवस्था) को भी सूक्ष्म रूप में दर्शाता है I

इसलिए जबकि यहाँ शब्द तो दशा का ही प्रयोग किया गया है, लेकिन इसका सूक्ष्म रूप वो अवस्था भी है, जो उत्कर्ष पथ पर साधक की स्थिति (या अवस्था) कहलाती है I और जहाँ यह उत्कर्ष स्थिति भी किसी न किसी लोक दशा से ही सम्बंधित होती है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जब साधना में दशा नामक आयाम को अपनी काया से बाहर की ओर साक्षात्कार किया जाएगा, तो वो सूक्ष्म और स्थूलादि दशाओं के तारतम्य से सुसज्जित, दशचक्र स्वरूप में ही साक्षात्कार होगा I

और जहाँ इस दशचक्र में कारण जगत, सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत के सभी लोक होंगे I

और जब इस दशा चक्र को पूर्व में साक्षात्कार किए हुए कालचक्र के साथ रखकर देखा जाएगा, तब यह भी पाया जाएगा कि इस दशा चक्र में विभिन्न कालखंडों की दशाएं (अर्थात उत्कर्षादि दशाएं या तत्त्वों की अवस्थाएं) एक दुसरे से पृथक हैं I

यही कारण रहा है कि विभिन्न कालखंडों में तत्त्वों में परिवर्तन होता है I और इस परिवर्तन से जीव जगत नवीन भी होता है I

उन कालखण्डों में कभी तो कोई दशा अपने स्थूल रूप को त्यागकर सूक्ष्म हो जाती है (अर्थात उस स्थूल का नाश होकर, वो स्थूल अपने मूल सूक्ष्म रूप में परिवर्तित हो जाता है) I और कभी इससे विपरीत दशा ही पाई जाती है I

और जहाँ उन दशाओं का उदय भी उस कालखंड की ऊर्जाओं के अनुसार ही होता है I

और ऐसी साधना में, वो साधक यह भी जान जाता है कि इस दशचक्र पर पड़ रहे कालचक्र के प्रभाव के कारण, जो कुछ भी इस जीव जगत में है, वो सबकुछ सदैव ही परिवर्तनशील रहता है I

इस साक्षात्कार से वो साधक यह भी जान जाता है, कि ब्रह्म की रचना में जो कुछ भी है, वो सबकुछ इस दशा चक्र के सदैव परिवर्तनशील स्वरूप में भी बसा हुआ है I और इसीलिए इस जीव जगत में जो भी है, वो सबकुछ परिवर्तनशील ही है I

इस दशा साक्षात्कार से साधक यह भी जान जाता है, कि दशा चक्र के दृष्टिकोण से, इस दशचक्र को ही जीव जगत कहा गया है I

 

इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि …

इस समस्त जीव जगत में, सदैव चलित परिवर्तन ही एकमात्र सनातन स्थिरता है I

संपूर्ण प्रकृति सहित, इस सृष्टि में केवल सनातन परिवर्तन ही स्थिर है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इसी साधना में दशा को अपनी काया से न बाहर और न भीतर की ओर देखा जाएगा, अर्थात अपने शरीर की त्वचा पर ही साक्षात्कार किया जाएगा, तब यह दशाएं एक के बाद एक, अटूट क्रम में ही साक्षात्कार होती ही चली जाएंगी I

और ऐसा होने पर भी वो दशाएँ एक दुसरे से पृथक ही होंगी I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इसी साधना में, दशा आयाम को शरीर के भीतर साक्षात्कार किया जाएगा, तब एक ही दशा पाई जाएगी, जो सर्वव्यापक होगी I

दशा आयाम के अंतर्गत, यही सर्वव्यापकता साधक का आत्मस्वरूप है I

और जहाँ वो आत्मस्वरूप ही सर्वव्यापक ब्रह्म कहलाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं का अपनी दशा साधना में साक्षात्कार कर लिया होगा, वो योगी ही दशामुक्त होने के मार्ग पर चला जाता है I

 

और अंततः, …

उस योगी की आत्मस्थिति को ही दशात्मा कहते हैं I

और जहाँ, दशात्मा का पद कैवल्य मुक्ति को ही दर्शाता है I

दशात्मा की स्थिति सर्वव्याप्त ही होती है I

 

सर्वव्याप्त एक या अधिक लोक का नहीं होता है, इसलिए वो समस्त लोकों (या दिशाओं) से अतीत, दशातीत ही होगा I

यही कारण है, कि दशात्मा का पद उस दशातीत (अर्थात लोकातीत या अवस्थातीत या स्थितितीत) ब्रह्म को ही दर्शाता है, जिसको कैवल्य मुक्ति भी कहते हैं I

जब उत्कर्ष मार्ग में कोई दशा (स्थिति या अवस्था) न रहे, तो वो मुक्ति ही तो है I

और इसी अवस्था को दशामुक्ति भी कहते हैं और इसके सिद्ध को दशामुक्त I

दशा मुक्त की अवस्था सर्वदशा व्याप्त ही होती है I

 

और क्यूंकि यह समस्त दशाओं से अतीत ही होती है, इसलिए यह भी दशातीत शब्द के अंतर्गत ही पाई जाती है I

दशातीत शब्द, लोकातीत, जागतातीत और ब्रह्माण्डातीत शब्दों को भी दर्शाता है, इसलिए जो योगी दशात्मा होगा, उसको लोकात्मा, जागतात्मा और ब्रह्माण्डात्मा भी कहा जा सकता है I

जो दशात्मा है, वही दशातीत है, और उसकी स्थिति ही दशामुक्त है I

जो लोकात्मा है, वही लोकातीत है, और उसकी स्थिति ही लोकमुक्त है I

जो लोकात्मा शब्द के गंतव्य पर ही बैठा है, वही जागतात्मा है I

जो जागतात्मा है, वही जागतातीत है और उसकी स्थिति ही जगतमुक्त है I

 

इसलिए दशा साधना से भी कैवल्य मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I और वो मुक्ति का एक नाम सर्वदशा व्यापक ब्रह्म भी है, अर्थात सर्वव्याप्त ब्रह्म ही है I

और इस अवस्था में, वो साधक अपने आत्मस्वरूप को ही त्रिकाल के समस्त समयखण्डों की सर्वदशाओं (अर्थात सभी अवस्थाओं) में समान रूप से व्याप्त पाता है I

और ऐसी दशा में वो साधक अपने आत्मस्वरूप को सर्वव्याप्त ही पाता है I

ऐसा सिद्ध योगी, ब्रह्म के समान, अपने आत्मस्वरूप को सर्वदशाओं में देखता है और अंततः उसी आत्मस्वरूप में वो साधक सर्वदशा साक्षी होकर ही शेष रह जाता है I

जो सर्वसाक्षी है, वही तो ब्रह्म है I

और ऐसा ही वो दशा सिद्ध योगी उसके अपने आत्मस्वरूप में भी होता है I

 

  • आकाश और आकाशचक्र, आकाश का गंतव्य अनंत है, आकाश का गंतव्य स्वरूप, आकाशात्मा, ऊर्जातमा, ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का स्थान आकाश है, आकाश और अनंत ब्रह्म, आकाश ब्रह्म, आकाश ब्रह्म ही है, आकाश ही ब्रह्म है, आकाश अनंत ब्रह्म ही है, आकाश ही अनंत ब्रह्म है, आकाशातीत ब्रह्म, आकाशातीत आत्मा, आकाशातीत, आकाश ब्रह्म

    , …

यह भाग मैं संक्षेप में ही बता रहा हूँ …

जब हम आकाश का साक्षात्कार अपनी काया से बाहर की ओर करते हैं, तब वो आकाश अपने चक्र स्वरूप, अर्थात आकाशचक्र में साक्षात्कार होता है I यह चक्र भी सदैव ही परिवर्तनशील होता है, इसी के कारण, सबकुछ अपने आकार में बढ़ता और सिकुड़ता रहता है I

आकाश का चक्र स्वरूप ही जीव जगत कहलाता है, और इसी आकाशचक्र में समस्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएँ निवास भी करती हुई पाई जाएंगी I

इस साक्षात्कार के पश्चात, योगी यह भी जान जाएगा, की जीव जगत के मूल में जो प्रकृति है, वो ऊर्जात्मक ही है I मूल प्रकृति अनंत ऊर्जा ही है I

और जब हम उसी आकाश को अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करते हैं, तो वो आकाश ही उस अनंत स्वरूप में होगा, जो ब्रह्म कहलाता है I

जिस योगी ने ऊपर बताए हुए दोनों साक्षात्कारों को पाया होगा, वही आकाश ब्रह्म को दर्शाएगा, और जहाँ वो आकाश अपने चक्र स्वरूप में जीव जगत ही होगा, और वही आकाश अपने चक्रतीत गन्तव्य स्वरूप में, अनंत ब्रह्म ही होगा, जो महाकाश स्वरूप में ही होगा I

और ऐसी दशा में, वो महाकाश ही साधक का अनंत आत्मस्वरूप होगा I

क्यूँकि महा कभी भी दो नहीं हुए, इसलिए, जो महा है, वो एक ही है I

और जो एक है, वही अद्वैत और निर्विकल्प ब्रह्म कहलाता है I

जो अद्वैत निर्विकल्प ब्रह्म, वही आकाश साक्षात्कारी साधक का आत्मस्वरूप है I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

चेतन चतुष्टय क्या है, चेतना चतुष्टय क्या है, चेतना की चार दशाएँ, जागृत क्या है, सुषुप्ति क्या है, स्वप्न क्या है, तुरीय क्या है, तुरीयातीत क्या है, चेतना की चार दशाएँ, चेतना चतुष्टय, चेतन चतुष्टय, जागृत, सुषुप्ति, स्वप्न, तुरीय, तुरीयातीत, तुरीयातीत आत्मा, तुरीयातीत ब्रह्म, नियमातीत, तुरीया तीत कौन?, तुरीयातीत क्या है?, तुरीयातीत किसे कहते हैं?, … अवधूत, ब्रह्म अवधूत, ब्रह्मवधूत, अवधूत कौन?, ब्रह्म अवधूत कौन?, ब्रह्मवधूत कौन?, …

चेतना की चार दशाएँ होती हैं, जो ऐसी होती हैं …

  • जागृत I
  • सुषुप्ति I
  • स्वप्न I
  • तुरीय I
  • लेकिन इन चारों से अतीत भी एक अवस्था होती है, जो साधक का तुरीयातीत आत्मस्वरूप होता है I

जो इन सभी से अतीत है, वो इन सब को जैसे सुदूर से देखकर साधक को इनका ज्ञान करवाता है, और जो ऐसा होने पर भी इन सबका केवल साक्षी है I वही इन सबका वास्तविक स्वरूप है, अर्थात आत्मस्वरूप है, जो तुरीयातीत कहा गया है I

और जहाँ साधक का वो आत्मस्वरूप ही इन सबके कालों और गुणों से अतीत है, और वही आत्मस्वरूप सर्वव्यापक, सर्वदिशा दर्शी, अनादि अनंत, अखंड और सनातन साक्षी है I

साधक का आत्मस्वरूप ही वो सबकुछ है, जो इस भाग सहित, इस अध्याय के भाग के गंतव्य स्वरूप में बताया गया है, और जिसको कई शब्दों से दर्शाया गया है, और जो कैवल्य मोक्ष रूपी ब्रह्म ही है I

साधक के इसी आत्मस्वरूप को तुरीयातीत आत्मा कहते हैं, और जहाँ वो आत्मा ही ब्रह्म है I

जब साधक इस भाग में बताई गई समस्त दशाओं के गंतव्य का साक्षात्कार करता है, जैसे काल का गंतव्य कालातीत सनातन ब्रह्म, गुणों का गंतव्य गुणातीत ब्रह्म, भूतों की गंतव्य भूतातीत ब्रह्माण्डातीत ब्रह्म, तन्मात्र का गंतव्य तन्मात्रातीत ब्रह्म, दिशा का गंतव्य सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म और दशा का गंतव्य सर्व्यापक ब्रह्म और आकाश का गंतव्य अनंत ब्रह्म…, तब साधक जिस आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करेगा, वही तुरीयातीत है I

इसलिए तुरीयातीत ही साधक का आत्मा है, और वही तुरीयातीत को ब्रह्म भी कहा जाता है I

 

अब तुरीयातीत शब्द को परिभाषित करता हूँ …

चेतन चतुष्टय से परे साधक के आत्मस्वरूप को तुरीयातीत कहते हैं I

चेतना की चार दशाओं का सनातन साक्षी, साधक का आत्मा ही तुरीयातीत है I

समस्त ब्रह्माण्ड का जो साक्षी आत्मा है, और जो ब्रह्म ही है, वो तिरियातीत है I

मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य मोक्ष अदि शब्द जिसको दर्शाते है, वो तुरीयातीत है I

जो कालमुक्त, गुणमुक्त, भूतमुक्त, तन्मात्रमुक्त, दिशामुक्त, दशामुक्त आदि शब्दों से दर्शाया जाता है, वो तुरीयातीत है I

जो कालातीत, गुणातीत, भूतातीत, तन्मात्रातीत, दिशातीत, मार्गातीत, दशातीत, लोकातीत, जगतातीत आदि शब्दों से दर्शाया जाता है, वो तुरीयातीत है I

जो कालात्मा, गुणात्मा, भूतात्मा, तन्मात्रात्मा, दिशात्मा, मार्गआत्मा, दशात्मा, लोकात्मा, जागतात्मा आदि शब्दों से दर्शाया जाता है, वो तुरीयातीत है I

जिसको स्वयं ही स्वयं में जाना जाता है, वो तुरीयातीत है I

जो सर्वसाक्षी होता हुआ भी, स्वयं ही स्वयं का साक्षी ही है, वो तुरीयातीत है I

टिपण्णी: ऊपर बताए गए अंतिम वाक्य में, आत्मा जो ब्रह्म ही है, उसको सूक्ष्म रूप में, सर्वअभिव्यक्ता स्वरूप में बताया गया है I

 

ऊपर बाये गए बिंदुओं, उनके साधना मार्गों और उनके गंतव्य को दर्शाते शब्दों में तारतम्य होने पर भी, यह सभी बिंदु और शब्द, साधक की उस पूर्ण स्वतंत्र और सर्वसाक्षी आत्मा को ही दर्शा रहे हैं, जो ब्रह्म कहलाता है और जिसको इस अध्याय में तुरीयातीत कहा गया है I

 

इसलिए, …

चेतन चतुष्टय से परे योगी का जो आत्मस्वरूप है, वो तुरीयातीत है I

योगी के उस तुरीयातीत आत्मा को ही स्व:प्रकाश, पूर्ण और ब्रह्म कहा जाता है I

और जहाँ वो तुरीयातीत ब्रह्म रूपी आत्मा, सिद्धितीत और समाधितीत ही है I

 

यही कारण है की …

निर्गुण ब्रह्म में कोई भी सिद्धि नहीं होती I

निर्गुण निराकार ब्रह्म की तो कोई समाधि भी नहीं होती I

जो तुम स्वयं अपने आत्मस्वरूप में हो ही, उसकी कैसी सिद्धि I

जो तुम अपने वास्तविक स्वरूप में अनादि कालों से हो ही, उसकी कैसी समाधि I

 

इसलिए, …

कैवल्य मोक्ष की न तो कोई साधना सिद्धि और न ही कोई समाधि ही होती है I

वो कैवल्य मोक्ष जो तो तुम्हारा आत्मस्वरूप है ही, उसको कैसे सिद्ध करोगे I

वो कैवल्य मोक्ष जो तिम्हारा वास्तविक स्वरूप है, उसकी कैसी समाधि I

 

इसलिए, …

कैवल्य मुक्ति को कभी भी पाया नहीं जाता, उस मुक्ति को प्राप्त हुआ जाता है I

जो तुम अपने आत्मस्वरूप में हो ही, उसकी कैसी प्राप्ति, उसका तो होना पड़ेगा न I

 

इसलिए, …

पाना या खोना तो कर्मों से होता है, लेकिन कैवल्य तो कर्ममुक्ति ही है I

जब वो कैवल्य मोक्ष कर्मातीत ही है, तो उसको कर्मों से कैसे पाओगे? I

इसलिए, कैवल्य मुक्त हुआ जाता है…, कि उस कैवल्य को पाया जाता है I

और वो जहाँ कैवल्य मुक्ति को ही तुरीयातीत कहा जाता है I

 

और एक बिंदु …

शिवत्व विष्णुत्व ब्रह्मत्व शाक्तत्व गणपतत्व का अद्वैत योग, तुरीयातीत है I

तुरीयातीत ही योगशिखर है, जिसको कैवल्य मोक्ष, आत्मा और ब्रह्म कहते हैं I

तुरीयातीत योगी अपनी सर्वात्मा रूपी आत्मा से सिवा, किसी और को नहीं भजते I

इसलिए, रूद्र के समान, तुरीयातीत योगी स्वयं ही स्वयं का उपासक होता है I

इसलिए, तुरीयातीत शब्द, उसका मार्ग और उसकी दशा, रुद्रात्मक ही है I

 

इसीलिए कुछ अवधूत यह भी कह गए, कि …

जब मैं ही शिव हूँ, तो मैं किसकी उपासना करू? I

जब मेरा आत्मस्वरूप ही तुरीयातीत है, तो मुझे जीव जगत से क्या लेना देना I

जब मै ही ब्रह्म हूँ, तो मेरे लिए कैसा प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि I

जब आत्मस्वरूप ही ब्रह्म है, तो क्या योग, क्या मार्ग और क्या कुछ और I

सर्वव्याप्त स्व:प्रकाश सर्वसाक्षी सनातन पूर्ण स्वतंत्र को इनसे क्या लेना I

तुरियेतीत आत्मस्वरूप, कैवल्य मोक्ष में स्थित योगी को इनसे क्या लेना देना I

यह वाक्य भी उन अवधूतों के तुरीयातीत आत्मा को ही दर्शाते हैं I और जहाँ उस तुरीयातीत आत्मा को ही शिव और ब्रह्म कहा गया है I

 

और मेरे अपने अनुभवों से, तुरीयातीत के बारे में मैं यह भी कह सकता हूँ …

जब ब्रह्म को जान लिया, तो ग्रंथ, मंत्र, मार्ग, दशा आदि से क्या लेना देना I

जो शब्दातीत, ग्रंथातीत, मार्गातीत और दशातीत है, वही तुरीयातीत है I

जब योगी के लिए पिण्ड ब्रह्माण्ड ही नहीं बचा, तो क्या उत्कर्ष और क्या अपकर्ष I

उत्कर्ष पथ पर जब पिण्ड और ब्रह्माण्ड, दोनों ही न दिखें, वो तुरीयातीत है I

जब साधक की चेतना, स्वयं ही स्वयं को ही न देख पाए, वो तुरीयातीत है I

जब योगी का चेतन आत्मा, जीव और जीवातीत, एक साथ ही हो, वो तुरीयातीत है I

जब योगी का आत्मा, ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्डातीत एक साथ हो, वो तुरीयातीत है I

जब योगी का आत्मस्वरूप, सर्वे और सर्वातीत, एक साथ हो, वो तुरीयातीत है I

जब योगी ब्रह्म और उनकी अभिव्यक्ति एक साथ ही हो, वो तुरीयातीत है I

जब योगी का आत्मा सबकुछ होता हुआ भी, केवल ही रहे, वो तुरीयातीत है I

जिसके लिए कोई ब्रह्माण्डीय नियमादि नहीं है, वो नियमातीत तुरीयातीत है I

जो निर्गुण होता हुआ भी, सगुण और सगुण निर्गुण दोनों हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो अनंत होता हुए भी, साकारी और निराकारी दोनों ही हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जीवतीत और जागतातीत होता हुआ भी, जीव जगत ही हुआ है, वो तुरुयतीत है I

जो पूर्ण होता हुआ भी, अपनी अभिव्यक्तियों में अपूर्ण सा हुआ है, वो तुरुयतीत है I 

जो जीव जगत के क्लेशों में बसा हुआ भी, सच्चिदानंद निरंजन है, वो तुरीयातीत है I

जिसमें जीव जगत और जो जीव जगत में भी प्रकाशित हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो जीव जगत रूप में बंधा प्रतीत होता हुआ भी, पूर्ण स्वतंत्र है, वो तुरीयातीत है I

जो पूर्ण है और जिससे अपूर्ण जीव जगत की पूर्णता सिद्ध है, वो तुरीयातीत है I

जो अभिव्यक्ता होता हुआ भी, जीव जगत रूप में अभिव्यक्त है, वो तुरीयातीत है I

जो जीव जगत रूपी तारतम्य में प्रतीत होता हुआ भी, अद्वैत है, वो तुरीयातीत है I

जो चलित जीव जगत रूप में होते हुए भी, पूर्ण अचल ही है, वो तुरीयातीत है I

जो अणु, विराट और विश्वरूपी होता हुआ भी, इन सबसे अतीत है, वो तुरीयातीत है I

जिसको जानने के बाद भी, वो अवर्णनीय ही रहता है, वो तुरीयातीत ब्रह्म है I

जिससे पूर्व और जिससे आगे, उसके सिवा कुछ और है ही नहीं, वो तुरीयातीत है I

जो मोक्ष होता हुआ भी, जीव जगत और मुक्तिमार्ग हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो परमशिव होता हुआ भी, सगुण शिव और पुरुष प्रकृति हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो सर्वातीत होता हुआ भी, अणु विराट और विश्वरूप हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो सर्वातीत होता हुआ भी, सर्वाधार और सर्व हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो होता हुआ भी नहीं है, और नहीं होता हुआ भी सदैव ही है, वो तुरीयातीत है I

जो मुलातीत और अमूल गंतव्य होता हुआ भी, सर्वमूल और सर्व हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो निरालम्ब निराधार निर्बीज होता हुआ भी, सर्वालम्ब सर्वाधार सर्वबीज हुआ है, वो तुरीयातीत है I

जो तेरा मेरा इसका उसका रूपी तारतम्य से परे अद्वैत सर्वात्मा है, वो तुरीयातीत है I

जो सब, जिसमें सब और जो सबमें होता हुआ भी, सबसे अतीत है, वो तुरीयातीत हैI

जो पूर्ण, सर्वसाक्षी, व्यापक सनातन कर्मातीत स्व:प्रकाश आत्मा है, वो तुरीयातीत है I

जो जानकार योगी ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में अवधूत कहलाएगा, वो तुरीयातीत है I

जो परमात्मा, परमेश्वर, परमार्थ, कैवल्य मोक्ष आदि कहलाता है, वो तुरीयातीत है I

आगे बढ़ता हूँ …

तुरीयातीत से आगे कोई दशा या मार्ग भी नहीं होता, इसलिए तुरीयातीत ही अंत है, और जहाँ उस अंत को ही अनंत कहा जाता है I और इसका ज्ञानी और धारक योगी अवधूत कहलाता है I

इसलिए चाहे अवधूत बोलो, तुरीयातीत बोलो, मुक्ति बोलो, कैवल्य या केवल बोलो, मोक्ष बोलो, आत्मा बोलो या ब्रह्म ही बोलो…, बात एक ही है I

और जब ऐसा तुरीयातीत अवधूत किसी लोक में लौटके आता है, तो वो ही ब्रह्मवधूत शब्द से पुकारा जाता है I

इस तुरीयातीत का धारक ब्रह्मवधूत योगी, कम से कम त्रिदेव का स्वरूप तो होगा ही…, लेकिन कुछ विशिष्ट ब्रह्मवधूत भी हुए हैं, जो किसी मृत्युलोक के किसी लोकादि में लौटने पर, पंच देव के ही स्वरूप थे I

वो तुरीयातीत अवधूत जो पंच देव के एक से अधिक का स्वरूप हुआ है, लेकिन पांचो देव का स्वरूप नहीं हुआ है, वो महामानव कहलाता है I

और वो तुरीयातीत अवधूत जो पंचदेव का ही स्वरूप है, वो ही अतिमानव कहलाया जाता है I

ऐसा योगी को पञ्च सरस्वती में से कोई एक माँ पञ्च विद्या सरस्वती, उनके अपने दैविक गर्भ में धारक करके किसी एक मृत्युलोक में, काल की प्रेरणा से कोई विशेष कार्य करने हेतु लाती है I

और ऐसे लाने के पश्चात, वो पञ्च विद्या उस अवधूत को एक स्थूल देह भी प्रदान करती हैं I

और इस लौटने के समय, वो तुरीयातीत अवधूत परकाया प्रवेश के मार्ग से ही शरीरी होती है, क्यूंकि ब्रह्मवधूत कभी भी किसी स्थूल देहि माता के गर्भ से जन्म ले ही नहीं सकता है I

इसीलिए, वैदिक वाङ्मय में अवधूत को सर्वोकृष्ट योगी ही बताया गया है I

 

अब इन्ही बिन्दुओं पर यह अध्याय समाप्त होता है, और मैं अगले अध्याय पर जाता हूँ, जिसका नाम पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा है I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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