सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा, सावित्री प्रदक्षिणा, हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा, अकार उकार प्रदक्षिणा, आर्य प्रदक्षिणा

सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा, सावित्री प्रदक्षिणा, हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा, अकार उकार प्रदक्षिणा, आर्य प्रदक्षिणा

इस अध्याय में सावित्री परिक्रमा (या अकार परिक्रमा) और हिरण्यगर्भ परिक्रमा (या उकार परिक्रमा) पर बात होगी I जब हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा या कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा, अर्थात उकार प्रदक्षिणा होती है, तब सावित्री प्रदक्षिणा, अर्थात अकार प्रदक्षिणा भी स्वतः हो जाती है I इसलिए इस प्रदक्षिणा (या परिक्रमा) को सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा और सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा भी कहा जा सकता है I

इस प्रदक्षिणा में, सावित्री सरस्वती का नाम इसलिए पहले कहा है, क्यूंकि परकाया प्रवेश से पाए हुए इस जन्म के उत्कर्ष मार्ग में, यह प्रदक्षिणा उन्ही माँ सावित्री विद्या, अर्थात अकार या प्रज्ञापारमिता से ही प्रारम्भ हुई थी I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही संबंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और यह भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकेर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का उनसठवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, ओ३म् सावित्री मार्ग की श्रृंखला का छठा अध्याय है।

 

इस चित्र का वर्णन

सावित्री प्रदक्षिणा, हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा
सावित्री प्रदक्षिणा, हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा

 

इस चित्र के नीचे की ओर जो स्वर्णिण देवी बैठी हुई हैं, उनके बारे में एक पूर्व का अध्याय, जिसका नाम अकार था…, उसमें बताया जा चुका है I

और इन देवी के ऊपर जो लिंगात्मक स्वरूप दर्शाया गया है, उसके बारे में भी पूर्व के एक अध्याय, जिसका नाम उकार था…, उसमें बताया जा चुका है I

इसलिए, यह चित्र पूर्व के उन दोनों अध्यायों की योगावस्था को वैसे ही दर्शा रहा है, जैसा ॐ मार्ग में होता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इस चित्र में अकार और उकार, अर्थात सावित्री सरस्वती और कार्य ब्रह्म (अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्म की रचैता रूप में अभिव्यक्ति) को दर्शाया गया है I इस चित्र में सावित्री विद्या और कार्य ब्रह्म वैसे ही दिखाए गए हैं, जैसे योगी के ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में साक्षात्कार होते हैं I

आंतरिक योगमार्ग, अर्थात आत्ममार्ग में, जब योगी ऊपर (या ब्रह्मरंध्र) की ओर उठता है, तब वो योगी पहले अकार या माँ सावित्री का साक्षात्कार करता है I और इस साक्षात्कार के पश्चात ही उकार या कार्य ब्रह्म का साक्षात्कार करता है I ऐसा ही इस चित्र में भी दिखाया गया है, जिसमे उकार का स्थान, अकार की देवी के ऊपर दिखाया गया है I

यह अध्याय का ज्ञान परकाया प्रवेश मार्ग से दिया जा रहा है, क्यूंकि इस मार्ग में, परकाया प्रवेशी के आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया की योगावस्था, इसी प्रदक्षिणा से होकर जाती है I

इस अध्याय की प्रक्रिया का ज्ञान किसी भी शास्त्र में नहीं मिलेगा, क्यूंकि इसे वो योगी ही जानता है, जो परकाया प्रवेश प्रक्रिया से लौटाया जाता है I

 

सावित्री प्रदक्षिणा, हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा …

जिस मार्ग से परकाया प्रवेशी किसी स्थूल शरीर में लाया जाता है, और उस धारण किए हुए शरीरी रूप में अपने निर्धारित कार्य करके, जिस मार्ग से वो उस लोक में पुनः लौटाया जाता है, जिससे वो पूर्व के किसी काल में उस शरीर में आया था…, यह प्रदक्षिणा मार्ग उस पथ के अनुसार है I

 

अब ध्यान देना …

  • क्यूंकि यहाँ पर जिस परकाया प्रवेशी की बात हो रही है, वो हिरण्य शरीर धारी योगी है, और जो उकार या कार्य ब्रह्म या सृष्टिकर्ता भगवान् के लोक से आया है, इसलिए इस अध्याय में उस परकाया प्रवेशी के आने और लौटने के मार्ग की योगावस्था को “कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा” कहा गया है I
  • पर क्यूँकि कार्य ब्रह्म, हिरण्यगर्भ ब्रह्म की सृष्टिकर्ता स्वरूप में अभिव्यक्ति हैं, इसलिए इस अध्याय में उस परकाया प्रवेशी के आने और लौटने के मार्ग की योगावस्था को “हिरण्यगर्भ ब्रह्म प्रदक्षिणा” भी कहा गया है I
  • और क्यूँकि कार्य ब्रह्म की अर्धांगनी (शक्ति) माँ सावित्री हैं, जो उस योगी को अपने गर्भ में धारण करके, हिरण्यगर्भ लोक से लेके आती हैं, और वो योगी अपने कार्य संपन्न करके पुनः माँ सावित्री के भीतर से ही लौटता है, इसलिए इस प्रदक्षिणा को “सावित्री प्रदक्षिणा” भी कहा गया है I
  • क्यूंकि माँ सावित्री के शब्दात्मक स्वरूप को ही अकार कहा जाता है, इसलिए इस अध्याय की प्रदक्षिणा को “अकार प्रदक्षिणा” भी कहा गया है I
  • और क्यूँकि कार्य ब्रह्म का शब्दात्मक स्वरूप ही उकार कहलाता है, इसलिए इस अध्याय की प्रदक्षिणा को “उकार प्रदक्षिणा” भी कहा गया है I
  • और क्यूँकि पञ्च विद्या सरस्वती, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म, आर्य शब्द को ही दर्शाती हैं, इसलिए इस प्रदक्षिणा को आर्य प्रदक्षिणा भी कहा गया है I

 

परिक्रमा या प्रदक्षिणा का मार्ग

शरीर के बायीं ओर का भाग वाम कहलाता है और दायीं ओर का दक्षिण I

पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ओर निवास करने वालों के लिए, परिक्रमा या प्रदक्षिणा का मार्ग दक्षिण हस्त का होता है I और पृथ्वी के दक्षिण ध्रुव की ओर निवास करने वालों के लिए, परिक्रमा या प्रदक्षिणा का मार्ग वाम हस्त का होता है I

और एक बात, कि यदि कभी भविष्य में यह ध्रुव बदलेंगे, अर्थात उत्तरी ध्रुव, दक्षिण की ओर हो जाएगा और दक्षिण ध्रुव, उत्तर की ओर हो जाएगा, तब इसका मार्ग भी ध्रुवों के अनुसार बदल जाएगा I लेकिन यहाँ पर जो मार्ग बताया जा रहा है, वो आज के ध्रुवों की स्तिथि के अनुसार है I

प्रदक्षिणा या परिक्रमा के समय, साधक किसी अर्चाविग्रह, लिंग, वेद दुर्ग (वेद मंदिर), माता पिता, गुरु, भूधर अदि के चारों ओर घूमता है I और ऐसी प्रक्रिया या मार्ग ही प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहलाती है I

लेकिन क्यूंकि आज यह प्रदक्षिणा या परिक्रमा की प्रक्रिया ही विकृत हो गई है, इसलिए इस अध्याय को इस ग्रन्थ में लाना पड़ गया I

 

प्रदक्षिणा या परिक्रमा और उत्कर्ष मार्ग पर गति का नाता

यदि साधक का प्रदक्षिणा पथ (परिक्रमा प्रक्रिया) ही सही न रहे, तो साधक का उत्कर्ष मार्ग विकृत हुए बिना नहीं रह पाता है I और यदि किसी साधक की प्रदक्षिणा सही हो, तो उस साधक की उत्कर्ष मार्ग पर गति भी विकृत नहीं होगी I

वैसे तो यदि केवल प्रदक्षिणा ही सही ढंग से की जाए, तो उतना ही बहुत है उत्कर्ष मार्ग पर गति को सुरक्षित रखने के लिए I

जो प्रदक्षिणा पथ यहाँ बताया जा रहा है, यदि साधक उसको ही पूर्णरूपेण करता जाए, तो इसके सिवा साधक को कुछ और करने की आवश्यकता भी नहीं होगी I ऐसा कहने का कारण है, कि यही प्रदक्षिणा पथ साधक को उस उत्कर्ष मार्ग पर गति करवा देगा, जिसकी अंत स्थिति में गंतव्य, अर्थात कैवल्य मोक्ष ही होता है I

 

प्रदक्षिणा के प्रकार

यह प्रदक्षिणा कई प्रकार से करी जा सकती है, जैसे …

  • वास्तविक … यह स्थूल शरीर के माध्यम से होती है, जिसमे साधक चल कर इसको पूर्ण करता है I
  • सांकेतिक … इसको साधक अपने मन में भी पूर्ण कर सकता हैं I
  • योगिक … यह योगमार्ग से संपन्न होती है I ऐसी योगमार्ग प्रदक्षिणा में, साधक अपने सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर या किसी देवलोक के शरीर (सिद्ध शरीर) का आलम्बन भी ले सकता है I

यदि साधकगण पहली दो श्रेणियों की प्रदक्षिणा करेंगे, तो बारम्बार करना पड़ेगा I

लेकिन एक जन्म में, योगमार्ग की प्रदक्षिणा को एक बार ही करना होता है, जिसमें साधक अपने सिद्धादि शरीर का आलम्बन लेके, इसको उस साधक की योगावस्था में ही संपन्न करता है I

 

श्रेष्ट प्रदक्षिणा, श्रेष्ट परिक्रमा, आर्य प्रदक्षिणा, आर्य परिक्रमा …

ब्रह्म की रचना में, रचना के द्वारा करी गई प्रदक्षिणा में,ब्रह्म प्रदक्षिणा ही श्रेष्ठ होती है I

क्यूंकि रचैता की रचना की भीतर, उस रचैता की प्रदक्षिणा या परिक्रमा ही सर्वश्रेष्ठ होती है, इसलिए, यहाँ बताई जा रही परिक्रमा ही सर्वश्रेष्ट परिक्रमा है I ऐसी प्रदक्षिणा सनातन वैदिक आर्य सिद्धांत के अंतर्गत ही होती है I

श्रेष्ट परिक्रमा करने वालों को ही आर्य कहा जाता है I

और क्यूंकि आज कोई इस श्रेष्ट परिक्रमा को करता ही नहीं है, इसलिए आर्य मार्ग और आर्य सिद्धांत ही लुप्त से हो गए हैं I

जबतक मानव इस श्रेष्ठ प्रदक्षिणा को करते थे, तबतक आर्य सिद्धांत सुरक्षित रहता है I लेकिन जब मानव जाती इसका पालन करना बंद कर देती है, तब से आर्य मार्ग भी लुप्त होने लगता है I

इसलिए, इस अध्याय को इस ग्रन्थ में जोड़ने का एक कारण यह भी है, कि इस धरा पर सनातन वैदिक आर्य सिद्धांत, पुनः ख्यापित हो, और जिसका एक उत्कृष्ट मार्ग यहाँ बताई जा रही प्रदक्षिणा का भी है I

 

परकाया प्रवेशी की आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया …

परकाया प्रवेशी की आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया
परकाया प्रवेशी की आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया

 

यहाँ कुछ स्पष्ट और कुछ सांकेतिक भी बताया जाएगा I इस चित्र में देवी सावित्री आपको देख रही हैं, अर्थात उनके मुख आपकी ओर है I

इसपर ध्यान देना, क्यूंकि यहाँ मुक्तिमार्ग का एक बिंदु बताया जाएगा I

ये ऐसा मुक्तिपथ है, कि इसमें इस बात का अंतर ही नहीं पड़ता, की कोई पुत्र है, या पुत्री, भक्त है या शिष्य I और इसमें ये भी अंतर नहीं पड़ता, कि कोई माता हो या पिता, गुरु हो या इष्ट या साक्षात् भगवान् I

इसलिए इस प्रदक्षिणा को साधक, पुत्र, पुत्री, शिष्य, अनुज, कोई भी किसी वेदमार्गी परंपरा के अंतर्गत, कर सकता है I वैदिक मार्गों के अंतर्गत जो भी है, उसमे इस प्रदक्षिणा किया जा सकता है I

लेकिन यहाँ बताया जा रहा प्रदक्षिणा मार्ग, परकाया प्रवेशी के आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया की योगावस्था के अनुसार है I तो अब इसको थोडा विस्तार से बताता हूँ …

 

परकाया प्रवेशी की आगमन प्रक्रिया (या जन्म प्रक्रिया) …

परकाया प्रवेशी की आगमन प्रक्रिया, परकाया प्रवेश की जन्म प्रक्रिया
परकाया प्रवेशी की आगमन प्रक्रिया, परकाया प्रवेशी की जन्म प्रक्रिया, परकाया प्रवेश की जन्म प्रक्रिया, परकाया प्रवेश की आगमन प्रक्रिया

 

जब ये अकार की देवी (अर्थात माँ सावित्री) उस योगी को जो परकाया प्रवेश के मार्ग से जन्म लेने वाला होता है, अपने गर्भ में धारण करती हैं, तो ये धरण प्रक्रिया भी इन देवी के दैविक शरीर के उस स्थान से होती है, जहाँ मस्तिष्क (अर्थात, ब्रह्मरन्ध्र) होता है I

इस ब्रह्मरंध्र से धारण करने की प्रक्रिया के पश्चात, यह अकार की देवी उस योगी को अपने दिव्य शरीर में धारण करती हैं, और उस योगी को अपने दिव्य शरीर के भीतर से और दायीं ओर से लेके जाती हुई (जैसा एक पूर्व के चित्र में दिखाया गया है), अपने गर्भ में स्थापित करती हैं I

और जब यह अकार की देवी उस योगी को हिरण्यगर्भ लोक से लाकर, किसी स्थूल शरीर में प्रवेश करवाती हैं, तब वो योगी भी इन देवी के दायीं ओर से ही बाहर निकलता है (जैसा ऊपर के चित्र में दिखाया गया है) I इन देवी के दिव्य शरीर से बाहर निकलने के पश्चात, वो योगी उस स्थूल शरीर में परकाया प्रवेश के मार्ग से प्रवेश करता है, जिसको इन देवी ने ही उसके लिए चुना था I

पूर्व के परकाया प्रवेश नामक अध्याय में बताया था, कि जब परकाया प्रवेश हुआ था, तब वो परकाया प्रवेशी एक सुनहरे शरीरी रूप में, इन अकार की देवी (अर्थात माँ सावित्री) के दाहिने ओर से प्रकट हुआ था I और यही दशा इस भाग के चित्र में भी दिखाई गई है (वैसे यही चित्र, पूर्व के परकाया प्रवेश के अध्याय में भी दिखलाया गया था) I

अब इसी बिंदु पर आगे बढ़ता हूँ …

 

  • परकाया प्रवेशी की प्रस्थान प्रक्रिया

लेकिन जब वो परकाया प्रवेशी अपना कार्य संपन्न करके, उसके अपने लोक में पुनः लौट रहा होता है (जहाँ से ये देवी, सावित्री विद्या सरस्वती उसे इस मृत्युलोक में लेके आयी थी), तब वो योगी इन देवी के बायीं ओर से लौटाया जाता है (जैसा की इस अध्याय के एक पूर्व के चित्र में भी दिखाया गया है) I

और इन अकार की देवी के बायीं ओर से जाकर, वो योगी इन देवी के स्वामी (अर्थात, पति) हिरण्यगर्भ या उकार से होता हुआ, मकार (अर्थात त्रिदेव का मणि स्वरूप या लिंग स्वरूप) से होकर, शुद्ध चेतन तत्त्व (अर्थात ब्रह्मतत्त्व) और ओमकार को जाता है, जो इन अकार की देवी के सर से ऊपर की दशाएं हैंI

लेकिन इन दशाओं के बारे में बाद के कुछ अध्यायों में बात होगी I

 

परकाया प्रवेशी के आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया की योगावस्था, … सावित्री परिक्रमा, हिरण्यगर्भ परिक्रमा, कार्य ब्रह्म परिक्रमा,  …

सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा
सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा, सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा

 

अब इस दिखलाए गए चित्र पर ध्यान देना, क्यूंकि इसका आलम्बन लेके ही अब बताया जाएगा I इस चित्र की जो दशा है, उसमें देवी माँ आपको देख रही हैं I

यहाँ पर बात उस योगी की हो रही है, जो हिरण्यगर्भ लोक से परकाया प्रवेश मार्ग से लौटा है I इसलिए वो योगी यहां बताए गए ज्ञान का सूत्रधार और धारक भी है I

क्यूंकि वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति के लोक से लौटा है, इसलिए हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही उस योगी के वास्तविक पिता हैं, और माँ सावित्री (अर्थात अकार की देवी जो कार्य ब्रह्म की अर्धांगनी शक्ति हैं) उस योगी की वास्तविक माता हैं I

जिस परकाया प्रवेशी की बात यहाँ पर हो रही है, वो इस ब्रह्मकल्प में सौ से भी अधिक बार परकाया प्रवेश के मार्ग से लौटने के बाद भी उसने (या किसी और परकाया प्रवेशी ने) आजतक इस ज्ञान के मार्ग को किसी को नहीं बताया, इसलिए इस अध्याय का ज्ञान किसी भी वेदादि ग्रंथों में नहीं मिलेगा I

और उसके बताने के बाद भी, जो साधकगण इसके वास्तविक पात्र नहीं हैं, वो इसको न तो समझ पाएंगे, और न ही इसपर गमन ही कर पाएंगे I

और एक बात … इस समस्त जीव जगत के किसी भी काल खंड के समय, मेरे इस ग्रन्थ के किसी भी चित्र या ज्ञान का प्रयोग केवल उस उत्कर्ष मार्ग पर हो पाएगा, जो ब्रह्म भावनात्मक होगा, नाकि किसी तंत्र मंत्र, यंत्र या किसी और देश का होगा I और इस ग्रन्थ में बस कर, यदि कोई भी जीवादी सत्ता इस बिंदु के विपरीत जाएगी, तो वो अपनी दुर्गति को ही पाएगी I यह बात त्रिकालों में पूर्णतः लागू होगी और उस समय भी लागू होगी, जब त्रिकाल की समस्त गति अदि दशाएँ स्थम्बित होती हैं (या शून्यअदि में बसी होती हैं) I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इस ग्रन्थ में, कुछ प्रक्रियाओं के योगमार्गी दृष्टिकोण से (जिनमें इस अध्याय की प्रक्रिया भी आती है), कुछ सांकेतिक भी बताया गया है, जिसके योगमार्ग पर वोही साधक जा पाएगा, जो इसका वास्तविक पात्र होगा I

लेकिन पूर्व में बताए गए अन्य दोनों, (अर्थात वास्तविक और सांकेतिक) मार्गों पर, कोई भी वेदमार्ग में बसा हुआ साधक जा सकता है, क्यूंकि यहाँ पर पात्र निषेद केवल इस प्रदक्षिणा के योगमार्गी स्वरूप का है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

तो अब इस हिरण्यगर्भ सावित्री परिक्रमा (या कार्यब्रह्म सावित्री परिक्रमा) के मार्ग को बतलाता हूँ I

यहाँ दिखाया गया चित्र जो ॐ मार्ग से सम्बंधित है, परकाया प्रवेश प्रक्रिया से आये हुए योगी के ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष की उस दशा का है, और जिसमें केवल कार्य ब्रह्म और माँ सावित्री सरस्वती को दिखलाया गया है I

लेकिन ओम् मार्ग में इनके ऊपर (या आगे) की भी अवस्थाएँ होती है, जो मकार, शुद्ध चेतन तत्त्व (या ब्रह्मतत्त्व) और ॐ कहलाती हैं, जिनके बारे में कुछ बाद के अध्यायों में बताया जाएगा I

 

और आगे बढ़ता हूँ …

यदि ऐसे आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया की योगावस्था को (अर्थात इन दोनों को जोड़ कर) देखा जाएगा, जो उस परकाया प्रवेशी के भीतर ही होती है, तो जो पाया जाएगा, वो ऐसा होगा …

वो परकाया प्रवेशी इन अकार की देवी की प्रदक्षिणा अपने उसी जन्म में पूर्ण करता है I

और क्यूंकि यही प्रदक्षिणा इन अकार की देवी के पति (अर्थात इन देवी के स्वामी या पति) हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म अभिव्यक्ति की प्रदक्षिणा को भी लेके जाती है, इसलिए, इसी प्रदक्षिणा में हिरण्यगर्भ ब्रह्म प्रदक्षिणा भी पूर्ण हो जाती है I

जैसे ये देवी उस परकाया प्रवेशी की वास्तविक माता है, वैसे ही हर एक जीव की माता होती हैंI इसका कारण है कि…,

जीवों में तारतम्य होने पर भी, उस सार्वभौम मातृ तत्त्व में तारतम्य नहीं होता I

जीव दशाओं में तारतम्य होने पर भी, सार्वभौम मातृ तत्त्व में तारतम्य नहीं होता I

इसलिए चाहे वो जीव किसी भी लोक में क्यों न निवास करता हो, जैसी एक जीव की माँ है…, वैसी ही सभी जीवों की होती है I

 

और जैसे हिरण्यगर्भ ही उस परकाया प्रवेशी के वास्तविक पिता होते हैं, वैसे ही हर एक जीव के पिता होते हैं I इसका कारण है कि…,

जीवों में तारतम्य होने पर भी, उस सर्वव्यापी पिता तत्त्व में तारतम्य नहीं होता I

जीव दशाओं में तारतम्य होने पर भी, सर्वव्यापी पिता तत्त्व में तारतम्य नहीं होता I

इसलिए चाहे वो जीव किसी भी लोक में क्यों न निवास करता हो, जैसे एक जीव के पिता होते हैं…, वैसे ही सभी जीवों के पिता होते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन इस हिरण्यगर्भ सावित्री प्रदक्षिणा (या सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा) के मार्ग को बतलाने को, इसके दो भागों को जानना पड़ेगा …

इसके प्रथम भाग का नाता, परकाया प्रवेशी के शरीर धारण करने के समय का है, अर्थात परकाया प्रवेशी के आगमन मार्ग का है I

और इसके दूसरे भाग का नाता उसी परकाया प्रवेशी के पुनः लौटने के मार्ग का है, अर्थात प्रस्थान मार्ग का है I

तो अब इन दोनों भागों को एक-एक करके बताता हूँ …

 

  • परकाया प्रवेश से लौटते हुए योगी की आगमन प्रक्रियाजब वो योगी परकाया प्रवेश किसी नीचे के लोक में आता रहा होता है, तब वो इस चित्र की बायीं ओर से नीचे आता है I

इसका अर्थ हुआ, कि वो परकाया प्रवेश से आता हुआ योगी, इस चित्र में दिखलाई गई माँ सावित्री के दाहिने ओर से, किसी नीचे के लोक में आता है I

ऐसे समय पर उस योगी के पैर जुड़े हुए होते हैं और उसके हाथ उसके ही हृदय क्षेत्र में स्थित होके, नमस्ते की मुद्रा में होते हैं I और यह दशा तबतक चलती है, जबतक वो योगी, माँ सावित्री सरस्वती के ब्रह्मरंध्र से अंदर जाके, उनके गर्भ में स्थापित नहीं हो जाता है I

और जब वो योगी सरस्वती विद्या के गर्भ में स्थापित हो जाता है, तब ही माँ सावित्री विद्या उसको किसी नीचे के लोक में ले के आती हैं, और उस योगी को  पूर्व से ही निर्मित एक देह प्रदान करती है, जिसमें वो योगी परकाया प्रवेश से स्थापित होके, उस देह को धारण करता है और देहधारी कहलाता है I

लेकिन जब वो योगी माँ सावित्री के गर्भ से बाहर निकल रहा होता है, तब वो माँ के दाहिने ओर से प्रकट होता है I यही दशा पूर्व के परकाया प्रवेश के अध्याय के चित्र में (और इस अध्याय के एक चित्र में) भी दिखाई गई थी I

और ऐसी दशा में, उस योगी के हाथ उसके पैरों की ओर होते है, हाथों की हथेलियां टांगों को छु रही होती हैं, और दोनों पाँव की एड़ियां जुडी हुई होती हैं I

इसी कारण, जब वो परकाया प्रवेश मार्ग से लौटता हुआ योगी, अपने उच्च लोक से नीचे की ओर, मृत्युलोक में आ रहा होता है, तो वो हिरण्यगर्भ और माँ सावित्री सरस्वती के दाहिने ओर होता है I

और यही दशा इस भाग के चित्र में भी दिखलाई गई है, जिसमे उस परकाया प्रवेश से लौटते हुए योगी का आगमन मार्ग, माँ सावित्री सरस्वती (या अकार की देवी) के दाहिने ओर ही दिखाया गया है I

और ऐसे समय पर उस योगी के हाथ की हथेलियां शरीर की ओर होती है, और उसकी टांगों को शरीर के दोनों ओर से छु रही होती है, और सावित्री माँ के दिव्य शरीर से बाहर निकलते हुए योगी की टांगें भी जुडु हुई होती हैं I

क्यूंकि यह दशा, माँ सरस्वती के दाहिने ओर हो रही होती है, इसलिए सावित्री हिरण्यगर्भ परिक्रमा के समय पर, जब योगी अपने इष्ट के दक्षिण (अर्थात दाहिने) ओर होता है, तब भी उसकी दशा ऐसी ही होनी चाहिए I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

माँ सावित्री के गर्भ से बाहर आकर, वो योगी उस स्थूल शरीर को धारण करता है, जिसको उसकी वास्तविक माता, सावित्री सरस्वती विद्या ने, उसके लिए ही चुना होता है I

और उस शरीर में बैठ कर, वो योगी उन कार्यों को करता है, जिनके लिए उसे उस नीचे के लोक में भेजा गया था I

यहाँ भेजा गया था, ऐसा कहा है…, नाकि वो लौटा था या आया था, ऐसा कहा है I इसका कारण है, कि जो योगी जन्म मरण से परे बैठ चुका हो, वो किसी नीचे के लोक में, जैसा यह मृत्युलोक है, उसमें आ ही नहीं सकता है I

ऐसा योगी केवल प्रधान ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं की प्रेरणा से ही किसी नीचे के (या अधम) लोक में लाया जा सकता है I और ऐसा योगी के मृत्यु अदि लोकों में लौटने के कई कारणों में से, महाकाल की प्रेरणा और उनकी दिव्यता या शक्ति, जिनको महाकाली कहते हैं, उनका साथ भी होना ही पड़ेगा I

अब आगे बढ़ता हूँ …

 

  • परकाया प्रवेशी के पुनः वापिस जाने की प्रक्रिया और उसका प्रस्थान मार्ग … सावित्री कार्य ब्रह्म परिक्रमा का दूसरा चरण …

अब उसी पूर्व के चित्र को देखो, जिसमे “प्रस्थान मार्ग” का शब्द लिखा हुआ है I

जब परकाया प्रवेश से आया हुआ योगी, अपने निर्धारित कार्य संपन्न करके उसके अपने वास्तविक लोक में पुनः लौटता है, तब जो मार्ग होता है, अब उसको बताता हूँ I

यह वापिस लौटने का मार्ग, इस हिरण्यगर्भ सावित्री परिक्रमा (अर्थात सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा) का दूसरा और अंतिम चरण है …

इस मार्ग पर वो योगी कभी भी जा सकता है, क्यूंकि जैसे ही उसके निर्धारित कार्य संपन्न होने को होंगे, तब भी वो योगी इस दूसरे चरण में प्रवेश कर सकता है I

यहाँ बतलाए गए दुसरे चरण से होकर ही, वो योगी उस शरीर से लौट जाता है, जिसमें कुछ समय पूर्व, वो परकाया प्रवेश के मार्ग से आया था और शरीर धारी कहलाया था I

लेकिन, यह दूसरा चरण उस योगी के देहावसान के समय हो सकता है, और इसके अतिरिक्त उस योगी के जीवित होते हुए भी पूर्ण हो सकता है I

यदि यह प्रस्थान मार्ग (या दूसरा चरण) उसके देहावसान के समय पूर्ण होगा, तो वो योगी विदेहमुक्त कहलाएगा (अर्थात विदेहमुक्ति को पाएगा) I और यदि यह उसके जीवित होते हुए ही पूर्ण होगा, तो वो योगी जीवन्मुक्त कहलाएगा (अर्थात वो जीवनमुक्ति को पाएगा, जिसका अर्थ है, कि वो योगी शरीरी रूप में जीवित दिखता हुआ भी, अपनी वास्तविकता में मुक्तात्मा ही होगा) I

इस प्रस्थान मार्ग में (अर्थात दूसरे चरण में), वो योगी अपने उसी लोक में लौटता है, जिससे वो पूर्व में आया था (या लौटाया गया था) और परकाया प्रवेश के मार्ग से किसी नीचे के लोक का शरीर धारण करके, शरीरी हुआ था I

ऐसे समय पर, यदि वो योगी लौटेगा तो उसके पास दो विकल्प होंगे I प्रथम विकल्प है जब वो अपने कार्य संपन्न करके, देहावसान के समय लौटेगा I और द्वितीय विकल्प में, वो योगमार्ग से ही इस दूसरे चरण को संपन्न करेगा I

मेरा यह दूसरा चरण, योगमार्ग से तब पूर्ण हुआ था, जब 2011 ईस्वी में, दिल्ली के जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे का आंदोलन बस होने ही वाला था I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जब योगी अपने वास्तविक लोक में लौटता है, तब उसकी जीवात्मा की जो दशा होती है, वो शाश्वत प्रणाम की होती है I

इसी को पूर्व के अकार और उकार के अध्यायों में चित्रों के माध्यम से दिखाया गया था…, और वही चित्र नीचे भी डाला जा रहा है I

जब परकाया प्रवेशी अपने कार्य संपन्न करता है, तब उसकी जीवात्मा उसके अपने वास्तविक लोक (अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्म) में लौटने लगती है, क्यूंकि जिस कार्य के लिए वो जीवात्मा आयी थी, वो तो अब पूर्ण हो गया है I

सावित्री कार्य ब्रह्म परिक्रमा का दूसरा चरण
परकाया प्रवेशी के पुनः वापिस जाने की प्रक्रिया और उसका प्रस्थान मार्ग, सावित्री कार्य ब्रह्म परिक्रमा का दूसरा चरण

 

और इस लौटने की दशा में, जो उस जीवात्मा की स्तिथि होती है, वो शाश्वत प्रणाम की होती है, जैसा इस चित्र में भी दिखाया गया है I

इस लौटने के मार्ग में, वो जीवात्मा माँ सावित्री (अर्थात अकार की देवी) के शरीर के बायीं ओर से जाती है, और इन देवी के ऊपर की ओर बसे हुए हिरण्यगर्भ ब्रह्म में स्थापित हो जाती है I इस मार्ग में, यह दोनों (अर्थात सावित्री विद्या सरस्वती और हिरण्यगर्भ ब्रह्म) उस योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर ही होते हैं, जैसा कि पूर्व के अध्यायों में भी बताया गया था I

बायीं ओर को ही वाम दिशा कहा जाता है, इसलिए उस परकाया प्रवेशी की जीवात्मा के अपने वास्तविक लोक में लौटने की स्थिति में, वो जीवात्मा वाममार्गी ही होती है I पूर्व के चित्र में, इस लौटने के मार्ग को ही “प्रस्थान मार्ग” से बताया गया था I

यह प्रस्थान मार्ग देवी सावित्री (अर्थात अकार की देवी) और कार्य ब्रह्म (अर्थात उकार या हिरण्यगर्भ) के बायीं ओर से होकर जाता है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इन दोनों चरणों का संगठित स्वरूप ही सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा है और इस प्रदक्षिणा में, हिरण्यगर्भ ब्रह्म उनके अपने रजोगुणी, कार्य ब्रह्म स्वरूप (अर्थात सृष्टिकर्ता स्वरूप) में ही होते हैं I

तो अब इन दोनों चरणों को संगठित करके बताता हूँ …

  • जब कोई योगी, जो जन्म मरण से परे है, परकाया प्रवेश मार्ग से किसी स्थूल शरीर में आता है, तो वो योगी हिरण्यगर्भ ब्रह्म की कार्य ब्रह्म रूपी अभिव्यक्ति और माँ सावित्री के भीतर से, लेकिन उनकी दाईं ओर से, अपना ऊर्ध्व लोक छोड़ कर किसी नीचे के (या अधम लोक) में आता है I

ऐसा समय पर वो योगी, हिरण्यगर्भ ब्रह्म और माँ सावित्री के भीतर ही निवास करता है I

और ऐसी दशा में वो योगी सावित्रि हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा का प्रथम चरण पूर्ण करता है, और वो भी दक्षिण मार्गी होके I दायीं दिशा को ही दक्षिण दिशा कहते हैं I

और जब वो योगी अपने ऊपर के लोक से नीचे के लोक में आ रहा होता है, तो वो खड़ी हुई अवस्था में होता है और उसके पाँव जुड़े हुए होते हैं, और उसके हाथ हृदय क्षेत्र में, नमस्ते की स्तिथि में जुड़े हुए होते हैं I

और इसी दशा में वो योगी, कार्य ब्रह्म (या उकार) के भीतर से होकर, माँ सावित्री के ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करता है, और उन देवी सावित्री के दिव्य शरीर के भीतर से ही जाता हुआ, उनके गर्भ में स्थापित होता है I

इसके पश्चात, जब वो योगी परकाया प्रवेश के मार्ग से शरीरी होने वाला होता है, तब वो योगी माँ सावित्री के गर्भ से बाहर निकलता है, और वो भी उनके (अर्थात माँ सावित्री के दिव्य शरीर की) दायीं ओर से I

ऐसे माँ सावित्री की दायीं ओर या दक्षिण दिशा से बाहर निकलने के पश्चात ही वो योगी, उस शरीर को परकाया प्रवेश प्रक्रिया से धारण करता है, जिसको उसकी माता सावित्री ने ही उसके लिए चुना था I

शरीर धारण करने के बाद ही वो पूर्व का अशरीरी योगी, शरीरी सा दिखाई देता है I और इसीलिए, उस स्थूल जगत के दृष्टिकोण से, जहाँ वो परकाया प्रवेश के मार्ग से लाया गया है, वो योगी शरीरी भी कहलाता है I

लेकिन ऐसे स्थूल शरीर में बसे होने के समय पर, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से वो योगी अशरीरी ही होता है I

स्थूल जगत के दृष्टिकोण से, स्थूल शरीर में बसा हुआ, वो योगी स्थूल शरीर के अनुसार ही चलता है I लेकिन उसकी अपनी वास्तविकता में, उस स्थूल शरीर के भीतर बैठा हुआ, वो शरीरी सा दिखाई देता हुआ अशरीरी योगी…, ऐसा तो बिलकुल नहीं होता I

और क्यूँकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही वो रचैता हैं, जिनकी रचना वो योगी और प्रत्येक जीव भी है, इसलिए प्रत्येक जीव के उत्कर्ष रूपी मुक्तिमार्ग का प्रारम्भ भी दक्षिण मार्ग में ही होता है I यह एक सार्वभौम सिद्धांत भी है I

 

अब ध्यान देना …

और क्यूंकि इस प्रदक्षिणा का प्रारम्भ, सावित्री विद्या के ब्रह्मरंध्र के क्षेत्र से होता है, और जो ब्रह्म के मध्य में बसे हुए सर्वव्यापक, स्वच्छ स्फटिक के समान, निरंग ईशान मुख को दर्शाता है, जो आकाश की ओर (अर्थात ऊपर की ओर) देखता है और जिसके, देवता समस्त गणों के स्वामी, भगवान् गणपति ही होते है जो अनुग्रह कृत्य (या कृपा कृत्य) के धारक भी होता है, इसलिए इस प्रदक्षिणा के प्रारम्भ से ही योगी पर अनुग्रह कृत्य बना रहता है I

इसका अर्थ हुआ, कि अपने प्रारम्भ से ही, यह सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा…, कृपा मार्ग है…, न की कोई कर्म मार्ग I

समस्त कामों के परे, वो ब्रह्म कृपा होती है, जो अनुग्रह कृत्य कहलाती है और जिसके धारक गणों के सम्राट, वोही गणेश्वर होते है, जो जयेष्ट शिवपुत्र और शक्तिपुत्र, भगवान् गणेश कहलाते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

उन भगवान गणेश का जन्म आज से कुछ समय पूर्व, पाताल पुरी में हो चुका है, जो लौकिक स्थान के अनुसार आज का अमेरिका महाद्वीप कहलाता है I

और वोही पाताल पुरी, योगी के शरीर में भी होती है, और जिसका स्थान मूलाधार चक्र के समीप होता है, और जिसकी विद्या को भारती सरस्वती कहते हैं, जो ब्रह्माण्डीय और ब्रह्माण्ड से परे की भी एकमात्र ज्ञानमय चेतनमय और क्रियामय, कृपा ऊर्जा ही होती हैं, और जिनके पतिदेव को ही भारत नामक ब्रह्मा कहा जाता है, और वैदिक वाङ्मय में इन्ही भारत नामक ब्रह्मा को ही ब्रह्माण्ड या वैदिक भारत या वैदिक राष्ट्र कहा जाता है I

इस युग स्थंबन के पश्चात, जब आज के कालखंड का (अर्थात कलियुग का) सबकुछ नष्ट हो जाएगा, तो ही वो कृपा भी पाताल पुरी से आएगी, जो उस महेस्वर के योगी (अर्थात हिरण्यगर्भ के योगी या योगेश्वर के योगी) से आएगी, जो गुरुयुग स्थापक होकर माँ सावित्री के गर्भ से इस मृत्युलोक में लौटाया गया है I

और ऐसे समय पर ही गणपति देव प्रकट होंगे, अपने सार्वभौमिक सर्वव्यापक अनुग्रह स्वरूप में I लेकिन इससे पूर्व तो बहुत कुछ का विनाश भी होना है, और जहाँ वो विनाश मानव जनित, प्राकृतिक और दैविक कारणों से भी होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

क्यूंकि यह प्रदक्षिणा मार्ग ही कृपा मार्ग है, इसलिए इस अध्याय में ही कुछ बाद में जो साधकगणों के उत्कर्ष के लिए, प्रदक्षिणा मार्ग बताया गया है, उसको भी उस प्रदक्षिणा पथगामी को कृपा मार्ग ही मानना चाहिए … न कि कर्म मार्ग I

वो बतलाया गया प्रदक्षिणा मार्ग, होगा तो कर्मों में, लेकिन वास्तव में कृपा की ओर ही लेके जाएगा, जो ब्रह्म का अनुग्रह कहलाती है और जिसको कैवल्य मोक्ष भी कहा जाता है I

यह प्रदक्षिणा मार्ग और इसकी दशा भी ब्रह्म भावपन अवस्था से होकर ही जाता है, इसलिए जब तक ब्रह्म भाव में साधक नहीं बसेगा, तब तक वो साधक इस प्रदक्षिणा मार्ग के गंतव्य, अर्थात कैवल्य मोक्ष को भी नहीं पाएगा I

जब तक उस बतलाए गए प्रदक्षिणा पथ पर साधक का ऐसा भाव नहीं होगा, तक तक उसपर वो कृपा भी नहीं होगी, जिसको यहाँ बतलाया जा रहा है और जो उस कृपा का ही मार्ग है, जो इस समस्त जीव जगत में कैवल्य मुक्ति, कर्ममुक्ति और कर्मातीत मुक्ति के शब्दों से पुकारि कहलाती है I

लेकिन यह बताया गया ब्रह्म भाव भी तो तब ही आएगा, जब साधक के मन में ही श्रद्धा और समर्पण का योग होगा I इस श्रद्धा और समर्पण की योगावस्था को ही तो भक्ति कहते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इस ब्रह्म भावपन अवस्था को पाने का जो सबसे सरल, सात्विक भावनात्मक उपाय है, वो अब बता रहा हूँ I

साधक को अपने मन मंदिर में, उस आत्मस्वरूप ब्रह्म को साक्षी मान के, उस ब्रह्म को ही ऐसे मन ही मन तबतक बोलते रहना चाहिए जबतक साधक का मन ही उस ब्रह्म में पूर्णस्थित न हो जाए …

तेरा सबकुछ…, तुझी को अर्पण I

मै भी तेरा…, तुझी को अर्पण I

 

यह मैं शब्द जो यहाँ कहा गया है, वो साधक की जीव रूपी अभिव्यक्ति ही है, जिसका अभिव्यक्ति भी वो आत्मस्वरूपा ब्रह्म ही है, जिसके भाव को पाने की बात यहाँ की जा रही है I

और क्यूँकि अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक होती ही नहीं है, इसलिए ऐसा मन ही मन बोलने के समय, साधक का मूल भाव भी वैसा ही होना चाहिए जैसा यहाँ सांकेतिक रूप में ही सही…, लेकिन बताया गया है I

और ऐसा मन ही मन बोलते बोलते, जब वो ही साधक, ब्रह्म भावपन हो जाएगा, तब यहाँ कहे गए मैं शब्द वो साधक, अपने ही आत्मस्वरूप (अर्थात अपने ही ब्रह्म रूप) में पाएगा I

ऐसा कहने का कारण है, कि योगमार्ग में, जब मैं पन (या अहम्) विशुद्ध होता है, तो वो मैं पन , उस सर्वात्मा का स्वरूप ही होता है, जो ब्रह्म कहलाता है I

 

अब इस बिंदु से आगे के बिन्दुओं को बताता हूँ …

  • नीचे के लोक में आकर, वो योगी परकाया प्रवेश प्रक्रिया से किसी शरीर को धारण करता है और अपने कार्य संपन्न करता है I

 

  • कार्यों को संपन्न करने के पश्चात, वो योगी पुनः अपने पूर्व के (या वास्तविक) लोक में लौटता है, जिससे वो पूर्व काल में में किसी शरीर में आया था और ऐसे आने के बाद वो अशरीरी योगी, शरीरी भी कहलाया था I

इस लौटने के योगमार्ग में, माँ सावित्री और कार्य ब्रह्म उस योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही निवास करते हैं, और वो भी अकार और उकार के स्वरूप में I

अर्थात उस योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही यह दोनों निवास करते हैं I

इसलिए लौटने के समय वो योगी इसी ब्रह्मरन्ध्र विज्ञानमय कोष में सूक्ष्म जीवात्मा स्वरूप में प्रवेश भी करता है और इन अकार और उकार की बायीं ओर से होकर जाता है I

इस लौटने के मार्ग में उस योगी की चेतना (जीवात्मा) माँ सावित्री और हिरण्यगर्भ ब्रह्म की बायीं ओर से ऊपर की ओर लौट के जाती है, अर्थात इनके वाम हस्त से (या वाममार्गी होकर) जाती है I

और ऐसी दशा में वो योगी सावित्रि हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा का दूसरा चरण पूर्ण करता है, और वो भी वाम मार्गी होके I

बाएं हस्त को ही वाम हस्त कहते हैं I

और क्यूँकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही वो रचैता हैं, जिनकी रचना वो योगी और प्रत्येक जीव भी हैं, इसलिए प्रत्येक जीव के उत्कर्ष रूपी मुक्तिमार्ग का प्रारम्भ दक्षिण से ही होता है, और उस मुक्तिमार्ग का अंत वाम से ही होता है I

 

और इस भाग के अंत में …

जैसे एक योगी का प्रदक्षिणा रूपी मुक्तिमार्ग होता है, वैसे ही प्रत्येक जीव का मुक्ति मार्ग भी होता है I इसका कारण है, कि …

  • जीवों और उनके उत्कर्ष मार्गों में तारतम्य होने पर भी, अंतिम मुक्तिमार्ग और उसकी प्रदक्षिणा, जिसको यहाँ बताया जा रहा है, उसमें तारतम्य नहीं होता I
  • और इसके साथ साथ, जीवों और उनके उत्कर्ष मार्गों में तारतम्य होने पर भी, उन जीवों की अंतगति, अर्थात मुक्ति में भी तारतम्य नहीं होता I
  • और इसके साथ साथ, जीवों के वर्णादि आश्रमों में तारतम्य होने पर भी, उन जीवों की अंतगति, अर्थात कैवल्य मुक्ति में तारतम्य नहीं होता I
  • और इसके साथ साथ, जीवों में लिंगअदि तारतम्य होने पर भी, उन जीवों की अंतगति, अर्थात कैवल्य मुक्ति में भी तारतम्य नहीं होता I

इसलिए, तू कहीं से भी जा, किधर भी निवास कर, किसी को भी मान, कुछ भी कर, लेकिन तेरी अंतगति उस जैसी ही, जिसको तू स्वयं ही अपना द्वन्दी या नास्तिक ही क्यों न मानता हो I इसका भी वही कारण है, की …

 

जीवजगत में तारतम्य होने पर भी, जीवजगत की मुक्ति में तारतम्य नहीं होता I

जीव मुक्ति ही जगत मुक्ति है, क्यूंकि जगत भी तो जीवों में ही होता है I

और जगत मुक्ति ही जीव मुक्ति है, क्यूंकि जीव भी तो जगत में ही बसे होते हैं I

 

यहाँ बताया गया प्रदक्षिणा मार्ग, जीव के भीतर बसे हुए जगत को भी उस जीव से मुक्त करता है I और इसके साथ साथ, जगत में बसे हुए जीव को भी जगत से मुक्त करता है I

जिस जीव में पूर्व का जगत ही नहीं रहा…, वो ही मुक्तात्मा I

और जिस सर्वव्यापक जगत में, पूर्व का जीव ही नहीं रहा, वो ही सर्वात्मा I

 

इस साक्षात्कार में, जो यहाँ बताई जा रही प्रदक्षिणा पथ से ही होता है, उसमे …

जीव…, जगत के कारण, दैविक, सूक्ष्म और स्थूल स्वरूपों में बसा होता है I

और जगत…, अपने ही सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक स्वरूप में, जीव में बसा होता है I

 

इसलिए, यह प्रदक्षिणा मार्ग, उस महाब्रह्माण्ड योग की ओर भी लेके जाएगा, जो समस्त जीव जगत में, योगशिखर कहलाता है I

और जिसका सिद्ध योगी, मन ही मन ऐसा कहता है …

यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे I

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे I

 

इसलिए, इस बताई जा रही प्रदक्षिणा को कोई भी वास्तविक साधक कर सकता है I और ऐसी प्रदक्षिणा से पूर्व, इस प्रदक्षिणा के समय और इस प्रदक्षिणा के पश्चात भी, जबतक उन प्रदक्षिणा पथगामी साधकों के भाव सामान होंगे, और वैसे ही होंगे जैसे यहाँ बताए गए हैं, तबतक उन साधकों की अंतगति और मुक्ति में भी समानता ही रहेगी I

इसलिए, जब किसी भी जीव के लिए इस बताई गई सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा की अंतगति में इस समस्त जीव जगत से ही प्रस्थान करने का समय आएगा, तब वो जीव भी वैसे ही जाएगा, जैसा इस सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा पथ में यहाँ बताया गया है I

और क्यूँकि हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही अपने कार्य ब्रह्म स्वरूप में इस समस्त जीव जगत के वास्तविक रचैता हैं, इसलिए ब्रह्म की रचना में जो कुछ भी है, चाहे वो देवत्व का कोई बिंदु हो, या जीवत्व का या जगतत्व का ही क्यों न हो, उन सबका प्रदक्षिणा मार्ग भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा यहाँ बताया गया है I

यदि कोई साधक इस प्रदक्षिणा को, जैसा इस अध्याय में बताया गया है, करता ही जाएगा, अंततः वो साधक अपने उत्कर्ष मार्ग की उस अंतगति पर चला जाएगा, जो कैवल्य मोक्ष कहलाती है और जो निर्गुण निराकार ब्रह्म के नाम से भी पुकारी जाती है और जिसको इस महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, एक प्रतिशत साधक भी नहीं पाए हैं I

मैंने यहाँ “एक प्रतिशत साधक” कहा है…, न की “एक प्रतिशत जीव” I

 

मुक्तिमार्ग में सावित्री हिरण्यगर्भ प्रदक्षिणा के आधार पर अन्य सब प्रदक्षिणा

हिरण्यगर्भ ब्रह्म अपने कार्य ब्रह्म स्वरूप में, समस्त जीव जगत के रचैता हैं I

और माँ सावित्री विद्या, जो कार्य ब्रह्म की अर्धांगिनी हैं, समस्त जीव जगत की माता हैं I

इसलिए, जो अब बता रहा हूँ, उसपर ध्यान देना क्यूंकि यह इस प्रदक्षिणा सिद्धांत के मूलबिंदु है …

  • माता पिता की प्रदक्षिणा … जैसी जगत माता, माँ सावित्री और जगत पिता कार्य ब्रह्म की प्रदक्षिणा होती है, वैसी ही प्रदक्षिणा माता पिता की होनी चाहिए, उनके पुत्र पुत्रियों के द्वारा I
  • गुरु प्रदक्षिणा … और क्यूँकि माता पिता अपने पुत्र और पुत्री के गुरुस्वरूप भी हैं, इसलिए जैसी प्रदक्षिणा माता पिता की होती है, वैसी ही गुरु की भी होनी चाहिए, उन गुरुके के शिष्यों के द्वारा I
  • इष्टदेव और इष्टदेवी प्रदक्षिणा … और क्यूंकि गुरु ही तो भगवान् और भगवती माता होते हैं, इसलिए जैसी प्रदक्षिणा गुरु की होती है, वैसी ही भगवान् (इष्ट देव और इष्ट देवी) की भी होनी चाहिए, उनके साधकगण और भक्तों के द्वारा I

और इन सभी प्रदक्षिणा के समय पर, साधक का भाव, साधक के शरीर की दशा और गति, और उसका मार्ग भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा इस अध्याय में बताया गया है I

 

सगुण साकार की प्रदक्षिणा का मार्ग … सगुण साकार प्रदक्षिणा मार्ग …

इस अध्याय का यह भाग, केवल सगुण साकार प्रदक्षिणा मार्ग पर ही लागू होता है, न कि सगुण निराकार प्रदक्षिणा या निर्गुण निराकार प्रदक्षिणा मार्ग पर I

 

आगे बढ़ता हूँ …

वैसे तो निर्गुण निराकार की प्रदक्षिणा, साधारणतः हो भी नहीं सकती, क्यूंकि अनंत की प्रदक्षिणा कैसे करोगे I

लेकिन तब भी इसका मार्ग, साधक के योगमार्ग से अवश्य होकर जाता है, जिसमें साधक की जीवात्मा, अपने आत्मस्वरूप की ही प्रदक्षिणा करती है, और जहाँ साधक का आत्मस्वरूप ही ॐ का लिपीलिंगात्मक स्वरूप होता है, और जहाँ वो ॐ का लिपीलिंग, साधक के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही होता है I

तो अब मैंने संकेत में ही सही, लेकिन निर्गुण निराकार की योगमार्ग में प्रदक्षिणा बतला दी I

इस परकाया प्रवेश के जन्म समय में, मेरी प्रदक्षिणा ब्रह्म के सगुण साकार, लिंगात्मक और सगुण निराकार स्वरूपों की ही हुई है I

और इन सबके अतिरिक्त, निर्गुण निराकार की प्रदक्षिणा “ॐ के लिपीलिंग” से हुई थी, जो ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है, और जिसके मार्ग को इस ग्रंथ में ओ३म् मार्ग कहा गया है I

लेकिन यहाँ पर केवल इस प्रदक्षिणा मार्ग के सगुण साकार स्वरूप पर बात होगी I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

अब इस सगुण साकार प्रदक्षिणा के कुछ बिन्दुओं को बतलाता हूँ …

  • यह सगुण साकार की प्रदक्षिणा, ब्रह्म की किसी भी सगुण साकार अभिव्यक्ति की हो सकती है, जैसे, माता पिता, गुरु, देवी देवता…, इत्यादि I
  • यही सगुण साकार प्रदक्षिणा मार्ग के मूल में कोई वेददुर्ग या वेदमंदिर, वेद ग्रन्थ या ग्रंथागार, वैदिक अर्चाविग्रह इत्यादि भी हो सकता है I
  • इसी सगुण साकार प्रदक्षिणा के मूल में, कोई भूधर, जैसे कोई पवित्र पारम्परिक नदी या पवित्र स्थान या पर्वतादि की भी हो सकता है I
  • इसी सगुण साकार प्रदक्षिणा के मूल में, कोई पारम्परिक दैविक जीव, जैसे कोई जलचर, भूचर या नभचर जीव और कोई पवित्र वनस्पति के बिंदु भी हो सकते है I
  • और इसी सगुण साकार परिक्रमा या प्रदक्षिणा के मूल में, ब्रह्म का लिंगात्मक स्वरूप, जैसे कोई शिवलिंग आदि भी हो सकता है I
  • और इसी सगुण साकार परिक्रमा या प्रदक्षिणा के मूल में, ब्रह्म का कोई सूक्ष्म अभिव्यक्ति, जैसे किसी चक्र के देवत्व बिंदु आदि भी हो सकता है I

 

अब इस प्रदक्षिणा के मार्ग को बताता हूँ …

साधक को सर्वप्रथम ब्रह्म की उस सगुण साकार अभिव्यक्ति के सामने और पीछे के भाग से अपने मन में एक रेखा खींचनी चाहिए I

और इस मन की रेखा को केंद्र बनके अपनी प्रदक्षिणा को दक्षिण पथ में प्रारम्भ करना चाहिए I

इसका अर्थ हुआ, कि ब्रह्म की उस सगुण साकार अभिव्यक्ति के सामने से पीछे तक, अपने मन में ही एक रेखा खीचो, और उस रेखा को मूल बनके, ब्रह्म की उस सगुण साकार अभिव्यक्ति की वाम और दक्षिण दिशा को जानो और उनकी प्रदक्षिणा प्रारम्भ करो I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

ऐसी प्रदक्षिणा के समय पर चलते हुए जब वो साधक (या पुत्र या पुत्री या शिष्य या भक्त या भगवत प्रेमी साखा इत्यादि), ब्रह्म की उस सगुण साकार (या लिंगात्मक) अभिव्यक्ति के दाहिने ओर (अर्थात दक्षिण दिशा की ओर) होगा, तो उसके हाथ शरीर से नीचे लटके हुए, हथेली उसकी जंघा को छूती हुई होनी चहिए I

और ऐसी दशा में दक्षिण मार्ग पर चलते हुए उस साधक को, ब्रह्म की उस सगुण सकार अभिव्यक्ति जिसकी प्रदक्षिणा हो रही है, उसका स्मरण करना चाहिए I  लेकिन ऐसे समय पर अपने अखंड सनातन परंपरा प्राप्त गुरुमंत्र, माँ सावित्री और कार्य ब्रह्म पर भी ध्यान केंद्रित किया जा सकता है I

और जब वो साधक (या पुत्र या पुत्री या शिष्य या भक्त इत्यादि), उस सगुण साकार (या लिंगात्मक) अभिव्यक्ति के बायीं ओर (अर्थात वाम दक्षिण दिशा की ओर) प्रदक्षिणा कर रहा होगा, तो उसका आसन शाश्वत प्रणाम में होना चाहिए I

ऐसा समय पर दक्षिण मार्ग में ही चलते हुए (अर्थात दाहिने ओर ही चलते हुए), साधक के हाथ ऊपर अर्थात आकाश की ओर होने चाहिए, आँखों की पुतलियां थोड़ी ऊपर की ओर होनी चाहिए, हथेलिआं आपस में नमस्ते की मुद्रा में मिली होनी चाहिए, और साधक के हाथ उस साधक के कानों को छूने चाहिए I

 

ब्रह्म की सगुण सकार अभिव्यक्ति की सांकेतिक प्रदक्षिणा

अब जो बताया जा रहा है, उसपर ध्यान देना …

  • यदि कोई साधक चल नहीं पा रहा है, या किसी कारणवश वो इस प्रदक्षिणा को चलकर नहीं कर पाएगा, तो उसकी प्रदक्षिणा सांकेतिक भी हो सकती है I
  • ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा मन में की जाती है I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

अब इस सांकेतिक प्रदक्षिणा के कुछ उदहारण देता हूँ, लेकिन यह उदहारण पूर्ण नहीं हैं…, इसलिए, जो उत्कृष्ट साधकगण, आत्मा और ब्रह्म के ज्ञाता वैदिक मनीषीगण और गंतव्य स्थित (प्राप्त) योगीजन हैं, वो इनके मार्ग के विस्तार को,  जितना चाहें उतना बढ़ा सकते हैं I

मैंने यहाँ पर कुछ ही उदहारण दिए हैं…, सारे नहीं…, इसलिए ऐसा बोल रहा हूँ I

  • ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा माता, पिता और गुरु के देहावसान के पश्चात भी हो सकती है, क्यूंकि वास्तव में तो सब आत्मा ही हैं, जो ब्रह्म है, जो अनादि अनन्त सनातन ही है I

 

ऐसा कहने का कारण है, कि …

शरीर के नाश से आत्मा का नाश भी नहीं होता I

इसलिए शरीर के न होने पर भी, यह प्रदक्षिणा संकेतरिक रूप में की जा सकती है I

  • यही सांकेतिक प्रदक्षिणा उन वेदमंदिरों, वेद्दुर्गों, पूर्व कालों के वैदिक सम्प्रदायों के स्थानों, वेद ग्रंथों और पुरातन वैदिक ग्रंथागारों, लुप्त भूधरों (अर्थात लुप्त हुई नदियाँ, जैसे सरस्वती नदी, इत्यादि), कुछ स्थानों की लुप्त हुई दिव्यताओं, की भी हो सकती है I

 

ऐसा कहने का कारण है, कि …

स्थूल अदि स्वरूप के नाश से, पारंपरिक वैदिक दिव्यताओं का नाश नहीं होता I

और यदि ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा होती है, और होती ही जाती है, तो वो सब जो इस समय लुप्त हुए प्रतीत हो रहे हैं…, शनैः शनैः स्वयंप्रकट भी होने लगेंगे I

  • यही सांकेतिक प्रदक्षिणा उन वेद बिन्दुओं की भी हो सकती है, जो कलियुग की काली काया के प्रभाव के कारण, आज या किसी भी कालखंड में म्लेच्छों के पास चले गए हैं (अर्थात जिनको म्लेच्छों ने आज कब्जा रखा है) I

यदि ऐसी प्रदक्षिणा चलती ही जाएगी, तो वो सब कुछ, जो मूल से योग और वेदों का है, और जो किसी कालखंड में म्लेच्छों के पास चला गया है, वो सब उन वेदमनिषियों और योगमानिसियों के पास, जो उसकी मूल परंपरा के मार्गी और धारक हैं, उन सबके लौटने भी लगेगा I

आज जो वेद मंदिर आदि सकरारों ने अपने विकृत संविधानिक न्याय तंत्रों का आलम्बन लेके कब्ज़ा लिए हैं, उनकी घर वापिस भी इसी सांकेतिक प्रदक्षिणा से, बिना किसी को कुछ भी बोले हुए, बिना किसी उपद्रव से, और बिना किसी अनर्थ से, उन वेद मनिषियों और वेदाचार्यों के पास, जो उस परम्परिक बिन्दु के मार्गी है, उनके पास की जा सकती है I

 

ऐसा कहने का कारण है, कि …

युगों के विकृत प्रभाव से, वेद सम्प्रदाओं और योग परम्पराओं का नाश नहीं होता I

 

  • यही सांकेतिक प्रदक्षिणा उस ज्ञान और ज्ञान ग्रंथों की भी हो सकती है, जिसको कलियुग तन्त्रों ने पूर्व के किसी कालखंड में नष्ट किया था I

और यदि ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा चलती ही जाएगी, तो वो सब जो पूर्व कालों में नष्ट किया गया था, स्वयं ही प्रकट होने लगेगा इस धरा पर I

इस ज्ञानरूपी प्रकटीकरण में, वो वैदिक ऋषि सिद्ध योगी जो इस प्रदक्षिणा के समय पर “सूक्ष्ण सिद्ध दैविक” आदि लोकों में था, और जो उस ज्ञान का धारक है, जिसकी सांकेतिक प्रदक्षिणा की जा रही है, उस धरा पर जन्म लेकर, उस ज्ञान को पुनः स्थापित करेगा I

पुरातन कालों में, ज्ञान प्रकटीकरण के यह भी एक मार्ग था, कि जो उस ज्ञान का धारक ऋषि सिद्धि योगी है, उसको ही जन्म लेने के लिए बाध्य कर दो या उसको किसी धरा के साधक का गुरु होने के लिए बाध्य कर दो, इस बताई जा रही सांकेतिक प्रदक्षिणा के मार्ग से I

 

ऐसा कहने का कारण है, की …

ग्रन्थ आदि के नाश से, उस ग्रन्थ के स्त्रोत्र, ज्ञान और धारक का नाश नहीं होता I

 

  • यही सांकेतिक प्रदक्षिणा किसी भी बिंदु की हो सकती है, जैसे वैदिक राष्ट्र स्थापना I

वैदिक राष्ट्र को ही ब्रह्माण्ड कहते हैं, चतुरदश भुवन कहते हैं, त्रिलोक कहते हैं और इस वैदिक राष्ट्र के सम्राट और गुरु, दोनों ही सर्वेश्वर भगवान् होते हैं I

इसलिए आप वेद और योग मनीषी अपने अपने इष्ट स्वरूप में ही उन सर्वेश्वर भगवान् की ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा, वैदिक राष्ट्र स्थापना के हेतु करोगे, और करते ही चले जाओगे, तो वो वैदिक राष्ट्र, जो सर्वेश्वर का साम्राज्य और पीठ (गुरुगद्दी) भी है, उसकी स्थापना भी स्वतः ही हो जाएगी…, और वो भी बिना किसी बड़े विप्लव, उपद्रव, युद्धादि से I

लेकिन इस वैदिक राष्ट्र स्थापना की सांकेतिक प्रदक्षिणा में, महाब्रह्माण्ड को (जिसके बारे में एक अध्याय में बताया जाएगा), लिंगात्मक स्वरूप में ही माना जाता है I

इस सांकेतिक प्रदक्षिणा के फल स्वरूप, साक्षात् भगवन या उनके कोई उत्कृष्ट परिकर ही स्वयं आ जाएंगे उस पृथ्वी पर, जहाँ ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा वैदिक राष्ट्र स्थापना के लिए करी जा रही है I

क्यूंकि संयासीगण, धारणा की शक्ति को जानते हैं, इसलिए यदि ऐसे संयासी आदिगण इस प्रदक्षिणा को वैदिक राष्ट्र स्थापना की धारणा में बसकर करेंगे, तो ऐसी प्रदक्षिणा के फल भी, शीघ्र ही, कुछ ही वर्षों में भी मिल सकते हैं, उस धरा पर जहाँ ऐसी प्रदक्षिणा सांकेतिक रूप में की जा रही है I

ऐसा कहने का कारण है, कि धारणा की गंतव्य अवस्था को ही ब्रह्माण्ड धारणा कहते हैं…, और ब्रह्माण्ड धारणा की गंतव्य अवस्था को, ब्रह्माण्ड योग I

ऐसी सांकेतिक प्रदक्षिणा में, बिना बात किए, बिना न्याय प्रक्रिया में गए हुए, बिना युद्ध लड़े ही सब हो जाएगा, जिसके लिए यह वैदिक प्रदक्षिणा की जाएगी I

और यदि उस महाब्रह्माण्ड की प्रदक्षिणा, जिसके बारे में बाद का अध्याय में बताया जाएगा, नहीं कर पा रहे हो, तो परम्पगत स्थापित शिवलिंग की प्रदक्षिणा भी कर सकते हो I

 

ऐसा कहने का कारण है, कि …

ब्रह्माण्ड का लिंगात्मक स्वरूप ही वैदिक परंपरागत स्थापित शिवलिंग होता है I

और शिवलिंग वैदिक परंपरागत स्थापित का निराकार स्वरूप ही ब्रह्माण्ड होता है I

ब्रह्माण्ड ही सर्वेश्वर का साम्राज्य और पीठ होता है, जो वैदिक राष्ट्र कहलाता है I

 

मेरे पूर्व जन्मों के पुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण भी हैं, क्यूंकि मैं प्रबुद्ध योगभ्रष्ट हूँ, यह भी एक मार्ग था, वैदिक राष्ट्र और लुप्त या विकृत हुए प्रशस्त यौगिक और वैदिक मानबिंदुओं की पुनर्स्थापना का I

योगिक और वैदिक बिन्दुओं में से, योग मूल होता है और वेद अमूल गंतव्य I

न तो मूल का कोई अन्य मूल होता है और न ही गंतव्य का कोई अन्य गंतव्य I

 

इसलिए, जो पारंपरिक वेद और योग मूल, और इनका अद्वैत गंतव्य है, जिसकी ओर वैदिक राष्ट्र का संविधान और उसकी सैद्धान्तिक जीवन शैली लेके जाएगी ही,वो सनातन ही है, जिसके कारण उसकी पुनर्स्थापना किसी भी काल खण्ड में की जा सकती है I

 

और मेरा ऐसा कहने का कारण है, कि …

पारम्परिक बिन्दुओं के प्रकट आदि स्वरूपों के नाश से उनके मूल और गंतव्य का नाश नहीं होताI

 

  • अपने आश्रम अनुसार, वर्णाश्रम अनुसार, शरीरी (स्वस्थ्य) उत्कर्ष के लिए, आर्थिक उत्कर्ष के लिए, मानसिक स्थिरता के लिए या किसी और बिंदु को पाने के लिए, जब इस प्रदक्षिणा को करोगे, तो उसके देवत्व बिंदु (देवी देवता) का स्मरण करना चाहिए (जैसे स्वास्थ्य के लिए, भगवान् धन्वन्तरि, आर्थिक उन्नति के लिए कुबेर देव, इत्यादि) I
  • यदि इस वैदिक सावित्रि कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा को मुमुक्षू करेगा, तो इसको करते समय उस मुमुक्षु को गणपति देव का ध्यान करना चाहिए I गणपति ही अनुग्रह कृत्य के देवता हैं, और अनुग्रह कृत्य ही मुक्तिमार्ग का अन्तिम बिन्दु होता है I

 

और इस भाग के अंत में …

यह माँ सावित्री और कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा का मार्ग है, जो सार्वभौम सर्वव्याप्त है इस समस्त जीव जगत में…, और यही प्रदक्षिणा मार्ग, इस जीव जगत से परे की अवस्थाओं में भी पूर्ण कारगर है I

 

सावित्री हिरण्यगर्भ परिक्रमा का मुक्तिमार्ग स्वरूप

जो जीव इस ग्रन्थ के योगतत्त्व को पाना चाहता है, उसको सात्विक प्रशस्त मानबिन्दुओं को धारण करके, गणेश भगवान् के समान, अपने पिता और माता को ही समस्त ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड की समस्त दिव्यता, अपनी और ब्रह्माण्ड की आत्मा और आत्मशक्ति मान कर…, उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए I

अपने माता और पिता (गुरु, देवादि) की जो प्रदक्षिणा होती है, उसको ही ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति प्रदक्षिणा कहा जाता है, जिसका आलम्बन लेके उस समय के नन्हे मुन्ने बालशिव गणेश जी भी, इस जीव जगत के गणपति देव हुए थे I और ऐसी ही प्रदक्षिणा गुरु और इष्ट की भी होती है I

ऐसी प्रदक्षिणा के समय, वाणी में (या मन में ही) अकार, उकार, मकार रूपी बीजों को बोलो … एक ही स्वांस में, जितना लम्बा बोल सकते हो…, उतना लम्बा बोलो I और बोलते ही जाओ जब तक ऐसी प्रदक्षिणा कर रहे हो I

और अपनी धारणा में, अपने आप को एक हिरण्यमयी प्रकाश में डालो, जो ब्रह्मतत्त्व (अर्थात शुद्ध चेतन तत्त्व) का होता है और जैसे इस अध्याय के चित्र में भी दिखाया गया है I

और यदि इस प्रदक्षिणा के समय पर, अपने मन में कर सको, तो अपने भाव में, उस ब्रह्मतत्त्व के भीतर स्वयं को ब्रह्म के लिपीलिंगात्मक स्वरूप में देखो, अर्थात स्वयं को ही ॐ के चिंन्ह रूप में ही देखो, क्यूंकि तुम्हारी वास्तविकता में, तुम वो ॐ रूपी आत्मा हो, जो अद्वैत निरंग स्व:प्रकाश निश्कलंक निर्विकल्प निर्बीज और निराधार ब्रह्म ही है I

वैदिक वाङ्मय में, तुम्हारे वास्तविक स्वरूप, अर्थात तुम्हारे आत्मस्वरूप को ही तो को ब्रह्म कहा गया है I

और तुम्हारे पृथक मार्गों के अनुसार भी…,

तुम वो ही हो जिसकी तुम उपासना करते हो I

 

जिसकी तुम उपासना करते हो, वो भी तो तुम्हारे सामान, उसी ब्रह्म की एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है, और वास्तव में तो, अभिव्यक्ति अपने अभिव्यक्ता से पृथक भी तो नहीं होती I

अभिव्यक्ति के गंतव्य, अर्थात निर्गुण निराकार स्वरूप को ही तो अभिव्यक्ता कहा जाता है I

 

और इसके साथ साथ…,

अभिव्यक्ता के सगुण साकार और सगुण निराकार, अर्थात अभिव्यक्त (या प्रकट) स्वरूपों को ही तो अभिव्यक्ति कहा जाता है I

 

यदि ऐसा पूर्ण रूप में कर पाए, तो इसका परिणाम भी वही होगा, जिसको मैंने स्वयं ही स्वयं में…, ऐसा कहा है I

और ऐसी प्रदक्षिणा, तुम्हारे कर्मों में रहते हुए भी, तुम्हारा मार्ग आत्ममार्ग ही हो जाएगा, जिसको इस ग्रन्थ में, आत्मा ही आत्मा में और ब्रह्म ही ब्रह्म में…, ऐसा कहा गया है I

ब्रह्म ने अपने को ही जीव जगत के स्वरूप में अभिव्यक्त किया है I

क्यूंकि रचैता अपने सिवा कुछ और बना भी तो नहीं पाया था I

 

उत्कृष्ट साधकगण इसी बिंदु को इस सावित्री कार्य ब्रह्म प्रदक्षिणा में ज्ञानरूप में जानेंगे I

और इस साक्षात्कार के पश्चात, वो साधकगण, ब्रह्म ही होकर, ब्रह्म के ही सामान, अपनी ही रचना के सर्वस्वरूपों के एकमात्र साक्षी भी हो जाएंगे I

सर्वसाक्षी को ही मुक्तात्मा कहा जाता है I

 

इस प्रबुद्ध योग भ्रष्ट की बातों को हलके में मत लेना, क्यूंकि मैंने अपने जीव रूपी इतिहास में कई बालक, बालिकाएं, शिष्य और भक्त, इसी प्रक्रिया से और उनके उसी जीवन के समय पर ही मुक्तात्मा होते देखे हैं…, अर्थात, जीवन्मुक्त होते देखे है I

 

सावित्री कार्यब्रह्म प्रदक्षिणा का प्रबुद्ध योग भ्रष्टों से अखंड नाता

चाहे वो प्रबुद्ध योग भ्रष्ट जिसको अकार की देवी किसी नीचे के लोक में लायी हैं, अपने देहावसान के पश्चात अपने लोक में प्रस्थान करे, या जीवित ही करे, उस प्रबुद्ध योग भ्रष्ट की आगमन और प्रस्थान प्रक्रिया वैसी ही होगी, जैसी यहाँ पर बताई गई है I

इसलिए जबतक वो स्वयं ही न बताए, तबतक उसके आगमन के बारे में कोई भी नहीं जान सकता I

वो बतलाएगा भी तब, जब उसको अपनी पारिवारिक परंपरा (अर्थात अकार और उकार) सहित, अपनी अखंड सनातन गुरूपरम्परा से ऐसा आदेश होगा I

वैसे तो जो योगी प्रबुद्ध योगभ्रष्ट होते हैं, वो इस सावित्री कार्यब्रह्म प्रदक्षिणा को तब भी करते हैं, जब वो हिरण्यगर्भ लोक में बसे होते है I

 

और अंत में इस प्रबुद्ध योगभ्रष्ट की एक और बात पर ध्यान केन्द्रित करो …

आगामी समय जो 2028 ईस्वी से 2.7 वर्षों के भीतर का है, उसमे इस धरा पर सनातन सिद्धांत (अर्थात सनातन वैदिक आर्य सिद्धान्त) को स्थापित किया जाना है और वो भी अखण्ड वैदिक स्वरूप में, क्यूंकि जो युग आने वाला है, वो वैदिक युग ही है I

सनातन कभी नही लुल्लपुल्ल होकर नहीं आता, वो करोड़ों सिंघों की दहाड़ के साथ आता है…, और जहाँ वो दहाड़ जीवों के भीतर और बाहर, दोनों ओर से आती है I

मेरे पूर्व जन्मों में भी, जब सनातन आत्मा रूपी काल की प्रेरणा से, आत्मशक्ति रूपी माँ महाकाली की निराकार शक्ति से, और जगत रूपी कालचक्र के प्रवाह और प्रभाव से, गुरुयुग के आगमन के कारण, सनातन आया था…, तब भी वो ऐसे ही दहाड़ता हुआ आया था I

और इस बार भी वो सनातन वैदिक आर्य सिद्धांत…, ऐसे ही आएगा…, क्यूंकि सनातन के आने का कोई और मार्ग है भी तो नहीं I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय I

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