सद्योजात ब्रह्म, इंद्रलोक, ब्रह्माण्डीय विज्ञानमय काया, हिरण्यगर्भ ब्रह्म, पुरुषार्थ चतुष्टय, धर्म अर्थ काम मोक्ष, ब्राह्मणत्व, माँ गायत्री का हेमा मुख, प्रज्ञानं ब्रह्म, ऋग्वेद

सद्योजात ब्रह्म, इंद्रलोक, ब्रह्माण्डीय विज्ञानमय काया, हिरण्यगर्भ ब्रह्म, पुरुषार्थ चतुष्टय, धर्म अर्थ काम मोक्ष, ब्राह्मणत्व, माँ गायत्री का हेमा मुख, प्रज्ञानं ब्रह्म, ऋग्वेद

यहाँ पर सद्योजात ब्रह्म की बात होगी I यही सद्योजात नामक ब्रह्म को हिरण्यगर्भ ब्रह्म भी कहा जाता है I इन्ही सद्योजात को ब्रह्माण्ड की विजयानमय काया (अर्थात ब्रह्माण्डीय विज्ञानमय काया) भी कहा जा सकता है, और यही इंद्रलोक से भी संबंधित है I सद्योजात की दिव्यता माँ गायत्री का हेमा मुख ही है, अर्थात सद्योजात की दिव्यता माँ गायत्री का पीला मुख है I इन सद्योजात का नाता पुरुषार्थ चतुष्टय, अर्थात चार पुरुषार्थ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहलाते हैं, इनसे भी है I क्यूंकि यह अध्याय ब्राह्मणत्व नामक बिंदु का भी अभिन्न अंग है, और क्यूंकि इस कलियुग की काली काया के प्रभाव के कारण, ब्राह्मणत्व लुप्त सा ही हो गया है, और क्यूंकि कलियुग ब्राह्मणत्व का युग है ही नहीं…, इसलिए इस अध्याय को अधिक रूप में नहीं बताया जाएगा I बस कम से कम बताके, इसको समाप्त कर दिया जाएगा I

पूर्व के अध्यायों में बताए गए तत्पुरुष और भू महाभूत के साक्षात्कार के पश्चात ही इस अध्याय में बताए गए सद्योजात नामक ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ था I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2007-2008 से प्रारम्भ होकर, कोई 2012 तक गया था I इतना लम्बा समय लगने का कारण था, कि इस साक्षात्कार के मार्ग मे बहुत सारी दशाएँ आई थी I

इन दशाओं के बारे में इस अध्याय में संक्षेप में बताया जाएगा, लेकिन इन दशाओं को बाद की अध्याय श्रंखलाओं में कुछ विस्तार से भी बताया जाएगा I उन अध्याय श्रृंखला के नाम हैं, ॐ मार्ग, रकार मार्ग, अष्टम चक्र मार्ग और अंत में सदाशिव मार्ग I

तत्पुरुष से लेकर सद्योजात के मार्ग में, इन सब को पार करके ही यहाँ बताए जा रहे सद्योजात ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ था I

इसलिए मैं यह भी मानता हूँ कि पञ्चब्रह्म प्रदक्षिणा में, तत्पुरुष से सद्योजात तक का मार्ग ही अधिकांश भाग है I

और इस भाग के साक्षात्कार में कई वर्ष लग गए थे, क्यूंकि इसके मध्य में इतनी दशाएँ और सिद्धियाँ थी, कि अधिकांश को तो इस ग्रन्थ में बताया ही नहीं गया है I लेकिन ऐसा होने पर भी, मुख्य बिंदुओं पर यह ग्रन्थ प्रकाश डालता ही है I

और क्यूंकि यह पूरा ग्रंथ ब्रह्मपथ को ही बताता है, इसलिए मैं ऐसा भी मानता हूँ, कि ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ का अधिकांश भाग, तत्पुरुष ब्रह्म से लेकर सद्योजात ब्रह्म के मध्य में ही है I

इस अध्याय में बताया गया पुरुषार्थ चतुष्टय, सदाशिव के सद्योजात मुख से सात्क्षात्कार होता है, न कि इस अध्याय के सद्योजात ब्रह्म से I

लेकिन तब भी इसको यहीं पर जोड़ा गया है, क्यूंकि पञ्च मुखा सदाशिव का मार्ग भी तत्पुरुष ब्रह्म से जाते हुए सद्योजात ब्रह्म तक के मार्ग के अंतर्गत ही आता है I

इसलिए इस बात पर ध्यान देना, कि जबकि यह पुरुषार्थ चतुष्टय का ज्ञान, सदाशिव के सद्योजात मुख का है, लेकिन इसको इसी अध्याय में डाला गया है, जिसका नाम सद्योजात नामक ब्रह्म है I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार है I इसलिए इस अध्याय के बिंदुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही संबंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का बाईसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, पञ्चब्रह्म गायत्री मार्ग श्रृंखला का आठवाँ अध्याय है।

 

सद्योजात ब्रह्म, इंद्रलोक, हिरण्यगर्भ ब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, ऋग्वेद
सद्योजात ब्रह्म, इंद्रलोक, हिरण्यगर्भ ब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, ऋग्वेद

 

पञ्च ब्रह्म प्रदक्षिणा मार्ग में सद्योजात ब्रह्म की महिमा,

पञ्च ब्रह्मोपनिषद प्रदक्षिणा मार्ग में, यह सद्योजात नामक ब्रह्म, पञ्च ब्रह्म की सगुण निराकार अवस्था के साक्षात्कारों में अंतिम पड़ाव है, क्यूंकि इस साक्षात्कार के पश्चात, वो साधक उन ईशान ब्रह्म के साक्षात्कार का पात्र बन जाता है जो वेदों में निर्गुण निराकार ब्रह्म कहलाते हैं I

 

सद्योजात ब्रह्म ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म हैं, … सद्योजात ही हिरण्यगर्भ हैं, … सद्योजात का कार्य ब्रह्म से नाता, … सद्योजात और कार्य ब्रह्म, …

वेदों मे बताए गए हिरण्यगर्भ ब्रह्म को ही पञ्च ब्रह्मोपनिषद में सद्योजात कहा गया है I

जब हिरण्यगर्भात्मक ब्रह्म रजोगुणी होते हैं, तो वही हिरण्यगर्भ, कार्य ब्रह्म कहलाते हैं I हिरण्यगर्भ ब्रह्म रजोगुणी होकर, अर्थात कार्य ब्रह्म होकर ही सृष्टिकर्ता कहलाते हैं I

क्यूंकि सद्योजात ब्रह्म को ही हिरण्यगर्भ कहा जाता है, इसलिए चाहे सद्योजात बोलो या हिरण्यगर्भ, बात एक ही है I

और क्यूँकि कार्य ब्रह्म को ही उकार कहा जाता है, इसलिए इसलिए सद्योजात का नाता ॐ नाद के मध्य शब्द, उकार से भी हैं I

 

तत्पुरुष से सद्योजात ब्रह्म का मार्ग, … तत्पुरुष से सद्योजात ब्रह्म , तत्पुरुष से सद्योजात, सद्योजात साक्षात्कार मार्ग …

 

तत्पुरुष से सद्योजात ब्रह्म का मार्ग, तत्पुरुष से सद्योजात, सद्योजात साक्षात्कार मार्ग
तत्पुरुष से सद्योजात ब्रह्म का मार्ग, तत्पुरुष से सद्योजात, सद्योजात साक्षात्कार मार्ग

 

ऊपर का चित्र तत्पुरुष से सद्योजात तक का साक्षात्कार मार्ग, संक्षेप में बता रहा है I लेकिन जैसे पूर्व में बताया था, कि इस मार्ग में कई सारी दशाएं आती हैं, जिनके बारे में आगे की अध्याय श्रंखलाओं में बात होगी I

जबकि इस चित्र में यह मार्ग बहुत सरल सा प्रतीत हो रहा है, लेकिन इस मार्ग पर कई सारे वैदिक बिंदुओं का साक्षात्कार भी होता है I

और तत्पुरुष ब्रह्म से आगे के मार्ग में, उन बहुत सारे वैदिक बिंदुओं के साक्षात्कार के पश्चात ही साधक की चेतना, सद्योजात ब्रह्म के भीतर प्रवेश कर पाती है I

इसलिए तत्पुरुष से सद्योजात तक का मार्ग बहुत लम्बा भी है I

लेकिन इस बहुत लम्बे मार्ग को ऊपर का चित्र साधारण रूप में ही दिखा रहा है…, बस एक काले वर्ण के तीर द्वारा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

तो अब तत्पुरुष से सद्योजात तक के मार्ग के जो बिंदु होते हैं, उनमें से कुछ मुख्य बिंदुओं को बताता हूँ …

  • तत्पुरुष ब्रह्म के साक्षात्कार के पश्चात, जब भू महाभूत का भी साक्षात्कार हो गया था, तब चेतना हृदयाकाश गर्भ में जाती है I
  • हृदय आकाश गर्भ से वो चेतना हृदय कैवल्य गुफा में जाती है, जिसके कुछ समय पश्चात, वो चेतना रूद्र लिंगात्मक गुफा में चली जाती है I
  • इसके पश्चात वो चेतना कुछ और दशाओं से जाती है, जैसे तथागतगर्भ, इत्यादि I
  • और इसके पश्चात, वो चेतना अकार (या का शब्द या ॐ का प्रथम बीज शब्द), उकार (या का शब्द या ओकार या ॐ का द्वितीय बीज शब्द), मकार (या त्रिदेव या ॐ का तृतीय बीज शब्द या का शब्द) से जाकर ब्रह्मतत्व (या शुद्ध चेतन तत्त्व) में जाती है और इसके पश्चात ओमकार का साक्षात्कार करती है I
  • और इस मार्ग से आगे वो चेतना, राम नाद (अर्थात शिव तारक मन्त्र) से अष्टम चक्र को जाती है I
  • अष्टम चक्र को पार करके, साधक पञ्च मुखा सदाशिव का साक्षात्कार करता है जहाँ इस साक्षात्कार के भी कई भाग हैं I
  • और इन सभी साक्षात्कारों के पश्चात ही साधक इन सद्योजात ब्रह्म का साक्षात्कार करता है I

इन सबके बारे में बाद की अध्याय श्रंखलाओं में बताया जाएगा I

 

टिपण्णी: लेकिन इस पूरे मार्ग को यहाँ पर संक्षेप में बताया गया है क्यूंकि इस मार्ग में और बहुत सारे पड़ाव भी होते हैं…, और जिनको आगे के अध्यायों में बताया जाएगा I

टिपण्णी: ऊपर बताए गए जो ॐ मार्ग और अन्य सभी साक्षात्कार हैं, वो भी तत्पुरुष से सद्योजात के मार्ग में ही होते हैं I इसका अर्थ हुआ, कि तत्पुरुष से सद्योजात के साक्षात्कार मार्ग पर जाकर ही ॐ का साक्षात्कार होता है I जिसको ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष कहा जाता है, वो भी सद्योजात ब्रह्म से संबंधित है I

 

सद्योजात का वर्णन, … सद्योजात कौन? …

पञ्च ब्रह्म प्रदक्षिणा में सद्योजात ब्रह्म का साक्षात्कार पञ्च ब्रह्म के अंतिम सगुण निराकार स्वरूप में ही होता है I

इसका अर्थ हुआ कि पञ्च ब्रह्मोपनिषद प्रदक्षिणा और साक्षात्कार मार्ग में, सद्योजात ही ब्रह्म का अंतिम सगुण निराकार स्वरूप हैं I

इसलिए यह पञ्चब्रह्म परिक्रमा जो अघोर ब्रह्म से से जाकर, अघोर से अगले ब्रह्म, वामदेव का साक्षात्कार करके, तत्पुरुष में जाकर अंततः सद्योजात में चली जाती है, उसमें सद्योजात ही पञ्च ब्रह्म का अंतिम सगुण निराकार स्वरूप हैं I

इस साक्षात्कार में सद्योजात, अतिसूक्ष्म, प्रकाशमान पीले वर्ण के होते हैं I

 

सद्योजात और ऋग्वेद, ऋग्वेद का महावाक्य, ऋग्वेद का महावाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म, … सद्योजात और प्रज्ञानं ब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म का महावाक्य, … ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष, …

ऋग्वेद का महावाक्य जो प्रज्ञानं ब्रह्म कहा गया है, वो सद्योजात का ही वाक्यलिंग है क्यूंकि सद्योजात ही वो प्राज्ञ हैं, जिनको यह मायवाक्य दर्शाता है I

और साधक के मस्तिष्क के ऊपर जो ब्रह्मरंध्र (या सहस्रार चक्र) है, उसके भीतर जो अतिसूक्ष्म पीले वर्ण की प्रकाशमान दशा है, और जिसको ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष भी कहा जाता है, उसका नाता भी सद्योजात से स्वयंउत्पन्न इंद्रलोक से ही है I

साधक के विज्ञानमय कोष का नाता भी इसी इंद्रलोक से है, जो सद्योजात से ही स्वयंउत्पन्न हुआ था I

 

सद्योजात और माँ गायत्री का हेमा मुख, सद्योजात ब्रह्म का माँ गायत्री के हेमा मुख से नाता, … पञ्च मुखा गायत्री का हेमा मुख और सद्योजात ब्रह्म, माँ गायत्री का पीला मुख, …

सद्योजात ब्रह्म से जो माँ गायत्री का मुख संबंधित होता है, उसको ही हेमा मुख कहा जाता है I

इसका अर्थ हुआ, कि पञ्च मुखा गायत्री का जो मुख सद्योजात ब्रह्म की दिव्यता को दर्शाता है, वही माँ गायत्री का हेमा मुख कहा गया है I

यह मुख सद्योजात ब्रह्म के ज्ञान ब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है, अर्थात पञ्च मुखी गायत्री का हेमा नामक मुख ही ब्रह्मज्ञान के तत्त्व को दर्शाता है I

यहाँ जो “ज्ञान तत्त्व” कहा गया है, वही ब्रह्म के ज्ञानमय स्वरूप को दर्शाता है I

 

सद्योजात का देवराज इंद्र से नाता, सद्योजात का इंद्रलोक से नाता, … माँ गायत्री के हेमा मुख का देवराज इंद्र से नाता, माँ गायत्री का हेमा मुख और इंद्रलोक, …

और ऐसी दशा में वही सद्योजात नामक ब्रह्म, इंद्रलोक से भी नाता रखते हैं I

पाशुपत मार्ग में, राजयोग के अंतर्गत जो सदाशिव का पूर्वी मुख तत्पुरुष है, उससे ही इंद्रलोक की स्वयंउत्पत्ति कही गई है I

लेकिन सदाशिव का तत्पुरुष मुख भी तो कार्य ब्रह्म ही हैं I

इसलिए, जो सदाशिव का तत्पुरुष मुख है, उससे ही उस इंद्रलोक (अर्थात इंद्र का सगुण निराकारी स्वरूप) स्वयं उत्पन्न हुआ था, और जिसका नाता सद्योजात नामक ब्रह्म से ही है I

और क्यूंकि सद्योजात ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म कहलाता था, इसलिए मेरे पूर्व जन्मों के उन पुरातन कालों में, जो मुझे स्मरण भी हैं क्यूंकि मैं प्रबुद्ध योगभ्रष्ट हूँ, कुछ वेद मनीषी कहते भी थे, कि इंद्र हिरण्यगर्भ ब्रह्म से संबंध रखते हैं, और कुछ तो यह भी कहते थे, कि इंद्र देव ब्रह्मा के प्रथम शिष्य ही हैं I

क्यूंकि इंद्रलोक का नाता सद्योजात ब्रह्म, अर्थात स्व:प्रकाश ज्ञानात्मक परमात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्म से ही होता है, इसलिए पुरातन वेद मनिषियों ने देवराज इंद्र को परमात्मा तक कहा है I

और क्यूँकि सद्योजात ब्रह्म की दिव्यता ही माँ गायत्री का हेमा मुख है, और क्यूँकि सद्योजात ब्रह्म का नाता इंद्रलोक और देवराज इंद्र से भी है, इसलिए इंद्रलोक का सीधा सीधा नाता पञ्च मुखी गायत्री के हेमा मुख से भी है I

 

इंद्रलोक और ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया, ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया का इंद्रलोक से नाता, … इंद्र का ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया से नाता, ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया का इंद्र से नाता, … गायत्री सरस्वति का हेमा मुख और इंद्र लोक, इंद्रलोक का गायत्री सरस्वती के हेमा मुख से नाता, …

इंद्रलोक ही ब्रह्माण्ड की विज्ञानमय काया है, अर्थात ब्रह्माण्ड में जो विज्ञान तत्त्व है, वही इंद्रलोक है I

विज्ञान के सगुण निराकार तत्त्व स्वरूप को ही इंद्रलोक कहते हैं I और इसी कारण से, इंद्रलोक ही ब्रह्माण्ड के ज्ञान तत्त्व को दर्शाता है I

ऐसा होने के कारण, देवराज इंद्र का ज्ञान ब्राह्म नामक शब्द से भी नाता है, जिसके कारण देवराज इंद्र का सीधा नाता, ज्ञान मार्ग से है I

ऐसे ही मेरे पुरातन जन्मों में भी माना जाता था और यही कारण है, कि वेद चतुष्टय में देवराज इंद्र को परमात्मा तक कहा गया है I और यह भी वो कारण था, कि वेदों का एक बड़ा भाग इंद्र देव पर ही आधारित हुआ था I

और ऐसा तब भी है जब इंद्र, देवराज होने के कारण, अभिमानी देवता ही हैं I देवताओं का राजा अनाभिमानी कैसे हो सकता है? …, हो ही नहीं सकता है I

लेकिन अभिमानी होने पर भी, इंद्र पद को वो उत्कृष्ट योगी ही पा सकता है, जिसने एक सौ आंतरिक अश्वमेध यज्ञ संपन्न किये हैं I

इसलिए, वो योगी जिसने एक सौ आंतरिक अश्वमेधे पूर्ण किये होते है, वही योगी आगे जाकर इंद्रपद को पाता है I

 

सद्योजात और ब्राह्मणत्व, … ब्राह्मणत्व का सद्योजात से नाता, … माँ गायत्री का हेमा मुख और ब्राह्मणत्व, … इंद्र ब्राह्मणत्व का मूल हैं, ब्राह्मणत्व और इंद्र, …

क्यूंकि सद्योजात का नाता उन देवराज इंद्र से हैं, जिनके लोक को ही ब्रह्माण्ड की विजयानमय काया कहा गया है, इसलिए सद्योजात का सीधा-सीधा नाता ज्ञानमय सिद्धि से है, और जहाँ यह नाता भी तत्त्व स्वरूप में है, न कि देवत्व आदि बिंदुओं में I

और क्यूंकि सद्योजात की दिव्यता को ही माँ गायत्री का हेमा मुख कहा गया है, इसलिए ऊपर बताए गए नाते में पञ्च मुखा गायत्री का हेमा मुख ही दिव्यता स्वरुप में मिलेगा I

यहाँ बताए गए कारणों से ब्राह्मणत्व के मूल में, इंद्र ही मिलेंगे I

इसका यह भी अर्थ हुआ, कि ब्राह्मण शब्द का सीधा-सीधा नाता, इंद्र देव से है I और यह नाता भी ऐसा है, कि इंद्रदेव ही ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व के पोशाक और रक्षक होते हैं और जहाँ उस ब्राह्मणत्व के धारक भी सद्योजात ही हैं I

जबसे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, तब से ऐसा ही है, और आगे भी ऐसा ही रहेगा I

 

कलियुग में वेद मनिषियों के प्रपंच, … पुराणों और अन्य ग्रंथों में कहे गए प्रपञ्च, … क्या इंद्र कुपित देवता हैं?, …

लेकिन इस कलियुग की काली काया के प्रदूषित प्रभाव के कारण, आज के समय में अधिकांश रूप में ब्राह्मणत्व नष्ट हो चुका है I

और जबकि पूर्व युगों में भारत ब्राह्मणत्व का दुर्ग ही था, लेकिन आज के स्वतंत्र भारत में, यह ब्राह्मणत्व कुछ वेद मनीषी ही बचा पाए हैं I

ऐसा मैं प्रत्यक्ष रूप सहित, अपनी साधनाओं में देखता भी हूं, कि भारत के बस कुछ ही स्थानों पर, वो पीले वर्ण के प्रकाश के परमाणु धारण किये हुए ब्राह्मण बैठे हैं I

और मुझे वो ब्राह्मणगण भी इतने ही दिखाई देते हैं, कि उनको मैं उँगलियों पर ही गिन सकता हूं I

और इन थोड़े से ब्राह्मणत्व धारी ब्राह्मणों के अतिरिक्त, बाकि सभी ब्राह्मणगण, कलियुगी प्रपंचों में चले गए है और अपना ही नहीं, बल्कि अपनी कई पीढ़ियों तक का ब्राह्मणत्व अपने पारिवारिक संस्कारों के दृष्टिकोण से ही नष्ट कर बैठे है I

आज के समय पर, भारत के अधिकांश स्थानों पर तो बनिए ही ब्रह्माण्ड कहलाए जाते हैं I

और यह आज के अधिकांश ब्राह्मण कहलाए जाने वाले वेद मनीषि, इतने भ्रष्ट हो गए हैं, कि यह मूल और गंतव्य, दोनों के ही व्यापारी होके रह गए हैं I

 

किसी भी उत्कर्ष मार्ग में …,

मूल में योग होता है और गंतव्य में ज्ञान या वेद I

न तो मूल का कोई मूल होता है, और न ही गंतव्य का कोई और गंतव्य ही है I

इसलिए, मेरे पुरातन कालों के जन्मों में, वेद और योग परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए, वेद मनीषि ही कहते थे, कि …

न तो मूल का व्यापार हो सकता है…, और न ही गंतव्य का I

जो मूल या गंतव्य का व्यापारी हो जाएगा, वो अपने ब्राह्मणत्व को ही खो देगा I

 

और ऐसा मनीषी…,

धर्म में दिखाई देता हुआ भी, ब्रह्मांडीय दिव्यताओं में अधर्मी ही कहलाएगा I

इसलिए, यहाँ बताया गया बिंदु, ब्राह्मणत्व सुरक्षा बिंदु ही है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

ऐसा होने के कारण, आज के समय पर वैदिक मंदिरों की परंपराएं भी नष्ट सी ही प्रतीत होती है I

 

लेकिन यही तो होगा जब…,

धर्म दुर्गों को ही धर्म निरपेक्ष स्वरूप में लाने की चेष्टा करी जाएगी I

और धर्म बिंदुओं को ही धर्म निरपेक्ष स्वरूप में ख्यापित करने का प्रयास होगा I

और यह भी वो कारण है, कि उस अनादि वेद परंपरा के दृष्टिकोण से …

भारत स्वतंत्र सा प्रतीत होते हुए भी, वास्तव में स्वतंत्र नहीं है I

और ऐसा होने के कारण, यह स्वतंत्र सा दिखता हुआ भारत कलियुग के संविधानों को धारण भी किया हुआ है I और स्वतंत्र दिखाई देते हुए भारत का तो संविधान भी उसकी अनादी परम्पराओं के विरुद्ध ही है I

 

अब ध्यान देना …

धर्म कभी भी स्वयं से निरपेक्ष नहीं हो सकता I

इसलिए, धर्मनिरपेक्ष नामक शब्द ही अधर्म का द्योतक है I

और इस अधर्म की ओर वो विधर्म नामक मार्ग से ही लेकर जाता है I

 

क्यूंकि पुरुषार्थ चतुष्टय में, मूल बिंदु धर्म ही होता है, इसलिए धर्म का ऐसा होने के कारण, अन्य तीनों पुरूषार्थ, जो अर्थ, काम और मोक्ष हैं, वो भी धर्म निरपेक्ष मार्गों से न तो स्थापित किये जा सकते हैं और न ही ख्यापित ही किये जा सकते हैं I

और जब चारों पुरुषार्थ का मूल, जो धर्म है, वही स्वयं से निरपेक्ष हो जाता है, तब ऐसे होने के पृथ्वी के एक डिग्री अग्रगमन के पश्चात ही वो विप्लव आता है, जो पृथक स्वरूपों में दिखाई देता हुआ भी, अंततः गुरु युग की नींव को इस संपूर्ण विश्व में डालने की ओर लेके जाता है I

क्यूंकि इस बिंदु का लेना देना केवल भारत खंड से ही है, इसलिए जिस समय से भारत का संविधान पूर्ण रूपेण गणतंत्र हुआ था, उसी समय से एक डिग्री अग्रगमन को जोड़कर, इस गुरु युग की ओर लेके जाने वाली प्रक्रिया के प्रारंभ को जाना जा सकता है I

 

तो अब इस समय के प्रारंभ समय के गणित में जाता हूँ …

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 में लाया गया था, अर्थात 1950.07 ईस्वी I

उस समय में एक डिग्री अग्रगमन 71.6 वर्षों का था I

 

तो भारतीय संविधान के अनुसार, उस गुरुयुग को चलित करने की प्रक्रिया जब प्रारम्भ हुई थी, अब उसका गणित करता हूँ …

1950.07 + 71.6 = 2021.67 ईस्वी I

इस समय तक यह प्रक्रिया चलित हो चुकी थी I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन भारत 15 अगस्त 1947 ईस्वी में ही स्वतंत्र हुआ था, अर्थात 1947.62 ईस्वी I

इसलिए, स्वतंत्रता दिवस से गणतंत्र दिवस तक का समय 2.44 वर्षों का था I

 

और क्यूंकि भारत के स्वतंत्र होने से और गणतंत्र बनने के मध्य में ही यह समय चलित हुआ था, इसलिए अब इस समय को निकालता हूँ I

1947.62 ईस्वी + (2.44/2) + 71.6 = 2020.44 ईस्वी, अर्थात 8-9 मई 2020 ईस्वी I

लेकिन कालचक्र विज्ञान से इसका समय 2020.24 ईस्वी का आता है, अर्थात 27-28 फरवरी, 2020 ईस्वी I

और यही समय था, जब इस विश्व को सनातन की ओर परिवर्तित करने हेतु, और उसका अधर्म, विकृत अर्थ, काम युक्त काम नष्ट करने हेतु वो महामारी आई थी I

 

और यह समय जब अपने चरम पर पहुंचेगा, तो वो दशा इस कालखंड में होगी …

2021.67 ईस्वी + (71.6/10) = 2028.83 ईस्वी I

लेकिन कालचक्र विज्ञान से इसका समय 2028.74 ईस्वी का आता है I

 

सद्योजात ब्रह्म से प्राप्त एक भविष्यवाणी, … आगामी गुरुयुग की संस्थापना, … गुरु युग की नींव डालने का समय, …

आगामी कुछ ही समय में आने वाला कालखण्ड, जो इस त्रिभुवन को उस गुरुयुग की ओर लेके जाएगा, और जो वैदिक युग कहलाता है और जिसकी नींव (अर्थात जिसका आधार) कुछ ही वर्षों में, कलियुग स्तम्भित होने के पश्चात ही डाली जाएगी, उसमें आज के भारत का संविधान भी बदला जाएगा I

और ऐसे बदले जाने के पश्चात, वो आगामी सम्विधान वेद विरोधी भी नहीं होगा, जिसके कारण वो संविधान वैदिक संप्रदायों में बसकर, वेद परंपरा के अनुसार ही होगा I

कालचक्र विज्ञान में सनातन की नींव जब इस धरा पर डाली जानी है, वो समय, 2026 ईस्वी की 04-05 जनवरी से लेकर 2031, की 14-15 मई तक का है, अर्थात ऊपर बताए गए 2028.74 ईस्वी से 2.7 वर्षों के भीतर I

और इसी समय खंड के भीतर, वो सनातन की नीव इस धरा पर डाली भी जाएगी और भारतीय संविधान बदलने का मत भी बनेगा I

 

सद्योजात और पुरुषार्थ चायुष्टय, … पुरुषार्थ चतुष्टय का सद्योजात ब्रह्म से नाता, … धर्म अर्थ काम मोक्ष का सद्योजात ब्रह्म से नाता, … धर्म की परिभाषा, अर्थ की परिभाषा, काम की परिभाषा, मोक्ष की स्थिति, …

तो अब पञ्च ब्रह्मोपनिषद के सद्योजात ब्रह्म का पुरुषार्थ चतुष्टय, या चार पुरुषार्थ से नाता बताता हूँ I

लेकिन, यहाँ जो बताया जा रहा है, उसका साक्षात्कार पञ्च मुखी सदाशिव के सद्योजात मुख में ही होता है, और जो ब्रह्मलोक भी कहलाता है और जिसका सीधा नाता, पञ्च ब्रह्मोपनिषद के सद्योजात से भी है I

इसलिए जबकि यह ज्ञान बिंदु, पञ्च ब्रह्मपोनिशद के सद्योजात नामक ब्रह्म में साक्षात्कार नहीं होता है, और यह पञ्च मुखा सदाशिव के सद्योजात नामक मुख में ही साक्षात्कार होता है, लेकिन तब भी इसको यहीं पर बताया जा रहा है I

पञ्च मुखा सदाशिव का सद्योजात मुख, जो ब्रह्मलोक भी कहलाता है, उसमें 20 लोक होते हैं I इसका अर्थ हुआ, कि वैदिक ब्रह्मलोक एक लोक नहीं है, बल्कि 20 लोकों का समूह है I

ब्रह्मलोक के 20 लोकों में से, सोलह लोक नीचे के होते हैं, जो सोलह कलाएं दर्शाते हैं I

और उसी ब्रह्मलोक में, चार लोक ऊपर के होते हैं, जो पुरुषार्थ चतुष्टय दर्शाते हैं I इन लोकों के बारे में एक बाद के अध्याय में बात होगी I

चार पुरुषार्थ होते हैं, जिनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहा गया है I

तो अब इनको परिभाषित करता हूँ …

 

  • सद्योजात और धर्म शब्द की मूल परिभाषा, धर्म पुरुषार्थ की परिभाषा, …

क्यूंकि अपने सगुण निराकार स्वरूप में, सद्योजात धर्म दुर्ग भी है, इसलिए इसी अध्याय में धर्म की मूल परिभाषा को बताया जा रहा है …

 

तो अब ध्यान देना …

वो गुण अनादि कालों से अनादि कालों तक, प्रत्येक जीव और समस्त जगत से साथ परस्पर और सामान रूप में बना रहता है, वही गुण उस जीव का और जगत के उस भाग का धर्म कहलाता है I

 

और यही कारण है, की …

धर्म भी उतना ही सनातन है, जितना सनातन ब्रह्म है I

 

और क्यूँकि ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, वेद परंपरा ही धर्म कहलाती है, और क्यूंकि वेद परंपरा, अपने मूल से योग की और अपने गंतव्य से ज्ञान की है, इसलिए वेद भी उतना ही सनातन है, जितने सनातन ब्रह्म हैं I

 

  • सद्योजात और अर्थ शब्द की मूल परिभाषा, अर्थ पुरुषार्थ की परिभाषा, …

सद्योजात का नाता पुरुषार्थ चतुष्टय के अर्थ पुरुषार्थ से भी होता है I

 

तो अब अर्थ शब्द को परिभाषित करता हूँ …

वो जो प्रकृति के समस्त बिंदुओं में पूर्णरूपेण और समानरूपेण बासकर, उत्कर्षमार्ग के रूप में परिलक्षित होता है और उत्कर्षगति पर जाने की क्षमता प्रदान करता है, वही जीव जगत का अर्थ कहलाता है I

 

इस परिभाषा के अनुसार …

त्रिगुण सहित, समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकर, पुरुषार्थ चतुष्टय का अर्थ ही हैं I

 

और क्यूंकि वेदों में बताई गई प्रकृति ही …

ब्रह्म की प्रथम और पूर्ण अभिव्यक्ति, शक्ति, अर्धांगनी, दिव्यता और दूती है I

 

इसलिए…,

अपने मूल रूप में प्रकृति भी उतनी ही सनातन है, जितना सनातन ब्रह्म है I

 

और क्यूँकि अर्थ पुरुषार्थ का नाता प्रकृति से ही है, इसलिए पुरुषार्थ चतुष्टय में कहे गए अर्थ का नाता भी ऊपर बताई गई प्रकृति से होने के कारण, अर्थ पुरुषार्थ भी एक सनातन बिंदु ही है I

यही कारण है, कि जब अर्थ जो प्रकृति का ही अंग है, अपनी विकृत गति से प्रकृति के परिकरों को ही प्रदूषित करने लगता है, तब प्रकृति इस सनातन अर्थ पुरुषार्थ को विशुद्ध करने हेतु, विकराल और प्रलयंकारी स्वरूप को धारण कर लेती है I

और क्यूंकि वो प्रकृति जिसकी बात यहाँ हो रही है और जो जीव और जगत स्वरूप में प्रतिष्ठित होती है, इसलिए वह ही तो जीवों के भीतर भी है और जहाँ जीव शब्द देवताओं से भी जुड़ा होता है, इसलिए इस गुरु युग की नींव डालने की प्रक्रिया में, प्रकृति का ऐसा विकराल स्वरूप, प्राकृतिक विप्लव, मानव द्वारा लाए जाने वाले विप्लव और दैविक विप्लवों के स्वरूप में भी होगा I

और यह विकराल स्वरुप ही तो उस आगामी गुरुयुग के नींव डालने के समय से पूर्व कालों में प्रारम्भ होना है I

और क्यूंकि कलयुग में, पुरुषार्थ चतुष्टय में, केवल अर्थ ही होता है, इसलिए इस विप्लव का मूल स्वरूप भी अर्थ पुरुषार्थ के अंतर्गत और अनुसार ही दिखाई देगा I

बहार से यह विप्लव का कारण कुछ भी प्रतीत हो रहा हो, लेकिन इसका वास्तविक कारण अर्थ पुरुषार्थ के ही अन्तर्गत होगा I और यही कारण है, कि इसके मूल में अर्थ का खंडित और कुछ सीमा में अचलित होना ही होगा I

और यह भी वो कारण है, कि उस मानव जनित विप्लव (जैसे कलह कलेश, अंतर्विग्रह, विद्रोह, युद्धादि) के आने से पूर्व, मानव जाती का अर्थ जो कलियुग का एकमात्र पुरुषार्थ है, उसको ही स्थम्बित किया जाएगा, क्यूंकि पुरुषार्थ विहीन होकर ही मानव जाति उस युग स्तम्भित प्रक्रिया में पूर्णरूपेण जा पाएगी और उसको पूर्णरूपेण जान पाएगी…, कि वो क्या बला है I

और क्यूँकि प्रकृति ही अर्थ पुरुषार्थ है, जिसमें समस्त जीव जगत बसे होते हैं, इसलिए जब अर्थ विकृत होगा, तो मानव के भीतर और बाहर, दोनों ओर की प्रकृति खंडित रूप में ही सही (अर्थात कभी इस स्थान पर और कभी उस स्थान पर) लेकिन शनैः शनैः विकराल रूप में आएगी ही और आती ही चली जाएगी I

 

  • सद्योजात और काम शब्द की मूल परिभाषा, काम पुरुषार्थ की परिभाषा, …

सद्योजात का नाता पुरुषार्थ चतुष्टय के काम पुरुषार्थ से भी होता है I

 

तो अब काम शब्द को परिभाषित करता हूँ …

वो काम जो निष्काम नहीं होता, वो पुरुषार्थ चतुष्टय का काम नहीं होता I

 

इस परिभाषा के अनुसार …

पुरुषार्थ चतुष्टय का काम वो होता है, जो निष्काम होता है I

 

लेकिन कलियुग के कालखंडों में, ऐसा काम होता ही नहीं है I

इसलिए कलियुग में, काम पुरुषार्थ का आभाव ही होता है I

और विकृत काम होने के कारण, कलियुग के कालखंडों में विकृत काम ही सभी प्रकार के कलह कलेश का कारण, समय समय पर बनता ही रहता है I

काम के उत्कृष्ट स्वरूप से ही, अर्थात निष्काम स्वरूप से ही मोक्ष मार्ग प्रशश्त होता है ी इसलिए जब काम ही विकृत हो जाए, तो मोक्ष मार्ग भी नहीं रह पाता और ऐसी दशा में जीवों की अधिकांश रूप में मुक्ति भी नहीं हो पाती I

और कलियुग के कालखंड में, इसी काम पुरुषार्थ के विकृत स्वरूप के कारण, जो मार्ग, किसी न किसी उत्कर्षपथ (या मोक्षमार्ग) स्वरूप में आते भी हैं, उनमें भी वो क्षमता नहीं होती कि वो अपने पथगामियों को मुक्ति लाभ करवा सकें I

 

  • सद्योजात और मोक्ष शब्द की मूल परिभाषा, मोक्ष पुरुषार्थ की परिभाषा, …

सद्योजात का नाता पुरुषार्थ चतुष्टय के मोक्ष पुरुषार्थ से भी होता है I

 

तो अब मोक्ष शब्द को परिभाषित करता हूँ …

जो धर्म, अर्थ, काम और जीव जगत से परे स्वतंत्र सत्ता है, वही मोक्ष पुरुषार्थ है I

 

पर क्यूँकि कलियुग के कालखंड में, धर्म का आभाव होता है, अर्थ विकृत स्वरूप में होता है, और काम तो निष्काम होता ही नहीं है, इसलिए पुरुषार्थ के इन तीन पूर्व के तीन पाद के आभाव में, कलियुग के कालखंड में वो स्वतंत्र सत्ता, जिससे मोक्ष पुरुषार्थ दर्शाता है…, वो नहीं होती I

यही कारण है, कि कलियुग के कालखंड में जितने भी मत या पंथ आदि आते हैं, जबतक वो वैदिक देवी देवताओं सम्बद्ध नहीं होते, उनमें मोक्ष के बिंदु भी नहीं होते हैं I

इसलिए ऐसे सभी कलियुगी मत, उनके मार्ग और ग्रन्थ कहते ही है, कि उनका न्याय (अर्थात मोक्ष) अंत समय पर ही होगा I

और ऐसे कलियुगी मत या पंथ कहते भी हैं, कि उस अंत समय तक, उनको प्रतीक्षा भी करनी होगी I

इन सभी मतों का ऐसे कहने का कारण भी वही है, जो पूर्व में बताया था की जब पुरुषार्थ चतुष्टय के पहले तीन बिंदु, अर्थात धर्म, अर्थ और काम नहीं होंगे, तो चौथा और अंतिम पुरुषार्थ, मोक्ष कैसे रहेगा और उसका मार्ग कैसे प्रशश्त होगा I

 

सद्योजात से जानि हुई कलियुग की विडम्बना, … कलियुग में केवल अर्थ पुरुषार्थ ही शेष रहता है, …

पुरुषार्थ चतुष्टय, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहलाते हैं, उनमें से कलियुगों के कालखंड में, केवल अर्थ ही एकमात्र पुरुषार्थ है, जो अपने एक प्रकृति भक्षी विकृत स्वरूप को धारण करके ही सही, लेकिन कुछ मात्रा में बचा रहता है I

और अन्य तीनों पुरुषार्थ, जो धर्म, काम और मोक्ष कहलाते हैं, वो कलियुग में होते ही नहीं हैं I

 

तो अब इस बिंदु को बताता हूँ …

  • कलियुग में धर्म पुरुषार्थ नहीं होता, … ऐसे होने से धर्म के स्थान पर, विधर्म और अधर्म ही दिखाई देता है I

क्यूंकि धर्म प्रकृति और ब्रह्म (पुरुष) दोनों से ही संबंधित होता है, और क्यूँकि प्रकृति बहुवादी होती हैं और ब्रह्म अद्वैत होते हैं, इसलिए धर्म वो होता है, जो बहुवादी अद्वैत होता है I

 

और क्यूंकि इस समस्त ब्रह्माण्ड में, केवल वैदिक धर्म ही ऐसी बहुवादी अद्वैत परम्परा का धारक है, इसलिए वैदिक धर्म …

मार्ग से बहुवादी होता हुआ भी, गंतव्य में अद्वैत होते है I

 

और इसके कारण, वैदिक धर्म में …

मार्गों का तारतम्य होता हुआ भी, गंतव्य में कोई तारतम्य नहीं होता I

 

और इसके कारण सनातन वैदिक आर्य धर्म में …

परम्पराओं का तारतम्य होता हुआ भी, उनका गंतव्य अद्वैत ब्रह्म ही होता है I

 

और यही कारण है कि वैदिक गोत्र, आश्रम और वर्णाश्रम व्यवस्था में …

कर्मादि बिन्दुओं में भिन्नता होते हुए भी, मोक्ष पर सभी का समान अधिकार है I

 

लेकिन कलियुग के कालखंडों में जो भी मत या पंथ, धर्म के नाम पर आते हैं, वो विकृत और कलेश से युक्य एकवाद (अर्थात Monotheism) के ही होते हैं, इसलिए कलियुग में धर्म का ही अभाव होता है I

और क्यूंकि ऐसे कलियुगी बिंदु, अधर्म या विधर्म या दोनों को ही दर्शाते हैं, इसलिए भी कलियुग के कालखंडों में जितने भी मत या पंथ या ग्रन्थ, धर्म बनकर आते हैं, उनमें अधर्म या विधर्म या दोनों की ही प्रधानता होती है I

 

  • कलियुग में अर्थ पुरुषार्थ होता हुआ भी वास्तव में नहीं होता, कलियुग में अर्थ एक विकृत स्वरूप में होता है, कलियुगी अर्थ का प्रकृति भक्षी स्वरूप, कलियुगी अर्थ प्रकृति को विनाश करके ही आगे बढ़ता है, …

अर्थ जो प्रकृति से जुड़ा होता है, वो कलियुग में अपने विशुद्ध स्वरूप में नहीं होता है I

कलियुग का अर्थ, प्रकृति को विकृत करके ही जाता है, इसलिए कलियुगी अर्थ अपने मूल को ही खंडित करके आगे बढ़ता है और कलियुग का अर्थ, प्रकृति भक्षी ही होता है, अर्थात स्वयं का ही भक्षी  होता है I

और जब ऐसा होता है, तो प्रकृति विकराल स्वरूप धारण करती है, जिसके पश्चात मानव जनित, प्रकृति और दैविक विप्लवों का दौर चालित होता है I

और यह दौर भी समय समय पर, पृथक पृथक स्थानों पर आता ही जाता है और मानव को त्रस्त भी करता ही जाता है I

 

इसलिए…,

कलियुग का विकासवाद, वास्तव में विनाशवाद का ही द्योतक होता है I

इसलिए कलियुगी अर्थ, पुरुषार्थ सा प्रतीत होता हुआ भी, वास्तव में नहीं होता I

 

  • कलियुग में काम पुरुषार्थ नहीं होता, … कलियुग में निष्काम काम नहीं होता, निष्काम काम ही काम पुरुषार्थ है, …

कलियुग में काम पुरुषार्थ अपने विशुद्ध स्वरूप में ही नहीं, बल्कि अपने विकृत स्वरूप में भी नहीं होता है I

इसका कारण है कि कलियुगी मानव हिंसा, लोभ, मोह, मात्सर्य आदि वासनाओं से ग्रसित ही रहता है I और ऐसी दशा में काम अपने पुरुषार्थक निष्काम स्वरूप में रह ही नहीं रह पाता है I

कलियुग में जो काम होता है, वो केवल तीन स्थानों तक ही सीमित रहता है और वो भी अपने अपने अतिविकृत स्वरूप में I यह तीन स्थान मस्तिष्क, पेट और लिंग हैं I

यह कलियुगी काम, मस्तिष्क से लोभ मोह आदि विकृतियों को जन्म देता है, जो मानव जनित त्रासदियों का कारण बनती है I पेट से यह कलियुगी काम जर आदि विकृतियों को जन्म देता है जिससे विभिन्न प्रकार के भौतिक और प्राकृतिक दुःख आते ही रहते हैं I और लिंग से यह विकृत काम दैविक त्रासदियाँ का कारण बनता है I

इसलिए कलियुग के कालखंड में, काम पुरुषार्थ का अति आभाव हो जाता है, जिसके कारण मानव और जीव जाती, त्रिपापों में ही चली जाती है I

 

  • कलियुग में मोक्ष पुरुषार्थ नहीं होता, … कलियुग में मोक्ष पुरुषार्थ का आभाव, …

कलियुग में मोक्ष होता ही नहीं है, इसलिए कलियुग में जितने भी ग्रन्थ, मार्ग, मत या पंथ आते हैं, वो सभी एक सुर से कहते हैं, कि उनका न्याय (अर्थात उनके अनुयायियों की मुक्ति) अंत समय पर ही होगा I

यही प्रमाण है कि कलियुग में मोक्ष नामक पुरुषार्थ होता ही नहीं है I

जब मैं सूक्ष्म आदि लोकों में भ्रमण करता हूँ, तो यह सिद्ध होता है, कि मानव जाति अब मुक्ति को पा ही नहीं रही है I

 

और यह साक्षात्कार मेरा अंतिम प्रमाण था, कि कलियुग जैसे जैसे आगे की ओर चलित होता है, वैसे वैसे वो कलियुग मोक्ष पुरुषार्थ और उसके मार्गों को ही निगलता चला जाता है, जिसके कारण अंततः, कलियुग के कालखंड में, मोक्ष नामक कोई दैविक वस्तु और मुक्तिमार्ग रहता ही नहीं है I

और आज के समय यह विश्व इस स्थिति में पहुंच भी चुका है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन क्यूंकि ब्रह्मा की रचना में, जीवों के प्रादुर्भाव का मूल कारण ही मुक्ति की प्राप्ति था, इसलिए यदि उन जीवों के प्रादुर्भाव के मूल कारण, अर्थात मुक्ति से ही उन जीवों को वंचित कर दोगे, तो जिस भी युग में ऐसा होगा…, उस युग का स्तम्भित होना अनिवार्य ही हो जाता है I

यही कारण है, कि इस मुक्ति पुरुषार्थ के आभाव के कारण ही, अभी का कलियुग, स्तम्भित होगा…, और कुछ वर्षों के अंतराल में ही होगा I

और इस कलियुग के स्तम्भित समय के समीप ही, उस गुरु युग को प्रकाशित भी किया जाएगा, जिसके बीज का धारक इस धरा पर जन्म भी ले चुका है और अभी के समय पर, वो एकांत में मानव जाती के विकृत शोरगुल से सुदूर बैठ कर, शांत चित्त होकर बैठा हुआ, काल की प्रेरणा की प्रतीक्षा कर रहा है I

तो अब इस बिंदु पर, मैं इस अध्याय को समाप्त करके, अगले अध्याय पर जाता  हूँ, जिसमें महाब्रह्माण्ड पर बात होगी I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

 

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