मकार और माँ सावित्री, ओ३म् का तीसरा बीज, त्रिदेव, त्रिदेवी, हरिहरब्रह्मा, शुद्ध चेतन तत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, ॐ तत् सत्, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, सगुण शिव, ब्रह्मनाद, प्रणव, भ्रामरी

मकार और माँ सावित्री, ओ३म् का तीसरा बीज, त्रिदेव, त्रिदेवी, हरिहरब्रह्मा, शुद्ध चेतन तत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, ॐ तत् सत्, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, सगुण शिव, ब्रह्मनाद, प्रणव, भ्रामरी

यहाँ पर मकार पर बात होगी, जिसका शब्द है, इसलिए इसको शब्द (म शब्द) भी कहा जा सकता है I मकार ही त्रिदेव, ईश्वर, आदित्य (सूर्य) और प्राज्ञ को दर्शाता है I मकार का साक्षात्कार लिंगात्मक स्वरूप में ही होता है, जो त्रिलिंग या त्रिदेव लिंग स्वरूप में होता है, और जहां त्रिदेव, अर्धनारीश्वर लिंग, विष्णु लिंग और आदित्य लिंग (सूर्य लिंग) के स्वरूपों में होते हैं I मकार का साक्षात्कार, ब्रह्मतत्त्व के भीतर होता है, जो अति प्रकाशमान पीले रंग का (अर्थात सुनहरा) होता है I ब्रह्मतत्त्व ही प्रणव, शुद्ध चेतन तत्त्व और सगुण शिव भी कहलाया था I यही हरिहरब्रह्मा है, अर्थात मकार ही हरि हर और ब्रह्मा (अर्थात ब्रह्मा विष्णु महेश) की योगावस्था है I

इस अध्याय में, मकार और ब्रह्मतत्त्व दोनों को ही बतलाया गया है I लेकिन यह दोनों (अर्थात मकार और ब्रह्मतत्त्व) पृथक अवस्थाएँ ही होती है I पर क्यूँकि ब्रह्मतत्त्व, मकार और मकार से आगे ॐ के मध्य में होता है और क्यूँकि ब्रह्मतत्त्व के प्रकाश के भीतर ही मकार और ॐ, दोनों का साक्षात्कार होता है, इसलिए इसी अध्याय में, इन दोनों को (अर्थात मकार और ब्रह्मतत्त्व को) बताया गया है I वैसे तो मकार और ब्रह्मतत्त्व के दो पृथक अध्याय होने चाहिए थे, लेकिन तब भी इन दोनों को इसी अध्याय में डाला गया है I

यहाँ बताया गया साक्षात्कार, 2011 ईस्वी के प्रारंभ की बात है, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर, अन्ना हज़ारे का अभियान, बस होने ही वाला था ।

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प (Brahma Kalpa) में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का साठवाँ अध्याय है, इसलिए, जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, ओ३म् सावित्री मार्ग की श्रृंखला का सातवां अध्याय है।

 

मकार त्रिदेव, ओ३म् का तीसरा बीज, हरिहरब्रह्मा, शुद्ध चेतन तत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, ॐ तत् सत्, ईश्वर
मकार त्रिदेव, ओ३म् का तीसरा बीज, हरिहरब्रह्मा, शुद्ध चेतन तत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, ॐ तत् सत्, ईश्वर

 

मकार और ब्रह्मतत्त्व की योग दशा … ब्रह्मतत्त्व क्या है?, … प्रणव कौन?, … शुद्ध चेतन तत्त्व क्या है?, … ईश्वर …

मकार की दशा एक बहुत प्रकाशमान पीले रंग की अवस्था के भीतर साक्षात्कार होती है I

यह पीले रंग का निराकार प्रकाश जिसके भीतर मकार का साक्षात्कार होता है, वो ही ब्रह्मतत्त्व है, और यही सगुण शिव और प्रणव कहलाया था I ब्रह्मतत्त्व को शुद्ध चेतन तत्त्व भी कहा जाता है, और जो प्रकृति और पुरुष के प्राथमिक योग को भी दर्शाता है I

प्रणव में ही पुरुष और प्रकृति का योग होता है, इसलिए कुछ वेद मनीषीयों द्वारा, सगुण शिव (या ब्रह्मतत्त्व या प्रणव) से ही पुरुष और प्रकृति का स्वयंउदय बताया गया है I वो पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति के लिंग रूप में, अर्थात अर्धनारीश्वर लिंग रूप में, सगुण शिव (या ब्रह्मतत्त्व या प्रणव) में बसे होते है और साधकों द्वारा इसी अवस्था में ही साक्षात्कार होंगे I

क्यूंकि प्रणव में ही पुरुष और प्रकृति का प्राथमिक योग होता है, इसलिए प्रणव पुरुष है और प्रणव प्रकृति है I यही कारण है, कि कुछ वेद मनीषी ऐसा ही मानते हैं, कि प्रणव ही पुरुष और प्रकृति है I

कुछ योगीजन, प्रणव को पुरुष स्वरूप में मानते हैं, और कुछ ने तो प्रणव को शक्ति स्वरूप (अर्थात प्रकृति) भी कहा है , और ऐसे मनीषी यह भी कहते हैं, कि प्रकृति अतिसूक्ष्म होती है और पीले वर्ण की होती है, और जहाँ ऐसे मनीषीयों द्वारा बताई गई पीले रंग की प्रकृति, प्रणव ही है I

वैसे तो ब्रह्मतत्त्व के भीतर ॐ का साक्षात्कार भी होता है, और इस साक्षात्कार में ॐ, ब्रह्म का शब्दात्मक और लिपिलिंगात्मक स्वरूप भी होता है I लेकिन ऐसा होने के बाद भी, ॐ प्रणव से पृथक ही है, क्यूंकि ॐ का साक्षात्कार प्रणव से आगे जाकर ही होता है I

प्रणव से आगे जाकर ही ॐ का साक्षात्कार होता है, और ऐसे साक्षात्कार में वो ॐ भी प्रणव के प्रकाश में ही बसा हुआ पाया जाता है I

मकार से ही ॐ को जाया जाता है, अर्थात मकार को पार करके ही ॐ साक्षात्कार होता है I इसलिए जो ओम द्रष्टा योगीजन हैं, वो मकार और ओम के मध्य की दशा को ही ब्रह्मतत्त्व कहते हैं, और जहाँ वो ब्रह्मतत्त्व, अतिसूक्ष्म और अतिप्रकाशमान, पीले वर्ण की दशा ही होती है I

जबकि ब्रह्मतत्त्व, मकार और ॐ के मध्य की दशा है, लेकिन ब्रह्मतत्त्व का विस्तार, मकार से लेकर, मकार से आगे जो ॐ है, उस ॐ तक होता होता है I और ॐ का चिन्ह, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष के भीतर जाकर ही साक्षात्कार होता है,  उसको भी इसी ब्रह्मतत्त्व ने घेरा होता है I

जब योगी की जीवात्मा, इस ब्रह्मतत्व से परे जो ॐ का चिन्ह है, उसमें जाती है, तब वह जीवात्मा ॐ साक्षात्कार के पश्चात, ॐ के लिपिलिंगात्मक चिंन्ह के ऊपर के बिन्दु में विलीन हो जाती है I ऐसी दशा में ही वो योगी की चेतना, स्वयं ही स्वयं को नहीं देख पाती है I लेकिन इस बिंदु के बारे में, एक बाद के अध्याय में, जिसका नाम ॐ ही होगा, उसमें बताया जाएगा I

यही कारण है, कि पुरातन योगमनीषी (और वेदमनीषी भी) कहते थे, कि मकार और ॐ के बीच में और इन दोनों को घेरे हुए जो तत्त्व होता है, वो ब्रह्मतत्त्व है I ऐसा कहने का कारण था, की ब्रह्मतत्त्व जो मकार और ॐ के मध्य की दशा में बसा होता है, उसके प्रकाश और ऊर्जा ने ही मकार और ॐ, दोनों को घेरा हुआ होता है I

ब्रह्मतत्त्व में मकार अपने त्रिलिंग (या त्रिमणि) स्वरूप में बसा होता है I और इसी ब्रह्मतत्त्व में ॐ अपने शब्द और चिंन्ह, दोनों रूपों में बसा होता है, अर्थात इस ब्रह्मतत्त्व में ही, ॐ का शब्दात्मक और उसी ॐ का लिपिलिंगात्मक बसा हुआ होता है I

ब्रह्मतत्त्व की दशा एक बहुत ऊर्जावान और प्रकाशवान पीले रंग की अवस्था है, जो निराकार भी है और सगुण भी है, इसलिए मकार, सगुण निराकार ब्रह्म को भी दर्शाता है I

अब आगे बढ़ता हूँ, और इसी को शैव और ब्रह्म मार्ग के एकसार से बताता हूँ I

 

सगुण शिव कौन हैं?, … सगुण निराकार ब्रह्म कौन?, … मकार और त्रिदेव … मकार और त्रिदेवी …

मेरे पूर्व जन्मों के उत्कृष्ट योगीजन कहते थे, कि …

  • परमशिव जो निर्गुण हैं, उनसे सगुण शिव का हुआ था I
  • सगुण शिव के स्वयंप्रादुर्भाव के समय वो निराकार ही था, इसलिए सगुण निराकार शिव ही था I
  • और उन सगुण शिव से प्रकृति और पुरुष का स्वयंप्रादुर्भाव हुआ था I
  • और उन प्रकृति और पुरुष की निष्काम योगावस्था से, समस्त जीव जगत का प्रादुर्भाव हुआ था I
  • और उस सगुण निराकार से ही सगुण साकार का प्रादुर्भाव हुआ था I

 

लेकिन यह सभी बिंदु तो यहां बताए जा रहे ओम मार्ग के ही है, इसलिए अब इनको ॐ मार्ग से बताता हूँ I

  • ॐ ही ब्रह्म है, जो निर्गुण निराकार कहलाता है I
  • उस ॐ से ब्रह्मतत्त्व का प्रादुर्भाव हुआ था, जो सगुण निराकार ब्रह्म की अवस्था का ही एक अंग है I
  • और उस ब्रह्मतत्त्व से त्रिदेव अपनी शक्ति (या अर्धांगनी या दिव्यता या त्रिदेवी) के साथ, अपने-अपने लिंग रूप में स्वयंप्रकट हुए थे I
  • त्रिदेव और त्रिदेवी का एकसार ही मकार है I मकार में त्रिदेव ही त्रिदेवी हैं, और त्रिदेवी ही त्रिदेव I

 

तो अब इन दोनों तथ्यों के एकसार को जानते हैं …

  • वो निर्गुण शिव, निर्गुण निराकार ब्रह्म ही है, जो ॐ कहलाता है, क्यूंकि ॐ ही उन निर्गुण ब्रह्म का लिपिलिंग और शब्द्लिंग है I

और शैव मार्ग में, यहाँ कहे गए निर्गुण निराकार ब्रह्म को ही परमशिव कहा गया है I

  • उस ॐ रूपी निर्गुण ब्रह्म ने जब स्वयं को तत्त्व स्वरूप में अभिव्यक्त किया था, तो वो ही ब्रह्मतत्त्व रूप में प्रकाशित हुआ था, जो उस ॐ रूपी निर्गुण ब्रह्म का ही सगुण निराकार स्वरूप है I

और इसी को शैव मार्ग में सगुण शिव कहा गया है I

  • और उसी तत्त्व ब्रह्म (या ब्रह्मतत्त्व) से त्रिदेव का स्वयंप्रादुर्भाव हुआ था, और वो भी उनकी दिव्यता (अर्थात अर्धांगिनि या शक्ति) के साथ I यही अवस्था को मकार कहा गया है, क्यूंकि इसका शब्द म नाद ही था I

और यह अवस्था त्रिदेव और त्रिदेवी की अद्वैत योगवास्था को भी दर्शाती है, क्यूंकि इसमें त्रिदेव और त्रिदेवी एकरूप होके, उनके ही प्रकाशमान लिंगात्मक स्वरूप में हैं I

ऐसी त्रिदेव और त्रिदेवी की योगावस्था होने के कारण, शैव मार्ग में इसी मकार को पुरुष और प्रकृति कहा गया है I

 

हरिहरब्रह्मा, … महासरस्वती महापार्वति महालक्ष्मी, … मकार और सावित्री सरस्वती …

अबतक बताए गए तथ्यों से आगे बढ़ता हूँ …

क्यूंकि मकार त्रिदेव ही है, इसलिए इस मकार को ही ब्रह्मा विष्णु महेश की योगावस्था (अर्थात हरिहरब्रह्मा) भी कहा जाता है, क्यूंकि मकार में हरी ही हर हैं, और हर ही वो ब्रह्मा हैं, जो सूर्य (या आदित्य) रूप में हैं I

  • और क्यूंकि मकार में ही त्रिदेवी का योग हुआ है, इसलिए मकार ही महालक्ष्मी, महापार्वति और महासरस्वती की योगावस्था भी है I
  • लेकिन इन तीनों देवियों की योगावस्था तो माँ सावित्री सरस्वती में ही होती है, इसलिए मकार की देवी भी माँ सावित्री विद्या ही हैं I

यही कारण है, कि पूर्व में बतलाए गए ॐ के अकार और उकार नामक भागों के सामान, मकार भी देवी सावित्री से ही जुड़ा हुआ है I

इसलिए ॐ के तृतीय बीज मकार में, जो दिव्यता प्रकाशित हो रही है, वो सावित्री सरस्वती (या सावित्री विद्या) की ही है I

 

मकार साक्षात्कार का स्थान

मकार का साक्षात्कार भी मस्तिष्क के भीतर बसे हुए ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में होता है I

जब योगी ब्रह्मरंध्र के विजयानमय कोश में स्थित होके, आकार और उकार का साक्षात्कार पूर्ण रूप से कर लेता है, तो उस योगी की चेतना अपने आप ही उकार से भी आगे (या ऊपर) को जाती है I

ॐ साक्षात्कार के मार्ग में, उकार से आगे (या ऊपर) की दशा ही मकार है I

वैसे एक बात बता दूं, कि जैसे जैसे योगी की चेतना अकार से उकार और उकार से मकार को जाती है, वैसे वैसे सूक्ष्मता और प्रकाश भी बढ़ता ही चला जाता है I

और जैसे जैसे ऐसा होता है, वैसे वैसे उन ऊपर (या आगे) की दशाओं की ऊर्जा भी बढ़ती ही चली जाती है I

और जैसे जैसे ऐसा होता है, वैसे वैसे उन दशाओं में साधक की गति भी बढ़ती ही चली जाती है I

 

मकार क्या है, … मकार का त्रिदेव स्वरूप, मकार का त्रिलिंग स्वरूप, मकार का त्रिमणि स्वरूप … त्रिलिंग, त्रिदेव लिंग, त्रिदेव का लिंगात्मक स्वरूप, … 

मकार की दशा में तीन मणि होती हैं I

यह तीन मणि, त्रिदेव के सूचक हैं I यही मणि त्रिदेव और त्रिदेवी की अद्वैत योगावस्था की भी सूचक हैं, जिसमें देव ही देवी है और देवी ही देव I

और इस ग्रन्थ में यह त्रिलिंग और त्रिदेवलिंग से भी कहे गए हैं, क्यूंकि यह तीन मणि त्रिदेव का लिंगात्मक स्वरूप ही हैं I यही त्रिदेवीलिंग भी कहे जा सकते हैं, क्यूंकि इनकी शक्ति त्रिदेवी ही हैं I

 

अब इन तीन मणियों के बारे में बतलाता हूँ, जो ऊपर के चित्र में दिखाए गए हैं…

  • शिव शक्ति मणि, शिव शक्ति का लिंगात्मक स्वरूप, अर्धनारिश्वर मणि, अर्धनारिश्वर लिंग … ऊपर के चित्र में बाएं हाथ वाली मणि, शिव और शक्ति की योगावस्था को दर्शाती है I इसमें शिव शक्ति अपने अर्धनारीश्वर स्वरूप में होते हैं, और जहाँ शिव ही शक्ति हैं और शक्ति ही शिव हैं I इस मणि में, नीले वर्ण में शिव हैं, और श्वेत वर्ण में शक्ति हैं I

शिव का अर्थ होता है, सर्वकल्याणकारी सत्ता, और शक्ति उस सर्वकल्याणकारी शिव की सर्वव्याप्त शक्ति या दिव्यता है I

समस्त जीवों के परमगुरु, शिव हैं…, और उन शिव की कल्याणकारी दिव्यता ही शक्ति कहलाती हैं I इसलिए इस चित्र में दिखाए गए शिव शक्ति के मणि या लिंग स्वरूप को, कल्याणकारी लिंग (शिव शक्ति की कल्याणकारी लिंगावस्था) भी कहा जा सकता है I

शक्ति अपने मूल रूप में मूल प्रकृति हैं, दुर्गा हैं I दुर्गा शब्द का अर्थ होता है, सर्वदशा और सर्वदिशा स्थित अपराजिता शक्ति और प्रकृति रूप में दुर्गा, मूल शक्ति ही होती हैं I

वास्तव में तो यह मणि, इन तीनों मणियों के बीच में होती है, लेकिन जब चेतना इस मणि के पास पहुंची थी, तो इस मणि ने कहा था, कि उसको बीच में नहीं दिखाना, और इन तीन मणियों के बीच में नीली मणि दिखानी है I

इसलिए इस चित्र में, इस मणि को बाएं हाथ पर दिखलाया गया है I लेकिन वास्तव में यह मणि बीच में होती है I

लेकिन, निर्गुणयान (अद्वैतयान) में बसे हुए साधक को इस मणि का मार्ग, शिवरंध्र में स्थापित कर देता है I

निर्गुणयान (अद्वैतयान) के बारे में, एक बाद के अध्याय में बात होगी, जब कपाल के पंचरंध्र को बताया जाएगा I

 

  • विष्णु मणि, विष्णुलिंग … बीच की मणि जो बहुत ही सुन्दर से नीले वर्ण की है, वह श्री विष्णु को दर्शाती है, जो समस्त जीवों के सनातन गुरु हैं और जिनकी गुरुगद्दीयाँ आम्नाय पीठ कहलाती हैं I

वास्तव में तो यह नील मणि बाए हाथ पे होती है, लेकिन शिव शक्ति की मणि के आदेश के कारण, इसे बीच में ही दिखलाया गया है I

लेकिन, निर्गुणयान (अद्वैतयान) में बसे हुए साधक को इस मणि का मार्ग, विष्णुरंध्र में स्थापित कर देता है I

 

  • हिरण्यगर्भ मणि, हिरण्यगर्भ लिंग, आदित्य मणि, आदित्यलिंग, दायें हाथ पर सुनहरे वर्ण की मणि होती है I

यह पितामह ब्रह्मा का वास्तविक हिरण्यगर्भ स्वरूप है, जिसमें लाल रंग का रजोगुण नहीं होता I और ऐसी दशा में यही मणि आदित्य (सूर्य) को भी दर्शाती है I

जब पितामह ब्रह्मा रजोगुणी नहीं होते, तो उन्हें हिरण्यगर्भ कहा जाता है I चित्र में दाएं हाथ की ओर दिखाई गई सुनहरे वर्ण की मणि, इन्ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म को दर्शा रही है, और वो भी उन हिरण्यगर्भ के आदित्य (सूर्य) स्वरूप में I

और जब हिरण्यगर्भ, लाल रंग के रजोगुण को धारण करते हैं, तो वो कार्य ब्रह्म, अर्थात सृष्टिकर्ता या जीव जगत के रचैता कहलाते हैं I उन्ही कार्य ब्रह्म को उकार के अध्याय के चित्र में बताया गया था I

इसीलिए पुराणों में पितामह ब्रह्मा को लाल रंग का और रजोगुणी कहा गया है I लेकिन पुराणों में बतलाया गया यह स्वरूप, कार्य ब्रह्म का है, अर्थात ब्रह्मा जी के सृष्टिकर्ता स्वरूप का है I

इस मणि के भीतर एक हीरे जैसे प्रकाश होता है, जो ब्रह्मलोक को दर्शाता है I यही कारण है, कि वैदिक मनीषी कह गए…, सूर्य से सीधा मार्ग ब्रह्मलोक को जाता है I और क्यूंकि यही वेदांत (ब्रह्मसूत्र) का ब्रह्मलोक को लेके जाने वाला मार्ग भी है, इसलिए यह मार्ग भी अद्वैतयान (अर्थात निर्गुणयान) का अंग है I

ब्रह्मलोक के बारे में एक बाद के अध्याय में बतलाऊँगा, जब पञ्च मुखा सदाशिव का वर्णन होगा I

 

मकार और हरिहरब्रह्मा योगावस्था … मकार और त्रिदेव की योगावसथा … ब्रह्मनाद …

ऊपर बतलाए गए तथ्यों के अनुसार, मकार ही हरिहरब्रह्मा योगावस्था को दर्शाता है I लेकिन इस योगावस्था में …

  • हरि … मध्य में दिखाई गई की नीली मणि के स्वरूप में हैं I
  • हर … बाएं हाथ पर दिखाई गई नीली और श्वेत मणि स्वरूप में हैं, जिसमें शिव ही शक्ति हैं, और शक्ति ही शिव हैं I
  • ब्रह्मा … दाएं हाथ की सुनहरी मणि के रूप में हैं, जो उन्ही पितामह ब्रह्मा के हिरण्यगर्भात्मक सूर्य स्वरूप को दर्शाती है I

इसलिए मकार, त्रिदेव की योगावस्था को भी दर्शाता है, और इस योगावस्था में त्रिदेव का एक दुसरे से योग, शब्द रूप में है I

इसका अर्थ हुआ, कि मकार ही त्रिदेव की शब्दात्मक योगावस्था को दर्शाता है I

और क्यूंकि त्रिदेव, वास्तव में ब्रह्म शब्द के भी वाचक हैं, इसीलिए मकार का बीज, म शब्द, ब्रह्मनाद कहलाया था I

 

मकार दुर्ग या ब्रह्मतत्त्व का वर्णन … ऊँ तत् सत् क्या है …

आत्ममार्ग में, मकार दुर्ग (या मकार मंदिर)) को ही ब्रह्मतत्त्व कहते हैं I ब्रह्मतत्त्व ही मकार दुर्ग है, क्यूंकि इस दुर्ग की अतिप्रकाशमान दशा के भीतर ही मकार का साक्षात्कार होता है I

लेकिन क्यूंकि मकार ही त्रिदेव हैं, इसलिए इस मकार दुर्ग को त्रिदेव दुर्ग (या त्रिदेव मंदिर) और त्रिदेवी दुर्ग (या त्रिदेवी मंदिर) भी कहा जा सकता है I वैदिक मंदिर सिद्धांत के मूल में यही ब्रह्मतत्त्व है I

यह तीनो मणियाँ सुनहरे प्रकाश के भीतर स्थित होती हैं I यह सुनहरा प्रकाश ब्रह्मतत्त्व का होता है I

वास्तव में ब्रह्मतत्त्व प्रकाश से निर्मित होता है, या यह कहूँ, कि ब्रह्मतत्त्व एक प्रकाशपुंज सरीका होता है I

ब्रह्मतत्त्व को ही योगमनीषीयों ने शुद्ध चेतन तत्त्व कहा था I

ब्रह्मतत्त्व को ही सगुण शिव भी कहा गया है, जिनसे पुरुष और प्रकृति स्वयंउत्पन्न हुए थे I ब्रह्मतत्त्व ही शिव का सगुणत्मक स्वरूप है I शिवात्मक शब्द के वास्तविक अर्थ में ब्रह्मतत्त्व ही है I

श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में कहा गया, ऊँ तत् सत् (ॐ तत्सत) भी इसी ब्रह्मतत्त्व को दर्शाता है I

 

मकार और ब्रह्मतत्त्व में बसी हुई प्रकाश की किरणों का वर्णन … ब्रह्मतत्त्व के प्रकाश का विस्तार सर्पिल स्वरूप (या प्रसार कुंडली स्वरूप) …

मकार और ब्रह्मतत्त्व, दोनों की दशा बहुत प्रकाशमान और चमकदार पीले वर्ण की है, इसलिए यह सुनहरे वर्ण का प्रतीत होता है, जैसे इसमें कई सारे सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हैं I

इतना प्रकाश है, कि इसको पूर्णरूपेण साक्षात्कार करने में भी बहुत कठिनाई होती है, क्यूंकि जब योगी की चेतना इसमें बस प्रवेश हुई ही होती है, तब इतने प्रकाश के आदी होने में भी समय लगता है, जिसके कारण इस दशा के साक्षात्कार में कुछ अधिक समय लगता ही है I

इस दशा में प्रकाश ऊपर की ओर जाता है, अर्थार्त योगी के सर के ऊपर के भाग की ओर जाता है I

इसमें जो प्रकाश की किरणे हैं, वह गोल गोल घूमती हुई ऊपर की ओर जाती हैं, और ऊपर जाते हुए उन किरणों की गोलाई भी बड़ी होती जाती है I

इसकी किरणों की गति को, विस्तार सर्पिल या प्रसार कुंडली जैसा भी कहा जा सकता है। इसी विस्तार सर्पिल या प्रसार कुंडली को अंग्रेजी में expanding spiral भी कहा जाता है।

इस विस्तार सर्पिल या प्रसार कुंडली की अवस्था में किरणें ऐसी गति करती है, जैसे वो गोल गोल घूमती और अनंत में फैलती हुई, ऊपर की ओर जा रही हैं, अर्थात ब्रह्मरंध्र की ओर जा रही हैं।

सूरजमुखी आदि पुष्प के बीज भी ऐसे ही विस्तार सर्पिल या प्रसार कुंडली के आकार में होते हैं।

ये अवस्था बहुत प्रकाशमान, पीले वर्ण के प्रकाश की असंख्य किरणों की है।

इसलिए जब किसी योगी की चेतना इस प्रकाश के भीतर चली जाती है, तो वह चेतना उसी गोल गोल घूमती हुई स्वर्णिम प्रकाश की अनगिनत किरणों का आलम्बन लेके, उन किरणों के समान ही गोल गोल घूमती हुई ही ऊपर की ओर की ओर जाती है I

 

मकार ही ब्रह्म तत्त्व है, मकार ही शुद्ध चेतन तत्त्व है …
त्रिदेवी, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, सगुण शिव, ब्रह्मनाद, प्रणव
त्रिदेवी, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, सगुण शिव, ब्रह्मनाद, प्रणव

 

अब यहाँ दिखलाए गए चित्र पर ध्यान दो I

मकार की तीनों मणियों के नीचे की ओर, अर्थात ओकार (या उकार) की ओर, एक एक त्रिकोण गुफा रूपी द्वार होता है I

यह त्रिकोण गुफा रूपी द्वार भी स्वर्णिम प्रकाशमयी ऊर्जा से भरा हुआ होता है, और इस त्रिकोण गुफा रूपी द्वार की ऊर्जाएँ भी गोल गोल घूमती हुई, मकार से भी ऊपर की ओर जाती हैं I

मकार की इन तीनों मणियों के नीचे की ओर, यही त्रिकोण गुफा रूपी द्वार होता है, जिसके भीतर से जाकर योगी की चेतना ब्रह्मतत्त्व में स्थापित हो जाती है, अंततः ॐ में विलीन हो जाती है I

यह त्रिकोणाकार द्वार इन तीनों मणियों के नीचे की ओर होता है, और ऐसा ही इस चित्र में दिखाया गया है I

जब योगी की चेतना इन तीनों मणियों में से किसी भी एक मणि के नीचे के त्रिकोणी द्वार में चली जाती है, तब वो चेतना भी उस त्रिकोण द्वार में गोल गोल घूमती हुई, ऊपर की ओर जाती हुई ऊर्जाओं के सामान, मकार से भी ऊपर की ओर ही जाने लगती है…, अर्थात वो चेतना मकार से भी परे जाने लगती है I

और अंततः वो चेतना, मकार से ऊपर जो ॐ का लिपि रूपी चिन्ह है, उसके पास पहुँच जाती है I

जैसे ही योगी की चेतना इन तीनो मणियों का साक्षात्कार करती है, वैसे ही वह चेतना किसी भी एक त्रिकोण द्वार में प्रवेश कर जाती है I और उस द्वार की ऊर्जा में स्थित होके, वह चेतना मकार के मणि स्वरूपों से भी ऊपर की ओर जाने लगती है I

मकार से ऊपर की ओर…, ॐ है I

 

मकार में जीवात्मा की दशा, … ब्रह्मतत्त्व में जीवात्मा की दशा, … प्रणव में जीवात्मा की दशा, … सगुण शिव में जीवात्मा की दशा, … शुद्ध चेतन तत्त्व में जीवात्मा की दशा, …

मकार में जीवात्मा की दशा, ब्रह्मतत्त्व में जीवात्मा की दशा, प्रणव में जीवात्मा की दशा
मकार में जीवात्मा की दशा, ब्रह्मतत्त्व में जीवात्मा की दशा, प्रणव में जीवात्मा की दशा, सगुण शिव में जीवात्मा की दशा, शुद्ध चेतन तत्त्व में जीवात्मा की दशा

 

पूर्व के दो अध्यायों में बतलाए गए अकार और उकार की तुलना में, मकार एक सूक्ष्म और प्रकाशमान दशा है I

जब वह योगी पूर्व के अध्याय में बताए गए उकार से मकार के लिंगात्मक स्वरूप की ओर जाता है, और इसके पश्चात जब वो योगी मकार से भी ऊपर, ब्रह्मतत्त्व की ओर जाता है, तो उस योगी की चेतना की अतिसूक्ष्म दशा जैसी होती है, वह इस चित्र में दर्शायी गयी है I

मकार में और मकार से ऊपर जाते हुए भी वो योगी की जीवात्मा की दशा, शाश्वत प्रणाम में ही होती है I

इसका अर्थ हुआ कि जैसे योगी की जीवात्मा शाश्वत प्रणाम में ही अकार और उकार में गयी थी, वैसे ही शाश्वत प्रणाम में योगी की जीवात्मा, मकार और मकार से भी ऊपर, अर्थात ब्रह्मतत्त्व में भी जाती है I

उन तीनों द्वारों में से किसी भी एक द्वार में प्रवेश करते ही, योगी की दशा ऐसी हो जाती है जैसे कि …

वो है…, लेकिन नहीं है I

वो नहीं है…, लेकिन तब भी है I

 

इस अवस्था में, योगी की चेतना (जीवात्मा) के साथ, न तो पूर्व की अग्नि, और न ही पूर्व का तैजस होता है I ऐसी दशा में, वो योगी अग्नि और तैजस दोनों से ही अतीत हो चुका होता है I

इस दशा में वह योगी विज्ञानमय स्वरूप को प्राप्त होता है, और उसके चेतना रूपी शरीर में (जो मकार से भी ऊपर की ओर जा रहा होता है), एक बहुत सूक्ष्म पीले वर्ण का प्रकाश व्याप्त होता है I और इस पीले वर्ण के प्रकाश को भेदता हुआ, अर्थात इस पीले प्रकाश के भीतर, एक हीरे के समान अतिसूक्ष्म प्रकाश भी होता है I

यही अवस्था, जीवात्मा का वास्तविक विज्ञानमय सगुण स्वरूप है I इसका अर्थ हुआ, कि इस बतलाई गयी ब्रह्मतत्त्व की दशा में, वो जीवात्मा अपने वास्तविक विज्ञानमय सगुण स्वरूप को प्राप्त होती है I

यहाँ शब्द विज्ञानमय कहा गया है, न की ज्ञानमय I इसका कारण है, कि अपने ज्ञानमय स्वरूप को जीवात्मा ॐ में विलीन होकर ही प्राप्त होती है I और वो ज्ञानमय स्वरूप उस जीवात्मा की ब्रह्मलीन अवस्था की ओर लेके जाता है I

 

मकार का बीज शब्द, भ्रामरी प्राणायाम, … म नाद, …

जैसे ही वह चेतना मकार की अवस्था में प्रवेश करती है, वैसे ही एक बीज शब्द सुनाई देता है, जो मममम…, ऐसा होता है I

पूर्व कालों में, इसी मकार के बीज नाद को योग तंत्र में स्थापित करने के लिए, योगीजनों ने भ्रामरी प्राणायाम का मार्ग दिया था I

 

मकार सिद्धि और ब्रह्मतत्त्व सिद्धि

और क्यूंकि यह मकार और ब्रह्मतत्त्व की अवस्था ब्रह्माण्ड के पूर्व में भी थी, इसलिए यह मकार सिद्धि और इसके पश्चात ब्रह्मतत्त्व सिद्धि भी तब प्राप्त होती है, जब अपनी भीतर की अवस्था में, वो योगी ब्रह्माण्ड से ही परे चला जाता है I

इसलिए ब्रह्मतत्त्व सिद्धि से पूर्व, मकार सिद्धि होती है I

और मकार सिद्धि से पूर्व ब्रह्माण्ड सिद्धि होनी ही पड़ेगी और वह ब्रह्माण्ड जो योगी सिद्ध करता है, वो उस योगी के पिण्ड रूपी शरीर के भीतर ही, सूक्ष्म सांस्कारिक स्वरूप में होता है I इसका यह भी अर्थ हुआ, कि मकार सिद्धि, ब्रह्माण्ड योग नामक सिद्धि से भी आगे की अवस्था है I

लेकिन क्यूंकि मकार से जाकर ही ब्रह्मतत्त्व को जाना जाता है, और क्यूंकि ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्माण्ड का मूल तात्त्विक स्वरूप है, इसलिए ब्रह्माण्ड योग के पश्चात ही मकार साक्षात्कार होता है और मकार साक्षात्कार के पश्चात ही, ब्रह्मतत्त्व को जाना जाता है I

इसका अर्थ यह भी हुआ, की ब्रह्म की रचना का मूल तत्त्व, जो ब्रह्मतत्त्व है, उसके अंतर्गत ही ब्रह्म की रचना से योग (अर्थात ब्रह्माण्ड योग) आता है I

 

इसलिए…,

जो मकार सिद्ध है, वो ब्रह्माण्ड योगी होगा ही … लेकिन जो ब्रह्माण्ड योगी है, वो मकार सिद्ध होगा ही, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलेगा I

 

पहले मकार सिद्धि पर बात होगी

जब मकार साक्षात्कार होता है, तब योगी कुछ सिद्धियों का भी धारक हो जाता है I तो अब उन सिद्धियों को बतलाता हूँ …

 

  • अर्धनारीश्वर सिद्धि ऐसे योगी के त्रिनेत्र में, भगवान अर्धनारीश्वर स्वयंप्रकट होते है I योगी के त्रिनेत्र में भगवान अर्धनारीश्वर घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में, गोल गोल घूमते हैं I

यह शिव और शक्ति की योग सिद्धि भी कहलाती है, क्यूंकि ऐसा योगी “शिव का होता हुआ भी, शक्ति का ही होता है”, और इसके साथ साथ, ऐसा योगी, “शक्ति का होता हुआ भी, शिव का ही होता है” I

ऐसा योगी श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् में कहे गए समस्त नामों में परमगुरु शिव को भी पा सकता है I

 

  • विष्णु सिद्धी ऐसा योगी श्री विष्णु का भी होता है, और वो श्री विष्णु ही उसके सनातन गुरु होते हैं I

ऐसा योगी विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् में कहे गए समस्त नामों में श्री विष्णु को भी पा सकता है I

 

  • आदित्य सिद्धि, हिरण्यगर्भ सिद्धि, सूर्य सिद्धि … ऐसा योगी, आदित्य का भी होता है और वो आदित्य, हिरण्यगर्भ ब्रह्म सरीके ही होते हैं I

ऐसा योगी सूर्य से समस्त 108 नामों में आदित्य को भी पा सकता है I

 

  • त्रिदेव सिद्धि मकार ही त्रिदेव है, और उन त्रिदेव में, गुरु शिव अपने अर्धनारीश्वर स्वरूप में होते हैं, श्री विष्णु अपने बहुत सुन्दर नीले स्वरूप में होते है, और पितामह ब्रह्मा अपने ही आदित्य (सूर्य या हिरण्यगर्भ) पीले रंग के स्वरूप में होते हैं I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने मकार साक्षात्कार किया है, और उसके बाद उस योगी की चेतना मकार के त्रिलिंग स्वरूप में भी चली गई, वो ही मकार सिद्ध, मकार के त्रिलिंग स्वरूप का सिद्ध, त्रिदेवी सिद्ध और त्रिदेव सिद्ध योगी होता है I

लेकिन ऐसे योगी, जो यहाँ बताई गई समस्त सिद्धियों के धारक होता है, वो अतिदुर्लभ ही होते हैं I

इसका कारण है, कि अधिकांश योगी बस एक मणि का साक्षात्कार करके, बस उस मणि से परे जाके, ब्रह्मतत्त्व को चले जाते हैं, और इसके पश्चात वो ॐ को साक्षात्कार भी कर लेते हैं I

और विरले योगी ही होते हैं, जो इन तीनो मणियों का साक्षात्कार करके ही ब्रह्मतत्त्व की ओर  प्रस्थान करते हैं I अधिकांश योगीजन तो बस एक मणि को पाके ही आगे ब्रह्मतत्त्व की ओर बढ़ जाते हैं I

लेकिन मकार की तो और भी बहुत सिद्धियाँ है, पर उनको मैं अभी नहीं बतलाऊँगा…, कभी और देखेंगे I

 

अब ब्रह्मतत्त्व सिद्धि की बात होगी

जब योगी को मकार से आगे जाकर, ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है, तब योगी कुछ और सिद्धियों का भी धारक हो जाता है I तो अब उन सिद्धियों को बतलाता हूँ …

 

  • ज्ञान सिद्धि … ज्ञानाकाश … इस सिद्धि से, जैसे ही वह योगी किसी भी सूक्ष्म, दैविक या कारण या सांस्कारिक अवस्था का साक्षात्कार करेगा, वैसे ही उस योगी को उस अवस्था का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जायेगा I

और अंततः, ऐसा योगी का ज्ञान, ज्ञानाकाश के सामान होता ही है, और जहाँ वो ज्ञानाकाश ही ब्रह्म होता है I इस सिद्धि का सम्बन्ध अस्मिता सिद्धि से भी है, जो रजोगुण समाधी का अंग भी होती है I

 

  • चेतन सिद्धि … चिदाकाश … इस सिद्धि से वह योगी जैसे ही किसी भी परा (अर्थात दैविक, कारण, इत्यादि) अवस्था का साक्षात्कार करेगा, उसकी चेतना उसी में विलीन होके, एक हो जाएगी I

और जैसे जैसे यह साक्षात्कार की प्रक्रिया आगे की ओर चलेगी, वैसे वैसे योगी की चेतना संपूर्ण दैविक, कारण और संस्कारिक अवस्थाओं में व्याप्त होती ही चली जायेगी I

और अंततः, ऐसे योगी की चेतना चिदाकाश के सामान होती ही है, और जहाँ वो चिदाकाश ही ब्रह्म होता है I

इस सिद्धि का सम्बन्ध, उस हीरे के समान प्रकाशित, सर्वसम निराकार ब्रह्मलोक से भी है, जिसमें सोलह नीचे के लोक होते हैं और चार ऊपर के, और जो विशुद्ध सत् की समाधी भी कहलाती है, और जिसका मार्ग, रकार नाद और अथर्ववेद के दसवें खण्ड के दूसरे सूक्त के इकत्तीसवें, बत्तीसवें और तैंतीसवें मंत्रों से भी होकर जाता है I

 

  • तत्त्व ब्रह्म सिद्धि … तत्त्वाकाश …  तत्त्व सिद्धि मकार ही ब्रह्म तत्त्व है, जो ब्रह्म के प्रथम तत्त्व स्वरूप में अभिव्यक्ति है I

इसलिए, जिस योगी ने इसका साक्षात्कार कर लिया, वह योगी तत्त्वब्रह्म सिद्धि को प्राप्त हुए बिना नहीं रह पाता, जिसमें तत्व ब्रह्म ही तत्त्वाकाश के सामान होता है, और वो तत्त्वाकाश ही ब्रह्म होता है I

यह एक बहुत ऊपर की (या उत्कृष्ट) सिद्धि है, क्यूंकि इससे योगी तत्त्व सिद्ध हो जाता है I इस तत्त्व सिद्धि से, समस्त रचना के तत्त्व में बसकर, वो योगी उस रचना का नियंत्रक भी हो सकता है I

 

  • प्रणव सिद्धि ब्रह्मतत्त्व ही प्रणव है, जो जीव जगत की चेतनमय, ज्ञानमय और क्रियामय ऊर्जा स्वरूप है I

इस सिद्धि से ही साधक के शरीर के भीतर ही पुरुष प्रकृति योग सिद्ध होता है, जिसका मार्ग भी रकार ही है, और जो उस निर्बीज समाधि की ओर लेके जाता है, जिसके बारे में किसी बाद के अध्याय में बतलाया जाएगा I

 

  • सगुण शिव सिद्धि निर्गुण शिव, जो निर्गुण निराकार ब्रह्म ही हैं, उनसे जो सगुण शिव स्वयंप्रकट हुए थे, उनको ही वेद मनीषीयों ने ब्रह्मतत्त्व कहा था I

इस सिद्धि का मार्ग, पुरुष प्रकृति के योग से भी परे (या आगे) होता है, और इस सिद्धि का आलम्बन लेके ही योगी, उस चक्र को जाता है, जिसको सिद्ध मनीषीयों ने निरालंबचक्र, निरालंबस्थान और अष्ठम चक्र कहा था , और जहाँ यह अष्ठम चक्र योगी के ब्रह्मरंध्र से ऊपर जो सुनेहरे वर्ण का वज्रदण्ड चक्र होता है, उस वज्रदण्ड से भी ऊपर होता है I

इस चक्र की दशा का साक्षात्कार, असम्प्रज्ञाता समाधी से होता हुआ, निर्बीज समाधी तक लेके जाता है, और जिसका मार्ग खाकार नामक शब्द से होता हुआ, ड़कार नामक शब्द से जाता हुआ, अंततः गकार नामक शब्द में लेके जाता है I ऐसा योगी सगुण शिव के खड़क नामक अस्त्र को धारण करता है I

ऐसा योगी निर्गुण ब्रह्म (अर्थात परमशिव) का साक्षात्कारी हुए बिना रह भी नहीं पाएगा, और जहाँ वो परमशिव ही उस योगी के आत्मस्वरूप होंगे I

लेकिन ब्रह्मतत्त्व की तो और भी बहुत सिद्धियाँ है, लेकिन इनको मैं अभी नहीं बतलाऊँगा…, कभी और देखेंगे I

 

शुद्ध चेतन तत्त्व … ब्रह्मतत्त्व … ॐ तत् सत् … ब्रह्मनाद क्या है?

मकार के शब्द की बीजावस्था को ब्रह्मनाद कहते हैं I साधक के शरीर में यह ब्रह्मनाद, साधक के ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर के भाग में सुनाई देता है I

ब्रह्मनाद अपने शब्द रूप में प्रकृति का अंग है, और अपने अतिप्रकाशमान तत्त्व रूप में वो ब्रह्म है I

ब्रह्मनाद में भगवान् और प्रकृति का योग होता है, जो उस प्रकृति के भीतर भी बसा हुआ होता है, और प्रकृति से परे भी होता है I

जब प्रकृति ने भगवान् (या ब्रह्म) से योग किया था, तब जो नाद स्वयंउत्पन्न हुआ था, वो ब्रह्मनाद था और सदैव ही रहेगा I

और उस भगवान् और प्रकृति के योग में, प्रकृति भी ब्रह्म की प्राथमिक अभिव्यक्ति, अर्धांगनी, शक्ति, दिव्यता और दूती स्वरूप में ही थी I

इस ब्रह्मतत्त्व (या शुद्ध चेतन तत्त्व या प्रणव) की अवस्था सुनहरे वर्ण की प्रकाश की असंख्य किरणों के जैसी होती है I

इस शुद्ध चेतन तत्त्व (या ब्रह्मतत्त्व) के साक्षात्कार में ऐसा लगता है, जैसे किसी अनंत प्रकाश ने, चेतना को घेर लिया है, और उसी प्रकाश की किरणें, चेतना को ऊपर की ओर, किसी स्थान पर गोल गोल घूमती हुई लेके जा रही हैं I

और चेतना की ऐसी ऊपर की गति में, सारा समय वो ही ब्रह्मनाद चल रहा होता है I

इसी की अवस्था को, योग शास्त्रों में शुद्ध चेतन तत्त्व भी कहा गया है I यह तत्त्व प्रकाश की किरणों से निर्मित, निष्कलंक होता है I यह तत्त्व अति प्रकाशमान असंख्य किरणों का होता है जिसमे प्रवेश करके,  योगी की चेतना ओमकार के साक्षात्कार को जाती है I

इसी सुनहरे प्रकाश की किरणों के तत्त्व को, वैदिक मनीषी ब्रह्मतत्त्व भी कहते हैं I

यह ब्रह्मतत्त्व निर्गुण निराकार ब्रह्म की तत्त्व स्वरूप में प्रथम अभिव्यक्ति है I

और इसी ब्रह्मतत्त्व की अभिव्यक्ति के पश्चात, जगत की रचना हुई थी I इसीलिये ब्रह्मतत्त्व ब्रह्म की प्राथमिक सत् रूपी (या निष्कलंकी) मूलतात्त्विक अभिव्यक्ति भी है I

 

मकार से ब्रह्मतत्त्व का मार्ग, और ब्रह्मतत्त्व से ॐ का मार्ग प्रशस्त होता है …

योग मार्ग, मकार से ब्रह्मतत्त्व और ब्रह्मतत्त्व से ॐ को लेके जाता है, और जहाँ यह दोनों मकार और ॐ भी उसी ब्रह्मतत्त्व के भीतर निवास करते हैं I

इस बताए गए मार्ग में वो ही योगी जा पाएगा, जो स्वयं ही स्वयं में जायेगा, अर्थार्त आत्मा होके ही, ॐ स्वरूप आत्मा में जाएगा I

यदि इस बताए गए मार्ग में, कोई साधक किसी देवी देवता का आलम्बन लेके जाएगा, तो इस मकार से आगे जो ओमकार (ओंकार या ॐ) है, उसमें तो बिलकुल नहीं जा पाएगा I

जबतक तू अपने आप में, अपने आप ही रमण नहीं करेगा, तबतक अपने आप को तो बिलकुल नहीं पाएगा I भक्तियोग मार्गियों के लिए यह मानना कठोर होगा…, लेकिन यही सत्य है I

और तेरी वास्तविक्ता तो तेरी आत्मा ही ब्रह्म है, और जिसका लिपि लिंगात्मक स्वरूप ही ॐ कहलाता है I ॐ ही वो आत्मा है, जो ब्रह्म है I

जिस योगी ने अपनी साधनाओं में, इस बतलाई गई मकार और ब्रह्मतत्त्व की अवस्था का साक्षात्कार कर लिया, वो योगी जगत से ही परे हो जाता है, क्यूंकि यह अवस्था जगत की रचना से भी पूर्व की है I

ऐसे साक्षात्कार के पश्चात, यदि वो योगी अपनी पूर्व की स्थूल काया में भी क्यों न रह जाए, तब भी वो इस जीव जगत से परे ही रहता है I इसका अर्थ हुआ, कि जीव जगत के भीतर बसा हुआ भी, वो योगी उस जीव जगत से परे ही होता है I

जिस योगी ने मकार और उसके पश्चात ब्रह्मतत्त्व का पूर्ण साक्षात्कार कर लिया है, वो ही ॐ के साक्षात्कार का पात्र बनता है I

इसका अर्थ हुआ, कि जिसने मकार और ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार नहीं किया, वो योगी उसके अपने ब्रह्मरंध्र के ॐ का साक्षात्कार भी नहीं कर पाएगा I

 

ब्रह्मतत्त्व का प्रणव स्वरूप

इसको दो दृष्टिकोणों से बताया जाएगा…, एक उत्पत्ति के दृष्टिकोण से, और दूसरा उत्कर्ष मार्ग में लय होने के दृष्टिकोण से I

 

  • ब्रह्म की रचना की उत्पत्ति के दृष्टिकोण से निर्गुण शिव, अर्थात परमशिव (या निर्गुण ब्रह्म) से सगुण शिव का स्वयं उदय हुआ था I

स्वयंउदय की दशा में, सगुण शिव निराकार थे I वो सगुण शिव ही ब्रह्मतत्त्व हैं I

वो सगुण शिव ही प्रणव हैं, जिनमें ब्रह्म और प्रकृति का योग हुआ है I

इसके कारण ही सगुण शिव, जो प्रणव कहलाते हैं, वो शक्ति रूपी प्रकृति भी है, और स्व:प्रकाश सर्वसाक्षी सर्वव्यापक ब्रह्म भी I

यही कारण है, कि सगुण शिव या ब्रह्मतत्त्व ही सगुण निराकार ब्रह्म नामक शब्द का मूल भी है I

ब्रह्मतत्त्व का स्वरूप, ऊर्जा और प्रकाश का गठा हुआ पुंज जैसा है, जिसमें पीले रंग के प्रकाश की असंख्य किरणें गोल गोल घूमती हुई, ऊपर की ओर जाती हैं I यही सगुण शिव भी कहलाता है, जिनका आलम्बन लेके योगी अपने आत्मस्वरूपा ॐ को साक्षात्कार करके, उस ॐ में ही लय हो जाता है I

ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्म का वास्तविक सगुण निराकार तात्विक स्वरूप है I

ब्रह्मतत्त्व में…, ऊर्जा (या क्रिया) रूप में ब्रह्मशक्ति हैं, और ज्ञानमय चेतनमय रूप में ब्रह्म हैं I

इसी ब्रह्मतत्त्व को प्रणव भी कहते हैं, और यही कारण है, कि प्रणव का अर्थ ब्रह्म भी है, और ब्रह्म शक्ति भी है I ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति की योगावस्था को ही प्रणव कहते हैं I साधक के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में प्रणव की दशा अति ऊर्जावान और प्रकाशमान होती है I

सगुण शिव (ब्रह्मतत्त्व) से पुरुष और प्रकृति का स्वयंप्रादुर्भाव हुआ था, और इस दशा के पश्चात ही जीव जगत की उत्पत्ति हुई थी I

 

  • जीवों के उत्कर्ष मार्ग में लय होने के दृष्टिकोण से उत्कर्ष मार्ग उत्पत्ति के मार्ग से विपरीत होता है I

इसलिए, उत्कर्ष मार्ग में योगी, पुरुष प्रकृति के योग से होकर ही ब्रह्मतत्त्व को जाता है I और ऐसे योग में, प्रकृति सात्विक ऊर्जा रूप में होती हैं…, और पुरुष साक्षी रूप में, जो न तो कर्ता होते हैं, और न ही अकर्ता I

उत्कर्ष मार्ग के उस “प्रकृति पुरुष योग” में, जो साधक के शरीर के भीतर ही होता है, जो अतिप्रकाशमान ऊर्जावान दिव्यता स्वयंप्रकट होती है, उसके सर्वसाक्षी तत्त्व और प्राथमिक सार्भौम ऊर्जा स्वरूप के योग को ही प्रणव कहते हैं I

ऐसी दशा के साक्षात्कार से पूर्व, साधक के मेरुदण्ड के नीचे के स्थान पर, एक पीले रंग का प्रकाश स्वयंउत्पन्न होता है I यह प्रकाश भी ब्रह्मतत्त्व का ही है, और इसी ब्रह्मतत्त्व की ऊर्जा का आलम्बन लेके, साधक की प्राणशक्ति मेरुदंड के नीचे के भाग से, ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में जाती है I

और उस प्राणशक्ति की ऐसी गति के समय, साधक की चेतना भी उसी ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में जाती है, जहाँ पर पूर्व के अध्यायों के आकार, उकार और इस अध्याय का मकार और ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार होता है, जिसको योगीजन शुद्ध चेतन तत्त्व, ॐ तत् सत्, सगुण शिव, सगुण निराकार ब्रह्म और प्रणव के नामों से भी पुकारते हैं I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय I

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