पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत, गायत्री ब्रह्म सिद्धांत, जीवधर, जगतधर, मूलास्त्र चतुष्टय, जीव ही जगत, जगत ही जीव, जीवातीत, जगतातीत, मनात्मा, ज्ञानात्मा, चिदात्मा, अहमात्मा, प्राणात्मा, सिद्धांतातीत, तंत्रातीत

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत, गायत्री ब्रह्म सिद्धांत, जीवधर, जगतधर, मूलास्त्र चतुष्टय, जीव ही जगत, जगत ही जीव, जीवातीत, जगतातीत, मनात्मा, ज्ञानात्मा, चिदात्मा, अहमात्मा, प्राणात्मा, सिद्धांतातीत, तंत्रातीत

यहाँ पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत पर बात होगी I इसमें साधक पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा मार्ग पर जाकर कई सिद्धियों को पाता है, जो प्रमुखतः तीन प्रकार की होती है I एक जो जीव शब्द से संबंध रखती है, और दूसरी जो जगत शब्द से सम्बंधित होती है और तीसरी जो इन दोनों से ही अतीत होती है I इसलिए इस मार्ग पर जाते हुए साधक को जो सिद्धियाँ प्राप्ति होती है, वो मूलतः जीवधर सिद्धि और जगतधर सिद्धि की श्रेणियों में ही आती हैं I और इनके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी भी होती है, जो सिद्धितीत या तुरीयातीत कहलाती है I इन दोनों जीवधर और जगतधर सिद्धियों को पाकर ही वो साधक इन सिद्धियों के गंतव्य को पाता है, जो जीवातीत और जगतातीत कहलाता है I जो योगी इन जीवातीत और जगतातीत दोनों की योगावस्था में ही बैठ गया, वही सर्वातीत सिद्धितीत और तुरीयातीत आत्मा कहलाता है I इसी गायत्री ब्रह्म सिद्धांत मार्ग में साधक आयाम चतुष्टय के प्रमुख स्वरूपों का साक्षात्कार करता है, जो उन आयामों के प्रकृति (शक्ति या दिव्यता या सार्वभौम ऊर्जा) स्वरूप, अर्थात चक्र रूप में होते है I और इस साक्षात्कार के पश्चात ही वो साधक इन आयामों के चक्रातीत स्वरूप, अर्थात गंतव्य ब्रह्म स्वरूप के साक्षात्कार करने का पात्र बनता है I इसलिए इस अध्याय में पञ्चब्रह्म और आयाम चतुष्टय विज्ञान पर भी बात होगी, जिसको गायत्री और आयाम चतुष्टय विज्ञान भी कहा जा सकता है I और इसी साक्षात्कार मार्ग से वो साधक मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान को भी जानता है और ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में शून्ययोद्धा, महाशून्य योद्धा और ब्रह्मयोद्धा भी कहलाता है I इसी गायत्री ब्रह्म सिद्धांत से, सिद्धांतातीत ब्रह्म और तंत्रातीत ब्रह्म को भी जाना जाता है I

किसी भी देव कलियुग के कालखंड में, देवास्त्रों और दिव्यास्त्रों का प्रयोग वर्जित होता है I लेकिन और भी तो अस्त्र होते हैं, जो सार्वभौम होते हैं I इनही सार्वभौम अस्त्रों में से, जिनपर किसी भी युग में कोई प्रतिबन्ध नहीं होता, यहाँ पर कुछ को बताया जाएगा I

उदहारण मात्र में, यह सार्वभौम अस्त्र कई प्रकार के होते हैं, जैसे कोशास्त्र जो पांच होते हैं, गुणास्त्र को तीन होते हैं, भूतास्त्र जो पांच होते हैं, तन्मात्रास्त्र जो पांच होते हैं, अन्तःकरण से संबधित अस्त्र जो चार होते हैं, और आयामास्त्र जो तीन और चार भी होते हैं I और समस्त जीवों की दादीजी और जगत की माता, अव्यक्त का अस्त्र जो प्राणास्त्र कहलाता है और जो दस प्रकार के होते हैं… इत्यादि I

देवास्त्रों के समान, इन सभी बताए गए अस्त्रों के प्रयोग पर किसी भी युग में, कोई भी प्रतिबन्ध नहीं होता, इसलिए यह अस्त्र सार्वभौम और सर्वकाली ही होते हैं I

इन सार्वभौम अस्त्रों का धारक योगी, इनको चलाएगा तो उसकी अपनी काया के भीतर, लेकिन वो चलेंगे ब्रह्माण्ड के उस भाग में जिसमे उस योगी की धारणा स्थित होगी I और यदि योगी की धारणा संपूर्ण ब्रह्माण्ड से ही सम्बंधित होगी, तो यही अस्त्र सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ही चलित दिखाई देंगे I इसका कारण है, कि ब्रह्माण्ड योग सिद्ध की स्थूल काया के भीतर का ब्रह्माण्ड ही वो बहार का ब्रह्माण्ड है, जिसमें योगी की काया स्थित होती है I

यह वो अस्त्र हैं, जिनका प्रयोग जीवधर और जीवातीत सहित, जगतधर और जगतातीत नामक सिद्धियों के मध्य में बैठ कर किया जाता है I इसलिए जब इन अस्त्रों का प्रयोग होता है, तब किसने इनका प्रयोग किया, कहाँ से इनका प्रयोग किया और कब इनका प्रयोग किया, उसको जाना ही नहीं जा सकता है I

और यह सभी के सभी सार्वभौम अस्त्र, माँ प्रकृति के कालास्त्र नामक अस्त्र में बसकर ही, काल की प्रेरणा से और दस हाथ वाली माँ महाकाली के आदेश पर ही प्रयोग किये जाते हैं I

यहाँ कही गई दस हाथ वाली माँ महाकाली ही हिरण्यगर्भ ब्रह्म की सुपुत्री है, जिनको माँ त्रिकाली भी कहा है, और जिनके बिन्दु शून्य स्वरूप से ही इस ब्रह्माण्ड सहित सभी ब्रह्माण्डों का, पृथक समयखण्डों में स्वयं उदय हुआ था I और इन सभी ब्रह्माण्डों के मूल में भी वो काल ही है, जिसके अस्त्र स्वरूप को गर्भास्त्र और कालास्त्र कहा गया है I

काल के गर्भ में ही जीव जगत बसा हुआ है I इसलिए इन बताए गए अस्त्रों में से जो कालास्त्र है, वही गर्भास्त्र कहलाता है, जिसका ज्ञान ब्रह्मशक्ति, अर्थात माँ मूल प्रकृति ने तो बस, कुछ ही देवताओं और सिद्धों को दिया है I

लेकिन इनमें से एक भी नहीं है, जो इस अस्त्र के पूर्ण ज्ञान के धारक है, क्यूंकि माँ प्रकृति ने इसका ज्ञान पूर्णरूपेण किसी को दिया ही नहीं है I ऐसा ही इस ब्रह्म रचना के समय से पूर्व से ही रहा है I

और ऐसा मैं तब भी कह रहा हूँ, जब एक पूर्व जन्म में, जो इसी ब्रह्मकल्प के स्वयंभू मन्वन्तर में हुआ था, और जब मैं प्रमिति नामक वो चक्रवर्ती सम्राट था जो माँ प्रकृति का चलता फिरता कालास्त्र था, और जिसने इस ब्रह्म कल्प में, इसी धरा पर आर्य धर्म (वैदिक धर्म) स्थापित किया था I

कुछ आज के वैष्णव कहेंगे कि श्री विष्णु के पास इसका ज्ञान है, कुछ शैव कहेंगे कि शिव के पास इसका ज्ञान है, और ऐसा भी हो सकता है कि कुछ और मार्ग के मनीषी अपने देवी देवताओं के लिए भी ऐसा ही कहेंगे I लेकिन कालास्त्र के बारे में मैंने जो कहना था, वो कह दिया है, कि चाहे तुम चलते फिरते कालास्त्र ही क्यों न हो जाओ, लेकिन इस गर्भास्त्र (कालास्त्र) का ज्ञान तुम कभी भी पूर्णरूपेण नहीं पाओगे… मैं अपने जीव समय के कई अनुभवों से बस इतना ही जानता हूँ I

इसीलिए जब अवतार भी आते हैं, तो वो अवतार भी ब्रह्माण्डीय नियमों के, जिनके मूल में काल की प्रेरणा ही है, उनके आधीन होकर, ही अपने कार्य करते हैं I और इसीलिए वो अवतार दुःखादि व्याधियां भी भोगते हैं I

इसीलिए मैं मानता हूँ, की यदि अवतारों के पास इस महाब्रह्माण्ड के गर्भास्त्र का ज्ञान होता, तो वो एक ही पल में वो कर देते, जिसको करने हेतु वो आए होंगे I और गर्भास्त्र का पूर्ण सिद्ध योगी तो दुखों को पाने का पात्र भी नहीं रह पाता I

और इसीलिए मैंने यहाँ पर ऐसा ही लिखा है, कि माँ प्रकृति ने इस गर्भास्त्र का ज्ञान किसी को भी पूर्णरूपेण नहीं दिया है, क्यूंकि जो योगी इस गर्भास्त्र का पूर्ण ज्ञाता हो जाएगा, वो योगी ब्रह्मशक्ति, अर्थात मूल प्रकृति के समान, ब्रह्माण्ड में बसा होने पर भी, ब्रह्माण्डीय नियमों के अधीन नहीं होता I

गर्भास्त्र पाया हुआ योगी, नियमातीत ही होता है और ऐसी दशा में वो जो चाहे, वैसा परिवर्तन इस गर्भास्त्र के प्रयोग से कर सकता है, इसलिए उसको दुःखों आदि को भोगने की भी आवश्यकता नहीं होती I कोई विशेष योगी चलता फिरता गर्भास्त्र तो हो सकता है, लेकिन गर्भास्त्र का पूर्ण ज्ञाता और स्वतंत्र चालक नहीं हो पाएगा I

जो साधक ब्रह्माण्ड योगी होता है, उसके आत्मिक दृष्टिकोण से समस्त जीव और संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसका मुक्तिमार्ग होता है, जिसमें वो जीव जगत उस योगी का ज्ञान और अस्त्र दोनों ही स्वरूपों में होता है I ऐसा ब्रह्माण्ड योगी उसके अपने पंच कोष, इन्द्रियाँ, और उसके भीतर और बाहर के सभी तत्त्वों को ज्ञान रूप सहित, अस्त्र स्वरूप में भी देखता है I

इस अध्याय में बताए गए साक्षात्कार का समय, कोई 2007-2008 से लेकर 2011-2012 तक का है I इतने वर्ष इसलिए लगे क्यूंकि इस अध्याय का मार्ग और साक्षात्कार कई सारी दशाओं से होकर ही जाता है, जिनके बारे में आगे की अध्यय श्रंखलाओं में बताया जाएगा I

पूर्व के सभी अध्यायों के समान, यह अध्याय भी मेरे अपने मार्ग और साक्षात्कार के अनुसार हैI इसलिए इस अध्याय के बिन्दुओं के बारे किसने क्या बोला, इस अध्याय का उस सबसे और उन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है I

यह अध्याय भी उसी आत्मपथ या ब्रह्मपथ या ब्रह्मत्व पथ श्रृंखला का अभिन्न अंग है, जो पूर्व के अध्यायों से चली आ रही है।

ये भाग मैं अपनी गुरु परंपरा, जो इस पूरे ब्रह्मकल्प में, आम्नाय सिद्धांत से ही सम्बंधित रही है, उसके सहित, वेद चतुष्टय से जुड़ा हुआ जो भी है, चाहे वो किसी भी लोक में हो, उस सब को और उन सब को, समर्पित करता हूं।

और ये भाग मैं उन चतुर्मुखा पितामह प्रजापति को ही स्मरण करके बोल रहा हूं, जो मेरे और हर योगी के परमगुरु महेश्वर कहलाते हैं, जो योगेश्वर, योगिराज, योगऋषि, योगसम्राट और योगगुरु भी कहलाते हैं, जो योग और योग तंत्र भी होते हैं, जिनको वेदों में प्रजापति कहा गया है, जिनकी अभिव्यक्ति हिरण्यगर्भ ब्रह्म और कार्य ब्रह्म भी कहलाती है, जो योगी के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोश में, उनके अपने पिंडात्मक स्वरूप में बसे होते हैं और ऐसी दशा में वो उकार भी कहलाते हैं, जो योगी की काया के भीतर, अपने हिरण्यगर्भात्मक लिंग चतुष्टय स्वरूप में होते हैं, जो योगी के ब्रह्मरंध्र के भीतर, जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्य के बत्तीस दल कमल में, उनके अपने ही हिरण्यगर्भात्मक सगुण आत्मा स्वरूप में होते हैं, जो जीव जगत के रचैता ब्रह्मा कहलाते हैं, और जिनको महाब्रह्म भी कहा गया है, जिनको जानके योगी ब्रह्मत्व को पाता है, और जिनको जानने का मार्ग, देवत्व और जीवत्व से होता हुआ, बुद्धत्व से भी होकर जाता है।

ये अध्याय, “स्वयं ही स्वयं में” के वाक्य की श्रंखला का उन्नतीसवाँ अध्याय है, इसलिए जिसने इससे पूर्व के अध्याय नहीं जाने हैं, वो उनको जानके ही इस अध्याय में आए, नहीं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा।

और इसके साथ साथ, ये भाग, पञ्चब्रह्म गायत्री मार्ग की श्रृंखला का पंद्रहवां अध्याय है।

लेकिन, यह अध्याय अधिकांश साधकगणों के लिए निषेध ही रहेगा I इसलिए, उन कुछ ही उत्कृष्ट योगीजनों के लिए, यह बताया जा रहा है… सभी साधकगणों के लिए नहीं I

 

जीव शब्द की परिभाषा, जीव की परिभाषा, … जगत शब्द की परिभाषा, जगत की परिभाषा, … जगत ही जीव है, जीव ही जगत है, … जीवधर ही जगतधर है, जगतधर ही जीवधर है, … जीवधर कौन, जीवधर किसे कहते हैं, जगतधर कौन, जगतधर किसे कहते हैं, जीवातीत कौन, जीवातीत किसे कहते हैं,  … ब्रह्म ही जीव जगत है, ब्रह्म ही जीव जगत स्वरूप में प्रकाशित है, …

इस भाग में जाने से पूर्व, जीव और जगत के शब्दों को परिभाषित करना होगा …

 

  • जीव शब्द की परिभाषा

जीव शब्द दो शब्दों से बना है… जा और ईव (इव) I

जा शब्द का अर्थ अज (अजा) शब्द से विपरीतार्थक है I और क्यूंकि अज शब्द का अर्थ अजन्मा होता है इसलिए जा शब्द का अर्थ, जो जन्मा है, जो जन्म लिया है… ऐसा होता है I

ईव (इव) शब्द का अर्थ, छोटा सा या जो आकार में हो, की तरह, यह, सदृश, यथा… ऐसा होता है I

इसलिए, जीव शब्द का अर्थ, जो जन्मे की तरह हो, जो जन्मा हो और जो सदृश्य हो या जो आकार में हो या जो छोटा हो, जो इस तरह जन्मा हो, और जो यथा जन्मा हो, इत्यादि होता है I

 

  • जगत शब्द की परिभाषा

जगत शब्द दो शब्दों से बना है, जो जा और गत हैं I

जा शब्द, अज शब्द का विपरीतार्थक है I और क्यूंकि अज शब्द का अर्थ अजन्मा होता है, इसलिए जा शब्द का अर्थ, जो जन्मा है, वो जो जन्म लिया है, ऐसा होता है I

और गत शब्द का अर्थ, जिसकी गति है, जो गतिशील है, जो परिवर्तनशील है… ऐसा होता है I और जहाँ गतिशील शब्द का अर्थ, उत्कर्ष पथ और उत्कर्ष पथगामी भी होता है I

इसलिए, जगत शब्द का अर्थ, वो जो जन्मा है, और जो परिवर्तनशील गतिशील अवस्था में स्थित है, ऐसा होता है I

लेकिन जगत शब्द की ऐसी परिभाषा तो जगत सहित, जीवो को भी दर्शाती है I

ऐसा होने का कारण है, कि जिस जगत में जीव निवास करते हैं, वही जगत तो जीवों के भीतर भी, उस जगत के अपने सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक स्वरूप में ही निवास करता है I

 

इसलिए, …

यह जगत का शब्द, जगत सहित, जीवों का भी वाचक है I

 

और अपने आंतरिक या वास्तविक स्वरूप में, …

जीव का शब्द भी तो जगत को ही दर्शाता है I

 

जगत के बारे में ऐसा कहने का कारण है, कि जगत शब्द की परिभाषा के अंतर्गत ही जीव शब्द की परिभाषा आती है, और जीव शब्द के अंतर्गत, जगत शब्द की परिभाषा I

और जहाँ, यह दोनों परिभाषाओं का एकवाद, ब्रह्माण्ड योग नामक सिद्धि को भी दर्शाता है I

 

इसका भी वही कारण है, कि …

जगत के भीतर जीव सत्ता, उस जगत का अभिन्न अंग होकर ही निवास करती है I

 

और इसके साथ साथ, …

जगत भी जीवों में, अपने सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप में निवास करता है I

 

टिपण्णी: जब ब्रह्म ने स्वयं के ही भाव में स्थित होके, अर्थात स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य में जाके, जगत को स्वयं उत्पन्न करने की इच्छा शक्ति प्रकट करी थी, तो वो जगत जो स्वयं उत्पन्न हुआ था, वो उन ब्रह्म का ही जीव जगत रूपी सूक्ष्म संस्कारिक स्वरूप था I यही स्वरूप इस जगत का प्राथमिक स्वरूप कहलाया था, जो अपनी वास्तविकता में उन्ही ब्रह्म की जगत रूपी प्राथमिक अभिव्यक्ति ही था I और आगे चलकर, इसी सूक्ष्म संस्कारिक प्राथमिक जगत स्वरूप से क्रमशः, कारण या दैविक जगत, सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत की स्वयं उत्पत्ति हुई थी I

 

इसलिए, अपनी वास्तविक दशा में, …

जीव के भीतर जगत और जगत के भीतर जीव निवास करता है I

 

यही कारण है, कि जीव और जगत की वास्तविक (आंतरिक) योगावस्था में …

जीव और जगत, दोनों अपने अपने तारतम्य में बसे आने पर भी, एक ही हैं I

जीव ही जगत होता है, और जगत ही जीव रूप में अभिव्यक्ता हुआ है I

और यह भी वो कारण है, कि …

जीवत्व सिद्धि, जगतत्व की अभिव्यक्ति है जगतत्व, जीवत्व में ही बसा हुआ है I

जगतत्व सिद्धि से जीवत्व का प्रादुर्भाव हुआ था जीवत्व, जीवों का आधार है I

जीव जगत में भेद होने पर भी, इनका अभिव्यक्ता, वही भेदरहित ब्रह्म ही हैं I

जीवत्व और जगतत्व में भेद होने पर भी, दोनों के मूल में ब्रह्मत्व ही हैं I

 

यही कारण है, कि …

जीवत्व और जगतत्व सिद्धियों का मार्ग, सिद्धितीत निर्गुण ब्रह्मत्व को जाता है I

 

और जहाँ, …

ब्रह्मत्व का निर्गुण स्वरूप ही, तुरीयातीत निर्गुण निराकार ब्रह्म और आत्मा है I

 

इसलिए, …

जीवत्व और जगतत्व के गंतव्य स्वरूप को ही कैवल्य मोक्ष, निर्गुण ब्रह्म कहते हैं I

उस कैवल्य मोक्ष का मार्ग, जीवत्व और जगतत्व सिद्धियों से होकर ही जाता है I

और जीव जगत के बारे में कुछ और बिंदु बताता हूँ …

जीव ही जगत का जीवत्व धारण किया हुआ, सगुण साकार स्वरूप है I

और जगत ही जीव का जगतत्व धारण किया हुआ, सगुण निराकार स्वरूप है I

यही कारण है, कि …

जीव और जगत में तारतम्य होने पर भी, वास्तव में कोई तारतम्य नहीं है I

 

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि जीव और जगत की वास्तविकता में, …

जीव ही उस सगुण निराकार जगत का सगुण साकार स्वरूप है I

जगत ही उस सगुण साकार जीव का सगुण निराकार स्वरूप है I

ऐसा होने के कारण ही …

जगतत्व से जीवत्व का उदय (अर्थात जीवों के उदय) मार्ग प्रशस्त होता है I

जीवत्व को धारण करके ही जगतत्व सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है I

 

यही कारण है, कि …

जीवत्व सिद्धि जगतत्व की और जगतत्व सिद्धि, जीवत्व की पूरक है I

जीवत्व से ही जगतत्व के साक्षात्कार और सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है I

जगतत्व से ही जीवत्व की परिपूर्णता के साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है I

 

यह भी वो कारण है, कि …

जीवत्व प्राप्ति उस जगतत्व को लेकर जाएगी, जिसने ब्रह्मत्व धारण किया हुआ है I

और जगतत्व सिद्धि, उस जीवत्व में बसकर ही होगी, जो ब्रह्मत्व को दर्शाता है I

जगतत्व और जीवत्व प्राप्ति, जीव और जगत की परिभाषा में बसकर ही होगी I

और इनसे आगे जो …

जो जीवातीत और जगतातीत दशा हैं, वो सिद्धितीत शब्द का अभिन्न अंग हैं I

सिद्धितीत ही तुरीयातीत आत्मा है, जो निर्गुण निराकार ब्रह्म कहलाता है I

निर्गुण निराकार ब्रह्म ही ब्रह्मत्व शब्द का गंतव्य, कैवल्य मुक्ति है I

और जो साधक ऊपर बताए बिंदुओं के स्वरूपों का साक्षात्कारी होगा, और इसके पश्चात भी वो अपनी मुक्ति से मुँह फेर लेगा, वही साधक इस अध्याय में बताए गए जीवधर और जगतधर शब्दों के अर्थ को, उनके अद्वैत स्वरूप में पूर्णरूपेण जानता होगा… अन्य कोई भी नहीं I

इस अध्याय में बताए गए इन दोनों जीवधर और जगतधर शब्दों में तारतम्य प्रतीत होने पर भी, वास्तव में इस समस्त जीव जगत में, यह दोनों एक दुसरे के पूरक और पोषक ही हैं I

 

और ऐसा इसलिए है, क्यूंकि अपने अभिव्यक्त स्वरूप में …

जीव ही जगत का पूरक और पोषकजगत ही जीव का पूरक और पोषक है I

जीव ही जगत का सगुण साकार जगत ही जीव का सगुण निराकार स्वरूप है I

यह दोनों उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, जो इनमें एकमात्र प्रकाशित हो रहा है I

 

ऐसा होने का कारण भी वही है, कि…

जीव और जगत के मूल में, ब्रह्म अपनी ब्रह्मशक्ति स्वरूप में हैं I

जीव और जगत के रूप में, ब्रह्म अपनी अभिव्यक्ति स्वरूप में हैं I

जीव और जगत के गंतव्य में, उन्ही ब्रह्म का निर्गुण निराकार स्वरूप है I

 

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि …

जीव जगत रूप में निर्गुण ब्रह्म ही सगुण साकार और सगुण निराकार हुए हैं I

इसलिए, जो भी सगुण या निर्गुण है, साकार या निराकार में है, सब ब्रह्म ही है I

सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार में, ब्रह्म ही एकमात्र प्रकाशित हो रहा है I

 

और एक बात …

ब्रह्म के स्वरूपों में तारतम्य प्रतीत होने पर भी, वास्तव में नहीं है I

इसलिए, जीव जगत में तारतम्य प्रतीत होने पर भी, वास्तव में नहीं है I

और जो साधक इन सब बिन्दुओं का साक्षात्कारी ज्ञाता होने पर भी, मुक्ति से विमुख हुआ है, वो ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, …

ब्रह्म की जीवधर और जगतधर अभिव्यक्ति, समान रूप में ही माना जाता है I

 

और ऐसी अभिव्यक्ति स्वरूप में …

जीवधर और जगतधर शब्दों में तारतम्य होता हुआ भीनहीं है I

 

इसलिए, जो साधक इन दोनों सिद्धियों, अर्थात जीवधर सिद्धि और जगतधर सिद्धि को पाया होगा, उसके दृष्टिकोण में …

जीव ही जगत है, और जगत ही जीव है I

जीवधर हो जगतधर है, और जगतधर ही जीवधर है I

यह दोनों शब्द भी उन ब्रह्म को स्पष्ट और संकेतिक, दोनों ही स्वरूपों में दर्शाते हैं I

 

लेकिन ऐसा होने पर भी, इन सिद्धियों के मार्गानुसार, …

जगत से ही जीवों का प्रादुर्भाव हैजीव होकर ही जगत का साक्षात्कार है I

जगत ही जीवों का प्रादुर्भाव मार्ग हैजीव ही जगत का साक्षात्कार मार्ग I

इसलिए, …

जगतत्व सिद्धि को धारण करके ही ब्रह्म ने स्वयं को अपने सगुण निराकारी, प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक जगत स्वरूप में स्वयं उत्पन्न किया था I

उस प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक जगत स्वरूप से ही जगत के अन्य सभी भागों का, जो कारण या दैविक, सूक्ष्म और स्थूल जगत थे, उनका स्वयं उदय हुआ था

जगतत्व और जीवत्व सिद्धि को धारण करके ही, ब्रह्म ने स्वयं को अपने सर्वसम, चतुर्मुखा सगुण साकार पितामह स्वरूप में स्वयं अभिव्यक्ता किया था I

जीवत्व सिद्धि को धारण करके ही, ब्रह्म ने जीवों को सगुण निराकारी जगत के ही सगुण साकार स्वरूप में स्वयं उत्पन्न किया था I

जगतत्व और जीवत्व सिद्धियों की योगावस्था में ही ब्रह्म ने उस प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक जगत को जीवों के भीतर, एक संस्कार रूप में ख्यापित किया थाऔर सभी जीवों, उनके उत्कर्ष मार्गों को जगत के भीतर स्थापित किया था I

यह प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक जगत, जीवों के अंतःकरण चतुष्टय के चित्त नामक भाग के भीतर, निरंग अथवा पारदर्षी संस्कार रूप में ही निवास कराया गया था I

जब जीव की चेतना निरलम्बस्थान से परे जाकर, इस संस्कार को ही उस शून्य ब्रह्म में ले जाती है, तब वो जीव, जीवातीत, जगतातीत और ब्रह्माण्डातीत होता है I

यही कारण है, कि …

जीवत्व को धारण करके ही, जीव उन ब्रह्म के जगतत्त्व को जान सकता है I

जीवत्व सिद्धि से ही जगतत्त्व सिद्धि को पाने का मार्ग प्रशस्त होता है I

और जहाँ इन दोनों सिद्धियों में, …

उन निर्गुण ब्रह्म की सगुण साकार अभिव्यक्ति ही जीव कहलाती है I

उन निर्गुण निराकार ब्रह्म की सगुण निराकार अभिव्यक्ति ही जगत कहलाती है I

इसलिए, …

जीवधर ही जगतधर का साक्षात्कार मार्गजगतधर ही जीवधर का प्रादुर्भाव मार्ग है I

जीवत्व ही जगतत्व का साक्षात्कार मार्गजगतत्व ही जीवत्व का प्रादुर्भाव मार्ग है I

जीवातीत ही जगतातीत का उत्कर्षमार्गजगतातीत ही जीवातीत का उदय मार्ग है I

और इसलिए, …

जीव और जगत के शब्दों और दशाओं में तारतम्य होने पर भी, दोनों में ब्रह्म ही एकमात्र प्रकाशित हो रहा है I

 

और ऐसा होने पर भी, …

जगतधर सिद्धि का उत्कर्ष मार्ग, जीवधर सिद्धि से होकर ही जाता है I

जीवधर का वास्तविक स्वरूप जगतधर हैऔर जगतधर का जीवधर I

और जहाँ, …

सगुण निराकारी जगतधर के भीतर ही सगुण साकारी जीवधर बसा होता है I

सगुण साकारी जीवधर के भीतर ही वो सगुण निराकारी जगतधर बसा होता है I

इसलिए भी …

जीवधर और जगतधर सिद्धियों के मार्गों में तातरम्य होने पर भी, इनके मूल और गंतव्य, दोनों में ही तारतम्य नहीं होता I

 

जिस साधक ने इन सबका साक्षात्कार किया होगा, वो साधक …

उसके अपने मूल से, वो भूधर होगा I

उसके अपने मार्ग से, वो भूमत्व का होगा I

उसके अपने प्रकट स्वरूप में, वो भूमि होगा I

और गंतव्य से, वो साधक भूमा सरीका ही होगा I

और ऐसे साधक की, …

जगतधर और जीवधर सिद्धियाँ भी ऐसी अद्वैत योगावस्था में होंगी, जिसमे कौन जातगधर सिद्धि है और कौन जीवधर वो समझ ही नहीं आएगा I

जैसे सूर्य को उसके प्रकाश से पृथक नहीं किया जा सकता, वैसे ही उस साधक के भीतर, इन जगतधर और जीवधर सिद्धियों और उनके तत्त्वों का योग होगा I

जैसे देवता को उनकी दिव्यता से पृथक नहीं किया जा सकता, वैसे ही उस साधक के भीतर, इन जगतधर और जीवधर सिद्धियों और उनके तत्त्वों का योग होगा I

इसलिए, ऐसा साधक इन सिद्धियों को एक दुसरे से पृथक भी नहीं देखेगा I

 

इसलिए ऐसा साधक यही मानेगा, कि …

अपने सगुण साकार काया रूप में, वो जीवधर है I

अपनी काया के भीतर बसे हुए सगुण निराकार जगत रूप में, वो जगतधर है I

 

और क्यूंकि यह दोनों स्वरूप, उन्ही निर्गुण निराकार ब्रह्म की समानरूपेण और पूर्णरूपेण अभिव्यक्ति ही हैं, इसलिए ऐसे साधक के लिए, इन दोनों सर्वव्यापक स्वरूपों में, …

वही एकमात्र ब्रह्म प्रकाशित हो रहा होगा, जो स्व:प्रकाश कहलाता है I

और जहाँ वो निर्गुण सबको प्रकाशित करता हुआ भी, स्वयं छिपा रहता है I

 

लेकिन ऐसा होने पर भी, उस निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार, कुछ उत्कृष्ट योगीजनों ने किया ही है, जिन्होंने उसको एक निरंग सर्वव्यापक, या सर्वातीत या दोनों स्वरूपों का में बताया है I

और इसी साक्षात्कार को ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में जल शब्द से भी सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन दर्शाया गया है I

ऐसे योगी का आत्मस्वरूप, अखंड सनातन अद्वैत निरालम्ब निराधार पूर्णब्रह्म है I

 

ऐसा होने के कारण, महाब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में …

वो निर्गुण निराकार ब्रह्म मुट्ठी भर साधकों के साक्षात्कार में ही है I

ऐसे योगी उन निर्गुण को, उनके आत्मस्वरूप में ही साक्षात्कार करते हैं I

आत्मस्वरूप के सीवा निर्गुण ब्रह्म साक्षात्कार का कोई और मार्ग है ही नहीं I

निर्गुण ब्रह्म साक्षात्कार भी, स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य में बसकर ही हो सकता है I

 

इसलिए, …

यहाँ बताया जा रहा तथ्य भी वही निर्गुण ब्रह्म और उनका ब्रह्मपथ है I

अंततः, मुमुक्षुजन निर्गुण साक्षात्कार स्वयं ही स्वयं मेंऔर ऐसे ही करेंगे I

इस अध्याय में ऐसा और कहीं नहीं बताया जाएगा, इसलिए इसको प्रारम्भ में ही बता दिया है I

और अब इन बिंदुओं को मूल बनाके, इस अध्याय का प्रारम्भ करता हूँ …

 

टिप्पणियां: इस अध्याय का साक्षात्कार करने से पूर्व, साधक को, …

  • पितमाहगुरु ब्रह्मा जी और पितामही गुरु, अव्यक्त शक्ति (या माया शक्ति) के पूर्ण अनुग्रह की प्राप्ति के लिए प्रयास करना होगा I
  • इस अनुग्रह का मार्ग भावनात्मक ही है, अर्थात साधक के भाव से ही स्वयं प्रकट होता है, और वो भी साधक के मुक्तिमार्ग स्वरूप में I

जैसे ब्रह्म की इच्छा शक्ति जिससे ब्रह्म रचना हुई थी, वो ब्रह्म का भाव ही था, और जिससे उन्ही ब्रह्म के साधन स्वरूप में ही ब्रह्माण्ड का स्वयं उदय हुआ था… वैसे ही साधक की ब्रह्म भावपन स्थिति से ही साधक का मुक्तिमार्ग, साधक के साधन स्वरूप में ही स्वयं प्रकट होता है I

जैसे ब्रह्म रचना के मूल में, ब्रह्म की इच्छा शक्ति रूपी जीव जगत उत्पन्न करने का भाव ही था… वैसे ही साधक की ब्रह्म भावपन दशा से, साधक का जीवातीत और जगतातीत अवस्थाओं की ओर को जाने वाला, मुक्तिमार्ग प्रशस्त होता है I

और यदि जीवतीत और जागतातीत की प्राप्ति के पश्चात भी वो साधक इन दोनों से लगाव या अलगाव न करे, तो इस दशा में साधक की तुरीयातीत आत्मसाक्षात्कार का मार्ग ही प्रशस्त हो जाएगा I और इसी को यहाँ पर ब्रह्म अनुग्रह कहा गया है I

  • इस अनुग्रह में, पितामह गुरु ब्रह्मा जी, अपने प्रजापति स्वरूप में, साधक की सुषुम्ना नाड़ी के भीतर, जो ब्रह्म नाड़ी है, उस नाड़ी की अतिप्रकाशमान अवस्था में बसे हुए होते हैं I
  • और इसी अनुग्रह में, पितामही गुरु, माया शक्ति, उस साधक के व्यान प्राण में ही प्रतिष्ठित होती हैं I
  • इस अनुग्रह के लिए, साधक के शरीर के भीतर ही, उन पितामह और पितामही का योग होना होगा, जो ब्रह्म नाड़ी और व्यान प्राण के प्रकाशों की योगदशा में ही होता है I

पितामह और पितामही के ऐसे योग के कारण, साधक के शरीर के भीतर ही एक सिद्ध शरीर स्वयंप्रकट होता है, जो बाहर से तो भगवे वर्ण का होता है, लेकिन उस भगवे वर्ण के भीतर एक बहुत प्रकाशमान श्वेत वर्ण होता है I इसी सगुण स्वरूप को दर्शाते शरीर को नीचे के चित्र में दिखाया गया है, लेकिन इसके बारे में एक आगे के अध्याय में बात होगी… यहाँ नहीं I

स्वरूप स्थिति सगुण, सगुण स्वरूप स्थिति
स्वरूप स्थिति सगुण, सगुण स्वरूप स्थिति

 

इस ग्रन्थ में, इस सिद्ध शरीर को सगुण स्वरूप स्थिति भी कहा गया है I

और क्यूंकि इस सिद्ध शरीर को आंतरिक मार्ग, अर्थात रूद्र मार्ग से ही पाया जाता है, इसलिए इस ग्रन्थ में यह सिद्ध शरीर, रूद्र रौद्री योग शरीर भी कहलाया गया है I

इसी सिद्ध शरीर को साधक की सगुण स्वरूप स्थिति भी कहते हैं, और ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में, इस सिद्ध शरीर का धारक योगी, सगुणत्मा भी कहलाता है I

  • और जहाँ उस सगुणत्मा स्वरूप-स्थिति का नाता, मेरे कुलदेवता रूद्र और उनकी अर्धांगनी शक्ति, माँ रौद्री से भी होता है, जिसके कारण इस योग में रौद्री रूद्र योग भी साधक की काया के भीतर ही हो जाता है I
  • जबतक ऐसा नहीं होगा, तबतक इस अध्याय का साक्षात्कार करना, पूर्ण असंभव तो नहीं… लेकिन असंभव सा ही प्रतीत होगा I
  • वैसे तो इस ग्रन्थ के सभी अध्याय बहुत कठिनाई से, कई आंतरिक विप्लवों को पार करके ही साक्षात्कार होते हैं (जो कई जन्मों तक भी चल सकती हैं), लेकिन उन सभी कठिन अध्यायों में से भी जो अध्याय बहुत अधिक कठिन हैं, उनमें से एक यह अध्याय है I
  • यह अध्याय उस उत्कृष्ट ज्ञान मार्ग का ही है, जिसमें जाते समय, मेरे मूलाधार से सहस्रार चक्रों तक कई बार और कई सारी ऊर्जाओं के कई विस्फोट होते थे, और उन विस्फोटों से ही यहाँ दिखाया गया सिद्ध शरीर स्वयं प्रकट हुआ था I

और इस प्रक्रिया में मैं अधमरा भी कई बार हुआ था I

  • इसलिए, इस अध्याय के साक्षात्कारों में जाने से पूर्व, साधकगण इस बात को अपने स्मरण में रखे, कि यह मार्ग कठिन से भी कठिन ही है I
  • और उन माया और ब्रह्म की योगावस्था आते आते, और उन कई सारे विस्फोटों में निवास करते करते, उस अधमरी सी लेकिन ज्ञानमय और चैतन्यमय स्थिति में, मैंने इस अध्याय जो जाना है I
  • और इस अध्याय के मार्ग में, एक दशा तो ऐसी भी आई, जिसमें मुझे लगा, कि बस यही काया का अंत है… लेकिन जब ब्रह्मा और ब्रह्मशक्ति महेरबान होते हैं, तो मेरे जैसे गधा भी पहलवान ही होता है I मैंने इस बात को अपने साक्षात्कार मार्गों में कई बार, ऐसे ही जाना है I
  • इसलिए आज के और आगे के किसी भी समयखण्ड में, यह अध्याय, अधिकाँश साधकगणों के लिए ऐसा निषेध ही रहेगा, जिसमें वही साधक जा पाएगा, जो उस भाव में बस चुका है, जो नीचे दर्शाया गया है …

काया तो कई बार मिलेगी, लेकिन इस मार्ग का ज्ञान बस इसी जन्म में पाना है I

 

इसलिए, जिस साधक का …

काया सहित, जीव जगत नामक मोह समाप्त हो गया, वही इस अध्याय में आए I

यहाँ कहे गए मोह शब्द को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता, कि वो साधक दुर्गम वनों, गुफाओं, पर्वतों या कंदराओं में बसा हुआ है, या अपनी ही गृहस्ती में निवास कर रहा है I

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि जब जीव जगत रूपी मोह समाप्त होता है, तब यह सभी बातें व्यर्थ ही प्रतीत होती हैं, कि तुम कहाँ या किस दिशा में निवास कर रहे हो I

और इस अध्याय में जाने से पूर्व, ऐसा कायातीत भाव धारी साधक, भगवान् वेद व्यास की वो वाणी में ही पूर्णरूपेण बस जाए, जो उन गुरुभगवान् ने मुझे तब बताई थी जब मेरी इस निरबल काया से परे, मेरा ही एक बलवान शरीर, उनके पास तब गया था, जब मेरी यह स्थूल काया को अधमरा सा हुए… कई माह बीत चुके थे I

उस समय उन गुरु भगवान् ने जो कहा था, वो एक पूर्व के अध्याय में भी बताया जा चुका है… और उसी गुरुवाणी को यहाँ पुनः बता रहा हूँ, लेकिन केवल उन उत्कृष्ट साधकगणो के लिए, जो मुकुक्षु शब्द की परिभाषा के अंतर्गत आते होंगे I

उस समय गुरुभगवान बादरायण ऋषि… ऐसा बोले थे …

देह अनात्मन् आत्मा अदेहम् I

 

इस अध्याय में बताए जा रहे साक्षात्कार और सिद्धिमार्ग में जाने से पूर्व, जबतक साधक के भाव में, इस गुरुवाक्य के समस्त भाग, इसी गुरुवाक्य की अद्वैत (या गंतव्य) दशा में पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित नहीं होंगे… उस साधक की मृत्यु निश्चित है I

इसलिए, यह अध्याय अधिकांश साधकगणों के लिए निषेध ही रहेगा I

इसपर केवल वो मुमुक्षुजन गमन करें, जिनको जीव जगत का मोह समाप्त हो गया है, क्यूंकि यहाँ बताए जा रहे बिन्दुओं के साक्षस्कार में, यदि ऐसे मुमुक्षु की मृत्यु ही क्यों न हो जाए, वो योगी अपनी विदेहमुक्ति को पाएगा  ही I

ऐसा होने का कारण भी वही है, कि देहावसान के समय, योगी का अंतिम भाव ही देहरहित होने के पश्चात की गति का मार्ग होता है I

 

और जो वास्तविक मुमुक्षु है, वो तो …

जीव जगत के मोह से ही अतीत हो गया, उसके लिए जीवन क्या और क्या मृत्यु I

 

इसलिए, …

जो योगी देहातीत भाव में स्थित न हुआ हो, वो उस अध्याय में आए I

मैं यह स्पष्ट बोल रहा हूँ I

 

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत मार्ग, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धि मार्ग
पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत मार्ग, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धि मार्ग, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धि, पञ्चब्रह्म गायत्री मार्ग, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धि,

 

 

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत का मूल, गायत्री ब्रह्म सिद्धांत का मूल, गायत्री ब्रह्म सिद्धांत का मूल, ब्रह्म गायत्री सिद्धांत का मूल, … तत्त्व साधना, आयाम साधना, काल साधना, आकाश साधना, दिशा साधना, दशा साधना, देव साधना, देवी साधना, देवत्व साधना, जीवत्व साधना, जगतत्व साधना, … काल का गंतव्य सनातन है, आकाश का गंतव्य अनंत है, दिशा का गंतव्य सर्वदिशा व्यापक है, दशा का गंतव्य सर्वव्याप्त है, … काल का प्राकृत स्वरूप जीव जगत का गर्भ है, आकाश का प्राकृत स्वरूप जीव जगत है, दशा का प्राकृत स्वरूप जीव जगत का तारतम्य है, दिशा का प्राकृत स्वरूप जीव जगत का उत्कर्ष पथ है, …

बहुत वर्ष पूर्व, और इस भूलोक के बहुत सारे देशों में भ्रमण करने के पश्चात, मैं ऐसा सोचने लगा कि सभी पंथ अपने अपने देवताओं को …

  • अनादि (या सनातन) कहते हैं… जो काल आयाम के अंतर्गत आता है I
  • अनंत कहते हैं… जो आकाश आयाम के अंतर्गत आता है I
  • सर्वव्यापक कहते हैं… जो दशा आयाम के अंतर्गत आता है I
  • सर्वदिशा व्यापक (अर्थात सभी मार्गों में व्याप्त) भी सांकेतिक रूप में कहते हैं… जो दिशा आयाम के अंतर्गत ही आता है I
  • तो क्यों न इन आयाम चतुष्टय पर ही साधना करके, उन सभी पंथों के देवताओं के मूल को ही एक साथ ही जाना जाए I

मैंने ऐसा इसलिए सोचा, क्यूंकि इन आयामों के गंतव्य दशा के अंतर्गत ही तो सभी पंथों के देवत्व बिंदुओं और देवताओं को बताया गया है I

इसलिए मैंने सोचा, कि यदि मैं इन आयामों को ही जान लूं, तो इन सभी पंथों के देवत्व बिंदुओं और देवताओं को एक साथ ही जान जाऊँगा, और इससे बहुत समय बच भी जाएगा, क्यूंकि यदि उनको पृथक मार्गों में जाकर जानूँगा, तो एक-एक करके जानने में तो यह जीवन ही छोटा पड़ जाएगा I

इसी भाव में, आयाम साधना के अंतर्गत कई सारी साधनाएं प्रारम्भ हुई, जो कई भागों में थी, जैसे गुण साधना, काल साधना, तन्मात्र साधना, आकाश साधना, महाभूत साधना, दशा साधना, दिशा साधना इत्यादि I

 

अब आगे बढ़ता हूँ …

इन साधनाओं में जो जाना, उसको यहाँ संक्षेप में बताता हूँ, और इनका थोड़ा विस्तार भी इस अध्याय में बाद में किया जाएगा I

  • काल आयाम का प्राकृत स्वरूप, जीव जगत की सदैव परिवर्तनशील गर्भ ऊर्जा है, और इसीलिए, कालचक्र ही प्राकृत जीव जगत है I

और इसी काल का गंतव्य स्वरूप, अनादि सनातन ब्रह्म हैं I

इसलिए काल अपने चक्र स्वरूप में ही, अपने तारतम्य से सुसज्जित, ऊर्जावान जीव जगत रूपी प्रकृति है, और काल का गंतव्य ही तारतम्य से रहित, अखंड सनातन ब्रह्म हैं I

 

  • आकाश आयाम का प्राकृत स्वरूप, जीव जगत का सदैव परिवर्तनशील स्वरूप है और इसीलिए, आकाशचक्र ही प्राकृत जीव जगत है I

और इसी आकाश का गंतव्य स्वरूप, अनंत ब्रह्म हैं I

इसलिए आकाश अपने ही चक्र स्वरूप में ही, जीव जगत रूपी प्रकृति है, और आकाश का गंतव्य ही अनंत ब्रह्म हैं I

 

  • दशा आयाम का प्राकृत स्वरूप, जीव जगत का सदैव परिवर्तनशील स्वरूप है और इसीलिए, दशाचक्र ही प्राकृत जीव जगत है I

और इसी दशा का गंतव्य स्वरूप, सर्वव्यापक ब्रह्म हैं I

इसलिए दशा अपने ही चक्र स्वरूप में, जीव जगत रूपी प्रकृति का तारतम्य है, और दशा का गंतव्य ही सर्वव्यापक ब्रह्म हैं I

 

  • दिशा आयाम का प्राकृत स्वरूप, जीव जगत का सदैव परिवर्तनशील स्वरूप है और इसलिए, दिशा चक्र ही प्राकृत जीव जगत है I

और इसी दिशा का गंतव्य स्वरूप, सर्वदिशा दर्शी ब्रह्म हैं I

इसलिए दिशा अपने ही चक्र स्वरूप में ही, जीव जगत रूपी प्रकृति में बसे हुए सदैव परिवर्तनशील उत्कर्ष पथ हैं, और दिशा का गंतव्य ही सर्वदिशा दर्शी (या सर्वदिशा व्यापक या सर्व मार्ग व्याप्त) ब्रह्म हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और जब इन सभी आयाम मार्गों से, कुछ ही वर्षों में मैंने इन सभी पंथों में बताए गए देवत्व बिन्दुओं की मूल दशाओं को जान लिया, तो मेरे सामने उन सभी पंथों के देवी देवता भी प्रकट होते चले गए I

 

ऐसा होने का कारण था, कि जब हमारी साधनाएँ …

तत्त्व पर होंगी, तो उस तत्त्व के देवत्व बिंदुओं पर भी स्वतः ही जो जाती हैं I

देवत्व बिंदुओं पर होंगी, तो उनके तात्त्वों पर स्वतः ही नहीं होती हैं I

और इसका अर्थ हुआ कि …

तत्त्वों पर साधनाओं में, उन तत्त्वों के देवत्व और देवता दोनों आते ही हैं I

पर देवत्व या देवताओं पर साधनाओं में, उन देवताओं के तत्त्व नहीं होते हैं I

तो इसका यह भी अर्थ हुआ कि …

जब तत्वों पर साधनाएँ होंगी, तो उन तत्त्वों के देवताओं की सिद्धि भी होगी I

जब देवताओं पर साधना होगी, तो उनके तत्त्वों की सिद्धियाँ नहीं भी हो सकती हैं I

यही कारण है, कि …

देवत्व बिंदुओं और उनके देवताओं पर साधनाएँ अपूर्ण होती हैं I

और तत्त्वों की साधनाएं ही पूर्ण होती हैं I

और एक बात …

तत्त्व सिद्ध उन सब देवत्व बिंदुओं का सिद्ध होता है, जो उस तत्त्व के अंतर्गत हैं I

 

इसलिए, आयाम साधनाओं में, उन आयामों के गंतव्य रूप में …

काल सिद्धि, उन सभी देवताओं की सिद्धि भी प्रदान करेगी, जो अनादि हैं I

आकाश सिद्धि उन सभी देवताओं की सिद्धि प्रदान करेगी, जो अनंत हैं I

दशा सिद्धि उन सभी देवताओं की सिद्धि प्रदान करेगी, जो सर्वव्याप्त हैं I

दिशा सिद्धि उन सभी देवताओं की सिद्धि प्रदान करेगी, जो सर्वदिशा व्यापक हैं I

 

यही मेरा मार्ग था, लेकिन यह सब तो पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत के अंतर्गत ही आते हैं, इसलिए अब इस बिंदु को बताता हूँ …

  • काल आयाम सद्योजात ब्रह्म और माँ गायत्री के हेमा मुख का है, क्यूंकि कल की अभिव्यक्ति सद्योजात, अर्थात हिरण्यगर्भ से ही हुई थी I
  • दिशा आयाम तत्पुरुष ब्रह्म और माँ गायत्री के रक्ता मुख के अंतर्गत है, क्यूँकि तत् शब्द दिशा को ही दर्शाता है I
  • दशा आयाम में वामदेव ब्रह्म और माँ गायत्री के धवला मुख का है, क्यूंकि जगत के उत्पत्ती मार्ग में भी वामपथ ही है I
  • आकाश आयाम ईशान ब्रह्म का होता हुआ भी, सर्वप्रथम अघोर ब्रह्म में ही साक्षात्कार होता है, इसलिए साक्षात्कार मार्ग में आकाश आयाम, अघोर ब्रह्म के विश्वरूप ब्रह्म स्वरूप में ही है I

 

और क्यूंकि इन चारों आयाम में ही ब्रह्म की समस्त रचना बसाई गई थी, इसलिए इन आयामों की साधना में, जो भी जीव और जगत, या जीवातीत और जगतातीत है, वो सब एक ही समय पर और एक साथ ही जाना जा सकता है I

यही आयाम साधना की महती है I

इसी आयाम साधना के अंतर्गत जाते हुए मुक्तिमार्ग में, अन्य सभी साधनाएं भी स्वतः ही पूर्ण हो जाती है, जैसे महाभूत साधनाएँ, तन्मात्र साधनाएँ, गुण साधनाएँ, पञ्च कोष साधनाएँ, शब्द ब्रह्म से सम्बंधित और सुसज्जित साधनाएँ, इत्यादि I

और इस परकाया प्रवेश से प्राप्त हुए जन्म में, यही तत्त्व साधना मेरे सात्क्षात्कारों के कई मार्गों में से, एक मार्ग भी हुआ है I

और इसी साधना के ज्ञान से, मैंने यह ग्रन्थ लिखा है, जिसके मूल में यहाँ बताया जा रहा, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत ही है I

 

पञ्चब्रह्म प्रदक्षिणा का गंतव्य, पञ्च ब्रह्म परिक्रमा का गंतव्य, …  पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा का गंतव्य, पञ्चब्रह्म गायत्री परिक्रमा का गंतव्य, ब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा का गंतव्य, गायत्री ब्रह्म प्रदक्षिणा का गंतव्य, … पञ्च ब्रह्मोपनिषत प्रदक्षिणा का गंतव्य, पञ्च ब्रह्मोपनिषत परिक्रमा का गंतव्य, … प्रदक्षिणा का गंतव्य ईशान ब्रह्म हैं, परिक्रमा का गंतव्य ईशान हैं, प्रदक्षिणा का गंतव्य ईशान हैं, परिक्रमा का गंतव्य ईशान हैं, …

ब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा मार्ग की समस्त दिशाओं में जब साधक की चेतना एक-एक करके जाती है, तो उन सभी दशाओं में साधक की चेतना एक ही तत्त्व को सर्वव्यापी पाती है I

वो सर्वव्यापी दशा, स्वच्छ जल के समान होती है, और यह दशा एक निरंग झिल्ली के समान इस प्रदक्षिणा मार्ग में और इस प्रदक्षिणा मार्ग में साक्षात्कार हुई समस्त दशाओं में, समान रूप में और पूर्ण रूप में साक्षात्कार होती ही चली जाती है I

इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि यह सर्वव्यापक निरंग स्वच्छ जल के समान जो दशा है, वो उस साधक के प्रदक्षिणा मार्ग के समस्त पड़ावों में समान रूप में (या यह कहूँ समान अरूप में) बसी हुई है I

और यही निरंग जल के समान दशा, उस साधक को उसकी अपनी स्थूल आदि काया के भीतर भी साक्षात्कार होने लगती है I

और ऐसे साधक यह भी साक्षात्कार करता है, कि इसी निरंग जल के समान दशा ने, उस साधक की काया को घेरा भी हुआ है, अर्थात उस साधक की स्थूल काया सहित, काया के भीतर बसी हुई समस्त सूक्ष्म, दैविक, कारण और संस्कारिक दशाएं भी इसी निरंग जल के समान दशा के भीतर बसी हुई हैं I

और इसके अतिरिक्त, उस साधक को ऐसा भी साक्षत्कार होता है, कि उस साधक की स्थूलादि काया भी इस निरंग जल के समान तत्त्व के भीतर बसी हुई हैं I

इसलिए ऐसे साक्षात्कार के पश्चात, वो साधक जान जाता है, कि जो निरंग जल के समान है, वो समान रूप में सर्वव्यापक है, और उसी में ब्रह्माण्ड और पिण्ड भी समान रूप में बसे हुए हैं I

इसके साथ साथ, वो सर्वव्यापक जल ही समस्त जीव जगत को अपने भीतर बसाया हुआ है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जब साधक की चेतना, यहाँ बताया गया प्रदक्षिणा मार्ग पूर्ण करती है, तो वो साधक सोचने पर विवश भी हो जाता है, कि यह निरंग जल के समान दशा कौन सी है, जिसने सबको अपने भीतर बसाया हुआ है, और वही दशा सबके भीतर भी बसी हुई है I

वो साधक सोचने लगता है, कि निरंग ही तो निर्गुण कहलाता है, तो क्या यह निरंग सर्वव्यापक जल, जिसका मैं मेरी स्थूलादि काया सहित, अन्य सभी दशाओं में भी समान रूप में साक्षात्कार कर रहा हूँ… क्या वो निर्गुण ब्रह्म हैं? I

और जैसे जैसे यह साक्षात्कार चलता है, वैसे वैसे उस साधक का पूर्व से चलता हुआ आत्ममार्ग, जो राज योग, भक्ति योग और कर्म योग की एक योगावस्था में ही बसा हुआ था, वो मार्ग उस निरंग जल को जानने हेतु, ज्ञान योग नामक मुक्तिपथ में ही चला जाता है I

इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि सभी योगमार्गों के गंतव्य में, ज्ञानयोग ही है I

और जहाँ वो ज्ञान योग ही आत्मयोग, आत्ममार्ग, आत्मपथ, ब्रह्मपथ कहलाता है, जो अंततः, आत्मज्ञान को ही दर्शाता है I

और जहाँ साधक के उस आत्मज्ञान का आत्मस्वरूप ही निर्गुण ब्रह्म कहलाता है I

 

ऐसी दशा में वो साधक जो जानता है, वो अब बताता हूँ …

वो निरंग स्वच्छ जल के समान जो व्यापक तत्त्व है, वही निर्गुण निराकार ब्रह्म हैं I

पञ्चब्रह्म मार्ग में उन्ही निर्गुण ब्रह्म को, ईशान ब्रह्म कहा गया है I

उन्ही ईशान को सदाशिव का ईशान मुख, शिव का ईशान मुख कहा जाता है I

नासदीय सूक्त में उन्ही ईशान को, अप् शब्द से सम्बोधित किया गया था I

वही ईशान नामक ब्रह्म, वैदिक वाङ्मय में कैवल्य मोक्ष कहलाते हैं I

ईशान ब्रह्म की दिव्यता को ही माँ गायत्री का मुक्ता मुख कहा गया था I

माँ गायत्री का मुक्ता मुख ही अदि पराशक्ति, ब्रह्मशक्ति इत्यादि कहलाता है I

 

इसलिए वो साधक जान जाता है, कि यह अकस्मात् प्रारम्भ और चलित होता हुआ साक्षात्कार मार्ग …

पञ्च ब्रह्म प्रदक्षिणा मार्ग का सर्वव्यापक गंतव्य, कैवल्य मुक्ति ही है I

इसी गंतव्य की दिव्यता को ही माँ गायत्री का मुक्ता मुख कहा गया है I

तो अब अगले बिंदु पर जाता हूँ …

 

मूलास्त्र की परिभाषा, आयाम का अस्त्र स्वरूप, मूलास्त्र क्या है, मूलास्त्र चतुष्टय क्या है, मूलास्त्र चतुष्टय किसे कहते हैं, आयाम चतुष्टय के अस्त्र, आयाम चतुष्टय का अस्त्र स्वरूप, आयाम चतुष्टय ही मूलास्त्र है, …

मूलास्त्र चार होते हैं, जो आयाम चतुष्टय के चार अस्त्र स्वरूप को दर्शाते हैं I

और जहाँ आयाम चतुष्टय का चक्र स्वरूप ही ब्रह्मशक्ति रूपी अस्त्र होता है, जिसका स्थूल, सूक्ष्म, दैविक या कारण और संस्कारिक जगत स्वरूप ही आयाम सिद्ध योगी का अस्त्र होता है I

 

इसलिए, आयाम सिद्ध योगी …

महा ब्रह्माण्ड को ही ज्ञान और अस्त्र, दोनों स्वरूपों में पाता है I

और जहाँ वो ज्ञान और अस्त्र स्वरूप ही, उस योगी का मुक्तिमार्ग होता है I

अपने मार्गानुसार, ऐसा योगी, ब्राह्मण क्षत्रिय या क्षत्रिय ब्राह्मण ही हो सकता है I

तो अब इन आयाम चतुष्टय और उनके मूलास्त्र चतुष्टय स्वरूप को संक्षेप में बताता हूँ …

काल आयाम का अस्त्र स्वरूप कालास्त्र है, जो सद्योजात ब्रह्म का है I

दिशा आयाम का अस्त्र स्वरूप दशास्त्र है, जो तत्पुरुष ब्रह्म का है I

दशा आयाम का अस्त्र स्वरूप दिशास्त्र है, जो वामदेव ब्रह्म का है I

आकाश आयाम का अस्त्र स्वरूप आकाशास्त्र है, जो अघोर ब्रह्म का है I

 

और जहाँ यह सभी मूलास्त्र…

आयाम चतुष्टय के चक्र रूप में होते हैं I

काल के सनतान गर्भ रूप में ही होते हैं I

आकाश के अनंत स्वरूप में स्थापित होते है I

दशा से सर्वव्यापक स्वरूप में स्थापित होते हैं I

सर्व दिशाओं के समस्त भागों से सम्बंधित रहते हैं I

मूल प्रकृति के सार्वभौम ब्रह्मशक्ति स्वरूप ही होते हैं I

जो ऐसा नहीं, वो मूलास्त्र नहीं कहलाया जा सकता I

और जहाँ वो मूल प्रकृति भी सार्वभौम, अपराजिता ब्रह्मशक्ति ही हैं, जो दुर्गा, पराम्बा, त्रिपुरसुन्दरी, महाकाली आदि उत्कृष्ट नामों से पुकारी जाती हैं I

 

पञ्चब्रह्म प्रदक्षिणा में गायत्री साक्षात्कार, पञ्च मुखा गायत्री साक्षात्कार, गायत्री सरस्वति का साक्षात्कार, गायत्री विद्या साक्षात्कार, गायत्री विद्या सरस्वती साक्षात्कार, गायत्री सरस्वती विद्या साक्षात्कार, … महात्मा कौन?, ज्ञानात्मा कौन?, चिदात्मा कौन?, अहमात्मा कौन?, प्राणात्मा कौन?, सर्वात्मा कौन?, सर्वात्मा क्या है?, मनात्मा क्या है?, ज्ञानात्मा क्या है?,  चिदात्मा क्या है?,  अहमात्मा क्या है?, प्राणात्मा क्या है?, … सर्वात्मा किसे कहते हैं?, मनात्मा किसे कहते हैं?, ज्ञानात्मा किसे कहते हैं?चिदात्मा किसे कहते हैं?अहमात्मा किसे कहते हैं?, प्राणात्मा किसे कहते हैं?, … ज्ञान ब्रह्म क्या है?, ज्ञान ब्रह्म किसे कहते हैं?, ज्ञान ब्रह्म कौन?, प्राण ब्रह्म  क्या है?,  प्राण ब्रह्म किसे कहते हैं?,  प्राण ब्रह्म कौन?,  मन ब्रह्म क्या है?, मन ब्रह्म किसे कहते हैं?, मन ब्रह्म कौन?, अहम् ब्रह्म क्या है?, अहम् ब्रह्म किसे कहते हैं?, अहम् ब्रह्म कौन?, …

इस पञ्चब्रह्म प्रदक्षिणा को पूर्ण करके, वो साधक यह भी जान जाता है, कि …

 

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत और मुक्ति, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत और मुक्तात्मा
पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत और मुक्ति, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत और मुक्तात्मा, मूलास्त्र चतुष्टय, जीव ही जगत, जगत ही जीव, जीवातीत, जगतातीत, मनात्मा, ज्ञानात्मा, चिदात्मा, अहमात्मा, प्राणात्मा, सिद्धांतातीत, तंत्रातीत,

 

 

पर वो ज्ञानाकाश नामक सिद्धांत उन सद्योजात से वाम दिशा के ब्रह्म, अर्थात अघोर ब्रह्म में ज्ञान शक्ति के रूप में ही प्रकाशित होता है I और ऐसा होने पर, अघोर का मार्ग, ज्ञान योग का कारक बनता है I

अघोर ब्रह्म ही ज्ञान शक्ति के धारक हैं I

इसलिए, जबकि ज्ञान ब्रह्म नामक सिद्धि, जिसका गंतव्य ज्ञानात्मा कहलाता है और जिसका स्थान ज्ञानाकाश ही है, वो पीले वर्ण के बुद्धत्व को धारण किये हुए सद्योजात ब्रह्म का ही है, लेकिन तब भी वो ज्ञानाकाश की ज्ञान शक्ति, नीले वर्ण के तमोगुणी अघोर ब्रह्म के अहम् तत्त्व में ही प्रकाशित होती है I

यहाँ कहा गया अहम् तत्त्व, प्रधानतः साधक की बुद्धि और अहम् की उस योगावस्था को ही दर्शाता है, जिसमें अहम् विशुद्ध होता है, और बुद्धि निष्कलंक I

और जहाँ निष्कलंक बुद्धि, प्रणव की ही वाचक है I

आत्ममार्ग में प्रणव के गंतव्य स्वरूप में प्रकाशित दशा, साधक के ब्रह्मरंध्र विज्ञानमय कोष में ही, विस्तार सर्पिल में गति करती हुई चमकदार और अतिसूक्ष्म हेमा वर्ण की ऊर्जा स्वरूप में ही साक्षात्कार होती है I और जहाँ उस विज्ञानमय कोष का नाता, सद्योजात ब्रह्म और माँ गायत्री के हेमा मुख से ही है I

 

पर वो चिदाकाश नामक सिद्धांत उन तत्पुरुष ब्रह्म से वाम दिशा के ब्रह्म, अर्थात सद्योजात ब्रह्म में क्रिया शक्ति के रूप में ही प्रकाशित होता है I और ऐसा होने पर सद्योजात का मार्ग भी क्रियात्मक ही है, अर्थात कर्म योग का मार्ग है I

सद्योजात ब्रह्म ही क्रिया शक्ति के धारक हैं I

इसलिए, जबकि चेतन ब्रह्म नामक सिद्धि, जिसका गंतव्य चिदात्मा कहलाता है, वो रजोगुणी (अर्थात लाल वर्ण) के तत्पुरुष ब्रह्म का ही है, लेकिन तब भी वो ब्रह्म की क्रिया शक्ति, पीले वर्ण के बुद्धत्व को धारण किये हुए सद्योजात ब्रह्म के प्रज्ञान तत्त्व में ही प्रकाशित होती है I

यहाँ कहा गया प्रज्ञान तत्त्व, प्रधानतः साधक की निष्कलंक बुद्धि और संस्कार रहित चित्त की योगावस्था को दर्शाता है I

 

पर वो मनाकाश नामक सिद्धांत, उन वामदेव ब्रह्म से वाम दिशा के ब्रह्म, अर्थात तत्पुरुष ब्रह्म में परा शक्ति (अर्थात चेतन शक्ति या चित्त शक्ति) के रूप में ही प्रकाशित होता है I

तत्पुरुष ब्रह्म ही चित्त शक्ति के धारक हैं I

तत्पुरुष के समान, पितामह ब्रह्मा के रचैता स्वरूप को भी लाल वर्ण का (अर्थात रजोगुणी) कहा गया है I

इसलिए, जबकि मन ब्रह्म नामक सिद्धि, जिसका गंतव्य मनात्मा कहलाता है, और जिसका स्थान मनाकाश ही है, वो सत्त्वगुणी वामदेव ब्रह्म की ही है, लेकिन तब भी वो मनाकाश की इच्छा शक्ति, लाल रंग के रजोगुणी तत्पुरुष ब्रह्म के चित्त नामक तत्त्व में ही, अयमात्मा स्वरूप में ही प्रकाशित होती है I

यहाँ कहा गया अयमात्मा शब्द, प्रधानतः साधक के मन और चित्त की योगावस्था को ही दर्शाता है, जिसमें मन स्वयं ही स्वयं में विलीन होता है, और चित्त, संस्कार रहित होता है I

 

अब ध्यान देना …

जब चित्त रजोगुणी होता है, तो उसका वर्ण भी हलके लाल रंग जैसे हो जाता है I

जब चित्त तमोगुणी होता है, तो उसका वर्ण भी हलके नील रंग का हो जाता है I

जब चित्त सत्त्वगुणी होता है, तब उसका वर्ण भी श्वेत रंग का होता है I

इसलिए चित्त के रंगों का अध्यन करके यह भी जाना जा सकता है, कि उस चित्त के धारक जीवादी का मूल गुण क्या है I

 

पर वो अहमाकाश नामक सिद्धांत उन अघोर ब्रह्म से वाम दिशा के ब्रह्म, अर्थात वामदेव ब्रह्म में मनस तत्त्व की अहम् शक्ति (अर्थात मनस शक्ति या इच्छा शक्ति) के रूप में ही प्रकाशित होता है I

वामदेव ब्रह्म ही इच्छा शक्ति के धारक हैं I

और यह भी वो कारण है, कि तिब्बती बार्दो नामक तंत्र (अर्थात Tibetan book of dead) में भी, समंतभद्र और इनकी शक्ति समंतभद्री का शब्द अह-हम् (या अहम्) बताया गया है, और जहाँ वो शक्ति ही श्वेत वर्ण की प्राचीन बुद्ध, समंतभद्री कहलाई गई हैं I

और उसी तिब्बती बार्दो तंत्र में, मन को ही प्राचीन बुद्ध समंतभद्र कहा गया है, जो नीले वर्ण के होते हैं, और जिनका शब्द भी अह-हम् (या अहम्) ही बताया गया है I

इस बार्दो तंत्र के समंतभद्र बुद्ध ही वेदमार्ग के अघोर ब्रह्म हैं, और इस मार्ग की समंतभद्री ही पंचब्रह्म मार्ग के वामदेव ब्रह्म की इच्छा शक्ति हैं, और जो श्वेत प्राण, अर्थात समतावादी प्राणों को दर्शाती हैं I

इसलिए, जबकि विशुद्ध अहम् शक्ति नामक सिद्धि, जिसका गंतव्य अहमात्मा कहलाता है, और जिसका स्थान अहमाकाश ही है, जो नीले वर्ण के तमोगुणी अघोर ब्रह्म की ही है, लेकिन तब भी वो अहमाकाश की अहम् शक्ति, श्वेत और काले वर्णों के सत्त्वगुणी वामदेव ब्रह्म के मनस तत्त्व में, तत् तत्त्व रूपी शब्द से ही प्रकाशित होता है I

यही कारण है, कि मनस तत्त्व और उसके मनोमय कोष का नाद भी अहम् शब्द का ही है I वामदेव ब्रह्म ही मनोमय कोष में बसे हुए हैं और जहाँ उस मनोमय कोष का नाता, अघोर ब्रह्म से भी है ही I

यहाँ कहा गया तत् तत्त्व, प्रधानतः साधक के मन और अहम् की उस योगावस्था को ही दर्शाता है, जिसमें अहम् विशुद्ध होता है, और मन “स्वयं ही स्वयं में” विलीन होता है I

 

  • माँ गायत्री का मुक्ता मुख, जो सर्वव्यापक है, वो पञ्चब्रह्म की वो अदि पराशक्ति का धारक है, जो सर्वव्यापक विद्या रूपी दिव्य सत्ता, माँ सरस्वती कहलाती हैं, और जो सभी ब्रह्म की दिव्यता और शक्ति रूप में पृथक-पृथक स्वरूपों में ही स्वयं प्रकाशित होती है I

और ऐसे स्वरूपों में प्रकाशित होते हुए भी, वो परमज्ञान परमचेतन स्व:प्रकाश सर्वव्यापक सनातन निर्गुण ब्रह्म को दर्शाती हुई, अपराजिता सर्वात्मशक्ति सर्वज्ञानात्मक होती हुई भी, ईशान ब्रह्म की सर्वसाक्षी दिव्यता ही हैं I

जिसको जानने पर और कुछ जानना शेष ही न रहे, वो स्व:प्रकाश सर्वसाक्षी ही हैं I

सर्वसाक्षी ही तुरीयातीत आत्मा, सर्वात्मा, माँ गायत्री का मुक्ता मुख, निर्गुण ब्रह्म है I

निर्गुण निराकार ब्रह्म ही पंचब्रह्मोपनिषद के सर्वव्यापक और सर्वातीत ईशान हैं I

ईशान ब्रह्म की दिव्यता ही माँ गायत्री के मुक्ता मुख स्वरूप में, माँ सरस्वती हैं I

शैव मार्गों में राजयोगियों ने उन्ही माँ सरस्वती को अदि पराशक्ति कहा है I

 

और यही कारण है, कि कुछ शक्ति साधकों ने ईशान को ही ब्रह्मशक्ति , मूल और गंतव्य शक्ति, अदि पराशक्ति, दुर्गा, मूल प्रकृति आदि उत्कृष्ट नामों से पुकारा है I और उन ब्रह्म को सर्वसाक्षी कहा है I

ऐसा ही मुक्तात्मा होता है, जो स्वयं और स्वयं की आत्मशक्ति का ही साक्षी मात्र होकर ही रह जाता है I

ऐसी दशा में उस साधक की आत्मशक्ति ही उस साधक का पालन पोषण आदि करती हैं, और तबतक करती हैं, जबतक जिस कार्य के लिए वो साधक आया है, वो पूर्ण न हो जाए I

जबकि निर्गुण आत्मा और सर्वात्मा नामक तत्त्व, ईशान ब्रह्म के ही हैं, लेकिन तब भी वो सर्वात्मा तत्त्व, पञ्चब्रह्म में पूर्णरूपेण और समानरूपेण प्रकाशित होता है I

जब साधक देवी गायत्री के मुक्ता मुख का साक्षात्कार करता है, तो उसका मन, बुद्धि, चित्त और अहम् उसी निर्गुण में समा जाते हैं, जो पञ्च ब्रह्म मार्ग में ईशान ब्रह्म कहलाते हैं I

जब ऐसा होता है, तब उस साधक की आत्मचेतना भी ईशान ब्रह्म में स्थित हो जाती है I

और ऐसी दशा में उस साधक के प्राण भी उस साधक का सहस्रदल कमल को पार करके, विसर्गी ही हो जाते हैं I

और इसके पश्चात, साधक एक अतिकष्टदायक दशा में चला जाता है, जिसका वर्णन और निवारण मार्ग पर किसी बाद के अध्याय में बात होगी I

ऐसी कष्टदायी दशा से ही वो साधक प्राणात्मा नामक दशा को पाकर, उसी में स्थित हो जाता है I

टिपण्णी: लेकिन यह भाग यहाँ पर समाप्त नहीं हुआ है I इसलिए इसके शेष बिंदुओं को किसी बाद के अध्याय में प्रकाशित करूंगा, जब पञ्च मुखा सदाशिव पर बात होगी I

 

आगे बढ़ता हूँ …

साधक ऐसा जानकार यह भी जान जाता है, कि यह चार आकाश (अर्थात अहमाकाश, मनाकाश, चिदाकाश, ज्ञानाकाश) की दिव्यताएं जो चार शक्तियां हैं (अर्थात अहम् शक्ति, इच्छा शक्ति, चित्त शक्ति और ज्ञान शक्ति), वास्तव में ईशान की अदि पराशक्ति की अभिव्यक्ति ही हैं I

 

टिप्पणियां : वैदिक वाङ्मय के किसी भी मार्ग में …

  • जो गंतव्य पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा का होता है, वही गंतव्य अन्य सभी परिक्रमा में भी होता है I
  • इसका कारण है कि अपनी एक ही रचना में, ब्रह्म ने दो गंतव्य कभी भी ख्यापित नहीं थे I
  • और इसीलिए, ब्रह्म का निर्गुण निराकार स्वरूप ही एकमात्र गंतव्य है I
  • इसका अर्थ तो यह भी हुआ कि …

पृथक कालों और मार्गों में तारतम्य होने पर भी, उनका गंतव्य एक ही है I

  • और यही बिंदु समस्त प्रदक्षिणा मार्ग में भी समानरूपेण पाया जाएगा I और ऐसा होने का जो मूल कारण है, इसको अब बताता हूँ …

परिक्रमा तो केवल वो बहाना है, जिसमें ब्रह्म भावपन होकर ही जाना है I

इसलिए प्रदक्षिणा के समय, जो साधक ब्रह्म भावपन ही नहीं हुआ होगा, उसनें प्रदक्षिणा करी ही नहीं है… ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा ऐसा ही माना जाएगा I

और ऐसे साधक को, जो ब्रह्म भावपन ही नहीं हुआ, नीचे बताई गई कोई भी सिद्धि का अंश मात्र भी प्राप्त नहीं होगा I

 

पञ्चब्रह्म प्रदक्षिणा और आयाम चतुष्टय का गंतव्य, पञ्चब्रह्म परिक्रमा आयाम चतुष्टय का गंतव्य, …  मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान सिद्धि, आयाम चतुष्टय विज्ञान सिद्धि, … माँ गायत्री और आयाम चतुष्टय, पञ्चब्रह्म और आयाम चतुष्टय, पञ्चब्रह्म गायत्री साधना और आयाम चतुष्टय, … जीवधर सिद्धि, जगतधर सिद्धि, जीवातीत सिद्धि, जगतातीत सिद्धि, … चतुश आयाम साधना, आयाम चतुष्टय साधना, चतुश आयाम सिद्धि, आयाम चतुष्टय सिद्धि, … दिशा दशा आकाश काल,

आयाम चतुष्टय होते हैं, जो इस ग्रन्थ में दिशा, दशा, आकाश और काल बताए गए हैं I

इनही चार आयाम में समस्त जीव जगत बसा हुआ है, और यही चार आयाम भी जीव जगत में समान रूप में बसे हुए हैं I

यही कारण है, कि इन आयाम चतुष्टय से समस्त जीव जगत और उसके मूल को भी जाना जा सकता है, और उसी जीव जागत के गंतव्य को भी I

इनही चार आयामों में समस्त जीव जगत के सभी स्थूल, सूक्ष्म, दैविक या कारण और संस्कारिक दशाएं समान रूप में बसी हुई हैं… और ऐसा ही इस चतुश आयाम साधना में जाना जाता है I

ऐसा होने के कारण यही आयाम चतुष्टय जीव जगत के मूल भी हैं और जीव जगत के गंतव्य भी है I और यही जीव जगत को धारण भी किए हुए हैं, अर्थात यही आयाम चतुष्टय जीवधर और जगतधर भी हैं I

इसलिए, जबतक इन आयामों की सिद्धि नहीं होगी, तबतक जीवधर और जगतधर सिद्धियाँ भी पूर्णरूपेण प्राप्त नहीं होंगी I

तो अब इन आयामों के अनुसार, इन जीवधर सिद्धि और जगतधर सिद्धि को बताता हूँ …

 

  • गायत्री ब्रह्मा सिद्धांत, ब्रह्मा गायत्री सिद्धांत, … दशा आयाम का जीवधर स्वरूप, दशा आयाम का जगतधर सिद्धि स्वरूप, दशा का जीवधर स्वरूप, … दशा का जीवातीत स्वरूप, दशा आयाम का जीवातीत सिद्ध स्वरूप, दशा आयाम का जगतातीत सिद्धि स्वरूप, दशा आयाम का जीवातीत स्वरूप, दशा आयाम का जगतातीत स्वरूप, दशा का जगतातीत स्वरूप, … दशातीत सिद्धि क्या है?, दशातीत अवस्था क्या है?, दशातीत सिद्धि, दशातीत अवस्था,दशा आयाम का अस्त्र स्वरूप, दशा आयाम का मारक स्वरूप, दशा आयाम का तारक स्वरूप, दशा आयाम का गंतव्य स्वरूप, दशा आयाम का जगत स्वरूप, … मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान और आयाम चतुष्टय विज्ञान, दशास्त्र, दशास्त्र और मूलास्त्र चतुष्टय, … दशाचक्र का जगत स्वरूप, दशाचक्र का जीव स्वरूप, दशाचक्र का जगत स्वरूप, दशाचक्र का जीव जगत स्वरूप, जीव जगत ही दशाचक्र है, दशाचक्र का शक्ति स्वरूप, दशाचक्र ही सार्वभौम शक्ति स्वरूप है, … लोकातीत ब्रह्म, दशातीत ब्रह्म, ब्रह्माण्डातीत ब्रह्म, अवस्थातीत ब्रह्म, … महासत्त्व योद्धा, महासत योद्धा, प्रकृति के नवम कोष का योद्धा, परा प्रकृति का योद्धा, …

दशा नाम का जगत स्वरूप, दशाचक्र कहलाता है, जिसके भीतर दशाओं का तारतम्य होता है, और इसीलिए दशा का ऐसा स्वरूप सदैव परिवर्तनशील दशाओं को दर्शाता है I

इसके अतिरिक्त, दशाचक्र में ही जीव और जगत बसा हुआ है, इसलिए जीवों और जगत की दशाओं में भी परिवर्तन होता रहता है I

दशा के दो प्रधान प्रकार होते हैं, जो सूक्ष्म और स्थूल कहलाते हैं I और इन दोनों प्रकारों में भी कई उप-प्रकार होते हैं I ब्रह्मलोक सहीत, ब्रह्म की समस्त रचना में, कुछ है ही नहीं जो इन दोनों प्रकारों के अंतर्गत नहीं आता I

इसलिए, दशा के इसी चक्र स्वरूप के अनुसार पृथक दशाओं का प्रादुर्भाव होता है I और जहाँ यह प्रादुर्भाव भी दो मूल स्वरूपों में जाना जा सकता है, जो स्थूल और सूक्ष्म हैं I और जहाँ इन दोनों मूल स्वरूपों के भीतर जो दशाएँ होती है, उसमें भी पृथकता होती है, जैसे अधिक या न्यून सूक्ष्म, और अधिक या न्यून स्थूल I

प्रादुर्भाव के पश्चात, दशाएँ जीव जगत के तारतम्य में जाकर, सदैव परिवर्तनशील भी रहती हैं I इसलिए आज जो स्थूल रूप में दशा है, वो कभी पूर्व में सूक्ष्म थी… और उसी दशा में आगे के किसी कालखंड में भी परिवर्तन होगा ही I

यह दशा परिवर्तन भी काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता या शक्ति के आलम्बन से ही ही होता है I सबकुछ काल के गर्भ में ही निवास करता है, इसलिए सबपर काल का ही नियंत्रण होता है, और जहाँ यह नियंत्रण भी कालचक्र द्वारा ही होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जैसे जैसे काल का परिवर्तन होता है, वैसे वैसे जो कुछ भी है, वो सब कल आयाम के अनुसार ही अपने परिवर्तन को पाता है I

इसका अर्थ हुआ, कि कालचक्र के सदैव परिवर्तनशील स्वरूप के कारण, जैसे ही काल की इकाई में परिवर्तन होगा, वैसे ही सभी दशाएं भी अपने अपने परिवर्तन को जाएंगी और जहाँ वो परिवर्तन भी वैसे ही होगा, जिससे वो दशाएँ काल की परिवर्तित इकाई में बस सकें I

यही कारण है, कि जब युग परिवर्तन (या युग स्तंभित) और नए युग का आगमन होता है, तब इस लोक में भी परिवर्तन हुए बिना नहीं रह पाता I

और क्यूँकि दशा परिवर्तन एक बहुत कष्टकारी व्यवस्था से होकर जाता है, इसलिए इन परिवर्तनों में, कष्ट भी भरपूर आते हैं I

और क्यूंकि यह परिवर्तन जीवों के भीतर भी होता है, इसलिए जो जीव इसको ग्रहण नहीं कर पाते, वो मानव जनित विप्लव का कारण बनते हैं, और इस धरा धाम पर उपद्रव करने लगते हैं I

यदि उन जीवों ने अपनी आंतरिक दशा को आगामी युग की काल इकाई और काल की दिव्यता के अनुसार परिवर्तन नहीं किया, तो वो जीव अंततः उसी युग परिवर्तन में समाप्त होते हैं, अर्थात मृत्यु को पाते हैं I

और यही अवस्था उन मार्गों की भी होती है, जो अंत होते हुए कालखंड में आए थे और एकवाद (Monotheism) के थे I

यही कारण है, कि सभी एकवादी (Monotheistic) मार्गों में अंत समय बताया जाता है, और ऐसा तब भी है, जब काल अपने चक्र रूप में भी, अनादि सनातन ही है I

इसके विपरीत, योग और वेद मार्गों में जो बहुवादी प्रकृति और अद्वैत ब्रह्म, दोनों से संबंधित हैं, उनमें काल अपने चक्र स्वरूप में बसा होता है I

इसलिए युगादि का अंत भी उन मार्गों का अंत नहीं होता, बल्कि ऐसे समयखण्डों में उन मार्गों की विशुद्धि प्रक्रिया ही चलित हो जाती है, जिससे ऐसे बहुवादी अद्वैत मार्गों में, स्वस्थ क्रांति आती है I

और जहाँ यह स्वस्थ क्रांति ऐसे बहुवादी अद्वैत मार्गों को विशुद्ध करके, नवीन ही करती है I

यह स्वस्थ क्रांति इन बहुवादी अद्वैत मार्गों को आगामी युगचक्र के अनुसार परिवर्तन करके, तैयार करती है I

यदि जीव जगत, जो दशा आयाम का चक्र स्वरूप ही है, उस का अनुसार नहीं चलोगे, तो नष्ट ही ही जाएगा… यह एक मूल बिंदु है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी दशाचक्र के अनुसार ही, सबकुछ जो इस दशा आयाम के अंतर्गत ही आता है, वो सदैव ही परिवर्तनशील रहता है I

दशा आयाम के अंतर्गत, दशाचक्र ही वो सार्वभौम शक्ति है, जो दशा आयाम की दिव्यता है I

ब्रह्म की रचना में, समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकर आदि बिंदु भी इसी दशा आयाम में बसाए गए थे I

इसलिए, जो साधक इस दशा आयाम का सिद्ध होता है, वो अपनी आत्मस्थिति में, प्रकृति भी है और ब्रह्म भी I

ऐसे साधक की आंतरिक स्थिति ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म दोनों में ही समान रूप में बसी हुई होती है I

ऐसे साधक का आत्मस्वरूप, प्रकृति और ब्रह्म, दोनों से ही संबद्ध होगा, और इन दोनों का ही द्योतक, चिंन्ह या लिंगात्मक स्वरूप होगा I

इससे साधक दशाचक्र का ज्ञान पाता है, जिसके पश्चात वो साधक दशा आयाम के चक्र स्वरूप से जीवधर और जगतधर सिद्धि के दशा आयाम नामक अंश को प्रकृति स्वरूप में, अर्थात ब्रह्मशक्ति स्वरूप में पा जाता है I

दशा आयाम के चक्र स्वरूप के अंतर्गत ही समस्त दशाएँ, जैसे ब्रह्म रचना के समस्त लोकादि आते हैं, इसलिए जो साधक दशाचक्र सिद्ध होगा, वही ब्रह्माण्ड सिद्ध हो सकता है I

इसका अर्थ हुआ, कि दशा आयाम सिद्धि भी ब्रह्माण्ड योग ही है I

और ऐसे साधक के पिंड के भीतर, साधक के अन्तःकरण चतुष्टय के चित्त नामक भाग में ही वो प्राथमिक सूक्ष्म संस्कारिक ब्रह्माण्ड, एक निरंग (अथवा पारदर्शी) संस्कार स्वरूप में ही स्वयं प्रकट होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी दशा आयाम के चक्र स्वरूप के तारतम्य को जानकार, वो साधक आगे बढ़ता है, और दशा आयाम के गंतव्य का साक्षात्कार करता है, जो सर्वव्यापक ब्रह्म ही है I

दशा की गंतव्य अवस्था ही सर्व्यापकता कहलाती है I

 

इस साक्षात्कार से वो साधक की चेतना उन्ही सर्वव्यापक ब्रह्म में, जो दशा आयाम के गंतव्य स्वरूप में हैं… उन्ही ब्रह्म में स्थित भी हो जाती है I

इस साक्षात्कार के पश्चात, वही साधक जो पूर्व में जीवधर और जगतधर सिद्धियों का धारक था, वो जीवातीत सिद्धि और जगतातीत ही हो जाता है I

 

और जहाँ …

जीवधर सिद्धि की सिद्धितीत दशा को ही जीवातीत कहते है I

जगतधर सिद्धि की सिद्धितीत दशा को ही जगतातीत कहते हैं I

जो ब्रह्माण्डातीत है, वही जीवातीत और जगतातीत है I

दशा आयाम का गंतव्य, जीवातीत और जगतातीत अवस्थाओं को भी दर्शाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

अब ऊपर बताई गई दोनों सिद्धियों के धारक साधक के बारे में बताता हूँ I

दशा आयाम का पूर्ण सिद्ध, दशा आयाम के प्रकृति (या चक्र या शक्ति) और गंतव्य (या ब्रह्म), दोनों ही स्वरूपों में समान रूप में बसा होता है I

 

ऐसा साधक, दशा आयाम के …

गंतव्य स्वरूप में दशा आयाम को ही कैवल्य रूप में पाएगा I

चक्र स्वरूप में यही दशा आयाम, उस साधक का सार्वभौम अस्त्र होगा I

दशा का यह चक्र रूप ही प्रकृति या ब्रह्मशक्ति का दशास्त्र स्वरूप कहलाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

दशास्त्र सिद्ध योगी, जीव जगत की दशा परिवर्तन करने में भी सक्षम होता है, और जहाँ वो दशा परिवर्तन भी सूक्ष्मता की ओर ही होता है I

जब जब वैदिक युग आता है, तब तब इस दशा आयाम का सिद्ध योगी लौटाया ही जाएगा, और जहाँ उस योगी से प्रकाशित दशा भी सूक्ष्म, दैविक, संस्कारिक आदि जगत से संबधित और इनसे अतीत भी होगी, अर्थात उस योगी के द्वारा स्थापित दशा, आत्मा के उस स्वरूप में ही होगी, जो सर्वव्यापक ब्रह्म है I

लेकिन यह तो उन सर्वसम ब्रह्म के सत्त्वगुणी मन से सम्बंधित है, और जो हीरे के समान प्रकाशमान, सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति हैं I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि दशा आयाम की आंतरिक साधनाओं के गंतव्य में, सर्वव्यापक ब्रह्म ही होते है, जो सर्वदशा व्यापक और दशातीत दोनों ही होने के कारण, सर्वव्यापक आत्मा रूपी ब्रह्म को ही दर्शाते हैं I

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत में, दशा आयाम का संबंध वामदेव ब्रह्म और माँ गायत्री के धवला मुख से ही है I

 

अब ध्यान देना …

जो साधक दशा आयाम सिद्ध होगा, वो दशा के गंतव्य और चक्र दोनों ही स्वरूपों का धारक होगा I और इसके साथ साथ, दशा आयाम के यह दोनों स्वरूप भी उस सिद्ध के धारक होंगे I

सभी आयाम चतुष्टय सिद्धियों में वैसे ही होता है, जैसा यहाँ बताया गया है I

इसका कारण है, कि आयाम सिद्धि ही एकमात्र ऐसी सिद्धि है, जिसमें साधक आयाम को धारण करता है, और वो आयाम जिसको साधक ने सिद्ध किया होता है, उस साधक को भी धारण करता हैं I

और किसी भी सिद्धि में ऐसा नहीं होगा, इसलिए आयाम सिद्धि के सिवा, अन्य सभी सिद्धियाँ अस्थाई ही होती है I

आयाम सिद्धि ही ऐसी सिद्धि है, जो स्थाई, अर्थात सनातन होती है I

इसलिए जिस योगी ने इन आयाम चतुष्टय (या इनमे से किसी एक आयाम) को ही सिद्ध किया होगा, वो योगी अनादि कालों तक उन आयाम को धारण करके रखेगा और वो आयाम भी उस योगी को धारण करके रहते हैं I इसलिए यह आयाम सिद्धि, पूर्ण स्थाई सिद्धि है I

इसलिए, पृथक पृथक जन्मों में गमन करने पर भी, यह आयाम सिद्धि तब तक लौटाई नहीं जा सकती, जबतक साधक उसी मार्ग पर पुनः नहीं जाएगा, जिससे उस साधक ने इन्हें पाया था I

इनके लौटाने का मार्ग भी वही है, जो इनके पाने का है, और जिसको इस ग्रन्थ में पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा कहा गया है I

 

तो अब इन दोनों स्वरूपों के मुख्य बिंदु को बतलाता हूँ …

 

दशाचक्र सिद्धि का अस्त्र स्वरूप, दशाचक्र सिद्धि का मारक स्वरूप, दशा चक्र सिद्धि का परिवर्तन कारक स्वरूप, दशाचक्र का अस्त्र स्वरूप, दशाचक्र का मारक स्वरूप, दशाचक्र का परिवर्तन कारक स्वरूप,… जब “स्वयं ही स्वयं में” के मार्ग पर, साधक स्वयं को दशाचक्र के भीतर रखेगा, तो वो साधक दशा आयाम के शक्ति चक्र स्वरूप में ही बसकर, उसी दशा आयाम को अपने शस्त्र स्वरूप में देखेगा I

ऐसी अवस्था में वो दशाचक्र साधक की काया से बाहर की ओर ही चलित होता हुआ पाया जाएगा, अर्थात वो साधक स्वयं को ही दशा के चक्र स्वरूप के भीतर बसा हुआ पाएगा I

और इसी अस्त्र को वो साधक दशास्त्र कहेगा… जो एक सार्भौम अस्त्र स्वरूप में ही होगा… और जिसका प्रयोग वो साधक करेगा तो उसकी अपनी काया के भीतर, लेकिन उसका प्रभाव समस्त जीव जगत में ही दिखाई देगा I

दशा आयाम का चक्र स्वरूप, प्रकृति (अर्थात ब्रह्मशक्ति) का ही अस्त्र रूप है, जिससे प्रकृति दशाओं का नित्य परिवर्तन करती ही रहती हैं, और जिसके कारण यह समस्त जीव जगत की दशाएं सदैव ही परिवर्तनशील रहती हैं I

इस दशा आयाम के चक्र स्वरूप को जानकार और उसके समस्त भागों में समान रूप में ही बसकर, इसका सिद्धि योगी प्रकृति की समस्त दशाओं को ही अपने अस्त्र स्वरूप में देखता है I

और ऐसे देखने के पश्चात भी, वो योगी जानता है, कि वो तो केवल उस अस्त्र स्वरूप का धारक है… न की चालक I

ऐसा योगी माँ प्रकृति के दशास्त्र स्वरूप का धारक होके ही रह जाता है I

ऐसा योगी माँ प्रकृति के समस्त परिकरों को ही अपने भीतर और स्वयं को उन परिवारों के भीतर भी देखता है I

और ऐसी दशा में वो योगी, माँ प्रकृति की समस्त दशाओं और उनके परिकरों को ज्ञान सहित, अपने अस्त्र रूप में भी देखता है I

और अंततः, वो योगी भी उन्ही माँ प्रकृति का एक आयाम, दशा नामक परिकर ही हो जाता है I

जो योगी स्वयं ही प्रकृति के ब्रह्मशक्ति स्वरूप का धारक नहीं, तो वो योगी समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकरों को ही अपने अस्त्र स्वरूप में कैसे पाएगा? I

और यदि वो योगी ऐसा ही नहीं होगा, तो वो योगी माँ प्रकृति (या ब्रह्मशक्ति) का योद्धा कैसे कहलाएगा? I

वास्तव में जो माँ प्रकृति का योद्धा ही नहीं, वो धर्म योद्धा भी नहीं हो सकता I

ऐसा कहने का कारण है, कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति, जो यह ब्रह्म्रचना ही है, उसमें दशाएं भी ब्रह्म और प्रकृति, दोनों का अभिन्न अंग होती हैं I

ऐसे योगी की काया के भीतर, अद्वैत ब्रह्म और बहुवादी प्रकृति की सनातन योगावस्था में ही धर्म शब्द परिभाषित होता है I

 

इस दशा आयाम सिद्धि से योगी जो जानता है, वो अब बताता हूँ …

दशा आयाम का चक्र स्वरूप ही जीव जगत रूपी ब्रह्मशक्ति हैं I

ब्रह्मशक्ति रूप में दशाएं सूक्ष्म और स्थूल के तारतम्य में होती हैं I

दशा आयाम का गंतव्य स्वरूप ही सर्वव्यापक ब्रह्म हैं I

गंतव्य ब्रह्म रूप में, दशा ही कैवल्य मोक्ष नामक ब्रह्म है I

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने दशा चक्र को ही अस्त्र स्वरूप में पाया है, उसको ही महासत्त्व  योद्धा कहा जाता है I ऐसे योगी का मन सत्त्वगुणी होता है, और उसका संबंध वामदेव ब्रह्म से होता है I

और ऐसे योग की शक्ति भी प्रकृति के सत्त्वगुण में ही सुरक्षित रहती है, अर्थात प्रकृति के नवम कोष, या परा प्रकृति (या माँ आदिशक्ति) में ही सुरक्षित रहती है I

इसी सत्त्वगुणी प्रकृति के भीतर ही दशा चक्र और उस दशा चक्र के समस्त भाग, अपने शक्ति स्वरूप (अर्थात अस्त्र स्वरूप) में चलायमान रहते हैं I

इसका अर्थ हुआ, कि इस दशास्त्र का नाता परा प्रकृति (अर्थात आदि शक्ति) से ही है… न की इस स्थूल जगत से I

और दशा चक्र का सिद्ध योगी, उन्ही प्रकृति के नवम कोष (अर्थात परा प्रकृति) में बसकर, अपने दशास्त्र के समस्त उप-अस्त्रों (अर्थात दशा चक्र के भागों) का प्रयोग शनैः शनैः ही करता है, और जीव और समस्त जगत (या किसी एक लोक)  की दशा (अर्थात स्थिति) में परिवर्तन लाता है I

और जहाँ यह परिवर्तन भी सूक्ष्मता की ओर ही होगा I

और यह दशा का परिवर्तन तब भी आएगा, जब इसको कोई इसको रोकने का प्रयास करेगा, क्यूंकि यह दशास्त्र, आयाम अस्त्र का अंग होने के कारण, इस जीव जगत के मूलास्त्र चतुष्टय नामक विज्ञान का अभिन्न अंग ही है I

दशास्त्र धारक योगी, जीव जगत का मारक भी हो सकता है, लेकिन ऐसा होने पर भी वो मारक क्षमता का प्रयोग जिसपर भी किया जाएगा, उस दशा या जीव को वो सूक्ष्मता की ओर ही लेकर जाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

वामदेव ब्रह्म सर्वसमता के द्योतक हैं, जो हीरे के समान प्रकाशमान होते हैं I और वही वामदेव शून्य को भी दर्शाते हैं I

जब कुछ भी सर्वसमता के समीप आता है (या उस सर्वसमता को स्पर्श करता है) तब वो सर्वसमता को ही पा जाता है I

इसलिए सर्वसमता को ही सर्वदशा सिद्धि कहते हैं I

और सर्वसम होकर वो योगी शून्यता को भी पा जाता है I

जहाँ भी सर्वसमता ख्यापित हो गई, उससे तो सभी दूर भागते हैं, क्यूंकि जिसनें भी सर्वसम तत्त्व को कभी भी स्पर्श किया है, वो उसी क्षण सर्वसम ही हुआ है I

और क्यूंकि सर्वसमता ही उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा प्रजापति का अंग है, इसीलिए वैदिक वाङ्मय में प्रजापति उपासना भी वर्जित है I

इसका कारण है, कि जीव जगत कभी भी सर्वसम नहीं हुआ है, क्यूंकि सर्वसम होने से वो अपने तारतम्य से अतीत हो जाएगा और ऐसी दशा में वो जीव जगत स्वरूप में भी नहीं रह पाएगा… प्रजापति के लोक, अर्थात सर्वसम सगुण निराकार ब्रह्मलोक में ही चला जाएगा और अंततः, ब्रह्मलोक में विलीन होकर, ब्रह्मलोक ही हो जाएगा I

इस महा ब्रह्माण्ड से समस्त इतिहास में, कुछ ही योगी हुए होंगे, जो सर्वसमता को पाने के पश्चात, वो सर्वसम सगुण निराकार ब्रह्मलोक नहीं हुए होंगे I

और ऐसे दुर्लभ योगजनों में से, कुछ अतिदुर्लभ ही ऐसे होंगे, जो उस हीरे के समान प्रकाशित ब्रह्मलोक में जाकर, अपना सगुण साकार स्वरूप धारण करके रहे होंगे I

और ऐसे योगीजनों में से एक या दो ही होंगे, जो उन सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह ब्रह्म और माँ सरस्वती के साक्षात्कारी होंगे, और उनके साथ, उनके लोक में ही निवास कर पाए होंगे, जो ब्रह्मलोक के बीस लोकों से जाने के पश्चात ही साक्षात्कार होता है, और जिसका मार्ग भी केवल सर्वसम सगुण साकार चतुर्मुखा पितामह पितामह ही जानते हैं I

और क्यूँकि प्रकृति सर्वसम हो ही नहीं सकती, इसलिए प्रकृति की और प्राकृत जीवों के मार्ग, सर्वसम भी नहीं हो सकते I

यही कारण है, कि योग और वैदिक वाङ्मय में, सर्वसमता का सिद्धांत बस संकेत मात्र ही बताया गया है, ताकि जो वास्तविक पात्र होंगे, वही उसको समझ कर, उसपर रमण कर पाएं I

प्रकृति जो तारतम्य प्रधान ही है, वो ऐसा होने ही नहीं देगी और यदि किसी ने किसी भी लोक में, कोई भी पूर्ण सर्वसम मार्ग स्थापित कर दिया, तो प्रकृति इतनी विप्लवकारी हो जाएगी, कि उस लोक में जीवों को उनकी नानी ही नहीं, परनानी तक स्मरण हो जाएगी I

इसीलिए वैदिक वाङ्मय में उन सर्वसम प्रजापति के किसी भी मूल स्वरूप (जैसे सद्योजात ब्रह्म, कार्य ब्रह्म, प्रजापति और विश्वरूप ब्रह्म) की उपासना वर्जित ही है I इनको केवल ज्ञान मार्ग से ही जाना जाता है I

वैदिक वाङ्मय में, सर्वसम प्रजापति के उन स्वरूपों की उपासना ही करी जाती है, जो उनके मूल स्वरूप नहीं हैं, जैसे सूर्य देव, सवितुर इत्यादि I

ऐसा होने का भी वही कारण है जो पूर्व में बताया था, कि जीव जगत के भीतर, प्रकृति सर्वसमता का मार्ग आने ही नहीं देंगी, क्यूंकि इस मार्ग से उनका तारतम्य ही संकट में आ जाएगा I

 

दशा सिद्धि का गंतव्य स्वरूप, दशा सिद्धि का तारक स्वरूप, दशा आयाम का गंतव्य स्वरूप, दशा आयाम का तारक स्वरूप, दशातीत अवस्था की प्राप्ति, दशा का गंतव्य स्वरूप, दशा का तारक स्वरूप, दशातीत अवस्था, दशातीत सिद्धि, … और वही दशास्त्र का धारक साधक जब इसी दशा आयाम के गंतव्य, अर्थात सर्वव्यापक ब्रह्म के भीतर स्थित होगा, तो वही साधक जो पूर्व में जीव जगत का मारक था, वो जीव जगत का तारक हो जाएगा I

ऐसा साधक भी जीवातीत और जगतातीत नामक अवस्थाओं को पा जाता है I

जो स्वयं ही जीवातीत और जगतातीत नहीं, वो जीव जगत का तारक कैसे हो सकता है?I

पूर्व का वो दशास्त्र का धारक योगी, यदि जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का भी धारक होगा, तो ऐसा योगी या तो ब्राह्मण क्षत्रिय होगा, या क्षेत्रीय ब्राह्मण… वो वर्णाश्रम के और किसी भी भाग का हो ही नहीं सकता I

ब्राह्मण होने से वो साधक इस दशा का पूर्ण ज्ञान पाएगा, और क्षत्रिय होने से वो इसी ज्ञान सिद्धि के तत्त्वों को ही अपने अस्त्र स्वरूप में देखेगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और क्यूंकि इसी गायत्री पंचब्रह्म प्रदक्षिणा एवं सिद्धांत में, जिसकी बात यहाँ हो रही है, वो साधक जान जाता है, कि वो सर्वव्यापक दशा ही ईशान ब्रह्म हैं, इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है कि जो ईशान ब्रह्म हैं, वो इस प्रदक्षिणा के अंतिम पड़ाव होते हुए भी, उनका कोई पड़ाव नहीं होता I

सर्वव्यापक का कोई पद या पड़ाव हो ही नहीं सकता है I

सर्वव्यापक की कोई एक या अनेक दशाएँ कैसे हो सकती है? … क्यूंकि वो तो दशवाद से ही अतीत है, अर्थात दशातीत है I

अब अगले आयाम पर जाता हूँ …

 

  • पञ्च मुखा गायत्री और पञ्चब्रह्म सिद्धांत, पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री सिद्धांत, … पञ्च मुखा गायत्री सिद्धांत, पञ्चब्रह्म सिद्धांत, दिशा आयाम का जीवधर सिद्धि स्वरूप, दिशा आयाम का जगतधर सिद्धि स्वरूप, दिशा आयाम का जीवधर स्वरूप, दिशा आयाम का जगतधर स्वरूप, … दिशा आयाम का जीवातीत स्वरूप, दिशा आयाम का जगतातीत स्वरूप, दिशा का जीवातीत स्वरूप, दिशा का जगतातीत स्वरूप, दिशा का मार्गातीत स्वरूप, … दिशातीत सिद्धि, दिशातीत अवस्था, मार्गातीत सिद्धि, मार्गातीत स्वरूप, मार्गातीत अवस्था, दिशा का अस्त्र स्वरूप, दिशा की मारक स्वरूप, दिशा का तारक स्वरूप, दिशा का गंतव्य स्वरूप, दिशा आयाम का अस्त्र स्वरूप, दिशा आयाम की मारक स्वरूप, दिशा आयाम का तारक स्वरूप, दिशा आयाम का गंतव्य स्वरूप, दिशा का तारक स्वरूप, दिशा का गंतव्य स्वरूप, दिशा आयाम का ग्रंथातीत स्वरूप, दिशा का  ग्रंथातीत स्वरूप, … पथातीत ब्रह्म, मार्गातीत ब्रह्म, दिशातीत ब्रह्म, उत्कर्षातीत ब्रह्म, ग्रंथातीत ब्रह्म,… महारजस योद्धा, महारज योद्धा, … प्रकृति के सप्तम कोष का योद्धा, अपरा प्रकृति के सप्तम कोष का योद्धा, …

अब ध्यान देना …

जीव जगत के मार्गचक्र या दिशाचक्र स्वरूप को उत्कर्ष पथ कहते हैं I

दिशा का चक्र स्वरूप ही उत्कर्ष पथ है, जो प्रकृति को दर्शाता है I

दिशा के गंतव्य को, जो जीवातीत जगतातीत है, दिशातीत कहते हैं I

जो दिशातीत या मार्गातीत है, वही सर्वदिशा व्यापक ब्रह्म है I

 

यही दिशा आयाम के दो प्रधान स्वरूप है, जिनमें अपने …

चक्र रूप में दिशा आयाम, जीव जगत का भाग होकर, उत्कर्ष पथ है I

गंतव्य चक्रातीत रूप में, दिशा आयाम ही सर्वदिशा दर्शी ब्रह्म है I

वो सर्वदिशा दर्शी ब्रह्म ही सर्वव्यापक और सर्वसाक्षी है I

दिशा आयाम के भी दो प्रधान प्रकार होते हैं, जो दिशा चक्र और दिशा के चक्रातीत स्वरूप, अर्थात दिशातीत (या मार्गातीत) हैं I

दिशाचक्र के भाग भी होते हैं जो पृथक उत्कर्ष पथों से जुड़े होते हैं I

ब्रह्मलोक सहीत, ब्रह्म की समस्त रचना में, कुछ है ही नहीं जो इन दोनों प्रकारों के अंतर्गत नहीं आता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

दिशा आयाम का जगत स्वरूप, दिशा चक्र कहलाता है, जो पृथक कालखंडों के सभी उत्कर्षमार्गों को दर्शाता है, और जिसके भीतर दिशाओं का (अर्थात उत्कर्ष मार्गों का) तारतम्य होता है I

इसीलिए यह दिशा के सदैव परिवर्तनशील स्वरूप (या परिवर्तनशील जीवन शैली स्वरूप, या उत्कर्ष मार्गों के परिवर्तनशील स्वरूप) को भी दर्शाता है I

इसके अतिरिक्त, दिशा चक्र में ही जीव बसे हुए हैं, इसलिए जीवों की दिशाओं (अर्थात उत्कर्ष मार्ग और जीवन मार्ग इत्यादि) में भी परिवर्तन होते रहते हैं I

दिशा चक्र के अनुसार ही पृथक दिशाओं (अर्थात जीवन मार्गों या उत्कर्ष मार्गों) का प्रादुर्भाव होता है, और वो मार्ग (अर्थात दिशा) भी प्रकृत जीव जगत के तारतम्य में जाकर, सदैव परिवर्तनशील ही रहते हैं I

ऐसा ही इस लोक के उत्कर्ष मार्गों के इतिहास में भी पाया जाता है, जहाँ उत्कर्ष मार्ग सदैव ही परिवर्तनशील रहे हैं, और जहाँ ऐसा होने का कारण भी यही दिशा चक्र ही है I

उत्कर्ष मार्गों के सदैव परिवर्तनशील होने के कारण ही वैदिक वाङ्मय बहुवादी हुआ है I

और जहाँ वो बहुवादी वैदिक वाङ्मय के मूल और गंतव्य, दोनों में, इसी दिशा आयाम का गंतव्य, सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म ही हैं I

इसलिए आज जो उत्कर्ष मार्ग (या जीवन मार्ग) हैं, वो कभी पूर्व कालों में या तो नहीं थे, और या किसी और स्वरूप में ही थे… और आगे भी इनका परिवर्तन होगा ही I

और यह दिशा परिवर्तन भी काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता या शक्ति के आलम्बन से ही होता है I

 

पूर्व में बताए गए दशाचक्र और यहां बताए जा रहे दिशाचक्र के प्रभावों से, …

इस समस्त प्राकृत जीव जगत का पूर्ण स्थिर बिंदु, उसकी परिवर्तनशीलता ही है I

इस प्राकृत जीव जगत का एकमात्र पूर्ण स्थिर बिंदु, सनातन परिवर्तन ही है I

प्राकृत जीव जगत की दशाओं और उत्कर्ष मार्गों में, परिवर्तन ही पूर्ण स्थिर है I

 

इसलिए, जो कुछ भी इस समस्त जीव जगत से सम्बंधित है, चाहे वो कोई देवत्व बिंदु ही क्यों न हो, वो सदैव ही परिवर्तनशील पाया जाता है I

यही कारण है, कि जब देवत्व बिंदुओं में परिवर्तन होता है, तब उस परिवर्तन के अनुसार ही नए मार्ग और देवलोकों के नए ग्रन्थ आते हैं I

और ऐसा परिवर्तन का समय चलित होने से थोड़ा पहले, कोई न कोई योगी आएगा ही, जो उस परिवर्तित दशा के अनुसार एक मार्ग ख्यापित करेगा, और जहाँ उस मार्ग के मूल में भी वही पूर्व कालों का देवत्व बिंदु होगा, जो काल की प्रेरणा और कालशक्ति के आलम्बन से उस समय या तो परिवर्तित हो रहा है, या उस परिवर्तन प्रक्रिया में जाने ही वाला है I

क्यूंकि इस ब्रह्मकल्प में वेद ही प्राथमिक विज्ञान है, इसीलिए इसी ब्रह्मकल्प में जितने भी मार्ग आए हैं, उनके देवत्व बिंदुओं का सीधा (या घूमकर) नाता, वैदिक वाङ्मय से ही है I

और क्यूँकि वैदिक वाङ्मय का सीधा सीधा नाता, माँ गायत्री और पञ्च ब्रह्म से है, इसलिए इस ब्रह्मकल्प में किसी भी देवत्व बिंदु पर जाता हुआ कोई मार्ग आया ही नहीं, जिसका नाता पञ्च मुखी गायत्री और पञ्च ब्रह्म से सीधा सीधा (या घूमता हुआ) नहीं है I

यही कारण है, कि इस पूरे कल्प में, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत ही एकमात्र मूल सिद्धांत रहेगा, और जहाँ पञ्चब्रह्म ही वेदपिता और पञ्च मुखा गायत्री ही वेदमाता होंगी I

यहाँ कहा गया वेद शब्द, उत्कर्ष पथ सहित, मुक्तिमार्ग और मुक्ति को समान रूप में ही दर्शाता है I

लेकिन ऐसा होने पर भी, दिशाएं या उत्कर्ष पथ और उनके देवत्व को दर्शाते हुए ग्रन्थ परिवर्तनशील ही रहेंगे… कुछ जो पूर्व में था, वो अभी नहीं मिलेगा… और जो अभी है, वो भविष्य के किसी कालखंड में लुप्त हो जाएगा I

और ऐसा होने पर भी, जो भी उस समय होगा या आएगा या लुप्त ही होगा, उसका नाता भी यहां बताए जा रहे पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत से ही होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसी दिशाचक्र और उसके गंतव्य, दोनों में आर्य धर्म की समस्त दिशाएं (या मार्गादि) समान रूप में बसाए गए थे I

और ऐसा होने के कारण, सनातन आर्य धर्म, मार्ग से तो बहुवादी है, लेकिन गंतव्य से अद्वैत ही है I

और क्यूँकि ब्रह्म की परिवर्तन रहित पूर्णस्थिर दशा के साथ साथ, यह वैदिक आर्य धर्म प्रकृति की परिवर्तनशील दशा में भी बसा हुआ है, इसलिए सनातन वैदिक आर्य धर्म में, …

मार्गों में तारतम्य होने पर भी, गंतव्य में वही ब्रह्म हैं I

मार्गों (दिशाओं) में तारतम्य होने पर भी, गंतव्य समान ही रहा है I

वर्णाश्रम चतुष्टय आदि के पृथक मार्गों में भी, वही गंतव्य, अद्वैत ब्रह्म हैं I

आश्रम चतुष्टय आदि के पृथक सिद्धांत होने पर भी, गंतव्य वही अद्वैत ब्रह्म हैं I

इसीलिए इस ग्रन्थ ने सनातन वैदिक आर्य धर्म को बहुवादी अद्वैत कहा है I

वैदिक मार्गों का बहुवाद प्रकृति से संबद्ध है, और गंतव्य अद्वैत ब्रह्म से I

आर्य धर्म में ब्रह्मशक्ति, बहुवादी हैं और ब्रह्म, अद्वैत गंतव्य I

 

ऐसा होने के कारण ही इस कलियुग के कालखंड में, इसी पृथ्वीलोक में जहाँ समस्त पुरातन बहुवादी मार्ग लुप्त हुए थे, लेकिन भारत भूखंड के हजार वर्षों से भी अधिक समय तक परतंत्र होने पर, सनातन वैदिक धर्म अपने कुछ स्वरूप में ही सही, लेकिन अपने आधार रूप में तो बचा ही हुआ है I

और उस आगामी समयखण्ड में, जो बहुत दूर भी नहीं है… जैसे जैसे कलियुग का स्तंभन होता चला जाएगा, वैसे वैसे इसी आधार का आलम्बन लेके, इसी वैदिक आर्य धर्म को पुनर्स्थापित भी किया जाएगा I

और चाहे वो पुनर्स्थापित आर्य धर्म, पूर्व समय के मार्गों से थोड़ा पृथक ही होगा, लेकिन उसके मूल में भी वही गायत्री ब्रह्म सिद्धांत होगा, जिसको यहाँ पर उसके कुछ भागों का आलम्बन लेके ही सही… लेकिन बताया जा रहा है I

कलियुग के समय खंड में आर्य मार्गों का चाहे आधार रूप में ही सही, लेकिन बचने का कारण है, कि जो अपने मार्ग में (या दिशा आयाम के अनुसार) बहुवादी होता हुआ भी, अपने गंतव्य में अद्वैत ही रहता है, वो प्रकृति की सूक्ष्म ब्रह्मशक्ति जो दिशा चक्र को भी दर्शाती है, उसका धारक भी होता है I और वो बहुवादी अद्वैत मार्ग ऐसा होता हुआ भी, ब्रह्म के सर्वदिशा दर्शी स्वरूप में पूर्ण व्यापक भी होता है I

और जो ऐसा होगा, वो मूल से प्रकृति का होगा और गंतव्य से ब्रह्म का, जिसके कारण उसको नष्ट करना असंभव ही होगा I

इसलिए ऐसे मार्गों का यदि एक ज्ञाता भी बच जाएगा, तब भी वो मार्ग किसी आगामी समय खंड में पूर्ण ख्यापित हो सकता है I

लेकिन ऐसा तब होगा, जब उचित कालखण्ड आएगा, अर्थात उस ज्ञाता को सनातन काल ही प्रेरणा देगा, और उन काल की अर्धांगनी शक्ति, अर्थात कालचक्र रूपी प्रकृति (और उनका जीव जगत स्वरूप) ही उस ज्ञाता के कर्मों का कारण बनेंगी  I

 

आगे बढ़ता हूँ …

प्रकृति, ब्रह्म की प्रथम और पूर्ण अभिव्यक्ति है, इसलिए प्रकृति भी उतनी ही सनतहं है, जितने सनातन ब्रह्म हैं I

इसका कारण है, कि अभिव्यक्ति अपने मूल से अपना अभिव्यक्ता ही होती है I

और ऐसा होने के कारण, प्रधान अभिव्यक्ति रूपी प्रकृति, ब्रह्म सहित, ब्रह्मपथ भी हैं I

समस्त जीव जगत में, कोई उत्कर्ष पथ या मुक्तिमार्ग है ही नहीं, जो इन ब्रह्मशक्ति प्रकृति में न बसा हो, और प्रकृति रूपी ब्रह्मशक्ति से न जाता हो I

 

प्रकृति ही ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति, पूर्ण शक्ति, सार्वभौम दिव्यता, सनातन अर्धांगनी और एकमात्र दूती हैं I

ऐसा होने के कारण, प्रकृति और ब्रह्म सनातन योगावस्था में ही हैं I

इस योगदशा में, यह पता ही नहीं चलता, कि कौन प्रकृति हैं, और कौन ब्रह्म I

इसीलिए वेद मनीषि कह गए थे, कि प्रकृति ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही प्रकृति I

प्रकृति ब्रह्मशक्ति हैं, और ब्रह्म शक्तिमान…  इनको पृथक किया नहीं जा सकता I

ऐसा होने से प्रकृति, सार्वभौम ब्रह्मशक्ति, ब्रह्मपथ और ब्रह्म भी हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और क्यूंकि सनातन वैदिक धर्म, प्रकृति और ब्रह्म दोनों में ही समान रूप में बसा हुआ है, इसलिए अपने मार्ग से वैदिक धर्म, सर्वमार्गी है, और गंतव्य से वही वैदिक धर्म, अद्वैत ही है I

सर्वमार्गी और अद्वैत, दोनों ही समानरूपेण होने के कारण, वैदिक और योगमार्ग ही वो अनादि अनंत है, जिसको नष्ट किया ही नहीं जा सकता I

और ऐसा होने से ही वैदिक आर्य धर्म, सनातन कहलाया गया था, जिसका उन ब्रह्म और प्रकृति के समान, न तो कोई आदि मिलेगा, और न ही कोई अंत I

और ऐसा बहुवादी होने के कारण ही, वैदिक आर्य धर्म के ग्रंथों और मार्गों का परिवर्तन होता ही रहता है, क्यूंकि मार्ग के अनुसार यह आर्य पथ, प्रकृति के दिशाचक्र का ही है I

और अद्वैत होने के कारण, यही आर्य धर्म अपने गंतव्य से ब्रह्म ही है I

यही कारण है, कि वैदिक आर्य धर्म को भी उतना ही सनातन कहा गया है, जितने सनातन ब्रह्म हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

दिशा आयाम में परिवर्तन भी काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता या शक्ति के आलम्बन से ही होता है I यही सभी दिशा परिवर्तनों का मूल कारण भी है I

इसलिए जब कोई योगी दिशा परिवर्तन हेतु लौटाया जाता है, तो वो योगी भी यह परिवर्तन काल की प्रेरणा से और काल की शक्ति का आलम्बन लेके ही कर पाता है I

और जहाँ यह जीवन मार्ग का परिवर्तन, संस्कारिक जगत से चालित होता हुआ, और इसके पश्चात यह मार्ग परिवर्तन, कारण या दैविक जगत से जाता हुआ, सूक्ष्म जगत से होकर ही स्थूल जगत में लाया जाता है I

संस्कारिक जगत परदादाजी होते हैं, कारण या दैविक जगत दादाजी, सूक्ष्म जगत पिताजी होते हैं और स्थूल जगत परपोताजी होता है I

इसलिए, जब परदादाजी से लेकर पिताजी तक परिवर्तन हो जाता है, तभी यह परिवर्तन, परपोताजी अर्थात स्थूल जगत में चलित होकर, दिखाई देने लगता है I

इसका यह भी अर्थ हुआ, कि जबतक यह दिशादी परिवर्तन स्थूल जीवों के ज्ञान में आएँगे, तब तक तो बहुत विलम्ब हो चुका होगा I

और इसके कारण, उस परिवर्तन को स्थूल जगत से और स्थूल जगत में रोक पाना, किसी के लिए भी असंभव ही होगा I

इस स्थूल पृथ्वी लोक में, यही दिशा (या उत्कर्ष मार्ग) परिवर्तन, आज के समयखण्ड में चल भी रहा है… और अब इसको रोकना असम्भव ही है I

जब परदादाजी, दादाजी और पिताजी, तीनों ही आगामी कालखंड के अनुसार परिवर्तित हो चुके हैं, तो परपोताजी उस परिवर्तन को कैसे रोकेगा, और वो भी तब, जब उस परपोताजी को तो इन तीनों जगत का कोई ज्ञान ही नहीं है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

दिशा आयाम साधना में जब योगी, दिशा आयाम को अपनी काया से बाहर की ओर देखता है, तब वो योगी दिशा आयाम के चक्र स्वरूप का साक्षात्कार करता है I

ऐसे साक्षात्कार में वो योगी दिशा चक्र को सिद्ध करता है, और वो भी उस दिशा चक्र के उत्कर्ष पथ स्वरूप में, जो प्रकृति के तारतम्य से होकर ही जाता है I

 

इस समस्त जीव जगत में, वैदिक वाङ्मय ही एकमात्र मार्ग है, जो …

प्रकृति के तारतम्य में बसा हुआ भी, निर्विकल्प अद्वैत ब्रह्म की ओर ही जाता है I

 

और इस दिशा चक्र से वो योगी, दिशा को प्रकृति (या ब्रह्मशक्ति) के स्वरूप में ही पाता है, और जहां वो प्रकृति ही दिशा चक्र स्वरूप में ब्रह्मशक्ति होती हैं I

ऐसा योगी दिशास्त्र, अर्थात दिशा आयाम के अस्त्र स्वरूप सिद्धि को पाता है I

दिशास्त्र सिद्ध योगी, जीव जगत की दिशा परिवर्तन करने में सक्षम होता है, और जहाँ वो दिशा परिवर्तन भी उत्कर्ष पथ के परिवर्तन स्वरूप में ही होगा I

जब जब वैदिक युग आता है, तब तब इस दिशा आयाम का कोई सिद्धि योगी लौटाया भी जाएगा, और जहाँ उस योगी का ख्यापित उत्कर्ष पथ भी आत्ममार्ग से संबंधित होगा, जिसके गंतव्य में वो पूर्णब्रह्म ही हैं, जो ऐसे योगी के आत्मस्वरूप में ही स्वयं प्रकट होते हैं I

इसका अर्थ हुआ, कि उस योगी का ख्यापित बिंदु स्वयं ही स्वयं में, के वाक्य में स्थापित होकर ही जाएगा, जिसके मूल में तत्पुरुष ही हैं I

लेकिन यह तो रजोगुणी चित्त शक्ति के मार्ग को ही दर्शाता है, जो कार्य ब्रह्म (अर्थात महेशवर या योगेश्वर) की ही होती है I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि दिशा आयाम की आंतरिक साधनाओं के गंतव्य में, सर्वदिशा दर्शी ब्रह्म ही हैं, और जो सर्वमार्गी और मार्गातीत दोनों ही समान और पूर्ण रूप में होने के कारण, कैवल्य पथ या मुक्ति मार्ग को ही दर्शाते हैं I

और जहाँ वो मुक्तिमार्ग भी ब्रह्मत्व पथ ही है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जब योगी दिशा आयाम को अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करता है, तो वो योगी उसी दिशा आयाम के गंतव्य का साक्षात्कार करता है I

इस साक्षात्कार में वो दिशा आयाम को पूर्णरूपेण और समानरूपेण सर्वदिशा व्यापक पाता है I

और जहाँ वो सर्वदिशा व्याप्त ही योगी का वो आत्मस्वरूप होता है, जिसको वैदिक वाङ्मय में ब्रह्म कहा गया है I

और जहाँ, इस दिशा आयाम की गंतव्य सिद्धि ही जीव जगत की सर्वमार्गी, सर्वदिशा व्यापक, सर्ववेद व्याप्त, सर्वोत्कृष्ट उत्कर्ष पथ होती है I

और ऐसा सर्वमार्गी पथ, भावनात्मक होता हुआ भी, सूक्ष्म रूप में ही सही, लेकिन कर्मात्मक ही होगा I

वैदिक मनीषियों द्वारा ऐसे कई वाक्य बताए गए हैं, जो इसी सर्वदिशा व्यापक सिद्धि को दर्शाते हैं I

ऐसी स्थिति में वो सर्वदिशा व्यापक तत्त्व, ब्रह्म ही होते हैं, जो मार्गातीत, उत्कर्षातीत, दिशातीत, पथातीत और ग्रंथातीत भी होते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसी दिशा चक्र के प्रभाव के कारण सब उत्कर्ष मार्ग (या जीवन मार्ग या उत्कर्ष दिशाएं) जो इस दिशा आयाम के अंतर्गत ही आती हैं, वो सदैव ही परिवर्तनशील रहती है I

और इसी दिशा चक्र के प्रभाव के कारण, सब उत्कर्ष मार्ग (या जीवन मार्ग या उत्कर्ष दिशाएं) जो इस दिशा आयाम के अंतर्गत ही आती हैं, उन सबके गंतव्य में वही सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म ही हैं I

और जहाँ अनादि कालों से, उन्ही सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म की ओर ही, सभी उत्कर्ष पथ गतिमान हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

ब्रह्मा की रचना में, समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकर आदि बिंदु भी इसी दिशा आयाम के चक्र स्वरूप में बसे हुए हैं I

लेकिन इस बिन्दु का साक्षात्कार भी तब होता है, जब योगी दिशा साधना मे दिशा आयाम को अपनी काया से बाहर की ओर साक्षात्कार करता है I

और जब वही साधक, इसी दिशा आयाम को अपनी काया के भीतर साक्षात्कार करेगा, तब वो इस दिशा आयाम के गंतव्य, सर्वदिशा व्यापक ब्रह्म को ही अपने आत्मस्वरूप में पाएगा I

इसलिए जो साधक इस दिशा आयाम का सिद्ध होता है, अर्थात जो साधक यहाँ बताए गए दोनों स्वरूपों में दिशा आयाम का ज्ञाता होगा, वो साधक उसकी अपनी आंतरिक स्थिति में, प्रकृति अर्थात उत्कर्ष मार्गी (या मुक्ति पथगामी) भी होगा, और मार्गातीत (या दिशातीत या उत्कर्षातीत) ब्रह्म भी होगा I

 

दिशा सिद्ध योगी जो मानेगा, वो अब बताता हूँ …

दिशा अपने जीव जगत रूपी चक्र स्वरूप में, सार्वभौम ब्रह्मशक्ति, माँ प्रकृति ही है I

अपने प्राथमिक अभिव्यक्ति स्वरूप में, वो ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति, ब्रह्म ही हैं I

दिशा अपने गंतव्य, चक्रातीत अखण्ड स्वरूप में, सर्वदिशा साक्षी ब्रह्म ही है I

 

ऐसे साधक की आंतरिक स्थिति उत्कर्ष मार्गी (या मुक्तिमार्गी) होने के साथ साथ, अपनी आत्मस्थिति वो साधक मार्गमुक्त ब्रह्म ही होगा I

जो मार्ग मुक्त है, वही तो ग्रन्थ मुक्त होगा I

जो मार्गमुक्त अर्थात ग्रन्थमुक्त है, वही तो साधक का आत्मस्वरूप, ब्रह्म है I

और जहाँ वो ग्रन्थ भी, ब्रह्मशक्ति रूपी प्रकृति स्वरूप में, साधक का शरीर ही है I

 

ऐसे शरीर रूपी ब्रह्मग्रन्थ के धारक योगीजन ही दिशा आयाम का आलम्बन लेके, उत्कर्ष मार्गों को विशुद्ध करते हैं I

और जहाँ यह विशुद्धीकरण प्रक्रिया भी उन योगीजनों के शरीर रूपी ब्रह्मग्रंथ में ही चलित होकर, समस्त जीव जगत में समानरूपेण और पूर्णरूपेण व्यापक होती है I

और जहाँ वो जीव जगत भी, समस्त जीवों के भीतर ही बसा होता है, इसलिए वो विशुद्धीकरण प्रक्रिया भी ऐसे दिशा सिद्ध योग के शारीर में प्रारम्भ होकर, समस्त जीवों की काया के भीतर ही, शनैः शनैः ही सही, लेकिन चलायमान हो जाती है I

जब ऐसा हो जाएगा, तो जो भी जीव उस प्रक्रिया में जाने के पात्र नहीं होंगे, वो पृथक लोकों में बसे होने पर भी, अपने उन लोकों के जो स्थूल शरीर हैं, उन शरीरों से प्रस्थान भी करने लगेंगे I

यही वो दशा है, जिसमें कई सारे जीव समूह या तो उपद्रव या आत्महत्या ही करने लगेंगे I

और जीव समूहों में यह दशा भी खंड प्रलय सरीकी ही दिखाई देगी, जिसमें प्रकृति के पार्रिकर भी अपना योगदान, अपनी कार्यक्षमता के अनुसार, अपने-अपने कार्यक्षेत्र में ही देंगे I

और क्यूंकि वो माँ प्रकृति और उनके पार्रिकर, जीवों के भीतर और जगत में ही समानरूप में बसे हुए हैं, इसलिए जीवों के दृष्टिकोण से यह खंड प्रलय आंतरिक और बाह्य, दोनों स्वरूपों में ही आएगी I

इस जीव जगत के इस पृथ्वी सहित समस्त लोकों में, यही प्रक्रिया अब चलित हो चुकी है I

और ऐसा इसलिए हुआ है, क्यूंकि उस गुरुयुग को ही आना है, जिसकी प्रेरणा के मूल में काल आयाम के गंतव्य, गुरु महाकाल और उनकी कालचक्र रूपी सार्वभौम शक्ति, दस हाथ वाली, जीव जगत की मूल ऊर्जा, गुरुमाँ महाकाली ही हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

ऐसे योगी के स्थूल काया में, आज्ञा चक्र से थोड़ा सा ऊपर की ओर, महाकाल महाकाली योग होता है, जिसके बारे में एक आगे के अध्याय में बताया जाएगा I

और जहाँ इस योग में गुरु महाकाल, योगी के सहस्रार चक्र में स्वयंस्थित होते हैं, और गुरुमाँ महाकाली योगी के मेरुदण्ड के नीचे के भाग से सहस्रार चक्र में बसे हुए उन गुरु महाकाल के पास, अखंड गति से जाती ही रहती है I

 

ऐसे योगी के लिए ही वेद मनीषियों ने ऐसा कहा था, …

जो उत्कर्ष के गंतव्य, अर्थात ब्रह्म में स्थित है, उसके लिए ग्रंथों का क्या लाभ? I

जो ब्रह्म सहित, उनकी सार्वभौम ब्रह्मशक्ति हो गया, उसके लिए क्या उत्कर्ष पथ I

 

और वेद मनिषियों ने तो ऐसा भी कहा था, …

जो उत्कर्ष पथ पर अब तक चला ही नहीं है, उसके लिए ग्रंथों का क्या लाभ? I

 

इसका अर्थ है, कि …

जो उत्कर्ष पथगामी है, उसके लिए ही तो ग्रन्थ और मार्ग आदि हैं I

जो ब्रह्म, उनकी सार्वभौम ब्रह्मशक्ति का पथगामी है, उसके लिए ही उत्कर्ष पथ है I

पर जिसने इस दशा को पार किया है, उसके लिए क्या उत्कर्ष और क्या अपकर्ष I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इन दोनों साधनाओं में और उनकी दोनों प्रकार की सिद्धियों में समान रूप में बसे होने के कारण, वो साधक जीव जगत का तारक ही है, क्यूंकि वो ब्रह्म की पूर्णता में ही बसा हुआ है I

ब्रह्म की पूर्णता में, निर्गुण ब्रह्म ही सगुण निराकारी और सगुण साकारी हैं I

ब्रह्म की पूर्णता में, ब्रह्म ही माँ प्रकृति (अर्थात ब्रह्मशक्ति) और भगवान् हैं I

ब्रह्म ही सार्वभौम ब्रह्मशक्ति (या मूल प्रकृति) हैं, और ब्रह्म शक्ति ही ब्रह्म I

ब्रह्मशक्ति (मूलप्रकृति) नामक अभिव्यक्ति स्वरूप में, ब्रह्म ही जीव जगत हुए हैं I

 

इस ब्रह्मशक्ति स्वरूप में, ब्रह्म की दो प्रधान अभिव्यक्तियां हैं,  जो सगुण निराकार और सगुण साकार कहलाती है I

और अपने गंतव्य स्वरूप में वही ब्रह्म को निर्गुण निराकार कहा जाता है I

इसलिए जिस साधक में ब्रह्म को पूर्णरूपेण जाना होगा, उसनें ब्रह्म के अभिव्यक्ति और गंतव्य स्वरूप, दोनों को ही जाना होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और क्यूँकि ब्रह्म का अभिव्यक्ति स्वरूप, ब्रह्मशक्ति नामक अस्त्र भी है, इसलिए ऐसे साधक ने ब्रह्म के अभिव्यक्ति स्वरूप को अस्त्र रूप में भी जाना ही होगा I

ब्रह्म की अभिव्यक्तियों के अस्त्र स्वरूप का ज्ञान भी, ब्रह्म की परिपूर्णता को जानने के मार्ग का अभिन्न अंग है I

दिशा आयाम में, ब्रह्म की अभिव्यक्ति को जानने के मार्ग से ही साधक दिशा चक्र का ज्ञान पाता है, और जिसके पश्चात, वो साधक दिशा आयाम के चक्र स्वरूप से जीवधर और जगतधर सिद्धि के दिशा आयाम नामक अंश को प्रकृति स्वरूप में, अर्थात ब्रह्मशक्ति के ही ब्रह्मपथ स्वरूप में पा जाता है I

और ऐसा होने के कारण, इसी दिशा आयाम का चक्र स्वरूप ही उस साधक का वो अस्त्र होता है, जिससे वो साधक इस जीव जगत के उत्कर्ष मार्गों को, प्रेमपूर्वक या मारक मार्ग से ही सही… लेकिन परिवर्तन करता है I

दिशा आयाम के अस्त्र स्वरूप का प्रयोग भी काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता (या शक्ति) का आलम्बन लेकर ही किया जाता है I

जब भी ऐसा दिशा आयाम का अस्त्र रूप में प्रयोग किया जाएगा, तो समस्त विकृत मार्गों के जीव पगलाएँगे ही I और ऐसे स्थिति में, वो जीव ही विप्लव का कारण बन जाएंगे I

इसलिए दिशास्त्र का प्रयोग भी युग अंत, युग स्तंभन आदि समय पर ही किया जाता है… अन्य किसी भी समयखण्ड में नहीं I

और इस दिशास्त्र का प्रयोग भी शनैः शनैः ही किया जाता है, ताकि जीवों का पागलपन भी शनैः शनैः और पृथक पृथक स्थानों पर आए (अर्थात सभी एक साथ पगला न जाएं) I

और इसी दिशास्त्र के प्रयोग के कारण, जिन जीवों के प्रारब्ध में अगले युगादि के अनुसार परिवर्तित होना है, वो परिवर्तन को ग्रहण भी करेंगे और अगले युगादि में जाने के पात्र भी बन जाएंगे I

यदि दिशास्त्र का प्रयोग ऐसे शनैः शनैः नहीं होगा, तो समस्त जीव (अर्थात स्थूल, सूक्ष्म, दैविक या कारण और संस्कारिक जगत में बसे हुए जीव) एक साथ पगला कर, सबकुछ ही नष्ट कर देंगे… और अगले युग में जाने के लिए, कोई बचेगा ही नहीं I

इसलिए दशास्त्र का प्रयोग भी शनैः शनैः की किया जाता है, और इसी प्रक्रिया से वो अस्त्र के प्रभाव, किसी एक पंथ, स्थान आदि से दुसरे में जाते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी दिशा आयाम के चक्र स्वरूप के तारतम्य को जानकार, वो साधक इसी दिशा आयाम के गंतव्य का साक्षात्कार करता है, जो सर्वदिशा व्यापक ब्रह्म ही है I

इस साक्षात्कार से वो साधक की चेतना उन्ही सर्वदिशा व्याप्त ब्रह्म में, जो दिशा आयाम के गंतव्य स्वरूप ही हैं, उनमें स्थित भी हो जाती है I

इस साक्षात्कार के पश्चात, वही साधक जो पूर्व में जीवधर और जगतधर सिद्धियों का धारक था, वो जीवातीत सिद्धि और जगतातीत सिद्धि का भी धारक हो जाता है I

इस दिशा आयाम के चक्र स्वरूप का साक्षात्कारी साधक,  जीव जगत का मुक्तिमार्ग (या तारकमार्ग) होता है I

और इसके साथ साथ, इसी दिशा आयाम के गंतव्य में स्थित होकर वो साधक, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण में उसी मुक्तिमार्ग का गंतव्य रूप, कैवल्य मोक्ष रूपी ब्रह्म ही कहलाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

अब ऊपर बताई गई दोनों सिद्धियों के धारक साधक के बारे में बताता हूँ I

दिशा आयाम का पूर्ण सिद्ध योगी, दिशा आयाम के प्रकृति (या चक्र या शक्ति) और गंतव्य (या ब्रह्म), दोनों ही स्वरूपों में समान रूप में बसा होता है I

प्रकृति स्वरूप में, अर्थात दिशाचक्र स्वरूप में वो साधक, ब्रह्म की दोनों प्रधान अभिव्यक्तियों का ज्ञाता होगा I

यह दो अभिव्यक्तियां ही ब्रह्म का सगुण निराकार और सगुण साकार स्वरूप कहलाती हैं I

इनही दोनों अभिव्यक्ति स्वरूपों में ही यह समस्त जीव जगत बसाया गया है I

और गंतव्य स्वरूप में वो साधक ब्रह्म के ही सर्वदिशा व्यापक स्वरूप में स्थित होगा I

यह सर्वदिशा व्यापक स्वरूप सभी दिशाओं (या उत्कर्ष मार्गों) के भीतर और उनके घेरे हुए (अर्थात बाहर) भी होता है I

इसलिए यह स्वरूप, ब्रह्म की पूर्णता का द्योतक भी है, क्यूंकि यह ब्रह्म की जीव जगत के भीतर, दिशा चक्र या उत्कर्ष पथ रूपी अभिव्यक्ति के साथ साथ, उन अभिव्यक्ता ब्रह्म जो मार्गातीत, पथातीत या दिशातीत और ग्रंथातीत ही हैं… इन दोनों से ही सम्बंद रखता है I

 

टिप्पणियां :

  • अपने प्राथमिक अभिव्यक्ति स्वरूप में, वो ब्रह्म ही उस सर्वशक्तिमान स्वरूप में होते हैं, जो प्रकृति (या ब्रह्मशक्ति) कहलाती है I
  • और अभिव्यक्ता स्वरूप में, वही ब्रह्म अपने सर्वसाक्षी स्वरूप में होते है, जो स्व:प्रकाश, तुरीयातीत आत्मा और निर्गुण निराकार ब्रह्म है I
  • इन दोनों स्वरूपों को जानकार ही ब्रह्म की परिपूर्णता जो जाना जाता है I
  • जिस योगी ने ब्रह्म को जाना होगा, उसनें ब्रह्म को अभिव्यक्ता और अभिव्यक्ति दोनों ही स्वरूपों में जाना होगा I और जिस योगी ने ऐसा नहीं जाना, उसने ब्रह्म की परिपूर्णता को भी नहीं जाना होगा I
  • जिस योगी ने ब्रह्म को जाना होगा, उसनें ब्रह्म को अभिव्यक्ता और अभिव्यक्ति दोनों ही स्वरूपों में जाना होगा I उस योगी ने ब्रह्म को जीव जगत और जीवातीत जगतातीत स्वरूप में भी समानरूपेण जाना होगा I
  • ऐसा ब्रह्मज्ञाता योगी, ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म की परिपूर्णता का लिंग स्वरूप होता है I
  • ऐसे योगी के मूल में, अर्थात मेरुदण्ड के सबसे नीचे के भाग से लेकर लिंग तक, ब्रह्मशक्ति ही निवास करती होगी I और उसी योगी के शिखर पर, अर्थात सहस्रार चक्र पर ही ब्रह्म अपने पूर्ण रूप में, या अपने समस्त स्वरूपों सहित अपने निर्गुण स्वरूप में भी निवास कर रहे होंगे I
  • और ऐसे योगी के आज्ञा चक्र के थोड़ा सा ऊपर, उन्ही ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति का सहवास भी योगी की काया के भीतर, अखंड रूप में चलित हो रहा होगा I
  • ऐसा योगी पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री की अद्वैत योगावस्था का सगुण साकार स्वरूप भी होता है I
  • ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में, ऐसा स्वरूपात्मा, वेदात्मा के शब्द से भी पुकारा जाता है I
  • क्यूंकि वेदात्मा, माँ पञ्च मुखा गायत्री ही होती हैं, इसलिए ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में ऐसा योगी माँ गायत्री का लिंगात्मक सगुण साकार स्वरूप भी कहलाता है I
  • और यही स्वरूप, यहां बताए जा रहे सभी आयामों की सिद्धि में, और सिद्धि से भी पाया जा सकता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

गंतव्य स्वरूप में वो साधक इस दिशा चक्र को अपने मुक्तिमार्ग और कैवल्य रूप में पाता है I

और जीव जगत रूपी चक्र स्वरूप में, यही दिशा आयाम उस साधक का सार्वभौम अस्त्र भी होता है, जिससे वो साधक इस जीव जगत के उत्कर्ष मार्गों का दिशा परिवर्तन करता है, और इस जीव जगत के समस्त अपकर्ष मार्गों का और उनके अनुयायियों का समापन भी, अपने दिशास्त्र के प्रयोग से, शनैः शनैः ही सही… लेकिन करता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

ऐसा दिशा सिद्ध योगी, वाममार्ग और दक्षिणमार्ग, दोनों में से किसी का भी हो सकता भी I

लेकिन वो जिस भी मार्ग पर गमन करता होगा, इस धरा पर उन सार्वभौम सम्राट और सनातन गुरु श्रीहरि का होकर ही रहेगा, अर्थात धरा पर वैष्णव होकर ही रहेगा, क्यूंकि इसके बिना संहार और तिरोधान के पश्चात, जो उत्पत्ति करी जाएगी, उसमें स्थिति ही नहीं आएगी I और ऐसी अवस्था में, वो अंत में आने वाला अनुग्रह भी स्थापित नहीं हो पाएगा I

ऐसा योगी उस मार्ग का भी हो सकता है, जो इन दोनों मार्गों के योग से चालित होता है, और जिसका ज्ञान आज लुप्त हो चुका है I

ऐसी दशा में वाममार्गी होकर, वो योगी रचनात्मक होगा (अर्थात उत्कर्ष मार्ग स्थापित करेगा) और दक्षिण मार्गी होकर वो योगी उस स्थापित उत्कर्ष पथ के भीतर से ही उस मुक्तिमार्ग को प्रकाशित करेगा… जो उस कैवल्य मोक्ष को जाता है, जो ब्रह्म कहलाता है I

 

तो अब इन दोनों स्वरूपों के मुख्य बिंदु को बतलाता हूँ …

 

दिशाचक्र सिद्धि का अस्त्र स्वरूप, दिशाचक्र सिद्धि का मारक स्वरूप, दिशाचक्र सिद्धि का परिवर्तनकारक स्वरूप, दिशाचक्र का अस्त्र स्वरूप, दिशाचक्र का मारक स्वरूप, दिशाचक्र का परिवर्तनकारक स्वरूप, दिशा का अस्त्र स्वरूप, दिशा का मारक स्वरूप, दिशा का परिवर्तनकारक स्वरूप, … जब वो साधक स्वयं को दिशा के प्रकृति स्वरूप, अर्थात दिशाचक्र के तातरम्य के भीतर रखेगा, तो वो साधक उसी दिशा आयाम के शक्तिचक्र स्वरूप में ही बसकर, उसी दिशा आयाम को अपने अस्त्र रूप में देखेगा I

और इसी अवस्था को वो साधक दिशास्त्र कहेगा… जो एक सार्भौम अस्त्र स्वरूप में ही होगा… और जिसका प्रयोग वो साधक करेंगे तो उसकी अपनी काया के भीतर, लेकिन उसका प्रभाव समस्त जीव जगत के उत्कर्ष मार्गों में ही दिखाई देगा I

लेकिन इस अस्त्र का प्रयोग भी काल की प्रेरणा से और काल की शक्ति का आलम्बन लेके ही किया जाएगा I

और जहाँ काल अपने चक्र स्वरूप में, मूल प्रकृति अर्थात ब्रह्मशक्ति (या माँ प्रकृति) ही होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जो योगी स्वयं ही प्रकृति के ब्रह्मशक्ति नामक मार्ग के स्वरूप का धारक नहीं हुआ है, तो वो योगी समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकरों के मार्गों (अर्थात दिशाओं) को ही अपने अस्त्र स्वरूप में कैसे पाएगा? I

और यदि वो योगी ऐसा ही नहीं होगा, तो वो योगी माँ प्रकृति (या ब्रह्मशक्ति) का उत्कर्षमार्गी योद्धा कैसे कहलाएगा? I

और वास्तव में तो जो माँ प्रकृति का योद्धा ही नहीं, वो धर्म योद्धा भी नहीं हो सकता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने दिशाचक्र को ही अस्त्र स्वरूप में पाया है, उसको ही महारजस योद्धा (अर्थात महारज योद्धा) कहा जाता है I

ऐसे योगी का संबंध रजोगुणी चित्त से होता है, जो ब्रह्म के रजोगुणी (या रचैता स्वरूप) को दर्शाता है I

और पञ्चब्रह्म में ऐसे योगी का नाता तत्पुरुष नामक ब्रह्म से ही होता है I

प्रकृति के नव कोशों में ऐसे योगी का नाता, अपरा प्रकृति के सप्तम कोष से होता है I

और ऐसे योगी की शक्ति भी प्रकृति के रजोगुण रूप में ही सुरक्षित रहती है, क्यूंकि इसी रजोगुण के भीतर ही दिशाचक्र और उस दिशाचक्र के समस्त भाग, अपने शक्ति स्वरूप (अर्थात अस्त्र स्वरूप) में चलायमान रहते हैं I

दिशा आयाम के अनुसार, यही वो ब्रह्मशक्ति है जिसका नाता माँ गायत्री के रक्ता मुख (अर्थात माँ गायत्री के विद्रुमा मुख) से होता है, और जो एक उग्र मुख (अर्थात उग्र शक्ति) ही है I

और दिशाचक्र का सिद्ध योगी, इसी रजोगुण में बसकर, अपने दिशास्त्र के समस्त उप-अस्त्रों के प्रयोग करता है… और जीव जगत में दिशा परिवर्तन लाता है I

यह दिशा परिवर्तन तब भी आएगा, जब इसको कोई रोकने का प्रयास करेगा, क्यूंकि यह दिशास्त्र, आयाम अस्त्र का अंग होने के कारण, इस जीव जगत के मूलास्त्र चतुष्टय का अंग भी है I

मूल का तो कोई मूल ही नहीं होता, इसलिए मूल की कोई काट भी नहीं होती I

 

इसलिए, इस समस्त जीव जगत में, मूलस्त्रों की काट किसी के पास नहीं है I

कलयुग में दिव्यास्त्रों और देवस्त्रों का प्रयोग नहीं होता, लेकिन और भी तो अस्त्रो होते हैं, जो सार्वभौम होते हैं I

इसलिए जब कलियुग के कालखण्ड के भीतर ही, और एक चलते हुए कलियुग को ही स्तंभित करके, जो गुरु युग (अर्थात वैदिक युग या श्रीहरि का युग) लाया जाता है, उसकी प्रक्रिया में ऐसे ही सार्वभौम अस्त्रों का प्रयोग किया जाता है… न कि दिव्यस्त्रों या देवस्त्रों का I

और ऐसा होने पर भी, दिशास्त्र सिद्ध योगी, इन मूलास्त्रों का प्रयोग, काल की प्रेरणा से और कालशक्ति के आलम्बन से ही कर पाएगा I

और इस दिशास्त्र की प्रधान शक्ति को माँ गायत्री का लाल मुख कहा जाता है, जिसके अंतर्गत कई और ब्रह्माण्डीय दिव्यताएं जैसे लाल तारा, रक्त चमुंडा, आदि भी आती हैं I लेकिन इन दिव्यताओं के बारे में तो तब ही बात हो पाएगी, जब पञ्च मुखा सदाशिव को ही गुरु विश्वकर्मा और विराट परब्रह्म स्वरूप में दर्शाया जाएगा I

 

  • पञ्च मुखी गायत्री और पञ्चब्रह्म सिद्धांत, पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखी गायत्री सिद्धांत, … दिशा का गंतव्य स्वरूप, दिशा का तारक स्वरूप, दिशा का दिशातीत स्वरूप, दिशा का मुक्ति स्वरूप, दिशा का सर्वदिशा व्यापक स्वरूप,

और वही साधक जब इसी दिशा आयाम के गंतव्य, अर्थात सर्वदिशा व्यापक ब्रह्म के भीतर स्थित होगा, तो वही साधक जीव जगत का तारक ही हो जाएगा I

ऐसा जीव जगत का तारक होने का कारण है, कि जिस साधक ने दिशा आयाम को यहाँ बताए गए दोनों स्वरूपों में पाया होगा, वो साधक ही जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का इस दिशा आयाम के अंतर्गत और परिपेक्ष में धारक भी होगा I

जो स्वयं ही जीवातीत और जगतातीत नहीं, वो जीव जगत का तारक कैसे हो सकता है? I

दिशास्त्र का धारक योगी, यदि जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का भी धारक होगा, तो ऐसा योगी या तो ब्राह्मण क्षत्रिय होगा और या क्षत्रिय ब्राह्मण… वो वर्णाश्रम के और किसी भी भाग का हो ही नहीं सकता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और क्योंकि वो साधक जान जाता है, कि वो सर्वदिशा व्याप्त ही ईशान ब्रह्म हैं, इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि जो ईशान ब्रह्म हैं, वो इस प्रदक्षिणा के अंतिम पड़ाव होते हुए भी, उनका कोई पड़ाव नहीं होता I

सर्वदिशा व्यापक का कोई मार्ग रूप में पड़ाव हो ही नहीं सकता है I

सर्वदिशा व्यापक की कोई एक या अनेक दिशाएँ कैसे हो सकती है? … क्यूंकि वो तो दिशावाद से ही अतीत है, अर्थात दिशातीत है I

अब अगले आयाम पर जाता हूँ …

 

  • पञ्च मुखी गायत्री पञ्चब्रह्म सिद्धांत, पञ्चब्रह्म पञ्च मुखी गायत्री सिद्धांत, … आकाश आयाम का जीवधर सिद्धि स्वरूप, आकाश का जगतधर सिद्धि स्वरूप, आकाश का जीवधर स्वरूप, आकाश का जगतधर स्वरूप, … आकाश आयाम का जीवातीत सिद्धि स्वरूप, आकाश आयाम का जगतातीत सिद्धि स्वरूप, आकाश का जीवातीत स्वरूप, आकाश का जगतातीत स्वरूप, … आकाशातीत सिद्धि, आकाशातीत अवस्था, … आकाश आयाम का अस्त्र स्वरूप, आकाश आयाम का मारक स्वरूप, आकाश आयाम का तारक स्वरूप, आकाश आयाम का गंतव्य स्वरूप, आकाश का अस्त्र स्वरूप, आकाश का मारक स्वरूप, आकाश का तारक स्वरूप, आकाश का गंतव्य स्वरूप, … मूलास्त्र चतुष्टय और आयाम चतुष्टय का नाता, … मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान का आकाश आयाम से नाता, आकाशास्त्र , …

आकाश आयाम का जगत स्वरूप ही आकाशचक्र कहलाता है, जिसके भीतर आकाश की ऊर्जाओं का तारतम्य होता है, और इसीलिए आकाश का ऐसा चक्र स्वरूप, उस सदैव परिवर्तनशील ब्रह्माण्डीय आकाश को दर्शाता है, जो जगत कहलाता है I

और वही आकाश जब अपने परिवर्तनशील घट स्वरूप में होता है, तो वही आकाश जीव शब्द का भी द्योतक है I

आकाश में ही समस्त ऊर्जाएँ बसी हुई होती हैं I इस जीव जगत के मूल में वो ऊर्जा ही है, जो ब्रह्मशक्ति कहलाती हैं और जहाँ उन ब्रह्मशक्ति का निवास स्थान भी आकाश ही है I

आकाश अपने चक्र स्वरूप में छोटा और बड़ा होता ही रहता है I और इस छोटे और बड़े होने की गति को आकाश की इकाइयों के ज्ञान से जाना भी जा सकता है I मैं आकाश इकाई का लिंक नीचे दे रहे हूँ, जिसको जानना हो, उसको पढ़ ले I

आकाश का चक्र स्वरूप ही प्रकृति के समस्त बिन्दुओं की सदैव परिवर्तनशील अवस्था का धारक होता है I और ऐसा होने के कारण, आकाश जो प्रकृति का ही प्रमुख परिकर है, वो भी परिवर्तनशील ही हो जाता है I

और इसी सदैव परिवर्तित होते हुए आकाश के चक्र स्वरूप को, आकाश चक्र कहा गया है, जिसके भीतर समस्त जीव जगत बसा हुआ है, और वो आकाश भी जीव जगत में समान रूप में बसा हुआ है I और जहाँ आकाश का चक्र स्वरूप भी सदैव परिवर्तनशील जीव जगत ही है I

इसी जीव जगत के भीतर ही समस्त जीव सत्ता समान रूप में बसी हुई है, और यह जगत भी समस्त जीव सत्ता में, अपने ही घट स्वरूप में, समान रूप ही में बसा हुआ है I

और क्यूंकि आकाश के चक्र स्वरूप के भीतर समस्त जीव जगत बसा हुआ है, और वो आकाश चक्र भी समस्त जीव जगत के भीतर चलायमान हो रहा है, इसलिए आकाश चक्र में जब भी परिवर्तन आता है, तब जीव जगत में भी वैसा ही परिवर्तन दिखाई देने लगता है I

और यह परिवर्तन भी काल के चक्र रूप के परिवर्तन के कारण ही होता है, क्यूंकि इस समस्त ब्रह्म रचना में, सबकुछ कालगर्भित ही है I और इसके कारण, काल ही मूल आयाम है जिसके परिवर्तन से सभी आयाम प्रभावित होते रहते हैं I

लेकिन यह परिवर्तन भी तो आकाश में बसी हुई ऊर्जाओं के तारतम्यवादी परिवर्तन से ही आता है, न कि आकाश के परिवर्तन से I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसलिए, आकाश में ऊर्जाएँ बसी होने पर भी, वो ऊर्जाएं प्रकृति के मूल स्वरूप को ही दर्शाती हैं, जो मूल प्रकृति कहलाती है, और जो वैदिक वाङ्मय में प्रकृति और देवी आदि शब्दों से भी दर्शाई गयीं हैं I

क्यूंकि सबकुछ आकाश में ही बसा हुआ है, इसलिए जब आकाश में परिवर्तन आता है, तब जो जो कुछ भी इस जीव जगत के भीतर बसा हुआ है, उस सबको को भी उस परिवर्तन को स्वीकार करना ही होता है, और उस परिवर्तन के अनुसार ही अपने को ढालना भी होता है I

ब्रह्म की रचना में, समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकर आदि बिंदु भी इसी आकाश आयाम में बसाए गए थे I

इसलिए जो साधक इस आकाश आयाम का सिद्ध होता है, वो अपनी आत्मस्थिति में, प्रकृति भी है और ब्रह्म भी, अर्थात वो साधक की आत्मस्थिति, ब्रह्मशक्ति में ही बसी हुई होती है, और उस साधक का आत्मस्वरूप ही ब्रह्म होता है I

आकाश के ऐसे प्रकृति रूपी चक्र स्वरूप का साक्षात्कार करके साधक आकाश चक्र का ज्ञान पाता है, और इसके पश्चात वो साधक आकाश आयाम के चक्र स्वरूप से जीवधर और जगतधर सिद्धि के आकाश आयाम नामक अंश को प्रकृति स्वरूप में, अर्थात ब्रह्मशक्ति स्वरूप में पा जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इसी आकाश आयाम के चक्र स्वरूप के तारतम्य को जानकार, वो साधक इसी आकाश आयाम के गंतव्य का साक्षात्कार करता है, जो अनंत ब्रह्म ही है I

इस साक्षात्कार से वो साधक की चेतना उन्ही अनंत ब्रह्म में, जो आकाश आयाम के गंतव्य ही हैं, उनमें ही स्थित हो जाती है, और ऐसा साधक अपने आत्मस्वरूप को ही अनंत रूप में साक्षात्कार करता है I

साधक का ऐसा आत्मस्वरूप अनंत शक्ति भी है, और अनंत ब्रह्म भी, इसलिए इस साक्षात्कार के पश्चात, वही साधक जो पूर्व में जीवधर और जगतधर सिद्धियों का धारक था, वो जीवातीत और जगतातीत ही हो जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

  • आकाश का प्रकृति स्वरूप, अर्थात आकाश चक्र की सिद्धि, जीवधर और जगतधर शब्दों से जुडी हुई होती है I
  • और आकाश के ब्रह्म स्वरूप, अर्थात आकाश का महाकाश स्वरूप जिसको अनंताकाश, ब्रह्माकाश आदि शब्दों से भी बताया जाता है, उसका साक्षात्कार जीवातीत और जगतातीत शब्दों से जुड़ा हुआ है I

 

अब ऊपर बताई गई दोनों सिद्धियों के धारक साधक के बारे में बताता हूँ I

  • जो साधक आकाश आयाम का पूर्ण सिद्ध होता है, वो आकाश आयाम के प्रकृति (या चक्र या शक्ति) और गंतव्य (या ब्रह्म), दोनों ही स्वरूपों में समान रूप में बसा होता है I
  • इस प्राकृत स्वरूप में वो साधक इस आकाश चक्र को अपनी आत्मऊर्जा रूप में पाता है I और उस ऊर्जावान चक्र स्वरूप में यही आकाश आयाम, उस साधक का अनंत व्याप्त अस्त्र भी होता है I
  • और आकाश आयाम के गंतव्य को जानकर, वो साधक उसी आकाश के अनंत स्वरूप में, जो अनंत ब्रह्म ही हैं, उनमें विलीन होकर, अनंत ही हो जाता है I

तो अब इन दोनों स्वरूपों के मुख्य बिंदु को बतलाता हूँ …

 

आकाश चक्र का अस्त्र स्वरूप, आकाश चक्र का मारक स्वरूप, आकाश चक्र का परिवर्तन कारक स्वरूप, आकाश चक्र का आकाशास्त्र स्वरूप, …

जब वो साधक स्वयं को आकाश चक्र के भीतर रखेगा, तो वो साधक उसी आकाश आयाम के शक्ति चक्र स्वरूप में ही बसकर, उसी आकाश आयाम को अपने अस्त्र रूप के देखेगा I

और इसी अस्त्र को वो साधक आकाशास्त्र कहेगा, जो एक अनंत स्वरूप अस्त्र ही होगा, और जिसका प्रयोग वो साधक करेगा तो उसकी अपनी काया के भीतर बसे हुए घटाकाश में, लेकिन उस अस्त्र का प्रभाव उस ब्रह्माण्डीय आकाश में ही देखेगा जिसमें समस्त जीव जगत बसा हुआ है I

लेकिन इस आकाशास्त्र का प्रयोग भी काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता के आलम्बन से ही होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

आकाशास्त्र सिद्ध योगी, जीव जगत का अहम् रूपी ऊर्जा परिवर्तन करने में भी सक्षम होता है, और जहाँ वो अहम् परिवर्तन भी अहम् विशुद्धि की ओर ही लेके जाता है I

और जहाँ वो विशुद्ध अहम् ही ब्रह्म कहलाता है I

जब जब वैदिक युग आता है, तब तब इस आकाश आयाम का सिद्ध योगी लौटाया ही जाएगा I और जहाँ उस योगी से प्रकाशित विशुद्ध अहम् भी, अनंत अहम् या अहमकाश स्वरूप में ही होगा, जो ब्रह्म ही है I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि विशुद्ध अहम् को ही ब्रह्म कहते हैं और जहाँ वो विशुद्ध अहम् भी अनंत ब्रह्म ही होता है I

लेकिन यह तो उन विश्वरूपी ब्रह्म के तमोगुणी अहम् स्वरूप से सम्बंधित है, जो ब्रह्माण्ड ही है I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि आकाश आयाम की आंतरिक साधनाओं के गंतव्य में, विश्वरूपी ब्रह्म ही होते है, और जो अनंत होते हैं, और साधक के ब्रह्माकाश रूपी आत्मस्वरूप को ही दर्शाता हैं I

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत में, आकाश आयाम का संबंध अघोर ब्रह्म और माँ गायत्री के नीले मुख से ही है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

ऐसा होने का कारण है, कि इस सिद्ध की प्राप्ति तक, उस साधक का घटाकाश ही महाकाश हो गया होगा I

इस सिद्धि की प्राप्ति तक, उस साधक के मन, बुद्धि, चित्त, अहम् और प्राण रूपी समस्त घट ही टूट गए होंगे I

ऐसा होने पर, उस साधक के घटाकाश में पूर्व से चल रहा परिवर्तनशील आकाश चक्र, साधक के ही महाकाश में विलीन हो गया होगा, और अपने निरपरिवर्तन अनंत स्वरूप को प्राप्त भी हो गया होगा I

ऐसी दशा के पश्चात, उस साधक की आत्मा शक्ति ही ब्रह्मशक्ति स्वरूप में स्वयं प्रकट हुई होगी I

जिस योगी की आत्मशक्ति ही ब्रह्मशक्ति होती है, उसका आत्मा भी ब्रह्म ही है I

 

इसलिए, वो योगी …

अपने आत्मशक्ति में अनंत प्रकृति (अर्थात अनंत या सार्वभौम ब्रह्मशक्ति) है

और वही योगी उसके अपने आत्मस्वरूप में, अनंत ब्रह्म ही है I

ऐसा होने के कारण, वो योगी …

ब्रह्म साक्षात्कारी ज्ञानी भी होगा, और ब्रह्मशक्ति का धारक, धर्म योद्धा भी होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने आकाश चक्र को ही अस्त्र स्वरूप में पाया है, उसको ही महातमस योद्धा (अर्थात महातम योद्धा) कहा जाता है I

ऐसे योगी का अहम् विशुद्ध होता है, और पञ्चब्रह्म में ऐसे योगी का नाता अघोर ब्रह्म और माँ गायत्री के नीले मुख से ही होता है I

और ऐसे योगी की शक्ति भी प्रकृति के तमोगुण में ही सुरक्षित रहती है, अर्थात प्रकृति के अष्टम आकाश, अर्थात अपरा प्रकृति (या ब्रह्माण्डीय शक्ति) के सबसे ऊपर के कोष (या अपरा प्रकृति के आठवें कोष) में ही सुरक्षित रहती है I

इसी तमोगुणी प्रकृति के भीतर ही आकाश चक्र और उस आकाश चक्र के समस्त भाग, अपने शक्ति स्वरूप (अर्थात अस्त्र स्वरूप) में चलायमान रहते हैं I

और आकाश चक्र का ऐसा सिद्ध योगी, प्रकृति के अष्टम कोष (अर्थात अपरा प्रकृति के सबसे ऊपर के लोक) में बसकर, अपने आकाशास्त्र के समस्त उप-अस्त्रों (अर्थात आकाश चक्र के भागों) का प्रयोग करता है, और जीव और जगत के समस्त अंगों के घटाकाश नामक भाग का ही परिवर्तन कर देता है I

और ऐसे योगी की शक्ति, प्रकृति के मूल रूप, शून्य तत्त्व में भी सुरक्षित रहती है I ऐसा इसलिए है, क्यूंकि इसी शून्यता के भीतर ही आकाशचक्र और उस आकाशचक्र के समस्त भाग, अपने शक्ति स्वरूप (अर्थात अस्त्र स्वरूप) में चलायमान रहते हैं I

इसलिए चाहे तुम शून्य शक्ति और शून्यास्त्र बोलो या आकाशास्त्र… बात एक ही है I

और ऐसा आकाश चक्र का सिद्ध योगी, इसी शून्य तत्त्व में बसकर और माँ प्रकृति की प्रेरणा से, अपने आकाशास्त्र के उपा-अस्त्रों के प्रयोग करता है, और जीवों के भीतर जो भी परिवर्तन लाना है, वो लाता है I

और यह घटाकाश परिवर्तन तब भी आएगा, जब कोई इसको रोकने का प्रयास करेगा, क्यूंकि यह आकाशास्त्र, आयाम अस्त्र का अंग होने के कारण, इस जीव जगत के मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान का अभिन्न अंग भी है I

 

आकाश चक्र सिद्धि का गंतव्य स्वरूप, आकाश चक्र सिद्धि का तारक स्वरूप, आकाश सिद्धि, … अनंतयुग, अनंत युग, श्रीहरी युग,

और जब साधक इसी आकाश आयाम के गंतव्य, अर्थात अनंत ब्रह्म के भीतर स्थित होगा, तो वो जीव जगत का तारक भी हो जाएगा I

जब ऐसा साधक परिवर्तन करके, एक नया युग ही ले आता है, तो ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा उस योगी को भी आकाश के गंतव्य, अनंत शब्द से पुकारा जाता है I

ऐसे योगी के आत्मस्वरूप और सनातन गुरु रूप में अनंत सर्वात्मा श्रीहरि ही होते हैं I

और वो योगी अपनी काया रूप में, अपने ही आत्मस्वरूप, श्रीहरि का नन्हा विद्यार्थी ही होता है I

 

इसलिए, …

ऐसा योगी अपना ही गुरु और शिष्य भी होगा I

अपने काया रूप में वो योगी शिष्यपन में होगा I

अपने ही आत्मस्वरूप में, वो योगी अपना ही गुरु होगा I

इसीलिए, जो युग आकाशास्त्र के प्रयोग से लाया जाएगा, वो अनंतयुग ही कहलाएगा, जिसमें जीवों का घटाकाश ही अनंत स्वरूप में साक्षात्कार होगा I

 

अब ध्यान देना … क्यूंकि उस अनंत युग अर्थात श्रीहरी युग के कुछ सूक्ष्म बिंदु बता रहा हूँ …

उस अनंत युग (या गुरु युग) में, जीवों का …

घटाकाश ही महाकाश के समान होके, अनंताकाश हो जाता है I

चित्त ही चिदाकाश के समान संस्कार रहित होके, अनंत हो जाता है I

अहम् ही अहमाकाश के समान विशुद्ध होके, अनंत हो जाता है I

मन ही मनाकाश के समान पूर्ण स्थिर होके, अनंत हो जाता है I

बुद्धि ही ज्ञानाकाश के समान निश्कलंक होके, अनंत हो जाती है I

 

और जब यह सब दशाओं की प्राप्ति होती है, तो ऐसा साधक …

  • अपने प्राणों को ही अपने आत्मिक प्राणाकाश के स्वरूप में पाता है I
  • और जहाँ वो आत्मिक प्राणाकाश भी वही जगत जननी, जगत तारक, जगत व्यापक सार्वभौमिक अनंत ब्रह्मशक्ति ही होती हैं I

यहाँ जो अनंत शब्द कहा गया है, वो ब्रह्मशक्ति का द्योतक होने के साथ साथ, उन अनंत ब्रह्म का भी द्योतक है, और जहाँ इन दोनों की योगावस्था ही ऐसे साधक का आत्मस्वरूप होती है I

 

इसलिए, आकाशास्त्र के प्रयोग से …

जीवों के भीतर के आकाश का घट स्वरूप टूट कर, महाकाश में विलीन होता है I

 

और जब ऐसा होता है, तब …

  • जीवों का अहम् भाव भी पूर्ण विशुद्ध ही होकर, अहमाकाश रूपी ब्रह्म स्वरूप हो जाता है I

ऐसा आकाशास्त्र का धारक योगी, अघोर ब्रह्म का होकर ही शेष रह जाता है I

ऐसा योगी, माँ गायत्री के नीले मुख का होकर, विशुद्ध अहमकाश स्वरूप रहता है I

 

  • जीवों की बुद्धि निश्कलंक होती है, जिसके पश्चात वो बुद्धि ही ब्रह्म के ज्ञानाकाश स्वरूप में प्रतिष्ठित होती है I

ऐसा योगी सद्योजात ब्रह्म का होकर ही शेष रह जाता है I

वो योगी, माँ गायत्री का हेमा मुख होकर, निष्कलंक ज्ञानकाश स्वरूप में रहता है I

 

  • जीवों का मन स्थिर होता है, और ब्रह्म के मनाकाश स्वरूप में विलीन होकर, ब्रह्म सा ही हो जाता है I

ऐसा योगी वामदेव ब्रह्म का होकर ही शेष रह जाता है I

वो योगी, माँ गायत्री का धवला मुख होकर, सर्वसम मनाकाश स्वरूप में रहता है I

 

  • जीवों का चित्त संस्कार रहित होता है और रजोगुण से युक्त चिदाकाश सरीका ही हो जाता है I

ऐसा योगी तत्पुरुष ब्रह्म का होकर ही शेष रह जाता है I

वो योगी, माँ गायत्री का रक्ता मुख होकर, संस्कारातीत चिदाकाश स्वरूप में रहता है I

 

और जब ऊपर बताए गए सभी बिंदुओं की दशाएं प्राप्त हो जाती हैं, तब …

  • जीवों के प्राण ही ब्रह्मशक्ति में विलीन होके, ब्रह्मशक्ति सरीके हो जाता है I और ऐसी दशा में, वो पूर्व के प्राण ही ब्रह्मशक्ति कहलाते हैं I

ऐसा योगी निर्गुण ब्रह्म और सार्वभौम ब्रह्मशक्ति का होकर ही शेष रह जाता है I

वो योगातीत ही माँ गायत्री का मुक्ता मुख, सर्वाधार सर्व सर्वातीत हैसर्वाकाश है I

और जहाँ वो ब्रह्मशक्ति भी उन निरंग स्फटिक के समान ईशान ब्रह्म का ही सर्वशक्तिमय स्वरूप ही होती हैं I

इनही बताए हुए कुछ कारणों से यह आकाश आयाम की सिद्धि एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, जिसको इस ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में उतने योगी भी नहीं पाए हैं, कि उनकी गणना मेरे दोनों हस्त की दस उँगलियों पर ही पूर्णरूपेण हो सके I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी मार्ग से वो साधक जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों को आकाश आयाम से ही पाता है, और इस जीव जगत का तारक कहलाता है I

जो स्वयं ही जीवातीत और जगतातीत नहीं, वो तारक कैसे हो सकता है? I

यदि आकाशास्त्र का धारक योगी, जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का भी धारक होगा, तो ऐसा योगी या तो ब्राह्मण क्षत्रिय होगा और या क्षत्रिय ब्राह्मण होगा… वो वर्णाश्रम के और किसी भी भाग का हो ही नहीं सकता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

आकाश महाभूत ईशान ब्रह्म का होता हुआ भी, इस आकाश का प्रथम साक्षात्कार अघोर में ही होता है I

ऐसा होने का कारण है, कि जो साधक ब्रह्म रचना ही होकर और ब्रह्म की रचना में ही बसकर, आकाश का साक्षात्कार करेगा, तब उस आकाश का प्रथम साक्षात्कार अघोर ब्रह्म में ही होगा I

लेकिन इस प्रथम साक्षात्कार के पश्चात, पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा मार्ग में, आकाश महाभूत का साक्षात्कार तो किसी भी ब्रह्म से हो सकता है I

और क्यूंकि ऐसा साधक जान जाता है, कि आकाश आयाम के गंतव्य के धारक तो ईशान ब्रह्म ही हैं, इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि जो ईशान ब्रह्म हैं, वो इस प्रदक्षिणा के अंतिम पड़ाव होते हुए भी, उनका कोई पड़ाव नहीं होता I

अनंत का कोई पड़ाव हो ही नहीं सकता है I

 

अनंत की कोई एक या अनेक पड़ाव कैसे हो सकते हैं?,  क्यूंकि वो तो आकाश वाद (अर्थात भूतवाद या जगतवाद) से ही अतीत है, अर्थात आकाशातीत (अर्थात भूततीत, जगतातीत) ही है I

 

अब अगले और इस ग्रंथ में बताए जाने वाले अंतिम आयाम पर जाता हूँ, जो काल का आयाम है I

 

  • पञ्च मुखी गायत्री पञ्चब्रह्म सिद्धांत, पञ्च मुखा गायत्री पञ्चब्रह्म सिद्धांत, ब्रह्म पञ्च मुखी गायत्री सिद्धांत, पञ्च मुखा गायत्री ब्रह्म सिद्धांत, … ब्रह्म गायत्री सिद्धांत, गायत्री ब्रह्म सिद्धांत, … काल आयाम का जीवधर सिद्धि स्वरूप, काल आयाम का जगतधर सिद्धि स्वरूप, काल आयाम का जीवधर स्वरूप, काल आयाम का जगतधर स्वरूप, … काल का जीवधर स्वरूप, काल का जगतधर स्वरूप, … काल आयाम का जीवातीत सिद्धि स्वरूप, काल आयाम का जगतातीत सिद्धि स्वरूप, काल आयाम का जीवातीत स्वरूप, काल आयाम का जगतातीत स्वरूप, काल का जीवातीत स्वरूप, काल का जगतातीत स्वरूप,… कालातीत सिद्धि, कालातीत अवस्था, … काल का अस्त्र स्वरूप, काल का मारक स्वरूप, काल आयाम का अस्त्र स्वरूप, काल आयाम का मारक स्वरूप, काल आयाम का तारक स्वरूप, काल आयाम का गंतव्य स्वरूप, काल का तारक स्वरूप, काल का गंतव्य स्वरूप, … मूलास्त्र चतुष्टय विज्ञान और आयाम चतुष्टय, गर्भास्त्र, काल का गर्भास्त्र स्वरूप, काल सृष्टि का गर्भ है, काल ब्रह्म रचना का गर्भ है, सबकुछ कालगर्भित है, सबकुछ काल के गर्भ में है, … महाविज्ञान योद्धा, महाज्ञान योद्धा,

इस भाग के प्रारम्भ में ही अब जो बताया जा रहा है, उसपर विशेष ध्यान देना …

आकाश का सीधा सीधा नाता, काल से है I

दशा का सीधा नाता, आकाश से है I

दिशा का सीधा नाता, दशा से है I

ऐसा इसलिए है, क्यूंकि …

कालास्त्र ही गर्भास्त्र है, और आकाशास्त्र ही सर्वास्त्र I

दिशास्त्र ही मार्गास्त्र है, और दशास्त्र ही ब्रह्माण्डास्त्र I 

 

अब अन्तःकरण चतुष्टय विज्ञान के गंतव्य से इन अस्त्रों को बताता हूँ …

कालास्त्र का मूल नाता, ज्ञान ब्रह्म से हैऋग्वेद से है I

आकाशास्त्र का मूल नाता, अहम् ब्रह्म से हैयजुर्वेद से है I

दिशास्त्र का मूल नाता, चेतन ब्रह्म से हैअथर्ववेद से है I

दशास्त्र का मूल नाता, मन ब्रह्म से हैसामवेद से है I

 

इसलिए, …

कालास्त्र का मूल नाता, प्रज्ञानं ब्रह्म से हैसद्योजात ब्रह्म से है I

आकाशास्त्र का मूल नाता, अहम् ब्रह्मास्मि से हैअघोर ब्रह्म से है I

दिशास्त्र का मूल नाता, अयमात्मा ब्रह्म से हैतत्पुरुष ब्रह्म से है I

दशास्त्र का मूल नाता, तत् त्वम् असि से हैवामदेव ब्रह्म से है I

 

अब और कुछ बिंदु, …

जब दिशा विकृत होती है, तब दशा भी विकृत हुए बिना नहीं रह पाती I

जब दशा विकृत होती है, तो आकाश अपने ऊर्जात्मक स्वरूप में प्राप्त नहीं होता I

जब आकाश ऊर्जाएं विकृत होती हैं, तब काल ही परिवर्तन का कारण बनता है I

इसीलिए, सब विकृतियों के मूल में दिशा आयाम ही है I

 

कुछ और बिंदु …

आकाश में ही दिशा, दशा आदि सबकुछ बसा हुआ है आकाश, काल के गर्भ में है I

दिशा, दशा आदि सबकुछ आकाशधीन है और आकाश ही कालाधीन है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

आज के समय यह विश्व, विकृति की उसी अवस्था में पहुँच गया है, जब काल ही परिवर्तन काकारण और कारक… दोनों ही बनेगा I

इसीलिए, जो योगी इस विश्व में योगेश्वर (अर्थात कार्य ब्रह्म या महेश्वर) के लोक से लौटाया गया है, और जो इस कलियुग के स्तम्भित होने पर, उस आगामी गुरु युग की वो सूक्ष्म लेकिन प्रबल आधारशिला डालेगा, वो …

ऋग्वेदीय, श्री जगन्नाथ पुरी के क्षेत्र में ही जन्म लिया होगा I

अथर्ववेदीय, श्री बदरीनाथ क्षेत्र में रहकर ही, दिशा (मार्ग) रूपी आधारशिला डालेगा I

सामवेदीय, श्री द्वारिकाधीश के क्षेत्र में ही मन से बसकर, दशा परिवर्तन करेगा I

यजुर्वेदीय, श्री रामेश्वरम क्षेत्र में अहम् को सूक्ष्म रूप में व्यापक करके, कार्य करेगा I

यही कारण है, कि वो कार्य करने हेतु, वाममार्गी ही होगा I

और ऐसा तब भी होगा, जब उसके द्वारा विश्व स्थापित और लोक ख्यापित गुरु युग का उत्कर्ष मार्ग, दक्षिण मार्गी ही रहेगा I

 

और अपने उस जन्म के अनुसार, वो महेश्वर का योगी, अर्थात कार्य ब्रह्म से लौटाया गया गुरु युग का संस्थापक योगी, उसके अपने …

मूल से प्रज्ञानमय, हिरण्यगर्भ ब्रह्म का होगा I

मार्ग (दिशा) से रजोगुणमय, सृष्टिकर्ता ब्रह्म का होगा I

दशा से सत्त्वगुणमय, सर्वसम चतुर्मुखा प्रजापति का होगा I

व्यापकता या सर्वस्व से तमोगुणमय, विश्वरूप ब्रह्म का होगा I

और ऐसा होने के कारण, अपने आत्मस्वरूप में वह पूर्ण ब्रह्मत्व ही होगा I

 

अब इस भाग के बिन्दुओं में आगे बढ़ता हूँ …

काल के चक्र स्वरूप का स्वयं प्रादुर्भाव, हिरण्यगर्भ ब्रह्म से हुआ था I और जहां वो हिरण्यगर्भ ब्रह्म भी, इसी काल के सनातन अखण्ड स्वरूप के भीतर ही स्वयं प्रादुर्भाव होकर, बसे हुए थे I

इसलिए, काल आयाम का गंतव्य (अर्थात सनातन-काल) ही हिरण्यगर्भ का निवास स्थान है, और हिरण्यगर्भ से ही काल के चक्र स्वरूप का प्रादुर्भाव हुआ था I

काल के इसी चक्र स्वरूप के भीतर, अब तक बताए गए समस्त आयाम सहित, समस्त जीव जगत बसाया गया था I इसलिए काल ही ब्रह्म रचना का गर्भ है, और इसी गर्भ में ब्रह्म ने अपनी रचना को बसाया है I

 

यही कारण है, कि …

जो भी ब्रह्म की रचना में है, वो सबकुछ कालगर्भित ही है I

 

काल के चक्र स्वरूप की दिव्यता को ही त्रिकाली शक्ति कहा जाता है, जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की ही सुपुत्री स्वरूपा, अर्थात बालिका शक्ति स्वरूप हैं I

इसलिए काल चक्र के शक्ति चक्र स्वरूप को ही… माँ त्रिकाली कहते हैं I

सब कुछ काल गर्भित है, और उस काल गर्भित जीव जगत को जो शक्ति चलायमान रखती हैं, वही हिरण्यगर्भ सुपुत्री स्वरूपा माँ त्रिकाली हैं, जो तीनों कालों में समान रूप में बासी होने पर भी, स्वयं ही परिवर्तनशील रहती हैं I

काल शक्ति, हिरण्यगर्भ सुपुत्री स्वरूपा त्रिकाली के परिवर्तनशील स्वरूप के कारण ही, इस जीव जगत के स्वरूप में जो भी है, जहाँ भी है, जब भी है और जैसा भी है… वो सब परिवर्तनशील ही रहता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

माँ त्रिकाली जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म से स्वयं उत्पन्न हुए कालचक्र की दिव्यता और शक्ति हैं, वो ऐसा ही हैं …

  • माँ त्रिकाली दसों दिशाओं में व्याप्त हिरण्यगर्भ की कालचक्र स्वरूप शक्ति ही हैं I इसलिए इनको दस हाथ वाली देवी भी कहा जा सकता है, क्यूंकि दस दिशाएं ही इनके दस हाथ हैं I
  • माँ त्रिकाली द्वैतवाद में बसे हुए जीव जगत की दिव्यता और शक्ति भी हैं, इसलिए उनके दस हाथों के अनुसार, उनके चरण (पैर) भी हैं I और ऐसा होने पर भी, माँ त्रिकाली का मुख एक ही है, इसलिए अपने गंतव्य में, वो अद्वैत ब्रह्म ही हैं I और इसके साथ साथ, अपने शरीरी रूप में भी वो एक ही हैं, इसलिए मार्ग के अनुसार भी, वो अद्वैत मार्ग को ही दर्शाती हैं, जो उनके ही गंतव्य स्वरूप में, दिशातीत ब्रह्म कहलाया जाता है I
  • क्यूंकि काल चक्र के गर्भ में ही समस्त जीव जगत बसा हुआ है, और क्यूंकि माँ त्रिकाली ही उस काल के चक्र स्वरूप की दिव्यता और शक्ति हैं, इसलिए माँ त्रिकाली की व्याप्ति भी इस सदैव परिवर्तनशील जीव जगत में, समान रूप से और समान रूप में भी है I और ऐसा होने के कारण, माँ त्रिकाली का वास्तविक स्वरूप भी उसी विशालकाय, सर्वदिशा व्यापक, सर्वव्याप्त, अनंत और सनातन ब्रह्म को दर्शाता है, जो इन आयाम चतुष्टय के गंतव्य ही हैं I
  • अपनी दशाओं और मार्गों में वो माँ त्रिकाली अनेक हैं I इसलिए उनके भीतर बसे हुए समस्त मार्ग और दशाएँ बहुवादी ही हैं I और ऐसा होने पर भी, क्यूंकि वो एक ही हैं, इसलिए वो अपने गंतव्य में अद्वैत ही हैं I

 

यही कारण है, कि माँ त्रिकाली …

ब्रह्म्रचना के भागों के तारतम्य में होकर भीदशातीत ही हैं I

रचना की गर्भ शक्ति का तारतम्य स्वरूप होकर भीगर्भातीत ही हैं I

ब्रह्म्रचना और उसका गर्भ होकर भी, वास्तव में रचनातीत ही हैं I

ऐसी होने पर भी, रचना के स्वरूप में वो माँ त्रिकाली अनेक ही हैं I

अनेक रचना स्वरूपों में होने के कारण, उनके मार्ग बहुवादी ही हैं I

इसलिए, दशा मार्गादि में वो बहुवादी हैंऔर गंतव्य में वो अद्वैत ही हैं I

इसी बहुवादी अद्वैत के मूलबिंदु पर ही वैदिक आर्य धर्म को बसाया गया था I

इसलिए, वैदिक मार्ग के मूल में बहुवादी अद्वैत कालशक्ति, माँ त्रिकाली ही हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जीव जगत की गर्भ शक्ति होने के कारण, माँ त्रिकाली ही इस सदैव परिवर्तनशील जीव जगत की कारक और धारक हैं I

वैदिक वाङ्मय में जो मूल शक्ति, ब्रह्मशक्ति, आत्मशक्ति आदि शब्द आए हैं, उन सभी का नाता इनही माँ त्रिकाली से है I

माँ त्रिकाली हिरण्यगर्भ ब्रह्म की पुत्री और उन त्रिकाल भगवान् की दिव्यता हैं, जिनके गर्भ में समस्त जीव जगत बसाया गया है… उन्हीं की शक्ति (दिव्यता) हैं I इसके कारण वो माँ त्रिकाली इस जीव जगत की गर्भ शक्ति ही हैं I

इनही त्रिकाली के कालचक्र रूपी गर्भ शक्ति के अस्त्र स्वरूप को कालास्त्र कहा जाता है I

और क्यूँकि काल का गंतव्य वो सनातन ब्रह्म ही हैं, जिनके भीतर ही काल का चक्र स्वरूप बसा होता है, और इसी सनातन काल के भीतर ही वो कालचक्र चलायमान भी होता है, इसलिए काल अपने चक्र रूपी तारतम्य में होता हुआ भी, वास्तव में उसी काल के अखंड सनातन तत्त्व को ही दर्शाता है I और जहाँ काल का वो अखंड सनातन स्वरूप ही ब्रह्म कहलाता है I

 

इसलिए, …

माँ त्रिकाली तारतम्य स्वरूप में होती हुई भी, अखंड सनातन ही हैं I

 

और क्यूंकि समस्त वैदिक वाङ्मय इनही माँ त्रिकाली में पूर्णरूपेण बसाया गया था, इसलिए …

सनातन वैदिक आर्य धर्म बहुवादी प्रतीत होता हुआ भी, अद्वैत मार्ग ही है I

 

क्यूंकि बहुवाद प्रकृति का अंग होता है और अद्वैत सनातन ब्रह्म का, इसलिए …

वैदिक आर्य धर्म ही एकमात्र मार्ग है, जो प्रकृति और ब्रह्म, दोनों का ही है I

 

और इसीलिए, समस्त ब्रह्म रचना में, केवल वैदिक मार्ग ही ऐसा है जिसमें …

प्रकृति के तारतम्य का आलम्बन लेकर भी, अद्वैत ब्रह्म को प्राप्त हुआ जाता है I

 

और ऐसा होने का भी वही कारण है, जिसका पूर्व में संकेत दिया गया था, कि …

काल का चक्र स्वरूप ही मूल प्रकृति है, दुर्गा पराम्बा त्रिपुरसुन्दरी है I

उसी काल का गंतव्य स्वरूप सनातन है, जो अज अनादि सनातन ब्रह्म ही है I

 

और वेदमार्ग में, इन दोनों में तारतम्य दिखाई देता हुआ भी, वास्तव में यह दोनों एक ही हैं I इसीलिए वेद मनीषी कह गए थे कि …

प्रकृति ब्रह्म है और ब्रह्म प्रकृति ही है I

यह वाक्य प्रकृति की गंतव्य अवस्था को दर्शाता है I

 

लेकिन प्रकृति के समस्त स्वरूपों को जानकर , वेद मनीषी यह सब भी कहे थे, …

प्रकृति अपने तारतम्य रहित, मूल प्रकृति स्वरूप में, ब्रह्मशक्ति ही है I

प्रकृति अपने गंतव्य मार्गी स्वरूप में, ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म का योग ही हैइसीलिए प्रकृति ब्रह्मपथ भी है I

पर प्रकृति ब्रह्मशक्ति और ब्रह्मपथ होती हुई भी, अपने जीव जगत रूपी तारतम्य मेंन ब्रह्मपथ है और न ही ब्रह्म कही जा सकती है I

पर ब्रह्मपथ, प्रकृति के तार्तम्यमय स्वरूप से होकर ही जाता है, इसलिए जीव जगत स्वरूप में प्रकृति, तारतम्य में होती हुई भी ठुकराई नहीं जा सकती I

जो समान रूप से मूल प्रकृति और ब्रह्म का नहीं, वो ब्रह्मपथ भी नहीं I

 

ऊपर बताए गए कुछ ही वाक्यों का यदि ज्ञान मार्ग से अध्यन किया जाएगा, तो इनही वाक्यों में जो कुछ भी वेद मनीषियों ने स्पष्ट या सांकेतिक रूप में प्रकृति के बारे में कभी भी बताया होगा, वो सबकुछ स्पष्ट या सांकेतिक रूप से जाना जा पाएगा I

और उस ज्ञानमय अध्यन में, साधक यह भी जान जाएगा, कि प्रकृति बहुवाद की कारक है और ब्रह्म अद्वैतवाद का, जिसके कारण वैदिक धर्म जो इन दोनों में ही समान रूप में बसा हुआ है, वो बहुवादी अद्वैत ही है… अर्थात …

वैदिक धर्म मार्गों से बहुवादी होता हुआ भी, गंतव्य से अद्वैत ही है I

 

और काल आयाम के दृष्टिकोण से, इन दोनों में …

बहुवाद कालचक्र है, जो प्रकृति के जगत स्वरूप को दर्शाता है I

और अद्वैत, काल का गंतव्य है, जो अजन्मा अखंड सनातन ब्रह्म ही है I

और काल और कालचक्र का योग, उस पूर्ण का द्योतक है, जो ब्रह्म कहलाता है I

 

और इसके अतिरिक्त, …

काल अपने चक्र स्वरूप में, मूल ऊर्जा, मूल प्रकृति, माँ दुर्गा ही है I

काल अपने चक्रातीत स्वरूप में, अखंड अनादि सनातन ब्रह्म ही है I

और इसके अतिरिक्त, …

काल के चक्रातीत और कालचक्र स्वरूपों का योग, अभिव्यक्ता ब्रह्म और उनकी अभिव्यक्ति ब्रह्मशक्ति (या प्रकृति) की सनातन योगावस्था का द्योतक ही है I

इस सनातन योग से ही ब्रह्म पूर्ण कहलाए थे, क्यूँकि ब्रह्म सर्वसाक्षी सर्वातीत होते हुए भी, अपनी प्रकृति नामक अभिव्यक्ति से, जीव जगत हुए थे I

इसलिए, सृष्टि के गर्भ आयाम, काल के दृष्टिकोण से, ब्रह्म जीव जगत अर्थात ब्रह्माण्ड भी हैं, और ब्रह्माण्डातीत भी वही ब्रह्म हैं I

जो जीव जगत सहित, जीवातीत जगतातीत भी है, वही तो पूर्ण हो सकता है I

इसलिए, …

यदि उन ब्रह्माण्डातीत ब्रह्म को जानना है, तो जीव जगत होकर ही जाना जाएगा I

जीव जगत में बसकर, जीव जगत ही होकर, ब्रह्म का साक्षात्कार होता है I

आत्ममार्ग का पहला बिंदु देवत्व होता है, और इसके पश्चात, जीवत्व, जगतत्व, बुद्धत्व और अंततः वो ब्रह्मत्व ही होगा, जो पूर्ण ब्रह्म ही है I

इस आत्ममार्ग को सुरक्षित रखने हेतु, उन अद्वैत ब्रह्म ने स्वयं को ही जीव जगत के स्वरूप में अभिव्यक्ता किया था I

जब ब्रह्म का पूर्ण साक्षात्कार होगा, तब वो ब्रह्म, प्रकृति सहित जीव जगत भी होंगे और जगतातीत सर्वातीत भीऐसा ही साधक का आत्मस्वरूप भी होगा I

और ऐसे साक्षात्कार में, उन ब्रह्म का जीव जगत स्वरूप, आयाम चायुष्टय के चक्र स्वरूप का होगा, और उन ब्रह्म का गंतव्य स्वरूप, आयाम गंतव्य, चक्रातीत होगा I

आयाम चतुष्टय के दृष्टिकोण से, इनही वाक्यों में संपूर्ण ब्रह्मपथ है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

काल आयाम का जीव जगत स्वरूप ही काल चक्र कहलाता है, जिसके भीतर कालखण्डों का तारतम्य होता है, और इसीलिए काल का ऐसा स्वरूप, उसी जीव जगत की सदैव परिवर्तनशील अवस्था को भी दर्शाता है I

इसी के अनुसार कालखण्डों का प्रादुर्भाव होता है, और वो काल चक्र रूपी जीव जगत और उसकी ऊर्जावन शक्ति, अर्थात प्रकृति, उसी जगत के तारतम्य में जाकर, जगत सहित समस्त जीवों के भीतर भी, सदैव परिवर्तनशील ही रहती हैं I

काल की इस सदैव चलित और परिवर्तनशील दशा के कारण, काल की अभी की दशा, एक क्षण पूर्व के कालखंड में नहीं थी I

और इसी काल चक्र के अनुसार ही, सबकुछ जो इसी काल आयाम के अंतर्गत ही आता है, वो सदैव ही परिवर्तनशील रहता है I

ब्रह्म की रचना में, समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकर आदि बिंदु भी उसी काल आयाम के गर्भ में ही बसाए गए थे I

लेकिन ऐसा होने पर भी कॉल अपने वास्तव स्वरूप में, वो अनादि  अजन्मा अखंड सनातन ही है, जो ब्रह्म कहलाया जाता है I

इसलिए जो साधक इस काल आयाम का सिद्ध होता है, वो अपनी आत्मस्थिति में, प्रकृति भी है और ब्रह्म भी, अर्थात वो साधक की आत्मस्थिति ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म दोनों में ही समान रूप में बसी हुई होती है I

इस से साधक काल चक्र का ज्ञान पाता है, जिसके पश्चात, वो साधक काल आयाम के चक्र स्वरूप से जीवधर और जगतधर सिद्धि के काल आयाम नामक अंश को प्रकृति स्वरूप में, अर्थात आत्मशक्ति के, त्रिकाल व्याप्त ब्रह्मशक्ति स्वरूप में ही पा जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और इसी काल आयाम के चक्र स्वरूप के तारतम्य को जानकार, वो साधक इसी काल आयाम के गंतव्य, अर्थात काल के ही अखण्ड सनातन स्वरूप का साक्षात्कार करता है, और जहाँ वो गंतव्य स्वरूप सर्वकालात्मक, अखंड सनातन ब्रह्म ही है I

इस साक्षात्कार से वो साधक की चेतना उन्ही कालात्मक ब्रह्म में, जो काल आयाम के गंतव्य स्वरूप में होते हैं, उनमें ही स्थित हो जाती है I

इस साक्षात्कार के पश्चात, वही साधक जो पूर्व में जीवधर और जगतधर सिद्धियों का धारक था, वो कालचक्र से ही अतीत होकर, काल आयाम के अंतर्गत आती हुई जीवातीत सिद्धि और जगतातीत सिद्धि का भी धारक हो जाता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और काल आयाम के अंतर्गत आती इनही जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों से वो साधक, अपने ही आत्मस्वरूप को अखंड सनातन साक्षात्कार करता है, जिसके पश्चात वही साधक, सर्व सिद्धितीत सरीका ही हो जाता है I

जिस भी साधक ने काल के गंतव्य को पाया होगा, वो कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन सिद्धितीत होता ही है I

और यही सिद्धितीत दशा तब भी आती है, जब कोई सिद्ध साधक ऋग्वेद के महावाक्य का साक्षात्कार करेगा, या ऋग्वेद की पूर्वी आम्नाय पीठ के मूल दिव्यता में जाएगा और निवास करेगा, या ऋग्वेद के जगन्नाथ पुरी धाम में ही जाएगा I

कोई सिद्ध हुआ ही नहीं, जो कभी बाद में ऋग्वेद के मूल से सम्बंधित हुआ था और सिद्धितीत अवस्था को नहीं पाया था I

इसीलिए उन पुरातन कालों में, जो मेरे पूर्व जन्मों के थे, वेद मनीषि ऋग्वेद के किसी भी प्रधान या मूल बिन्दुओं में तभी जाया करते थे, जब उनको सिद्धितीत ब्रह्म को पाना होता है, अर्थात कैवल्य मुक्ति को जाना होता था I

इसका कारण भी यही है, कि ऋग्वेद के प्रधान या मूल बिन्दुओं में जाकर ही कोई सिद्ध, सिद्धितीत हो पाता है I यह भी वो कारण है, की ऋग्वेदी मंत्र अन्य वेदों में भी पाए जाते हैं I

और यहाँ बताया जा रहा काल आयाम, ऋग्वेद का मूल बिंदु ही है I

पर इस भाग तक बताए गए मार्ग से ब्रह्म की परिपूर्णता नहीं जानी जाती है, बस उन निर्गुण ब्रह्म की सिद्धितीत प्रज्ञानमय दशा का साक्षात्कार होता है I

तो अब मैं ब्रह्म की इस पूर्ण दशा के साक्षात्कार का एक प्रमुख बिंदु बताता हूँ I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन इस सिद्धितीत दशा में जाकर, वो साधक यदि चाहे, तो कुछ समय पश्चात पुनः अपनी पूर्व की सिद्धियों को पा भी सकता है I

और जब यह सिद्धियां पुनः पाई जाती हैं, तब ही वो साधक ब्रह्म को परिपूर्ण रूप में जान पाता है I

 

ऐसे पूर्ण रूप में जानने का कारण है, कि …

वो साधक सिद्धतीत होता हुआ भी, सिद्ध हो जाता है I

सिद्धितीत दशा निर्गुण ब्रह्म की और सिद्ध की दशा ब्रह्मशक्ति की वाचक है I

इसलिए जब वो सिद्धितीत साधक अपनी सिद्धियों को पुनः पाएगा, तो वही साधक उन सर्व अभिव्यक्ता ब्रह्म और उन ब्रह्म की पूर्ण अभिव्यक्ति प्रकृति रूपी ब्रह्मशक्ति की योगावस्था को अपने शरीर के भीतर, अपने ही आत्मस्वरूप में ही पा जाएगा I

 

इसलिए, जब योगी …

सिद्धितीत के पश्चात, पुनः सिद्ध होगा, तभी वो ब्रह्म को पूर्णरूपेण जान पाएगा I

 

और ऐसे जानने में, …

सिद्धियों में ब्रह्मशक्ति (प्रकृति) और सिद्धितीत में निर्गुण ब्रह्म होंगे I

और योगी के आत्मस्वरूप में ही ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म की योगावस्था होगी I

और जब ऐसा होगा, तभी योगी उन …

ब्रह्म को उनके अभिव्यक्ता और अभिव्यक्ति दोनों स्वरूप में जानेगा I

और यही ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान भी होगा I

 

और जिस योगी ने, उन ब्रह्म को उन्ही ब्रह्म के …

अभिव्यक्ता और अभिव्यक्ति, दोनों स्वरूपों में जाना है, वही ज्ञाता है I

ब्रह्म को पूर्ण जानने पर भी, उन ब्रह्म को शब्दादि में दर्शाया नहीं जा सकता I

इसलिए, आयाम चतुष्टय के अंतर्गत आते हुए साक्षात्कारों में, …

ब्रह्म को पूर्णरूपेण जान सकते हो, पर शब्दों में बताना असम्भव होगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

यह ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति की अद्वैत योगावस्था, जिससे ब्रह्म को पूर्णरूपेण जाना जा सकता है, उसका मार्ग भी शिव तारक मंत्र (राम नाद) से ही जाएगी, जिसका मुख्य स्थान काशी ही है I

और जब साधक ब्रह्म को पूर्णरूपेण जानने का पात्र बनेगा, तब वो काशी भी साधक के नैन कमल (अर्थात आज्ञा चक्र) में ही स्वयं प्रतिष्ठित हो जाएगी I

क्यूंकि यह ऋग्वेद की सिद्धि है, इसलिए पूर्वी आम्नाय (अर्थात गोवर्धन मठ, पूरी) का क्षेत्र भी काशी तक माना जाना चाहिए I

और क्यूंकि ब्रह्म प्रदक्षिणा मार्ग में, तत्पुरुष से सद्योजात के मार्ग में ही पञ्च मुखी सदाशिव का साक्षात्कार होता है, जिनका मुख्य स्थान नेपाल में भगवान पशुपतिनाथ मंदिर ही है, इसलिए ऋग्वेद से संबद्ध आम्नाय पीठ का क्षेत्र नेपाल के भगवान् पशुपतिनाथ मंदिर परिसर तब भी माना जाना चाहिए I

वैसे भी पञ्च मुखा सदाशिव के पूर्ण साक्षात्कार और प्रदक्षिणा का मार्ग राम नाद (अर्थात शिव तरक मंत्र) के सिवा कोई और है भी तो नहीं I

इसलिए जिस पीठ के क्षेत्र में काशी है, उसी पीठ के क्षेत्र में नेपाल के भगवान् पशुपतिनाथ भी हैं ही I इसलिए काशी सहित, पशुपतिनाथ मंदिर, ऋग्वेदीय गोवर्धनमठ की सीमा में ही है I

सुनने में थोड़ा विचित्र लगेगा, लेकिन मेरे आंतरिक मार्ग में तो ऐसा ही था I

 

आगे बढ़ता हूँ …

लेकिन जो साधक सिद्धितीत होकर भी, सिद्ध नहीं होना चाहता, तो इसी दशा में वो निर्गुण ब्रह्म में विलीन होकर, निर्गुण ही होकर निवास करने लगता है I

लेकिन यदि ऐसा साधक पुनः कायाधारी किया जाएगा (अर्थात ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं द्वारा) किसी काया में लौटाया जाएगा, तो उसके कायाधारी होने के पश्चात, उसके शरीर के भीतर योगेश्वर भी प्रतिष्ठित हो सकते हैं I लेकिन ऐसे योगी, अतिदुर्लभ ही होते हैं I

 

आगे बढ़ता हूँ …

साधना मार्ग में, जब काल को …

  • अपनी काया से बाहर की ओर देखा जाएगा, तो वो काल उसके चक्र स्वरूप में, अर्थात प्रकृति नामक ब्रह्मशक्ति स्वरूप में ही साक्षात्कार होगा और जहाँ वो ब्रह्मशक्ति भी साधक की आत्मशक्ति ही होंगी I
  • अपनी काया के भीतर देखा जाएगा, तो वो काल उसके अनादि अजन्मे अखंड सनातन स्वरूप में, उस साधक की आत्मा ही कहलाएगा I

 

आगे बढ़ता हूँ …

इन दोनों साक्षात्कारों से वो साधक जो पाएगा, वो अब बताता हूँ …

  • काल के चक्र स्वरूप का सिद्ध, माँ मूल प्रकृति का ही जीव रूपी (अर्थात जीवित) कालास्त्र हो जाता है I

ऐसे कालास्त्र स्वरूप जीव को मूल प्रकृति युग परिवर्तन, युग स्तंभन आदि कालखंडों में जन्म भी दिलवाती हैं I

और ऐसे साधक का जन्म या तो परकाया प्रवेश से होता है और या सीधा सीधा वो साधक सूक्ष्म आदि लोकों से, स्थूल शरीरी रूप में प्रकट हो जाता है I

यदि कार्य का समय लम्बा हुआ, तो वो साधक परकाया प्रवेश से लौटाया जाएगा I और यदि उस कार्य का समय छोटा सा ही हुआ, तो वो साधक यहाँ बताई गई दूसरी प्रक्रिया से ही लौटाया जाएगा I

  • और इसी काल के अखंड सनातन स्वरूप का सिद्ध, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में कालात्मा कहलाता है I

ऐसे कालात्मा को भी माँ प्रकृति समय समय पर किसी न किसी लोकादि में लौटाती हैं, जीवों का उद्धार करने हेतु I

और जहाँ कालात्मा का जन्म भी अयोनि प्रक्रिया से ही होता है I

  • और वो अतिविरला योगी, जो ऊपर बताई गई दोनों दशाओं का ही सिद्ध हो गया, वो ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं में त्रिकाल स्वरूप कहलाता है I

उन्ही महाकाल के अखंड सनातन स्वरूप में हिरण्यगर्भ ब्रह्म का स्वयं उदय हुआ था I और इसके पश्चात ही वो हिरण्यगर्भ, रजोगुणी होकर कार्य ब्रह्म या सृष्टिकर्ता हुए थे I

और उन्ही महाकाल के चक्र स्वरूप में, उन हिरण्यगर्भ की पुत्री रूप में, उनकी काल शक्ति, महाकाली का स्वयं प्रादुर्भाव, उन हिरण्यगर्भ ब्रह्म से ही हुआ था I

और इसके पश्चात, वही माँ त्रिकाली इस जीव जगत की मुलात्मक शक्ति, मुलात्मक दिव्यता, गर्भात्मक शक्ति, गर्भात्मक दिव्यता और कालास्त्र रूपी गर्भास्त्र भी कहलाई थी I

उन्ही माँ महाकाली के दस हाथ वाले स्वरूप को इस अध्याय में माँ त्रिकाली कहा गया है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

अब ऊपर बताई गई दोनों सिद्धियों के धारक साधक के बारे में बताता हूँ I

जब काल को अपनी काया से बहार ओर साक्षात्कार किया जाएगा, वो वो काल अपने काल चक्र स्वरूप में ही साक्षात्कार होगा I और जहाँ वो कालचक्र साधक के आत्मशक्ति स्वरूप में ही विश्वव्यापक शक्ति होकर, विश्व सहित ब्रह्मशक्ति भी होगा I

और जब काल को अपनी काया के भीतर साक्षात्कार किया जाएगा, तो वो काल साधक का ही अखण्ड सनातन आत्मस्वरूप होगा I

काल आयाम का पूर्ण सिद्ध, काल आयाम के प्रकृति (या चक्र या शक्ति या देवी) और गंतव्य (या आत्मा या ब्रह्म), दोनों ही स्वरूपों में समान रूप में बसा होता है I

गंतव्य स्वरूप में वो साधक, चक्रातीत अखंड सनातन काल को अपने कैवल्य मोक्ष स्वरूप में पाता है, और ऐसी दशा में, वो सनातन अखंड काल ही उस साधक का आत्मस्वरूप कहलाता है I

और उसी काल के चक्र स्वरूप में यही काल आयाम, उस साधक की आत्मशक्ति रूप में, मुक्तिमार्ग और सार्वभौम अस्त्र भी होता है, जो कालास्त्र कहलाता है I

 

तो अब इन दोनों स्वरूपों के मुख्य बिंदु को बतलाता हूँ …

 

कालचक्र सिद्धि का अस्त्र स्वरूप, कालचक्र सिद्धि का मारक स्वरूप, कालचक्र सिद्धि का प्रतिवर्तन कारक स्वरूप, कालचक्र का अस्त्र स्वरूप, कालचक्र का मारक स्वरूप, कालचक्र का प्रतिवर्तन कारक स्वरूप, काल का अस्त्र स्वरूप, काल का मारक स्वरूप, काल का प्रतिवर्तन कारक स्वरूप… जब वो साधक स्वयं को कालचक्र के भीतर रखेगा, तो वो साधक उसी काल आयाम के शक्ति चक्र स्वरूप में ही बसकर, उसी काल आयाम को अपने शस्त्र स्वरूप के देखेगा I

और कालचक्र का मुक्तिमार्ग शस्त्र स्वरूप को वो साधक कालास्त्र कहेगा… जो एक सार्भौम अस्त्र स्वरूप में ही होगा… और जिसका प्रयोग वो साधक करेंगे तो उसकी अपनी काया के भीतर, लेकिन उसका प्रभाव समस्त जीव जगत में ही दिखाई देगा I

जो योगी स्वयं ही मूल प्रकृति के कालास्त्र रूपी ब्रह्मशक्ति स्वरूप का धारक नहीं, तो वो योगी समस्त प्रकृति और प्रकृति के समस्त परिकरों को ही अपने अस्त्र स्वरूप में कैसे पाएगा? I

और यदि वो योगी ऐसा ही नहीं होगा, तो वो योगी माँ प्रकृति (या ब्रह्मशक्ति) का योद्धा कैसे कहलाएगा?I

और वास्तव में तो, जो माँ प्रकृति का योद्धा ही नहीं, वो धर्म योद्धा भी नहीं हो सकता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

कालास्त्र सिद्ध योगी, जीव जगत का काल परिवर्तन करने में भी सक्षम होता है और जहाँ वो काल परिवर्तन भी किसी उत्कृष्ट कालखंड की ओर ही होता है I

जब जब वैदिक युग आता है, तब तब इस काल आयाम का सिद्धि योगी लौटाया ही जाएगा, और जहाँ उस योगी से प्रकाशित वैदिक कालखंड भी सूक्ष्म, दैविक आदि जगत से सम्बंधित होता है, अर्थात उस योगी के द्वारा स्थापित कालखण्ड, आत्मा के उस स्वरूप में ही होगी, जो सनातन ब्रह्म है I

ऐसा इसलिए होगा, क्यूंकि काल आयाम की आंतरिक साधनाओं के गंतव्य में, सनातन अखंड ब्रह्म ही होते है, और जो सर्वकालेश्वर और कालातीत दोनों ही होने के कारण, कालात्मा रूपी ब्रह्म को ही दर्शाते हैं I

पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत में, काल आयाम का संबंध सद्योजात ब्रह्म और माँ गायत्री के हेमा मुख से ही है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

जिस योगी ने काल चक्र को ही अस्त्र स्वरूप में पाया है, उसको ही महाविज्ञान योद्धा (अर्थात महाज्ञान योद्धा) कहा जाता है I

और ऐसे योगी का प्रादुर्भाव भी एक महाविज्ञान पद्धति से, काल की प्रेरणा से और काल की दिव्यता माँ त्रिकाली की शक्ति का आलम्बन लेकर ही होता है I

और ऐसे योगी की शक्ति भी प्रकृति और ब्रह्म की योगावस्था के मूल रूप, शून्य ब्रह्म में ही सुरक्षित रहती है, क्यूंकि इसी शून्य ब्रह्म के भीतर ही कालचक्र और उस कालचक्र के समस्त भाग, अपने शक्ति स्वरूप (अर्थात अस्त्र स्वरूप) में चलायमान रहते हैं I

और ऐसा कालचक्र का सिद्ध योगी, इसी शून्य ब्रह्म नामक तत्त्व में बसकर, अपने कालास्त्र के समस्त उप-अस्त्रों के प्रयोग करता है, और वैसा ही काल परिवर्तन लाता है, जैसा उस समय खंड के लिए लाना होता है I

यह काल परिवर्तन तब भी आएगा, जब इसको कोई भी रोकने का प्रयास करेगा, क्यूंकि यह कालास्त्र, आयाम अस्त्र का अंग होने के कारण, इस जीव जगत का मूल अस्त्र चतुष्टय विज्ञान का अभिन्न अंग ही है I

और इसके अतिरिक्त, यही कालास्त्र इस समस्त ब्रह्म रचना का गर्भास्त्र भी है, जिसका सीधा नाता, सृष्टिकर्ता कार्य ब्रह्म से है, जो ईश्वर, महेश्वर, योगेश्वर, योगऋषि, योग सम्राट, योग गुरु, योग और योग तंत्र भी कहलाते हैं… और जो हिरण्यगर्भ ब्रह्म की रजोगुणी अभिव्यक्ति ही हैं I

इसलिए कालास्त्र का धारक योगी, उन महेश्वर का योगी ही होगा I

 

काल का गंतव्य स्वरूप, काल का तारक स्वरूप, काल सिद्धि का गंतव्य स्वरूप, काल सिद्धि का तारक स्वरूप, कालातीत आत्मा, कालात्मा कौन?, काल रूपी आत्मा,

और वही साधक जब इसी काल आयाम के गंतव्य, अर्थात अखंड सनातन ब्रह्म के भीतर स्थित होगा, तो वो जीव जगत का तारक हो जाएगा I

लेकिन इस काल आयाम का सिद्ध, तारक होने से पूर्व मारक होगा ही, क्यूंकि ब्रह्म की समस्त रचना में ऐसा कोई मार्ग है ही नहीं, जिसमें तारक तत्त्व से पूर्व, उस तारक के अनुसार ही मारक तत्त्व नहीं आता I

इसलिए जब युग परिवर्तन (या युग स्थम्भन) आदि प्रक्रियाओं का समय आता है, तब भी तारक तत्त्व से पूर्व, और उस तारक तत्त्व की क्षमता के अनुसार ही, मारक तत्त्व की क्षमता प्रकट होती है I

और ऐसा ही वो योगी भी होता है, जो काल सिद्ध, अर्थात समस्त ब्रह्म रचना के गर्भ का सिद्ध होता है I

 

इसलिए इस काल सिद्धि के मार्ग में..,

  • मारक सिद्धि जीवधर और जगतधर स्वरूप में ही आती है I
  • और जब यह मारक सिद्धि चलित हो जाती है, और अपने कार्य प्रारम्भ करके कुछ आगे की ओर भी बढ़ जाती है, तब ही वो तारक सिद्धि स्वयं प्रकट होती है I और जहाँ वो तारक सिद्धि जीवातीत और जगतातीत ही होती है I
  • और क्यूँकि काल आयाम ही जीव जगत का गर्भ आयाम है, इसलिए जब रचना का गर्भ आयाम, अर्थात काल आयाम ही ऐसा है, तब अन्य तीनों आयाम इससे पृथक कैसे हो सकते हैं? I
  • यही कारण था, कि पूर्व में बताए गए तीनों आयामों के बारे में भी ऐसा ही कहा गया था I

 

इसलिए काल आयाम के दृष्टिकोण से, जो योगी स्वयं ही …

  • जीवधर और जगतधर सिद्धियों का धारण नहीं, वो जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का धारक भी नहीं होगा I
  • जो स्वयं ही जीवातीत और जगतातीत नहीं, वो जीव जगत का तारक भी नहीं हो पाएगा I

जो जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का ही धारक नहीं, वो जीव जगत को क्या तारक मार्ग देगा… थोड़ा सोचो तो? I

और क्यूंकि कलियुग में ऐसे योगी मानव समाजों के भीतर होते ही नहीं हैं, इसलिए जैसे जैसे कलियुग का समयखण्ड बढ़ता चला जाता है, वैसे वैसे कलियुग में तारक बिन्दुओं और उनके मार्गों का आभाव होता ही चला जाता है I

यदि इन सिद्धियों का धारक योगी मानव समाज के किसी परिवार में आ भी गया, तब भी वो समाज से सुदूर ही रहेगा, अर्थात वो समाज में रहता हुआ भी, समाज से सुदूर ही रहेगा I

जैसे जैसे कलयुग गति करता है, वैसे वैसे पूर्व के युगों के तारक बिंदु भी लुप्त होते ही चले जाते हैं I

और जब ऐसा होता है, तो मानव जाती पुरुषार्थसंकर होके, गर्त की दिशा में ही चलने लगती है I

और यदि ऐसी गर्त रूपी कलियुगी दशा में, इस आयाम विज्ञान को प्रकाशित भी किया जाएगा, तो भी इस आयाम विज्ञान के पात्रों की संख्या या तो न्यून से भी न्यून होगी, या इस ज्ञान के पात्र ही नहीं मिलेंगे I

लेकिन क्यूंकि और कुछ ही वर्षों में, कलियुग स्तंभन का समय आ रहा है, और इसके साथ साथ उस आगामी गुरुयुग के प्रकाशन का समय भी आएगा, इसलिए इस विज्ञान को उस आगामी गुरु युग (अर्थात वैदिक युग या नारायण युग) की मानव जाती के लिए ही बताया जा रहा है… न की इस कलियुग की काली काया से ग्रसित आज की मानव जाती या कलियुगी पंथों के देवताओं आदि के लिए I

 

आगे बढ़ता हूँ …

कालास्त्र का धारक योगी, यदि जीवातीत और जगतातीत सिद्धियों का भी धारक होगा, तो ऐसा योगी या तो ब्राह्मण क्षत्रिय होगा और या क्षत्रिय ब्राह्मण… वो वर्णाश्रम के और किसी भी भाग का हो ही नहीं सकता I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और क्यूंकि वो साधक जान जाता है, कि वो अखंड सनातन काल ही ईशान ब्रह्म हैं, इसलिए वो साधक यह भी जान जाता है, कि जो ईशान ब्रह्म हैं, वो इस पञ्चब्रह्म गायत्री प्रदक्षिणा और पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत के अंतिम पड़ाव होते हुए भी… उनका कोई पड़ाव नहीं होता I

जो अखण्ड है, अनादि है, सनातन है, उसका कोई पड़ाव हो भी तो नहीं सकता है I

 

सनातन के कोई एक या अनेक कालखण्ड कैसे हो सकते है? … क्यूंकि वो तो कालखण्डों से ही अतीत है, अर्थात कालातीत है I

अब इसी काल आयाम के अगले बिंदु पर जाता हूँ I

 

गर्भास्त्र से प्रकट हुआ युग ही गुरु युग है, कालास्त्र से प्रकट हुआ युग ही गुरु युग है, कालास्त्र से लाया गया युग ही गुरुयुग है, गर्भास्त्र से लाया गया युग ही गुरुयुग है, …

गुरु युग वो होता है जो …

देवताओं के कलियुग तो बीच में ही स्तंभित करके, पृथ्वी के अग्रगमन चक्र में, मानव सत्युग के स्वरूप में ही प्रकट करा जाता है I

 

इसलिए, जो मानव युग …

देव कलियुग को स्तंभित करके और उस देव कलियुग के भीतर ही, जो मानव सत्युग के स्वरूप में कोई 10,000 वर्षों की अवधि के लिए एक मानव युग लाया जाता है, उसको ही गुरुयुग कहते हैं I

और क्यूंकि यह युग एक चलते हुए देव युग को ही स्तंभित करके प्रकट किया जाता है, इसलिए यह वैदिक प्रक्रिया से ही लाया जाता है, क्यूंकि इस समस्त जीव जगत में वेद ही एकमात्र मार्ग है, जिसमें प्रकृति का आलम्बन लेकर भी ब्रह्म को पाया जा सकता है, और जिसका नाता प्रकृति रूपी ब्रह्मशक्ति और ब्रह्म, दोनों से ही समान रूप में होता है I

और क्यूंकि वेद मार्ग ही एकमात्र मार्ग है, जिसमें प्रकृति ही ब्रह्म होती हैं और ब्रह्म ही प्रकृति, इसलिए इस युग को लाने के लिए वेद मार्ग का ही आलम्बन लिया जाता है I इसके कारण ही ये गुरुयुग, वैदिक युग भी कहलाता है I

इस युग के प्रकटीकरण के लिए, सर्वप्रथम प्रकृति के ब्रह्मशक्ति स्वरूप का मूलास्त्र या गर्भास्त्र स्वरूप, जो कालास्त्र है, उसका मारक रूप में ही शनैः शनैः प्रयोग होता है I आज के समयखण्ड में, ऐसा हो भी रहा है I

और इस मारक रूप के प्रयोग के चलित होने पर, इसी कालास्त्र में ही माँ प्रकृति, ब्रह्म होकर तारक रूप में प्रकट होती है I

इसलिए इस गुरु युग आगमन प्रक्रिया में भी मारक तत्त्व, तारक तत्त्व से पूर्व में ही आता है I

और ऐसे ही प्रत्येक युग, मन्वन्तर आदि के परिवर्तन समय में भी होता है I

 

आगे बढ़ता हूँ …

और ऐसा ही उस अखंड सनातन तत्त्व का सिद्ध योगी भी होता है, जिसको माँ प्रकृति लौटाती हैं, जब गुरु युग के आगमन का समय समीप हो जाता है, और जब उस गुरु युग के प्रारंभिक प्रकाश को 54 +/- 2.7 वर्ष ही शेष रह जाते हैं I

लेकिन इस प्रारंभिक प्रकाश के पश्चात भी उस गुरुयुग को पूर्णरूपेण प्रकाशित होने में, 54 +/- 27 वर्ष और लगेंगे I

 

यह प्रारंभिक प्रकाश का समय, 2028 ईस्वी से 2.7 वर्षों के भीतर होना है… और होगा ही क्यूंकि जिस समय में यह भाग लिख रहा हूँ, उस समय से कुछ पूर्व में ही, माँ प्रकृति द्वारा इस कालास्त्र का प्रयोग करा जा चुका है …

 

  • माँ प्रकृति ने आज तक इस गर्भास्त्र (अर्थात कालास्त्र) का ज्ञान बस कुछ ही देवत्व, जीवत्व और जगतत्व सिद्ध योगीजनों को ही प्रदान किया है I

लेकिन इस ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, ऐसे देवता, योगी आदि भी तो गिने चुने ही हुए हैं I

और इसलिए इस काल ज्ञान के मारक और तारक, दोनों बिंदुओं के धारक योगी इस समस्त ब्रह्म रचना में, बस गिने चुने ही हैं I

और इसके अतिरिक्त, में प्रकृति ने इस कालास्त्र का पूर्ण ज्ञान तो किसी को भी नहीं दिया है I

इसलिए इस कालास्त्र का पूर्ण ज्ञाता माँ प्रकृति के सीवा कोई और है भी नहीं I

 

  • गर्भास्त्र (अर्थात कालास्त्र) जो ब्रह्म रचना का अस्त्र ही है, इसकी आज तक कोई काट बनाई ही नहीं गई है… और न ही इसकी काट कभी बनाई ही जा सकती है I

ऐसे होने का कारण है, कि मूल का कोई मूल होता ही नहीं है, इसलिए मूल की काट भी नहीं होती है I

इसलिए जब युग समापन, युग स्तंभन आदि प्रक्रियाएँ चलनी होती है, तब ही वो चलती है I और जब उन प्रक्रियाओं को पूर्ण होना होता है, तब ही वो पूर्ण भी होती हैं I

और क्यूंकि इस कलियुग के कालखंड में और इस कलियुग थोड़ा पहले के कालखंड के, किसी भी मजहब, पंथ आदि के देवता के पास इस गर्भास्त्र की काट है ही नहीं, इसलिए उन सभी ने अपने अपने ग्रंथों में अंत समय की बात भी करी है I

यदि कलियुग के समय में आए ग्रंथों के देवताओं के पास इस गर्भास्त्र से बचने की कोई काट होती, तो वो देवता वैदिक ऋषियों के द्वारा बताए समयचक्र की बात करते… न कि अंत समय की I

ऐसा उन सभी कलियुग के कालखंड में आए देवताओं ने इसलिए कहा गया था, क्यूंकि उनको पता था कि उनके पास इस कालास्त्र की काट है ही नहीं I

यदि उनके पास इसकी काट होती तो अपने ग्रंथों में, कहीं न कहीं वो कहते ही, कि समय का अंत आएगा ही नहीं I लेकिन ऐसा वो कहेंगे कैसे, जब कालास्त्र का ज्ञान ही वैदिक है, न की किसी म्लेच्छ सत्ता या उसके देवता का I

यही वो प्रमाण है, कि उनके पास समय की काट है ही नहीं, और इसका कारण भी यही है, कि समय ही समस्त रचना और रचना के समस्त तंत्र का गर्भ है I

इसलिए यदि समय को जानना है, तो रचित, रचना, और तंत्रातीत रचैता, एकसाथ होकर ही जाना जा सकता है I

इसलिए जो योगी कार्य ब्रह्म में ही विलीन नहीं होंगे, वो समय को जानते ही नहीं होंगे I

और जो योगी इन कार्य ब्रह्म में विलीन होके, उस सनातन काल को नहीं जानेंगे, वो कालास्त्र को धारण भी नहीं किए होंगे I

और जो योगी ऐसे नहीं होंगे, वो कालास्त्र को समझते भी नहीं होंगे, इसलिए उनके पास कालास्त्र की काट भी नहीं होगी I

लेकिन यह सभी जानने को तो उन माँ प्रकृति (अर्थात ब्रह्मशक्ति) का आशीर्वाद भी अनिवार्य है I

वैसे समस्त ब्रह्माण्ड के समस्त इतिहास में, माँ प्रकृति ने ऐसा आशीर्वाद बहुत ही कम जीवों को दिया है, इसलिए ऐसे जीवों की संख्या भी इतनी न्यून है, कि यदि उनको अपने एक हाथ की उँगलियों पर ही गिनोगे, तो भी उँगलियाँ ही अधिक पायी जाएंगी I

 

आयाम चतुष्टय का स्वरूप चतुष्टय, आयाम चतुष्टय का बुद्ध स्वरूप, आयाम चतुष्टय का भूमि स्वरूप, आयाम चतुष्टय का भूमा स्वरूप, आयाम चतुष्टय का भूमत्व स्वरूप, आयाम चतुष्टय भूधर भूमि भूमा भूमत्व स्वरूप, भूधर भूमि भूमा भूमत्व, भूधर, भूमि, भूमा, भूमत्व,…

क्यूंकि आयाम चतुष्टय के भूधर, भूमि, भूमा और भूमत्व स्वरूप भी होते हैं, इसलिए, ऊपर बताए गए आयाम चतुष्टय विज्ञान के बिन्दुओं में भी ऐसा ही कहीं स्पष्ट और कहीं सांकेतिक रूप में ही सही, लेकिन कहा गया था I

 

आयाम चतुष्टय से सम्बंधित …

  • जो भूमि शब्द है, वो इन आयाम चतुष्टय के चक्र स्वरूप में है I
  • जो भूधर शब्द है, वो आयाम चतुष्टय विज्ञान ही है I
  • और जो भूमत्व है, वो इस आयाम चतुष्टय के चक्र और गंतव्य स्वरूप का साक्षात्कार ही है I
  • जो भूमा है, वो साधक का आत्मस्वरूप है, जो ब्रह्म कहलाता है और जो इन आयाम चतुष्टय में बताए गए उनके समस्त (अर्थात चक्र और गंतव्य) दोनों ही स्वरूपों में समान रूप में स्थित, इनका साक्षी मात्र ही होता है I

इसलिए जिस साधक ने इन आयाम चतुष्टय को पूर्णरूपेण जान लिया, वो अपने आत्मस्वरूप में, ब्रह्माण्डीय दिव्यताओं के दृष्टिकोण से, अंततः भूमा शब्द से ही जाना जाएगा I

और ऐसे साधक की उपलब्धि भी, उन भूमा स्वरूप सनातन ब्रह्म का सार्वभौमिक, सर्वव्यापक, सर्वदिशा स्थित, अनंत और सनातन भूमत्व ही कहलाएगा I

 

टिप्पणियां:

  • जो चतुर्मुखा पितामह ब्रह्मा हैं, वही तैंतीस कोटि देवी देवताओं में प्रजापति नाम से पुकारे जाते है I
  • वो प्रजापति हीरे के समान प्रकाशमान हैं, न की सुनहरे I इसलिए उनको इस ग्रन्थ में सर्वसम भी कहा गया है I
  • आज जो वैष्णवाचार्य, सद्योजात (अर्थात हिरण्यगर्भ) को चतुर्मुखा कह रहे हैं, वो सत्य नहीं है क्यूंकि हिरण्यगर्भ एक मुखा हैं, न की चतुर्मुखा I
  • हिरण्यगर्भ साधक के वो आत्मा हैं, जो बाल रूप में होती है, और ब्रह्मरंध्र के भीतर जो तीन छोटे छोटे चक्र होते हैं, उनमें से मध्यम चक्र जो बत्तीस दल कमल स्वरूप में है, उनमें बैठे होते हैं, और आकाश की ओर (अर्थात ब्रह्मरंध्र से ऊपर या बाहर की ओर) देखते है I
  • उस सगुण रूप में सुनहरी आत्मा की दिव्यता को ही, माँ ब्रह्माणी सरस्वती कहा जाता है, जिनका संबंध ईशान ब्रह्म और माँ गायत्री के मुक्ता मुख से भी है I
  • यह सुनेहरी आत्मा बालक रूप में है I और यही बालक स्वरूप आत्मा, साधक की काया के भीतर विराजमान राम लल्ला भी है I
  • वास्तव में तो वेदों के तैंतीस कोटि देवी देवताओं में तैंतीसवें देवता जो प्रजापति के नाम से पुकारे गए हैं, वही चतुर्मुखा हैं, और उनका स्वरूप सर्वसम है, अर्थात हीरे के समान प्रकाशित है I
  • वह सर्वसम चतुर्मुखा प्रजापति एक वृद्ध मानव स्वरूप से साक्षात्कार होते हैं I
  • और उनका साक्षात्कार भी ब्रह्मलोक के बीस उप-लोकों से परे जाकर, उसी ब्रह्मलोक में ही होता है I

जब किसी भी साधक को यहाँ बताए गए दोनों बिंदुओं का साक्षात्कार होगा, तो वो साधक वही कहेगा जो यहाँ लिखा गया है I

 

पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखी गायत्री का मूल स्वरूप, … पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत, गायत्री पञ्चब्रह्म सिद्धांत,  …

वैदिक वाङ्मय में जो कुछ भी है, या अब तक कभी भी हुआ है, या आगे के किसी भी समयखंड में होगा, उन सब के मूल में यहाँ बताया गया पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखी गायत्री सिद्धांत ही है I

लेकिन क्यूंकि ईशान ब्रह्म ही निर्गुण निराकार हैं, इसलिए उनका संबंध केवल वेदांत (उपनिषद) से है, अर्थात वेद चतुष्टय के गंतव्य से है I

और क्यूंकि गायत्री विद्या के मुक्ता नामक मुख का नाता भी, उन निरंग स्फटिक के समान ईशान ब्रह्म से ही है, इसलिए माँ गायत्री का मुक्ता मुख भी उन्ही निर्गुण निराकार ब्रह्म को दर्शाता है, जो कैवल्य मोक्ष भी कहलाते हैं I

 

इसलिए, …

  • पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री के सिद्धांत पर ही वेद चतुष्टय बसाया गया है I
  • पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री के सिद्धांत पर ही पीठ चतुष्टय बसाई गई हैं I
  • पञ्चब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री के सिद्धांत पर ही धाम चतुष्टय बसाए गए हैं I
  • और इनही पञ्च ब्रह्म और पञ्च मुखा गायत्री के सिद्धांत पर ही वो सब कुछ बसाया गया है, जो वैदिक वाङ्मय का देवत्व, जीवत्व, जगतत्व, बुद्धत्व, विष्णुत्व, शिवत्व और ब्रह्मत्व आदि बिन्दुओं सा प्रतीत हो रहा है I
  • इस समस्त जीव जगत में, कोई भी मार्ग या पंथ और उसका देवी देवता हो ही नहीं सकता, जिसका इस मूल सिद्धांत, पञ्चब्रह्म गायत्री सिद्धांत से सीधा (या अन्य कोई घूमता फिरता हुआ) नाता नहीं होगा I

 

सिद्धांतातीत ब्रह्म, तंत्रातीत ब्रह्म, … सिद्धांत और आयाम, तंत्र और आयाम

ऊपर बताए गए समस्त बिन्दुओं से कुछ बातें स्पष्ट होती है, कि आयाम ब्रह्माण्ड के सिद्धांत और तंत्र सहित, ब्रह्म के सिद्धांतातीत और तंत्रातीत स्वरूपों को भी दर्शाते हैं I

 

अब इसको संक्षेप में बताता हूँ …

  • चक्र स्वरूप में आयाम, ब्रह्माण्डीय सिद्धांत और तंत्र के द्योतक हैं I ऐसे चक्र स्वरूप में सिद्धांत और तंत्र, शक्ति रूप में ही हैं, जिनका आलम्बन लेके यह समस्त जीव जगत अपनी निर्धारित दिशा-दशा आदि में चलायमान रहता है I
  • चक्रतीत स्वरूप में, आयाम ही सिद्धांतातीत और तंत्रातीत हैं I और ऐसे स्वरूप में, वो आयाम ही सिद्धांतातीत ब्रह्म और तंत्रातीत ब्रह्म को दर्शाते हैं, उन्ही ब्रह्म के द्योतक हैं I

इसी बिंदु पर यह अध्याय और यह अध्याय श्रंखला भी समाप्त होती है I

 

तमसो मा ज्योतिर्गमय

 

 

 

लिंक:

आकाश की इकाई : (unitary value of space, space units, unit of space).

काल की इकाई : (celestial time, unit of time, Unitary value of time).

 

 

 

 

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