आत्मा ही ब्रह्म, बूंद ही सागर, आत्मा और ब्रह्म, बूंद और सागर
स्वयं ही स्वयं के मार्ग में, अंतिम ज्ञान जो होता है, उसमें साधक का आत्मा ही ब्रह्म होता है। लेकिन, ऐसे साक्षात्कार से पूर्व, अपने पिण्ड स्वरूप में, साधक जो बूँद सरिका होता है, वो स्वयं को सागर रूप में …